হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4408)


4408 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تواصلوا، فأيكم إذا أراد أن يواصل فليواصل حتى السحر".

قالوا: فإنك تواصل يا رسول الله. قال:"إني لست كهيئتكم، إني أبيت لي مُطْعِم يُطعمني، وساق يسقين".

صحيح: رواه البخاري في الصوم (1963) عن عبد الله بن يوسف، حدّثنا الليث، حدثني ابن الهاد، عن عبد الله بن خبّاب، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

وفي الحديث من الإذن في الوصال إلى السَّحر - أي أن الصائم يتسخر ثم يواصل صومه إلى سحر آخر ولا يأكل شيئًا في الليل.

وقد ذهب إلى هذا أحمد وجماعة من المالكية وبعض أهل العلم، وقد كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يفعل ذلك أحيانًا كما في حديث جابر وعلي الآتيين في آخر الباب.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "তোমরা (রোযার) বিসাল (একটানা রোযা) করো না। তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি বিসাল করতে চায়, সে যেন সাহরী পর্যন্ত বিসাল করে।" তারা বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো বিসাল করেন।" তিনি বললেন, "আমি তোমাদের মতো নই। আমি যখন রাত যাপন করি, তখন আমার জন্য একজন খাদ্যদাতা থাকেন, যিনি আমাকে খাদ্য দেন এবং একজন পানীয়দাতা থাকেন, যিনি আমাকে পান করান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4409)


4409 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا وصال" يعني في الصوم.

حسن: رواه أحمد (11597) عن عبد الله بن الوليد، حدّثنا سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن قزعة، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الله بن الوليد، وهو ابن ميمون أبو محمد المكي، المعروف بالعدنيّ، مختلف فيه، فضعفه ابن معين، ومشّاه الآخرون، وهو حسن الحديث، وقد رواه ابن حبان في"صحيحه" (3578) من طريقه، وقرنه بمؤمل بن إسماعيل، كلاهما عن سفيان، به.

ومؤمل بن إسماعيل سيء الحفظ، ولكنه لا بأس به في المتابعات.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিসাল (অর্থাৎ একটানা রোযা রাখা) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (4410)


4410 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الحجامة والمواصلة. ولم يحرمهما إبقاءً على أصحابه، فقيل له: يا رسول الله! إنّك تواصل إلى السَّحر. فقال:"إنّي أواصل إلى السَّحر، وربّي يطعمني ويسقيني".

صحيح: رواه أبو داود (2374) عن الإمام أحمد -وهو في مسنده (18822) -، عن عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن عبد الرحمن بن عابس، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال: حدثني رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

ورواه أيضًا (18823، 18836) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7535) - عن سفيان، بإسناده، مثله.

وإسناده صحيح، وجهالة الصحابي لا تضر لأن الصحابة كلّهم عدول.

وقوله:"إبقاء" معناه رحمة. وهذه علة النهي، أي لم يكن النهي للحرمة، بل للرحمة.

وقوله:"إلى السّحر" بفتحتين - هذا بالنظر إلى بعض الأوقات وإلا فقد جاء ما يدل على أنه كان يواصل أكثر من ذلك.




নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিঙ্গা লাগানো (রক্তমোক্ষণ) এবং বিছাল (ইফতার না করে লাগাতার রোযা) পালন করতে নিষেধ করেছেন। তবে তিনি তাঁর সাহাবীগণের প্রতি দয়া করে তা হারাম করেননি। তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো সাহরী পর্যন্ত লাগাতার রোযা রাখেন। তিনি বললেন, "আমি সাহরী পর্যন্ত বিছাল করি, (কারণ) আমার রব আমাকে আহার করান এবং পান করান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4411)


4411 - عن ليلى امرأة بشير، قالت: أردت أن أصوم يومين مواصلة، فمنعني بشير، وقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عنه. وقال:"يفعل ذلك النصارى -وقال عفان: يفعل ذلك النصارى، ولكن صوموا كما أمركم الله: {ثُمَّ أَتِمُّوا الصِّيَامَ إِلَى اللَّيْلِ} فإذا كان الليل فأفطروا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (21955)، وأبو داود الطيالسي (1221)، والطبراني في الكبير (2/ 31)، وعبد بن حميد (429) كلّهم من حديث عبيد الله بن إياد بن لقيط السدوسي، عن أبيه، عن ليلى امرأة بشير، فذكرته.

وإسناده صحيح، عبيد الله وأبوه ثقتان، وإن قال الحافظ في عبيد الله:"صدوق" فقد وثقه النسائي والعجلي وأبو نعيم وغيرهم.

وليلى امرأة بشير كانت من بني شيان، وروت عن النبيّ صلى الله عليه وسلم حديثين أو ثلاثة قاله أبو عمر، وذكره ابن حبان في الصحابة، فقال: يقال: لها صحية. ثم ذكرها في ثقات التابعين.

وكان اسمها"جهذمة" فغيرها النبي صلى الله عليه وسلم إلى ليلي.

أخرج الترمذيّ في الشمائل (46) عن إياد بن لقيط، عن الجهدمة امرأة بشير بن الخصاصية قالت: أنا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يخرج من بيته ينفض رأسه".

كل هذا ذكره ابن حجر في"الإصابة" في ترجمة"جهذمة".

وأمّا الهيثمي في"المجمع" (3/ 158) فلم يجد من ذكر ليلى وقال:"وبقية رجاله رجال
الصّحيح".

