আল-জামি` আল-কামিল
4528 - عن أبي ذرّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الرجل إذا صلى مع الإمام حتى ينصرف حُسِبَ له قيام ليلة".
صحيح: رواه أبو داود (1375)، والترمذي (806)، والنسائي (1364)، وابن ماجه (1327)
كلّهم من طريق داود بن أبي هند، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشيّ، عن جبير بن نفير الحضرميّ، عن أبي ذر، في حديث طويل. وإسناده صحيح، وقد سبق تخريجه.
وفي الباب ما روي عن أنس، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى المغرب والعشاء في جماعة حتى ينقضي شهر رمضان، فقد أصاب ليلة القدر بحظٍّ وافر".
رواه البيهقي في"فضائل الأوقات" (116) من حديث يحيى بن عقبة، عن محمد بن جحادة، عن أنس، فذكره.
ويحيى بن عقبة هو ابن أبي العيزار ضعيف جدًّا. قال ابن حبان في"المجروحين" (1203):"وكان ممن يروي الموضوعات عن أقوام أثبات، ويلزق المتون الموضوعة بالأسانيد الصحيحة، لا يجوز الاحتجاج به بحال من الأحوال". وضعّفه أيضًا ابن معين وأبو حاتم والنسائي.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من صلَّى العشاء الآخرة في جماعة في رمضان، فقد أدرك ليلة القدر".
رواه ابن خزيمة (2195)، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (117) كلاهما من حديث عقبة بن أبي الحسنة، عن أبي هريرة، فذكره.
وعقبة بن أبي الحسنة مجهول، كما قال ابن المديني وأبو حاتم والذهبي وغيرهم.
ولكن ذكره ابن حبان في"الثقات" تبعًا لقاعدته، وعلى قاعدة شيخه ابن خزيمة.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় কোনো ব্যক্তি যখন ইমামের সাথে সালাত আদায় করে যতক্ষণ না তিনি (ইমাম) ফিরে যান, তখন তার জন্য এক রাতের কিয়াম (নামাযে দাঁড়ানো) হিসেবে গণ্য করা হয়।"
4529 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا غُفر له ما تقدّم من ذنبه، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".
متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2014)، ومسلم في صلاة المسافرين (760) كلاهما من طريق أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমান ও সাওয়াবের আশায় রমযানের রোযা রাখে, তার পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি ঈমান ও সাওয়াবের আশায় কদরের রাতে (ইবাদতের জন্য) দাঁড়ায়, তারও পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হয়।"
4530 - عن عائشة، قالت: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم إذا دخل العشرُ أحيا اللّيل وأيقظ أهله وجدَّ وشدّ المئزر.
متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2024)، ومسلم في الاعتكاف (1174) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي يعفور، عن أبي الضّحي مسلم بن صُبيح، عن مسروق، عن عائشة، قالت"فذكرته". واللفظ لمسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (রমযানের) শেষ দশ দিনে প্রবেশ করতেন, তখন তিনি রাত জাগরণ করতেন, তাঁর পরিবারকে জাগিয়ে দিতেন, কঠোর চেষ্টা করতেন এবং (ইবাদতের জন্য) লুঙ্গি শক্ত করে বাঁধতেন।
4531 - عن عائشة، قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يجتهد في العشر الأواخر ما لا يجتهد في غيره.
صحيح: رواه مسلم في الاعتكاف (1175) من طريق عبد الواحد بن زياد، عن الحسن بن
عبيد الله، قال: سمعت إبراهيم يقول: سمعت الأسود بن يزيد يقول: قالت عائشة (فذكرته).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শেষ দশকে (ইবাদতে) এমন কঠোর সাধনা করতেন, যা তিনি অন্য সময়ে করতেন না।
4532 - عن على، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا كان العشر الأواخر من رمضان شمّر المئزر، واعتزل النساء.
