আল-জামি` আল-কামিল
441 - عن أبي هريرة، أنّ النّاس قالوا: يا رسول اللَّه، هل نرى ربَّنا يوم القيامة؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هل تضّارُّون في القمر ليلة البدر؟". قالوا: لا يا رسول اللَّه، قال:"فهل تضارّون في الشّمس ليس دونها سحاب؟". قالوا: لا يا رسول اللَّه. قال:"فإنّكم ترونه كذلك".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (806)، وفي الرّقاق (6573)، ومسلم في الإيمان (182) كلاهما من حديث أبي اليمان، قال: أخبرنا شعيب، عن الزّهريّ، قال: أخبرني سعيد بن المسيب وعطاء بن يزيد اللّيثيّ، أنّ أبا هريرة أخبرهما، فذكر الحديث بطوله، وهو مخرّج في حديث الصّراط.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে লোকেরা জিজ্ঞেস করলো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি কিয়ামতের দিন আমাদের রবকে দেখতে পাবো? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পূর্ণিমার রাতে চাঁদ দেখতে তোমাদের কি কোনো ভিড় বা অসুবিধা হয়?" তারা বললো: না, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: "মেঘমুক্ত অবস্থায় সূর্য দেখতে তোমাদের কি কোনো ভিড় বা অসুবিধা হয়?" তারা বললো: না, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা তাঁকে (আল্লাহকে) ঠিক সেভাবেই দেখবে।"
442 - عن أبي سعيد الخدريّ، أنّ أناسًا في زمن النبيّ صلى الله عليه وسلم قالوا: يا رسول اللَّه، هل نرى ربَّنا يوم القيامة؟ . قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"نعم، هل تضارُّون في رؤية الشّمس بالظّهيرة، ضوء ليس فيها سحاب؟". قالوا: لا. قال:"وهل تضارُّون في رؤية القمر ليلة البدر، ضوء ليس فيها سحاب؟". قالوا: لا. قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"ما تضارون في رؤية اللَّه عز وجل يوم القيامة إلّا كما تُضّارون في رؤية أحدهما".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4581)، ومسلم في الإيمان (183)، كلاهما من حديث حفص بن ميسرة، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث في سياق طويل. انظر: باب الصّراط جسر على جهنّم.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে কিছু লোক বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা কি কিয়ামতের দিন আমাদের রবকে দেখতে পাব? নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হ্যাঁ। দুপুর বেলায় যখন মেঘমুক্ত আকাশে আলো থাকে, তখন কি তোমরা সূর্য দেখতে কোনো কষ্ট অনুভব করো? তারা বলল: না। তিনি বললেন: আর পূর্ণিমার রাতে যখন মেঘমুক্ত আকাশে আলো থাকে, তখন কি তোমরা চাঁদ দেখতে কোনো কষ্ট অনুভব করো? তারা বলল: না। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: কিয়ামতের দিন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা-কে দেখতে তোমাদের ততটুকুই কষ্ট হবে, যতটুকু কষ্ট হয় এই দুটির (সূর্য বা চাঁদ) একটিকে দেখতে।
443 - عن أبي موسى الأشعريّ عبد اللَّه بن قيس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"جنّتان من فضّة، آنيتُهما وما فيهما، وجنّتان من ذهب آنيتهما وما فيهما، وما بين القوم وبين أن ينظروا إلى ربّهم إلا رداء الكِبرياء على وجهه في جنّة عدن".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7444)، ومسلم في الإيمان (180) كلاهما من حديث عبد العزيز بن عبد الصّمد، عن أبي عمران الجونيّ، عن أبي بكر بن عبد اللَّه بن قيس، عن أبيه، فذكر الحديث، ولفظهما سواء.
আবু মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দু’টি জান্নাত রূপার হবে, সেগুলোর পাত্রাদি এবং তার মধ্যে যা কিছু আছে। আর দু’টি জান্নাত সোনার হবে, সেগুলোর পাত্রাদি এবং তার মধ্যে যা কিছু আছে। আর আদন জান্নাতে জান্নাতবাসী ও তাদের রবের দর্শনের মাঝে কোনো কিছু বাধা থাকবে না, শুধু তাঁর চেহারায় (বিদ্যমান) মহিমা ও প্রতাপের চাদর ব্যতীত।
444 - عن صُهيب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا دخل أهل الجنةِ الجنَّةَ. قال: يقول اللَّه تبارك وتعالى: تريدون شيئًا أزيدكم؟ فيقولون: ألم تبيِّض وجوهنا؟ ألم تدْخلنا الجنّة، وتنجيّنا من النار؟ قال: فيكشف الحجاب. فما أُعطوا شيئًا أحبَّ إليهم من النّظر إلى ربّهم عز وجل".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (181) عن عبيد اللَّه بن عمر بن ميسرة، قال: حدثني عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا حماد بن سلمة، عن ثابت البنانيّ، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن صُهيب، فذكر الحديث.
ورواه أيضًا من طريق يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد وزاد:"ثم تلا هذه الآية: {لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا الْحُسْنَى وَزِيَادَةٌ} [سورة يونس: 26]".
وقد جاء عن جمع من أهل العلم من الصّحابة والتابعين: أنّ قوله تعالى: {لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا الْحُسْنَى وَزِيَادَةٌ} قالوا: الزّيادة هي النّظر إلى وجه ربّهم عز وجل، ذكره ابن خزيمة في كتاب التوحيد (1/ 402 - 403) وعزاه إلى عدد من أهل العلم.
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন জান্নাতবাসীরা জান্নাতে প্রবেশ করবে, আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা বলবেন: তোমরা কি এমন কিছু চাও যা আমি তোমাদেরকে আরও বেশি দিতে পারি? তখন তারা বলবে: আপনি কি আমাদের মুখমণ্ডল উজ্জ্বল করে দেননি? আপনি কি আমাদেরকে জান্নাতে প্রবেশ করাননি এবং জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেননি? তিনি (আল্লাহ) বলবেন: অতঃপর পর্দা উন্মোচিত হবে। তাই তাদেরকে তাদের প্রতিপালক পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহর দিকে তাকানোর চেয়ে প্রিয়তর আর কিছুই দেওয়া হয়নি।
445 - عن ابن شهاب، قال: أخبرني عمر بن ثابت الأنصاريّ، أنّه أخبره بعض أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال يوم حذّر النّاس الدّجال:"إنّه مكتوب بين عينيه كافر، يقرؤه من كره عملَه، أو يقرؤه كلّ مؤمن" وقال:"تعلَّموا أنه لن يرى أحد منكم ربّه عز وجل حتى يموت".
صحيح: رواه مسلم في الفتن (2930) عن حرملة بن يحيى، قال: أخبرني ابنُ وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، بإسناده في حديث طويل في قصة ابن صيّاد.
উমর ইবনু সাবিত আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, যেদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করেছিলেন, সেদিন তিনি বলেন: "তার (দাজ্জালের) দুই চোখের মাঝখানে 'কাফির' লেখা থাকবে। যার কাছে তার কাজ অপছন্দনীয় হবে, সে তা পড়তে পারবে, অথবা (তিনি বলেন) প্রত্যেক মুমিন ব্যক্তিই তা পড়তে পারবে।" এবং তিনি বলেন: "তোমরা জেনে রাখো, তোমাদের কেউই তার রব্ব আযযা ওয়া জাল-কে দেখতে পাবে না, যতক্ষণ না সে মারা যায়।"
446 - عن رجل قال لابن عمر: كيف سمعتَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول في النّجوى؟ قال: سمعتُه يقول:"يُدنَى المؤمنُ يوم القيامة من ربّه عز وجل، حتى يضع عليه كنفه، فيقرّره بذنوبه، فيقول: هل تعرف، فيقول: أي ربّ أعرف. قال: فإنّي قد سترتها عليك في الدّنيا، وإنّي أغفرها لك اليوم. فيعطى صحيفة حسناته. وأمّا الكفّار والمنافقون فيُنادى بهم على رؤوس الخلائق. هؤلاء الذين كذبوا على اللَّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4685)، ومسلم في التوبة (2768) كلاهما من طريق هشام الدّستوائيّ، عن قتادة، عن صفوان بن محرز، قال: قال رجل لابن عمر، فذكره، واللّفظ لمسلم.
قوله:"كنفه" أي جانبه وناحيته.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন যে, নজওয়া (গোপন আলাপ) সম্পর্কে আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলতে শুনেছেন? তিনি (ইবনু উমর) বললেন: আমি তাঁকে (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) বলতে শুনেছি: কিয়ামতের দিন মুমিনকে তার মহান ও পরাক্রমশালী রবের নিকটবর্তী করা হবে, এমনকি তিনি তার উপর তাঁর আবরণ (আড়াল) রেখে দেবেন। অতঃপর আল্লাহ তাকে তার গুনাহসমূহের স্বীকারোক্তি করাবেন এবং জিজ্ঞেস করবেন: তুমি কি তা জানো (স্বীকার করো)? সে বলবে: হ্যাঁ, হে আমার রব, আমি জানি (স্বীকার করি)। আল্লাহ বলবেন: আমি দুনিয়াতে তোমার জন্য তা গোপন রেখেছিলাম এবং আজ আমি তোমার জন্য তা ক্ষমা করে দিচ্ছি। অতঃপর তাকে তার নেক আমলের আমলনামা দেওয়া হবে। আর কাফির ও মুনাফিকদেরকে সকল সৃষ্টির সামনে উচ্চস্বরে ডেকে বলা হবে: এরাই হলো তারা, যারা আল্লাহর প্রতি মিথ্যা আরোপ করত।
447 - عن جابر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في قصة الورود، قال:"نحن يوم القيامة على كذا وكذا -انظر، أي: ذلك فوق الناس- قال: فتُدعى الأمم بأوثانها وما كانت تعبد، الأوّل فالأوّل، ثم يأتينا ربُّنا بعد ذلك، فيقول: من تنتظرون؟ فيقولون: ننتظر ربَّنا. فيقول: أنا ربّكم، فيقولون: حتى ننظر إليك، فيتجلّى لهم يضحك".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (191) من طرق عن روح بن عبادة القيسيّ، حدثنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه بسأل عن الورود، فذكر مثله في حديث طويل مخرج بكامله في حديث الصّراط.
وقوله:"كذا وكذا - انظر" هذا كلّه تحريف وقع في المتن، كما سبق بيانه في باب الضّحك.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ‘আল-উরুদ’ (পুলসিরাত অতিক্রম বা জাহান্নামের নিকটবর্তী হওয়া)-এর ঘটনা সম্পর্কে বলেন: কিয়ামতের দিন আমরা এমন এমন স্থানে থাকব—দেখো, অর্থাৎ, তা হবে লোকজনের ওপরে। তিনি বলেন: অতঃপর জাতিদেরকে ডাকা হবে তাদের মূর্তিপূজা এবং তারা যা কিছুর ইবাদত করত সেগুলোর মাধ্যমে, প্রথমোক্ত জাতি, এরপরের জাতি। অতঃপর তার পরে আমাদের প্রতিপালক আমাদের নিকট আগমন করবেন এবং বলবেন: তোমরা কার অপেক্ষা করছ? তারা বলবে: আমরা আমাদের রবের অপেক্ষা করছি। তিনি বলবেন: আমিই তোমাদের রব। তারা বলবে: যতক্ষণ পর্যন্ত না আমরা আপনাকে দেখি (ততক্ষণ অপেক্ষা করব)। অতঃপর তিনি তাদের সামনে প্রকাশ করবেন, তখন তিনি হাসতে থাকবেন।
448 - عن عبادة بن الصّامت أنّه قال: إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّي قد حدّثتكم عن الدّجال حتى خشيتُ أن لا تعقلوا، إنّ مسيح الدّجال رجل قصير أفحج، جعد، أعور مطموس العين، ليس بناتئة ولا حجْراء، فإن ألبس عليكم -قال يزيد: ربُّكم- فاعلموا أنّ ربَّكم ليس بأعور، وأنّكم لن ترون ربَّكم حتى تموتوا".
قال يزيد:"تروا ربّكم حتى تموتوا".
حسن: رواه الإمام أحمد (22764) وولده عبد اللَّه عن أبيه في السنة (1007)، وعثمان بن سعيد الدّارميّ في الرّد على الجهمية (182)، والبزّار في البحر الزّخار (2681)، وابن أبي عاصم في السنة (428)، والآجريّ في الشريعة (881) كلهم من طرق عن بقيّة، قال: حدّثني بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن عمرو بن الأسود، عن جُنادة بن أبي أميّة، أنّه حدّثهم عن عبادة بن الصّامت، فذكره، واللّفظ لأحمد.
والحديث سبق ذكره في باب ما جاء بأنّ أحدًا لن يرى اللَّه عز وجل حتى يموت.
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে দাজ্জাল সম্পর্কে এত বেশি বলেছি যে, আমি ভয় পাচ্ছি তোমরা না বুঝে ফেলো। নিশ্চয় মাসীহ দাজ্জাল হলো বেঁটে, পা-দুটি বাঁকা (ফাঁক করে হাঁটে), কোঁকড়া চুল বিশিষ্ট এক পুরুষ। সে একচোখা, তার চোখটি সম্পূর্ণরূপে নিশ্চিহ্ন থাকবে—যা উঁচুও হবে না আবার গর্তের মতোও হবে না। যদি তোমাদের নিকট (তার বিষয়টি) অস্পষ্ট লাগে, তবে তোমরা জেনে রাখো যে, তোমাদের প্রতিপালক একচোখা নন। আর তোমরা তোমাদের প্রতিপালককে ততক্ষণ পর্যন্ত দেখতে পাবে না, যতক্ষণ না তোমরা মৃত্যুবরণ করো।"
449 - عن عمّار بن ياسر، وكان من دعاء النبيّ صلى الله عليه وسلم:"وأسألك لذّةَ النّظرِ إلى وجهك".
صحيح: رواه النسائيّ (1305) عن يحيى بن حبيب بن عربي، قال: حدّثنا حمّاد، قال: حدّثنا عطاء بن السّائب، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة في كتاب التوحيد (12) وعنه ابن حبان في صحيحه (1971)، والحاكم (1/ 524)، والدارميّ في الرّد على الجهمية (188) كلهم من طريق حماد بن زيد، بإسناده، مثله، في حديث طويل. انظر: إثبات الوجه.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وهو كما قال فإن عطاء بن السائب ثقة وثقه الأئمة إلا أنه اختلط، ولكن روى حماد بن سلمة
عنه قبل اختلاطه.
ورواه النسائيّ (1306)، وأحمد (4/ 264)، والطبرانيّ في الدّعاء (625) من وجه آخر وفيه شريك وهو ابن عبد اللَّه القاضي سيء الحفظ، ولكن لا بأس به في المتابعات.
