আল-জামি` আল-কামিল
4308 - عن أبي أسامة، قال: قلت: يا رسول الله، لم أرك تصوم من شهر من الشّهور ما تصوم من شعبان؟ قال:"ذاك شهر يغفل الناسُ عنه بين رجب ورمضان. وهو شهر ترفع فيه الأعمال إلى ربّ العالمين، فأحبّ أن يرفع عملي وأنا صائم".
حسن: رواه الإمام أحمد (21753) وعنه الضياء في"المختارة" (1356) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا ثابت بن قيس أبو غُصْن، حدثني أبو سعيد المقبري، حدثني أسامة بن زيد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ثابت بن قيس فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! শাবান মাসে আপনি যত রোযা রাখেন, অন্য কোনো মাসে আমি আপনাকে তত রোযা রাখতে দেখিনি।’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘এটি এমন একটি মাস, যা রজব ও রমজানের মধ্যখানে হওয়ায় মানুষ সে সম্পর্কে উদাসীন থাকে। এটি এমন মাস, যে মাসে সৃষ্টিকর্তার নিকট বান্দার আমলসমূহ পেশ করা হয়। আমি ভালোবাসি যে, যখন আমার আমল পেশ করা হবে, তখন আমি যেন রোযাদার অবস্থায় থাকি।’
4309 - عن عمران بن حُصين، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، أنه سأله أو سأل رجلًا وعمران يسمع، فقال: يا فلان، أما صُمْتَ سرَر هذا الشّهر؟ قال: أظنّه قال يعني رمضان، قال الرجل: لا، يا رسول الله. قال: فإذا أفطرت فصُمْ يومين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1983)، ومسلم في الصيام (1161) من طريق مهدي بن ميمون، حدّثنا غيلان بن جرير، عن مطرِّف، عن عمران بن حصين، به، فذكره. واللفظ للبخاريّ.
وقوله:"رمضان" خطأ، والصواب شعبان كما نبه عليه البخاري، وذكره عن ثابت معلقا، وهو عند مسلم متصل. ولفظ مسلم:"يا فلان، أصمتَ من سُرَّة هذا الشّهر؟".
وفي رواية عند مسلم (199) من وجه آخر عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن مطرف، عن عمران بن حصين، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال له أو لآخر:"أصمت من سرر شعبان؟" قال: لا. قال:"فإذا أفطرت فصمْ يومين".
ولم يشك شعبة بأنه صلى الله عليه وسلم قال لرجل آخر. رواه عن ابن أخي مطرف بن الشّخّير، قال: سمعت مطرقًا يحدث عن عمران بن حصين، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لرجل:"هل صمت من سرر هذا الشهر شيئًا" يعني شعبان. قال: لا. فقال له:"إذا أفطرت رمضان فصم يومًا أو يومين" شكّ شعبة. وأظنّه قال: يومين.
رواه أحمد (19839) عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، فذكره.
ورواه مسلم من وجهين (محمد بن جعفر، والنضر بن شميل) كلاهما عن شعبة.
وفي هذه الرواية تحديد هذا الشّهر بأنه شعبان.
وقوله:"سَرَر" بفتحتين: أي آخره.
وما رواه أبو داود (2330) من طريق الأوزاعي أنه قال:"سره أوله" فهو غلط كما قال الخطابي، وقال:"والصحيح أن سره آخره هكذا حدّثنا أصحابنا عن إسحاق بن إبراهيم بن إسماعيل، حدّثنا محمود بن خالد الدمشقي، عن الوليد، عن الأوزاعي، قال:"سره: آخره". وهذا هو الصواب. وفيه لغات يقال: سِر الشهر، وسرر الشهر، وسراره. وسمي آخر الشّهر سرًا لاستسرار القمر فيه" انتهي.
وهذا الذي صوبه أيضًا البيهقي (4/ 211) وقال: وأراد به اليوم واليومين اللذين يستر فيهما القمر قبل يوم الشك، وأراد به صيام آخر الشهر مع يوم الشك إذا وافق ذلك عادته في صوم آخر كل شهر. وقيل: أراد بسره وسطه، وسر كلّ شيء جوفه. فعلى هذا أراد أيام البيض" انتهى.
وقيل: ولعلّ سبب ذلك أنه كان يعتاد صوم آخره، أو نذره، فتركه لظاهر النهي عن تقدم رمضان بيوم أو يومين، فبيّن أن المعتاد أو المنذور ليس بمنهي عنه.
وللحديث تأويلات أخرى ذكرها الحافظ في"الفتح" (4/ 231 - 232) فراجعه، والذي أرتضي من هذه التأويلات هو ما ذكرته من أن المراد من سره آخره، والمنهي عنه تقدم يوم أو يومين بدون أن يكون معتادا أو منذورا، ولعل كان ذلك قبل فرضية رمضان، ثم صار بعدها تطوعا للمعتاد والمنذور.
وفي معناه ما رُوي عن معاوية قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صوموا الشهر وسره".
رواه أبو داود (2329) عن إبراهيم بن العلاء الزبيدي من كتابه، حدّثنا الوليد بن مسلم، حدّثنا عبد الله بن العلاء، عن أبي الأزهر -المغيرة بن فروة- قال: قام معاوية في الناس بدَيْر مِسْحل الذي على باب حمص، فقال: أيها الناس، إنا قد رأينا الهلال يوم كذا وكذا، وأنا متقدم بالصيام، فمن أحب أن يفعله فليفعل. قال: فقام إليه مالك بن هبيرة السبتي، فقال: يا معاوية، أشيء سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم أم شيء من رأيك؟ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).
وأبو الأزهر -المغيرة بن فروة الثقفي- الدمشقي غير مشهور في طلب العلم ولم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي إذا تُوبع، وإلا فلين الحديث. وفيه الوليد بن مسلم وهو مدلس فإنه كان يدلس تدليس التسوية، ولكنه صرَّح، ويكفي عند الجمهور تصريحه في أول الإسناد ولو صرّح في جميع الطبقات لكان أولي.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে অথবা অপর এক ব্যক্তিকে জিজ্ঞাসা করলেন, আর ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনছিলেন। তিনি বললেন: হে অমুক, তুমি কি এই মাসের শেষাংশের (সরার) রোযা রাখোনি? (রাবী) বলেন, আমার ধারণা, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসকে বুঝিয়েছিলেন। লোকটি বলল: না, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যখন তুমি (রমযানের পর) ইফতার করবে, তখন দু’দিন রোযা রাখবে।
4310 - عن عبد العزيز بن محمد، قال: قدم عباد بن كثير المدينة، فمال إلى مجلس العلاء، فأخذ بيده فأقامه ثم قال: اللهم! إنّ هذا يحدّث عن أبيه، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا انتصف شعبان فلا تصوموا". فقال العلاء: اللهم! إنّ
أبي حدّثني عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بذلك.
صحيح: رواه أبو داود (2337)، والترمذي (738)، وابن ماجه (1651) كلّهم من حديث عبد العزيز بن محمد بإسناده. واللفظ لأبي داود، ولم يذكر الترمذي وابن ماجه القصّة.
