হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4508)


4508 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تسابَّ وأنتَ صائمٌ، وإن سابَّك أحدٌ فقُلْ: إنِّي صائمٌ، وإنْ كنتَ قائمًا فاجلسْ".

حسن: رواه ابن خزيمة (1994) وعنه ابن حبَّان (3483) عن محمد بن بشار، ثنا عثمان بن عمر، أخبرنا ابن أبي ذئب، عن عجلان مولي المشْمَعِل، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عجلان مولى المشمعل فإنه حسن الحديث.

ورواه الإمام أحمد (9532) عن يحيى بن سعيد، عن ابن أبي ذئب، بإسناده ولم يذكر فيه:"وإن كنت قائمًا فاجلس".
وهي زيادة صحيحة، فقد تابع عثمان بن عمر أبو داود الطيالسي (3259)، والنسائي في"الكبرى" (3259) من طريق ابن المبارك.

ويزيد هو ابن هارون، وأبو عامر وهو عبد الملك بن عمرو العقدي شيخا أحمد (10564) كلّهم عن ابن أبي ذئب، فلعل يحيى بن سعيد اختصره. وهي سنة عزيزة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রোযা অবস্থায় তুমি কাউকে গালিগালাজ করো না। যদি কেউ তোমাকে গালি দেয়, তবে তুমি বলো: আমি রোযাদার। আর যদি তুমি দাঁড়ানো অবস্থায় থাকো, তাহলে বসে পড়ো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4509)


4509 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لم يدع قول الزّور والعملَ به، فليس الله حاجة في أن يدع طعامه وشرابه".

وزاد في رواية:"والجهل".

صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1903) عن آدم بن أبي إياس، حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب، حَدَّثَنَا سعيد المقبريّ، عن أبيه، عن أبي هريرة.

والرّواية الأخرى في الأدب (6057) عن أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب، به.

قوله:"قول الزُّور" أي الكذب.

"والجهل" أي السَّفه.

"والعمل به" أي بمقتضاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মিথ্যা কথা এবং সে অনুযায়ী কাজ পরিত্যাগ করে না, তার পানাহার বর্জনে আল্লাহর কোনো প্রয়োজন নেই।" (অন্য এক বর্ণনায় 'এবং মূর্খতার কাজ' অতিরিক্ত উল্লেখ করা হয়েছে।)









আল-জামি` আল-কামিল (4510)


4510 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ربّ صائم ليس له من صيامه إِلَّا الجوع، وربّ قائم ليس له من قيامه إِلَّا السَّهر".

حسن: رواه ابن ماجه (1690) عن عمرو بن رافع، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن المبارك، عن أسامة ابن زيد، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، قال (فذكره).

وإسناده حسن من أجل الكلام في أسامة بن زيد وهو الليثيّ، فإنه مختلف فيه وكان يخطئ كثيرًا غير أنه حسن الحديث.

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (9685)، وقد تابعه عمرو بن أبي عمرو، عن سعيد المقبريّ.

رواه ابن حبَّان (3481)، والبيهقي (4/ 270) من طريقه.

ورواه أبو يعلى (6551)، وابن خزيمة (1997)، والحاكم (1/ 431) فقالوا: عمرو بن أبي عمرو، عن أبي سعيد المقبريّ.

وعمرو بن أبي عمرو - واسمه ميسرة مولى المطلب بن عبد الله بن حنطب، وثَّقه ابن معين وأحمد، وقال أبو حاتم: صدوق.

فهو متابع قوي لأسامة بن زيد، وهو يرُوي عن سعيد، وأبيه أبي سعيد واسمه كيسان.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “অনেক রোযাদার এমন আছে, যার রোযা থেকে ক্ষুধা ছাড়া আর কিছুই লাভ হয় না। আর অনেক রাত জাগরণকারী (ইবাদতকারী) এমন আছে, যার রাত জাগরণ থেকে বিনিদ্রা (জেগে থাকা) ছাড়া আর কিছুই লাভ হয় না।”









আল-জামি` আল-কামিল (4511)


4511 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس الصيام من الأكل والشرب، إنّما الصيام من اللغو والرفث. فإن سابّك أحدٌ أو جهل عليك، فلتقلْ: إنِي صائم،
إني صائم".

حسن: رواه ابن خزيمة (1996)، وابن حبَّان (3479)، والحاكم (1/ 430 - 431)، والبيهقي (4/ 270) كلّهم من حديث الحارث بن عبد الرحمن، عن عمّه، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

وعمّ الحارث هو عبد الله بن المغيرة بن أبي ذباب كما قال ابن حبَّان. وذكره في"ثقاته" (5/ 304) إِلَّا أن مسلمًا لم يخرج له كما قال الحاكم.

وقيل: عمّه اسمه الحارث أيضًا. وقيل: اسمه عياض كما سمّاه ابن منده. وذكره في الصّحابة.

انظر: تهذيب التهذيب (1/ 148).

وفي الباب عن عبيد مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ امرأتين صامتا وإنَّ رجلًا قال: يا رسول الله، إنَّ هاهنا امرأتين قد صامتا، وإنهما قد كادتا أن تموتا من العطش! فأعرض عنه أو سكت، ثمّ عاد - وأُراه قال: بالهاجرة- قال: يا نبي الله، إنَّهما والله! قد ماتا أو كادتا أن تموتا! قال:"ادْعُهما". قال: فجاءنا، قال: فجيء بقدح أو عُسٍّ. فقال لإحداهما:"قيتي". فقاءت قيحًا ودمًا وصديدًا ولحمًا، حتّى قاءت نصف القَدَح. ثمّ قال للأخرى:"قيئي" فقاءت من قيح ودم وصديد ولحم عبيط وغيره حتّى ملأت القَدَح. ثمّ قال:"إنَّ هاتين صامتا عمَّا أحلَّ الله لهما، وأفطرنا على ما حرَّم الله عليهما، جلستْ إحداهما إلى الأخرى، فجعلتها تأكلان لحومَ النَّاس".

رواه الإمام أحمد (23653) عن يزيد، أخبرنا سليمان وابن عديّ، عن سليمان -المعنى-، عن رجل حدّثهم في مجلس أبي عثمان النهديّ.

قال ابن عدي: عن شيخ في مجلس أبي عثمان، عن عبيد، فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل رجل لم يُسم.

وأمّا ما رواه أبو يعلى (1576) من طريق حمّاد بن سلمة، عن سليمان -هو ابن طرخان التيمي-، عن عبيد. فسقط منه الرّجل، وظاهره يوهم الاتصال.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"ربَّ صائم حظّه من صيامه الجوع والعطش، ورب قائم حظّه من قيامه السّهر".

رواه الطبرانيّ في"الكبير" (13/ 382) من حديث موسي بن أيوب النصيبيّ، ثنا بقية بن الوليد، عن معاوية بن يحيى، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وفيه بقية بن الوليد مدلِّس تدليس التسوية.



رواه أبو داود (2356)، والترمذي (725)، والإمام أحمد (15678)، والبيهقي (4/ 272) كلّهم من حديث عاصم بن عبيد الله، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه، فذكره.

وعلقه البخاريّ بصيغة التمريض. قال الترمذي:"حسن".

قلت: ليس بحسن؛ فإنّ عاصم بن عبيد الله بن عاصم بن عمر بن الخطاب العدوي المدني ضعيف باتفاق أهل العلم.

ورواه ابن خزيمة (2007) من حديث سفيان، عن عاصم بن عبيد الله، به. مثله، ثم قال:"وأنا بريء من عهدة عاصم، سمعت محمد بن يحيى يقول: عاصم بن عبيد الله ليس عليه قياس". ثم قال ابن خزيمة:"سمعت مسلم بن الحجاج يقول: سألنا يحيى بن معين، فقلنا: عبد الله بن محمد بن عقيل أحبّ إليك أم عاصم بن عبيد الله؟ قال: لستُ أحبُّ واحدًا منهما".