حسن: رواه البيهقي في"الكبرى" (4/ 314)، وفي"فضائل الأوقات" (75) عن علي بن محمد ابن بشران ببغداد، حدثنا إسماعيل بن محمد الصفّار، حدثنا عبد الكريم بن الهيثم، حدثنا محمد بن الصباح، حدثنا هشيم، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن علي، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن ضمرة فإنه حسن الحديث.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রমাদানের শেষ দশ দিন আসত, তখন তিনি (ইবাদতের জন্য) কোমর শক্ত করে বেঁধে নিতেন এবং নারীদের (স্ত্রীদের) থেকে দূরে থাকতেন।
4533 - عن علي بن أبي طالب، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يوقظ أهله في العشر الأواخر من رمضان.
حسن: رواه الترمذي (795) عن محمود بن غيلان، حدثنا وكيع، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن هبيرة بن بَريم، عن علي، فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: يحتمل تحسينه فإنّ هبيرة بن يُريم -على وزن عظيم- مختلف فيه، فقال الإمام أحمد: لا بأس بحديثه. وذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 511)، وقال ابن سعد: كان معروفًا وليس بذاك. وضعّفه النسائي وجهّله ابن معين وأبو حاتم. فمثله لا بأس بحديثه كما قال أحمد، وخاصة إذا كان له شواهد.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজানের শেষ দশকে তাঁর পরিবারবর্গকে (ইবাদতের জন্য) জাগিয়ে তুলতেন।
4534 - عن زرّ بن حبيش يقول: سألت أُبَيَّ بن كعب رضي الله عنه، فقلت: إنّ أخاك ابن مسعود يقول: مَنْ يَقُم الحوْلَ يُصِبْ ليلةَ القَدْر؟ فقال: رحمه الله أراد أن لا يتّكل الناس، أَمَا إنه قد علم أنها في رمضان، وأنّها في العشر الأواخر، وأنّها ليلة سبع وعشرين -ثم حلف لا يستثني- أنّها ليلة سبع وعشرين. فقلت: بأيِّ شيء تقول ذلك يا أبا المنذر؟ قال: بالعلامة أو بالآية التي أخبرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنّها تطلُعُ يومئذ لا شعاع لها".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (762: 220) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبدة وعاصم بن أبي النجود، سمعا زرّ بن حبيش يقول (فذكره). وعبدة هو ابن أبي لبابة.
وفي سنن أبي داود (1378) وغيره:"تصبح الشمس صبيحة تلك الليلة مثل الطّست ليس لها شعاع حتى ترتفع".
والطّست أي مظلمة لا ضوء لها.
যির্র ইবনু হুবাইশ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম। আমি বললাম: "আপনার ভাই ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যে ব্যক্তি সারা বছর রাত জেগে ইবাদত করবে, সে লাইলাতুল কদর পাবে?"
তিনি (উবাই) বললেন: "আল্লাহ তাকে রহমত করুন। তিনি চেয়েছিলেন যেন লোকেরা (একটি নির্দিষ্ট রাতে) ভরসা করে বসে না থাকে। জেনে রাখো, তিনি অবশ্যই জানেন যে, তা (লাইলাতুল কদর) রমজানে, আর তা হলো শেষ দশকে, আর তা হলো সাতাশতম রাত।" এরপর তিনি শপথ করে বললেন—কোনোরূপ ব্যতিক্রম না করেই—যে, তা সাতাশতম রাত।
আমি বললাম: "হে আবুল মুনযির! কীসের ভিত্তিতে আপনি এ কথা বলছেন?"
তিনি বললেন: "সেই নিদর্শন বা আলামতের ভিত্তিতে যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে জানিয়েছেন: 'ঐদিন সূর্য উদিত হবে, কিন্তু তার কোনো কিরণ থাকবে না'।"
4535 - عن ابن عباس، قال: أتيت وأنا نائم في رمضان، فقيل لي: إنّ الليلة ليلة القدر، فقمتُ وأنا ناعس، فتعلّقتُ ببعض أطناب فسطاط رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يصلي. فنظرتُ في الليلة فإذا هي ليلة ثلاث وعشرين.
قال ابن عباس: إنّ الشيطان يطلع مع الشمس كلّ يوم إلا ليلة القدر، وذلك أنها تطلع يومئذ ولا شعاع لها.