قلت: لأنّ المترجمين ترجموها باسم"جهذمة" لا باسم"ليلى".

وفي الباب ما روي عن جابر بن عبد الله، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يواصل من النحر إلى السَّحر.

رواه الطبراني في"الأوسط" (3768) عن علي بن عبد العزيز، حدّثنا أبو غسان مالك بن إسماعيل النهدي، قال: حدّثنا شريك بن عبد الله، عن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد الله، فذكره. وفيه شريك بن عبد الله هو النخعي كثير الخطأ.

وكذلك لا يصح عن جابر مرفوعا:"لا وصال في الصيام" رواه أبو داود الطيالسي (1873) عن خارجة بن مصعب، عن حرام بن عثمان، عن أبي عتيق، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وفيه خارجة بن مصعب وشيخه حرام بن عثمان ضعيفان جدا.

ورواه أيضًا (1874) عن اليمان أبي حذيفة، عن أبي عبس، عن جابر مثله، واليمان أبو حذيفة ضعف بالاتفاق، وأبو عبس لا يعرف.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن علي بن أبي طالب قال:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يواصل إلى السَّحر".

رواه أحمد (700)، والطبراني في الكبير (1/ 68)، وابن أبي شيبة (3/ 82 - 83)، وعبد بن حميد (85) كلّهم من طريق إسرائيل، عن عبد الأعلى، عن محمد بن علي، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

ومحمد بن علي هو ابن أبي طالب المعروف بابن الحنفية، وكنيته أبو القاسم، ويقال أيضًا: أبو عبد الرحمن كما في"منتخب عبد بن حميد".

وإسناده ضعيف من أجل عبد الأعلى وهو ابن عامر الثعلبي ضعفه جمهور أهل العلم.

وأما الهيثمي، فقال في"المجمع" (3/ 158):"رجاله رجال الصحيح"، وهذا وهم منه، فإن الثعلبي من رجال السنن فقط.

وقد استدل بمجموع هذه الأحاديث على أنّ الوصال من خصائص النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو ممنوع لغيره،

للعلّة التي بيّنها النبيُّ صلى الله عليه وسلم وهي أن الله تبارك وتعالى يطعمه ويسقيه حقيقة، وهذا من خصائصه صلى الله عليه وسلم التي لا يشاركه فيها أحد. ولأهل العلم تفاسير أخرى غير أن ما ذكرته هو أقربها إلى الصواب.




লায়লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন বাশিরের স্ত্রী। তিনি বলেন, আমি লাগাতার দু’দিন রোযা রাখতে চেয়েছিলাম (বিসাল করতে চেয়েছিলাম)। তখন বাশির আমাকে নিষেধ করলেন এবং বললেন, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা করতে নিষেধ করেছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "খ্রিষ্টানরা এমনটি করে,"—আফফান বলেন: খ্রিষ্টানরা এমনটি করে—"কিন্তু আল্লাহ তোমাদেরকে যেভাবে আদেশ করেছেন সেভাবে রোযা রাখো: {অতঃপর রাত পর্যন্ত সিয়াম পূর্ণ করো।} সুতরাং যখন রাত হবে, তখন ইফতার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4412)


4412 - عن محمد بن عباد بن جعفر، قال: سألت جابر بن عبد الله -وهو يطوف بالبيت-: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صيام يوم الجمعة؟ فقال: نعم وربِّ هذا البيت.

متفق عليه: رواه مسلم في الصيام (1143) عن عمرو الناقد، حدّثنا سفيان بن عيينة، عن عبد الحميد بن جبير، عن محمد بن عباد بن جعفر، فذكره.
ورواه أيضًا من طريق عبد الرزاق وهو في"مصنفه" (7808) عن ابن جريج، قال: أخبرني عبد الحميد بن جبير بن شيبة، بإسناده، فذكره عبد الرزاق مثله إلا أنه قال فيه: أسمعتَ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن صيام يوم الجمعة؟ .

وأما مسلم فلم يسق لفظ الحديث، وإنما أحال على ما سبق.

ورواه البخاري في الصوم (1984) عن أبي عاصم، عن ابن جريج، ولم يذكر قصة الطواف.

وقال البخاريّ: زاد غير أبي عاصم:"أن ينفرد بصوم".




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবনু আব্বাদ ইবনু জা'ফার বলেন: আমি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলাম—যখন তিনি বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করছিলেন—: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কি জুমু'আর দিন রোযা রাখতে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এই ঘরের রবের শপথ করে বলছি।









আল-জামি` আল-কামিল (4413)


4413 - عن وعن أبي هريرة، قال: سمعت النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يصومُ أحدكم يوم الجمعة إلّا يومًا قبله أو بعده".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1985)، ومسلم في الصيام (1144: 147) كلاهما من طريق الأعمش، حدّثنا أبو صالح، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তোমাদের কেউ যেন জুমু'আর দিন রোযা না রাখে, তবে তার আগের দিন অথবা পরের দিনের সাথে মিলিয়ে রাখলে (তা ভিন্ন কথা)।”









আল-জামি` আল-কামিল (4414)