ثم قال ابن خزيمة:"كنتُ لا أخرج حديث عاصم بن عبيد الله في هذا الكتاب، ثم نظرتُ فإذا شعبة والثوري قد رويا عنه، ويحيى بن سعيد وعبد الرحمن بن مهدي وهما إماما أهل زمانهما قد رويا عن الثوري عنه. وقد روي عنه مالك خبرًا في غير الموطأ" انتهى.

قلت: رواية هؤلاء الأئمة عن شخص لا يعني في جميع أحواله توثيقًا له، فإنهم قد رووا عنه للاعتبار أو للبيان؛ ولذا قال شعبة -وقد روي عن عاصم بن عبيد الله-: كان عاصم لو قيل له: من بني مسجد البصرة؟ لقال: عن فلان، عن فلان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه بناه". وفيه إشارة إلى أنه كان يتعمّد.

وقال أحمد: كان ابن عيينة يقول: كان الأشياخ يتقون حديث عاصم. وقال علي بن المديني: سمعت عبد الرحمن بن مهدي ينكر حديثه أشد الإنكار، وتكلم فيه الإمام أحمد والنسائي والدارقطني والجوزجاني وابن حبان وغيرهم. وقال البيهقي عقب الحديث:"عاصم بن عبيد الله ليس بالقوي". واضطرب الحافظ في الحكم على حديث عامر بن ربيعة في التلخيص فقال مرة (1/ 62): إسناده حسن.

وقال في موضع آخر (ص 68):"فيه عاصم بن عبد الله، وهو ضعيف".

لكن عموم أدلة استحباب السواك عند كلّ صلاة شامل للمفطر والصائم؛ لقول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشقّ على أمّتي لأمرتهم بالسواك عند كلّ صلاة".

قال ابن خزيمة (3/ 247):"لم يستثن مفطرًا دون صائم، ففيها دلالة على أنّ السواك للصائم عند كلّ صلاة فضيلة فهو كالمفطر".

قال الترمذي عقب تخريج الحديث والحكم عليه بالحسن:"والعمل على هذا عند أهل العلم، لا يرون بالسواك للصائم بأسًا آخر النهار، ولم ير الشافعي بالسواك بأسًا أول النهار ولا آخره. وكره أحمد وإسحاق السواك آخر النهار".

ونقل ابن حجر في"التلخيص" مثل قول الشافعي: لا بأس بالسواك للصائم أول النهار
وآخره. فقال:"وهذا اختيار أبي شامة، وابن عبد السلام، والنووي. وقال: إنه قول أكثر العلماء، ومنهم المزني".

قلت: وهو اختيارات شيخ الإسلام ابن تيمية كما نقل عنه البعلي الدمشقي في"الاختيارات الفقهية" (ص 20)، فقال:"وهو في جميع الأوقات مستحب، والأصح ولو للصائم بعد الزوال، وهو رواية عن أحمد، وقاله مالك وغيره".

وفي الباب أحاديث أخرى ذكرها ابن الملقن في"البدر المنير" ولم يصح منها شيء.




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "রোজা শুধু পানাহার থেকে বিরত থাকার নাম নয়, বরং রোজা হলো অনর্থক কথা ও অশ্লীলতা থেকে বিরত থাকা। যদি কেউ তোমাকে গালি দেয় বা তোমার সাথে মূর্খের মতো আচরণ করে, তবে তুমি বলো: 'আমি রোজা রেখেছি, আমি রোজা রেখেছি'।"









আল-জামি` আল-কামিল (4512)


4512 - عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر الناس في سفره عام الفتح بالفطر. وقال:"تقوّوا لعدوّكم" وصام رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال أبو بكر: قال الذي حدّثني: لقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعَرْج يصُبُّ الماء على رأسه من العطش أو من الحرّ. ثم قيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنّ طائفةً من الناس قد صاموا حين صُمتَ. قال: فلما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم بالكَديد دعا بقَدَح فشرب، فأفطر النّاسُ.

صحيح: رواه مالك في الصيام (22) عن سُميٍّ مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ورواه أبو داود (2365)، والنسائي في الكبرى (3017)، وأحمد (15903)، والحاكم (1/ 432) كلّهم من حديث مالك، به، مثله إلا أنّ النسائي. رواه مختصرًا.

ورواه الحاكم من وجهين: عبد الصمد بن الفضل وإسحاق بن الهياج كلاهما عن محمد بن نعيم السعدي، ثنا مالك بن أنس، عن سمي، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال:"رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعرج يصبّ على رأسه الماء من الحرّ وهو صائم".

قال الحاكم:"هذا حديث له أصل في الموطأ، فإن كان محمد بن نُعيم حفظه هكذا، فإنه صحيح على شرط الشيخين".

قال الحافظ في"اللسان" في ترجمة إسحاق بن الهياج البلخي، عن محمد بن نعيم السعديّ البصريّ … قال الدارقطني: وهم فيه في موضعين. وهو في"الموطأ" عن مالك، عن سمي، عن أبي بكر، عن بعض الصحابة غير مسمى".

وقال الحافظ ابن عبد البر في"التمهيد" (22/ 47):"هذا حديث مسند صحيح، ولا فرق بين أن يسمي التابعُ الصاحبَ الذي حدّثه أو لا يسميه في وجوب العمل بحديثه؛ لأنّ الصحابة كلّهم
عدول مرضيون، ثقات أثبات. وهذا أمر مجتمع عليه عند أهل العلم بالحديث".




আবূ বাকর ইবনু আব্দুর রহমান থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কোনো কোনো সাহাবী থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের বছর সফরের সময় লোকদেরকে রোজা ভেঙে ফেলতে নির্দেশ দেন। তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের শত্রুদের মুকাবিলার জন্য শক্তি সঞ্চয় করো।" আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রোজা রেখেছিলেন। আবূ বাকর বললেন: যিনি আমাকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: আমি দেখেছি যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'আল-আরজ' নামক স্থানে তৃষ্ণা অথবা গরমের কারণে তাঁর মাথার ওপর পানি ঢালছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি রোজা রাখায় কিছু লোক রোজা রেখেছে। তিনি বললেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন 'আল-কাদীদ' নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন এক পেয়ালা চাইলেন এবং তা পান করলেন। ফলে লোকেরাও রোজা ভেঙে ফেলল।









আল-জামি` আল-কামিল (4513)


4513 - عن لقيط بن صبرة، قال: قلت: يا رسول الله، أخبرني عن الوضوء؟ قال:"أسبغ الوضوء وخلِّل بين الأصابع، وبالغ في الاستنشاق إلا أن تكون صائمًا".

صحيح: رواه أبو داود (2366)، والترمذي (788)، والنسائي (87)، وابن ماجه (407) كلّهم من حديث يحيى بن سُليم، قال: حدثني إسماعيل بن كثير، قال: سمعت عاصم بن لقيط بن صبرة، عن أبيه، فذكره مطوّلًا، ومختصرًا.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

وصحّحه ابن خزيمة (150)، وابن حبان (1054)، والنووي في"المجموع" وغيرهم. وسبق تخريجه في كتاب الوضوء.




লুকাইত ইবনে সাবরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে ওযু সম্পর্কে বলুন। তিনি বললেন: "পূর্ণাঙ্গরূপে ওযু করো এবং আঙ্গুলসমূহের ফাঁকা স্থান খেলাল করো, আর নাকে পানি দেওয়ার ক্ষেত্রে ভালোভাবে গভীর পর্যন্ত পৌঁছাও (কুল্লি করো), তবে যদি তুমি রোযাদার হও (তাহলে বেশি করো না)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4514)


4514 - عن * *




৪৫১৪ - ...থেকে বর্ণিত।









আল-জামি` আল-কামিল (4515)


4515 - عن أبي هريرة، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

متفق عليه: رواه البخاريُّ في الإيمان (37)، ومسلم في صلاة المسافرين (759) كلاهما من حديث مالك، عن ابن شهاب، عن حميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره.