حسن: رواه البيهقيّ في"فضائل الأوقات" (104) من طريق مسدد، حدثنا أبو الأحوص، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (2302) عن عفان، حدثنا أبو الأحوص بإسناده إلا أنه لم يذكر علامة ليلة القدر. ورواه أبو داود الطيالسي (2790) عن سلام، عن سماك إلا أنه جعله ليلة أربع وعشرين. وسماك في عكرمة متكلّم فيه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রমযান মাসে ঘুমন্ত অবস্থায় ছিলাম, তখন আমাকে বলা হলো: আজকের রাতটি লাইলাতুল কদর। আমি ঘুমন্ত অবস্থায়ই উঠে দাঁড়ালাম এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর তাঁবুর কিছু রশি ধরে ঝুলে রইলাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট আসলাম যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন। আমি রাতটির দিকে লক্ষ্য করলাম, তখন তা ছিল তেইশতম রাত (২৩ তারিখের রাত)।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন: শয়তান প্রতিদিন সূর্যোদয়ের সময় সূর্যের সাথে ওঠে, লাইলাতুল কদর ব্যতীত। এর কারণ হলো, সেদিন সূর্য উদিত হয় কিন্তু তার কোনো তীব্র দীপ্তি (রশ্মি) থাকে না।
4536 - عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني كنتُ أُريتُ ليلة القدر، ثم نسيتُها، وهي في العشر الأواخر من ليلتها، وهي ليلة طلقة بلجة، لا حارة ولا باردة".
وزاد الزيادي:"كأنّ فيها قمرًا يفضح كواكبها. وقالا: لا يخرج شيطانُها حتى يضيء فجرها".
حسن: رواه ابن خزيمة (2190) وعنه ابن حبان (3688) عن محمد بن زياد بن عبيد الله الزيادي، ومحمد بن موسى الحرشي، قالا: حدّثنا الفضيل بن سليمان، حدّثنا عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الفضيل بن سليمان وهو النميري فقد تكلم فيه أكثر أهل العلم إلا أنه يكتب حديثه كما قال أبو حاتم. يعني للاعتبار في الشواهد، وهذا منه، وقد انتقى البخاري رحمه الله من حديثه مما توبع عليه.
وفي الباب ما رُوي عن عبادة بن الصامت أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ليلة القدر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"في رمضان، فالتمسوها في العشر الأواخر، فإنها في وتر: في إحدى وعشرين، أو ثلاث وعشرين، أو خمس وعشرين، أو سبع وعشرين، أو في آخر الليلة. فمن قامها ابتغاءها إيمانا واحتسابًا، ثم وقّفتْ له، غفر له ما تقدّم من ذنبه وما تأخّر" إلا أنه ضعيف.
رواه الإمام أحمد (22713) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، قال: حدّثنا سعيد بن سلمة -يعني ابن أبي الحسام-، حدّثنا عبد الله بن محمد بن عقيل، عن عمر بن عبد الرحمن، عن عبادة بن الصامت، فذكره.
وعمر بن عبد الرحمن، ذكره ابن حبان في"الثقات" ولم يوثقه غيره وله ترجمة في"التاريخ
الكبير"، و"الجرح والتعديل". ولكن لم يذكر فيه البخاري ولا ابن أبي حاتم شيئًا لا جرحًا ولا
تعديلًا فهو في عداد المجهولين. ولم يرو عنه غير عبد الله بن محمد بن عقيل.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (22765) عن حيوة بن شريح، حدّثنا بقية، حدثني بحير بن سعد،
عن خالد بن معدان، عن عبادة بن الصامت، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ليلة القدر في العشر البواقي،
من قامهن ابتغاء حسبتهن فإن الله يغفر له ما تقدّم من ذنبه وما تأخر، وهي ليلة وتر: تسع، أو سبع،
أو خامسة، أو ثالثة، أو آخر ليلة".
وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ أمارة ليلة القدر أنها صافية بَلْجة، كأنّ فيها قمرًا ساطعًا ساكنة
ساجية، لا برد فيها ولا حرَّ، ولا يحل لكوكب أن يُرمي به فيها حتى يصبح، وإنّ أمارتها أن
الشمس صبيحتها تخرج مستوية، ليس لها شعاع مثل القمر ليلة البدر، لا يحل للشيطان أن يخرج
معها يومئذ".