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দোয়াসমূহের মধ্যে এই বাক্যটিও ছিল: "আমি তোমার চেহারার (দিদার) প্রতি দৃষ্টিপাতের আনন্দ (লজ্জাতুন নাজর) প্রার্থনা করি।"
450 - عن عبد اللَّه بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يجمع اللَّه الأوّلين والآخرين لميقات يوم معلوم قيامًا أربعين سنة شاخصة أبصارهم إلى السماء ينتظرون فصل القضاء، قال: وينزل اللَّه عز وجل في ظلل من الغمام من العرش إلى الكرسيّ، ثم ينادي منادٍ: أيّها الناس ألم ترضوا من ربّكم الذي خلقكم ورزقكم وأمركم أن تعبدوه ولا تشركوا به شيئًا أن يولي كل ناس منكم ما كانوا يتولون ويعبدون في الدين؟ أليس ذلك عدلا من ربّكم؟ قالوا: بلى. قال: فلينطلق كلُّ قومٍ إلى ما كانوا يعبدون في الدنيا، قال: فينطلقون ويمثل لهم أشياء ما كانوا يعبدون؛ فمنهم من ينطلق إلى الشّمس، ومنهم من ينطلق إلى القمر، وإلى الأوثان من الحجارة، وأشباه ما كانوا يعبدون. قال: ويُمثَّل لمن كان يعبد عيسى شيطان عيسى، ويُمثّل لمن كان يعبد عزيرًا شيطان عزير، ويبقى محمّد صلى الله عليه وسلم وأمّتُه. قال: فيتمثل الرّب عز وجل فيأتيهم فيقول: ما لكم لا تنطلقون كما انطلق الناس؟ قال: فيقولون: إن لنا لإلهًا ما رأيناه بعدُ. فيقول: هل تعرفونه إن رأيتموه؟ فيقولون: إنّ بيننا وبينه علامة إذا رأيناها عرفناها؟ قال: فيقول: ما هي؟ فيقولون: يكشف عن ساقه. قال: فعند ذلك كشف عن ساق، فيخرُّ كلُّ من كان نَظَرَه، ويبقى قوم ظهورهم كصياصي البقر يريدون السُّجود فلا يستطيعون وقد كان يُدعون إلى السجود وهم سالمون، ثم يقول: ارفعوا رؤوسكم فيرفعون رؤوسهم فيعطيهم نورَهم على قدر أعمالهم فمنهم من يعطى نوره مثل الجبل العظيم يسعى بين يديه، ومنهم من يعطى نوره أصغر من ذلك، ومنهم من يعطى نورًا مثل النخلة بيمينه، ومنهم من يعطى نورًا أصغر من ذلك، حتى يكون آخرهم رجلا يعطى نوره على إبهام قدمه يضيء مرة ويطفئ مرة، فإذا أضاء قدّم قدمه فمشى، وإذا طفئ قام. قال: والربُّ عز وجل أمامهم حتى يمر في النار فيبقى أثره كحد السيف دحض مزلّة. قال: ويقول: مُرُّوا، فيمرون على قدر نورهم منهم من يمر كطرف العين، ومنهم من يمر كالبرق، ومنهم من يمر كالسحاب، ومنهم من يمر كانقضاض الكوكب، ومنهم من يمرُّ كالرّيح، ومنهم من يمرُّ كشدّ الفرس، ومنهم من يمرّ كشدّ الرجل، حتى يمر الذي أعطي نوره على إبهام
قدميه يحبو على وجهه ويديه ورجليه تخرّ يد وتعلق يد تخرّ رجل وتعلق رجل ويصيب جوانبه النّار، فلا يزال كذلك حتى يخلص فإذا خلص وقف عليها، ثم قال: الحمد للَّه لقد أعطاني اللَّه ما لم يعط أحدًا أن نجاني منها بعد إذ رأيتها. قال: فينطلق به إلى غدير عند باب الجنة فيغتسل فيعود إليه ريح أهل الجنة وألوانهم فيرى ما في الجنة من خلال الباب، فيقول: ربِّ أدخلني الجنّة. فيقول اللَّه له: أتسأل الجنة وقد نجيتك من النّار؟ فيقول: ربّ اجعل بيني وبينها حجابا. لا أسمع حسيسها. قال: فيدخل الجنة. قال: فيرى أو يرفع له منزلًا أمام ذلك كأنما هو فيه إليه حلم. فيقول: ربّ أعطني ذلك المنزل. فيقول له: فلعلّك إن أعطيتكهـ تسأل غيره؟ فيقول: لا وعزّتِك لا أسألك غيره، وأيُّ منزل يكون أحسن منه؟ فيعطيه فينزله ويرى أمام ذلك منزلًا كأنما هو فيه إليه حلم، قال: رب أعطني ذلك المنزل فيقول اللَّه عز وجل له: فلعلك إن أعطيتكهـ تسأل غيره، فيقول: لا وعزتك لا أسألك غيره، وأي منزل يكون أحسن منه، قال: فيعطى منزله، قال: ويرى أو يرفع له أمام ذلك منزل آخر كأنما هو إليه حلم، فيقول: أعطني ذلك المنزل. فيقول اللَّه جل جلاله: فلعلّك إنْ أعطيُتكَهُ تسأل غيره؟ قال: لا وعزّتِك لا أسألُك غيره وأيُّ منزلٍ يكون أحسن منه. قال: فيُعطاه فينزله، ثم يسكت، فيقول اللَّه عز وجل: ما لك لا تسأل؟ فيقول: ربّ لقد سألتُك حتى استحييتك وأقسمت لك حتى استحييتك. فيقول اللَّه تعالى: ألم ترضَ أن أعطيك مثل الدّنيا منذ خلقتها إلى يوم أفنيتها وعشرة أضعافه؟ فيقول: أتستهزئ بي وأنت ربُّ العِزّة، فيضحك الرّبُّ عز وجل من قوله. -قال: فرأيت عبد اللَّه بن مسعود إذا بلغ هذا المكان من هذا الحديث ضحك. فقال له رجل: يا أبا عبد الرحمن قد سمعتك تحدّث هذا الحديث مرارًا كلما بلغت هذا المكان ضحكتَ؟ - فقال: إنّي سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يحدِّثُ هذا الحديث مرارًا كلّما بلغ هذا المكان من هذا الحديث ضَحِك حتى تبدو أضراسه. قال: فيقول الرّبُّ عز وجل: لا ولكني على ذلك قادر سَلْ، فيقول: ألحقني بالناس، فيقول: إلحق النّاس. قال: فينطلق يرمل في الجنة حتى إذا دنا من النّاس، رفع له قصر من درّة فيخر ساجدًا. فيقال له: ارفع رأسك، مالك؟ فيقول: رأيت ربّي أو تراءى لي ربّي! فيقال له: إنّما هو منزل من منازلك. قال: ثم يلقى رجلًا فيتهيأ للسجود له، فيقال له: مَهْ مالك؟ فيقول رأيت أنك ملَك من الملائكة، فيقول: إنما أنا خازن من
خزّانك، عبد من عبيدك تحت يدي ألف قهرمان على مثل ما أنا عليه. قال: فينطلق أمامه حتى يفتح له القصر قال وهو في درّة مجوفة سقائفها وأبوابها وأغلاقها ومفاتيحها منها تستقبله جوهرة، جوهرة خضراء مبطنة بحمراء، كل جوهرة تفضي إلى جوهرة على غير لون الأخرى، في كلّ جوهرة سرر وأزواج ووصائف أدناهن حوراء عيناء عليها سبعون حلة، يُرى مخُّ ساقها من وراء حللها، كبدها مرآته وكبده مرآتها إذا أعرض عنها إعراضة ازدادتْ في عينه سبعين ضعفًا عمّا كانت قبل ذلك، وإذا أعرضتْ عنه إعراضة ازداد في عينها سبعين ضعفًا عمّا كان قبل ذلك. فيقول لها: واللَّه لقد ازددت في عيني سبعين ضعفًا! وتقول له: وأنت واللَّه لقد ازددت في عيني سبعين ضعفًا! فيقال له: أَشْرِفْ. قال: فيُشْرِفُ، فيقال له: ملكك مسيرة مائة عام ينفذه بصره".
قال: فقال عمر: ألا تسمع ما يحدّثنا ابنُ أمِّ عبد يا كعب عن أدنى أهل الجنة منزلًا، فكيف أعلاهم؟ فقال كعب: يا أمير المؤمنين ما لا عين رأت ولا أذن سمعت إنّ اللَّه عز وجل جعل دارًا فجعل فيها ما شاء من الأزواج والثّمرات والأشربة ثم أطبقها ثم لم يرها أحد من خلقه لا جبريل ولا غيره من الملائكة ثم قرأ كعب: قال: وخلق دون ذلك جنتين وزينهما بما شاء وأراهما من شاء من خلقه. ثم قال: مَنْ كان كتابه في عليين نزل تلك الدّار التي لم يرها أحدٌ، حتّى إنّ الرّجل من أهل عليين ليخرج فيسير في ملكه فما تبقى خيمة من خيم الجنّة إلا دخلها من ضوء وجهه فيستبشرون بريحه فيقولون واها لهذا الريح، هذا رجل من أهل عليين قد خرج يسير في ملكهـ فقال: ويحك يا كعب، إنّ هذه القلوب قد استرسلتْ واقبضها. فقال كعب: والذي نفسي بيده! إنّ لجهنّم يوم القيامة لزفرة ما من ملك مقرب ولا نبي مرسل إلا يخر لركبتيه حتى إنّ إبراهيم خليل اللَّه ليقول: ربّ نفسي نفسي، حتى لو كان لك عمل سبعين نبيًّا إلى عملك لظننتَ أنّك لا تنجو.
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (9/ 416 - 421) من طريقين: عن علي بن عبد العزيز، ثنا أبو غسان، ثنا عبد السلام بن حرب، عن أبي خالد الدّالانيّ، عن المنهال بن عمرو، عن أبي عبيدة، عن مسروق، عن عبد اللَّه بن مسعود.
ح وعن محمد بن النّضر الأزديّ وعبد اللَّه بن أحمد بن حنبل والحضرميّ قالوا: ثنا إسماعيل بن عبيد بن أبي كريمة الحرانيّ، ثنا محمد بن سلمة الحرانيّ، عن أبي عبد الرحيم، عن زيد بن أبي
أنيسة، عن المنهال بن عمرو، عن أبي عبيدة بن عبد اللَّه، عن مسروق بن الأجدع، ثنا عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.
والحديث في كتاب السنة (1203) لعبد اللَّه بن أحمد.
ورواه ابن منده في التوحيد (531) من وجهين آخرين عن إسماعيل بن عبيد بن أبي كريمة، بإسناده، مثله.
قال ابن خزيمة في كتاب التوحيد (468):"عندنا حديث عبد اللَّه بن مسعود بإسنادين متصلين، فروي من طريق أبي غسان وهو مالك بن إسماعيل البصريّ بإسناده مختصرًا.
والإسناد الثاني هو ما رواه عن محمد بن بشار، قال: حدثني يحيى وقرأه عليَّ من كتابي - قال: حدثنا سفيان، حدثنا سلمة -وهو ابن كُهيل- عن أبي الزّعراء، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكر الحديث مختصرًا.
وإلى هذا أشار ابن منده في كتاب التوحيد (3/ 123) وقال:"عن ابن مسعود وفيه:"فتمثّل اللَّه للخلق ثم يأتيهم في صورته" وروى هذا الحرف أبو هريرة وأبو سعيد".
ونقله الذهبيّ في"العلو" (201) مثله ولم يعزه إلى ابن منده.
قلت: وحديث أبي هريرة وأبي سعيد مر قبل هذا في هذا الباب.
وأبو عبد الرّحيم هو خالد بن أبي يزيد بن سماك الأموي مولاهم.
وصحّحه أيضًا الحاكم (4/ 589 - 592) وقال:"رواة هذا الحديث عن آخرهم ثقات غير أنهما لم يخرّجا أبا خالد الدّالانيّ في الصحيحين لما ذكر من انحرافه عن السنة في ذكر الصّحابة. فأمّا الأئمّة المتقدّمون فكلّهم شهدوا لأبي خالد بالصّدق والإتقان، والحديث صحيح ولم يخرجاه، وأبو خالد الدالانيّ ممن يُجمع حديثُه في أئمّة أهل الكوفة".
وتعقّبه الذّهبيُّ بقوله:"ما أنكرَه حديثًا! على جودة إسناده، وأبو خالد شيعيٌّ منحرف".
وأمّا في"العلو" (200) فحسّن إسناده مطلقًا.
قلت: وأبو خالد الدّالانيّ اسمه يزيد بن عبد الرحمن الأسديّ الكوفيّ، قال فيه ابن معين والنسائيّ: ليس به بأس، وقال أبو حاتم: صدوق ثقة، وتكلّم فيه ابن حبان، ولكن شيخه ابن خزيمة أخرج عنه وأقرّ به. ثم هو تُوبع في الإسناد الثاني، إلا أن ما ذكر من السجود لغير اللَّه ففيه نكارة لأن من لم يسجد لغير اللَّه في الدنيا كيف يسجد لغير اللَّه في الآخرة.
আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা প্রথম ও শেষ সকল মানুষকে একটি নির্দিষ্ট দিনের জন্য একত্র করবেন। তারা চল্লিশ বছর ধরে (আদালত প্রতিষ্ঠার অপেক্ষায়) দাঁড়িয়ে থাকবে, তাদের চোখ আকাশের দিকে নিবদ্ধ থাকবে। তারা বিচারের সমাপ্তির অপেক্ষা করতে থাকবে। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আল্লাহ তাআলা মেঘের আড়াল থেকে আরশ থেকে কুরসী পর্যন্ত অবতরণ করবেন। এরপর একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা দেবেন: 'হে মানবজাতি, তোমরা কি তোমাদের রবের উপর সন্তুষ্ট নও—যিনি তোমাদের সৃষ্টি করেছেন, রিযক দিয়েছেন এবং তোমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন তোমরা কেবল তাঁরই ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক না করো—যে তিনি তোমাদের মধ্য থেকে প্রত্যেক দলকে তাদের উপাস্যদের সাথে জুড়ে দেবেন, যাদেরকে তারা (দুনিয়ার) ধর্মে গ্রহণ করত ও ইবাদত করত? এটা কি তোমাদের রবের পক্ষ থেকে ন্যায়বিচার নয়?' তারা বলবে: 'হ্যাঁ, অবশ্যই।' তিনি বলবেন: 'তাহলে প্রত্যেক দল যেন দুনিয়াতে তারা যাদের ইবাদত করত, তাদের দিকে চলে যায়।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন তারা চলে যাবে এবং তাদের সামনে সেসব বস্তুকে উপস্থাপন করা হবে যাদের ইবাদত তারা করত। তাদের কেউ সূর্যের দিকে, কেউ চাঁদের দিকে, কেউ পাথরের প্রতিমা ও অনুরূপ উপাস্যদের দিকে চলে যাবে। বর্ণনাকারী বলেন: যারা ঈসা (আ.)-এর ইবাদত করত, তাদের সামনে ঈসার শয়তানকে (তার রূপে) তুলে ধরা হবে। আর যারা উযাইর (আ.)-এর ইবাদত করত, তাদের সামনে উযাইরের শয়তানকে (তার রূপে) তুলে ধরা হবে। আর শুধু মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর উম্মত অবশিষ্ট থাকবে।
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত রব স্বয়ং (একটি রূপে) তাদের সামনে আত্মপ্রকাশ করে তাদের কাছে আসবেন এবং বলবেন: 'তোমাদের কী হলো যে তোমরা অন্যদের মতো চলে যাচ্ছো না?' তারা বলবে: 'নিশ্চয়ই আমাদের একজন ইলাহ আছেন, যাঁকে আমরা এখনো দেখিনি।' তিনি জিজ্ঞেস করবেন: 'তোমরা তাঁকে দেখলে কি চিনতে পারবে?' তারা বলবে: 'আমাদের ও তাঁর মাঝে একটি নিদর্শন রয়েছে, যা দেখলে আমরা তাঁকে চিনে নিতে পারব।' তিনি জিজ্ঞেস করবেন: 'সেটি কী?' তারা বলবে: 'তিনি তাঁর পায়ের গোছা উন্মোচন করবেন।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি তাঁর গোছা উন্মোচন করবেন। তখন যারা (দুনিয়াতে ইখলাসের সাথে) সিজদা করত, তারা সবাই সিজদায় লুটিয়ে পড়বে। আর কিছু লোক অবশিষ্ট থাকবে, যাদের পিঠ গরুর শিংয়ের মতো শক্ত হয়ে থাকবে (যারা সিজদা করতে চাইলেও) সিজদা করতে পারবে না। অথচ তারা যখন সুস্থ ছিল, তখন তাদেরকে সিজদার জন্য আহ্বান করা হয়েছিল। অতঃপর তিনি বলবেন: 'তোমরা তোমাদের মাথা তোলো।' তখন তারা তাদের মাথা তুলবে। অতঃপর তিনি তাদের আমল অনুযায়ী তাদের নূর প্রদান করবেন। তাদের কারো কারো নূর হবে বিরাট পাহাড়ের মতো, যা তাদের সামনে ছুটবে। আবার কারো কারো নূর হবে এর চেয়ে ছোট। কারো কারো নূর হবে খেজুর গাছের মতো, যা তাদের ডান হাতে থাকবে। আবার কারো কারো নূর এর চেয়েও ছোট হবে। এমনকি তাদের শেষ ব্যক্তিটি এমন হবে যে তার নূরের আলো শুধু তার পায়ের বৃদ্ধাঙ্গুলির উপর থাকবে—যা একবার জ্বলবে এবং একবার নিভে যাবে। যখন তা জ্বলবে, তখন সে এক পা এগিয়ে হেঁটে যাবে। আর যখন তা নিভে যাবে, তখন সে দাঁড়িয়ে পড়বে।
বর্ণনাকারী বলেন: আর মহাপরাক্রমশালী রব তাদের সামনে থাকবেন, যতক্ষণ না তিনি জাহান্নামের উপর দিয়ে পার হন। তাঁর অতিক্রমের ফলে তার উপর তলোয়ারের ধারালো অংশের মতো একটি পিচ্ছিল পথ (পুলসিরাত) অবশিষ্ট থাকবে। তিনি বলবেন: 'তোমরা পার হয়ে যাও।' তখন তারা তাদের নূরের পরিমাণ অনুযায়ী পার হতে থাকবে। তাদের কেউ কেউ চোখের পলকের মতো, কেউ কেউ বিদ্যুতের মতো, কেউ কেউ মেঘের মতো, কেউ কেউ উল্কার পতনের মতো, কেউ কেউ বাতাসের মতো, কেউ কেউ দ্রুতগামী ঘোড়ার বেগে, আর কেউ কেউ দ্রুত চলমান ব্যক্তির বেগে পার হবে। অবশেষে সেই ব্যক্তিটিও পার হবে, যাকে তার পায়ের বৃদ্ধাঙ্গুলির উপর নূর দেওয়া হয়েছিল। সে তার চেহারা, হাত ও পায়ের উপর ভর দিয়ে হামাগুড়ি দিতে থাকবে। তার কখনো একটি হাত বিচ্যুত হবে, আবার কখনো তা লেগে যাবে। একটি পা বিচ্যুত হবে, আবার একটি পা লেগে যাবে। আগুনের শিখা তার পাশে আঘাত করতে থাকবে। সে এভাবেই কষ্ট পেতে থাকবে, যতক্ষণ না সে মুক্তি পায়। যখন সে মুক্তি পাবে, তখন সেখানে দাঁড়িয়ে যাবে এবং বলবে: 'সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, তিনি আমাকে এমন কিছু দান করেছেন যা আর কাউকে দান করেননি। তিনি জাহান্নাম দেখার পর আমাকে তা থেকে মুক্তি দিয়েছেন।'
বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তাকে জান্নাতের দরজার কাছে একটি পুকুরের দিকে নিয়ে যাওয়া হবে, যেখানে সে গোসল করবে। ফলে তার কাছে জান্নাতবাসীদের সুঘ্রাণ ও বর্ণ ফিরে আসবে। সে দরজা দিয়ে জান্নাতের ভেতরের সবকিছু দেখতে পাবে। তখন সে বলবে: 'হে আমার রব, আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করান।' আল্লাহ তাকে বলবেন: 'আমি তোমাকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দিলাম, এরপরও তুমি জান্নাত চাচ্ছো?' সে বলবে: 'হে রব, আমার ও এর (জাহান্নামের) মাঝে একটি পর্দা তৈরি করে দিন, যেন আমি এর কোনো শব্দ শুনতে না পাই।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে জান্নাতে প্রবেশ করবে। বর্ণনাকারী বলেন: অথবা তার সামনে এমন একটি মনযিল তুলে ধরা হবে, যেন তা তার জন্য স্বপ্নস্বরূপ। সে বলবে: 'হে রব, আমাকে ঐ মনযিলটি দিন।' আল্লাহ তাকে বলবেন: 'যদি আমি তোমাকে এটি দিই, তাহলে তুমি হয়তো এর চেয়ে বেশি কিছু চাইবে?' সে বলবে: 'না, আপনার ইজ্জতের কসম, আমি এর চেয়ে বেশি কিছু চাইব না। এর চেয়ে উত্তম আর কী মনযিল হতে পারে?' তখন আল্লাহ তাকে সেটি দেবেন এবং সে তাতে অবস্থান করবে। এরপর সে এর চেয়েও সামনে এমন একটি মনযিল দেখতে পাবে, যা তার কাছে স্বপ্নের মতো মনে হবে। সে বলবে: 'হে রব, আমাকে ঐ মনযিলটি দিন।' তখন আল্লাহ তাআলা তাকে বলবেন: 'যদি আমি তোমাকে এটি দিই, তাহলে তুমি হয়তো এর চেয়ে বেশি কিছু চাইবে?' সে বলবে: 'না, আপনার ইজ্জতের কসম, আমি এর চেয়ে বেশি কিছু চাইব না। এর চেয়ে উত্তম আর কী মনযিল হতে পারে?' বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাকে সেই মনযিল দেওয়া হবে। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর সে এর চেয়েও সামনে আরেকটি মনযিল দেখতে পাবে অথবা তার সামনে তুলে ধরা হবে, যা তার কাছে স্বপ্নের মতো মনে হবে। সে বলবে: 'আমাকে ঐ মনযিলটি দিন।' তখন আল্লাহ জাল্লা জালালুহু তাকে বলবেন: 'যদি আমি তোমাকে এটি দিই, তাহলে তুমি হয়তো এর চেয়ে বেশি কিছু চাইবে?' সে বলবে: 'না, আপনার ইজ্জতের কসম, আমি এর চেয়ে বেশি কিছু চাইব না। এর চেয়ে উত্তম আর কী মনযিল হতে পারে?' বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাকে সেটি দেওয়া হবে এবং সে তাতে বসবাস করবে। এরপর সে নীরব থাকবে। তখন আল্লাহ তাআলা বলবেন: 'তোমার কী হলো যে তুমি আর কিছু চাইছো না?' সে বলবে: 'হে রব, আমি আপনার কাছে চাইতে চাইতে এবং কসম করতে করতে লজ্জিত হয়ে গেছি।' তখন আল্লাহ তাআলা বলবেন: 'তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে আমি তোমাকে পৃথিবী সৃষ্টির দিন থেকে তা ধ্বংস হওয়ার দিন পর্যন্ত যা ছিল, তার সমপরিমাণ এবং তার দশ গুণ বেশি দান করব?' তখন সে বলবে: 'আপনি কি আমার সাথে ঠাট্টা করছেন? অথচ আপনি পরাক্রমশালী রব।' তখন তার কথায় মহাপরাক্রমশালী রব হেসে দেবেন।
বর্ণনাকারী বলেন: আমি দেখেছি, আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন এই হাদীসের এই স্থানে পৌঁছতেন, তখন হাসতেন। এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল: 'হে আবূ আবদুর রহমান! আমি আপনাকে বহুবার এই হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি। যখনই আপনি এই স্থানে পৌঁছান, তখনই হাসেন কেন?' তিনি বললেন: 'আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বহুবার এই হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি, আর তিনি যখনই এই স্থানে পৌঁছাতেন, তখনই এমনভাবে হাসতেন যে তাঁর দাঁতের মাড়ি পর্যন্ত দেখা যেত।' তখন মহাপরাক্রমশালী রব বলবেন: 'না (আমি ঠাট্টা করছি না), বরং আমি এর উপর ক্ষমতাবান। চাও।' সে বলবে: 'আমাকে মানুষের সাথে (জান্নাতে) মিলিত করে দিন।' তিনি বলবেন: 'মানুষের সাথে মিলিত হও।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে দৌড়ে জান্নাতে প্রবেশ করবে। যখন সে মানুষের কাছাকাছি পৌঁছবে, তখন মুক্তার তৈরি একটি প্রাসাদ তার সামনে তুলে ধরা হবে। তখন সে সিজদায় লুটিয়ে পড়বে। তাকে বলা হবে: 'মাথা তোলো, তোমার কী হয়েছে?' সে বলবে: 'আমি আমার রবকে দেখেছি, বা আমার রবের দর্শন পেয়েছি।' তাকে বলা হবে: 'এটি তো তোমারই মনযিলসমূহের একটি।' বর্ণনাকারী বলেন: এরপর সে একজন ব্যক্তির সাথে দেখা করবে এবং তাকে সিজদা করার প্রস্তুতি নেবে। তাকে বলা হবে: 'থামো, তোমার কী হয়েছে?' সে বলবে: 'আমি ভেবেছিলাম যে আপনি ফেরেশতাদের মধ্যে থেকে একজন।' সে (লোকটি) বলবে: 'আমি তো আপনারই কোষাগার রক্ষকদের একজন, আপনারই দাসদের একজন। আমার অধীনে এমন এক হাজার তত্ত্বাবধায়ক (কাহরামান) রয়েছে, যারা আমার মতোই।' বর্ণনাকারী বলেন: এরপর সে (তত্ত্বাবধায়ক) তার সামনে যাবে, যতক্ষণ না তার জন্য প্রাসাদটি খুলে দেওয়া হয়। বর্ণনাকারী বলেন: সেটি হবে ভেতরে ফাঁপা একটি মুক্তার তৈরি প্রাসাদ, যার ছাদ, দরজা, তালা এবং চাবি সবই ওই মুক্তার তৈরি। একটি রত্ন তাকে অভ্যর্থনা জানাবে—একটি সবুজ রত্ন, যার ভেতরের অংশ লাল। প্রতিটি রত্ন অন্য রত্নের দিকে নিয়ে যাবে, যার রং ভিন্ন হবে। প্রতিটি রত্নের ভেতরে থাকবে পালঙ্ক, স্ত্রীগণ (স্ত্রী ও সঙ্গিনীরা) এবং সেবাদাসীগণ। তাদের মধ্যে সর্বনিম্ন স্তরের নারী হবে ডাগর চোখবিশিষ্ট হুর, যার গায়ে সত্তরটি পোশাক থাকবে, আর সেই পোশাকের ভেতর দিয়ে তার পায়ের গোছার মগজ দেখা যাবে। তার কলিজা হবে তার (স্বামীর) জন্য আয়না, আর তার (স্বামীর) কলিজা হবে তার জন্য আয়না। যদি সে তার থেকে একবার মুখ ফিরিয়ে নেয়, তবে তার চোখে সে আগের চেয়ে সত্তর গুণ বেশি সুন্দর হয়ে উঠবে। আর যদি সে (স্ত্রী) তার থেকে একবার মুখ ফিরিয়ে নেয়, তবে তার চোখে সে (স্বামী) আগের চেয়ে সত্তর গুণ বেশি সুন্দর হয়ে উঠবে। তখন সে (স্বামী) তাকে বলবে: 'আল্লাহর কসম, আমার চোখে তুমি সত্তর গুণ বেড়ে গেছ!' আর সে (স্ত্রী) তাকে বলবে: 'আল্লাহর কসম, আমার চোখে আপনি সত্তর গুণ বেড়ে গেছেন!' তাকে বলা হবে: 'উপরে আরোহণ করো।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে আরোহণ করবে। তাকে বলা হবে: 'তোমার রাজত্ব হলো একশত বছরের পথ, যা তার দৃষ্টির সীমা পর্যন্ত বিস্তৃত।'
বর্ণনাকারী বলেন: তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'হে কা'ব! ইবনু উম্মি আবদ (আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ) জান্নাতবাসীদের মধ্যে সর্বনিম্ন মর্যাদার ব্যক্তির মনযিল সম্পর্কে যা বর্ণনা করছেন, তা কি তুমি শুনছো না? তাহলে তাদের সর্বোচ্চ মর্যাদার মনযিল কেমন হবে?' কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'হে আমীরুল মুমিনীন! যা কোনো চোখ দেখেনি এবং কোনো কান শোনেনি। নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা একটি ঘর বানিয়েছেন এবং তাতে যা চেয়েছেন, স্ত্রী, ফলমূল ও পানীয় রেখেছেন। এরপর তিনি তা ঢেকে দিয়েছেন এবং তাঁর সৃষ্টির কেউ তা দেখেনি—না জিবরীল, না অন্য কোনো ফেরেশতা। অতঃপর কা'ব এই আয়াত পড়লেন: 'এবং এর নিচে তিনি আরও দুটি জান্নাত সৃষ্টি করেছেন এবং সেগুলোকে যা চেয়েছেন, তা দ্বারা সুসজ্জিত করেছেন এবং তাঁর সৃষ্টির যাকে চেয়েছেন তাকে তা দেখিয়েছেন।' এরপর তিনি বললেন: যার আমলনামা ইল্লিয়্যীনে থাকবে, সে এমন ঘরে অবতরণ করবে যা কেউ দেখেনি। এমনকি ইল্লিয়্যীনবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক যখন বের হয়ে তার রাজত্বে বিচরণ করবে, তখন জান্নাতের এমন কোনো তাঁবু অবশিষ্ট থাকবে না, যেখানে তার চেহারার আলো প্রবেশ করবে না। তখন তারা তার সুঘ্রাণ পেয়ে আনন্দিত হবে এবং বলবে: 'বাহ! কী চমৎকার সুঘ্রাণ! ইল্লিয়্যীনবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক তার রাজত্বে পরিভ্রমণ করতে বেরিয়েছে।' উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'আফসোস তোমার জন্য, হে কা'ব! এসব শুনে হৃদয় অনেক বেশি আশান্বিত হয়ে যাচ্ছে, এবার ক্ষান্ত হও।' কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! কিয়ামতের দিন জাহান্নামের এমন একটি গর্জন হবে যে, কোনো নৈকট্যপ্রাপ্ত ফেরেশতা বা প্রেরিত নবীও থাকবে না, যে নিজ হাঁটু গেড়ে বসে না পড়বে। এমনকি আল্লাহর খলীল ইবরাহীম (আ.)ও বলবেন: 'হে রব, শুধু আমাকে বাঁচাও, আমাকে বাঁচাও।' এমনকি যদি তোমার আমলনামায় সত্তরজন নবীর আমলও যোগ করা হয়, তবুও তুমি মনে করবে যে তুমি হয়তো মুক্তি পাচ্ছ না।
451 - عن أبي رَزين، قال: قلت: يا رسول اللَّه، أنرى اللَّه يوم القيامة؟ وما آيةُ ذلك في خلقه؟ قال:"يا أبا رزين، أليس كلّهم يرى القمر مُخْليًا به؟" قال: قلت: بلى. قال:"فاللَّه أعظم وذلك آية في خلقه".