4414 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تختصوا ليلة الجمعة بقيام من بين الليالي، ولا تخصُّوا يوم الجمعة بصيام من بين الأيام، إلّا أن يكون في صوْمٍ يصومُه أحدُكم".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1144: 148) عن أبي كريب، حدّثنا حسين (يعني الجعفي)، عن زائدة، عن هشام (هو ابن حسّان القردوسيّ)، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অন্যান্য রাতের মধ্য থেকে কেবল জুমু‘আর রাতকে কিয়ামের জন্য নির্দিষ্ট করো না এবং অন্যান্য দিনের মধ্য থেকে কেবল জুমু‘আর দিনকে রোযার জন্য নির্দিষ্ট করো না। তবে যদি তা এমন কোনো রোযার অন্তর্ভুক্ত হয়, যা তোমাদের কেউ রেখে থাকে (তাহলে রাখতে পারবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4415)


4415 - عن وعن أبي هريرة، قال -وهو يطوف بالبيت-: وربِّ الكعبة، ما أنا نهيتُ عن صيام يوم الجمعة، محمد صلى الله عليه وسلم وربّ الكعبة - نهي عنها.

صحيح: رواه الإمام أحمد (7288)، وعبد الرزاق (7807) وعنه أحمد أيضًا (7839)، وصحّحه ابن خزيمة (2157)، وابن حبان (3609) كلّهم من طريق عمرو بن دينار، أخبرني يحيى ابن جعدة، أنه سمع عبد الله بن عمرو القاري، قال: سمعت أبا هريرة، يقول (فذكر الحديث).

ثم يقول عمرو (يعني ابن دينار):"إذا أفرد". ومنهم من زاد:"من أصبح جنبًا فلا يصوم".

وإسناده حسن؛ فإنّ عبد الله بن عمرو وهو ابن عبد القاري، وهو من رجال مسلم، ولكن لم يوثقه غير ابن حبان كما في بعض نسخ"الثقات"؛ ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، وقد توبع.

تابعه محمد بن جعفر المخزومي، قال: لقي أبا هريرة رجلٌ -وهو يطوف بالبيت-، فقال: يا أبا هريرة، أنتَ نهيتَ النّاس عن صوم الجمعة؟ قال: لا، وربَّ الكعبة، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عنه.

رواه أحمد (9097) عن يونس، حدّثنا المستور -يعني ابن عباد-، حدّثنا محمد بن جعفر المخزومي، فذكره.

وهذا إسناد صحيح، محمد بن جعفر منسوب إلى جده، وهو محمد بن عباد بن جعفر بن رفاعة
المخزومي من رجال الجماعة.

والمستور -ويقال: المستورد- ابن عباد الهنائي، ثقة أخرج له النسائي.

وعبد الله بن عمرو القاري أخطأ البعض، فسمّاه عبد الرحمن بن عمرو القاري، والصواب ما أثبتناه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন কা‘বা শরীফ তাওয়াফ করছিলেন, তখন বললেন: ‘কা‘বার রবের কসম! জুমআর দিন রোযা রাখা থেকে আমি নিষেধ করিনি। বরং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ই—কা‘বার রবের কসম—তা থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4416)


4416 - عن جويرية بنت الحارث، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها يوم الجمعة وهي صائمة، فقال: أصُمْتِ أمسِ؟ قالت: لا. قال: تريدين أن تصومي غدًا؟ قالت: لا. قال:"فأفطري".

وقال حمّاد بن الجعد سمع قتادة حدثني أبو أيوب: أن جويرية حدَّثته فأمرها، فأفطرتْ.

صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1986) من طريق شعبة، عن قتادة، عن أبي أيوب، عن جويرية بنت الحارث، فذكرته.

قوله:"وقال حماد بن الجعد … إلخ".

قال الحافظ:"وصله أبو القاسم البغوي في"جمع حديث هدبة بن خالد" قال: حدّثنا هدية، حدّثنا حماد بن الجعد، سئل قتادة عن صيام النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: حدثني أبو أيوب، فذكره.

وقال في آخره:"فأمرها فأفطرت". وحمّاد بن الجعد فيه لين.




জুওয়াইরিয়াহ বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিন তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন, তখন তিনি রোযা অবস্থায় ছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি গতকাল রোযা রেখেছিলে? তিনি বললেন: না। তিনি বললেন: তুমি কি আগামী দিন রোযা রাখার ইচ্ছা করেছ? তিনি বললেন: না। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি রোযা ভেঙ্গে ফেলো।"

আর হাম্মাদ ইবনু জাদ বলেছেন, তিনি কাতাদাকে বলতে শুনেছেন, আবু আইয়ুব আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, জুওয়াইরিয়াহ তাঁকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে রোযা ভাঙ্গার নির্দেশ দেন এবং তিনি রোযা ভেঙ্গে ফেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4417)


4417 - عن عبد الله بن عمرو: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على جويرية بنت الحارث وهي صائمة في يوم الجمعة. فقال لها:"أصمتِ أمس؟". فقالت: لا. قال: أتريدين أن تصومي غدًا؟". فقالت: لا. قال:"فأفطري إذًا".

صحيح: رواه أحمد (6771) عن محمد بن جعفر، حدّثنا سعيد، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن عبد الله بن عمرو، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على جويرية بنت الحارث، فذكر الحديث.

وسعيد هو ابن أبي عروبة، وقد اختلط في آخره. ومحمد بن جعفر ممن سمع منه بعد الاختلاط، ولكنه لم ينفرد، بل رواه عدد عن سعيد بن أبي عروبة.

منهم: عبدة بن سليمان عنه. ومن طريقه رواه ابن خزيمة (2162)، وابن حبان (3611).

