হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4328)


4328 - عن أبي هريرة، قال:"أوصاني خليلي بثلاث: صيام ثلاثة أيام من كلِّ شهر، وركعتي الضُّحى، وأن أوتِر قبل أن أنام".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1981)، ومسلم في صلاة المسافرين (721: 85) من طريق عبد الوارث، حدّثنا أبو التياح، حدّثني أبو عثمان النّهدي، عن أبي هريرة.

هكذا أطلقه ثلاثة أيام من كلّ شهر، وجاء مقيّداً بالبيض. والبخاريّ ممن يرى تقييد ذلك لأنه بوّب بقوله: باب صيام البيض: ثلاث عشرة وأربع عشرة وخمس عشرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার প্রিয়তম বন্ধু (খলিল) আমাকে তিনটি বিষয়ের জন্য উপদেশ দিয়েছেন: প্রতি মাসে তিনটি দিন রোযা রাখা, সালাতুদ-দুহার দু'রাকাত নামাজ এবং আমি যেন ঘুমাবার পূর্বে বিতর নামাজ আদায় করে নিই।









আল-জামি` আল-কামিল (4329)


4329 - عن أبي هريرة، أنه كان في سفر، فلما نزلوا أرسلوا إليه وهو يصلي ليطعم، فقال للرسول: إني صائم. فلما وضع الطّعام، وكادوا يفرغون جاء، فجعل يأكل. فنظر القوم إلى رسولهم، فقال: ما تنظرون؟ قد أخبرني أنه صائم. فقال أبو هريرة: صدق، إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صوم شهر الصّبر، وثلاثة أيام من كلّ شهر صوم الدّهر".

فقد صُمت ثلاثة أيام من كلّ شهر، وأنا مفطر في تخفيف الله، وصائم في تضعيف الله.
صحيح: رواه النسائي (2408)، وأحمد (7577، 8986، 10663)، وصحّحه ابن حبان (3659)، والبيهقي (4/ 293) كلّهم من أوجه عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أبي عثمان النّهدي، عن أبي هريرة، فذكره إلا أن البعض لم يذكروا القصة.

وإسناده صحيح. ولكن قال الدارقطني في العلل (6/ 285): وحديث أبي ذر أشبه بالصواب". وهو ما يأتي.

وأما قوله: حديث أبي ذر أشبه بالصواب أي بمقابل هذا الإسناد الذي ساقه من طريق حماد بن سلمة بإسناده، وإلا فأصل حديث أبي هريرة في الصحيحين بغير هذا الإسناد، وهو أصح من حديث أبي ذر، إلا أني لم أقف عليه في"العلل"، فهل فات الدارقطني؟ وقد أشار إليه الترمذي عقب حديث أبي ذر كما يأتي.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একবার এক সফরে ছিলেন। যখন তারা যাত্রাবিরতি করলেন, তখন তারা তাঁর কাছে খাবার গ্রহণের জন্য লোক পাঠালেন, আর তিনি তখন সালাত আদায় করছিলেন। তিনি (আবূ হুরায়রা) দূতকে বললেন: আমি রোযাদার (রোযা রেখেছি)। যখন খাবার রাখা হলো এবং তারা (খাওয়ার) প্রায় শেষ পর্যায়ে, তখন তিনি এলেন এবং খেতে শুরু করলেন। তখন উপস্থিত লোকেরা তাদের দূতের দিকে তাকাল। দূত বললেন: তোমরা কী দেখছো? সে তো আমাকে বলেছিল যে সে রোযাদার। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে সত্য বলেছে। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "ধৈর্যের মাসের (রমযানের) রোযা এবং প্রতি মাসের তিন দিনের রোযা হলো সারা বছরের রোযা রাখার সমতুল্য।" সুতরাং, আমি প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখি। আর আল্লাহর দেওয়া লঘুতা (সুযোগ) গ্রহণের কারণে আমি (প্রকাশ্যে) পানাহার করছি, কিন্তু আল্লাহর বহুগুণ প্রতিদানের কারণে আমি (মূলত) রোযাদার।









আল-জামি` আল-কামিল (4330)


4330 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عبد الله، ألم أخبر أنك تصوم النهار وتقوم الليل؟" فقلت: بلى يا رسول الله. قال:"فلا تفعل، صم وأفطر، وقم ونم، فإن لجسدك عليك حقًّا، وإنّ لعينك عليك حقًّا، وإنّ لزوجك عليك حقًّا، وإن لزورك عليك حقًّا، وإن بحسبك أن تصوم كل شهر ثلاثة أيام، فإن لك بكل حسنة عشر أمثالها، فإنّ ذلك صيام الدّهر كلّه" فذكر حديثًا طويلًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1975)، ومسلم في الصوم (1159: 182) كلاهما من حديث يحيي بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره. والسياق للبخاريّ.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে আব্দুল্লাহ! আমি কি জানতে পারিনি যে তুমি দিনে রোযা রাখো এবং রাতে সালাতে (ইবাদতে) দাঁড়াও?" আমি বললাম: 'হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ!' তিনি বললেন: "তুমি এমন করো না। রোযা রাখো এবং রোযা ভঙ্গ করো; রাতে সালাতে দাঁড়াও এবং ঘুমাও। কারণ, তোমার দেহের তোমার ওপর অধিকার আছে, তোমার চোখের তোমার ওপর অধিকার আছে, তোমার স্ত্রীর তোমার ওপর অধিকার আছে এবং তোমার মেহমানেরও তোমার ওপর অধিকার আছে। তোমার জন্য যথেষ্ট হলো যে তুমি প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখবে। কেননা, তোমার প্রতিটি নেকির জন্য দশ গুণ সাওয়াব রয়েছে। আর এটিই সারা বছর রোযা রাখার শামিল।" এরপর তিনি দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4331)


4331 - عن أبي الدرداء، قال:"أوصاني حبيبي صلى الله عليه وسلم بثلاث لن أدعهن ما عشتُ: بصيام ثلاثة أيام من كلّ شهر، وصلاة الضُّحى، وبأن لا أنام حتى أوتر".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (722) من طرق عن ابن أبي فديك، عن الضحّاك بن عثمان، عن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، عن أبي مرة مولى أمّ هانئ، عن أبي الدرداء، فذكره.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার প্রিয়তম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি কাজের ওসিয়ত করেছেন যা আমি যতদিন বেঁচে থাকব ততদিন ত্যাগ করব না: প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখা, সালাতুদ-দুহা (চাশতের নামাজ) আদায় করা এবং বিতর সালাত আদায় না করা পর্যন্ত না ঘুমানো।









আল-জামি` আল-কামিল (4332)


4332 - عن أبي ذرّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام من كلّ شهر ثلاثة أيام، فذلك صيام الدّهر".