حسن: رواه أبو داود (4731) من طريق شعبة، وابن ماجه (180) من طريق حمّاد بن سلمة - كلاهما عن يعلى بن عطاء، عن وكيع بن حُدُس، عن عمّه أبي رزين، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة في كتاب التوحيد (359، 360)، فرواه من طريقين، وابن حبان في صحيحه (6141)، والحاكم (4/ 560)، وأحمد (16186) كلهم من طريق حماد بن سلمة وحده، بإسناده مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد". وأقرّه الذّهبيُّ وقال:"رواه شعبة عن يعلى، واسم أبي رزين لقيط بن عامر". إلّا أنّ ابن حبان زاد في الحديث السؤالَ الثاني وهو قول أبي رزين: قال: قلت: يا رسول اللَّه، أين كان ربُّنا قبل أن يخلق السموات والأرض؟ قال:"في عماء، ما فوقه هواء، وما تحته هواء".
وهذا الجزء الثاني رواه الترمذيّ (3109) من طريق حمّاد بن سلمة، بإسناده وزاد في آخره:"وخلق عرشه على الماء". وقال:"هذا حديث حسن".
قلت: وهو كما قال، فإن إسناده حسن من أجل وكيع بن حُدس -بالحاء- كما قال حماد بن سلمة، عن يعلى بن عطاء. وقال شعبة وأبو عوانة وهُشيم: وكيع بن عُدس -بالعين- ورجّح الإمام أحمد بأن الصّواب هو حُدس -بالحاء- نقله عنه ولده عبد اللَّه في مسند أبيه (16189).
ثم هو"مجهول الحال" كما قال ابن القطّان. وقال الذهبيّ:"لا يُعرف" لأنه لم يرو عنه غير يعلى بن عطاء.
ولكنه ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 496) ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي حيث يتابع، وقد توبع في الجملة في حديث طويل ولكن فيه رجال لا يعرفون.
وأنقل هنا هذا الحديث الطّويل، ثم أذكره مفرقًا في أماكنه حسب الموضوع، ولا أذكره كاملًا في مكان آخر.
عن عاصم بن لقيط: أنّ لقيط بن عامر خرج وافدًا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعه صاحب له يقال له: نهيك بن عاصم بن مالك بن المنتفق. قال لقيط: فخرجت أنا وصاحبي حتى قدمنا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لانسلاخ رجب، فأتينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فوافيناه حين انصرف من صلاة الغداة، فقام في النّاس خطيبًا فقال:"أيها الناس ألا إنّي قد خبّأت لكم صوتي منذ أربعة أيام، ألا لأسمعنكم، ألا فهل من امرئ بعثه قومُه؟". فقالوا: اعْلَم لنا ما يقولُ رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم."ألا ثمّ لعلّه أن يُلهيه حديثُ نفسه، أو حديثُ صاحبه، أو يلهيه الضلال، ألا إني مسؤولٌ، هل بلّغتُ؟ ألا اسمعوا تعيشوا، ألا اجلسوا، ألا اجلسوا". قال: فجلس الناسُ، وقمتُ أنا وصاحبي حتى إذا فرغ لنا فؤاده وبصره، قلت: يا رسول اللَّه ما عندك من علم الغيب؟ فضحك لعمرُ اللَّه، وهز رأسه، وعلم أني أبتغي لسَقَطِه، فقال:"ضنَّ ربُّك عز وجل بمفاتيح خمس من الغيب لا يعلمها إلا اللَّه" وأشار بيده -فقلت: وما هي؟
قال:"علم المنية، قد علم مني منيةُ أحدكم ولا تعلمونه، وعلم المني حين يكون في الرحم قد علمه ولا تعلمونه، وعلم ما في غد قد علم ما أنت طاعم غدا ولا تعلمه، وعلم يوم الغيث يشرف عليكم أَزِلين أَزلين مشفقين، فيظلُ يضحك، قد علم أن غِيَرَكم إلى قُرْبٍ". قال لقيط: قلتُ: لن نَعْدَمَ من ربٍّ يضحك خيرًا،"وعلم يوم السّاعة". قلت: يا رسول اللَّه! علّمنا مما تُعلِّم الناس وما تعلم، فإنا من قبيل لا يصدّق تصديقنا أحد، من مَذْحِج التي تربأُ علينا، وخثعم التي توالينا، وعشيرتنا التي نحن منها. قال:"تلبثون ما لبثْتُم، ثم يُتوفّى نبيُّكم، ثم تلبثون ما لبثتم، ثم تبعثُ الصّائحةُ، فلَعَمْرُ إلهك ما تدعُ على ظهرها من شيء إلّا مات، والملائكة الذين مع ربّك عز وجل، فأصبح ربُّك يطوف في الأرض، وخَلَتْ عليه البلاد، فأرسل ربُّك عز وجل السّماء تهضِب من عند العرش، فَلَعَمْرُ إلهك ما تدع على ظهرها من مصرع قتيل، ولا مدفن ميت إلا شقّتِ القبرَ عنه حتى تجعله من عند رأسه، فيستوي جالسًا، فيقولُ ربُّك: مَهْيَمْ، لما كان فيه، يقول: يا ربّ، أمس، اليوم، ولعهده بالحياة يحسبه حديثًا بأهله". فقلت: يا رسول اللَّه! فكيف يجمعنا بعد ما تمزُقُنا الرّياح والبِلى والسِّباع؟ قال:"أنبئك بمثل ذلك في آلاء اللَّه: الأرضُ أشرفتَ عليها وهي مدرة بالية. فقلتَ: لا تحيا أبدًا. ثم أرسل اللَّهُ عليها السماء فلم تلبث عليك إلا أيامًا حتى أشرفتَ عليها وهي شَرَبةٌ واحدةٌ، ولَعَمْرُ إلهك لهو أقدرُ على أن يجمعكم من الماء على أن يجمع نبات الأرض، فتخرجون من الأصواء، ومن مصارعكم، فتنظرون إليه وينظر إليكم". قال: قلت: يا رسول اللَّه، وكيف ونحن ملء الأرض وهو شخص واحد ننظر إليه وينظر إلينا؟ قال:"أنبئك بمثل ذلك في آلاء اللَّه عز وجل: الشّمس والقمر آية منه صغيرة ترونهما ويريانكم ساعة واحدة ولا تضارّون في رؤيتهما، ولعمر إلهك لهو أقدر على أن يراكم وترونه من أن ترونهما ويريانكم لا تضارون في رؤيتهما". قلت: يا رسول اللَّه، فما يفعل بنا ربُّنا عز وجل إذا لقيناه؟ قال:"تعرضون عليه باديةً له صفحاتُكم، لا يخفى عليه منكم خافيةٌ، فيأخذُ ربُّك عز وجل بيده غَرْفَة من الماء، فينضحُ قَبِيْلَكُم بها، فَلَعَمْرُ إلهك ما تُخْطِئُ وجَه أحدكم منها قطرةٌ، فأما المسلم فتدع وجهه مثل الرّيطة البيضاء، وأما الكافر فتخطمه مثل الحميم الأسود، ألا ثم ينصرف نبيُّكم صلى الله عليه وسلم، ويفترق على أثره الصّالحون، فيسْلُكون جِسْرًا من النار، فيطأ أحدكم الجمر يقول: حَسَّ! يقول ربُّك عز وجل: أوانه، ألا فتطلعون على حوض الرسول على أظمأ -واللَّه- ناهلةٍ قطّ ما رأيتها، فلعمرُ إلهك ما يبسط واحد منكم يده إلا وقع عليها قَدَحٌ يطهره من الطَّوْف والبول والأذى، وتُحْبَسُ الشّمسُ والقمرُ، ولا ترون منهما واحدًا". قال: قلت: يا رسول اللَّه فبمَ نبصر؟ قال:"بمثل بصرك ساعتك هذه، وذلك قبل طلوع الشمس في يوم أشرقت الأرض واجهت به الجبال". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فبمَ نجزى من سيئاتنا وحسناتنا؟ قال:"الحسنة بعشرة أمثالها، والسيئة بمثلها إلا أن يعفُوَ". قال: قلت: يا رسول اللَّه، أما الجنة أما النار؟ قال:"لَعَمْرُ إلهك إنّ للنار لسبعةَ أبواب ما منهن بابان إلّا يسير الرّاكب بينهما سبعين عامًا، وإنّ للجنّة لثمانيةَ أبواب ما منهن بابان إلّا يسير الرّاكب بينهما سبعين
عامًا". قلت: يا رسول اللَّه، فعلامَ نطلع من الجنة؟ قال:"على أنهار من عسل مصفى، وأنهار من كأس ما بها من صُداع ولا ندامة، وأنهار من لبن لم يتغير طعمُه، وماء غير آسن، وبفاكهة، لعَمْرُ إلهك ما تعلمون، وخير من مثله معه، وأزواج مطهّرة". قلت: يا رسول اللَّه أو لنا فيها أزواج أو منهن مصلحات؟ قال:"الصالحات للصّالحين تلذُّونَهُنّ مثل لذّاتكم في الدّنيا، ويلذذن بكم غير أن لا توالد". قال لقيط: فقلت: أقصى ما نحن بالغون ومنتهون إليه؟ فلم يجبه النبيُّ صلى الله عليه وسلم. قلت: يا رسول اللَّه، على ما أبايعك؟ قال: فبسط النبي صلى الله عليه وسلم يده وقال:"على إقام الصّلاة وإيتاء الزكاة، وزيال المشرك، وأن لا تشرك باللَّه إلهًا غيره". قلت: وإن لنا ما بين المشرق والمغرب؟ فقبض النّبي صلى الله عليه وسلم يده، وظنّ أني مشترط شيئا لا يُعطينيه. قال: قلت: نحلُّ منها حيث شئنا، ولا يجني امرؤ إلا على نفسه، فبسط يده، وقال:"لك ذلك تَحُلُّ حيث شئتَ، ولا يجني عليك إلا نفسُك". قال: فانصرفنا عنه، ثم قال:"إنّ هذَيْن لَعَمْرُ إلهك من أتقى الناس في الأولى والآخرة". فقال له كعب بن الخدارية؛ أحدُ بني بكر بن كلاب: مَنْ هم يا رسول اللَّه؟ قال:"بنو المنتفق أهل ذلك". قال: فانصرفنا وأقبلتُ عليه، فقلت: يا رسول اللَّه، هل لأحد ممن مضى من خير في جاهليتهم؟ قال: قال رجل من عُرْضِ قريش: واللَّه إنّ أباك المنتفق لفي النّار. قال: فلكأنّه وقع حر بين جلدي ووجهي ولحمي مما قال لأبي على رؤوس النّاس، فهممت أن أقول: وأبوك يا رسول اللَّه؟ ثم إذا الأخرى أجمل، فقلتُ: يا رسول اللَّه، وأهلك؟ قال:"وأهلي لَعَمْرُ اللَّه ما أتيتَ عليه من قبر عامريّ، أو قرشيّ من مشرك قُلْ: أرسلني إليك محمّدٌ، فأبشرُكَ بما يسوؤك، تُجَرُّ على وجهك وبطنك في النّار". قال: قلت: يا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ما فعل بهم ذلك وقد كانوا على عمل لا يحسنون إلّا إيّاه، وكانوا يحسبون أنهم مصلحون؟ قال صلى الله عليه وسلم:"ذلك لأن اللَّه عز وجل بعث في آخر كلِّ سَبْع أُمم -يعني- نبيًّا، فمن عصى نبيَّه كان من الضّالين، ومن أطاع نبيَّه كان من المهتدين".
أخرجه عبد اللَّه بن أحمد في مسند أبيه (16206)، وفي كتابه"السنة" (1120) قال:"كتب إليَّ إبراهيم بن حمزة الزبيريّ: كتبتُ إليك بهذا الحديث، وقد عرفته وسمعته على ما كتبت به إليك، فحدِّث بذلك عني، حدّثني عبد الرحمن بن المغيرة الحزاميّ، حدثني عبد الرحمن بن عياش السمعيّ الأنصاريّ القبائيّ -من بني عمرو بن عوف- عن دُلهم بن الأسود بن عبد اللَّه بن حاجب بن عامر ابن المنتفق العقيليّ، عن أبيه، عن عمّه لقيط بن عامر. قال دُلْهم: وحدثنيه ابن أبي الأسود، عن عاصم بن لقيط، أنّ لقيطًا خرج وافدًا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعه صاحب له يقال له: نُهيل بن عاصم ابن مالك بن المنتفق. قال لقيط: فخرجتُ وصاحبي حتى قدمنا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم المدينة انسلاخ رجب، فأتينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حين انصرف من صلاة الغداة، فقام في الناس خطيبًا، فقال (فذكر الحديث).
ولقيط هو أبو رزين العقيليّ.