وحديث مالك عن ابن شهاب، عن حميد بن عبد الرحمن ليس في رواية يحيى الليثي. وقد أكّد ذلك ابن عبد البر في التمهيد (7/ 97).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, “যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় রমযানের রাতে দাঁড়িয়ে ইবাদত করে, তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (4516)


4516 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1901)، ومسلم في صلاة المسافرين (760) كلاهما من حديث هشام، حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره. بزيادة ليلة القدر.

وكذلك رواه يحيى بن سعيد، ومحمد بن عمرو:"من صام رمضان …" أخرج حديثهما ابن عبد البر في التمهيد (7/ 103 - 104).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় রমজানের রোযা পালন করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে। আর যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় কদরের রাতে (ইবাদতে) দাঁড়াবে, তারও পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4517)


4517 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرغّبُ في قيام رمضان من غير أن يأمر بعزيمة، فيقول:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

قال ابن شهاب: فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، والأمر على ذلك ثم كان الأمر على ذلك في خلافة أبي بكر، وصدرًا من خلافة عمر.

صحيح: رواه مالك في كتاب الصلاة في رمضان (2) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (759: 174) من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7719) وعنه أحمد (7787) وأصحاب السنن -غير ابن ماجه- قال: حدثنا معمر، عن الزهري،
عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

قوله:"فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم والأمر على ذلك" هو من قول الزهري كما في الموطأ. وكذلك قال البخاري في صلاة التراويح (2009) ولم يفصله مسلم، بل وقع عنده في نفس الخبر.

والصواب أنه مفصول من الحديث. ومعناه ترك الجماعة في صلاة التراويح.

قال ابن عبد البر:"وفي هذا الحديث من الفقه: فضل قيام رمضان، وظاهره يبيح فيه الجماعة والانفراد؛ لأنّ ذلك كله فعل خير".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসের রাত্রি জাগরণ (নামায) পালনে উৎসাহিত করতেন, তবে তা কঠোরভাবে আদেশ করতেন না। তিনি বলতেন: "যে ব্যক্তি ঈমান ও সওয়াবের আশায় রমযানের রাত্রি জাগরণ (নামায) করবে, তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"

ইবনু শিহাব (যুহরী) বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, আর বিষয়টি এভাবেই রইল (ঐচ্ছিক)। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম দিকেও বিষয়টি এভাবেই ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4518)


4518 - عن عائشة، قالت: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرغّب الناس في قيام رمضان من غير أن يأمرهم بعزيمة أمر فيه، فيقول:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

وفي رواية: خرج في جوف الليل يصلي في المسجد، وصلى بالناس" وساق الحديث. وجاء فيه:"وكان يرغبهم في قيام رمضان من غير أن يأمرهم بعزيمة ويقول:"من قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه". قال: فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم والأمر على ذلك.

صحيح: رواه النسائي (2192، 2193، 2195)، وصحّحه ابن خزيمة (2207)، وابن حبان (2543) من أوجه عن الزهري، أخبرني عروة بن الزبير، أنّ عائشة أخبرته، فذكرت الحديث.

وممن رواه عن الزهري أيضًا إبراهيم بن إسماعيل بن مجمع، ومالك كلاهما عن الزهري بهذا الإسناد، ذكره الدارقطني في العلل (3805) إلا أنه قال:"والمحفوظ عن الزهري، عن أبي سلمة وحميد عن أبي هريرة".

قلت: هذا هو الظاهر لاعتماد الشيخين له، ولكن لا يمنع أن يكون للزهري أوجه منها: عن عروة بن الزبير، عن عائشة.

وأما ما رُوي عن عبد الرحمن بن عوف، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الله تبارك وتعالى فرض صيام رمضان عليكم، وسننتُ لكم قيامه، فمن صامه وقامه إيمانًا واحتسابًا خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمُّه" فهو ضعيف.

رواه النسائي (2210)، وابن ماجه (1328) من طريق النضر بن شيبان، قال: قلت لأبي سلمة ابن عبد الرحمن: حدِّثني بشيء سمعته من أبيك، سمعه أبوك من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ليس بين أبيك وبين رسول الله صلى الله عليه وسلم أحدٌ في شهر رمضان. قال: نعم. حدثني أبي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم (فذكره) واللفظ للنسائي.

ورواه الإمام أحمد (1660) من طريق النضر بن شيبان، نحوه.

ورواه النسائي أيضًا (2208) بالإسناد نفسه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه ذكر شهر رمضان ففضّله على الشهور، وقال:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمُّه".
قال النسائي:"هذا خطأ، والصواب: أبو سلمة عن أبي هريرة".

قلت: يعني حديث الشيخين المتقدم قريبًا.

وكذلك قال البخاري:"لم يصح، وحديث الزهري وغيره عن أبي سلمة عن أبي هريرة أصح".

والحديث مداره على النضر بن شيبان، قال فيه ابن معين:"ليس حديثه بشيء".

وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"كان ممن يخطئ".

فتعقبه ابن حجر في"التهذيب" (10/ 438) بقوله:"فإذا كان أخطأ في حديثه وليس له غيره، فلا معنى لذكره في الثقات، إلا أن يقال هو في نفسه صادق وإنما غلط في اسم الصحابي فيتجه؛ لكن يردُ على هذا أن في بعض طرقه عنه:"لقيت أبا سلمة، فقلت له: حدثني بحديث سمعته من أبيك، وسمعه أبوك من النبيّ صلى الله عليه وسلم. فقال أبو سلمة: حدثني أبي، فذكره. وقد جزم جماعة من الأئمة بأنّ أبا سلمة لم يصح سماعه من أبيه، فتضعيف النضر على هذا متعيّن.

وقد قال ابن خراش: إنه لا يعرف بغير هذا الحديث. وأعلّه الدارقطني أيضًا بحديث أبي سلمة، عن أبي هريرة" اهـ كلام الحافظ.

قلت: وممن جزم بعدم سماعه من أبيه: علي بن المديني، وأحمد، وابن معين، والبخاري، وأبو حاتم، ويعقوب بن شيبة، وأبو داود. وقال أحمد: مات وهو صغير.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকদেরকে রমযান মাসের কিয়ামের (রাতের নামাযের) প্রতি উৎসাহিত করতেন, তবে তিনি কঠোরভাবে আবশ্যিক নির্দেশ দিতেন না। তিনি বলতেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের প্রত্যাশায় রমযান মাসে কিয়াম করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হবে।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের মধ্যভাগে বের হয়ে মসজিদে সালাত আদায় করেন এবং লোকেদের সাথে সালাত আদায় করেন। ... তাতে আরও এসেছে: তিনি তাদেরকে রমযান মাসের কিয়ামের প্রতি উৎসাহিত করতেন, তবে কঠোরভাবে আবশ্যিক নির্দেশ দিতেন না। তিনি বলতেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় কদরের রাতে কিয়াম (নামাজ) করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হবে।" রাবী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন এবং এই (ঐচ্ছিক উৎসাহ প্রদানের) বিষয়টি তেমনই বহাল রইল।









আল-জামি` আল-কামিল (4519)


4519 - عن عائشة أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى في المسجد ذات ليلة، فصلَّي بصلاته ناسٌ، ثم صلَّى الليلة القابلة فكثُر النّاس، ثم اجتمعوا من الليلة الثالثة أو الرابعة، فلم يخرج إليهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما أصبح قال:"قد رأيتُ الذي صنعتُم، ولم يمنعني من الخروج إليكم إلَّا أني خشيتُ أن تُفرض عليكم" وذلك في رمضان.