فأنزل الله تصديق ذلك في كتابه {مَنْ جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ عَشْرُ أَمْثَالِهَا} [سورة الأنعام: 160] فاليوم بعشرة أيام.

صحيح: رواه الترمذي (762)، والنسائي (2409)، وابن ماجه (1708)، وأحمد (21301) كلّهم من أوجه عن عاصم الأحول، عن أبي عثمان، عن أبي ذر، فذكره.

قال الترمذيّ: حديث حسن صحيح. وقد روى شعبة هذا الحديث عن أبي شِمر وأبي التياح،
عن أبي عثمان، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم".

وأشار ابن خزيمة (3/ 302) إلى خبر أبي عثمان، عن أبي ذر. ولعله أخرجه في كتابه الكبير.

وأورده المنذريّ في الترغيب والترهيب (1579) وعزاه لمن عزوت إليه وأقر بتحسين الترمذي وتصحيح ابن خزيمة له.

وأبو عثمان هو عبد الرحمن بن ملّ بن عمرو النهدي الكوفي أدرك الجاهلية، وأسلم على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم ولم يلقه.

قال أبو الحسن بن البرّاء: ونسخت من كتاب علي بن المديني ولم أسمعه منه: أبو عثمان النهدي واسمه عبد الرحمن بن مَل. ويقال مُلّ، وأصله كوفي وصار إلى البصرة بعد، وهو من العرب، وقد أدرك الجاهلية، وهاجر إلى المدينة بعد موت أبي بكر ووافق استخلاف عمر، وسمع من عمر، ولم يسمع من أبي ذر".

فقوله:"لم يسمع من أبي ذر" فيه نظر؛ لأنّ أبا ذر عند استخلاف عمر كان بالمدينة، ولم يخرج إلى الرّبذة إلّا في عهد عثمان ومات بها، فلقاءه ممكن، ولذا اعتمد الأئمة على اتصال هذا الإسناد وصحّحوه.

وأمّا ما رواه النسائي (2410) من طريق عبد الله (وهو ابن المبارك)، عن عاصم، عن أبي عثمان، عن رجل، قال: قال أبو ذر: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم (فذكر الحديث" بلفظ:"من صام ثلاثة أيام من الشّهر فقد تم صوم الشّهر أو فله صوم الشّهر".

فهو وإن دلّ على أن بينهما رجلًا، فلعله سمع أولا من هذا الرجل، وهو بالتأكيد أن يكون صحابيًّا، ثم تيسر له اللقاء والسماع فروى عنه لأنهما كانا بالمدينة.

فلعلّ ابن المديني اعتمد على هذه الرواية فنفى السماع عنه، ولم ينظر إلى الروايات الأخرى. ثم كتاب ابن المديني قد يكون مسودة لم يهذبه، ولذا لم يسمعه أبو الحسن البراء؛ لأني لم أقف على كلام أحد من أهل العلم من نفي سماع أبي عثمان النهدي عن أبي ذر. ولم يوصف أبو عثمان النهدي بالتدليس فيحمل عنعنته على الاتصال.

وأما حديث أبي هريرة الذي أشار إليه الترمذي فقد مضى في أول الباب.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখে, তা সারা বছর রোযা রাখার (সমান)।"

আল্লাহ তাআলা এর সত্যায়নস্বরূপ তাঁর কিতাবে অবতীর্ণ করেছেন: "কেউ কোনো সৎকর্ম করলে সে তার দশ গুণ প্রতিদান পাবে।" (সূরা আল-আন'আম: ১৬০)। অতএব, একদিন দশ দিনের (সমান)।









আল-জামি` আল-কামিল (4333)


4333 - عن أبي قتادة الأنصاريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صومُ ثلاثة من كلّ شهر، ورمضان إلى رمضان صوم الدَّهر".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1162) عن محمد بن بشار (بندار)، حدثنا محمد بن جعفر، قال: حدثنا شعبة، عن غيلان بن جرير، عن عبد الله بن معبد الزّماني، عن أبي قتادة.

وهو جزء من حديث طويل سيأتي في باب النهي عن صوم الدَّهر.

ورواه ابن خزيمة (2126) عن بندار نفسه بإسناده إلا أنه لم يذكر فيه:"ورمضان إلى رمضان".
فقال ابن خزيمة:"وفي حديث حماد بن زيد:"صوم ثلاثة أيام من كلّ شهر، ورمضان إلى رمضان فهذا صيام الدَّهر كلّه". كذا قال وهو في رواية شعبة أيضًا، كما سبق.




আবু কাতাদাহ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখা এবং এক রমযান থেকে (পরবর্তী) রমযান পর্যন্ত রোযা রাখা হলো সারা জীবন (বা সারা বছর) রোযা রাখার সমতুল্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (4334)


4334 - عن قرّة بن إياس قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم في صيام ثلاثة أيام من الشّهر:"صوم الدّهر، وإفطاره".

وفي لفظ:"صوم ثلاثة أيام من كلّ شهر صيام الدّهر وقيامه".

صحيح: رواه الإمام أحمد (15584) عن عفّان، حدّثنا شعبة، عن معاوية بن قرة، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث باللفظ الأوّل.

وكذلك رواه أيضًا البزار -كشف الأستار (1059) - من وجهين محمد بن جعفر، ويحيى بن سعيد القطان كلاهما عن شعبة بهذا اللفظ.

وكذلك رواه وكيع عن شعبة. ومن طريقه رواه الإمام أحمد (15594).