وصحّحه ابن حبان (3589، 3591). ورواه من وجه آخر عن العلاء مختصرًا.
وأخرجه الإمام أحمد (9707) من وجه آخر عن العلاء بن عبد الرحمن بن يعقوب بإسناده وفيه:"إذا كان النّصف من شعبان فأمسكوا عن الصوم حتى يكون رمضان".
قال أبو داود: وكان عبد الرحمن لا يحدّث به، قلت لأحمد: لِمَ؟ قال: لأنه كان عنده أن النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يصل شعبان برمضان، وقال عن النبيّ صلى الله عليه وسلم خلافه.
قال أبو داود:"وليس هذا عندي خلافه، ولم يجي به غير العلاء عن أبيه".
وقال الترمذي: حديث أبي هريرة حسن صحيح، لا نعرفه إلّا من هذا الوجه على هذا اللفظ. ومعنى هذا الحديث عند بعض أهل العلم أن يكون الرجل مفطرًا، فإذا بقي من شعبان شيء أخذ في الصوم لحال شهر رمضان، وقد رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم ما يُشبه قولهم حيث قال:"لا تقدموا شهر رمضان بصيام إلا أن يوافق ذلك صومًا كان يصومه أحدكم". وقد دلّ في هذا الحديث إنما الكراهية على من يتعمّد الصيام لحال رمضان" انتهي.
ولأهل العلم في الجمع بين حديث عائشة وحديث أبي هريرة مذاهب ذكرتُ بعضها في"المنة الكبري" (3/ 430).
وأما قول البيهقي (4/ 209): رواه أبو داود عن قتيبة، ثم قال أبو داود: وقال أحمد بن حنبل:"وهذا حديث منكر. قال: وكان عبد الرحمن لا يحدّث به". فلم أجد هذا الكلام في النسخة المطبوعة لأبي داود من رواية ابن داسة. كما لم أجده في كتاب مسائل أبي داود للإمام أحمد، فتنبّه.
وقد قال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (3/ 223 - 224) أنّ هذا الحديث لا يعارض الحديث الآخر كما ظن عبد الرحمن بن مهدي، وكون العلاء لم يتابع عليه فهو ليس بعلة قادحة عند المحدثين.
بل هو حديث صحيح على شرط مسلم، فإن مسلمًا أخرج في صحيحه عدّة أحاديث عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة. وتفرده به تفرّد ثقة بحديث مستقل، وله عدّة نظائر في الصحيح. وأطال الكلام في تصحيحه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল আযীয ইবনু মুহাম্মাদ বলেন: ইবাদ ইবনু কাসীর মদীনায় এলেন এবং আলা’র মজলিসের দিকে গেলেন। তিনি তাঁর হাত ধরে তাঁকে দাঁড় করালেন। অতঃপর বললেন: হে আল্লাহ! এই ব্যক্তি তার পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন শা‘বানের অর্ধেক পেরিয়ে যায়, তখন তোমরা আর সওম পালন করো না।” তখন আলা’ বললেন: হে আল্লাহ! আমার পিতা আমাকে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে অনুরূপ হাদীসই বর্ণনা করেছেন।
4311 - عن أبي أيوب الأنصاريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان وأتبعه
ستًا من شوال، كان كصيام الدَّهر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1164) من طرق عن سعد بن سعيد أخي يحيى بن سعيد، عن عمر بن ثابت بن الحارث الخزرجي الأنصاريّ، عن أبي أيوب الأنصاري، فذكره.
وسعد بن سعيد هو ابن قيس بن عمرو الأنصاريّ أخو يحيي بن سعيد الأنصاريّ ضعّفه أحمد والنسائي وغيرهما من أجل سوء حفظه، إلا أنه لم ينفرد بهذا الحديث بل تابعه صفوان بن سُليم. رواه أبو داود (2433)، وصححه ابن خزيمة (2114)، وابن حبان (3634) فروي بعضهم مقرونًا به.
وصفوان بن سليم هو المدني ثقة، ووثقه أبو حاتم وغيره، وهو يقوي حديث سعد بن سعيد، بل أولي منه.
وقال الترمذي (759) عقب تخريج الحديث:"قد تكلّم بعض أهل الحديث في سعد بن سعيد من قبل حفظه".
قلت: لقد زال هذا الضعف بمتابعة صفوان بن سُليم له، بل قال الطحاوي في مشكله (6/ 119 - 121):"فكان هذا الحديث مما لم يكن بالقوي في قلوبنا لما سعد بن سعيد عليه في الرواية عند أهل الحديث، ومن رغبتهم عنه حتى وجدناه قد أخذه عنه من ذكرنا أخذه إياه عنه من أهل الجلالة في الرواية والثبت فيها، فذكرنا حديثه لذلك".
وساق أسانيد صفوان بن سُليم، وزيد بن أسلم، ويحيى بن سعيد الأنصاريّ، وعبد ربه بن سعيد الأنصاريّ كلّهم عن عمر بن ثابت.
إلا أن عمر بن ثابت وهو ابن الحارث المازني الخزرجي الأنصاري المدني انفرد به، ولا يضرّ تفرده، فإنه من ثقات أهل المدينة ويعضده حديث ثوبان وغيره.
আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি রমজানের সাওম (রোযা) পালন করল এবং এর পরে শাওয়াল মাসের ছয়টি সাওম রাখল, সে যেন সারা বছর সাওম পালন করল।”
4312 - عن ثوبان، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صيام رمضان بعشر أشهر، وصيام الستة أيام بشهرين، فذلك صيام السنة يعني رمضان وستة أيام بعده".
صحيح: رواه ابن ماجه (1715)، والإمام أحمد (22412)، وابن خزيمة (2115)، وابن حبان (3635)، والطحاوي في"مشكله" (2348)، والبيهقي (4/ 293) كلّهم من حديث يحيي بن الحارث الذماريّ، عن أبي أسماء الرحبي، عن ثوبان، فذكره واللفظ لابن خزيمة.
ولفظ ابن ماجه:"من صام ستة أيام بعد الفطر كان تمام السنة، من جاء بالحسنة فله عشر أمثالها".
وإسناده صحيح، وأبو أسماء اسمه عمرو بن مرثد، وهو ثقة.
ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রমযানের রোযা দশ মাসের (সমতুল্য), এবং ছয় দিনের রোযা দুই মাসের (সমতুল্য)। এটাই হচ্ছে পূর্ণ এক বছরের রোযা—অর্থাৎ রমযানের এবং এর পরের ছয় দিনের রোযা।"
4313 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام رمضان وأتبعه بست من شوال فكأنما صام الدّهر".
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1061) - عن محمد بن مسكين، ثنا عمرو، ثنا سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو وهو ابن أبي سلمة التّنيسيّ الدّمشقي من رجال الجماعة إلا أنه بهم قليلًا، ولعله لم يهم في هذا الحديث.