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة في رمضان (1) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (761: 177) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه البخاري في صلاة التراويح (2012) من طريق عقيل، ومسلم في صلاة المسافرين (761: 178) من طريق يونس بن عبيد، كلاهما عن الزهري، به، بسياق أطول.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতে মসজিদে সালাত আদায় করলেন। তাঁর সালাতের সাথে অনেক লোকও সালাত আদায় করল। এরপর তিনি পরের রাতে সালাত আদায় করলেন, তাতে লোকের সংখ্যা আরও বেড়ে গেল। অতঃপর তারা তৃতীয় বা চতুর্থ রাতে একত্রিত হলো, কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে বের হয়ে আসলেন না। যখন সকাল হলো, তখন তিনি বললেন: “তোমরা যা করেছ, তা আমি দেখেছি। তোমাদের কাছে বেরিয়ে আসতে আমাকে শুধু এই জিনিসটিই বাধা দিয়েছে যে, আমি ভয় পেয়েছিলাম—এটা তোমাদের উপর ফরয হয়ে যাবে।” আর এটা ছিল রমাযান মাসে।









আল-জামি` আল-কামিল (4520)


4520 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: كان الناس يصلون في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان باللّيل أوزاعًا يكون مع الرّجل شيء من القرآن فيكون معه النفر الخمسة أو الستة أو أقل من ذلك أو أكثر فيصلون بصلاته. قالت: فأمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم -
ليلة من ذلك أن أنصب له حصيرا على باب حجرتي ففعلت فخرج إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد أن صلى العشاء الآخرة. قالت: فاجتمع إليه من في المسجد فصلي بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلا طويلًا، ثم انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم فدخل وترك الحصير على حاله، فلما أصبح الناس تحدّثوا بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بمن كان معه في المسجد تلك الليلة. قالت: وأمسى المسجد راجّا بالناس، فصلّى بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء الآخرة، ثم دخل بيته وثبت الناس. قالت: فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما شأن الناس يا عائشة؟". قالت: فقلت له: يا رسول الله، سمع الناس بصلاتك البارحة بمن كان في المسجد فحشدوا لذلك لتصلى بهم. قالت: فقال:"أطوِ عنا حصيرك يا عائشة". قالت: ففعلت وبات رسول الله صلى الله عليه وسلم غير غافل، وثبت الناس مكانهم حتى خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الصبح. فقالت: فقال:"أيها الناس! أما والله! ما بِتُ -والحمد لله- ليلتي هذه غافلًا وما خفي عليَّ مكانكم ولكني تخوفت أن يفترض عليكم فاكلفوا من الأعمال ما تطيقون فإن الله لا يمل حتى تملوا".

قال: وكانت عائشة تقول: إنَّ أحبَّ الأعمال إلى الله أدومُها وإن قلَّ.

حسن: رواه الإمام أحمد (26307)، والطبراني في الأوسط (5277) كلاهما من حديث محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن عائشة، فذكرته.

قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن محمد بن إبراهيم التيمي إلا محمد بن إسحاق، تفرَّد به محمد بن سلمة الحراني.

قلت: ليس كما قال، فقد تابع محمد بن إسحاق محمد بن عمرو وهو الليثيّ في أصل القصة.

ومن طريقه رواه أبو داود (1374) مختصرًا.

وليس فيه أنه صلى ليلة واحدة، بل أحال أبو داود إلى أصل القصة التي يرويها ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، وفيها أنه صلى الله عليه وسلم لم يخرج من الليلة الثالثة.

فالظاهر أن ابن إسحاق وَهِم في جعله صلاة النبيّ صلى الله عليه وسلم ليلة واحدة، فإنه لم يتابع على ذلك، ولكن يعكّر عليه ما ذكره أحمد (26038) عن محمد بن عمرو. وفيه:"فلما كانت الليلة الثانية كثروا، فأطلع عليهم، فقال:"اكلفوا من الأعمال ما تطيقون. فإنّ الله لا يملّ حتى تملُّوا". فالله أعلم هل تعددت القصة أو هو آخر من وَهِم.

وأما قول الطبراني:"تفرد به محمد بن سلمة الحراني" فليس كما قال، بل تابعه أبو يعقوب وهو إبراهيم بن سعد بن إبراهيم الزهري.
ومن طريقه رواه الإمام أحمد في الرواية المشار إليها أعلاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: রমযান মাসের রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে লোকেরা বিচ্ছিন্নভাবে (দলবদ্ধ হয়ে) সালাত আদায় করতেন। কোনো কোনো ব্যক্তির সাথে কুরআনের কিছু অংশ মুখস্থ থাকতো। তখন পাঁচ বা ছয়জন অথবা এর থেকে কম বা বেশি লোক তার সাথে যোগ দিতো এবং তারা তার ইকতিদায় সালাত আদায় করতো।

তিনি (আয়িশা) বলেন: একদিন রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আদেশ করলেন যেন আমি তাঁর জন্য আমার কক্ষের দরজায় একটি চাটাই পেতে রাখি। আমি তাই করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার শেষ সালাত আদায়ের পর সেদিকে বের হলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর মসজিদে যারা উপস্থিত ছিলেন, তারা তাঁর কাছে সমবেত হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে নিয়ে দীর্ঘ সময় ধরে রাতের সালাত আদায় করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে গেলেন এবং (তাঁর ঘরে) প্রবেশ করলেন। চাটাইটি সেভাবেই পড়ে রইল।

যখন সকাল হলো, লোকেরা সে রাতে মসজিদে উপস্থিতদের নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত আদায়ের বিষয়টি আলোচনা করতে লাগলো। তিনি বলেন: পরের সন্ধ্যাবেলায় মসজিদে লোকে লোকারণ্য হয়ে গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিয়ে এশার শেষ সালাত আদায় করলেন, এরপর তিনি নিজ গৃহে প্রবেশ করলেন, কিন্তু লোকেরা সেখানেই স্থির হয়ে রইল। তিনি বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আয়িশা! লোকেদের কী হয়েছে?"

তিনি বললেন: আমি তাঁকে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! গতকাল রাতে যারা মসজিদে ছিল, তাদের সাথে আপনার সালাত আদায়ের কথা লোকেরা শুনেছে। তাই তারা আপনার সাথে সালাত আদায়ের জন্য ভিড় করেছে। তিনি বলেন: তখন তিনি বললেন: "আয়িশা! আমাদের দিক থেকে চাটাইটি গুটিয়ে রাখো।"

তিনি বলেন: আমি তাই করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাত অতিবাহিত করলেন (কিন্তু ঘর থেকে বের হলেন না), যদিও তিনি গাফেল ছিলেন না। লোকেরা তাদের স্থানেই স্থির হয়ে রইল, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতের জন্য বের হলেন। তিনি বলেন: তখন তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আল্লাহর শপথ! আলহামদুলিল্লাহ, আমি আমার এ রাতটি গাফেল হয়ে অতিবাহিত করিনি এবং তোমাদের অবস্থান আমার কাছে গোপন ছিল না। কিন্তু আমি আশঙ্কা করছিলাম যে, এই সালাতটি তোমাদের উপর ফরয হয়ে যাবে। সুতরাং তোমরা কেবল সেই আমলই করবে যা তোমাদের সামর্থ্যের মধ্যে থাকে। কেননা আল্লাহ তাআলা (সওয়াব দিতে) বিরক্ত হন না, যতক্ষণ না তোমরা (আমল করতে) বিরক্ত হয়ে যাও।"

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো সেটি, যা পরিমাণে অল্প হলেও নিয়মিতভাবে করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (4521)


4521 - عن أبي ذرّ، قال: صُمنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم رمضان، فلم يقُمْ بنا شيئًا من الشَّهر، حتى بقي سبعٌ، فقام بنا حتى ذهب ثلث الليل، فلما كانت السادسة لم يقم بنا، فلما كانت الخامسةُ قام بنا حتى ذهب شطر الليل. فقلت: يا رسول الله، لو نفّلتنا قيام هذه الليلة؟ قال: فقال:"إنّ الرجل إذا صلّى مع الإمام حتى ينصرف حُسب له قيام ليلة".