ورواه ابن حبان (3652) عن أبي يعلى، حدّثنا عبيدالله بن عمر القواريريّ، حدّثنا يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن معاوية بن قرة، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكره باللفظ الثاني).

فالظّاهر أن الرواة اختلفوا على يحيى بن سعيد أو أنه روي على اللفظين.

وروي عفان ووكيع ومحمد بن جعفر باللفظ الأول.

فقول ابن حبان:"قول وكيع عن شعبة في هذا الخبر"إفطاره" وقول يحيى القطان عن شعبة"وقيامه" وهما جميعًا حافظان متقنان" فيه نظر. لأن يحيى بن سعيد القطان روي باللفظين.

ومعنى قوله:"صيام ثلاثة أيام من الشهر صوم الدّهر" لأنّ الحسنة بعشر أمثالها.

وقوله:"وإفطاره" أي إفطار الدّهر فإنه بصوم ثلاثة أيام واستمتاعه بقية الأيام بالإفطار فكأنه استمتع الدهر كله بالإفطار.




কুররা ইবনে ইয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসের তিনটি দিনে রোযা রাখা সম্পর্কে বলেছেন: "তা সারা বছর রোযা রাখা এবং ইফতার করা।"

অন্য এক শব্দে (বর্ণনায়) এসেছে: "প্রতি মাসে তিনটি দিন রোযা রাখা সারা বছর রোযা রাখা এবং কিয়াম (রাত জেগে ইবাদত/নামায) করার সমতুল্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (4335)


4335 - عن أبي العلاء بن الشّخِّير، قال: كنتُ مع مُطرِّف في سوق الإبل، فجاءه أعرابيٌّ معه قطعةُ أديمٍ، أو جِرابٌ، فقال: من يقرأ أو فيكم من يقرأ؟ قلت: نعم، فأخذتُه فإذا فيه:"بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، من محمد رسول الله، لبني زُهير بن أقَيْش -حيٍّ من عُكْل- أنّهم إن شهدوا أن لا إله إلا الله، وأنّ محمدًا رسولُ الله، وفارقوا المشركين، وأقرُّوا بالخُمْس في غنائمهم، وسهْم النبيِّ صلى الله عليه وسلم وصفيِّه، فإنّهم آمِنون بأمان الله ورسوله".

فقال له بعضُ القوم: هل سمعتَ من رسول الله صلى الله عليه وسلم شيئًا تحدِّثناه؟ قال: نعم. قالوا: فحدِّثنا يرحمُك الله، قال: سمعته يقول:"من سرَّه أن يذهب كثيرٌ من وَحَر
صدّره فليصُمْ شهرَ الصَّبْر، وثلاثةَ أيام من كلّ شهر". فقال له القوم أو بعضهم: أأنتَ سمعتَ هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: ألا أُراكم تتّهموني أن أكذب على رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ ! .

وقال إسماعيل مرة: تخافون - والله! لا أحدّثنكم حديثًا سائر اليوم. ثم انطلق.

صحيح: رواه الإمام أحمد (20737) عن إسماعيل، حدّثنا الجريري، عن أبي العلاء بن الشخير، قال (فذكر الحديث بطوله).

والجريري هو سعيد بن إياس مختلط إلا أن إسماعيل وهو ابن علية كان سماعه منه قبل الاختلاط. وقد تابعه عليه غيره، كما أن الجريري لم ينفرد به.

واسم الأعرابي هو النّمر بن تولب بن زهير العكلي.

وقصة هذا الرجل ذكرها كل من ابن قانع في"معجم الصحابة" (3/ 165 - 166)، والطبراني في"المعجم الأوسط" (4937)، والنسائي (4146) من طرق، عن الجريريّ، مختصرًا.

كما رواه أيضًا أبو داود (2999)، والإمام أحمد (23070) كلاهما من حديث قرة بن خالد، عن يزيد بن عبد الله بن الشخير، عن الأعرابي، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صوم الصبر، وثلاثة أيام من كلّ شهر يذهبن وَحَر الصَّدر".

ولفظ أبي داود: قال:"كنا بالمربد، فجاء رجل أشعث الرأس بيده قطعة أديم أحمر. فقلنا: كأنّك من أهل البادية؟ فقال: أجل، قلنا: ناولنا هذه القطعة الأديم التي في يدك. فناولناها، فقرأناها فإذا فيها:"من محمد رسول الله إلى بني زهير ....". ذكره مختصرًا وليس فيه ذكر الصوم.

وهذا إسناده صحيح. وقرة بن خالد السدوسيّ ثقة ضابط، وهو متابع قوي للجريري.

وقوله:"وَحَر الصدر" بفتحتين، هو الغِلُّ.




আবূ আল-আলা বিন আশ-শিখখীর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুতাররিফ-এর সাথে উটের বাজারে ছিলাম। তখন তাঁর কাছে একজন বেদুঈন আসলেন, যার সাথে ছিল চামড়ার একটি টুকরা অথবা একটি থলে। বেদুঈনটি জিজ্ঞাসা করলেন, ‘কে এটি পড়তে পারে, অথবা তোমাদের মধ্যে কেউ কি পড়তে পারে?’

আমি বললাম, ‘হ্যাঁ।’ এরপর আমি তা নিলাম। তাতে লেখা ছিল: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময়, দয়ালু আল্লাহর নামে), আল্লাহর রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে, উক্ল গোত্রের শাখা বানূ যুহায়র ইবনু উকায়শ-এর প্রতি: তারা যদি সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আর তারা মুশরিকদের (মূর্তিপূজকদের) থেকে বিচ্ছিন্ন থাকে, এবং গনীমতের সম্পদের এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ ও তাঁর বাছাইকৃত সম্পদের (সাফী) স্বীকৃতি দেয়, তবে তারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের নিরাপত্তায় নিরাপদ।"

তখন উপস্থিত কিছু লোক তাকে (বেদুঈনকে) জিজ্ঞেস করল: ‘আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এমন কোনো কথা শুনেছেন যা আমাদের বলবেন?’ সে বলল: ‘হ্যাঁ।’ তারা বলল: ‘আল্লাহ আপনাকে রহম করুন, আমাদের বলুন।’ সে বলল: আমি তাঁকে (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে) বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি চায় তার হৃদয়ের বহু ক্রোধ (অসন্তোষ/বিদ্বেষ) দূর হয়ে যাক, সে যেন ধৈর্যের মাস (রমযান) এবং প্রতি মাসে তিন দিন সাওম পালন করে।"

এরপর সেই লোকজন বা তাদের কেউ কেউ তাকে বলল: ‘আপনি কি সত্যিই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এটি শুনেছেন?’ সে বলল: ‘তোমরা কি আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যা বলার জন্য অভিযুক্ত করছো?!’