ورواه الطبراني في الكبير (19/ 211)، وصحّحه ابن خزيمة في التوحيد (382)، والحاكم (4/
560) كلهم من طريق عبد الرحمن بن المغيرة، بإسناده، مع أغلاط وقعتْ في المستدرك في قلب الأسانيد.
قال الحاكم:"هذا حديث جامع في الباب، صحيح الإسناد كلّهم مدنيّون".
وتعقبّه الذهبي فقال:"يعقوب بن محمد بن عيسى الزهريّ ضعيف".
وهو الرّاوي عن عبد الرحمن بن المغيرة، وقد توبع كما في رواية عبد اللَّه بن أحمد، وابن أبي عاصم في"السّنة" (524، 636) إلّا أنّ فيه:"عن دلهم بن الأسود، عن جدّه". بدل"عن أبيه".
وذكره الهيثميّ في"المجمع" (10/ 340) وقال:"رواه عبد اللَّه، والطبراني بنحوه، وأحد طريقي عبد اللَّه إسنادها متصل، ورجالها ثقات".
وهو يقصد بقوله:"ثقات" توثق ابن حبان، وإلّا فعبد الرحمن بن عياش وشيخه دُلهم، وأبوه أسود لا يعرفون إلّا بهذا الإسناد.
وقال الذّهبيّ:"دلهم بن الأسود، وجدّه عبد اللَّه بن حاجب لا يُعرفان".
وعبد الرحمن بن عايش ذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول". أي إذا توبع وإلّا فليّن الحديث.
وقد توبع على قوله:"لن نعدم من رب يضحك خيرًا يا رسول اللَّه"، كما سبق في باب الضّحك.
وأمّا الحافظ ابن القيم فقوّى هذا الحديث قائلًا في"زاد المعاد" (3/ 677):"هذا حديث كبير جليل، تنادي جلالتُه وفخامتُه وعظمتُه على أنّه قد خرج من مشكاة النّبوة، لا يُعرف إلّا من حديث عبد الرحمن بن المغيرة بن عبد الرحمن المدنيّ، رواه عنه إبراهيم بن حمزة الزبيريّ وهما من كبار علماء المدينة، ثقتان محتجّ بهما في الصحيح، احتجّ بهما إمام أهل الحديث محمد بن إسماعيل البخاريّ، ورواه أئمة السنة في كتبهم، وتلقوه بالقبول، وقابلوه بالتّسليم والانقياد، ولم يطعن منهم فيه ولا في أحد من رواته".
فذكر من أخرجه منهم عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، وابن أبي عاصم في السنة (459، 460)، وأبو أحمد العسال في"المعرفة" والطبراني -كما مضى-، وأبو الشيخ في"السنة"، وابن منده، وأبو نعيم الأصبهانيّ. وقال:"جماعة من الحفّاظ سواهم يطول ذكرهم. . . إلخ". واللَّه أعلم.
وقوله:"تهضِبُ" أي تُمطر، والأصواء: القبور. والشَّرَبة -بفتح الرّاء-: الحوض الذي يجتمع فيه الماء، وبالسّكون والياء: الحنظلة، يريد أنّ الماء قد كثر، فمن حيث شئت تشرب. وعلى رواية السكون والياء: يكون قد شبّه الأرض بخُضرتها بالنّبات بخضرة الحنظلة واستوائها.
وقوله:"حس": كلمة يقولها الإنسان إذا أصابه غفلةً ما يحرقه أو يؤلمه. قال الأصمعيّ: وهي مثل أوه.
وقوله: يقول ربُّك عز وجل:"أو أنه". قال ابن قتية: فيه قولان: أحدهما: أن يكون"أنه"
بمعنى"نعم".
والآخر: أن يكون الخبر محذوفًا كأنه قال: أنتم كذلك، أو أنّه على ما يقول.
وفي الحديث: لا"يُصَلِّ أحدُكم، وهو يدافع الطَّوْف والبَوْل".
والطّوف: الغائط. والجسر: الصّراط.
وقوله:"فيقول ربُّك. مَهيم". أي: ما شأنُك وما أمرُك، وفيم كنتَ.
وقوله:"يشرف عليكم أَزْلين": الأزْل -بسكون الزّايْ- الشّدة، والأَزِل على وزن كَتِف: هو الذي قد أصابه الأزل، واشتد به حتى كاد يقنط.
وقوله:"فيظلّ يضحك" هو من صفات أفعاله سبحانه وتعالى التي لا يشبهه فيها شيءٌ من مخلوقاته، كصفات ذاته، وقد وردت هذه الصّفة في أحاديث كثيرة لا سبيل إلى ردّها، كما لا سبيل إلى تشبيهها وتحريفها، وكذلك"فأصبح ربُّك يطوف في الأرض"، هو من صفات فعله، كقوله: {وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ} [سورة الفجر: 22]. {هَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا أَنْ تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ رَبُّكَ} [سورة الأنعام: 158]، و"ينزلُ ربُّنا كلَّ ليلةٍ إلى السّماء الدُّنيا"، و"يدنُو عشيّة عرفة، فيباهي بأهلِ الموقف الملائكة". والكلام في الجميع صراط واحد مستقيم، إثبات بلا تمثيل، وتنزيه بلا تحريف وتعطيل".
وقوله:"والملائكة الذين عند ربّك": لا أعلم موت الملائكة جاء في حديث صريح إلّا هذا، وحديث إسماعيل بن رافع الطّويل، وهو حديث الصُّور، وقد يستدل عليه بقوله تعالى {وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ} [سورة الزمر: 68]". انتهى بما في الزاد.
وفي الباب ما رُوي عن ابن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ أدنى أهل الجنّة منزلة لمن ينظر إلى جنانه وأزواجه ونعيمه وخدمه وسروره مسيرة ألف سنة، وأكرمهم على اللَّه من ينظر إلى وجهه غدوة وعشيّة". ثم قرأ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: {وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَاضِرَةٌ (22) إِلَى رَبِّهَا نَاظِرَةٌ} [سورة القيامة: 22 - 23]".
رواه الترمذيّ (2553)، وأحمد (2/ 13)، وابن منده في الرّد على الجهميّة (91)، وصحّحه الحاكم (2/ 509 - 510) كلهم من طريق ثوير بن أبي فاختة، عن ابن عمر، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث مفسر في الرد على المبتدعة، وثوير بن أبي فاختة وإن لم يخرجاه، فلم يُنقم عليه غير التشيّع".
وتعقبه الذهبي فقال:"بل هو واهي الحديث". وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (10/ 401) فقال:"وفي أسانيدهم ثوير بن أبي فاختة، وهو مجمع على ضعفه".
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن أبي موسى الأشعريّ قال: قال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يجمعُ اللَّه عز وجل الأمم في صعيد واحد يوم القيامة، فإذا بدا للَّه عز وجل أن يصْدع بين خلقه، مُثِّل لكلِّ قوم ما كانوا يعبدون، فيتبعونهم حتى يُقَحِّمونهم النّار، ثم يأتينا ربُّنا عز وجل ونحن على مكان رفيع، فيقول: من أنتم؟ فنقول: نحن المسلمون. فيقول: ما تنتظرون؟ فيقولون: ننتظر ربَّنا عز وجل".
قال:"فيقول: وهل تعرفونه إذا رأيتموه؟ فيقولون: نعم. فيقول: كيف تعرفونه ولم تروه؟ فيقولون: نعم، إنّه لا عِدْل له. فيتجلّى لنا ضاحكًا يقول: أبشروا أيّها المسلمون، فإنّه ليس منكم أحدٌ إلّا جعلتُ مكانه في النار يهوديًّا أو نصرانيًّا".
رواه الإمام أحمد (19654)، والآجريّ في الشريعة (607)، وابن خزيمة (464)، والدارميّ في الرّد على الجهمية (180) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن عُمارة، عن أبي بردة، عن أبي موسى الأشعريّ، فذكر مثله، واللّفظ لأحمد.
وفي لفظ عند الدّارميّ ونحوه عند الآجريّ عن عمارة القرشيّ أنه كان عند عمر بن عبد العزيز، فأتاه أبو بردة بن أبي موسى الأشعريّ، فقضى له حوائجه، فلما خرج رجع. فقال عمر: أذكر الشيخ؟ فقال له عمر: ما ردّك؟ ألم تقضِ حوائجك؟ قال: بلى، ولكن ذكرتُ حديثًا حدثناه أبو موسى الأشعريّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال (فذكر الحديث).
وفيه علّتان:
الأولى: علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف عند جماهير أهل العلم.
والثانية: شيخه عمارة وهو القرشيّ، نقل الذهبي عن الأزديّ أنه قال:"ضعيف جدًّا. روى عنه علي بن زيد بن جدعان وحده"، وأورد جزءًا من الحديث المذكور. الميزان (3/ 178).
ولكن لبعض فقراته شواهد صحيحة، مثل قوله:"أبشروا أيّها المسلمون، فإنّه ليس منكم أحدٌ إلّا جعلتُ مكانه في النار يهوديًّا أو نصرانيًّا".
رواه مسلم في التوبة (2767) من وجه آخر عن عون وسعيد بن أبي بردة، حدّثاه أنّهما شهدا أبا بردة يُحدّث عمر بن عبد العزيز، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يموت رجل مسلم ولا أدخل اللَّه مكانه النار يهوديًّا أو نصرانيًّا". قال: فاستحلفه عمر بن عبد العزيز باللَّه الذي لا إله إلا هو ثلاث مرات، أن أباه حدّثه عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: فحلف له، قال: فلم يحدّثني سعيد أنه استحلفه ولم ينكر على عون قوله.
قال ابن خزيمة رحمه اللَّه تعالى:"إنّ اللَّه عز وجل إنّما تراءى لهذه الأمة برّها وفاجرها ومنافقها بعد ما تساقط أولئك في النار، فاللَّه تعالى كان محتجبًا عن جميعهم لم يره منهم أحد، كما قال تعالى {كَلَّا بَلْ رَانَ عَلَى قُلُوبِهِمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (14) كَلَّا إِنَّهُمْ عَنْ رَبِّهِمْ يَوْمَئِذٍ لَمَحْجُوبُونَ (15) ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُو الْجَحِيمِ (16) ثُمَّ يُقَالُ هَذَا الَّذِي كُنْتُمْ بِهِ تُكَذِّبُونَ} [سورة المطففين: 14 - 17]، فأعلمنا عز وجل أن مَنْ حُجب عنه يومئذ هم المكذِّبون بذلك في الدنيا، ألا تسمع قوله تعالى: {هَذَا الَّذِي كُنْتُمْ بِهِ تُكَذِّبُونَ}. وأمّا المنافقون، فإنّما كانوا يكذّبون بذلك بقلوبهم، ويقرّون به بألسنتهم رياءٌ وسُمعةٌ، فقد تراءى لهم رؤية امتحان واختبار، وليكون حجبه إياهم بعد ذلك عن رؤيته حسرة عليهم وندامة، إذ لم يصدّقوا به بقلوبهم وضمائرهم، ويوعده ووعيده، وما أمر به ونهى عنه، وبيوم الحسرة والنّدامة".
আবূ রাযীন (লাকীত ইবনু আমির) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিয়ামতের দিন কি আমরা আল্লাহ তাআলাকে দেখতে পাবো? এবং তাঁর সৃষ্টির মধ্যে এর নিদর্শন কী? তিনি বললেন: "হে আবূ রাযীন! তোমরা কি সবাই চাঁদকে একান্তে স্পষ্ট দেখতে পাও না?" তিনি (আবূ রাযীন) বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই। তিনি বললেন: "তবে আল্লাহ তার চেয়েও মহান, আর এটাই তাঁর সৃষ্টির মধ্যে এর নিদর্শন।"
আসিম ইবনু লাকীত থেকে বর্ণিত, লাকীত ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রতিনিধি দলের সদস্য হিসেবে বের হলেন। তাঁর সাথে নাহীক ইবনু আসিম ইবনু মালিক ইবনুল মুনতাফিক নামক তাঁর এক সঙ্গী ছিলেন। লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি এবং আমার সঙ্গী রজব মাসের শেষে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছার উদ্দেশ্যে বের হলাম। আমরা তাঁর কাছে পৌঁছলাম যখন তিনি ফজরের সালাত থেকে ফিরে এসে লোকদের মাঝে দাঁড়িয়ে ভাষণ দিচ্ছিলেন। তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি চার দিন ধরে তোমাদের কাছে আমার কথা গোপন রেখেছিলাম। সাবধান! আমি অবশ্যই তোমাদেরকে তা শোনাবো। সাবধান! তোমাদের মধ্যে এমন কেউ কি আছে, যাকে তার কওম পাঠিয়ে দিয়েছে?" (তারা বলবে, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা জানতে এসেছি)। "সাবধান! হয়তো সে আত্ম-কথার কারণে, বা তার সঙ্গীর কথার কারণে, কিংবা পথভ্রষ্টতার কারণে অমনোযোগী হতে পারে। সাবধান! আমি জিজ্ঞাসিত হবো, আমি কি পৌঁছে দিয়েছি? সাবধান! তোমরা শোনো, তোমরা বেঁচে থাকবে। সাবধান! তোমরা বসো। সাবধান! তোমরা বসো।"
লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন লোকেরা বসে গেল এবং আমি ও আমার সঙ্গী দাঁড়িয়ে রইলাম। যখন তিনি মন ও চোখ দিয়ে আমাদের দিকে মনোনিবেশ করলেন, তখন আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার কাছে গায়বের কী জ্ঞান আছে? আল্লাহর কসম! তিনি হাসলেন এবং মাথা নাড়লেন, আর বুঝলেন যে আমি গায়বের বিষয়ে প্রশ্ন করছি। তিনি বললেন: "তোমার প্রতিপালক মহান আল্লাহ গায়বের পাঁচটি চাবি গোপন রেখেছেন, যা একমাত্র আল্লাহ ছাড়া আর কেউ জানে না।" তিনি তাঁর হাত দিয়ে ইশারা করলেন। আমি বললাম: সেগুলো কী কী?