ومنهم: خالد بن الحارث عنه. ومن طريقه رواه أيضًا ابن خزيمة (2162).

ومنهم: بشر بن المفضل عنه. ومن طريقه رواه النسائي في"الكبرى" (2753).

ومنهم: ابن عدي وعبد الأعلى عنه. ومن طريقهما أخرجه أيضًا ابن خزيمة (2164).

ومن هؤلاء من سمع من سعيد بن أبي عروبة قبل الاختلاط، فمتابعة بعضهم لبعض يدل على أنه لم يختلط في هذا الحديث.

ولكن يرى الحافظ ابن حجر أنّ طريق شعبة، عن قتادة، عن أبي أيوب. وهو المراغي الأزدي -، عن جويرية محفوظ لمتابعة همام وحماد بن سلمة، عن قتادة بخلاف حديث سعيد بن أبي عروبة، عن
قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن عبد الله بن عمرو، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم دخل على جويرية، فذكره.

ثم قال: ويحتمل أن تكون طريق سعيد محفوظة أيضًا، فإنّ معمرًا رواه عن قتادة، عن سعيد بن المسبب أيضًا. لكن أرسله. انظر:"الفتح" (4/ 234).

قلت: هذا المرسل رواه عبد الرزاق (7804)، وزيادة الثقة مقبولة، وإنّ قتادة كثير الرواية، فلعله روي مرة هكذا وأخرى هكذا، وكلّه صحيح.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জুওয়াইরিয়াহ বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, যখন তিনি জুমার দিন রোযা রেখেছিলেন। অতঃপর তিনি তাকে বললেন, "তুমি কি গতকাল রোযা রেখেছিলে?" তিনি বললেন, "না।" তিনি বললেন, "তুমি কি আগামীকাল রোযা রাখতে চাও?" তিনি বললেন, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে তুমি ইফতার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4418)


4418 - عن بشير بن الخصاصية أنه سأل النبيّ صلى الله عليه وسلم: أصوم يوم الجمعة، ولا أكلِّم ذلك اليوم أحدًا؟ . فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تصم يوم الجمعة إلّا في أيام هو أحدها، أو في شهر. وأما أن لا تكلّم أحدًا، فلعمري لأن تكلِّم بمعروف، وتنهى عن منكر خير من أن تسكت".

صحيح: رواه الإمام أحمد (21954)، والطبراني في"الكبير" (2/ 31)، وعبد بن حميد (428)، والبيهقي (10/ 75 - 76) كلّهم من طريق عبيد الله بن إياد بن لقيط، قال: سمعت إياد بن لقيط يقول: سمعت ليلى امرأة بشير تقول: أخبرني بشير، فذكره.

وإسناده صحيح. وامرأة بشير صحابية كان اسمها جهدمة فسماها رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلى، وقد مضى لها حديث في النهي عن صوم الوصال.

وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تصوموا يوم الجمعة وحده".

رواه أحمد (2615) عن عتّاب بن زياد، قال: أخبرنا عبد الله، قال: أخبرنا الحسين بن عبد الله ابن عبيد الله بن عباس، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

والحسين بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس ضعيف باتفاق أهل العلم.

روي عن أبي الدرداء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أبا الدرداء لا تختص ليلة الجمعة بقيام دون الليالي، ولا يوم الجمعة بصيام دون الأيام".

رواه أحمد (27507)، والنسائي في"الكبري" (2752)، وابن أبي شيبة (3/ 45) كلّهم من حديث عاصم الأحول، عن محمد بن سيرين، عن أبي الدرداء، فذكره.

إلا أن محمد بن سيرين لم يسمع من أبي الدرداء؛ لأنه ولد لسنتين بقينا من خلافة عثمان، وتوفي أبو الدرداء في آخر خلافة عثمان، ثم هو كان في البصرة وأبو الدرداء كان في الشام كما قال أبو حاتم. قال بهذه الأحاديث جمهور أهل العلم بأن تخصيص يوم الجمعة للصوم مكروه. وقال مالك: لا يكره.

وفي"الموطأ" في باب جامع الصيام، قال يحيي: سمعتُ مالكًا يقول: لم أسمع أحدًا من أهل العلم والفقه، ومن يُقتدى به ينهى عن صيام يوم الجمعة، وصيامه حسن، وقد رأيت بعض أهل العلم يصومه، وأراه كان يتحراه".
تنقل الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" عن الداودي أنه قال:"لم يبلغ مالكًا هذا الحديث، ولو بلغه لم يخالفه".

قلت: وفيه ردٌّ بأنّ عمل أهل المدينة حجة؛ لأنّه قد تخفى عليهم السنن مثل ما تخفى على غيرهم؛ لأنّ جماعة من الصحابة بعد النبيّ صلى الله عليه وسلم خرجوا منها إلى الديار الأخرى للجهاد والدعوة والتعليم والتجارة وغيرها.




বশীর ইবনুল খাসাসিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: আমি কি জুমু'আর দিনে সাওম পালন করব এবং সেদিন কারো সাথে কথা বলব না? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: জুমু'আর দিনে সাওম পালন করো না, তবে যদি এমন কিছু দিন হয় যার মধ্যে এই দিনটি একটি, অথবা (তা যদি কোনো) মাসের মধ্যে হয় (তবে ভিন্ন কথা)। আর কারো সাথে কথা না বলার বিষয়ে বলছি—আমার জীবনের শপথ! তুমি যদি ভালো কাজের আদেশ দাও এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করো, তবে চুপ থাকার চেয়ে তা উত্তম।









আল-জামি` আল-কামিল (4419)


4419 - عن أبي الأوبر، قال: كنت قاعدًا عند أبي هريرة إذ جاءه رجل، فقال: إنّك نهيت النّاس عن صيام يوم الجمعة؟ قال: ما نهيتُ الناس أن يصوموا يوم الجمعة، ولكني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تصوموا يوم الجمعة فإنه يوم عيد إلا أن تصلوه بأيام".

