আল-জামি` আল-কামিল
4221 - عن صلة، قال: كنا عند عمار في اليوم الذي يشك فيه، فأتي بشاة، فتنحى بعض القوم.
فقال عمار: من صام هذا اليوم فقد عصى أبا القاسم صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أبو داود (2334)، والترمذيّ (686)، والنسائيّ (2188)، وابن ماجه (1645) كلّهم من طرق عن عمرو بن قيس الملائيّ، عن أبي إسحاق، عن صلة بن زفر، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (1914)، وابن حبان (3585)، والحاكم (1/ 423). قال الترمذي: حديث حسن صحيح.
وقال الدارقطني: هذا إسناد حسن صحيح، ورواته كلهم ثقات.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
وأبو إسحاق هو عمرو بن عبد الله السبيعي اختلط بآخره، ولكنه لم يختلط في هذا لوجود طريق آخر يقويه.
وهو ما رواه ابن أبي شيبة (3/ 72) عن عبد العزيز بن عبد الصمد العمّي، عن منصور، عن ربعي، أنّ عمار بن ياسر وناسًا معه أتوهم بمسلوخة مشوية في اليوم الذي يشك فيه أنه من رمضان أو ليس من رمضان، فاجتمعوا واعتزلهم رجل، فقال له عمار: تعالَ، فكل. قال: فإني صائم.
فقال عمار: إن كنت تؤمن بالله واليوم الآخر فتعال فكل. وهذا إسناد صحيح.
সিলাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা শাবান মাসের সন্দেহের দিনে আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। তখন একটি বকরির গোশত আনা হলো। উপস্থিত কিছু লোক (তা খাওয়া থেকে) সরে গেল। তখন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "যে ব্যক্তি এই দিনে রোযা রাখল, সে আবূল কাসেম (মুহাম্মদ) (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবাধ্যতা করল।"
4222 - عن محمد بن كعب القرظيّ، قال: دخلت على أنس بن مالك عند العصر يوم يشكون فيه رمضان، وأنا أريد أن أسلِّم عليه، فدعا بطعام فأكل. فقلت: هذا الذي تصنع سنة؟ قال: نعم.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (9039) من طريق محمد بن جعفر بن أبي كثير، عن زيد ابن أسلم، عن محمد بن المنكدر، عن محمد بن كعب القرظي، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 148): رجاله رجال الصحيح.
قلت: وهو كما قال.
ومحمد بن جعفر بن أبي كثير وإن كان تفرّد به عن زيد بن أسلم كما قال الطبرانيّ فهو ثقة ثبت لا يضره تفرّده.
وممن روي عنه النهي عن صوم يوم الشك: عمر وعلي وعبد الله بن مسعود وعبد الله بن عباس وابن عمر وحذيفة وأنس بن مالك وغيرهم.
ذكرهم ابن أبي شيبة (3/ 71 - 72)، والبيهقي في السنن الكبرى (4/ 208 - 209).
وبه قال سفيان الثوريّ، ومالك بن أنس، وعبد الله بن المبارك، والشافعي وأحمد وإسحاق. كره هؤلاء أن يصوم الرجل اليوم الذي يشك فيه. انظر: الترمذي (3/ 61).
وكانت عائشة وأسماء ابنتا أبي بكر تصومان يوم الشك، وكانت عائشة تقول: لأن أصوم يومًا
من شعبان أحبّ إلي من أن أفطر يومًا من رمضان.
وكان ابن عمر يقول:"إذا لم يُر هلالُ رمضان ليلة ثلاثين من شعبان، وكان صحوًا فلا صيام رمضان، وإن لم يكن صحوًا، وكان في السماء غيم أصبح الناس صائمين، وأجزأهم من رمضان إن ثبت بعد أن الشهر كان من تسع وعشرين".
وليس في كلامه ما يدلّ على صوم يوم الشّك. وقد ثبت عنه أنه قال:"لو صمتُ السنة كلَّها، لأفطرتُ اليوم الذي يُشكّ فيه".
رواه ابن أبي شيبة (3/ 71) عن وكيع، عن سفيان، عن عبد العزيز بن حكيم، قال: سمعت ابن عمر، فذكره.
وقال الجمهور: إن جاء الخبر بعد ذلك اليوم أو بعدما أمسوا أو أخطأوا في تقدير الهلال كان عليهم قضاء ذلك اليوم.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনে কা'ব আল-কুরযী বলেন: আমি এমন এক দিনে আসরের সময় আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম যেদিন লোকেরা রমজানের বিষয়ে সন্দেহ করছিল। আমি তাঁকে সালাম দিতে চাইছিলাম, তখন তিনি খাবার আনতে বললেন এবং খেলেন। আমি বললাম: আপনি যা করলেন, এটা কি সুন্নাহ (নবীজীর তরিকা)? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
4223 - عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الصوم يوم تصومون، والفطر يوم تفطرون، والأضحى يوم تضحّون".
حسن: رواه الترمذي (697) عن محمد بن إسماعيل، حدثنا إبراهيم بن المنذر، حدثنا إسحاق ابن جعفر بن محمد، حدثني عبد الله بن جعفر، عن عثمان بن محمد الأخنسي، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكره. قال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في عثمان بن محمد الأخنسي فوثّقه ابن معين، وقال النسائي: ليس بذاك القري. وقيده علي بن المديني بأنه روي عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة أحاديث مناكير.
وذكره ابن حبان في"الثقات" والخلاصة فيه أنه حسن الحديث إذا لم يرو عن سعيد بن المسيب.
وللحديث طرق أخرى:
منها ما رواه أبو داود (2324) عن محمد بن عبيد، حدّثنا حماد في حديث أيوب، عن محمد ابن المنكدر، عن أبي هريرة، ذكر النبيّ صلى الله عليه وسلم فيه قال:"وفطركم يوم تفطرون، وأضحاكم يوم تضحون، كلّ عرفة موقف، وكلّ مني منحر، وكلّ فجاج مكة منحر، وكل جمع موقف".
فزاد فيه الجمل الأخيرة.
ومحمد بن المنكدر لم يلق أبا هريرة على الصحيح كما قال يحيى بن معين وأبو زرعة. وقال المنذري: روي عن أبي هريرة ولم يسمع منه.
ومنها ما رواه ابن ماجه (1660) عن محمد بن عمر المقريّ، قال: حدثنا إسحاق بن عيسي، قال: حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، قال:"الفطر يوم تفطرون، والأضحى يوم يضحون".