তিনি বললেন: "মৃত্যুর জ্ঞান। তোমাদের কারো মৃত্যু কখন হবে, তা তিনি জানেন কিন্তু তোমরা জানো না। জরায়ুতে যখন বীর্য হয়, তার জ্ঞান। তিনি তা জানেন, কিন্তু তোমরা জানো না। আগামীকালের জ্ঞান। আগামী কাল তুমি কী খাবে, তা তিনি জানেন কিন্তু তোমরা জানো না। বৃষ্টিপাতের দিনের জ্ঞান। তিনি তোমাদের প্রতি দৃষ্টি দেন যখন তোমরা উদ্বিগ্ন ও শঙ্কিত থাকো, আর তিনি হাসেন, কারণ তিনি জানেন যে তোমাদের পরিবর্তন (স্বস্তি) সন্নিকটে।" লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম: যিনি হাসেন, আমরা সেই রবের পক্ষ থেকে কল্যাণ থেকে বঞ্চিত হবো না। "(পঞ্চমটি হলো) কিয়ামতের দিনের জ্ঞান।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি লোকদের যা শিক্ষা দেন, আর যা জানেন, তা আমাদেরকে শিখিয়ে দিন। কেননা আমরা এমন গোত্রের অন্তর্ভুক্ত— মাযহিজ গোত্র যা আমাদের উপরে কর্তৃত্ব করে এবং খাসআম গোত্র যারা আমাদের মিত্র— আর আমাদের নিজেদের গোত্র, কেউ আমাদের সত্যয়ন করে না।
তিনি বললেন: "যত দিন তোমাদের থাকার আছে, তোমরা থাকবে। অতঃপর তোমাদের নবীর ইন্তিকাল হবে। অতঃপর তোমরা ততদিন থাকবে, যত দিন থাকার। এরপর এক বিকট আওয়াজ আসবে। তোমার রবের কসম! পৃথিবীর উপরিভাগে থাকা সব প্রাণী এতে মারা যাবে, আর তোমার রবের কাছে থাকা ফেরেশতারাও মারা যাবেন। অতঃপর তোমার রব সকালে পৃথিবীতে বিচরণ করবেন, আর এলাকাগুলো তাঁর জন্য জনশূন্য হয়ে যাবে। অতঃপর তোমার মহান রব আরশের নিকট থেকে আকাশকে বর্ষণ করার আদেশ দেবেন। তোমার রবের কসম! পৃথিবীর উপরিভাগে কোনো নিহত ব্যক্তির স্থান বা কোনো মৃতের কবর বাকি থাকবে না, যা ফেটে না যাবে এবং মাথা থেকে তাকে বের করে না আনবে। সে বসে যাবে। তোমার রব তাকে বলবেন: 'কী খবর?' সে বলবে: 'হে রব, গতকাল, আজ।' জীবনকালের সাথে তার দীর্ঘ দিনের দূরত্ব থাকার কারণে সে মনে করবে যে, তা অল্প কিছুদিনের ঘটনা।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! বায়ু, পচন এবং হিংস্র জন্তুরা আমাদেরকে টুকরো টুকরো করার পর তিনি কিভাবে আমাদেরকে একত্রিত করবেন?
তিনি বললেন: "আল্লাহর কুদরতের মধ্যে এর দৃষ্টান্ত আমি তোমাকে জানাবো: তুমি পৃথিবীর দিকে তাকাও, যা শুষ্ক ও পুরনো। তুমি বলো: এটা আর কখনও সতেজ হবে না। অতঃপর আল্লাহ তার ওপর আকাশ থেকে বর্ষণ করেন। মাত্র কয়েক দিন না যেতেই তুমি তার দিকে তাকাও, তখন তা যেন এক বিশাল পানির জলাধার। তোমার রবের কসম! তোমাদেরকে একত্রিত করার ক্ষমতা তাঁর কাছে পৃথিবীর উদ্ভিদকে একত্রিত করার ক্ষমতার চেয়েও অধিক। তোমরা তোমাদের কবর থেকে এবং তোমাদের নিহত হওয়ার স্থান থেকে বেরিয়ে আসবে, অতঃপর তোমরা তাঁকে দেখবে, এবং তিনি তোমাদেরকে দেখবেন।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তো সারা পৃথিবী জুড়ে, আর তিনি এক সত্তা, আমরা তাঁকে কিভাবে দেখব এবং তিনি আমাদের দিকে তাকাবেন?
তিনি বললেন: "আল্লাহ তাআলার কুদরতের মধ্যে এর দৃষ্টান্ত আমি তোমাকে জানাবো: সূর্য ও চন্দ্র তাঁর ছোট দুটি নিদর্শন, তোমরা সে দুটিকে একই সময়ে দেখতে পাও এবং তারা তোমাদেরকে দেখে, আর সে দুটি দেখতে তোমাদের কোনো অসুবিধা হয় না। তোমার রবের কসম! তিনি তোমাদেরকে দেখবেন এবং তোমরা তাঁকে দেখবে— এই ক্ষমতা তাঁর কাছে তোমাদের চাঁদ-সূর্য দেখার চেয়েও অধিক, আর সে দুটি দেখতে তোমাদের কোনো অসুবিধা হয় না।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা যখন আমাদের মহান রবের সাথে মিলিত হব, তখন তিনি আমাদের সাথে কী করবেন?
তিনি বললেন: "তোমাদের মুখমণ্ডলগুলো তাঁর সামনে প্রকাশ্যভাবে তুলে ধরা হবে, তোমাদের কোনো গোপন বিষয় তাঁর কাছে গোপন থাকবে না। অতঃপর তোমার মহান রব নিজ হাতে এক অঞ্জলি পানি গ্রহণ করবেন এবং তোমাদের গোত্রের দিকে তা ছিটিয়ে দেবেন। তোমার রবের কসম! তোমাদের কারো মুখমণ্ডল থেকে একটি ফোঁটাও ছুটে যাবে না। মুসলিমের মুখমণ্ডল সেই সাদা কাপড়ের মতো হয়ে যাবে। আর কাফিরের মুখমণ্ডল কালো ফুটন্ত পানির মতো হয়ে যাবে। সাবধান! অতঃপর তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রস্থান করবেন, এবং তাঁর পেছনে সৎকর্মশীলরা পৃথক হয়ে যাবেন। তারা আগুনের সেতুর উপর দিয়ে অতিক্রম করবেন। তোমাদের কেউ কেউ জ্বলন্ত কয়লার উপর পা রাখবে এবং 'হিস্' (আহ্!) বলবে। তোমার মহান রব বলবেন: 'এই তো সময়।' সাবধান! অতঃপর তোমরা রাসূলের হাউজের দিকে অগ্রসর হবে, আল্লাহর কসম, আমি জীবনে কখনও এত তৃষ্ণার্ত মানুষকে দেখিনি, যারা তৃষ্ণার্ত অবস্থায় হাউজের দিকে অগ্রসর হবে। তোমার রবের কসম! তোমাদের কেউ হাত বাড়ানোর আগেই তার হাতে একটি পেয়ালা পড়ে যাবে, যা তাকে মল, মূত্র ও নোংরামি থেকে পবিত্র করবে। আর সূর্য ও চন্দ্রকে আটকিয়ে রাখা হবে, তোমরা সে দুটির কোনো একটিকেও দেখবে না।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আমরা কী দিয়ে দেখব?
তিনি বললেন: "তোমার এই মুহূর্তের দৃষ্টির মতোই (দেখতে পাবে)। আর এটা হবে সূর্যের উদয়ের পূর্বে এক দিনের বেলায়, যখন পৃথিবী আলোকিত হবে এবং পর্বতমালা তাঁর দিকে মুখ করে থাকবে।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের নেকী ও বদলার কী দিয়ে বিচার করা হবে?
তিনি বললেন: "নেকীর দশগুণ, আর পাপের তার সমপরিমাণ— যদি না তিনি ক্ষমা করে দেন।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! জান্নাত ও জাহান্নামের কেমন অবস্থা?
তিনি বললেন: "তোমার রবের কসম! জাহান্নামের সাতটি দরজা রয়েছে। এমন কোনো দুটি দরজা নেই, যার মধ্য দিয়ে একজন আরোহী সত্তর বছর পথ অতিক্রম করতে পারে না। আর জান্নাতের আটটি দরজা রয়েছে। এমন কোনো দুটি দরজা নেই, যার মধ্য দিয়ে একজন আরোহী সত্তর বছর পথ অতিক্রম করতে পারে না।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! জান্নাতের মধ্যে আমরা কী দেখতে পাবো?
তিনি বললেন: "পরিষ্কার পরিচ্ছন্ন মধুর নহরসমূহ, আর এমন মদের পাত্রের নহরসমূহ যা পান করলে মাথা ব্যথা হয় না বা অনুতাপ হয় না, আর এমন দুধের নহরসমূহ যার স্বাদ পরিবর্তিত হয়নি, আর স্বচ্ছ পানির নহরসমূহ। আর ফল-ফলাদি, তোমার রবের কসম! যা তোমরা জানো না এবং এর চেয়েও উত্তম কিছু তার সাথে থাকবে, আর থাকবে পবিত্র স্ত্রীগণ।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেখানে কি আমাদের স্ত্রীরা থাকবেন? অথবা তাদের মধ্যে কি সৎকর্মশীলা স্ত্রীরাও থাকবেন?
তিনি বললেন: "সৎকর্মশীলাগণ সৎকর্মশীলদের জন্য। তোমরা দুনিয়ার আমোদের মতোই তাদের সাথে আমোদ উপভোগ করবে, আর তারাও তোমাদের সাথে আমোদ উপভোগ করবে, তবে কোনো সন্তান জন্মাবে না।"
লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: যা আমরা সর্বোচ্চ অর্জন করতে এবং যেখানে শেষ হতে পারি (সে সম্পর্কে বলুন)? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো উত্তর দিলেন না।
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কিসের ওপর আপনার কাছে বাইয়াত করব?
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত বাড়িয়ে দিয়ে বললেন: "সালাত প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত প্রদান করা, মুশরিকদের থেকে বিচ্ছিন্ন থাকা, এবং আল্লাহর সাথে অন্য কোনো ইলাহকে শরীক না করার ওপর।"
আমি বললাম: মাশরিক (পূর্ব) ও মাগরিবের (পশ্চিমের) মধ্যবর্তী যা কিছু, তা কি আমাদের জন্য? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত গুটিয়ে নিলেন, কারণ তিনি ভাবলেন যে আমি এমন কোনো শর্ত দিচ্ছি যা তিনি আমাকে দিতে পারবেন না। আমি বললাম: আমরা যেখানে খুশি সেখানে অবতরণ করব, আর কোনো ব্যক্তি তার নিজের কৃতকর্মের ফল ছাড়া অন্য কারো কৃতকর্মের ফল ভোগ করবে না। তখন তিনি হাত বাড়িয়ে দিয়ে বললেন: "তোমাদের জন্য তাই। তোমরা যেখানে খুশি অবতরণ করো, আর তোমার নিজের কৃতকর্মের ফল ছাড়া অন্য কারো কৃতকর্মের ফল তোমার ওপর বর্তাবে না।"
লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমরা তাঁর কাছ থেকে ফিরে গেলাম। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহর কসম! এই দু'জন দুনিয়া ও আখিরাতে সবচেয়ে বেশি মুত্তাকীদের অন্তর্ভুক্ত।"
তখন কা'ব ইবনু খুদারিয়্যাহ— যিনি বানী বকর ইবনু কিলাবের অন্তর্ভুক্ত— তিনি বললেন: তারা কারা ইয়া রাসূলাল্লাহ?
তিনি বললেন: "বানী মুনতাফিক— তারাই এর যোগ্য।"
লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর আমরা ফিরে গেলাম, আর আমি তাঁর দিকে এগিয়ে গিয়ে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের পূর্বপুরুষদের মধ্যে যারা জাহিলিয়্যাতের যুগে মারা গেছেন, তাদের কারো জন্য কি কোনো কল্যাণ আছে?
তখন কুরাইশের মধ্যম সারির এক ব্যক্তি বললেন: আল্লাহর কসম! তোমার পিতা আল-মুনতাফিক জাহান্নামে।
লাকীত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: লোকজনের সামনে আমার পিতাকে উদ্দেশ্য করে তার এই কথা শুনে যেন আমার চামড়া, মুখ ও মাংসের মাঝে আগুন জ্বলে উঠল। আমি বলতে উদ্যত হলাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার পিতা? কিন্তু (ভাবলাম) অন্য প্রশ্ন করাই উত্তম। তাই আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আর আপনার পরিবার?
তিনি বললেন: "আর আমার পরিবারও। আল্লাহর কসম! মুশরিকদের মধ্য থেকে যে কোনো আমিরী বা কুরাইশী কবরের পাশ দিয়ে তুমি যাও না কেন, তাকে বলো: আমাকে মুহাম্মাদ তোমার কাছে পাঠিয়েছেন। আর এমন সুসংবাদ দাও যা তাকে দুঃখিত করবে— তাকে মুখে ভর দিয়ে পেটের উপর টেনে হিঁচড়ে জাহান্নামে নিয়ে যাওয়া হবে।"
আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তাদের সাথে এমন আচরণ করা হলো কেন, অথচ তারা তো এমন কাজের উপর ছিল যা তারা শুধু ভালোই মনে করত, আর তারা ভাবত যে তারা সৎ কাজ করছে?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কারণ আল্লাহ তাআলা প্রতি সাত উম্মতের শেষ ভাগে একজন নবী প্রেরণ করেছেন। যে ব্যক্তি তার নবীর অবাধ্য হয়েছে, সে পথভ্রষ্টদের অন্তর্ভুক্ত হয়েছে। আর যে ব্যক্তি তার নবীর আনুগত্য করেছে, সে হেদায়েত প্রাপ্তদের অন্তর্ভুক্ত হয়েছে।"
452 - عن عديّ بن حاتم، أنّ رجلًا خطب عند النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"من يطع اللَّه ورسوله فقد رشد، ومن يعصهما فقد غوى، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"بئس الخطيب أنتَ! قل: ومن يعصِ اللَّه ورسوله".
صحيح: رواه مسلم في الجمعة (870) من طريق وكيع، عن سفيان، عن عبد العزيز بن رُفيع، عن تميم بن طرفة، عن عدي بن حاتم، فذكره.
আদি ইবনে হাতেম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে খুতবা দিচ্ছিল। সে বলল: "যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করে, সে সঠিক পথ পায়; আর যে তাদের উভয়কে অমান্য করে, সে পথভ্রষ্ট হয়।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কত মন্দ খুতবাদাতা! বলো: 'আর যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে অমান্য করে'।"
453 - عن الطُّفيل بن سَخْبرة -أخي عائشة لأمّها- قال: إنّ رجلًا من المسلمين رأى في النوم أنّه لقي رجلًا من أهل الكتاب فقال: نعم القومُ أنتم لولا أنّكم تشركون، تقولون: ما شاء اللَّه وشاء محمّد. وذكر ذلك للنبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"أما واللَّه إن كنتُ لأعرفها لكم. قولوا: ما شاء اللَّه، ثم شاء محمّد".
صحيح: رواه ابن ماجه (2118 المكرر) عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، حدّثنا أبو عوانة، عن عبد الملك، عن ربعي بن حراش، عن الطّفيل بن سخبرة، فذكره.
وإسناده صحيح، ورجاله ثقات غير أن عبد الملك بن عمير وهو ثقة قد تغيّر حفظه، واختلف عليه، فرواه أبو عوانة عنه هكذا، وتابعه على ذلك: حماد بن سلمة، عن عبد الملك بن عمير، بإسناده.