وبقية هو ابن الوليد، وقد صرَّح بالتحديث في أول الإسناد وهو يكفي على رأي الجمهور. وفيه
خالد بن معدان لم يسمع من عبادة بن الصامت، قال أبو حاتم كما في المراسيل (183) وقال أبو
نعيم: لم يلق عبادة بن الصّامت. كما في"تهذيب الكمال".
وله إسناد آخر وهو ما رواه يعقوب بن سفيان (1/ 386)، والبيهقي في"الشعب" (3420) من
طريق إسحاق بن سليمان الرازي، قال: سمعت معاوية بن يحيى، عن الزهريّ، عن محمد بن
عبادة، عن عبادة بن الصامت به.
قال البيهقي:"في هذا الإسناد ضعف".
قلت: لعله يقصد به معاوية بن يحيى وهو الصدفي أبو روح الدمشقي. فإنه ضعيف جدًّا. قال
يحيى: هالك ليس بشيء. وقال الجوزجاني: ذاهب الحديث. وقال أبو زرعة: ليس بقوي،
أحاديثه كلها منكرة ما حدّث بالرّيِّ، والذي حدّث بالشام أحسن حالًا. وضعّفه أيضًا عدد من أهل
العلم.
وفي الباب أيضًا عن ابن عباس. رواه ابن خزيمة (2192) بلفظ:"ليلة طلقة لا حارة ولا
باردة، تُصبح الشمس يومها حمراء ضعيفة".
رواه من طريق زمعة، عن سلمة -وهو ابن وهرام-، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ومن طريقه رواه أيضًا البزار -كشف الأستار (1034) - إلا أنه لم يذكر فيه:"تصبح الشمس
يومها …".
قال البزار: سلمة بن وهرام لا نعلم حدث عنه غير ابنه عبيد الله وزمعة، وهو من أهل اليمن لا
بأس به، وأحاديثه عن ابن عباس غرائب. ولا نعلم هذا بهذا اللفظ إلّا من حديثه.
قلت: وزمعة هو ابن صالح الجنديّ -بفتح الجيم والنون- ضعيف عند جمهور أهل العلم،
وحديثه عند مسلم مقرون.
وشيخه سلمة بن وهرام مختلف فيه فوثقه أبو زرعة، وضعّفه أبو داود، وهو حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমাকে লাইলাতুল ক্বদর দেখানো হয়েছিল, অতঃপর আমি তা ভুলে গেছি। এটি (রমজানের) শেষ দশকে (শেষ দশকের রাতের মধ্যে) রয়েছে। এটি একটি নির্মল, ঝলমলে রাত, যা উষ্ণও নয় এবং শীতলও নয়।" আর আল-যিয়াদি অতিরিক্ত বলেছেন: "যেন তাতে এমন চাঁদ থাকে যা তার নক্ষত্রগুলোকে ম্লান করে দেয়। এবং তারা দুজন (বর্ণনাকারী) বলেছেন: এর শয়তান এর ভোর আলোকিত না হওয়া পর্যন্ত বের হয় না।"
4537 - عن عائشة، قالت: قلتُ: يا رسول الله، أرأيتَ إن علمتُ ليلة القدر ما أقول فيها؟ قال:"قولي: اللهمّ! إنّك عفوٌّ تحبُّ العفوَ فاعفُ عنّي".
صحيح: رواه الترمذي (3513)، وابن ماجه (3850) كلاهما من حديث كهمس بن الحسن، عن عبد الله بن بريدة، عن عائشة، فذكرته.
ورواه الإمام أحمد (25384)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (872) (873) (874)، والحاكم (1/ 530)، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (113) كلّهم من هذا الطريق.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وقال الترمذي:"حسن صحيح" وصحّحه النووي في"الأذكار". ولكن قال النسائي:"مرسل".