وقد رواه البزار (1060) بإسناد آخر وأعلّه.
ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 183):"رواه البزار، وله طرق، رجال بعضها رجال الصحيح".
وفي الباب عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام رمضان، وستًا من شوال كان كصيام الدهر". رواه الإمام أحمد (14302)، والبزّار -كشف الأستار (1062)، والطحاوي في"مشكله" (2350)، والبيهقي (4/ 293)، وعبد بن حميد (1116) كلّهم من طريق عمرو بن جابر الحضرمّي أبي زرعة، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول (فذكر الحديث).
قال البزار: تفرد به عمرو.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 183) بعد أن عزاه لأحمد والبزار والطبراني في"الأوسط":"وفيه عمرو بن جابر وهو ضعيف".
وأمّا ما رواه الطبراني في"الأوسط" (7603) عن أبي هريرة مرفوعًا وفيه:"من صام ستة أيام بعد الفطر متتابعة، فكأنما صام السنة".
فقوله:"متتابعة" فيه نكارة.
قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (3/ 183 - 184):"رواه الطبراني في"الأوسط"، وفيه من لم أعرفه".
وأخذ بهذه الأحاديث جمهور أهل العلم من المحدثين والفقهاء، فقالوا باستحباب صيام ست من شوال.
واختار البعض من أول الشهر، فإن صامها متفرقه قبل خروج شوال جاز.
وكره مالك أن يلحق برمضان، قال:"ولم يبلغني في ذلك عن أحد من السلف، وإنّ أهل العلم يكرهون ذلك، ويخافون بدعته وأن يلحق برمضان ما ليس منه أهل الجهالة والجفاء، لو رأوا في ذلك رخصة عن أهل العلم، ورأوا يعملون ذلك" انتهي.
قال ابن عبد البر فيما نقله عنه ابن القيم في"تهذيب السنن":"لم يبلغ مالكًا حديث أبي أيوب على أنه حديث مدني، والإحاطة بعلم الخاصة لا سبيل إليه، والذي كرهه مالك قد بيّنه وأوضحه خشية أن يضاف إلى فرض رمضان، وأن يسبق ذلك إلى العامة، وكان متحفظًا كثير الاحتياط للدّين، وأمّا صوم الستة الأيام على طلب الفضل وعلى التأويل الذي جاء به ثوبان فإنّ مالكًا لا
يكره ذلك إن شاء الله؛ لأنّ الصّوم جنّة وفضله معلوم يدع طعامه وشرابه لله وهو عمل بر وخير، وقد قال تعالى: {وَافْعَلُوا الْخَيْرَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ} [الحج: 77] ومالك لا يجهل شيئًا من هذا، ولم يكره ذلك إلّا ما خافه على أهل الجهالة والجفاء إذا استمر ذلك، وخشي أن يُعدّ من فرائض الصيام مضافًا إلى رمضان". انظر أيضًا: الاستذكار (10/ 259).
ونهاية كلام ابن عبد البر:"وقد يمكن أن يكون جهل الحديث، ولو علمه لقال به. والله أعلم".
قلت: صدق الشافعي رحمه الله تعالى حين قال:"ما من حديثٍ صحيحٍ إلا وقد حُفِظَ، ليس عند شخص واحد، ولكن عند أفراد الأمة".
والإمام مالك إمام دار الهجرة لم يعلم بحديث أبي أيوب في فضل صيام الست من شوال مع أنه حديث مدني، فكيف بغيره؟ .
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি রমযানের রোযা রাখল এবং এর সাথে শাওয়ালের ছয়টি রোযা যুক্ত করল, সে যেন যুগ ভরে (বা সারা বছর) রোযা রাখল।”
[এই হাদীসটি হাসান: বায্যার (কাশ্ফুল আসতার ১০৬১) এটি মুহাম্মাদ ইবনে মিসকীন থেকে, তিনি আমর থেকে, তিনি সুহাইল থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা থেকে বর্ণনা করেছেন।
এর সনদ হাসান, কারণ এতে আমর রয়েছেন—তিনি হলেন আমর ইবনে আবী সালামাহ আত-তিয়নিসী আদ-দিমাশকী। তিনি জুমহূর মুহাদ্দিসগণের দ্বারা নির্ভরযোগ্য রাবী হিসেবে গণ্য, যদিও তার মধ্যে কিছু ভুলভ্রান্তি ছিল। সম্ভবত এই হাদীস বর্ণনায় তার কোনো ভুল হয়নি।
বায্যার (১০৬০) এটিকে অন্য সনদেও বর্ণনা করেছেন এবং সেটিকে ত্রুটিপূর্ণ বলেছেন।
এ কারণেই হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৮৩)-তে বলেছেন: “বায্যার এটি বর্ণনা করেছেন এবং এর একাধিক রাস্তা (সনদ) রয়েছে, যার কোনো কোনোটির বর্ণনাকারীগণ সহীহের বর্ণনাকারী।”
এই বিষয়ে জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও একটি হাদীস বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি রমযানের রোযা রাখল এবং শাওয়ালের ছয়টি রোযা রাখল, তা সারা বছর রোযা রাখার মতো।” এটি ইমাম আহমাদ (১৪৩০২), বায্যার (কাশ্ফুল আসতার ১০৬২), ত্বাহাবী ‘মুশকিল’-এ (২৩৫০), বায়হাকী (৪/২৯৩) এবং আবদ ইবনে হুমাইদ (১১১৬) সকলে আমর ইবনে জাবির আল-হাদরামী আবূ যুরআর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যে তিনি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে শুনেছেন (তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন)।
বায্যার বলেন: আমর এই হাদীসটি একাকী বর্ণনা করেছেন।
হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৮৩)-তে এটিকে আহমাদ, বায্যার ও ত্ববারানী ‘আল-আওসাত’ এর দিকে সম্পৃক্ত করার পর বলেন: “এতে আমর ইবনে জাবির আছেন এবং তিনি দুর্বল রাবী।”
আর ত্ববারানী ‘আল-আওসাত’ (৭৬০৩)-এ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে যে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তাতে আছে: “যে ব্যক্তি ঈদের পরে লাগাতার ছয়টি রোযা রাখল, সে যেন এক বছর রোযা রাখল।”
এতে “লাগাভার” (متتابعة) শব্দটি মুনকার (অস্বীকৃত)।
হাইসামী ‘মাজমাউয যাওয়াইদ’ (৩/১৮৩-১৮৪)-এ বলেন: “এটি ত্ববারানী ‘আল-আওসাত’-এ বর্ণনা করেছেন, এতে এমন রাবী আছেন যাকে আমি চিনি না।”
মুহাদ্দিস ও ফকীহগণের মধ্যে জুমহূর (অধিকাংশ) আলেম এই হাদীসগুলোর উপর ভিত্তি করে শাওয়ালের ছয়টি রোযা রাখা মুস্তাহাব বলেছেন।