حسن: رواه أحمد (8773)، وابن حبان (3610)، وعبد الرزاق (7806) كلهم من طرق عن عبد الملك بن عمير، عن رجل من بني الحارث بن كعب، يقال له: أبو الأوبر، فذكره. واللفظ لابن حبان.

وإسناده حسن من أجل أبي الأوبر، وترجمته في"التعجيل" في ترجمة زياد الحارثي، كما سماه النسائيّ والدولابي وأبو أحمد وغيرهم.

ووثقه ابن معين، وابن حبان، وصحح حديثه، وقد جزم الحسيني بأنه معروف، ولكنه مشهور بكنيته أكثر من اسمه.

وفيه أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة، مرفوعًا:"يوم الجمعة يوم عيد، فلا تجعلوا يوم عيدكم يوم صيامكم، إلا أن تصوموا قبله أو بعده".

رواه الإمام أحمد (8025)، وابن خزيمة (2161، 2166)، والحاكم (1/ 437)، والبزار -كشف الأستار (1069) - كلّهم من طريق أبي بشر، عن عامر بن لُدين الأشعري، عن أبي هريرة، فذكره.

وأبو بشر لم يعرف اسمه وهو مجهول، كما قال الذهبي متعقبًا الحاكم في قوله:"صحيح الإسناد إلا أن أبا بشر هذا لم أقف على اسمه، وليس ببيان بن بشر، ولا بجعفر بن أبي وحشية".

وعامر بن لُدين لم يوثقه غير ابن حبان، فهو في عداد المجهولين أيضًا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ আল-আওবার বলেন: আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম। এমন সময় তাঁর কাছে এক লোক এসে বলল, 'আপনি নাকি লোকদেরকে জুমু'আর দিন রোযা রাখতে নিষেধ করেছেন?' তিনি বললেন, 'আমি লোকজনকে জুমু'আর দিন রোযা রাখতে নিষেধ করিনি। তবে আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা জুমু'আর দিন রোযা রেখো না। কারণ এটি ঈদের দিন। তবে এর সঙ্গে যদি অন্য কোনো দিন যুক্ত করো (অর্থাৎ এর আগের দিন বা পরের দিনও রোযা রাখো, তাহলে ভিন্ন কথা)।" '









আল-জামি` আল-কামিল (4420)


4420 - عن الصماء بنت بسر، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تصوموا يوم السبت إلا في ما افتُرض عليكم، وإن لم يجد أحدكم إلا لِحاء عِنبةٍ، أو عودَ شجرة فليمضغه".
صحيح: رواه أبو داود (2421)، والترمذي (744)، وابن ماجه (1726)، وأحمد (27075). وصححه ابن خزيمة (2164)، والحاكم (1/ 435) كلهم من حديث ثور، عن خالد بن معدان، عن عبد الله بن بسر، عن أخته الصماء، فذكرته. ومنهم من جعله من مسند عبد الله بن بسر وهو صحابي أيضًا.

قال أبو داود:"هذا الحديث منسوخ". وقال:"عبد الله بن بسر حمصي، وهذا الحديث منسوخ، نسخه حديث جويرية. ونقل أبو داود في"سننه" عن مالك أنه قال:"هذا الحديث كذب".

ونقل البيهقي (4/ 302 - 303) عن الأوزاعي أنه قال:"ما زلت له كاتمًا، ثم رأيته انتشر".

وقد قيل فيه اضطراب، قاله النسائيّ.

وبمقابل هذا، قال الترمذي:"حديث حسن. ومعني كراهته في هذا أن يخصّ الرجل يوم السبت بصيام؛ لأنّ اليهود تعظّم يوم السبت".

وقال الحاكم:"حديث صحيح على شرط البخاري. وقال: وله معارض بإسناد صحيح، وقد أخرجاه. فذكر حديث جويرية بنت الحارث كما مضى في باب النهي عن صيام يوم الجمعة منفردًا.

وقول مالك:"هذا الحديث كذب" ردّه النووي في"شرح المهذب" (6/ 439) فقال:"هذا القول لا يقبل، فقد صحّحه الأئمة".

وردّ على قول أبي داود بأنه منسوخ قائلًا:"ليس كما قال".

إذا عرفت هذا فاعلم أنّ هذا الحديث صحيح الإسناد رجاله ثقات، ثور هو ابن يزيد الحمصي ثقة ثبت.

وخالد بن معدان الكلاعي حمصي أيضًا ثقة عابد من رجال الجماعة.

وعبد الله بن بسر صحابي صغير، وهو آخر من مات بالشّام.

وقد توبع نور بن يزيد وهو ما رواه أحمد (27077) عن الحكم بن نافع، قال: حدّثنا إسماعيل بن عياش، عن محمد بن الوليد الزبيدي، عن لقمان بن عامر، عن خالد بن معدان، بإسناده، نحوه. وهي متابعة جيدة؛ فإنّ إسماعيل بن عياش ثقة في روايته عن أهل بلده الشّاميين. وهذه منها.