وفيه شيخ ابن ماجه محمد بن عمر المقريّ قال فيه الحافظ:"لا يعرف ولعله محمد بن أبي عمر الدوري". ثم هو خالف نجعل عن أيوب عن محمد بن سيرين، والصحيح أنه عن محمد بن المنكدر كما رواه الثقات.
ومنها جعله من مسند عائشة.
رواه الترمذي (802)، والدارقطني (2447) كلاهما من طريق يحيي بن اليمان، عن معمر، عن محمد بن المنكدر، عن عائشة -قال أبو هشام: أظنه رفعه- قال:"الفطر يوم يفطر الناس، والأضحى يوم يضحّي الناس".
قال الترمذي: سألت محمدًا قلت له: محمد بن المنكدر سمع من عائشة؟ قال: نعم، يقول في حديثه: سمعت عائشة.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب صحيح من هذا الوجه".
قلت: بل إسناده ضعيف من أجل الكلام في يحيي بن اليمان، ومخالفته للثقات الذين جعلوا هذا الحديث من مسند أبي هريرة.
إلا أنه اختلف في رفعه ووقفه كما ذكره الدّارقطني في كتابه"العلل" (1867).
والخلاصة أنّ الحديث حسن بالإسناد الذي ساقه الترمذي، والأسانيد الأخرى تقويه إلا جملًا يسيرة لم تثبت.
ومعنى الحديث: إنّ الصوم والفطر مع الجماعة وعُظْم الناس كما قال الترمذيّ.
فلا يجوز لأحد أن يشذّ عن الجماعة في بداية الصيام وعيدي الفطر والأضحى.
قال السندي:"والظاهر أن معناه أنّ هذه الأمور ليس للآحاد فيها دخل، وليس لهم التفرّد فيها، بل الأمر فيها إلى الإمام والجماعة، ويجب على الآحاد اتباعهم للإمام والجماعة، وعلى هذا فإذا رأى أحدٌ الهلالَ، وردّ الإمامُ شهادته ينبغي أن لا يثبت في حقّه شيء من هذه الأمور، ويجب عليه أن يتبع الجماعة في ذلك" اهـ.
وقيل: له أن يصوم أو يفطر إذا رأى الهلال إلا أنّه لا يعَيِّد إلّا مع النّاس.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: রোযা হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা রোযা রাখো; আর ঈদুল ফিতর হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা রোযা ভঙ্গ করো (ঈদ উদযাপন করো); এবং ঈদুল আযহা হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা কুরবানি করো।
4224 - عن أبي بكرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"شهران لا ينقصان، شهرا عيدٍ: رمضان، وذو الحجة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1912)، ومسلم في الصيام (1089) كلاهما من طريق معتمر بن سليمان، عن إسحاق بن سويد، وخالد الحذّاء، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، فذكره. واللفظ للبخاري.
قوله:"شهران لا ينقصان" قال أحمد معناه: شهرا عيدٍ لا ينقصان أي لا ينقصان معًا في سنة واحدة، شهر رمضان، وذو الحجة، إن نقص أحدهما تم الآخر". ذكره الترمذي عقب تخريج الحديث (692).
وقيل: معناه لا ينقصان في الفضيلة إن كانا تسعة وعشرين أو ثلاثين.
هذا القولان مشهوران عن السلف كما قال الحافظ في"الفتح" (4/
আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "দুটি মাস (তার পূর্ণতা থেকে) কম হয় না, আর তা হলো দুই ঈদের মাস: রমযান এবং যুলহাজ্জা।"
4225 - عن كريب، أنّ أمَّ الفضل بنت الحارث بعثته إلى معاوية بالشّام. قال: فقدمتُ الشام، فقضيتُ حاجتها، واستهل عليَّ رمضان وأنا بالشّام. فرأيت الهلال ليلة الجمعة، ثم قدمتُ المدينة في آخر الشّهر، فسألني عبد الله بن عباس رضي الله عنهما، ثم ذكر الهلال فقال: متى رأيتم الهلال؟ فقلت: رأيناه ليلة الجمعة. فقال: أنت رأيتَه؟ فقلتُ: نعم، ورآه الناس وصاموا وصام معاوية. فقال: لكنا رأيناه ليلة السبت، فلا نزال نصوم حتى نكمل ثلاثين أو نراه. فقلتُ: أو لا تكتفي برؤية معاوية وصيامه؟ فقال: لا، هكذا أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1087) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن محمد بن أبي حرملة، عن كريب، به، فذكره.
وقوله: هكذا أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم، أراد به قوله صلى الله عليه وسلم:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته" وقد يكون عنده حديث آخر أخصّ من هذا في مثل هذه الحادثة.
ولعلّ ابن عباس فهم من هذا النّص أنّ لكل بلد له رؤية؛ لاختلاف المطالع، وهو رأي لبعض أهل العلم.
وذهب آخرون إلى أنّ أهل بلد إذا رأوا الهلال لزم جميع البلاد الصوم، وهو مذهب أحمد والليث وبعض أصحاب الشافعي كما في المغني لابن قدامة.
وهو مذهب المالكية أيضًا.
وقد أفتت اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والدعوة والإفتاء فتوي (319):"يجب على من لم ير الهلال في مطلعهم في صحو أو غيم أن يتموا العدّة ثلاثين إن لم يره غيرهم في مطلع آخر.
فإن ثبت عندهم رؤية الهلال في غير مطلعهم لزمهم أن يتبعوا ما حكم به ولي الأمر العام المسلم
في بلادهم من الصوم أو الإفطار؛ لأن حكمه في مثل هذه المسألة يرفع الخلاف بين الفقهاء في اعتبار اختلاف المطالع وعدم اعتباره.
فإن لم يكن ولي أمرهم الحاكم في بلادهم مسلمًا عملوا بما يحكم به مجلس المركز الإسلامي في بلادهم من الصوم تبعًا لرؤية الهلال في غير مطلعهم أو الإفطار عملًا باعتبار اختلاف المطالع".