কেউ কেউ শাওয়ালের প্রথম দিক থেকে এগুলো রাখার পক্ষে মত দিয়েছেন, আবার কেউ বলেছেন শাওয়াল মাসের মধ্যে বিচ্ছিন্নভাবে রাখলেও জায়েয হবে।
তবে ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে রমযানের সাথে লাগিয়ে রাখা অপছন্দ করতেন। তিনি বলেন: “সালাফদের কারো থেকে এ বিষয়ে আমি কিছু শুনিনি। আলেমগণ এটি অপছন্দ করেন, কারণ তারা আশঙ্কা করেন যে এতে বিদ’আত সৃষ্টি হতে পারে এবং অজ্ঞ লোকেরা এটিকে রমযানের অংশ মনে করে নিতে পারে, যদি তারা আলেমদের পক্ষ থেকে এতে সুযোগ দেখতে পায় এবং দেখেন যে তারা এটি করছেন।”
ইবনুল কাইয়্যিম কর্তৃক বর্ণিত ইবনে আব্দুল বার্র (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্য: “আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি ইমাম মালিকের নিকট পৌঁছায়নি, যদিও এটি মাদানী হাদীস। আর বিশেষ জ্ঞানের সকল বিষয় জানা সম্ভব নয়। ইমাম মালিক যা অপছন্দ করতেন, তা তিনি স্পষ্ট করেছেন এই আশঙ্কায় যে, এটি যেন রমযানের ফরযের অংশ হিসাবে যুক্ত না হয় এবং সাধারণ মানুষের মনে এমন ধারণা না আসে। তিনি দীনের ক্ষেত্রে অনেক সতর্ক ও রক্ষণশীল ছিলেন। আর ফযীলত লাভের উদ্দেশ্যে এবং ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দ্বারা বর্ণিত ব্যাখ্যার ওপর ভিত্তি করে ছয়টি রোযা পালন করাকে ইমাম মালিক অপছন্দ করতেন না ইনশাআল্লাহ; কেননা রোযা ঢালস্বরূপ এবং এর ফযীলত সুপরিচিত—বান্দা আল্লাহর জন্য তার পানাহার ত্যাগ করে। এটি একটি ভালো ও নেক কাজ। আল্লাহ তাআলা বলেন: {আর তোমরা ভালো কাজ করো, যাতে সফল হতে পারো} [আল-হাজ্জ: ৭৭]। ইমাম মালিক এই বিষয়গুলো সম্পর্কে অজ্ঞ ছিলেন না, তিনি কেবল সেই আশঙ্কাতেই অপছন্দ করতেন, যদি এটি অব্যাহত থাকে তবে অজ্ঞ ও মূর্খ লোকেরা এটিকে রমযানের ফরয রোযার সাথে অতিরিক্ত হিসেবে গণ্য করে নেয়।” (দেখুন: আল-ইস্তিজকার ১০/২৫৯)।
ইবনে আব্দুল বার্র (রাহিমাহুল্লাহ)-এর শেষ কথা: “হতে পারে তিনি হাদীসটি সম্পর্কে অবগত ছিলেন না। যদি তিনি জানতেন, তবে তিনি এর উপর আমল করতেন। আল্লাহই ভালো জানেন।”
আমি বলি: ইমাম শাফেঈ (রাহিমাহুল্লাহ) সত্যই বলেছিলেন: “এমন কোনো সহীহ হাদীস নেই যা সংরক্ষিত হয়নি; তা শুধু একজনের কাছে নয়, বরং উম্মতের বহু ব্যক্তির কাছে সংরক্ষিত আছে।”
ইমাম মালিক, যিনি হিজরতের শহরের ইমাম, তিনি শাওয়ালের ছয় রোযার ফযীলতের বিষয়ে আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি জানতেন না, যদিও এটি মাদানী হাদীস ছিল। তাহলে অন্যদের অবস্থা কেমন হতে পারে?]
4314 - عن أبي قتادة الأنصاريّ، قال: وسئل (يعني النبيّ صلى الله عليه وسلم) عن صوم يوم عرفة؟ فقال:"يكفِّر السنة الماضية والباقية".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1162) من طريق غيلان بن جرير، سمع عبد الله بن معبد الزّمَّاني، عن أبي قتادة، فذكره. وهو جزء من حديث طويل سبق ذكره بتمامه.
وفي لفظ:"صيام يوم عرفة أحتسب على الله أن يكفر السنة التي قبله، والسنة التي بعده".
আবূ কাতাদা আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁকে (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে) আরাফার দিনের রোযা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল? তিনি বললেন: "তা বিগত এক বছর এবং অবশিষ্ট (আগত) এক বছরের গুনাহ মুছে দেয়।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আরাফার দিনের রোযার ব্যাপারে আমি আল্লাহর কাছে আশা করি যে, তা এর পূর্বের এক বছর এবং পরের এক বছরের গুনাহের কাফফারা হয়ে যাবে।"
4315 - عن سهل بن سعد، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام يوم عرفة، غفر له سنتين متتابعتين".
حسن: رواه أبو يعلى (7548) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا معاوية بن هشام، عن أبي حفص الطّائفي، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره. وهو في مصنف أبي بكر بن أبي شيبة (3/ 97)
ومن طريقه رواه أيضًا الطبراني في الكبير (6/ 220).
وإسناده حسن من أجل أبي حفص وهو عبد السلام بن حفص أبو حفص، ويقال: أبو مصعب المدني، ويقال: الطائفي، ويقال: القرشي مولاهم، وثّقه ابن معين. وقال أبو حاتم: ليس بمعروف. وذكره ابن حبان في"الثقات". وقال الذهبي في"الديوان":"صدوق يُغرب".
وفيه أيضّا معاوية بن هشام وهو القصار من رجال الصحيح إلا أنه وصف بأن له أوهامًا.
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 189):"ورواه أبو يعلى والطبراني في"الكبير"، ورجال أبي يعلى رجال الصحيح" ففيه وهمان:
الأول: عبد السلام بن حفص ليس من رجال الصحيح، وإنما أخرج له أصحاب السنن غير ابن ماجه.
الثاني: يوهم كلامه بأن الطبراني رواه من طريق آخر، والصحيح أنه رواه أيضًا من طريق ابن أبي شيبة كما رواه أبو يعلى، إلا أنه زاد طريقًا وهو عثمان بن أبي شيبة، كلاهما عن معاوية بن هشام.
وفي الباب ما رُوي عن قتادة بن النعمان قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صام يوم عرفة غفر له سة أمامه وسنة بعده".
رواه ابن ماجه (1731) عن هشام بن عمار قال: حدّثنا يحيى بن حمزة، عن إسحاق بن عبد الله، عن عياض بن عبد الله، عن أبي سعيد الخدري، عن قتادة بن النعمان، فذكره.
وإسناده ضعيف جدًّا فإن فيه إسحاق بن عبد الله وهو ابن أبي فروة ضعيف باتفاق أهل العلم.
وقد قال أبو حاتم والنسائي والدارقطني وغيرهم: متروك الحديث.