وللحديث إسناد آخر عن عبد الله بن بسر نفسه، وهو ما رواه أحمد (17686) عن إبراهيم بن إسحاق الطالقاني، قال: حدّثنا الوليد بن مسلم، عن يحيى بن حسان، قال: سمعت عبد الله بن بسر، يقول: ترون يدي هذه، فأنا بايعت بها رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ولا تصوموا يوم السبت إلّا فيما افتُرض عليكم". وهذا إسناد صحيح.

ويحيي بن حسان هو البكري الفلسطيني وقد توبع. رواه ابن حبان في"صحيحه" (3615) عن أبي يعلى، قال: حدّثنا الحكم بن موسي، قال: حدّثنا مبشر بن إسماعيل، عن حسان بن نوح،
قال: سمعت عبد الله بن بسر المازني صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: ترون بدي هذه، بايعتُ بها رسول الله صلى الله عليه وسلم وسمعته يقول:"لا تصوموا يوم السبت إلّا فيما افتُرض عليكم، ولو لم يجد أحدكم إلّا لِحاءَ شجرة فليفطر عليه".

وإسناده صحيح. حسان بن نوح"ثقة". وفي الإسناد تصريح بأنّ عبد الله بن بسر سمع هذا الحديث من النبيّ صلى الله عليه وسلم؛ فلعله سمعه أولًا عن أخته الصماء، ثم تيسر له السماع من النبيّ صلى الله عليه وسلم مباشرة وكلّه جائز. وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرتها هي أصحها.

إذا عرفت هذا فلا معنى لقول النسائيّ بأنه حديث مضطرب؛ لأن القواعد الحديثية نحكم بأنّ ما صحّ لا يُعَلُّ بما لم يصح.

وأما المعارضة بحديث جويرية فالصحيح أنه لا يعارضه بل يوافقه؛ لأنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها يوم الجمعة وهي صائمة، فقال:"أصُمِتِ أمس؟". قالت: لا. قال:"تريدين أن تصومي غدًا؟" قالت: لا. قال:"فأفطري".

ففيه النهي عن صوم يوم الجمعة وحده، وجواز ذلك مع قبله أو بعده وهو السبت، وليس فيه ذكر لجواز صيام السبت وحده، بل مع قبله وهو الجمعة أو مع بعده وهو الأحد.

وقد أطال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" في تخريج هذا الحديث وبيان علله، والسبب في النهي عن الصوم هذا اليوم، وخلص إلى القول بأن صيام يوم السبت منفردًا مكروه، وإذا صام يومًا قبله أو بعده جاز جمعًا بين الأحاديث. وبه قال النووي في"شرح المهذب".

وقال ابن الملقن في"البدر المنير" (5/ 763):"والحقّ أنه حديث صحيح غير منسوخ". وبالله التوفيق.




আব্দুল্লাহ ইবনে বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা শনিবার দিন রোযা রাখবে না, তবে যা তোমাদের উপর ফরয করা হয়েছে (সেটা রাখতে পার)। আর তোমাদের কেউ যদি (শনিবার দিন) আঙ্গুর গাছের ছাল বা কোনো গাছের ডাল ছাড়া অন্য কিছু না পায়, তবে সে যেন তা চিবিয়ে নেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4421)


4421 - عن جويرية بنت الحارث، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها يوم الجمعة وهي صائمة، فقال: أصُمْتِ أمسِ؟ قالت: لا. قال: تريدين أن تصومي غدًا؟ قالت: لا. قال:"فأفطري".

صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1986) من طريق شعبة، عن قتادة، عن أبي أيوب، عن جويرية بنت الحارث، فذكرته.




জুওয়াইরিয়া বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিন তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, যখন তিনি রোযাদার ছিলেন। তিনি বললেন: তুমি কি গতকাল রোযা রেখেছিলে? তিনি বললেন: না। তিনি বললেন: তুমি কি আগামীকাল রোযা রাখার ইচ্ছা করেছ? তিনি বললেন: না। তিনি বললেন: তাহলে তুমি ইফতার (রোযা ভঙ্গ) করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4422)


4422 - عن أمّ سلمة، تقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم يوم السبت ويوم الأحد أكثر مما يصوم من الأيام ويقول:"إنّهما يوما عيد المشركين، فأنا أحبُّ أن أخالفهم".

حسن: رواه أحمد (26750)، والطبراني في الكبير (23/ 283) وصحّحه ابن خزيمة (2167)، وابن حبان (3616، 3646)، والحاكم (1/ 436) كلّهم من طرق، عن عبد الله بن
المبارك، قال: أخبرني عبد الله بن محمد بن عمر بن علي، قال: حدّثنا أبي، عن كريب مولي ابن عباس، عن أم سلمة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عمر بن علي وهو ابن أبي طالب، وأبيه محمد بن عمر فإنهما صدوقان.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শনিবার ও রবিবার অন্য দিনের চেয়ে বেশি সাওম (রোযা) পালন করতেন। আর তিনি বলতেন, "নিশ্চয় এই দুই দিন হলো মুশরিকদের উৎসবের দিন, তাই আমি তাদেরকে বিরোধিতা করা পছন্দ করি।"









আল-জামি` আল-কামিল (4423)


4423 - عن وعن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تصوم المرأة وبعلها شاهد إلّا بإذنه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5192)، ومسلم في الزكاة (1026) كلاهما من حديث معتمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكره.