وقالت اللجة:"وربما استدل الفريقان بالنّص الواحد كاشتراكهما في الاستدلال بقوله: {فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ} [البقرة: 185]، وبقوله: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَهِلَّةِ قُلْ هِيَ مَوَاقِيتُ لِلنَّاسِ} [البقرة: 189]، وبقوله صلى الله عليه وسلم:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته" إلخ، وغير هذا من النّصوص؛ وذلك لاختلاف الفريقين في فهم النصوص وسلوك كل منهما طريقًا في الاستدلال بها، ولم يكن لهذا الاختلاف بينهم أثر سيء تخشى عاقبته لحسن قصدهم واحترام كل مجتهد منهم اجتهاد الآخر وحيث اختلف السابقون من أئمة الفقهاء في هذه المسألة وكان لكل أدلته".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, নিশ্চয় উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস তাঁকে (কুরাইবকে) সিরিয়ায় মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠান। কুরাইব বলেন, আমি সিরিয়ায় পৌঁছলাম এবং তাঁর প্রয়োজন পূরণ করলাম। আমি সিরিয়ায় অবস্থানকালে রমজান শুরু হয়ে গেল। আমি জুমুআর রাতে চাঁদ দেখলাম। এরপর মাসের শেষে আমি মদীনায় ফিরে এলাম। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন এবং চাঁদ প্রসঙ্গে আলোচনা করে বললেন: তোমরা কখন চাঁদ দেখেছিলে? আমি বললাম: আমরা জুমুআর রাতে চাঁদ দেখেছিলাম। তিনি বললেন: তুমি নিজে দেখেছো? আমি বললাম: হ্যাঁ, আর লোকেরা চাঁদ দেখেছে এবং রোজা রেখেছে, মুআবিয়াও রোজা রেখেছেন। তখন তিনি বললেন: কিন্তু আমরা তো শনিবার রাতে চাঁদ দেখেছি। সুতরাং আমরা ত্রিশ পূর্ণ না করা পর্যন্ত অথবা পুনরায় চাঁদ না দেখা পর্যন্ত রোজা রাখতেই থাকব। আমি বললাম: আপনি কি মুআবিয়ার দেখা ও রোজা রাখাকে যথেষ্ট মনে করেন না? তিনি বললেন: না, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এভাবেই নির্দেশ দিয়েছেন।
4226 - عن عبد الله بن عمر، قال: تراءى الناس الهلال، فأخبرت رسول الله صلى الله عليه وسلم أني رأيته فصامه وأمر الناس بصيامه.
صحيح: رواه أبو داود (2342) عن محمود بن خالد وعبد الله بن عبد الرحمن السمرقنديّ -وأنا لحديثه أتقن-، قالا: حدّثنا مروان (وهو ابن محمد)، عن عبد الله بن وهب، عن يحيى بن عبد الله ابن سالم، عن أبي بكر بن نافع، عن أبيه، عن ابن عمر، قال: فذكره.
وإسناده صحيح. وعبد الله بن عبد الرحمن السّمرقنديّ هو الحافظ الدّارميّ صاحب السنن، والحديث في"سننه" (1733) ومن طريقه أخرجه أيضًا ابن حزم في"المحلي" (6/ 236) وقال:"هذا خبر صحيح".
وصحّحه أيضًا ابن حبان (3447). وقال الدارقطني (2146) تفرد به مروان بن محمد، عن ابن وهب، وهو ثقة.
قلت: وفات الدارقطني، فإنه رواه أيضًا هارون بن سعيد الأيلي وهو ثقة فاضل، عن عبد الله بن وهب، بإسناده مثله. ومن طريقه رواه الحاكم (1/ 423) وعنه البيهقيّ (4/ 212).
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা চাঁদ (অর্থাৎ রমজানের নতুন চাঁদ) দেখার চেষ্টা করল। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দিলাম যে আমি তা দেখেছি। অতঃপর তিনি সে দিন রোযা রাখলেন এবং লোকদেরকেও রোযা রাখার নির্দেশ দিলেন।
4227 - عن ابن عباس، قال: جاء أعرابيٌّ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني رأيت الهلال - يعني هلال رمضان- فقال:"أتشهد أن لا إله إلا الله؟" قال: نعم، قال:"أتشهد أنّ محمدًا رسول الله؟" قال: نعم. قال:"يا بلال، أذّن في الناس أن يصوموا غدًا".
حسن: رواه أبو داود (2333)، والترمذي (691) كلاهما من حديث الوليد بن أبي ثور، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وكذلك رواه زائدة بن قدامة، عن سماك، بإسناده مثله.
ومن طريقه رواه الترمذي (691)، وابن ماجه (1652)، والنسائي (3113). وصحّحه ابن خزيمة (1923)، وابن حبان (3446)، والحاكم (1/ 434) كلهم من هذا الطّريق موصولًا.
وقال الحاكم:"وقد احتجّ البخاريّ بأحاديث عكرمة، واحتج مسلمٌ بأحاديث سماك بن حرب، وحماد بن سلمة، وهذا الحديث صحيح ولم يخرجاه".
وكذلك رواه حماد بن سلمة، عن سماك بإسناده، مثله.
ومن طريقه رواه الحاكم (1/ 424) وعنه البيهقيّ.
وكذلك رواه حازم بن إبراهيم، عن سماك بإسناده مثله.
ومن طريقه رواه الطبراني في الكبير (11/ 235).
وهؤلاء أصحاب سماك رووه عنه موصولًا - بذكر ابن عباس.
ورواه سفيان بن عيينة، عنه، ولكن اختلف أصحابه عليه.
فرواه الفضل بن موسى السينانيّ، عن سفيان، عنه موصولًا.
ومن طريقه رواه النسائي (2112)، والبيهقي (4/ 212) وقال: وكذلك روي عن أبي عاصم، عن الثوريّ موصولًا. ورواه غيرهما عن الثوريّ مرسلًا.
قلت: ومن هؤلاء أبو داود الطيالسي، وابن المبارك كلاهما عن سفيان، عن سماك، مرسلًا.
ولم يذكرا ابن عباس.
ومن طريقهما رواه أيضًا النسائي (2114، 2116).
والحكم لمن وصل لأنه ليس لابن عباس أن يقول لبلال: أذّنْ في الناس …
وسماك بن حرب، وإنْ كان اضطربَ في رواية عكرمة إلا وله ما يشهد له بأنه لم يضطرب في هذا.
قال الترمذي:"والعمل على هذا الحديث عند أكثر أهل العلم. قالوا: تقبل شهادة رجل واحد في الصيام. وبه يقول ابن المبارك والشافعي وأحمد وأهل الكوفة. قال إسحاق: لا يُصام إلّا بشهادة رجلين. ولم يختلف أهل العلم في الإفطار أنه لا يقبل فيه إلّا شهادة رجلين" انتهي.