رواه الإمام أحمد (20694) عن بهز وعفّان، قالا: حدّثنا حماد بن سلمة، بإسناده، وهذا لفظه: عن طفيل بن سَخْبرة أخي عائشة لأمّها: أنّه رأى فيما يرى النائمُ، كأنه مرّ برهط من اليهود، فقال: من أنتم؟ قالوا: نحن اليهود. قال: إنّكم أنتم القوم لولا أنّكم تزعمون أنّ عُزيرًا ابنُ اللَّه! فقالت اليهود: وأنتم القوم لولا أنكم تقولون: ما شاء اللَّه وشاء محمد! .
ثم مرّ برهط من النّصارى فقال: من أنتم؟ قالوا: نحن النّصارى، فقال: إنّكم أنتم القوم، لولا أنّكم تقولون: المسيح ابنُ اللَّه! قالوا: وأنتم القوم لولا أنّكم تقولون: ما شاء اللَّه وما شاء محمد! فلمّا أصبح أخبر بها مَنْ أخبر، ثم أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال:"هل أخبرتَ بها أحدًا". قال عفّان: قال: نعم، فلمّا صلَّوا خَطَبهم، فحمد اللَّه وأثنى عليه، ثم قال:"إنّ طُفيلًا رأى رؤيا فأخبرَ بها مَنْ أخبر منكم، وإنّكم كنتم تقولون كلمةً كان يمنعني الحياءُ منكم أن أنهاكم عنها". قال:"لا تقولوا: ما شاء اللَّه وما شاء محمد".
رواه الدّارميّ في سننه (2741) عن يزيد بن هارون، عن شعبة، عن عبد الملك بن عُمير بإسناده مختصرًا.
وذكره البخاريّ في التاريخ الكبير (4/ 363) في ترجمة طفيل أخي عائشة، فقال:"قال علي بن نصر: وهو طفيل بن سخبرة بن جرثومة بن عثمان وأمّهما أم رومان من كنانة". ثم ذكر الحديث من طريق شعبة، بإسناده مختصرًا، ورجّحه على رواية سفيان، عن عبد الملك، عن ربعي، عن حذيفة.
قلت: وخالفهم جميعًا فرواه سفيان بن عيينة، عن عبد الملك، عن ربعيّ، عن حذيفة، قال: أتى رجلٌ النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّي رأيت في المنام أني لقيتُ بعض أهل الكتاب فقال: نعم القومُ أنتم لولا أنّكم تقولون: ما شاء اللَّه وشاء محمد! فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"قد كنتُ أكرهها منكم، فقولوا: ما شاء اللَّه، ثم شاء محمد".
رواه الإمام أحمد (23339)، وابن ماجه (2118) من طريق سفيان بن عيينة، بإسناده، مثله.
وكذلك خالفهم معمر فرواه عن عبد الملك بن عمير، عن جابر بن سمرة، قال: رأى رجلٌ من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم في النوم أنه لقي قومًا من اليهود، فأعجبتْهُ هيئتُهم فقال: إنّكم لقومٌ لولا أنكم تقولون: عزيرٌ ابنُ اللَّه! فقالوا: وأنتم قومٌ لولا أنّكم تقولون: ما شاء اللَّه وشاء محمد، قال: ولقي قومًا من النّصارى، فأعجبتْهُ هيئتُهم، فقال: إنّكم قومٌ لولا أنّكم تقولون: المسيح ابنُ اللَّه، فقالوا: وأنتم قومٌ لولا أنّكم تقولون: ما شاء اللَّه وشاء محمد، فلما أصبح، قصَّ ذلك على النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"كنتُ أسمعها منكم فتؤذونني، فلا تقولوا: ما شاء اللَّه وشاء محمد".
والذي يظهر من دراسة طرق هذا الحديث أنّ الذي رأى في المنام هو الطّفيل أخو عائشة أمّ المؤمنين، وسمعه منه حذيفة وجابر بن سمرة، ولكن الرواة لم يحفظوا اسمه لقلّة روايته فأبهموه، ومن الخطأ أن يجعل هذا الحديث من مسند حذيفة أو جابر بن سمرة، واللَّه تعالى أعلم.
তুফাইল ইবনে সাখবারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বৈমাত্রেয় ভাই, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: জনৈক মুসলিম ব্যক্তি স্বপ্নে দেখল যে সে আহলে কিতাবের (কিতাবধারীদের) এক ব্যক্তির সাথে সাক্ষাৎ করেছে। লোকটি (আহলে কিতাব) বলল: 'তোমরা খুবই উত্তম জাতি, যদি না তোমরা শিরক করতে—তোমরা বলো: 'আল্লাহ যা চেয়েছেন এবং মুহাম্মাদ যা চেয়েছেন।' সে (স্বপ্নদ্রষ্টা) বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: **"শোনো, আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের মাঝে এই শব্দটি লক্ষ্য করতাম। তোমরা বলো: 'আল্লাহ যা চেয়েছেন, অতঃপর (ثُمَّ) মুহাম্মাদ যা চেয়েছেন।' "**
454 - عن وعن قُتَيْلة امرأة من جهينة، أنّ يهوديًّا أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّكم تندِّدون وإنّكم تشركون تقولون: ما شاء اللَّه وشئتَ! وتقولون: والكعبةِ! . فأمرهم النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا أرادوا أن يحلفوا أن يقولوا:"وربِّ الكعبة"، ويقولوا:"ما شاء اللَّه ثم شئت".
صحيح: رواه النسائيّ (3773) عن يوسف بن عيسى، حدثنا الفضل بن موسى، حدثنا مسعر، عن معبد بن خالد، عن عبد اللَّه بن يسار، عن قتيلة، فذكرته.
وإسناده صحيح. وقد صحّحه أيضًا الحافظ في"الإصابة" بعد أن عزاه إلى النسائي.
ورواه أحمد (27093) عن يحيى بن سعيد، قال: حدثنا المسعودي، قال حدثني معبد بن خالد، بإسناده، وهذا لفظه: عن قتيلة بنت صيفي الجهنية، قالت: أتى حَبرٌ من الأحبار إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال: يا محمد، نعم القومُ أنتم، لولا أنّكم تُشركون، قال:"سبحان اللَّه، وما ذاك؟". قال: تقولون إذا حلفتم: والكعبة. قالت: فأمهل رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا ثم قال:"إنّه قد قال، فمن حلف فلْيحلِف بربِّ الكعبة". ثم قال: يا محمد، نعم القومُ أنتم، لولا أنكم تجعلون للَّه ندًّا، قال:"سبحان اللَّه، وما ذاك؟". قال: تقولون: ما شاء اللَّه وشئتَ. قال: فأمهل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا، ثم قال:"إنّه قد قال، فمن قال: ما شاء اللَّه، فليفصل بينهما: ثم شئتَ".
والمسعودي مختلط، ولكن يحيى بن سعيد يروي عنه قبل الاختلاط. رواه الحاكم (4/ 97) من وجه آخر عن المسعودي مختصرًا، وقال: صحيح الإسناد.
وأمّا ما رواه أبو داود (4980)، والإمام أحمد (23265) كلاهما من حديث شعبة، عن منصور، عن عبد اللَّه بن يسار، عن حذيفة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مختصرًا:"لا تقولوا ما شاء اللَّه وشاء فلان، ولكن قولوا: ما شاء اللَّه ثم شاء فلان".
فهو منقطع؛ فإنّ عبد اللَّه بن يسار لم يسمع من حذيفة كما قال ابن معين.
قال عثمان بن سعيد الدّارميّ: وسألت يحيى بن معين عن عبد اللَّه بن يسار الذي يروي عنه منصور، عن حذيفة:"لا تقولوا ما شاء اللَّه وشاء فلان" ألقيَ حذيفة؟ فقال: لا أعلمه.
انظر: تاريخ ابن معين (567)، وكذا ذكره أيضًا العلائيّ في جامع التحصيل (407).
وقد سبق أن تابعه ربعي بن حراش، عن حذيفة، ولكن رجّح البخاريّ وغيره أنه من مسند الطفيل بن سخبرة أخي عائشة كما سبق. كما أن البخاري رجح رواية منصور عن عبد اللَّه بن يسار عن حذيفة على رواية معبد بن خالد بن عبد اللَّه بن يسار، عن فتيلة. ذكره الترمذيّ في العلل الكبير (2/ 659) واللَّه أعلم بالصواب.
وقوله:"لا تقولوا ما شاء اللَّه وشاء فلان" لأنّه مما يوهم التسوية.
কুতাইলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন ইহুদি পণ্ডিত (হিবর) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: "হে মুহাম্মাদ, আপনারা উত্তম জাতি, যদি না আপনারা শিরক করতেন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুবহানাল্লাহ! সেটা কী?" পণ্ডিতটি বললেন: "আপনারা যখন কসম করেন, তখন বলেন: 'ওয়া কা‘বাতি' (কাবা ঘরের কসম)।" কুতাইলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন, তারপর বললেন: "সে ঠিক বলেছে। সুতরাং, যে কেউ কসম করবে, সে যেন 'ওয়া রব্বিল কা‘বাতি' (কাবা ঘরের রবের কসম) বলে কসম করে।"
এরপর পণ্ডিতটি আবার বললেন: "হে মুহাম্মাদ, আপনারা উত্তম জাতি, যদি না আপনারা আল্লাহর জন্য প্রতিদ্বন্দ্বী (নিদ্দ) স্থির করতেন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুবহানাল্লাহ! সেটা কী?" পণ্ডিতটি বললেন: "আপনারা বলেন: 'মাশাআল্লাহু ওয়া শি’তা' (আল্লাহ যা চেয়েছেন এবং আপনি যা চেয়েছেন)।" কুতাইলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন, তারপর বললেন: "সে ঠিক বলেছে। সুতরাং, যে কেউ 'মাশাআল্লাহ' বলবে, সে যেন এর সাথে 'ছুম্মা শি’তা' (এরপর আপনি যা চেয়েছেন) যোগ করে বলে।"
455 - عن ابن عباس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا حلف أحدُكم فلا يقل: ما شاء اللَّه وشئت، ولكن ليقلْ: ما شاء اللَّه ثم شئت".
حسن: رواه ابن ماجه (2117) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا عيسى بن يونس، قال: حدثنا الأجلح الكنديّ، عن يزيد بن الأصمّ، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في الأجلح، وهو الأجلح بن عبد اللَّه بن حُجيَّة -مصغرًا- يكني أبا حجية الكنديّ، يقال: اسمه يحيى، مختلف فيه: فضعّفه أبو داود والنسائي وابن سعد وابن حبان وغيرهم، ومشّاه غيرهم، فقال ابن معين: صالح، وقال العجليّ: كوفيّ ثقة. وقال أبو حاتم: ليس بالقوي، يكتب حديثه ولا يحتج به. وقال ابن عدي: له أحاديث صالحة.
والخلاصة أنه حسن الحديث، وفي التقريب:"صدوق شيعي".
وهو شاهد قويّ لما سبق.
ومن هذا الطريق رواه الإمام أحمد (2117)، والنسائيّ (988) كلاهما بلفظ:"أنّ رجلًا أتي النبي صلى الله عليه وسلم فكلّمه في بعض الأمر، فقال: ما شاء اللَّه وشئت! فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أجعلتني اللَّه عدلًا، بل قلْ: ما شاء اللَّه وحده".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ কসম বা শপথ করে, তখন সে যেন না বলে: 'আল্লাহ যা চেয়েছেন এবং তুমি যা চেয়েছো' (মা শা আল্লাহু ওয়া শি'তা), বরং সে যেন বলে: 'আল্লাহ যা চেয়েছেন অতঃপর তুমি যা চেয়েছো' (মা শা আল্লাহু ছুম্মা শি'তা)।"
456 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه قال: من عادى لي وليا فقد آذنته بالحرب، وما تقرّب إليَّ عبدي بشيء أحبَّ إليَّ مما افترضتُه عليه، وما يزال عبدي يتقرب إليَّ بالنوافل حتى أحبَّه، فإذا أحببته كنتُ سمعَه الذي يسمعُ به، وبصرَه الذي يبصر به، ويده التي يبطشُ بها، ورجلَه التي يمشي بها، وإن سألني لأعطِينَّه، ولئن استعاذني لأعيذنّه، وما ترددتُ عن شيء أنا فاعله تردّدي عن نفس المؤمن، يكره الموت، وأنا أكره مساءته".
صحيح: رواه البخاريّ في الرّقاق (6502) عن محمد بن عثمان، حدثنا خالد بن مخلد، حدثنا سليمان بن بلال، حدثني شريك بن عبد اللَّه بن أبي نمر، عن عطاء، عن أبي هريرة، فذكره.
وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، عن جبريل، عن اللَّه تبارك وتعالى قال:"يقول اللَّه عز وجل: من أهان لي وليًّا، فقد بارزني بالمحاربة، وإني لأغضبُ لأوليائي كما يغضب الليثُ الحرد، وما تقرّب إليّ عبدي المؤمن بمثل أداء ما افترضتُ عليه، وما زال عبدي المؤمنُ يتقرّبُ إليّ بالنّوافل حتى أُحبَّه، فإذا أحببتُه، كنتُ له سمعًا وبصرًا ويدًا، ومؤيدًا، إن دعاني أجبته، وإن سألني أعطيته، وما ترددتُ في شيء أنا فاعله تردّدي في قبض روح عبدي المؤمن، يكره الموت وأكره مساءته، ولا بد له منه. وإنّ من عبادي المؤمنين لمن يسألني الباب من العبادة، فأكفُّه علّه ألا يدخله عُجْبٌ فيفسدَه ذلك. وإنّ من عبادي المؤمنين لمن لا يصلح إيمانَه إلا الغنى، ولو أفقرتُه لأفسدَه ذلك. وإنّ من عبادي المؤمنين لمن لا يصلح إيمانه إلا الفقر، ولو أغنيتُه لأفسده ذلك، وإن من عبادي المؤمنين لمن لا يصلح إيمانه إلا الصّحة ولو أسقتُه لأفسده ذلك. وإنّ من عبادي المؤمنين لمن لا يصلح إيمانه إلا السَّقَمُ ولو أصححتُه لأفسده ذلك. إني أُدبِّرُ أمرَ عبادي بعلمي بقلوبهم، إنّي عليمٌ خبيرٌ". فهو ضعيف.
رواه أبو نعيم في"الحلية" (8/ 318)، والبغويّ في شرح السنة (5/ 22)، والبيهقي في الأسماء والصفات (1/ 307)، وابن الجوزيّ في العلل المتناهية (1/ 31 - 32)، كلّهم من طرق عن الحسن ابن يحيى الخشني، عن صدقة الدّمشقيّ، عن هشام الكنانيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال ابن الجوزيّ:"الحسن بن يحيى الخشنيّ قال فيه ابن معين: ليس بشيء، وقال الدارقطني: متروك، وصدقة الدمشقي مجروح".