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عائشة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ صوم عرفة يكفّر العام الذي قبله".
رواه الإمام أحمد (24970) عن عفان، قال: حدّثنا حماد بن سلمة، قال: أخبرنا عطاء الخراساني، أنّ عبد الرحمن بن أبي بكر دخل على عائشة يوم عرفة وهي صائمة، والماء يُرشّ عليها. فقال لها عبد الرحمن: أفطري. فقالت: أفطر؟ ! وقد سمعت رسول الله يقول (فذكرته).
وإسناده منقطع؛ فإنّ عطاء الخراساني لم يسمع من عائشة.
وبه أعلّه المنذري في"الترغيب والترهيب" (1538)، والهيثمي في"المجمع" (3/ 189).
সহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি আরাফার দিন সাওম (রোযা) পালন করবে, তার ধারাবাহিক দুই বছরের গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"
4316 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما العمل في أيام العشر أفضل من العمل في هذه". قالوا: ولا الجهاد؟ . قال:"ولا الجهاد، إلّا رجل خرج يخاطر بنفسه وماله، فلم يرجع بشيء".
صحيح: رواه البخاري في العيدين (969) عن محمد بن عرعرة، قال: حدّثنا شعبة، عن
سليمان، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই দশ দিনের আমলের চেয়ে উত্তম কোনো আমল নেই।" সাহাবীগণ বললেন: "জিহাদও না?" তিনি বললেন: "জিহাদও না। তবে ঐ ব্যক্তি ব্যতীত, যে নিজের জান ও মাল নিয়ে (জিহাদে) বের হলো এবং আর কোনো কিছু নিয়েই ফিরে এলো না।"
4317 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من أيام أعظم عند الله، ولا العمل فيهن أحبّ إلى الله من هذه الأيام، فأكثروا فيها التهليل والتحميد" يعني أيام العشر.
صحيح: رواه أبو عوانة في"مسنده" (3024) عن أبي يحيى عبد الله بن أحمد بن أبي ميسرة، حدّثنا عبد الحميد بن غزوان البصريّ، حدّثنا أبو عوانة، عن موسى بن أبي عائشة، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح، وموسي بن أبي عائشة ثقة من رجال الجماعة.
ورواه الإمام أحمد (5446)، وعبد بن حميد (807) كلاهما من حديث أبي عوانة، حدّثنا يزيد ابن أبي زياد، عن مجاهد، به، مثله.
ويزيد بن أبي زياد هو الهاشمي مولاهم ضعيف، ولكنه توبع في الإسناد الأول.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আল্লাহর নিকট এমন কোনো দিন নেই যা এই দিনগুলোর (অর্থাৎ যিলহজ্জের প্রথম দশ দিনের) চেয়ে অধিক মহান, আর এই দিনগুলোর মধ্যে আমল করা আল্লাহর নিকট অধিক প্রিয়। সুতরাং তোমরা এই দিনগুলোতে তাহলীল ও তাহমীদ বেশি করে পাঠ করো।”
4318 - عن عبد الله بن عمرو، قال: كنت عند رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكرت الأعمال، فقال:"ما من أيام العمل فيهن أفضل من هذه العشر". قالوا: يا رسول الله، ولا الجهاد في سبيل الله؟ قال: فأكبره، فقال:"ولا الجهاد إلا أن يخرج رجل بنفسه وماله في سبيل الله، ثم تكون مهجة نفسه فيه".
حسن: رواه الإمام أحمد (6559)، وابن أبي عاصم في"الجهاد" (157)، والطيالسيّ (2397) كلّهم من حديث زهير بن معاوية، حدثنا إبراهيم بن المهاجر، عن عبد الله بن باباه، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الاختلاف في إبراهيم بن المهاجر، فضعّفه أبو حاتم ومشّاه أحمد وأبو داود والعجلي وابن سعد وغيرهم، وهو حسن الحديث.
وقوله:"مُهجة" بضم الميم وسكون الهاء الدم، أو دم القلب والرّوح.
وقد رُوي عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما من أيام أحبّ إلى الله أن يُتعبّد له فيها من عشر ذي الحجة، يعدل صيام كل يوم منها بصيام سنة. وقيام كل ليلة منها بقيام ليلة القدر".
رواه الترمذي (758)، وابن ماجه (1728)، وأبو عوانة (3021)، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (174) كلهم من حديث مسعود بن واصل، عن نهاس بن قَهْم، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.
ومسعود بن واصل الأزرق ضعّفه أبو داود وغيره.
وشيخه النهاس بن قَهم القيسي أسوأ حالًا منه فقد ضعّفه جمهور أهل العلم.
قال ابن حبان:"كان يروي المناكير عن المشاهير، ويخالف الثقات، لا يجوز الاحتجاج به".
ولعلّ هذا منه فإنه انفرد به عن قتادة، ولم يرو هذا الحديث من غير طريقه.
وتساهل الترمذيّ فحسّنه مع الغرابة، فقال:"حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث مسعود بن واصل، عن النهاس".
وقال:"وسألت محمدًا عن هذا الحديث فلم يعرفه من غير هذا الوجه مثل هذا".
وقال:"قد رُوي عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا شيء من هذا. وقد تكلّم يحيى بن سعيد في نهاس بن قهم من قبل حفظه" انتهى.
وفي الباب حديث جابر، رواه ابن حبان (3853) وغيره، وسبق ذكره في الحج - فضل يوم عرفة فراجعه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন নেক আমলসমূহ সম্পর্কে আলোচনা করছিলেন। তিনি বললেন: "এমন কোনো দিন নেই, যার মধ্যে সম্পাদিত নেক আমল এই দশ দিনের (যিলহজ্জের প্রথম দশ দিন) আমলের চেয়ে উত্তম।" সাহাবীগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর পথে জিহাদও কি এর চেয়ে উত্তম নয়?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটিকে (জিহাদকে) মহান জ্ঞান করলেন, অতঃপর বললেন: "জিহাদও না। তবে যদি কোনো ব্যক্তি তার জীবন ও সম্পদ নিয়ে আল্লাহর পথে জিহাদের জন্য বের হয় এবং সেখানে তার প্রাণ উৎসর্গ হয়ে যায়।"
4319 - عن عائشة، قالت:"ما رأيتُ رسولّ الله صلى الله عليه وسلم صائمًا في العشر قطّ".
وفي لفظ:"أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم لم يَصُم العشر".
صحيح: رواه مسلم في الاعتكاف (1176) من طريق الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، فذكرته.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الترمذي (756) وقال: هكذا روي غير واحد عن الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة. وروى الثوري وغيره هذا الحديث عن منصور، عن إبراهيم، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم ير صائمًا قط.
وأما ما رُويَ عن بعض أزواج النبي صلى الله عليه وسلم: أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصوم العشر فهو شاذٌّ مخالفٌ لما في الصحيح.