قال: فلما كانت الرابعة لم يقم، فلما كانت الثالثة جمع أهله ونساءه والناس، فقام بنا حتى خشينا أن يفوتنا الفلاح. قال: قلت: وما الفلاح؟ قال: السَّحور، ثم لم يقُمْ بنا بقية الشّهر.

صحيح: رواه أبو داود (1375)، والترمذي (806)، والنسائي (1364)، (1605)، وابن ماجه (1327) كلّهم من طريق داود بن أبي هند، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشي، عن جبير بن نفير الحضرمي، عن أبي ذر، قال (فذكره).

وإسناده صحيح، ورواه الإمام أحمد (21447)، وصححه ابن خزيمة (2206)، وابن حبان (2547) من طريق داود بن أبي هند، به.

وقال الترمذي:"حسن صحيح".




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে রমযানের রোযা রেখেছিলাম। কিন্তু মাসের কোনো অংশে তিনি আমাদের নিয়ে (তারাবীহর জন্য) কিয়াম করেননি, যখন সাত রাত অবশিষ্ট ছিল। তখন তিনি আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন (সালাত আদায় করলেন) যতক্ষণ না রাতের এক-তৃতীয়াংশ অতিবাহিত হলো। এরপর যখন ষষ্ঠ রাত এলো, তিনি আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন না। যখন পঞ্চম রাত এলো, তখন তিনি আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন যতক্ষণ না রাতের অর্ধেক অতিবাহিত হলো। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি এই রাতের বাকি অংশও আমাদের নফল হিসেবে (সালাতে) অতিবাহিত করতে দিতেন? তিনি বললেন: “নিশ্চয়ই কোনো লোক যদি ইমামের সাথে সালাত আদায় করে যতক্ষণ না তিনি (ইমাম) ফিরে যান (সালাত শেষ করেন), তবে তার জন্য এক রাত (পূর্ণ) কিয়ামের সওয়াব লেখা হয়।” আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর যখন চতুর্থ রাত এলো, তিনি কিয়াম করলেন না। এরপর যখন তৃতীয় রাত এলো, তিনি তার পরিবার, মহিলা এবং লোকদের একত্রিত করলেন এবং আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন যতক্ষণ না আমরা ভয় পেলাম যে আমাদের ফালাহ্ (কল্যাণ) হাতছাড়া হয়ে যাবে। তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম, ফালাহ্ কী? তিনি বললেন: সাহুরী (সাহরি)। এরপর মাসের বাকি অংশে তিনি আর আমাদের নিয়ে কিয়াম করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (4522)


4522 - عن نعيم بن زياد، قال: سمعتُ النّعمان بن بشير على منبر حمص يقول: قمنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في شهر رمضان ليلة ثلاث وعشرين إلى ثُلث الليل الأوّل، ثم قُمنا معه ليلة خمس وعشرين إلى نصف الليل، ثم قمنا معه ليلة سبع وعشرين حتى ظنّنا أن لا ندرك الفلاح وكانوا يسمُّونه السُّحور.

حسن: رواه النسائي (1606)، وأحمد (18402) وصحّحه ابن خزيمة (2204)، والحاكم (1/ 440) كلهم من حديث معاوية بن صالح، قال: حدثني نعيم بن زياد أبو طلحة، فذكره.

وزاد أحمد في آخره: فأما نحن فنقول: ليلة السابعة، ليلة سبع وعشرين، وأنتم تقولون: ليلة ثلاث وعشرين السابعة، فمن أصوب نحن أو أنتم؟ .

وإسناده حسن من أجل معاوية بن صالح الحمصي فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ".

فتعقبه الذهبي بقوله:"معاوية إنما احتجّ به مسلم وليس الحديث على شرط واحد منهما، بل هو حسن".




আন-নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হিমসের (হোমসের) মিম্বরে দাঁড়িয়ে বলছিলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে রমযান মাসে তেইশ তারিখের রাতে রাতের প্রথম তৃতীয়াংশ পর্যন্ত কিয়াম (নামাজ) করেছিলাম। এরপর পঁচিশ তারিখের রাতে আমরা তাঁর সাথে রাতের অর্ধেক পর্যন্ত কিয়াম করেছিলাম। এরপর সাতাশ তারিখের রাতে আমরা তাঁর সাথে এত দীর্ঘ সময় কিয়াম করেছিলাম যে, আমরা মনে করেছিলাম যে আমরা হয়তো 'ফালাহ' (সাহরী) পেতে পারব না। আর তারা সেটিকে সাহরী বলত।

(বর্ণনাকারী আন-নু'মান ইবনু বাশীর আরও বলেন): আর আমরা (সাহাবীগণ) বলি, সেটি সপ্তম রাত, অর্থাৎ সাতাশ তারিখের রাত। আর আপনারা (পরবর্তী প্রজন্ম) বলেন, তেইশ তারিখের রাত হলো সপ্তম রাত। তাহলে আমাদের মধ্যে কে অধিক সঠিক—আমরা নাকি আপনারা?









আল-জামি` আল-কামিল (4523)


4523 - عن أنس بن مالك، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي بالليل في رمضان، فجاء قومٌ فقاموا خلفه، فصلّي فكان يخفِّف، ثم يدخل بيته فيصلي، ثم يخرُج ويخفِّف. فلما أصبح، قالوا: يا رسول الله، قمنا خلفك الليلة، فكنتّ تدخلُ بيتك ثم تخرج؟ فقال:"إنّما فعلتُ ذلك من أجلكم".

صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (8204) عن موسى بن هارون، قال: حدثنا إسحاق بن راهويه، قال: أخبرنا النضر بن شميل، قال: حدّثنا حماد بن سلمة، قال: أخبرنا ثمامة، عن أنس، فذكره.

وإسناده صحيح، وثمامة هو ابن عبد الله بن أنس بن مالك ثقة من رجال الصحيح، قال ابن عدي: له أحاديث عن أنس. وأرجو أنه لا بأس به، وأحاديثه قريبة من غيره. وهو صالح فيما يرويه عن أنس عندي".

وعزاه الهيثمي في"المجمع" (3/ 173) إلى الأوسط، وقال:"رجاله رجال الصحيح".

وفي الباب عن أبي هريرة، قال: خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فإذا أناسٌ في رمضان يصلون في ناحية المسجد، فقال:"ما هؤلاء؟". فقيل: هؤلاء ناس ليس معهم قرآن، وأبي بن كعب يصلي وهم يصلون بصلاته. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"أصابوا ونِعْم ما صنعوا".

رواه أبو داود (1377) عن أحمد بن سعيد الهمداني، حدّثنا عبد الله بن وهب، أخبرني مسلم بن خالد، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة. فذكره.

وفي إسناده مسلم بن خالد المعروف بالزنجيّ، قال الذهبي في"الكاشف":"وثق، وضعفه أبو داود لكثرة غلطه"، وقال الحافظ في"التقريب":"فقيه صدوق كثير الأوهام".

ولذلك قال أبو داود عقب الحديث:"ليس هذا الحديث بالقوي؛ مسلم بن خالد ضعيف". وقال فيه ابن المديني: ليس بشيء. وقال البخاري: منكر الحديث، يكتب حديثه ولا يحتج به، يعرف وينكر، وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"يخطئ أحيانًا". وقال عثمان الدارمي عن ابن معين:"ثقة".

والحديث رواه أيضًا ابن خزيمة (2208) وعنه ابن حبان (2541) من طريق ابن وهب، به.

ورُوي مرسلًا من طريق ثعلبة بن أبي مالك القرظيّ.

رواه البيهقيّ (2/ 495) من طريق بحر بن نصر، قال: قرئ على عبد الله بن وهب، أخبرك عبد الرحمن بن سلمان وبكر بن مضر، عن ابن الهاد، أنّ ثعلبة بن أبي مالك القرظي حدثه، قال:"خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة في رمضان …" الحديث.