قلت: الحسن بن يحيى الخشني مختلف فيه، فقال الآجريّ عن أبي داود سمعت أحمد يقول: ليس به بأس، وقال الساجيّ، ثنا أبو داود، ثنا سليمان بن عبد الرحمن، ثنا الحسن بن يحيى الخشني -وكان ثقة-، وقال دحيم: لا بأس به.
وأما ابن معين فاختلف عليه، فقال عباس الدوريّ عنه: ليس بشيء، وقال ابن أبي مريم عنه: ثقة خراسانيّ، وقال ابن الجنيد: الحسن بن يحيى ومسلمة بن علي الحنشنيان ضعيفان ليسا بشيء، والحسن أحبُّهما إليّ.
وجرّحه النسائي والحاكم أبو أحمد والدارقطني وعبد الغني بن سعيد وغيرهم.
فهو إلى الضعف أقرب، ولكن ليس بمتهم، ولذا قال الحافظ في التقريب:
"صدوق كثير الغلط". وأخرج ابن عدي عددًا من رواياته المنكرة وليس فيها هذا الحديث وقال:"وهو ممن تحتمل روايته".
ولكن قال ابن رجب في"جامع العلوم والحكم" (ص 314) بعد أن عزاه للطبراني:"الخشني
وصدقة ضعيفان، وهشام الكناني لا يعرف، وسئل ابن معين عن هشام هذا من هو؟ قال: لا أحد، يعني: أنه لا يعتبر به" انتهى.
وقال أبو نعيم:"غريب من حديث أنس، لم يرو عنه بهذا السياق إلّا هشام الكناني، وعنه صدقة ابن عبد اللَّه أبو معاوية الدمشقي، تفرّد به الحسن بن يحيى الخشني". وتحرف الخشني إلى الحسني.
وللجزء الثاني منه شاهد من حديث عمر بن الخطاب مرفوعًا:"أتاني جبريل فقال: يا محمد ربُّك يقرأ عليك السّلام ويقول: إنّ من عبادي من لا يصلُح إيمانُه إلّا بالغني ولو أفقرته لكفر، وإنّ من عبادي من لا يصلح إيمانه إلّا بالفقر ولو أغنيته لكفر، وإنّ من عبادي من لا يصلح إيمانه إلّا بالسقم لو أصححته لكفر، وإنّ من عبادي من لا يصلح إيمانه إلّا بالصحة لو أسقمته لكفر".
رواه أبو بكر الخطيب في تاريخ بغداد (6/ 15) وعنه ابن الجوزيّ في العلل المتناهية (1/ 31).
وفيه عيسى الرمليّ -يعني يحيى- التميمي الهشلي، قال ابن معين: ليس بشيء، وقال النسائيّ: ليس بالقوي، وقال ابن حبان في المجروحين (1219): كان ممن ساء حفظه وكثر وهمه حتى جعل يخالف الأثبات فيما يروي عن الثقات، فلما كثر ذلك في روايته بطل الاحتجاج به. وقال ابن عدي في الكامل (7/ 2673): عامة رواياته مما لا يتابع عليه.
قال ابن الجوزيّ: هذا حديث لا يصح؛ لأنّ فيه يحيى بن عيسى الرّمليّ ثم ذكر قول يحيى وابن حبان، وأما كون مسلم روى عنه فلعله انتقي من رواياته مما لم يخطئ فيها وله متابعات.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ তা’আলা বলেন: যে আমার কোনো ওলীর (বন্ধুর) সাথে শত্রুতা পোষণ করে, আমি তার বিরুদ্ধে যুদ্ধের ঘোষণা দিলাম। আমার বান্দা আমি যা তার উপর ফরয করেছি, তার চেয়ে প্রিয় অন্য কোনো বস্তুর মাধ্যমে আমার নৈকট্য লাভ করতে পারে না। আর আমার বান্দা নফল ইবাদতের মাধ্যমে আমার নৈকট্য লাভ করতে থাকে, যতক্ষণ না আমি তাকে ভালবাসি। যখন আমি তাকে ভালবাসি, তখন আমি হয়ে যাই তার সেই কান, যা দ্বারা সে শোনে; তার সেই চোখ, যা দ্বারা সে দেখে; তার সেই হাত, যা দ্বারা সে ধরে; এবং তার সেই পা, যা দ্বারা সে হাঁটে। আর সে যদি আমার কাছে কিছু চায়, আমি অবশ্যই তাকে তা দান করি। আর সে যদি আমার কাছে আশ্রয় চায়, আমি অবশ্যই তাকে আশ্রয় দিই। আমি যে কাজই করি না কেন, মু'মিনের জান কবয করার ব্যাপারে যতটুকু দ্বিধা করি, ততটুকু দ্বিধা অন্য কিছুতে করি না। সে মৃত্যুকে অপছন্দ করে আর আমি তার কষ্ট অপছন্দ করি।
457 - عن عمران بن حصين قال: دخلت على النبيّ صلى الله عليه وسلم وعقلتُ ناقتي بالباب، فأتاه ناسٌ من بني تميم فقال:"أقبلوا البشرى يا بني تميم". قالوا: قد بشّرْتنا فأعطنا -مرّتين- ثم دخل عليه ناسٌ من أهل اليمن فقال:"اقبلوا البشرى يا أهل اليمن إذ لم يقبلها بنو تميم". قالوا: قد قبلنا يا رسول اللَّه، قالوا: جئناك نسألك عن هذا الأمر، قال:"كان اللَّه ولم يكن شيءٌ غيره، وكان عرشه على الماء، وكتب في الذِّكر كلَّ شيءٍ، وخلق السّماوات والأرض". فنادى منادٍ: ذهبتْ ناقتُك يا ابن الحصين، فانطلقتُ فإذا هي يقطع دونها السرابُ فواللَّه لوددتُ أنّي كنت تركتها".
صحيح: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3191) عن عمر بن حفص بن غياث، حدّثنا أبي، حدّثنا الأعمش، حدّثنا جامع بن شدّاد، عن صفوان بن محرز، أنّه حدّثه، عن عمران بن حصين، فذكر الحديث.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম এবং আমার উটনীকে দরজার কাছে বেঁধে রাখলাম। তখন তাঁর কাছে বানু তামিম গোত্রের কিছু লোক এলো। তিনি বললেন: "হে বানু তামিম! সুসংবাদ গ্রহণ করো।" তারা বলল: আপনি তো আমাদের সুসংবাদ দিলেন, এখন আমাদের কিছু দিন— (কথাটি তারা) দুইবার বলল।
এরপর তাঁর নিকট ইয়ামানবাসীদের কিছু লোক প্রবেশ করল। তিনি বললেন: "হে ইয়ামানবাসী! তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো, যখন বানু তামিম তা গ্রহণ করেনি।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তা গ্রহণ করলাম। তারা বলল: আমরা আপনার কাছে এই সৃষ্টিজগত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে এসেছি।
তিনি বললেন: "আল্লাহ ছিলেন, আর তিনি ছাড়া অন্য কোনো কিছুই ছিল না। আর তাঁর আরশ ছিল পানির উপরে। তিনি ‘আয-যিকর’ (লওহে মাহফুয)-এ সবকিছু লিখে রেখেছেন এবং আসমান ও যমীন সৃষ্টি করেছেন।"
তখন একজন আহ্বানকারী আহ্বান করল: হে ইবনুল হুসাইন! আপনার উটনী চলে গেছে। তখন আমি দ্রুত ছুটলাম এবং দেখলাম যে, মরীচিকা সেটিকে (পথ চলতে) বাধা দিচ্ছে। আল্লাহর কসম! আমি তখন আফসোস করলাম— ইশ! যদি আমি সেটি (উটনী) ছেড়ে দিয়ে যেতাম (এবং রাসূলের কথা শুনতাম)।
458 - عن أبي هريرة يبلغُ به النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"قال اللَّه تبارك وتعالى: يا ابنَ آدم، أنْفقْ أُنفِق عليك". وقال:"يمين اللَّه ملآي (وقال ابنُ نمير: ملآن) سحَّاء لا يغيضها شيءٌ اللّيلَ والنّهار".
وفي رواية: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه قال لي: أَنفْق أُنفقْ عليك". وقال
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يمين اللَّه ملآي لا يغيضها سحّاء اللّيل والنّهار. أرأيتم ما أنفقَ مذْ خلق السّماء والأرض؟ فإنّه لم يغض ما في يمينه". قال:"وعرشه على الماء، وبيده الأخرى القبض يرفع ويخفض".
متفق عليه: رواه مسلم في الزّكاة (993) من طريق ابن عيينة، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
والرواية الثانية أخرجها أيضًا مسلمٌ من طريق عبد الرزّاق، حدّثنا معمر بن راشد، عن همّام بن منبّه، قال: هذا ما حدّثنا أبو هريرة، فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه البخاريّ في التوحيد (7419) بلفظ قريب منه.
ورواه أيضًا في النفقات (5352) عن إسماعيل، عن مالك، عن أبي الزّناد، بإسناده ولفظه:"قال اللَّه: أنفق يا ابن آدم أنفق عليك".
وهذه الرواية غير موجودة في الموطآت المطبوعة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মারফত বর্ণনা করেন। তিনি বলেন, আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা’আলা বলেছেন: “হে আদম সন্তান, তুমি খরচ করো, আমি তোমার উপর খরচ করব (তোমাকে দেব)।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন: “আল্লাহর ডান হাত ভরপুর (ইবনু নুমাইরের বর্ণনায়: পরিপূর্ণ), যা রাতে-দিনে উদারভাবে দান করে, কোনো কিছুই তাকে কমাতে পারে না।”
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ আমাকে বলেছেন: খরচ করো, আমি তোমার উপর খরচ করব।” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন: “আল্লাহর ডান হাত ভরপুর, যা রাতে-দিনে উদারভাবে দান করে, কোনো কিছু তা কমাতে পারে না। তোমরা কি দেখনি, যখন থেকে তিনি আকাশ ও পৃথিবী সৃষ্টি করেছেন তখন থেকে তিনি কত খরচ করেছেন? অথচ তাঁর ডান হাতের সম্পদ এতটুকুও কমেনি।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আর তাঁর আরশ পানির উপর এবং তাঁর অপর হাতে রয়েছে গ্রহণ করার ক্ষমতা; তিনি উন্নত করেন এবং অবনত করেন।”
459 - عن أبي رزين، قال: قلت: يا رسول اللَّه، أين كان ربُّنا عز وجل قبل أنّ يخلق خلْقَه؟ قال:"كان في عَماءٍ، ما تحته هواء، وما فوقه هواء، ثم خلق عرشَه على الماء".
حسن: رواه الترمذيّ (3109)، وابن ماجه (182) كلاهما من حديث يزيد بن هارون، قال: أنبأنا حماد بن سلمة، عن يعلى بن عطاء، عن وكيع بن حُدُس، عن عمّه أبي رزين، فذكره. ومن هذا الوجه أخرجه الإمام أحمد (16188).
وصحّحه ابنُ خزيمة (360)، وابن حبان (6141)، وروياه من هذا الوجه، ووكيع بن حُدس"مقبول".
وقد توبع. انظر تخريجه المفصل -باب رؤيا المؤمنين ربَّهم يوم القيامة-.
قوله:"عَماء" بالفتح والمدّ، أي أنّ الخلق لا يعرفون خالقهم من حيث هم، لأنّه كان في عماء قبل خلقه الزّمان والمكان، ولا شيء معه، فمعرفة الخلق إيّاه كأنّه في عماء عن علم الخلق، لا أنّ اللَّه كان في عماء، إذ هذا الوصف شبيه بأوصاف المخلوقين. قاله ابن حبان.
আবূ রযীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের মহান ও সম্মানিত রব তাঁর সৃষ্টিজগত সৃষ্টির আগে কোথায় ছিলেন?" তিনি বললেন, "তিনি 'আমা'-এর মধ্যে ছিলেন। যার নিচেও কোনো বাতাস ছিল না এবং উপরেও কোনো বাতাস ছিল না। এরপর তিনি তাঁর আরশ পানির উপর সৃষ্টি করেন।"
460 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من آمن باللَّه ورسوله، وأقام الصّلاة، وصام رمضان كان حقًّا على اللَّه أنّ يدخله الجنّة، جاهد في سبيل اللَّه أو جلس في أرضه التي وُلد فيها". فقالوا: يا رسول اللَّه أفلا نبشر النّاس؟ قال:"إنّ في الجنة مائةَ درجة أعدّها اللَّه للمجاهدين في سبيل اللَّه، ما بين الدّرجتين كما بين
السماء والأرض، فإذا سألتم اللَّه فاسألوه الفردوس؛ فإنه أوسط الجنة، وأعلى الجنة -أُراه فوقه عرش الرّحمن- ومنه تفجر أنهار الجنة".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد (2790) عن يحيى بن صالح، حدّثنا فليح، عن هلال بن علي، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره.
قال البخاريّ: وقال محمد بن فليح، عن أبيه:"وفوقه عرش الرحمن". أي دون شكّ.
قلت: وحديث محمّد بن فليح، عن أبيه. أخرجه البخاريّ أيضًا في التوحيد (7423) عن إبراهيم بن المنذر، عنه، عن أبيه، حدثني هلال إلّا أنّ فيه:"هاجر في سبيل اللَّه، أو جلس في أرضه التي وُلد فيها، بدلًا من"جاهد في سبيل اللَّه. . .".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান আনল, সালাত (নামাজ) প্রতিষ্ঠা করল এবং রমজানের রোজা রাখল, তাকে জান্নাতে প্রবেশ করানো আল্লাহর জন্য কর্তব্য হয়ে যায়। সে আল্লাহর পথে জিহাদ করুক অথবা যে ভূমিতে সে জন্মগ্রহণ করেছে সেখানেই অবস্থান করুক।" তখন তারা জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি লোকদেরকে এই সুসংবাদ দেব না? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জান্নাতে আল্লাহর পথে জিহাদকারীদের জন্য আল্লাহ একশত স্তর প্রস্তুত করে রেখেছেন। দুটি স্তরের মধ্যবর্তী দূরত্ব আসমান ও যমিনের মধ্যবর্তী দূরত্বের ন্যায়। সুতরাং যখন তোমরা আল্লাহর কাছে চাইবে, তখন তোমরা ফিরদাউস (জান্নাতুল ফিরদাউস) চাইবে। কারণ এটি জান্নাতের মধ্যম স্থান এবং জান্নাতের সর্বোচ্চ স্থান।—বর্ণনাকারী বলেন: আমার ধারণা, তিনি বলেছেন—এর উপরেই দয়াময় আল্লাহর আরশ রয়েছে এবং এর থেকেই জান্নাতের নদীগুলো প্রবাহিত হয়।"