انظر للمزيد"المنة الكبري" (3/ 292 - 295).
وأزيد هنا أن آخر قولي الشافعي أنه لا بد من عدلين ففي الأم. قال الربيع: قال الشافعي بعد:"لا يجوز على رمضان إلّا شاهدان".
وأمّا الحنفية فوافقوا الجمهور على الاكتفاء في ثبوت هلال رمضان بعدل واحد، لكن خصُّوا ذلك بما إذا كان في السماء علة من غيم أو غبار ونحو ذلك، وإلا لم يقبل إلا من جمع كثير يقع
العلم بخبرهم. انظر: طرح التثريب (4/
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, আমি চাঁদ দেখেছি—অর্থাৎ রমাদানের চাঁদ। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: ‘তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই?’ সে বলল, হ্যাঁ। তিনি আবার জিজ্ঞাসা করলেন: ‘তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল?’ সে বলল, হ্যাঁ। তিনি তখন বললেন: ‘হে বিলাল, লোকদের মাঝে ঘোষণা করে দাও যেন তারা আগামীকাল রোযা রাখে।’
4228 - عن حسين بن الحارث الجدليّ -من جديلة قيس-، أنّ أمير مكة خطب، ثم قال: عهد إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن ننسُك للرؤية، فإن لم نره وشهد شاهدا عدل نسكنا بشهادتهما، فسألت الحسين بن الحارث: مَنْ أميرُ مكة؟ قال: لا أدري، ثم لقيني بعد قال: هو الحارث بن حاطب أخو محمد بن حاطب. ثم قال الأمير: إنّ فيكم من هو أعلم بالله ورسوله مني. وشهد هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم وأومأ بيده إلى رجل - قال الحسين: فقلت لشيخ إلى جنبي: من هذا الذي أومأ إليه الأمير؟ قال: هذا عبد الله بن عمر، وصدق. كان أعلم بالله منه. فقال: بذلك أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (2338) عن محمد بن عبد الرحيم أبي يحيى البزار، ثنا سعيد بن سليمان، ثنا عبّاد، عن أبي مالك الأشجعيّ، ثنا حسين بن الحارث الجدلي، فذكره.
ومن طريقه رواه البيهقيّ (4/ 248).
ورواه الدارقطنيّ (2191، 2192) مختصرًا ومطولًا من وجهين آخرين، عن سعيد بن سليمان، ومن أحد هذين الوجهين أخرجه البيهقيّ.
قال الدارقطني:"هذا إسناد متصل صحيح".
قلت: وهو كما قال، غير أن الحسين بن الحارث الجدلي لم يبلغ درجة الثقات الضابطين، كما أنه ليس بمجهول كما زعم ابن حزم في"المحلى" (6/ 238) لأنه روى عنه عدد، وقال ابن المديني: كان معروفًا، وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 155).
والخلاصة فيه كما قال الحافظ ابن حجر:"صدوق".
ورواه أحمد (18895) عن حسين بن الحارث الجدلي، قال: خطب عبد الرحمن بن زيد بن الخطاب في اليوم الذي يشك فيه، فقال: ألا إني قد جالست أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم وسألتهم، ألا وإنهم حدّثوني أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته، وانسكوا لها، فإن غُمّ عليكم فأتمّوا ثلاثين. وإن شهد شاهدان مسلمان فصوموا وأفطروا" إلا أنه ضعيف.
رواه عن يحيى بن زكريا، قال: أخبرنا حجاج، عن حسين بن الحارث الجدلي، فذكره.
ورواه الدارقطني (2193) من حديث يزيد بن هارون، حدثنا الحجاج بإسناده.
والحجاج هو ابن أرطاة ضعيف.
ورواه النسائي (2116) من طريق يحيي بن زكريا بن أبي زائدة، عن حسين بن الحارث الجدلي ولم يذكر بينهما"الحجاج".
قال ابن عبد الهادي في"تنقيح التحقيق" (3/ 216):"وكأنه وهم".
وقال المزي:"والصواب ذكره".
قلت: قد يكون الوهم في هذا الحديث من الحجاج، فإن الصحيح أن الحسين بن الحارث يروي عن أمير مكة، وجعله الحجاج يرويه عن عبد الرحمن بن زيد بن الخطاب أو صحّ ذلك من وجهين، ولكن النفس لا تطمئن من الحجاج.
وفي الباب ما جاء عن شقيق قال: جاءنا كتاب عمر ونحن بخانقين، قال في كتابه:"إنّ الأهلّة بعضُها أكبر من بعض، فإذا رأيتم الهلال نهارًا فلا تفطروا حتى يشهد شاهدان".
رواه الدارقطني (2196) عن أبي بكر النيسابوريّ، حدّثنا علي بن حرب، وسعدان بن نصر، قالا: حدّثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن شقيق، فذكره.
ورواه شعبة، عن الأعمش، فقال:"إذا رأيتم الهلال من أول النهار فلا تفطروا حتى يشهد شاهدان أنهما رأياه بالأمس".
قال الدارقطني: وهذا أصح إسنادًا من حديث ابن أبي ليلى، وقد تابع الأعمش منصور وكتبناه بعد هذا. ثم أخرج حديث منصور من طرق عنه.
ورواه البيهقي (4/ 248) من طريق شعبة، عن الأعمش، به، مثله.
وقال: هذا أثر صحيح عن عمر رضي الله عنه.
وأثر ابن أبي ليلى الذي أشار إليه الدارقطني رواه هو (2198) وعنه البيهقي (4/ 249) عن أبي بكر النيسابوري، حدّثنا محمد بن علي الوراق، حدثنا عبيدالله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن عبد الأعلى، عن ابن أبي ليلى، قال: كنت عند عمر، فأتاه راكب فزعم أنه رأى الهلال، فأمر الناس أن يفطروا.
قال محمد بن علي: قلت لأبي نعيم: سمع ابن أبي ليلى من عمر؟ قال: لا أدري. قال محمد ابن علي: قلت ليحيى بن معين: سمع ابن أبي ليلى من عمر؟ فلم يثبت ذلك.
وعبد الأعلى هو ابن عامر الثعلبي غيره أثبت منه.