ইসমাঈল (রাবী) একবার বলেছেন: ‘তোমরা ভয় পাও (অর্থাৎ সন্দেহ করছ)। আল্লাহর কসম! আমি আজকের দিনে তোমাদের আর কোনো হাদীস শোনাব না।’ এরপর সে চলে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (4336)


4336 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: قيل للنبيّ صلى الله عليه وسلم رجل يصوم الدّهر. قال:"وددتُ أنه يطعم الدهر". قالوا: فثلثيه. قال:"أكثر". قالوا:"فنصفه". قال:"أكثر". قال:"ألا أخبركم بما يُذهب وَحَر الصّدر، صوم ثلاثة أيام من كلّ شهر".

صحيح: رواه النسائي (2385، 2386) من وجهين عن سفيان وأبي معاوية كلاهما عن الأعمش، عن أبي عمار، عن عمرو بن شرحيل، عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وإسناده صحيح. وأبو عمار هو عريب بن حميد الهمداني الدُّهني، ثقة.




এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো, এক ব্যক্তি সারা বছর রোজা রাখে। তিনি বললেন: "আমি চাই যে সে সারা বছর (মানুষকে) খাদ্য খাওয়াক।" তারা বলল: তাহলে (রোজা রাখার ক্ষেত্রে) দুই-তৃতীয়াংশ? তিনি বললেন: "এর চেয়েও বেশি (না করার দরকার)।" তারা বলল: তাহলে অর্ধেক? তিনি বললেন: "এর চেয়েও বেশি (না করার দরকার)।" তিনি বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে এমন কিছু সম্পর্কে অবহিত করব না, যা অন্তরের বিদ্বেষ দূর করে দেয়? তা হলো: প্রতি মাসে তিন দিন রোজা রাখা।"









আল-জামি` আল-কামিল (4337)


4337 - عن معاوية بن قرة المزني، قال: أتيت المدينة زمن الأقط والسمن والأعراب يأتون بالبرقان فيبيعونها فإذا أنا برجل طامح بصره ينظر إلى الناس فظننت أنه غريب، فدنوت منه فسلمتُ عليه فردّ عليَّ وقال لي: من أهل هذه أنت؟ قلت: نعم
فجلست معه فقلت: ممن أنت؟ فقال: من هلال واسمي كهمس -أو قال لي: من بني سلول واسمي كهمس- ثم قال: ألا أحدثك حديثا شهدته من عمر بن الخطاب؟ فقلت: بلى قال: بينما نحن جلوس عنده إذ جاءت امرأة فجلست إليه فقالت: يا أمير المؤمنين! إنّ زوجي قد كثر شرُّه وقلَّ خيره، فقال لها عمر رضي الله عنه: ومن زوجك؟ قالت: أبو سلمة قال: إنّ ذاك الرجل رجل له صحبة، وإنه لرجل صدق، ثم قال عمر لرجل عنده جالس: أليس كذلك؟ فقال: يا أمير المؤمنين! لا نعرفه إلا بما قلت، فقال عمر لرجل: قم فادعه لي، وقامت المرأة حين أرسل إلى زوجها فقعدت خلف عمر فلم يلبث أن جاءا معًا حتى جلسا بين يدي عمر فقال عمر: ما تقول في هذه الجالسة خلفي؟ قال: ومن هذه يا أمير المؤمنين؟ قال: هذه امرأتك قال: وتقول ماذا؟ قال: تزعم أنّه قد قلَّ خيرُك وكثر شرُّك! قال: بئس ما قالتْ يا أمير المؤمنين! إنها لمن صالح نسائها، أكثرهن كسوة، وأكثرهن رفاهية، ولكن فَحْلها بكيء، قال عمر: ما تقولين؟ قالت: صدق. فقام إليها عمر بالدّرة فتناولها بها ثم قال: أي عدوة نفسها! أكلت ماله، وأفنيت شبابه، ثم أنشأت تخبرين بما ليس فيه! فقالت: يا أمير المؤمنين! لا تعجل، فوالله لا أجلس هذا المجلس أبدا، ثم أمر لها بثلاثة أثواب فقال: خذي لما صنعتُ بك. وإياك أن تشتكين هذا الشيخ، كأني أنظر إليها قامت ومعها الثياب ثم أقبل على زوجها فقال: لا يحملنك ما رأيتني صنعت بها أن تسيء إليها، انصرفا، فقال الرجل: ما كنت لأفعل ثم قال عمر: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"خير أمتي القرن الذي أنا منه، ثم الثاني، ثم الثالث، ثم ينشأ قوم تسبق أيمانُهم شهادتَهم يشهدون من غير أن يُستشهدوا، لهم لغط في أسواقهم".

قال: قال لي كهمس: أفتخاف أن يكون هؤلاء من أولئك؟ . ثم قال لي كهمس: إني أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فأخبرته بإسلامي، ثم غبت عنه حولا، ثم أتيته فقلت: يا رسول الله! كأنّك تُنكرني؟ فقال:"أجل". فقلت: يا رسول الله! ما أفطرت منذ فارقتك، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ومن أمرك أن تعذِّب نفسك، صم يوما من الشهر"، فقلت: زدني قال:"فصم يومين"، حتى قال:"فصم ثلاثة أيام من الشهر".

حسن: رواه أبو داود الطيالسيّ (32) ومن طريقه ابن قانع في"معجمه" (930)، والطحاوي في"مشكل الآثار" (2460).
ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (19/ 194)، والبخاري في التاريخ الكير (7/ 238 - 239) كلّهم من طريق حماد بن يزيد، عن معاوية بن قرة المزني، فذكره واللفظ للطيالسي، وأكثرهم اختصروه.