قال البيهقيّ:"هذا مرسل حسن. قال: وقد رُوي بإسناد موصول إلا أنه ضعيف". ثم روي حديث خالد الزنجي السابق من طريق أبي داود.
ورواه في المعرفة (4/ 39 - 40) (5401) من طريق الربيع، قال: حدثنا ابن وهب، به، فذكره.

قال البيهقي عقبه:"وهذا خاص فيمن لا يكون حافظًا للقرآن، وثعلبة بن أبي مالك قد رأي النبي صلى الله عليه وسلم فيما زعم أهل العلم بالتواريخ".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজান মাসে রাতে সালাত আদায় করতেন। তখন কিছু লোক এসে তাঁর পেছনে দাঁড়াল এবং তিনি সালাত আদায় করলেন। তিনি (সালাত) সংক্ষিপ্ত করতেন। এরপর তিনি নিজ ঘরে প্রবেশ করে (নফল) সালাত আদায় করতেন। অতঃপর তিনি (পুনরায়) বের হয়ে এসে (সালাতে) সংক্ষিপ্ত করতেন। যখন সকাল হলো, তারা বললো: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা গত রাতে আপনার পেছনে দাঁড়িয়েছিলাম। আপনি ঘরে প্রবেশ করছিলেন আবার বের হচ্ছিলেন? তখন তিনি বললেন: "আমি তো কেবল তোমাদের জন্যই এমনটি করেছিলাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (4524)


4524 - عن عبد الرحمن بن عبدِ القاري أنه قال: خرجتُ مع عمر بن الخطاب في رمضان إلى المسجد، فإذا الناسُ أوزاعٌ متفرِّقون، يصلّي الرجلُ لنفسه، ويصلي الرجل فيصلّي بصلاته الرَّهْط.

فقال عمر: والله! إنّي لأراني لو جمعتُ هؤلاء على قارئ واحد لكان أمثل، فجمعهم على أبيّ بن كعب. قال: ثم خرجتُ معه ليلة أخرى والنّاسُ يصلُّون بصلاة قارئهم. فقال عمر: نعمتِ البدعةُ هذه! والتي تنامون عنها أفضل من التي تقومون يعني آخر الليل، وكان الناسُ يقومون أوله".

صحيح: رواه مالك في الصلاة في رمضان (3) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عبد الرحمن بن عبد القاري، فذكره.

ورواه البخاري في صلاة التراويح (2010) من طريق مالك، به، مثله.

وقول عمر رضي الله عنه:"نعمت البدعة هذه" البدعة هنا بمعناها اللغويّ.

وأمّا في الشّرع فهي بمقابل السنة، وإنّما مدحها عمر رضي الله عنه لأنّها ليست ببدعة شرعًا، بل هي سنّة لإقرار النبيّ صلى الله عليه وسلم من صلّى معه في بعض ليالي رمضان، وإن كان كره ذلك لهم خشية أن تفترض عليهم، فلما مات النبيّ صلى الله عليه وسلم حصل الأمن من ذلك.

ولذلك قال ابن بطال: قيام رمضان سنة؛ لأنّ عمر إنما أخذه من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم، وإنّما تركهـ النبيّ صلى الله عليه وسلم خشية الافتراض. انظر: فتح الباري (4/ 252).

وقد ذهب أكثر الصحابة إلى فعل عمر بن الخطاب من جمعه الناس على قارئ واحد.

وكذلك رُوي عن علي بن أبي طالب:"أنه كان يأمر الناس بالقيام في رمضان، فيجعل للرجال إمامًا، وللنساء إمامًا. قال عرفجة: فأمرني فأممتُ النساء" إلا أنه ضعيف.

رواه عبد الرزاق (5125، 7722) عن محمد بن عمارة، عن عمر الثقفي، عن عرفجة، أنّ عليًا كان يأمر الناس، فذكره. وفي الموضع الثاني، قال: أبو أمية الثقفي، عن عرفجة.

ورواه البيهقي في فضائل الأوقات (125) من وجه آخر عن أبي عبد الله الثقفي، حدثنا عرفجة.

وعمر هو ابن عبد الله بن يعلى بن مرة الثقفي، ضعيف.

وقال الدارقطني:"متروك". وهو من رجال"التهذيب" إلا أنه لم يُذكر فيه كنيته أبو أمية ولا أبو
عبد الله. فتنبّه.




আব্দুর রহমান ইবনে আব্দিল কারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রমজান মাসে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মসজিদে গিয়েছিলাম। তখন দেখি যে লোকেরা বিচ্ছিন্ন দলে দলে বিভক্ত হয়ে সালাত আদায় করছে। কেউ নিজে একাকী সালাত আদায় করছে, আবার কেউ সালাত আদায় করছে এবং তার সালাতের সাথে একদল লোকও সালাত আদায় করছে।

তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমার মনে হচ্ছে, যদি আমি এই লোকগুলোকে একজন মাত্র ক্বারীর (ইমামের) পিছনে একত্রিত করে দিই, তবে সেটাই উত্তম হবে। এরপর তিনি তাদেরকে উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে একত্রিত করে দিলেন।

(আব্দুর রহমান ইবনে আব্দিল কারী) বলেন: অতঃপর আমি তার (উমর রাঃ)-এর সাথে অন্য এক রাতে বের হলাম, তখন লোকেরা তাদের ক্বারীর (ইমামের) সালাতের সাথে সালাত আদায় করছে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: এটা কতই না উত্তম বিদআত! আর তোমরা যে সময়ে ঘুমিয়ে থাকো তা এই সময় সালাত আদায় করার চেয়ে উত্তম—অর্থাৎ রাতের শেষাংশ। (তখন) লোকেরা অবশ্য রাতের প্রথমাংশেই সালাত আদায় করত।









আল-জামি` আল-কামিল (4525)


4525 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، أنه سأل عائشة، زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم: كيف كانتْ صلاةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان؟ فقالت: ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزيدُ في رمضان ولا في غيره على إحدى عشرة ركعة. يصلي أربعًا، فلا تسأل عن حُسنهنّ وطولهنَّ. ثم يصلي أرْبعًا فلا تسألْ عن حسنهنَّ وطولهنَّ. ثم يصلي ثلاثًا. فقالت عائشة: فقلتُ: يا رسول الله، أتنامُ قبل أن توتِر؟ فقال:"يا عائشة، إنَّ عيْنيَّ تنامان، ولا ينام قلبي".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، به.

ورواه البخاري في صلاة التراويح (2013)، ومسلم في صلاة المسافرين (738: 125) كلاهما من طريق مالك، به.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালামাহ ইবনু আবদুর রহমান ইবনু আওফ তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলেন: রমযান মাসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে এবং রমযান ছাড়া অন্য মাসেও এগারো রাকাতের বেশি পড়তেন না। তিনি প্রথমে চার রাকাত পড়তেন। তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো না (অর্থাৎ তা ছিল অসাধারণ)। অতঃপর তিনি আরও চার রাকাত পড়তেন। তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি তিন রাকাত (বিতর) পড়তেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি কি বিতর পড়ার আগে ঘুমিয়ে যান? তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমার চোখ দুটি ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4526)


4526 - عن أبي سلمة، قال: أتيتُ عائشة، فقلتُ: أيْ أمه أخبرني عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقالت: كانت صلاته في شهر رمضان وغيره ثلاث عشرة ركعة بالليل، منها ركعتا الفجر.

متفق عليه: رواه مسلم في صلاة المسافرين (738: 127) عن عمرو الناقد، حدثنا سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي لبيد، سمع أبا سلمة، قال (فذكره).

ورواه البخاريّ (1140) من وجه آخر نحوه غير أنه لم يذكر فيه شهر رمضان.