ونقل الدارقطني في"السنن" (3557) في كتاب النكاح عن عبد الله بن بريدة، عن عائشة، قالت: جاءت امرأة تريد رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم تلقه، فجلستْ تنتظره حتى جاء …".
وقال:"هذه كلّها مراسيل، ابن بريدة لم يسمع من عائشة".
هكذا نقله عنه أيضًا ابن حجر في"تهذيب التهذيب"، وفي"إتحاف المهرة" وجاء في المطبوعة في آخره:"شيئًا".
وذكر الدارقطنيّ في"العلل" (3860) حديث الباب وذكر الخلاف الذي وقع في إسناده، ولم يحكم عليه بالإرسال أو الانقطاع. وإنما قال فقط:"الصحيح عن ابن بريدة، عن عائشة".
ثم رواه أيضًا سليمان بن بريدة عن عائشة، فذكرت مثله.
رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (877) من وجه آخر عن سفيان الثوري، عن علقمة بن مرثد، عنه، وقد رُوي أيضًا عنها موقوفًا من وجه آخر بإسناد صحيح.
وبمجموع هذه الأسانيد يحسّن هذا الحديث، وقد سبق أن صحّحه الترمذي، وبناء عليه ردّ الحافظ ابن حجر دعوى عدم سماع عبد الله بن بريدة من عائشة. والله تعالى أعلم
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! যদি আমি জানতে পারি যে কোনটি লাইলাতুল কদর (কদরের রাত), তাহলে আমি তাতে কী বলব? তিনি বললেন: তুমি বলো: "আল্লাহুম্মা ইন্নাকা 'আফুওউন তুহিব্বুল 'আফওয়া ফা'ফু 'আন্নী" (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আপনি ক্ষমাশীল, আপনি ক্ষমা করতে ভালোবাসেন, সুতরাং আমাকে ক্ষমা করে দিন)।
4538 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أُريتُ ليلة القدر، ثم أيقظني بعضُ أهلي، فنُسِّيتُها، فالتمسوها في العشْر الغوابر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1166) من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره.
قوله:"الغوابر" يعني البواقي، وهي الأواخر.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে লাইলাতুল কদর দেখানো হয়েছিল, অতঃপর আমার পরিবারের কেউ আমাকে জাগিয়ে তুলল, ফলে আমি তা ভুলিয়ে গেলাম। সুতরাং তোমরা তা অবশিষ্ট দশকে তালাশ করো।"
4539 - عن ابن عمر، قال: وكان الناس لا يزالون يقصون على النبيّ صلى الله عليه وسلم الرؤيا: أنّها في الليلة السابعة من العشر الأواخر، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"أرى رؤياكم قد تواطت في العشر الأواخر، فمن كان متحريها فليتحرّها من العشر الأواخر".
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1158)، ومسلم في فضائل الصحابة (2478) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
واللفظ للبخاريّ، فإنه ذكر تحت هذا الإسناد ثلاثة أحاديث، وهذا منها. ولم يذكر مسلمٌ تحت هذا الإسناد إلا حديثًا واحدًا غير هذا، وستأتي في فضائل ابن عمر.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, লোকেরা সর্বদা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে স্বপ্ন বর্ণনা করত যে, (শবে কদর) শেষ দশ দিনের সপ্তম রাতে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি দেখছি তোমাদের স্বপ্ন শেষ দশকে ঐক্যবদ্ধ (বা অভিন্ন ইঙ্গিতবাহী)। তাই যে ব্যক্তি এর সন্ধান করতে চায়, সে যেন শেষ দশকেই এর সন্ধান করে।"
4540 - عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من كان منكم مُلتمسها، فليلتمسها في العشر الأواخر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1165: 210) عن محمد بن المثني، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن جبلة، قال: سمعت ابن عمر يقول (فذكر الحديث).
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি এর (কদরের রাতের) সন্ধান করতে চায়, সে যেন তা শেষ দশকে তালাশ করে।"
4541 - عن الفلتان بن عاصم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني رأيت ليلة القدر، ثم أنسيتها، ورأيتُ مسيح الضّلالة، ورأيت رجلين يتلاحيان، فحجزت بينهما، فأنسيتُهما. فأمّا ليلة القدر فاطلبوها في العشر الأواخر. وأما مسيح الضلالة فرجل أجلى الجبهة، ممسوح العين اليسرى، عريض النحر فيه دفأ كأنه فلان بن عبد العزّى، أو عبد العزّي بن فلان".