وحديث أبي وائل أصح إسنادًا عن عمر منه. رواه الأعمش ومنصور عن أبي وائل. انتهى.
وزاد البيهقي عن العباس بن محمد الدوريّ، قال: سئل يحيى بن معين عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عمر، فقال: لم يره. قلت: له الحديث الذي يروي كنا مع عمر نتراءى الهلال؟ فقال: ليس بشيء. انتهى.
ورواه أحمد (307)، والبيهقي (4/ 248) عن يزيد بن هارون، أخبرنا ورقاء بن عمر، عن عبد الأعلى الثعلبي، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال:"كنت مع البراء بن عازب وعمر بن الخطاب في البقيع ينظر إلى الهلال، فأقبل راكب، فتلقاه عمر، فقال: من أين جئتَ؟ فقال: من
المغرب. قال: أهللت؟ قال: نعم. قال عمر: الله أكبر إنما يكفي المسلمين الرجل. ثم قام عمر فتوضأ، فمسح على خفيه، ثم صلي المغرب، ثم قال: هكذا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم صنع". وإسناده ضعيف من أجل عبد الأعلى وعبد الرحمن بن أبي ليلى كما سبق.
فقه الباب:
استدل بأحاديث هذا الباب جمهور أهل العلم على أنّ هلال شوال لا يثبت إلّا بشهادة رجلين عدلين. قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (2/ 49 - 50): وكان من هديه صلى الله عليه وسلم أمر الناس بالصوم بشهادة الرجل الواحد المسلم، وخروجهم منه بشهادة اثنين".
وقال النووي في"المجموع" (6/ 281):"هذا مذهبنا، وبه قال العلماء كافّة إلا أبا ثور.
فحكى أصحابنا عنه أنه يقبل في شوال عدل واحد كهلال رمضان. وحكاه ابن المنذر عن أبي ثور وطائفة من أهل الحديث. قال إمام الحرمين: قال صاحب التقريب: لو قلت بما قاله أبو ثور لم أكن مبعدًا" انتهي.
হুসাইন ইবনুল হারিস আল-জাদালি—যিনি কায়স গোত্রের জাদিলা শাখার লোক—থেকে বর্ণিত, মক্কার আমীর ভাষণ দিলেন, অতঃপর বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, আমরা চাঁদ দেখে ইবাদত (রোজা, ঈদ ইত্যাদি) পালন করব। যদি আমরা তা দেখতে না পাই এবং দুজন নির্ভরযোগ্য সাক্ষী সাক্ষ্য দেয়, তবে আমরা তাদের সাক্ষ্য অনুযায়ী ইবাদত পালন করব।
(বর্ণনাকারী বলেন) আমি হুসাইন ইবনুল হারিসকে জিজ্ঞেস করলাম: মক্কার আমীর কে ছিলেন? তিনি বললেন: আমি জানি না। অতঃপর তিনি পরে আমার সাথে সাক্ষাৎ করে বললেন: তিনি হলেন হারিস ইবনু হাতিব, যিনি মুহাম্মাদ ইবনু হাতিবের ভাই।
অতঃপর আমীর বললেন: তোমাদের মাঝে এমন লোক আছেন যিনি আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে আমার চেয়ে বেশি জানেন। এবং তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পক্ষ থেকে এই বিষয়ে (অর্থাৎ চান্দ্র মাসের হুকুমের বিষয়ে) সাক্ষ্য দিলেন—এই বলে তিনি (আমীর) এক ব্যক্তির দিকে হাত দ্বারা ইশারা করলেন।
হুসাইন (বলেন): আমি আমার পাশের এক বয়স্ক ব্যক্তিকে জিজ্ঞেস করলাম: আমীর কার দিকে ইশারা করলেন? তিনি বললেন: ইনি হলেন আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি (আমীর) সত্য বলেছেন। তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু উমর) আমীরের চেয়ে আল্লাহ সম্পর্কে অধিক জ্ঞানী ছিলেন। অতঃপর (আবদুল্লাহ ইবনু উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের এই রূপই আদেশ করেছেন।
4229 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: اختلف الناس في آخر يوم من رمضان. فقدم أعرابيان فشهدا عند النبيّ صلى الله عليه وسلم بالله لأهلا الهلال أمس عشية، فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس أن يفطروا.
زاد خلف في حديثه: وأن يغدوا إلى مصلاهم.
صحيح: رواه أبو داود (2339) عن مسدّد، وخلف بن هشام المقرئ، قالا: حدّثنا أبو عوانة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
ومن طريقه رواه الدارقطني (2202)، والبيهقي (4/ 250) وقال الدارقطني:"هذا إسناد حسن ثابت".
وللدارقطني طريق آخر عن عبيدة بن حميد، عن منصور، به.
وفيه:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أصبح صائمًا لتمام الثلاثين من رمضان فجاء أعرابيان، فشهدا أن لا إله إلا الله، وأنهما أهلّاه بالأمس، فأمرهم فأفطروا". وقال:"هذا صحيح".
ورواه الإمام أحمد (18824)، والبيهقي (4/ 248) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن منصور، به، مثله.
ولكن رواه الحاكم (1/ 297) وعنه البيهقي (4/ 248) من طريق إسحاق بن إبراهيم الطالقاني، ثنا سفيان بن عيينة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن أبي مسعود، قال (فذكر الحديث).
قال البيهقي: وكذلك رواه إبراهيم بن بشار عن سفيان.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين".
وهذا وهمٌ منه فإن إسحاق بن إسماعيل الطالقاني لم يخرج له الشيخان، وإنما أخرج له أبو داود وحده غير أنه ثقة، وتسمية الصحابي أو عدم تسميته لا يؤثّر في صحة الحديث.
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষ রমযানের শেষ দিন নিয়ে দ্বিধায় পড়ে গেল। তখন দুজন বেদুঈন (আরব) আসল এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আল্লাহর নামে সাক্ষ্য দিল যে, তারা গত সন্ধ্যায় চাঁদ দেখেছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদেরকে রোযা ভাঙার (ইফতার করার) নির্দেশ দিলেন।
খলফ তাঁর হাদীসে যোগ করেছেন: এবং তারা যেন পরদিন সকালে তাদের ঈদগাহের দিকে যায়।
4230 - عن أبي عمير بن أنس، عن عمومة له من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم: أنّ ركْبًا جاءوا إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم يشهدون أنّهم رأوا الهلال بالأمس، فأمرهم أن يفطروا، وإذا أصبحوا يغدوا إلى مصلاهم.