رواه النسائي (2418) من حديث هنيدة بن خالد، عن امرأته، عن بعض أزواج النبي صلى الله عليه وسلم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, "আমি রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে (যিলহজ্জের) প্রথম দশ দিনে কখনো রোজা রাখতে দেখিনি।"
অন্য একটি বর্ণনায় রয়েছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ দশ দিনে রোজা রাখেননি।
4320 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل الصّيام بعد رمضان شهر الله المحرَّم، وأفضل الصّلاة بعد الفريضة صلاة اللّيل".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1163) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا أبو عوانة، عن أبي بشر، عن حُميد بن عبد الرحمن الحميريّ، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রমজানের পর সর্বোত্তম সিয়াম হলো আল্লাহর মাস মুহাররম, আর ফরয সালাতের পর সর্বোত্তম সালাত হলো রাতের সালাত (তাহাজ্জুদ)।"
4321 - عن جندب بن سفيان البجليّ، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ أفضل الصّلاة بعد المفروضة الصلاة في جوف الليل، وأفضل الصيام بعد رمضان شهر الله الذي تدعونه
المحرم".
صحيح: رواه الطبراني في الكبير (2/ 182 - 183)، والنسائي في الكبري (2904)، والبيهقي (4/ 291) كلّهم من حديث عبيدالله بن عمرو، عن عبد الملك بن عمير، عن جندب بن سفيان، فذكره. واختصره النسائي.
قال المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1548) بعد أن عزاه للنسائي، والطبراني: إسناده صحيح.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 190 - 191):"عزاه في الأطراف إلى النسائي. ولم أجده في نسختي، وكأنه في"الكبرى". ورواه الطبراني في"الكبير" ورجاله رجال الصحيح".
وفي الباب ما رُوي عن مجيبة الباهليّة، عن أبيها -أو عمّها- أنه أتى النبيّ صلى الله عليه وسلم، ثم انطلق، فأتاه بعد سنة، وقد تغيّرت حاله وهيئته، فقال: يا رسول الله! أما تعرفني؟ قال:"من أنت؟". قال: أنا الباهلي الذي جئتك عام الأول. قال:"فما غيّرك، وقد كنت حسن الهيئة؟". قال: ما أكلتُ طعامًا منذ فارقتك إلا بليل؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لم عذبتَ نفسك؟" ثم قال:"صُمْ شهر الصّبر، ويومًا من كلّ شهر". قال: زدني فإن بي قوة. قال:"صم يومين" قال: زدني: قال:"صم ثلاثة أيام". قال: زدني -قال:"صم من الْحُرُم واترك، وصم من الْحُرُم واترك، صم من الْحُرُم واترك" وقال بأصابعه الثلاثة- فضمّها ثم أرسلها.
رواه أبو داود (2428) من طريق حماد، وابن ماجه (1741)، والنسائي (2743) من حديث سفيان، والإمام أحمد (20323) من حديث الجريري، كلّهم عن أبي السيل، عن مجيبة الباهلية، فذكرته.
هكذا رواه أبو داود -واللفظ له-، ورواه ابن ماجه، فقال: عن أبي مجيبة الباهلي، عن أبيه -أو عن عمه-.
وفيه بعد قوله:"ويومين":"صم شهر الصبر، وثلاثة أيام بعده، وصم أشهر الْحُرُم".
وفي رواية النسائي: عن مجيبة الباهلي، عن عمّه -بدون شك، وفيه-:"صُم الْحُرُم وأفطر".
وفي رواية أحمد:"مجيبة عجوز من باهلة".
ومجيبة الباهلية مجهولة لم يرو عنها غير أبي السبيل. ثم كما رأيت اضطرب الناس فيها فقيل: إنّها امرأة، وقيل: إنها رجل، وقيل: أبو مجيبة.
قال المنذري بعد أن نقل كلام العلماء في مجيبة الباهلية أو الباهلي:"وقد وقع هذا الاختلاف كما تراه، وأشار بعض شيوخنا إلى تضعيفه لذلك، وهو متوجه".
والجريري هو سعيد بن إياس اختلط بآخره ولكن رواه البعض من سبق ذكرهم قبل الاختلاط.
وقوله:"الْحُرُم" أي الأشهر الحرم، وهي: رجب، وذو القعدة، وذو الحجة، والمحرم. وقد عبر أعرابي بقوله: ثلاثة سَرْد، وواحد فرد.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن علي بن أبي طالب سأله رجل فقال: أي شهر تأمرني أن أصوم
بعد شهر رمضان؟ قال له: ما سمعت أحدًا يسأل عن هذا إلا رجلا سمعته يسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا قاعد. يا رسول الله، أي شهر تأمرني أن أصوم بعد شهر رمضان؟ قال:"إن كنت صائمًا بعد شهر رمضان فصم المحرم، فإنه شهر الله، ففيه يوم تاب فيه على قوم، ويتوب فيه على قوم آخرين".
رواه الترمذي (741) عن علي بن حجر، أخبرنا علي بن مسهر، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن النعمان بن سعد، عن علي بن أبي طالب، فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: ليس بحسن فإن فيه عبد الرحمن بن إسحاق وهو أبو شيبة الواسطي ضعيف باتفاق أهل العلم.
والنعمان بن سعد لم يوثفه غير ابن حبان؛ ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا تُوبع، ولم أجد من تابعه بل أكّد الترمذي بأنه غريب.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام يوم عرفة كان له كفارة سنتين، ومن صام يومًا من المحرم، فله بكل يوم ثلاثون يومًا".
رواه الطبرانيّ في الصغير (963) عن محمد بن رزين بن جامع المصري أبي عبد الله المدني، حدّثنا الهيثم بن حبيب، حدّثنا سلّام الطويل، عن حمزة الزيات، عن ليث بن أبي سليم، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.
قال الطبراني: لم يروه عن حمزة الزيات إلا سلّام الطويل، تفرّد به الهيثم بن حبيب.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 190): فيه الهيثم بن حبيب ضعّفه الذهبي.
قلت: وشيخه سلّام الطويل"متروك" كما في التقريب.
وفيه أيضًا ليث بن أبي سليم اختلط أخيرًا ولم يتميز حديثه فترك.
فقول المنذري في"الترغيب والترهيب" (1949):"رواه الطبراني في الصغير وهو غريب، وإسناده لا بأس به، والهيثم بن حبيب وثقه ابن حبان".
كيف يكون لا بأس به، وفيه كل هذه مما ذكرت، كما أني لم أجد توثيق ابن حبان للهيثم بن حبيب في"الثقات". وفي الباب أيضًا عن أنس بن مالك.
رواه الطبراني في"الأوسط" وفيه يعقوب بن موسى المدني مجهول وفيه مسلمة بن راشد. قال أبو حاتم:"مضطرب الحديث". انظر:"المجمع" (3/ 191).