حسن: رواه أبو بكر بن أبي شيبة في"مسنده" -المطالب العالية (1115) -، حدثنا عبد الله بن إدريس، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن خاله الفلتان بن عاصم، فذكره.
ومن طريقه أخرجه الطبراني في"الكبير" (18/ 335).
وإسناده حسن من أجل عاصم وأبيه فهما صدوقان.
والحديث أخرجه أيضًا الطبراني، وأبو القاسم البغوي، وابن السكن، وابن شاهين، وغيرهم من طرق عن عاصم بن كليب، به، نحوه.
ذكره الحافظ في"الإصابة" (3/ 209) في ترجمة (الفلتان بن عاصم).
আল-ফালতান ইবনে আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কদরের রাত (লাইলাতুল কদর) দেখেছি, এরপর আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। আমি ভ্রষ্টতার মসীহকে (মাসিহুদ দালালাহ) দেখেছি এবং দুজন লোককে ঝগড়া করতে দেখেছি। আমি তাদের মাঝে মীমাংসা করে দিয়েছি, ফলে আমাকে তাদের (নাম বা পরিচয়) ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং, কদরের রাত তোমরা শেষ দশকে অনুসন্ধান করো। আর ভ্রষ্টতার মসীহ হল এমন এক ব্যক্তি, যার কপাল প্রশস্ত, বাম চোখ নিশ্চিহ্ন (বা মোছা), প্রশস্ত বক্ষবিশিষ্ট এবং এতে উষ্ণতা (বা স্থূলতা) রয়েছে। সে যেন অমুক ইবনে আব্দুল উযযা, অথবা আব্দুল উযযা ইবনে অমুক।"
4542 - عن جابر بن سمرة، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"التمسوا ليلة القدر في العشر الأواخر".
حسن: رواه الإمام أحمد (20809) عن سليمان بن داود، عن شريك، عن سماك، عن جابر ابن سمرة، فذكره. وشريك هو ابن عبد الله القاضي سيء الحفظ إلا أنه توبع.
رواه ابن أبي شيبة (2/ 513) عن عمرو بن طلحة، عن أسباط بن نصر، عن سماك بن حرب، بإسناده، مثله.
وأسباط بن نصر لا بأس به في المتابعة، وقد قال فيه البخاري:"صدوق".
ورواه عبد الله بن أحمد (20930)، والبزار -كشف الأستار (1031) - كلاهما من طريق عبد الرحمن بن شريك، قال: حدثني أبي، عن سماك، بإسناده، مثله. وزاد:"في وتر، فإني قد رأيتها فنُسيتُها، وهي ليلة مطر وريح" أو قال:"قطر وريح".
وعبد الرحمن بن شريك أسوأ من أبيه، قال فيه أبو حاتم: واهي الحديث. ومع ذلك ذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 375) ولكن قال فيه: ربما أخطأ.
ورواه الطبراني في"المعجم الصغير" (285) من وجه آخر عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: وجدتُ في كتاب أبي بخطّه، حدثنا شعبة، عن سماك بن حرب، بإسناده، بلفظ:"التمسوا ليلة القدر، ليلة سبع وعشرين".
قال الطبراني: لم يروه عن شعبة إلا محمد بن أبي شيبة.
قلت: ووالد أبي بكر بن أبي شيبة هو محمد بن إبراهيم بن عثمان العبسيّ مولاهم الكوفي"ثقة".
فلا يضرّ تفرّده لشهرة هذا الحديث من حديث شعبة كما مضى.
জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা লাইলাতুল কদরকে শেষ দশ রাতের মধ্যে অনুসন্ধান করো।"
4543 - عن معاذ بن جبل، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن ليلة القدر، فقال:"هي في العشر الأواخر، أو في الخامسة، أو في الثالثة".