وقوله:"شاهد" يخرج به المسافر.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কোনো নারী যেন তার স্বামী উপস্থিত থাকা অবস্থায় তার অনুমতি ছাড়া সিয়াম (রোজা) পালন না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (4424)


4424 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تصوم المرأة وزوجها شاهد يومًا من

غير شهر رمضان إلّا بإذنه".

صحيح: رواه الترمذي (782)، وابن ماجه (1761)، وأحمد (7343)، وابن خزيمة (2168)

كلّهم من حديث سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح. وقد رُوي هذا الحديث عن أبي الزناد، عن موسي

ابن أبي عثمان، عن أبيه، عن أبي هريرة".

قلت: الإسناد الثاني أخرجه أيضًا الإمام أحمد (مع الإسناد الأول) فقال: قرئ عليه (أي على

سفيان) سمعت أبا الزناد، عن موسى بن أبي عثمان، عن أبيه، عن أبي هريرة.

فكان لأبي الزناد شيخان: أحدهما: الأعرج، والثاني: موسي بن أبي عثمان. وموسي بن أبي

عثمان وأبوه واسمه سعيد - وقيل: عمران - حسنا الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "রমযান মাস ব্যতীত অন্য কোনো দিনে স্বামী উপস্থিত থাকা অবস্থায় স্ত্রী তার অনুমতি ছাড়া রোযা রাখতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4425)


4425 - عن أبي سعيد الخدري، قال: جاءت امرأة صفوان بن المعطَّل إلى النّبيِّ صلى الله عليه وسلم

ونحن عنده. فقالت: يا رسول الله، إنّ زوجي صفوان بن المعطَّل يضربني إذا

صليتُ، ويُفطرني إذا صُمْتُ، ولا يصلي صلاة الفجر حتى تطلع الشمس قال -

وصفوان عنده - قال: فسأله عمَّا قالت، فقال: يا رسول الله، أمّا قولُها: يضربني

إذا صليتُ، فإنها تقرأ سورتين، فقد نهيتُها عنها. قال: فقال:"لو كانت سورة

واحدة لكفتِ النَّاسَ". وأما قولها: يُفطِّرني. فإنّها تصومُ وأنا رجلٌ شابٌ. فلا

أصَبْرُ. قال: فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومئذ:"لا تصومَنَّ امرأةٌ إلا بإذن زوجها". قال:

وأما قولها: بأنّي لا أصلّي حتى تطلع الشّمسُ، فإنّا أهل بيتٍ قد عُرِف لنا ذاك، لا
نكادُ نستيقظ حتى تطلعَ الشّمس. قال:"فإذا استيقظتَ فصلِّ".

صحيح: رواه أبو داود (2459)، والإمام أحمد وابنه (11759)، وصححه ابن حبان (1488)، والحاكم (1/ 436) وعنه البيهقي (4/ 303) كلّهم من حديث جرير، عن الأعمش، عن

أبي صالح، عن أبي سعيد، فذكره. وإسناده صحيح.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ورواه ابن ماجه (1762) من حديث أبي عوانة، عن سليمان الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد، قال:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم النساء أن يصمن إلا بإذن أزواجهن". هكذا مختصرًا، وإسناده صحيح.

وصحّحه الحافظ ابن حجر في"الإصابة" (2/ 191) في ترجمة صفوان بن معطّل. وقال:"ولكن يشكل عليه أنّ عائشة قالت في حديث الإفك:"إن صفوان قال: واللهِ! ما كشفتُ كنف أنثي قطّ". وقد أورد هذا الاشكال قديمًا البخاريّ ومال إلى تضعيف حديث أبي سعيد بذلك. وقال: ويمكن أن يجاب بأنه تزوّج بعد ذلك" انتهى كلام ابن حجر.

قلت: فقد عاش بعد قصة الإفك زمنًا؛ فإنه قُتل في غزوة إرمينية شهيدًا سنة (19 هـ) كما قاله ابن إسحاق. وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا وموقوفًا.

فأمّا المرفوع فهو ما رواه أبو يعلى -كما في المطالب العالية (2/ 195) - من طريق ليث بن أبي سليم، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: سألت امرأة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: ما حقُّ الرجل على امرأته؟ قال:"لا تمنعه نفسها وإن كانت على رأس قتب". قالت: وما حقُّ الرجل على امرأته؟ قال:"لا تصومُ يومًا تطوعًا إلا بإذنه، فإن فعلتْ أثمت، ولم يتقبَّل منها".

وليث بن أبي سليم سيء الحفظ، وقد اضطرب في هذا الحديث، فرواه مرة هكذا، وأخرى عن مجاهد، عن ابن عباس. رواه البيهقي (7/ 292) من طريق هشيم عنه.

ورواه عبد الرزاق في المصنف (7889) عن رجل، عن صالح مولى التوأمة، قال: سمعتُ ابن عباس يقول:"لا تحل لامرأة أن تصوم تطوعًا إلا بإذن زوجها" موقوفًا.

ثم رواه ليث بن أبي سليم أخرى فجعله من مسند ابن عمر.

رواه أبو داود الطيالسيّ، عن جرير، عن ليث بن أبي سليم، عن عطاء، عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم: أنّ امرأة أتته فقالت:"ما حقّ الزّوج" فذكر مثله.

ومن طريقه رواه البيهقيّ (7/ 292) وقال: تفرد به ليث بن أبي سُليم.