وإسناده حسن من أجل حماد بن يزيد أو أبو يزيد وهو من أهل البصرة، كان معروفًا لديهم، وقد روى عنه أبو داود الطيالسي، وذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 219) وذكر أن موسي بن إسماعيل روى عنه.

وترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (3/ 151) وزاد من روى عنه: يونس بن محمد، ومسلم بن إبراهيم، ومحمد بن عون الزيادي. وقال:"سمعت أبي يقول ذلك. وقال: وروى عنه طالوت بن عباد الجحدري" انتهى.

ولفقرات حديثه شواهد صحيحة، وإنه لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.

ولم يعرف الحافظ الهيثمي أن ابن حبان ذكره في"الثقات" ظنًا منه أنه غيره فإنه قال:"رواه الطبراني في"الكبير" وفيه حماد بن يزيد المنقري ولم أجد من ذكره".

كذا قال في المجمع (3/ 197) والصحيح أنه المقرئ، وتوجد له ترجمة في المصادر التي ذكرتها.




মুয়াবিয়া ইবনু কুররাহ আল-মুযানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি (মুয়াবিয়া ইবনু কুররাহ) এমন এক সময়ে মদীনায় এলাম যখন পনির (আকিত), মাখন (সামন) এবং বেদুঈনরা 'বুরকান' (চামড়ার থলি বা ঝুলি) নিয়ে এসে বিক্রি করত। হঠাৎ আমি একজন লোককে দেখলাম যার দৃষ্টি উঁচু করে মানুষের দিকে তাকিয়ে আছে। আমি ধারণা করলাম সে আগন্তুক। আমি তার কাছে গিয়ে তাকে সালাম দিলাম। সে সালামের জবাব দিল এবং আমাকে বলল: তুমি কি এই এলাকার অধিবাসী? আমি বললাম: হ্যাঁ। আমি তার সাথে বসলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কোন্ গোত্রের লোক? সে বলল: আমি হিলাল গোত্রের, আমার নাম কাহমাস। -অথবা সে বলল: আমি বনী সালূল গোত্রের, আর আমার নাম কাহমাস।

এরপর সে (কাহমাস) বলল: আমি কি তোমাকে এমন একটি হাদীস শোনাব যা আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে দেখেছি? আমি বললাম: হ্যাঁ। সে বলল: আমরা তার (উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে বসেছিলাম, এমন সময় একজন মহিলা এসে তার কাছে বসলেন এবং বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আমার স্বামীর মন্দ কাজ বৃদ্ধি পেয়েছে এবং ভালো কাজ কমে গেছে। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তোমার স্বামী কে? মহিলাটি বললেন: আবূ সালামা। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সেই ব্যক্তি তো রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছে এবং সে সত্যবাদী লোক। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে বসা এক ব্যক্তিকে বললেন: তাই না? সে বলল: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি যা বলেছেন, আমরা তাকে এর বাইরে আর কিছু জানি না। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অন্য এক ব্যক্তিকে বললেন: ওঠো, তাকে আমার কাছে ডেকে আনো। যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার স্বামীকে আনার জন্য লোক পাঠালেন, মহিলাটি উঠে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে গিয়ে বসলেন। তারা দু'জন (স্বামী-স্ত্রী) অল্পক্ষণের মধ্যেই একসাথে এসে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে বসলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার পিছনে বসে থাকা এই মহিলা সম্পর্কে তুমি কী বলো? সে বলল: হে আমীরুল মুমিনীন! ইনি কে? উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইনি তোমার স্ত্রী। সে বলল: আর তিনি কী বলছেন? উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে ধারণা করছে যে তোমার ভালো কাজ কমে গেছে এবং মন্দ কাজ বেড়ে গেছে! লোকটি বলল: হে আমীরুল মুমিনীন! তিনি খুব খারাপ কথা বলেছেন! তিনি তো তার নেককার স্ত্রীদের মধ্যে একজন। আমি তাকে সব থেকে বেশি পোশাক ও আরাম-আয়েশ দিয়েছি। কিন্তু তার স্বামী কৃপণ। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কী বলছ? মহিলাটি বললেন: তিনি সত্য বলেছেন।

এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চাবুক (দুর্রা) নিয়ে তার দিকে গেলেন এবং তা দিয়ে তাকে আঘাত করলেন। তারপর বললেন: হে নিজের শত্রুগোষ্ঠী! তুমি তার সম্পদ খেয়েছ, তার যৌবন শেষ করেছ, তারপর এখন এমন খবর দিতে এসেছ যা তার মধ্যে নেই! মহিলাটি বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! তাড়াহুড়া করবেন না। আল্লাহর কসম! আমি আর কখনো এই মজলিসে বসব না। এরপর তিনি তাকে তিনটি পোশাক দেয়ার নির্দেশ দিলেন এবং বললেন: আমি তোমার সাথে যা করলাম, তার জন্য এটি নাও। আর সাবধান! তুমি যেন এই বুড়ো লোকের বিরুদ্ধে আর কখনো অভিযোগ না করো। আমার যেন মনে হচ্ছিল, মহিলাটি উঠে গেলেন এবং কাপড়গুলো তার সাথে ছিল। এরপর তিনি তার স্বামীর দিকে ফিরে বললেন: আমি তার সাথে যা করেছি, তা যেন তোমাকে তার প্রতি খারাপ ব্যবহার করতে উৎসাহিত না করে। তোমরা দু'জন চলে যাও। লোকটি বলল: আমি এমনটা করব না। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আমার উম্মতের মধ্যে সর্বোত্তম প্রজন্ম হলো সেই প্রজন্ম, যার মধ্যে আমি আছি। এরপর দ্বিতীয় প্রজন্ম। এরপর তৃতীয় প্রজন্ম। এরপর এমন একদল লোকের সৃষ্টি হবে, যাদের কসম তাদের সাক্ষ্যের অগ্রগামী হবে, তারা সাক্ষী না চাওয়া সত্ত্বেও সাক্ষ্য দেবে, এবং তাদের বাজারে (কাজে) উচ্চ শব্দ থাকবে।”