জন্দাব ইবনে সুফিয়ান আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "নিশ্চয়ই ফরয সালাতের পর সর্বোত্তম সালাত হলো রাতের গভীরে (তাহাজ্জুদের) সালাত। আর রমযানের পর সর্বোত্তম সিয়াম হলো আল্লাহর মাস, যাকে তোমরা মুহাররম বলে ডাকো।"
4322 - عن أبي قتادة الأنصاريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن صوم الاثنين؟ فقال:"فيه وُلدتُ، وفيه أُنزل عليَّ".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1162: 198) من طريق مهدي بن ميمون، عن غيلان (هو ابن جرير المعْوليّ)، عن عبد الله بن معبد الزّمّاني، عن أبي قتادة، فذكره.
ورواه أيضًا (1162: 197) من طريق شعبة، عن غيلان بن جرير، به، نحوه.
ثم قال مسلم:"وفي هذا الحديث من رواية شعبة. قال: وسئل عن صوم يوم الاثنين والخميس؟ فسكتنا عن ذكر الخميس لما نُراه وهمًا".
আবু ক্বাতাদা আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সোমবারে রোযা রাখা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: “এ দিনেই আমি জন্মগ্রহণ করেছি এবং এ দিনেই আমার ওপর (অহি) অবতীর্ণ হয়েছে।”
4323 - عن أسامة بن زيد، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم الأيام يسرُد حتى يقال: لا يُفطر، ويُفطر الأيام حتى لا يكاد أن يصوم إلّا يومين من الجمعة، إن كان في صيامه، وإلّا صامهما، ولم يكن يصوم من شهر من الشهور ما يصوم من شعبان، فقلت: يا رسول الله، إنّك تصوم لا تكاد أن تُفطر، وتُفطر حتى لا تكاد أن تصوم إلّا يومين إن دخلا في صيامك وإلّا صُمتَهما! قال:"أيُّ يومين؟". قال: قلت: يوم الاثنين ويوم الخميس. قال:"ذانِكَ يومان تُعرض فيهما الأعمال على ربِّ العالمين، وأُحبُّ أن يُعرض عملي وأنا صائم".
قال: قلت: ولم أرك تصوم من شهر من الشهور ما تصومُ من شعبان! قال:"ذاك شهرٌ يغفُلُ الناس عنه بين رجب ورمضان، وهو شهرٌ ترفع فيه الأعمال إلى ربِّ العالمين، فأحبُّ أن يرفع عملي وأنا صائم".
حسن: رواه الإمام أحمد (21753) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا ثابت بن قيس أبو غصن، حدثني أبو سعيد المقبري، حدثني أسامة بن زيد، فذكره.
ورواه النسائي (2357) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، مختصرًا.
وإسناده حسن من أجل ثابت بن قيس أبو غصن المدني، وثقه الإمام أحمد وغيره، وضعّفه أبو داود وغيره إلا أنه حسن الحديث.
وحسّنه أيضًا المنذري من طريق النسائي في"مختصر سنن أبي داود".
وله طريق آخر رواه أبو داود (2436)، والإمام أحمد (21744) كلاهما من طريق أبان، حدثني يحيى بن أبي كثير، حدثني عمر بن أبي الحكم بن ثوبان، عن مولي قدامة بن مظعون، عن مولي أسامة بن زيد، أنه انطلق مع أسامة إلى وادي القرى في طلب مال له، فكان يصوم يوم الاثنين ويوم الخميس، فقال له مولاه: لِم تصوم الاثنين ويوم الخميس وأنت شيخ كبير؟ فقال: إنّ نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم كان يصوم يوم الاثنين والخميس، وسئل عن ذلك فقال:"إنّ أعمال العباد تعرض يوم الاثنين ويوم الخميس".
قال أبو داود: كذا قال هشام الدستوائي، عن يحيى، عن عمر بن أبي الحكم.
قلت: إسناده ضعيف فإن مولي قدامة بن مظعون ومولي أسامة بن زيد لا يعرفان. إلا أن الثاني اسمه حرملة، وقد مشاه البعض، فقال:"صدوق".
وقال المنذري:"وفي إسناده رجلان مجهولان" ثم ذكر حديث النسائي من طريق أبي سعيد كيسان المقبري. وقال:"هو حديث حسن".
فالمنذريّ حسَّن الطريق الأوّل، وأما الطريق الثاني وهو طريق أبي داود فضعّفه ولكن بمجموع الطريقين يكون الحديث حسنًا.
وله طريق آخر وهو ما رواه ابن خزيمة (2119) من طريق شرحبيل بن سعد، عن أسامة، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم الاثنين والخميس ويقول:"إنّ هذين اليومين تعرض فيهما الأعمال".
وشرحبيل بن سعد هو أبو سعد المدني مولى الأنصار.
ضعّفه النسائي، ووثقه ابن حبان، وهو لا بأس به في المتابعة.
وفي التقريب:"صدوق اختلط بآخره" وهذا لم يختلط فيه لوجود متابعات له.
উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমনভাবে লাগাতার সাওম (রোযা) পালন করতেন যে, (দেখে) মনে হতো তিনি আর ইফতার করবেন না (রোযা ছাড়বেন না)। আবার তিনি এমনভাবে রোযা ছেড়ে দিতেন যে, (দেখে) মনে হতো তিনি আর রোযা পালন করবেন না, তবে জুমুআর দিনগুলোর মধ্যে দুটি দিন ছাড়া (যদি না তা তাঁর নিয়মিত রোযার মধ্যে পড়ে যেত, তবে তিনি এই দুটি দিনে অবশ্যই রোযা রাখতেন)। তিনি অন্য কোনো মাসে এত সাওম পালন করতেন না, যেমনটি পালন করতেন শা‘বান মাসে।
আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি এমনভাবে সাওম পালন করেন যে, মনে হয় আপনি আর ইফতার করবেন না, আবার এমনভাবে রোযা ছেড়ে দেন যে, মনে হয় আপনি আর রোযা পালন করবেন না, তবে আপনার রোযার মধ্যে যদি দুটি দিন এসে পড়ে, তাহলে আপনি সেই দুটি দিনে রোযা রাখেন! তিনি বললেন: "কোন দুটি দিন?" আমি বললাম: সোমবার ও বৃহস্পতিবার। তিনি বললেন: "ওই দুটি দিনে বিশ্বজগতের প্রতিপালকের নিকট আমলসমূহ পেশ করা হয়। আমি ভালোবাসি যে আমার আমল পেশ করার সময় আমি যেন সাওমরত অবস্থায় থাকি।"
(উসামা) বলেন, আমি বললাম: অন্য কোনো মাসে আপনি এত রোযা পালন করেন না, যেমনটি করেন শা‘বান মাসে! তিনি বললেন: "এটি এমন একটি মাস যা রজব ও রমাযানের মধ্যবর্তী হওয়া সত্ত্বেও লোকেরা তা থেকে উদাসীন থাকে। এটি এমন মাস, যাতে বিশ্বজগতের প্রতিপালকের নিকট আমলসমূহ উঠানো হয়। তাই আমি পছন্দ করি যে আমার আমলসমূহ উঠানোর সময় আমি সাওমরত অবস্থায় থাকি।"
4324 - عن عائشة، قالت: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يصوم شعبان ورمضان ويتحرّى صوم الاثنين والخميس.