حسن: رواه أحمد (22043)، والطبراني في"الكبير" (20/ 92) من حديث بقية بن الوليد، حدثني بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي بحرية، عن معاذ بن جبل، فذكره.
وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد فإنه صدوق إذا صرَّح، وإلا فهو كثير التدليس عن الضعفاء.
وقد صرَّح في رواية أحمد، وقد اشترط بعض أهل العلم التصريح في جميع طبقات السند، والجمهور على أنه يقبل إذا صرّح في طبقة شيوخه.
وأبو بحرية اسمه عبد الله بن قيس الكندي الحمصي، ثقة، وهو مشهور بكنيته.
وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أقبل إليهم مسرعًا، قال: حتى أفزعنا من سرعته، فلما انتهى إلينا، قال:"جئتُ مسرعًا أخبركم بليلة القدر فأْنسيتُها بيني وبينكم، ولكن التمسوها في العشر الأواخر من رمضان".
رواه الإمام أحمد (2352)، والطبراني في الكبير (12621) كلاهما من طريق قابوس بن أبي
ظبيان، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.
وقابوس مختلف فيه، وأكثر أهل العلم على أنه ضعيف، حتى قال ابن حبان:"ينفرد عن أبيه بما لا أصل له".
قلت: ليس كما قال، فإنّ هذا الحديث له شواهد كثيرة كما مضى إلا قوله:"فأنسيتُها بيني وبينكم". وأما أبو ظبيان فهو حصين بن جندب الجنبي الكوفي من رجال الجماعة.
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লাইলাতুল কদর সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "তা (রমাদানের) শেষ দশ দিনে, অথবা পাঁচ দিনে, অথবা তিন দিনে।"
4544 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"تحرّوا ليلة القدر في الوِتْر من العشر الأواخر من رمضان".
متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2017) من طريق أبي سُهيل، عن أبيه، عن عائشة. وأبو سهيل هو نافع بن مالك بن أبي عامر الأصبحيّ.
ورواه أيضًا (2020) هو ومسلم في الصيام (1169) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجاورُ في العشر الأواخر من رمضان ويقول:"تحرَّوا ليلة القدْر في العشر الأواخر من رمضان" واللفظ للبخاري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা রমাদানের শেষ দশ দিনের বেজোড় রাতগুলোতে শবে কদর সন্ধান করো।"
তিনি (আয়িশা) আরও বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন এবং বলতেন: "তোমরা রমাদানের শেষ দশকে শবে কদর সন্ধান করো।"
4545 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يعتكفُ العشْر الوسط من رمضان، فاعتكف عامًا، حتى إذا كان ليلةَ إحدى وعشرين. وهي التي يخرجُ فيها من صُبحها من اعتكافه. قال:"من اعتكف معي فليعتكف العشر الأواخر. وقد رأيت هذه الليلة، ثم أُنْسيتُها. وقد رأيتُني أسجدُ من صبحها في ماء وطين. فالتَمسوها في العشر الأواخر، والتمسوها في كلِّ وِتْر".
قال أبو سعيد: فأُمطرت السماءُ تلك الليلة، وكان المسجدُ على عريشٍ، فوكف المسجدُ. قال أبو سعيد: فأبصرت عينايَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم انصرف وعلى جبهته وأنفه أثرُ الماء والطين: من صبح ليلة إحدى وعشرين.
متفق عليه: رواه مالك في الاعتكاف (9) عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم ابن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي سعيد، فذكره.
ورواه البخاري في الاعتكاف (2027) عن مالك.