(মুয়াবিয়া ইবনু কুররাহ) বলেন: কাহমাস আমাকে বললেন: আপনি কি ভয় পান যে এই লোকেরা তাদের অন্তর্ভুক্ত হবে? এরপর কাহমাস আমাকে বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসেছিলাম এবং তাকে আমার ইসলাম গ্রহণের কথা জানিয়েছিলাম। এরপর আমি তার কাছ থেকে এক বছর অনুপস্থিত থাকলাম। তারপর আবার তার কাছে এসে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি আমাকে চিনতে পারছেন না? তিনি বললেন: “হ্যাঁ (চিনতে পারছি না)।” আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার কাছ থেকে বিদায় নেওয়ার পর থেকে আমি (দিনের বেলায়) আর ইফতার (রোযা ভঙ্গ) করিনি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “কে তোমাকে নির্দেশ দিয়েছে যে তুমি নিজেকে শাস্তি দেবে? মাসে একদিন রোযা রাখো।” আমি বললাম: আমাকে আরও বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: “তাহলে দুই দিন রোযা রাখো।” অবশেষে তিনি বললেন: “তাহলে মাসের মধ্যে তিন দিন রোযা রাখো।”









আল-জামি` আল-কামিল (4338)


4338 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله:"صوم شهر الصّبر، وثلاثة أيام من كلّ شهر يُذْهِبن وَحَر الصَّدْر".

حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1057) - عن يوسف بن موسى، ثنا حسين بن علي، عن زائدة، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل سماك، وهو ابن حرب البكري الكوفي فإنه صدوق في نفسه، ولكنه كان يضطرب في روايته عن عكرمة، وهذا مما لم يضطرب فيه لكثرة شواهده.

ولذا لم يعلّه البزار به، بل قال:"تفرد به زائدة عن سماك".

وزائدة هو ابن قدامة الثقفي ثقة حافظ فلا يضرّ تفرده.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধৈর্যের মাসের সাওম (রোযা) এবং প্রতি মাসের তিন দিনের সাওম—এগুলো বুকের (মনের) কষ্ট দূর করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4339)


4339 - عن أبي هريرة، قال: أتي أعرابي رسول الله صلى الله عليه وسلم بأرنب قد شواها، ومعها صنابُها وأُدْمُها، فوضعها بين يديه، فأمسك رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم يأكل، وأمر أصحابه أن يأكلوا، فأمسك الأعرابي، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما يمنعك أن تأكل؟" قال: إني أصوم ثلاثة أيام من كلّ شهر. قال:"إن كنت صائمًا فصُم الأيام الغُرّ".

صحيح: رواه النسائي (2421)، والإمام أحمد (8434)، وابن حبان (3650) كلّهم من حديث أبي عوانة، عن عبد الملك بن عمير، عن موسى بن طلحة، عن أبي هريرة، فذكره. واللفظ لأحمد.

وإسناده صحيح. ولا يضر الاختلاف علي موسي بن طلحة فإنه صحّ عنه هكذا وصحّ عنه كما يأتي.
وأما ما رُوي عنه مرسلًا، فلا يُعِل ما روي عنه موصولًا.

وقوله:"أيام الغُرّ": هي الأيام البيض، والأيام شاملة الليل، وهي الثالث عشر، والرابع عشر، والخامس عشر من كلّ شهر.

ويقال البيض: لأنّ القمر يكون كاملًا في هذه الليالي فليلها كنهارها.

وقوله:"صِنابها" هو الخردل المعمول بالزيت، هو صباغ يؤدم به.

وقوله:"وأُدْمها": الأُدْم والإدام وهو ما يؤكل مع الخبز أي شيء كان.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি ভুনা করা খরগোশ নিয়ে আসল। এর সাথে তার সিনা-ব (সর্ষপজাতীয় মসলা) এবং উদম (সহায়ক খাদ্য) ছিল। সে এটি তাঁর সামনে রাখল। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা ধরা থেকে বিরত রইলেন এবং খেলেন না। তিনি তাঁর সাহাবীদের খেতে বললেন। বেদুঈনটিও খাওয়া থেকে বিরত রইল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমাকে কিসে খেতে বাধা দিচ্ছে?" সে বলল: আমি প্রত্যেক মাসে তিনটি রোযা রাখি। তিনি বললেন: "যদি তুমি রোযা রাখতে চাও, তবে 'আইয়্যামুল গুর্‌র'-এ রোযা রাখো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4340)


4340 - عن أبي ذرّ، قال: أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن نصوم من الشّهر ثلاثة أيام البيض: ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة.

حسن: رواه الترمذي (761)، والنسائي (2426) -واللفظ له- كلاهما من طريق شعبة، عن الأعمش، قال: سمعت يحيي بن سام، عن موسى بن طلحة، قال: سمعت أبا ذر بالرّبذة يقول (فذكره).

وقال الترمذي:"حديث أبي ذرّ حديث حسن".

وصحّحه ابن خزيمة (2128) من طريق شعبة، بإسناده. ورواه ابن حبان (3566) من طريق يحيي القطان، عن فطر، عن يحيى بن سام، به.

وإسناده حسن، موسي بن طلحة هو ابن عبد الله التيمي، ثقة جليل، يقال: إنه وُلد في عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم. ويحيي بن سام بن موسى الضبيّ، روى عنه جماعة. وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 606) ولذلك قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" يعني حيث يتابع.

وقد تابعه رجلان كما في الإسناد الآتي، إلا أنهما أدخلا بين موسى بن طلحة، وأبي ذر رجلًا مع زيادة قصة الأرنب.