حسن: رواه أبو داود (1157)، والنسائي (1556)، والدارقطني (2003) كلهم من حديث شعبة، عن جعفر بن إياس، عن أبي عمير بن أنس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي عمير بن أنس بن مالك، كان أكبر ولد أنس بن مالك، واسمه عبد الله، قال ابن سعد:"كان ثقة قليل الحديث". وذكره ابن حبان في"الثقات".
فلا يقبل فيه قول ابن عبد البر بأنه"مجهول".
وقد صحّح هذا الحديث أبو بكر بن المنذر وغيره.
وقال البيهقيّ:"إسناده حسن، وأبو عمر رواه عن عمومة له من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، وأصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم كلّهم ثقات سواء سمّوا أو لم يسمّوا".
وأما ما رواه سعيد بن عامر، عن شعبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك: أنّ عمومة له شهدوا عند النبيّ صلى الله عليه وسلم على رؤية الهلال … فأخطأ فيه سعيد بن عامر.
ومن طريقه رواه ابن حبان في"صحيحه" (3456).
قال البيهقي:"تفرد به سعيد بن عامر، عن شعبة. وغلط فيه، وإنما رواه شعبة عن أبي بشر".
وهو كما قال. وقد تابعه على ذلك هشيم بن بشير عند ابن ماجه (1653)، وأبو عوانة عند البيهقي، كلاهما عن أبي بشر بإسناده، مثله.
আবু উমাইর ইবনু আনাস তাঁর এমন কতিপয় চাচা থেকে বর্ণনা করেন, যাঁরা রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী ছিলেন, যে একদল আরোহী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে সাক্ষ্য দিলেন যে, তাঁরা গতকাল চাঁদ দেখেছেন। তখন তিনি তাদেরকে ইফতার করার (রোযা ভেঙ্গে ফেলার) নির্দেশ দিলেন এবং যখন তাঁরা সকালে উঠবে, তখন যেন তারা তাদের ঈদগাহের দিকে গমন করে।
4231 - عن حفصة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من لم يبيّت الصّيام من اللّيل فلا صيام له".
صحيح: رواه أبو داود (2454)، وابن خزيمة (1933)، والبيهقي (4/ 202) كلّهم من طرق عن عبد الله بن وهب، حدّثني ابن لهيعة، ويحيى بن أيوب، عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، عن حفصة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكرته.
وهذا إسناد صحيح. ابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أنه من رواية أحد العبادلة عنه، كما أنه توبع.
ورواه النسائي (2332)، والترمذي (730)، والبيهقي من طرق عن يحيى بن أيوب، عن عبد الله ابن أبي بكر، بإسناده، مثله.
إلّا أن الترمذي أعلّه فقال:"حديث حفصة حديث لا نعرفه مرفوعًا إلّا من هذا الوجه"."وقد
رُوي عن نافع، عن ابن عمر قوله، وهو أصح"."وهكذا أيضًا روي هذا الحديث عن الزهري موقوفًا، ولا نعلم أحدًا رفعه إلّا يحيى بن أيوب" انتهي.
ويحيى بن أيوب هو الغافقي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا توبع، وقد رأيت في الإسناد تابعه ابن لهيعة، وروى عنه عبد الله بن وهب وهو أحد العبادلة الذين رووا عنه قبل اختلاطه، وحديثه صحيح، فكيف وقد تابعه يحيى بن أيوب.
فقول الترمذي:"لا نعرفه مرفوعًا إلّا من هذا الوجه" وهو بحسب علمه، وفوق كلّ ذي علم عليم.
وقال أبو داود:"رواه الليث وإسحاق بن حازم أيضًا جميعًا عن عبد الله بن أبي بكر، مثله".
ومعنى هذا أنّ أربعة وهم ابن لهيعة، ويحيى بن أيوب، والليث وإسحاق بن حازم اتفقوا على رفع هذا الحديث.
ويبدو أنه وقع وهم من أبي داود، فإنّ رواية الليث ليست عن عبد الله بن أبي بكر، وإنما هي عن يحيى بن أيوب، كما رواه النسائيّ (2331)، والدارمي (1740) كلاهما عن سعيد بن شرحبيل، حدّثنا الليث، عن يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن أبي بكر، عن سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر، عن حفصة، فذكرته. هذه رواية النسائي.
فيكون الليث بن سعد متابعًا لعبد الله بن وهب.
وأمّا رواية إسحاق بن حازم فرواها ابن أبي شية (3/ 31 - 32) عن خالد بن مخلد، عنه، قال: حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن سالم، عن ابن عمر، عن حفصة، فذكرته.
وعنه رواه ابن ماجه (1700) إلّا أنّ خالد بن مخلد وهو القطوانيّ مختلف فيه إلا أنه لا بأس به في المتابعات.
إلا أنّ الليث بن سعد وإسحاق بن حازم أسقطا ابن شهاب، وكلاهما صحيح فإن عبد الله بن أبي بكر أدرك سالمًا، فإنه تارة روى هكذا، وأخرى هكذا وكلّه صحيح لأنه من الثقات الضابطين.
وقد اختلف على الزهريّ فجاء عنه مرفوعًا كما سبق، وجاء عنه موقوفًا كما قال أبو داود عقب الكلام السابق:"وأوقفه على حفصة: معمر، والزبيدي، وابن عيينة، ويونس الأيليّ كلهم عن الزهريّ".
قلت: حديث ابن عيينة ويونس ومعمر أخرجه النسائي (4/ 197) وزاد ممن رواه عن الزهري موقوفًا:"عبيدالله".
ولكن الحكم لمن زاد، فإن الزهري كثير الرواية فلا يعد أن يروي هؤلاء عنه مرفوعًا، وهؤلاء
عنه موقوفًا.
وقد وجدنا أيضًا ابن جريج ممن روى عن الزهري مرفوعًا. رواه النسائي (2334) من طريق
عبد الرزاق عنه، وابن جريج توبع.
وخلاصة القول: حديث حفصة صحيح مرفوعًا وموقوفًا.
والموقوف هو الأصح، والمرفوع دونه في الصحة. وفيه زيادة علم وهي مقبولة عند جمهور العلماء. ويقوي هذه الزيادة بأن هذا الحكم لا يصدر إلا عن الشارع لما يترتب عليه الوجوب وعدمه، وهي قرينة قوية لرفع الحديث، وإن كان رجاله دون رجال الوقف.