رواه الترمذي في الجامع (789) عن بشر بن معاذ العقدي البصريّ، حدثنا أيوب بن واقد الكوفيّ، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت (فذكرته).

ورواه ابن ماجه (1763) عن محمد بن يحيى الأزديّ، قال: حدّثنا موسي بن داود، وخالد بن أبي يزيد، قالا: حدّثنا أبو بكر المدني، عن هشام بن عروة، بإسناده، مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث منكر، لا نعرف أحدا من الثقات روي هذا الحديث عن هشام بن عروة. وقد روي موسي بن داود عن أبي بكر المدني عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوًا من هذا".

وقال:"وهذا حديث ضعيف أيضًا. وأبو بكر ضعيف عند أهل الحديث، وأبو بكر الذي روي عن جابر بن عبد الله اسمه الفضل بن مُبشِّر، وهو أوثق من هذا وأقدم، انتهي.

قلت: وهو كما قال؛ فإنّ أيوب بن واقد الكوفي أبا الحسن ضعيف باتفاق أهل العلم، قال الدارقطني:"متروك الحديث".

وقال ابن حبان:"يروي المناكير عن المشاهير حتى يسبق إلى القلب أنه كان يتعمّدها لا يجوز الاحتجاج بخبره".

وأبو بكر هو: ابن عبد الله بن محمد بن أبي سيرة القرشي المدني، رموه بالوضع، وهو يروي عن هشام بن عروة ما لم يوافق عليه الثقات من أصحابه.

قال الحاكم أبو عبد الله:"يروي الموضوعات عن الأثبات مثل هشام بن عروة وغيره".




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাফওয়ান ইবনুল মুয়াত্তালের স্ত্রী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যখন আমরা তাঁর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার স্বামী সাফওয়ান ইবনুল মুয়াত্তাল আমি যখন সালাত আদায় করি, তখন আমাকে মারেন; আর আমি যখন সাওম (রোযা) রাখি, তখন আমাকে সাওম ভাঙিয়ে দেন; এবং ফাজরের সালাত সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত আদায় করেন না।

(বর্ণনাকারী) বলেন—সাফওয়ান তখন তাঁর নিকটেই ছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে মহিলাটির অভিযোগ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। সাফওয়ান বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তার এই অভিযোগ যে, আমি তাকে মারি যখন সে সালাত আদায় করে—কারণ সে দুটি সূরা পাঠ করে, আমি তাকে তা থেকে বারণ করেছি।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তা একটি মাত্র সূরা হতো, তবুও তা মানুষের জন্য যথেষ্ট ছিল।"

সাফওয়ান বললেন: আর তার এই অভিযোগ যে, আমি তাকে সাওম ভাঙিয়ে দিই, এর কারণ হলো সে সাওম রাখে, আর আমি একজন যুবক মানুষ। তাই আমি ধৈর্য ধরতে পারি না।

বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো মহিলা যেন তার স্বামীর অনুমতি ছাড়া (নফল) সাওম না রাখে।"

সাফওয়ান বললেন: আর তার এই অভিযোগ যে, আমি সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত সালাত আদায় করি না—এর কারণ হলো, আমরা এমন একটি পরিবার, যার ব্যাপারে এই বিষয়টি জানা আছে যে, সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত আমরা সচরাচর জাগি না।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখনই তুমি জাগ্রত হও, তখনই সালাত আদায় করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4426)


4426 - عن * *




(The source text provided consists only of a number and placeholders ("عن * *"), making the identification of the required Sahabi/narrator and the Matn (main text) impossible. Therefore, a coherent, rule-adhering Hadith translation cannot be generated.)









আল-জামি` আল-কামিল (4427)


4427 - عن عدي بن حاتم، قال: لما نزلتْ: {حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ} عَمَدْتُ إلى عقال أسودَ، وإلى عِقال أبيضَ فجعلتهما تحت وسادتي، فجعلتُ أنظرُ في الليل فلا يستبينُ لي، فغدوْتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرتُ ذلك له، فقال:"إنّما ذلك سواد الليل وبياض النّهار".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1916)، ومسلم في الصيام (1090) كلاهما من طريق حصين بن عبد الرحمن، عن الشعبيّ، عن عديّ بن حاتم، به، فذكره. واللفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم نحوه، وزاد:"إنّ وسادتك لعريض".

قوله:"وسادتك". الوسادة: هي المخدة، وهي ما يجعل تحت الرأس عند النوم.

قوله:"العريض". قال القاضي عياض: معناه أن جعلتَ تحت وسادك الخيطين اللذين أرادهما الله تعالى، وهما الليل والنهار، فومادك يعلوهما ويغطيهما، وحينئذ يكون عريضًا.




আদি ইবনে হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো—{যতক্ষণ না তোমাদের কাছে সাদা সুতা কালো সুতা থেকে স্পষ্ট হয়ে যায়...}—আমি একটি কালো উটের রশি এবং একটি সাদা উটের রশি নিলাম এবং সে দুটোকে আমার বালিশের নিচে রাখলাম। আমি রাতে সেগুলোর দিকে তাকাতে থাকলাম, কিন্তু আমার কাছে তা স্পষ্ট হলো না। তাই আমি সকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম এবং তাঁর কাছে বিষয়টি উল্লেখ করলাম। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো রাতের অন্ধকার এবং দিনের শুভ্রতা।"