وروياه -البخاري (813)، ومسلم (1167: 216) - كلاهما من حديث يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد، فذكره.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের মধ্যবর্তী দশকে ই'তিকাফ করতেন। তিনি একবার ই'তিকাফে বসেন। এরপর যখন একুশতম রাত এলো—যে রাতের পরদিন সকালে তিনি ই'তিকাফ শেষ করে বের হতেন—তিনি বললেন, "যে ব্যক্তি আমার সাথে ই'তিকাফ করেছে, সে যেন শেষ দশকেও ই'তিকাফ করে। আমি এই রাতটি (ক্বদরের রাত) দেখেছিলাম, কিন্তু পরে আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। আমি নিজেকে এই রাতের পরদিন সকালে পানি ও কাদার মধ্যে সিজদা করতে দেখেছি। সুতরাং তোমরা শেষ দশকে তা (লাইলাতুল ক্বদর) সন্ধান করো, আর প্রতিটি বিজোড় রাতে তা তালাশ করো।"
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সেই রাতে আকাশ থেকে বৃষ্টি বর্ষিত হলো। মসজিদটি ছিল খেজুর ডালের ছাউনিযুক্ত, ফলে মসজিদের ছাদ চুইয়ে পানি পড়ছিল। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার চোখ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছিল, যখন তিনি (ফজরের সালাত শেষে) ফিরলেন, তখন তাঁর কপাল ও নাকের ওপর পানি ও কাদার চিহ্ন লেগে ছিল। এই ঘটনাটি ছিল একুশতম রাতের সকালের।
4546 - عن ابن عمر، قال: رأى رجلٌ أنّ ليلة القدر ليلة سبع وعشرين. فقال النبيُّ
- صلى الله عليه وسلم:"أرى رؤياكم في العشر الأواخر، فاطلبوها في الوتر منها".
متفق عليه: رواه مسلم في الصيام (1165: 207) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن الزهريّ، عن سالم، عن أبيه، فذكره.
ورواه البخاريّ في التعبير (6991) من طريق عُقيل، عن ابن شهاب، بلفظ: أنّ ناسًا أُروا ليلة القدر في السبع الأواخر، وأنّ أناسًا أُروا أنها في العشر الأواخر، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"التمسوها في السّبع الأواخر" ولم يذكر فيه"الوتر".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি স্বপ্নে দেখল যে, কদরের রাত হলো সাতাশতম রাত। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি তোমাদের স্বপ্নগুলোকে শেষ দশকেই (ঐকমত্যে আসতে) দেখছি। সুতরাং তোমরা সেই দশকের বেজোড় রাতগুলিতে তা তালাশ করো।”
4547 - عن أبي بكرة، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"التمسوها في تسع بقين، أو سبع بقين، أو خمس بقين، أو في ثلاث أواخر ليلة".
حسن: رواه الترمذي (794) عن حُميد بن مسعدة، حدثنا يزيد بن زريع، حدثنا عيينة بن عبد الرحمن، قال: حدثني أبي، قال: ذُكرتْ ليلة القدر عند أبي بكرة، قال: ما أنا ملتمسها لشيء سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم إلّا في العشر الأواخر، فإني سمعته يقول (فذكر الحديث).
وإسناده حسن. وقد رواه الإمام أحمد (20376)، وأبو داود الطيالسي (922)، وصحّحه ابن خزيمة (2175)، وعنه ابن حبان (3686)، والحاكم (1/ 438) كلهم من وجه آخر عن عيينة بن عبد الرحمن بإسناده، نحوه. وزاد بعضهم في آخر الحديث:"فكان لا يصلي في العشرين إلا كصلاته في سائر السنة، فإذا دخل العشر اجتهد". قال الترمذي: حسن صحيح.
قلت: فيه عيينة بن عبد الرحمن وهو ابن جوشن الغطفاني"صدوق" كما في"التقريب"، وثقه النسائي، وقال أحمد: ليس به بأس.
وأبوه عبد الرحمن بن جوشن الغطفاني أحسن حالًا منه، وثّقه أبو زرعة وابن سعد والعجلي وابن حبان. وقال أحمد:"ليس بالمشهور".
قلت: لأنه لم يذكر من الرواة عنه غير ابنه عيينة. وله أحاديث كثيرة يرويها عن أبي بكرة وغيره، فسبر أهل العلم هذه الأحاديث فلم يجدوا فيها ما ينكر عليه فوثقوه.
আবু বকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "তোমরা তা (লাইলাতুল কদর) তালাশ করো যখন নয় রাত বাকি থাকে, অথবা সাত রাত বাকি থাকে, অথবা পাঁচ রাত বাকি থাকে, অথবা শেষ তিন রাতের মধ্যে।"