حسن: رواه الترمذي (745)، والنسائي (2187)، وابن ماجه (1649، 1739)، والإمام أحمد (24508) وصححه ابن حبان (3643) كلهم من حديث ثور بن يزيد، عن خالد بن معدان، حدّثنا ربيعة بن الغاز، أنه سأل عائشة عن صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت (فذكرت الحديث).
إلّا أنّ أحمد لم يذكر بين خالد بن معدان وبين عائشة ربيعة. والصحيح إثباته.
قال الترمذي: حديث حسن غريب من هذا الوجه.
وربيعة بن الغاز هو ربيعة بن عمرو الجرشي، وثقه الدارقطني وغيره، وهو حسن الحديث.
وهذا الإسناد من أصح ما روي به هذا الحديث.
وله أسانيد وفيها اختلاف كما قال النسائي وغيره إلا أنّ ما صحّ لا يضره ما لا يصح.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শা‘বান ও রামাদান মাসে সাওম (রোজা) পালন করতেন এবং সোম ও বৃহস্পতিবারের সাওমের প্রতি বিশেষভাবে সচেষ্ট থাকতেন।
4325 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"تعرض الأعمال يوم الاثنين والخميس، فأحبُّ أن يعرض عملي وأنا صائم".
صحيح: رواه الترمذي (747)، وابن ماجه (1740)، والإمام أحمد (8361) كلهم من حديث محمد بن رفاعة، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وزاد الآخران:"فيغفر الله لكل مسلم -أو لكل مؤمن- إلّا المتهاجرين فيقول: أخّرهما".
هذا لفظ المسند، ولفظ ابن ماجه:"دعهما حتى يصطلحا".
ومحمد بن رفاعة هو ابن ثعلبة القرظيّ قال فيه الحافظ:"مقبول".
وهو كما قال، فإنه توبع غير أنه زاد فيه: ذكر الصوم، ولعله لذلك استغربه الترمذيّ، فقال:"حسن غريب" ولكنه لم يخطئ لوجود شواهد صحيحة كما مضت، فلعلّ غيره اختصره، أو لم يبلغ إليه ذكر الصّوم بإسناد صحيح.
فقد رواه مالك في حسن الخلق (17) ومن طريقه مسلم في البر والصلة (2565) عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"تفتح أبواب الجنة يوم الاثنين ويوم الخميس، فيُغفر لكل عبد لا يشرك بالله شيئًا إلا رجلا كانت بينه وبين أخيه شحناء. فيقال: انظروا هذين حتى يصطلحا، انظروا هذين حتى يصطلحا، انظروا هذين حتى يصطلحا" إلّا أنه لم يذكر فيه صوم النبي صلى الله عليه وسلم.
ورواه أيضًا مالك (18) ومن طريقه مسلم (2565) عن مسلم بن أبي مريم، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة، رفعه مرة قال:"تعرض الأعمال في كل يوم خميس واثنين، فيغفر الله عز وجل في ذلك اليوم لكلّ امرئ لا يُشرك بالله شيئًا إلا امرءً كانت بينه وبين أخيه شحناء، فيقال: اتركوا هذين حتى يصطلحا، اتركوا هذين حتى يصطلحا". وكذلك رواه أيضًا سفيان، عن مسلم بن أبي مريم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমলসমূহ প্রতি সোমবার ও বৃহস্পতিবার (আল্লাহর সামনে) পেশ করা হয়। তাই আমি পছন্দ করি যে আমার আমল যেন এমন অবস্থায় পেশ করা হয় যখন আমি সওম পালনরত থাকি।"
4326 - عن أمّ سلمة، تقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم يوم السبت ويوم الأحد أكثر مما يصوم من الأيام ويقول:"إنّهما يوما عيد المشركين، فأنا أحبُّ أن أخالفهم".
حسن: رواه أحمد (26750)، والطبراني في الكبير (23/ 283) وصححه ابن خزيمة (2167)، وابن حبان (3616، 3646)، والحاكم (1/ 436) كلّهم من طرق عن عبد الله بن المبارك، قال: أخبرني عبد الله بن محمد بن عمر بن علي، قال: حدثنا أبي، عن كريب مولى ابن عباس، عن أمّ سلمة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عمر بن علي وهو ابن أبي طالب، وأبيه محمد بن عمر فإنهما صدوقان.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অন্য দিনগুলোর তুলনায় শনি ও রবিবার বেশি রোযা রাখতেন। আর তিনি বলতেন: "নিশ্চয়ই এই দুটি দিন মুশরিকদের ঈদের দিন, তাই আমি তাদের বিরোধিতা করতে পছন্দ করি।"
4327 - عن معاذة العدوية أنّها سألتْ عائشة زوجَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم: أكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يصوم من كلِّ شهر ثلاثة أيام؟ قالت: نعم، فقلت لها: من أيِّ أيام الشّهر كان يصوم؟ قالت: لم يكن يبالي من أيِّ أيام الشهر يصوم.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1160) عن شيبان بن فروخ، حدّثنا عبد الوارث، عن يزيد الرِّشْك، قال: حدّثتني معاذة العدوية، فذكرته.
هذا الإطلاق أولى من التقييد لما فيه من التنويع.
وأما التقييد ففيه أربعة أنواع من الصيام وهي الأول: صوم يوم من كل عشرة أيام.
والثاني: صيام البيض: وهي ثلاث عشرة، وأربع عشرة، وخمس عشرة.
والثالث: صوم ثلاثة أيام من غرّة كلّ شهر.
والرابع: صوم اثنين والخمسين من كلّ شهر.
والأحاديث الواردة فيها كلّها صحيحة.
وأما ما رُوي عن عائشة قالت:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم من الشهر: السبت والأحد والاثنين، ومن الشهر الآخر: الثلاثاء والأربعاء والخميس" فالصواب أنه موقوف.
رواه الترمذي في السنن (746)، وفي الشمائل (300) عن محمود بن غيلان، حدّثنا أبو أحمد ومعاوية بن هشام، قالا: حدّثنا سفيان، عن منصور، عن خيثمة، عن عائشة، قالت: فذكرته.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن، وروى عبد الرحمن بن مهدي هذا الحديث، عن سفيان ولم يرفعه".
قال الحافظ في الفتح (4/ 227):"والموقوف أشبه".
قلت: حديث عبد الرحمن أخرجه ابن جرير الطبري في"تهذيب الآثار" (984) عن ابن بشار، حدّثنا عبد الرحمن، حدثنا سفيان، عن منصور، عن خيثمة، قال:"كانت عائشة تصوم من الشهر السبت والأحد والاثنين، ومن الشهر الآخر كما مضى".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আযাহ আল-'আদাবিয়্যাহ তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। মু'আযাহ বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: মাসের কোন কোন দিন তিনি রোযা রাখতেন? তিনি বললেন: মাসের কোন দিনগুলোয় তিনি রোযা রাখতেন, সে ব্যাপারে তিনি পরোয়া করতেন না।