وفي الباب عن جابر بن عبد الله، قال: صلَّى بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في شهر رمضان ثمان ركعات وأوتر، فلما كانت القابلةُ اجتمعنا في المسجد ورجوْنا أن يخرج إلينا، فلم نزل فيه حتى أصبحنا ثم دخلنا فقلنا: يا رسول الله، اجتمعنا في المسجد ورجوْنا أن تصلي بنا. فقال:"إنّي خشيتُ -أو كرهتُ- أن تكتب عليكم".

رواه أبو يعلى (1802)، والطبراني في الصغير (525) كلاهما من طريق يعقوب بن عبد الله القُمِّي، أخبرنا عيسي بن جارية، عن جابر، قال (فذكره).

قال الطبراني عقبه: لا يروى عن جابر بن عبد الله إلا بهذا الإسناد، تفرد به يعقوب وهو ثقة.

وصحّحه ابن خزيمة (1070)، وابن حبان (2409) من طريق يعقوب القميّ، به.

وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 173):"فيه عيسي بن جارية وثقه ابن حبان، وضعفه ابن معين".
قلت: وهو مختلف فيه؛ قال ابن معين: ليس حديثه بذاك، لا أعلم أحدًا روى عنه غير يعقوب القميّ. وقال في رواية أخرى عنه: عنده مناكير، حدّث عنه يعقوب القمي، وعنبسة قاضي الرّي.

وقال أبو عبيد الآجري عن أبي داود: منكر الحديث. وقال في موضع آخر: ما أعرفه، روي مناكير. وذكره النسائي في"الضعفاء" وقال: منكر. وذكره العقيلي، وابن عدي في جملة الضعفاء. وقال ابن عدي: أحاديثه غير محفوظة. وذكر حديثه هذا في جملة مناكيره. (الكامل 5/ 1889).

ولكن قال أبو زرعة:"لا بأس به". وصحّح حديثه ابن خزيمة، وابن حبان، وقال الذهبي في"الميزان":"إسناده وسط"، وقال في"الكاشف":"صدوق". وسكت عنه الحافظ في"الفتح" (3/ 12) وقد نصَّ في المقدمة أن ما سكتَ عنه فهو حسن.

ولذا قلتُ في"المنة الكبرى" (3/ 389):"ويبدو من هذا أنّ الحديث لا يقلّ عن درجة الحسن لغيره لموافقته لما روته عائشة من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم بأنه لا يزيد في رمضان ولا في غيره عن ثمان ركعات …".

فالذي يغلب على الظن أنه صلي في هذه الليالي الثلاث بالجماعة إحدى عشرة ركعة كما كان يصلي في بيته منفردًا.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي في رمضان عشرين ركعة والوتر. فهو ضعيف جدًّا.

رواه ابن أبي شيبة (2/ 164)، والطبراني في الكبير (11/ 393) وعنه البيهقي (2/ 496)، وعبد ابن حميد (653) من طريق أبي شيبة إبراهيم بن عثمان، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره. وعلّته أبو شيبة هذا فهو متروك، كما في"التقريب".

وقد رواه الذهبي في"الميزان" وقال:"إنه من مناكير أبي شيبة".

وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (3/ 172) وعزاه للأوسط أيضًا.

وقال الحافظ الزيلعي في نصب الراية (2/ 153):"هو معلول بأبي شيبة إبراهيم بن عثمان جدّ الإمام أبي بكر بن أبي شيبة، وهو متفق على ضعفه، وليّنه ابن عدي في"الكامل". ثم إنه مخالف للحديث الصحيح عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سأل عائشة" اهـ فذكر حديثها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু সালামা আমাকে বললেন: হে আম্মাজান! আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সালাত সম্পর্কে বলুন। তিনি বললেন: রমযান মাসে এবং রমযান ছাড়া অন্য মাসেও রাতের বেলা তাঁর সালাত তেরো রাকাত ছিল, যার মধ্যে ফজরের (সুন্নত) দুই রাকাতও অন্তর্ভুক্ত।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি মুসলিম (৭৩৮: ১২৭)-এ সলাতুল মুসাফিরীন অধ্যায়ে আমর আন-নাকিদ হতে, তিনি সুফিয়ান ইবনু উয়াইনা হতে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু আবী লাবীদ হতে, তিনি আবু সালামা হতে বর্ণনা করেছেন।

আর এটি আল-বুখারীও (১১৪০) অন্য সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি এতে রমযান মাসের উল্লেখ করেননি।

আর এই বিষয়ে জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতেও বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযান মাসে আমাদের নিয়ে আট রাকাত সালাত এবং বিতর পড়লেন। যখন পরের রাত এলো, আমরা মসজিদে সমবেত হলাম এবং আশা করছিলাম যে তিনি আমাদের কাছে বেরিয়ে আসবেন। আমরা ভোর হওয়া পর্যন্ত সেখানেই থাকলাম। এরপর আমরা তাঁর কাছে প্রবেশ করে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা মসজিদে একত্রিত হয়েছিলাম এবং আশা করেছিলাম যে আপনি আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করবেন। তিনি বললেন: “আমি ভয় করেছিলাম—বা অপছন্দ করেছিলাম—যে এটি তোমাদের উপর ফরয হয়ে যায়।”

এটি আবূ ইয়া’লা (১৮০২) এবং ত্বাবারানী ফিস সাগীর (৫২৫) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই ইয়াকূব ইবনু আবদুল্লাহ আল-ক্বুম্মী এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যিনি ঈসা ইবনু জারিয়াহ হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।

ত্বাবারানী এর পর মন্তব্য করেছেন: এই সনদ ছাড়া জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে আর কেউ এটি বর্ণনা করেনি। এতে ইয়াকূব একক, আর তিনি নির্ভরযোগ্য।

আর ইবনু খুযাইমাহ (১০৭০) ও ইবনু হিব্বান (২৪০৯) ইয়াকূব আল-ক্বুম্মীর সূত্রে এটিকে সহীহ বলেছেন।

হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৭৩)-তে বলেছেন: “এতে ঈসা ইবনু জারিয়াহ আছেন, যাঁকে ইবনু হিব্বান নির্ভরযোগ্য বললেও ইবনু মাঈন দুর্বল বলেছেন।”

আমি (গ্রন্থকার) বলছি: তিনি (ঈসা ইবনু জারিয়াহ) সম্পর্কে মতপার্থক্য রয়েছে। ইবনু মাঈন বলেছেন: তার হাদীস তেমন শক্তিশালী নয়। আমি ইয়াকূব আল-ক্বুম্মী ছাড়া আর কাউকে তার থেকে বর্ণনা করতে শুনিনি। অন্য বর্ণনায় তিনি (ইবনু মাঈন) তার সম্পর্কে বলেছেন: তার কাছে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস আছে। তার থেকে ইয়াকূব আল-ক্বুম্মী এবং রাইয়ের কাযী 'আনবাসা বর্ণনা করেছেন।

আবু উবায়দ আল-আজুরী আবূ দাঊদ থেকে বর্ণনা করেছেন: তিনি মুনকারুল হাদীস (অস্বীকৃত হাদীসের বর্ণনাকারী)। অন্য এক স্থানে বলেছেন: আমি তাকে চিনি না, তিনি মুনকার হাদীস বর্ণনা করেছেন। নাসাঈ তাকে ‘আয-যু’আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেন: মুনকার। উকাইলী এবং ইবনু আদী তাকে দুর্বল বর্ণনাকারীদের তালিকায় উল্লেখ করেছেন। ইবনু আদী বলেছেন: তার হাদীস সংরক্ষিত নয়। আর তার এই হাদীসটিকে তিনি তার মুনকার হাদীসসমূহের মধ্যে উল্লেখ করেছেন (আল-কামিল ৫/১৮৮৯)।

তবে আবূ যুর'আ বলেছেন: “তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।” আর ইবনু খুযাইমাহ ও ইবনু হিব্বান তার হাদীসকে সহীহ বলেছেন। ইমাম যাহাবী ‘আল-মীযান’-এ বলেছেন: “এর সনদ মধ্যম মানের।” আর ‘আল-কাশেফ’-এ বলেছেন: “তিনি সত্যবাদী (সাদুক)।” হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-ফাতহ’ (৩/১২)-এ এ বিষয়ে নীরবতা অবলম্বন করেছেন। তিনি ভূমিকায় স্পষ্ট করেছেন যে যে হাদীস সম্পর্কে তিনি নীরব থাকেন, তা হাসান (উত্তম) মানের।

এ কারণেই আমি ‘আল-মিন্না আল-কুবরা’ (৩/৩৮৯)-তে বলেছি: “এ থেকে প্রতীয়মান হয় যে এই হাদীসটি হাসান লি-গাইরিহি (অন্য কারণে হাসান)-এর স্তর থেকে নিম্ন নয়, কারণ এটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণিত রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আমলের সঙ্গে মিলে যায় যে তিনি রমযানে বা অন্য সময়ে আট রাকাতের বেশি সালাত আদায় করতেন না...”