وله شاهد ضعيف عن عائشة رواه الدارقطني (2/ 171 - 172)، والبيهقي (4/ 203) ولكن فيه عبد الله بن عباد البصريّ ثم المصريّ ضعيف جدًّا.
ومع ذلك قال الدارقطني:"تفرّد به عبد الله بن عباد، عن المفضل بهذا الإسناد وكلّهم ثقات".
ونقله عنه البيهقي وأقرّه. وفيه نظر لما قال ابن حبان في المجروحين (574) في ترجمة عبد الله بن عباد البصري أنه شيخ سكن مصر يقلب الأخبار، روي عن المفضل بن فضالة، عن يحيى بن أيوب، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
وقال:"وهذا مقلوب، إنما هو عند يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن أبي بكر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، عن حفصة. فيما يشبه هذا، روى عنه روح بن الفرج أبو الزنباع نسخة موضوعة" انتهى.
فلا يستشهد بهذا الشاهد.
وله شاهد آخر عن ميمونة بنت سعد، تقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أجمع الصوم من الليل فليصم، ومن أصبح ولم يُجمعه فلا يصم".
رواه الدارقطني (1/ 173) وفيه الواقدي وهو متهم.
فقه الحديث:
ظاهر حديث الباب يفيد بأن من لم ينو الصيام من الليل فلا صيام له، وبه قال أحمد ومالك والشافعي؛ لأنّ الصوم عبادة يفتقر إلى النية كالصلاة وبقية العبادات.
هذا في صيام رمضان أو في قضاء رمضان، أو في صيام نذر، وتجزئه نية واحدة لجميع شهر رمضان عند الإمام أحمد. وأمّا صيام التطوع فمباح له أن ينويه بعد ما يصبح. انظر للمزيد:"المنة الكبري" (3/ 278).
হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি রাত থেকে রোযার নিয়ত করে না, তার রোযা (সহীহ) হয় না।”
4232 - عن أنس بن مالك، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"تسحَّروا، فإن في السَّحور بركة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1923) من طريق شعبة، ومسلم في الصيام (1095) من طريق ابن عليّة -كلاهما عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس، به.
আনাস ইবন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাহ্রী গ্রহণ করো, কারণ সাহ্রীর মধ্যে বরকত (কল্যাণ) রয়েছে।"
4233 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله:"تسحروا، فإن في السحور بركة".
حسن: رواه الإمام أحمد (8898) عن عبد الرزاق وهو في مصنفه (7601) قال: أخبرنا
سفيان، عن ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن أبي هريرة، فذكره.
وابن أبي ليلي ضعيف لسوء حفظه، ومن طريقه رواه النسائي (2150) عن يحيى بن آدم، عن سفيان، بإسناده مثله.
ولكنه لم ينفرد به بل تابعه عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء بن أبي رباح.
ومن طريقه رواه النسائّي (2147) ولكن اختلف على عبد الملك بن أبي سليمان، فرواه عنه منصور بن أبي الأسود عنه مرفوعًا كما مضى. ورواه يزيد عنه موقوفًا على أبي هريرة.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا النسائيّ (2148) وأشار إلى رفع ابن أبي ليلى، وزيادة الثقة مقبولة عند المحدثين.
وله إسناد آخر يقوي الرفع وهو ما رواه النسائيّ (2151) من طريق محمد بن فضيل، حدّثنا يحيى بن سعيد، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر مثله.
ولكن قال النسائيّ:"يحيي بن سعيد هذا إسناده حسن، وهو منكر، وأخاف أن يكون الغلط من محمد ابن فضيل" انتهي.
قلت: لا وجه للحكم بالنكارة بعد تحسين إسناده، فإن محمد بن فضيل وهو ابن غزوان ثقة، وثقه كبار الأئمة مثل ابن معين، وابن المديني، والدارقطني، وابن سعد، وغيرهم. وروى له الشيخان.
وما سبق يقوي على رفعه، ولم يأت في حديثه ما بنكر عليه، فالله أعلم ما قصد به النّسائيّ من قوله هذا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সেহরি খাও, কারণ সেহরিতে বরকত রয়েছে।"
4234 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"تسحّروا فإنّ في السحور بركة".
حسن: رواه النسائي (2144) عن محمد بن بشار، قال: حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم، عن زرّ، عن عبد الله، فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضّا ابن خزيمة (1936) وقال: ثنا أبو يحيى محمد بن عبد الرحيم البزار، ثنا أحمد بن يونس، نا أبو بكر بن عياش، بهذا الإسناد مثله سواء مرفوعًا. وفيه ردّ لمن رواه موقوفًا.
وهو عبيدالله بن سعيد، عن عبد الرحمن بن مهدي، بإسناده.
وعنه رواه النسائي (2145) ولم يرجع النسائي أحدهما على الآخر.
ومن رفعه عنده زيادة في العلم وهي مقبولة.
وأبو بكر بن عياش ثقة فاضل إلا أنه لما كبر ساء حفظه، وعبد الرحمن بن مهدي روى عنه بوجهين مرفوعًا وموقوفًا. وقد تابعه على رفعه أحمد بن يونس، وله ما يشهد كما مضى.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাহরী খাও, কারণ সাহরীতে বরকত রয়েছে।"
4235 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: دخلت على النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو يتسحّر
فقال:"إنّها بركة أعطاكم الله إياها فلا تَدَعُوه".
صحيح: رواه النسائيّ (2162) عن إسحاق بن منصور، قال: أنبأنا عبد الرحمن، قال: حدّثنا شعبة، عن عبد الحميد صاحب الزيادي، قال: سمعت عبد الله بن الحارث يحدّث عن رجل، فذكره.
ورواه الإمام أحمد من وجهين آخرين - عن محمد بن جعفر (23113)، وعن روح (23142) كلاهما عن شعبة، بإسناده، مثله.
وإسناده صحيح، وعبد الرحمن هو ابن المهدي. وعبد الله بن الحارث هو الأنصاري البصري أبو الوليد نسيب بن سيرين من رجال الشيخين.
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে একজন ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম যখন তিনি সাহরী খাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয় এটি এমন বরকত, যা আল্লাহ তোমাদের দিয়েছেন। সুতরাং তোমরা তা পরিত্যাগ করো না।"
4236 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله وملائكته يصلون على المتسحّرين".