رواه النسائي (2428)، وأحمد (21335)، والحميدي (136) كلّهم من طريق سفيان بن عيينة، قال: حدّثنا محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة وحكيم بن جبير، سمعاه من موسي بن طلحة أنه سمع رجلًا من أخواله من بني تميم يقال له: ابنُ الحوْتكيّة. قال: قال عمر بن الخطاب: مَنْ حاضرُنا يوم القاحة إذْ أُتي النبيّ صلى الله عليه وسلم بأرنب؟ فقال أبو ذر: أنا؛ أتى أعرابيٌّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم بأرنب. فقال: يا رسول الله، إنّي رأيتها تَدْمي. قال: فكفَّ عنه النبيُّ صلى الله عليه وسلم فلم يأكل وأمر أصحابه أن يأكلوا، واعتزل الأعرابيُّ فلم يطعم. فقال: إني صائم. فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"وما صوْمُك؟" قال: ثلاثٌ من كلِّ شهر. قال:"فأين أنت عن البيض الغرِّ: ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".

واللفظ للحميدي، واقتصر النسائي وأحمد -بهذا السند- على ذكر الصّوم فقط دون ذكر قصة الأرنب.

وصحّحه ابن خزيمة (2127) من طريق سفيان، عن محمد بن عبد الرحمن مولي آل طلحة -وحده-، عن موسى بن طلحة، به، فذكره بتمامه بنحو حديث الحميدي، ثم قال عقبه:"قد خرجت هذا الباب بتمامه
في كتاب"الكبير" وبين أن موسى بن طلحة قد سمع من أبي ذرّ قصة الصوم دون قصة الأرنب. وروي عن ابن الحوتكية القصتين جميعًا".

وابن الحوتكية هو يزيد بن الحوتكية التميمي، تفرّد بالرواية عنه موسى بن طلحة. وقال ابن حجر:"مقبول".

فالحديث بهذه المتابعة يتقوّى، وقد حسّنه الترمذي وصحّحه ابن خزيمة.

ورواه ابن جرير الطبري في"تهذيب الآثار" (949 - مسند عمر) من وجه آخر عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن موسى بن طلحة، عن ابن الحوتكية، قال: قدمتُ على عمر بن الخطاب وهو في نفر من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فسألته عن الصيام، فقال: من كان منكم معنا إذ كنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم بالقاحة؟ فقالوا: نحن كنا إذ أهدى له الأعرابي أرنبًا …" فساقه بتمامه، وصحّح إسناده.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মাসের তিনটি আইয়ামে বীয (শুভ্র দিন) রোযা রাখতে আদেশ করেছেন: মাসের তেরো, চৌদ্দ এবং পনেরো তারিখে।









আল-জামি` আল-কামিল (4341)


4341 - عن جرير بن عبد الله، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"صيام ثلاثة أيام من كلّ شهر صيام الدّهر، وأيام البيض صبيحة ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".

صحيح: رواه النسائي (2420) عن مخلد بن الحسن، حدثنا عبيدالله، عن زيد بن أبي أنيسة، عن أبي إسحاق، عن جرير بن عبد الله، فذكره.

قال الحافظ في الفتح (4/ 226):"وإسناده صحيح".

وقال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1588):"إسناده جيد".

وهو كما قالا إلا أن أبا إسحاق وهو عمرو بن عبد الله الهمداني السبيعي وُصف بالتدليس إلا أن الأئمة تحمّلوا تدليسه.




জারীর ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রতি মাসে তিন দিন রোজা রাখা সারা বছর রোজা রাখার সমতুল্য। আর আইয়ামে বীয (শুভ্র দিনগুলো) হলো মাসের তেরো, চৌদ্দ ও পনেরো তারিখের সকাল বেলা।









আল-জামি` আল-কামিল (4342)


4342 - عن ابن عباس قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم لا يفطر أيام البيض في حضر، ولا سفر.

حسن: رواه النسائي (2345) عن القاسم بن زكريا، قال: حدثنا عبيدالله، قال: حدثنا يعقوب، عن جعفر، عن سعيد، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل يعقوب وهو ابن عبد الله القمي، وشيخه جعفر وهو ابن أبي المغيرة القمي، وكلاهما مختلف فيهما غير أنهما حسنا الحديث.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুকিম অবস্থায় এবং সফর অবস্থায় আইয়ামে বীজের (শুক্লপক্ষের) রোযা কখনও ছাড়তেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (4343)


4343 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجل:"وَصُمْ من كلّ شهر، ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (1887) والبيهقي في دلائل النبوة (6/ 294) كلاهما من حديث يحيي بن عبد الرحمن الأرحبي، حدثني عبيدة بن الأسود، عن القاسم بن الوليد، عن سنان ابن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر، فذكر حديثا طويلا.

وهذا جزء منه، والجزء الثاني في كتاب الصلاة، والجزء الثالث منه في كتاب الحج، فضل يوم عرفة.
وإسناده حسن، وكذلك حسّنه أيضًا البيهقي، انظر تخريجه المفصل فيما مضى.

وفي الباب عن قتادة بن ملحان القيسي أنه كان مع النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يأمرهم بصيام البيض" ويقول:"هي صيام الدّهر".

رواه أبو داود (2449)، والنسائي (2430)، وابن ماجه (1707)، وأحمد (20316)، وابن حبان (3651) كلّهم من حديث أنس بن سيرين، عن ابن ملحان القيسي، عن أبيه، فذكره.

وابن ملحان قيل هو قتادة بن ملحان القيسي، وقيل: ملحان بن شبل والد عبد الملك بن ملحان، وقيل: إنه منهال بن ملحان والد عبد الملك. قال ابن معين: هو خطأ. قاله المنذري.

قلت: ابن ملحان هذا لم يرو عنه غير أنس بن سيرين ولم يوثقه أحد، ولذا يعد من المجاهيل.

وأما ابن حبان فذكره في"الثقات" على قاعدته في توثيق المجاهيل، وأخرج حديثه في"صحيحه". وقال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد من تابعه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে বললেন, "আর তুমি প্রতি মাসে তেরো, চৌদ্দ এবং পনেরো তারিখে সাওম (রোযা) পালন করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4344)


4344 - عن عبد الله بن مسعود، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم يعني من غرّة كلّ شهر ثلاثة أيام.

حسن: رواه أبو داود (2450) عن أبي كامل، حدّثنا أبو داود، حدّثنا شيبان، عن عاصم، عن زر، عن عبد الله، فذكره.