حسن: رواه ابن حبان (3467) عن أحمد بن الحسن بن أبي الصغير، حدّثنا إبراهيم بن منقذ، حدّثنا إدريس بن يحيي، عن عبد الله بن عياش بن عباس، عن عبد الله بن سليمان الطويل، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل رجال لا يرتقون إلى درجة الثقة منهم إدريس بن يحيى وهو الخولاني المصريّ، وشيخه عبد الله بن عياش بن عباس، وشيخه عبد الله بن سليمان الطويل. انظر: للمزيد"الإيمان بالملائكة".
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ ও তাঁর ফেরেশতাগণ সাহরী গ্রহণকারীদের উপর সালাত (রহমত) বর্ষণ করেন।
4237 - عن عبد الله بن عمرو، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تسحروا ولو بجرعة من ماء".
حسن: رواه ابن حبان في"صحيحه" (3476) عن أحمد بن يحيي بن زهير بتُستر، قال: حدّثنا إبراهيم بن راشد الآدميّ، قال: حدّثنا محمد بن بلال، قال: حدثنا عمران القطان، عن قتادة، عن عقبة بن وسّاج، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن راشد، وعمران القطان فهما حسنا الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাহরী খাও, যদিও তা এক ঢোঁক পানি দিয়েই হোক।"
4238 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"السحور أكله بركة، فلا تدَعوه، ولو أن يجرع أحدكم جرعة من ماء، فإنّ الله عز وجل وملائكته يصلون على المتسحّرين".
حسن: رواه الإمام أحمد (11086) عن إسماعيل (هو ابن علية)، عن هشام الدّستوائيّ، قال: حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي رفاعة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.
وأبو رفاعة هذا يقال له أيضًا أبو مطيع، واسمه رفاعة بن عوف ذكره البخاري في الكني (9/ 31)، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 371) ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا.
ولم يذكره ابن حبان في"ثقاته" مع أنه على شرطه.
وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول" وهو كذلك؛ لأنه توبع، تابعه عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر مثله.
رواه الإمام أحمد (11396) عن إسحاق بن عيسي، حدّثنا عبد الرحمن بن زيد، عن أبيه، عن عطاء بن يسار، بإسناده.
وعبد الرحمن بن زيد ضعيف إلا أنه توبع أيضًا في الإسناد الأوّل.
وله إسناد ثالث، رواه أيضًا الإمام أحمد (11281) عن مطلب، حدّثنا ابن أبي ليلى، عن عطية، عن أبي سعيد الخدريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"تسحّروا، فإنّ في السّحور بركة".
وفيه ابن أبي ليلى، وشيخه عطية ضعيفان. وبمجموع هذه الأسانيد يحسن هذا الحديث.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس بن مالك، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"تسحّروا ولو بجرعة من ماء".
رواه أبو يعلي (3340)، والعقيلي (3/ 50) كلاهما من حديث محمد بن أبي بكر المقدمي، حدّثنا عبد الواحد بن ثابت الباهليّ، قال: حدّثنا ثابت، عن أنس، فذكره.
وعبد الواحد بن ثابت الباهلي هذا قال فيه البخاري:"منكر الحديث" انظر:"الميزان" (2/ 671).
وقال العقيلي: لا يتابع على حديثه. وذكر له حديثًا آخر وهو قوله:"كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يُفطر على تمرات أو شيء لم يمسه النار".
وقال:"وروى جماعة من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم عنه بأسانيد جياد أنه قال:"تسحّروا فإنّ في السّحور بركة" وفي السحور أسانيد ثابتة.
وأمّا اللّفظتان اللتان جاء بهما هذا الشيخ:"ولو بجرعة من ماء""أو شيء لم يمسه النار" فليس يتابع عليهما ثقة" انتهى كلام العقيلي.
كذا قال! مع أنّ اللفظ الأول جاء بأسانيد حسان كما سبق.
وفي الباب عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أراد أن يصوم فليتسحّر بشيء".
رواه أحمد (14950)، وأبو يعلى (1930) كلاهما من حديث أبي أحمد الزبيري، حدّثنا شريك، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.
وشريك هو ابن عبد الله النخعي مختلف فيه، فإذا توبع يحسّن، وإلا فلا؛ لأنه تغيّر حفظه منذ ولي القضاء بالكوفة.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাহরীর খাবার বরকতময়। সুতরাং তোমরা তা ত্যাগ করো না, যদি তোমাদের কেউ এক ঢোক পানিও পান করে। কেননা মহান আল্লাহ এবং তাঁর ফেরেশতাগণ সাহরী গ্রহণকারীদের প্রতি রহমত বর্ষণ করেন।
4239 - عن عمرو بن العاص، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"فصل ما بين صيامنا وصيام أهل الكتاب، أكلةُ السَّحر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1096) من طريق موسى بن عُلَي، عن أبيه، عن أبي قيس مولي عمرو بن العاص، عن عمرو بن العاص، فذكره.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাদের সিয়াম এবং আহলে কিতাবদের সিয়ামের মধ্যে পার্থক্যকারী হলো সাহরীর খাবার।"
4240 - عن ابن عباس، قال: أرسل إلىَّ عمر بن الخطاب يدعوني إلى السّحور. وقال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سماه الغداء المبارك.
حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (505) عن أحمد بن القاسم بن مساور الجوهريّ، قال: حدّثنا محمد بن إبراهيم أخو أبي معمر، قال: حدّثنا سفيان بن عيينة، عن إبراهيم بن ميسرة، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
ومن هذا الطريق رواه الخطيب في"تاريخه" (1/ 387) في ترجمة محمد بن إبراهيم بن معمر الهذلي أبو بكر، ونقل عن موسى بن هارون: أنه صدوق لا بأس به.
وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 151) ونقل عن موسى بن هارون الحمال، كما ذكره الخطيب. وقال: سئل ابن معين عن أبي معمر فقال: مثل أبي معمر لا يسأل عنه، وهو وأخوه من أهل الحديث. وبقية رجاله ثقات.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট লোক পাঠালেন আমাকে সাহরির জন্য ডাকার জন্য। আর তিনি (উমার) বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহরিকে বরকতময় প্রাতরাশ (আল-গাদাউল মুবারক) নামে অভিহিত করেছেন।