والحديث في"مسند أبي داود الطيالسي" (358) ومن طريقه رواه ابن خزيمة (2129)، وابن ماجه (1725)، وابن حبان (3641) إلّا أن ابن خزيمة جمع بين حديثين وهو:"ويكون من صومه يوم الجمعة". وأما ابن ماجه فلم يذكر إلا الحديث الثاني، وهو قول ابن مسعود:"ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم مفطرًا يوم الجمعة" بالإسناد نفسه.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عاصم وهو ابن أبي النجود فإنه حسن الحديث.

والحديث قد أخرجه من طريقه أيضًا الترمذي (742)، والنسائي (2368)، وأحمد (3860).

وقوله:"غرة كلّ شهر" أي أوله. والغر هو كلّ شيء له أوله.

وقوله:"ما رأيت مفطرًا يوم الجمعة" أي مع الخميس لما جاء النهي عن إفراد يوم الجمعة بالصّوم.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক মাসের প্রথম দিক থেকে তিনটি দিন রোযা পালন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4345)


4345 - عن بعض أزواج النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم تسع ذي الحجة، ويوم عاشوراء، وثلاثة أيام من كلّ شهر: أوّل اثنين من الشهر والخميسَين.
صحيح: رواه أبو داود (2437)، والنسائي (2417)، وأحمد (26468) كلّهم من طريق أبي عوانة، عن الحرّ بن الصبّاح، عن هُنيدة بن خالد، عن امرأته، عن بعض أزواج النبيّ صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد صحيح. وامرأة هنيدة لم أقف على اسمها غير أنَّ الحافظ ذكر في التقريب في"المبهمات" أنها صحابية.

ورواه النسائي (2415) من وجه آخر عن زهير، عن الحر بن الصبّاح قال: سمعت هُنَيدة الخزاعيّ قال: دخلتُ على أمّ المؤمنين سمعتها تقول:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم من كلّ شهر ثلاثة أيام، أول اثنين من الشّهر، ثم الخميس، ثم الخميس الذي يليه". فأسقط امرأة هنيدة.

وإسناده صحيح أيضًا؛ فإنّ هنيدة أولًا سمع من امرأته عن أمّ المؤمنين، ثم دخل عليها وسمع منها مباشرة. وهذا شيء معروف في علم الحديث.

وهذا الحديث روي بألوان أخرى بعضها لا يصح، وأخطأ من حكم عليه بالاضطراب؛ لأنّ ما صحّ لا يضر ما لم يصح، والاضطراب لا يصار إليه إلّا إذا تعذّر التوفيق بين الروايات.

وأمّا ما روي عن حفصة قالت:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم ثلاثة أيام من الشّهر: الاثنين والخميس، والاثنين من الجمعة الأخرى". ففيه رجل مقبول.

رواه أبو داود (2451)، والنسائي (2366)، وأحمد (26460، 26463) كلّهم من حديث حماد، عن عاصم بن بهدلة، عن سواء الخزاعي، عن حفصة، فذكرته.

وسواء الخزاعي روى عنه اثنان آخران وهما المسيب بن رافع، ومعبد بن خالد. وذكره ابن حبان في"الثقات" كما قال المزي إلا أنه سقطت ترجمته في المطبوع؛ لأن محقق تهذيب الكمال عزاه إلى المخطوطة. ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة.

ولم أجد من تابعه، بل فيه مخالفة للحديث الصحيح بأنه صلى الله عليه وسلم كان يصوم أول اثنين من الشهر والخميسين، ولعلّ ذلك من عاصم بن بهدلة فقد تكلموا في حفظه، ولأنه اضطرب فيه، فمرة رواه عن سواء، عن حفصة. وأخرى عنه، عن أمّ سلمة كما عند النسائي (2365).

وأخرى عنه عن المسيب، عن حفصة، وفيه:"كان صلى الله عليه وسلم يصوم الاثنين والخميسين". ولم يذكر فيه سواء. كذلك رواه الإمام أحمد (26461)، والنسائي.

والمسيب هو ابن رافع لم يسمع من حفصة.

وللحديث أسانيد أخرى فالظاهر منه وقوع الاضطراب في الإسناد والمتن؛ لأنّها كلّها، تدور على عاصم بن بهدلة الذي قال فيه البزار:"لم يكن بالحافظ"، وقال الدارقطني:"في حفظه شيء" فمثله لا تحتمل مخالفته.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক স্ত্রী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিলহাজ্জ মাসের নয় দিন, আশুরার দিন এবং প্রতি মাসে তিন দিন—মাসের প্রথম সোমবার এবং দুটি বৃহস্পতিবার—রোযা রাখতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4346)


4346 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال له النبي صلى الله عليه وسلم:"فصم وأفطر، وصل ونم، وصُمْ من كلّ عشرة أيام يومًا، ولك أجر تسعة".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1977)، ومسلم في الصيام (1159: 186) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: سمعت عطاء يزعم أن أبا العباس الشاعر أخبره، أنه سمع عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره. واللفظ لمسلم ولم يذكر هذا اللفظ البخاري في الموضع المشار إليه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি রোযা রাখো এবং (সময়মতো) রোযা ভাঙ্গো, সালাত আদায় করো এবং ঘুমাও, আর প্রতি দশ দিনে একদিন রোযা রাখো, এর ফলে তোমার জন্য নয় দিনের সাওয়াব থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4347)


4347 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صُمْ يومًا وأفطر يومًا، وذلك صيام داود. وهو أعدل الصيام لا أفضل من ذلك".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3418)، ومسلم في الصيام (1159: 181) كلاهما من حديث ابن شهاب، قال: أخبرني سعيد بن المسيب وأبو سلمة بن عبد الرحمن أن عبد الله بن عمرو قال (فذكره).




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "একদিন সাওম (রোযা) পালন করো এবং একদিন সাওম ভঙ্গ (না-রোযা) করো। আর এটাই হলো দাউদের সাওম। এবং এটাই হলো সবচেয়ে ন্যায়ানুগ সাওম। এর চেয়ে উত্তম সাওম আর নেই।"