সুতরাং, যা প্রবলভাবে মনে হয় তা হলো, তিনি এই তিন রাতে জামাআতের সাথে এগারো রাকাত সালাত আদায় করেছিলেন, যেমনটি তিনি তাঁর ঘরে একাকী সালাত আদায় করতেন।

আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযানে বিশ রাকাত এবং বিতর পড়তেন, তা অত্যন্ত দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)।

এটি ইবনু আবী শাইবাহ (২/১৬৪), ত্বাবারানী ফীল কাবীর (১১/৩৯৩) এবং তার সূত্রে বায়হাক্বী (২/৪৯৬), এবং আবদ ইবনু হুমাইদ (৬৫৩) বর্ণনা করেছেন আবূ শাইবাহ ইবরাহীম ইবনু উসমান-এর সূত্রে, তিনি হাকাম হতে, তিনি মিকসাম হতে, তিনি ইবনু আব্বাস হতে বর্ণনা করেছেন। আর এর দুর্বলতার কারণ হলেন এই আবূ শাইবাহ, যিনি ‘আত-তাকরীব’-এ বর্ণিত আছে যে পরিত্যক্ত (মাতরুক) রাবী।

আর যাহাবী এটি ‘আল-মীযান’-এ বর্ণনা করে বলেছেন: “এটি আবূ শাইবাহ-এর মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসসমূহের অন্তর্ভুক্ত।”

আর হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৭২)-এও এই রাবীর দুর্বলতার কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন এবং এটিকে ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থের দিকেও সম্বন্ধ করেছেন।

হাফিয যাইলায়ী ‘নাসবুর রায়াহ’ (২/১৫৩)-এ বলেছেন: “এটি আবূ শাইবাহ ইবরাহীম ইবনু উসমান, ইমাম আবূ বকর ইবনু আবী শাইবাহ-এর দাদা, এর কারণে ত্রুটিপূর্ণ। তার দুর্বলতার ব্যাপারে সবাই একমত, যদিও ইবনু আদী ‘আল-কামিল’-এ তাকে কিছুটা নরম প্রকৃতির বলেছেন। উপরন্তু, এটি আবূ সালামা ইবনু আব্দুর রহমান কর্তৃক আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রশ্ন করার সহীহ হাদীসের বিরোধী।” (তিনি এরপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি উল্লেখ করেছেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (4527)


4527 - عن السّائب بن يزيد أنه قال: أمر عمر بن الخطاب أبيَّ بنَ كعب وتميمًا الدّاريَّ أن يقوما للناس بإحدى عشرة ركعة. قال: وقد كان القارئُ يقرأُ بالمئين، حتى كنّا نعتمدُ على العصيِّ من طول القيام، وما كنّا ننصرف إلّا في فروع الفجر.

صحيح: رواه مالك في الصلاة في رمضان (4) عن محمد بن يوسف، عن السائب بن يزيد، فذكره.
وإسناده صحيح، السائب بن يزيد صحابي صغير، ومحمد بن يوسف الأعرج من ثقات التابعين، وهو ابن أخت السائب بن يزيد كما صرّحت الرواية بذلك في السنن الكبرى للبيهقي (2/ 496) من طريق مالك، وقد احتج به الشّيخان.

ورواه سعيد بن منصور في سننه من وجه آخر عن عبد العزيز بن محمد، عن محمد بن يوسف بإسناده، مثله. انظر شرح الموطأ للزرقاني (1/ 354).

وكذلك رواه يحيى بن سعيد عند أبي بكر بن أبي شيبة (2/ 391)، وإسماعيل بن جعفر في حديث علي بن حجر (440)، ومحمد بن إسحاق كما عند محمد بن نصر في قيام الليل (ص 42) كلّ هؤلاء عن محمد بن يوسف، به، مثله. إلّا أن ابن إسحاق فإنه قال:"ثلاث عشرة ركعة".

وهذه المتابعات تدل على أنّ مالكًا لم يخطئْ في قوله:"إحدى عشرة ركعة" ولم ينفرد بها كما قال الحافظ ابن عبد البر.

قال البيهقيّ في"فضائل الأوقات" (ص 275) بعد أن أخرج الحديث من طريق مالك: هكذا في هذه الرواية، وهي موافقة لرواية عائشة عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في عدد ركعات قيامه في شهر رمضان وغيره. وكان عمر بن الخطاب أمر بهذا العدد زمانًا ثم أمر بما …" أي الآثار التي سوف تأتي عنه.

وأمّا ما رواه عبد الرزاق (7730) عن داود بن قيس وغيره، عن محمد بن يوسف، عن السائب ابن يزيد، أنّ عمر جمع الناس في رمضان على أبي بن كعب، وعلى تميم الداري على إحدى وعشرين ركعة، يقرؤون بالمئين، وينصرفون عند بزوغ الشمس".

هكذا قال في هذه الرواية"إحدى وعشرين" فيبدو أنه خطأ من عبد الرزاق، وهو وإن كان ثقة حافظًا فإنه قد عمي في آخر عمره فتغيّر، كما صرَّح به الحافظ في"التقريب".

فالصّحيح عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه، أنه أمر أبي بن كعب وتميمًا الداري أن يقوما بإحدى عشرة ركعة تأسيًا بفعل رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن لما رأى طول القيام، وشعر بمشقة الناس، وفيهم الكبير والضعيف، أمر بتخفيف القراءة وإكثار الركوع والسجود؛ لأنّ صلاة التراويح من الصلوات النافلة يجوز فيها الزيادة والنقصان، وعليه تدل الآثار الآتية:

منها ما رواه السائب بن يزيد نفسه، قال:"كانوا يقومون على عهد عمر في شهر رمضان بعشرين ركعة، وإن كانوا ليقرأون بالمئين من القرآن".

رواه أبو القاسم البغويّ في حديث"علي بن الجعد" المعروف بالجعديات (3387) ومن طريقه البيهقي (2/ 496) عن ابن أبي ذئب، عن يزيد بن خصيفة، عن السائب بن يزيد، فذكره.

ورواه الفريابي في كتاب الصيام (158) من طريق يزيد بن هارون، عن ابن أبي ذئب، به، مثله. وزاد:"حتى كانوا يتوكأون على عصيهم من شدة القيام".

ورواه البيهقي في"المعرفة" (5409) من طريق محمد بن جعفر، قال: حدثني يزيد بن
خصيفة، عن السائب بن يزيد، قال:"كنا نقوم في زمان عمر بن الخطاب بعشرين ركعة والوتر".

ويزيد بن خصيفة ينسب إلى جدّه وهو يزيد بن عبد الله بن خصيفة ثقة، وثّقه الأئمة إلا أن أحمد قال فيه:"منكر الحديث" مع توثيقه له في رواية الأثرم عنه.

قال الحافظ ابن حجر في"هدي الساري" (ص 453):"هذه اللفظة يطلقها أحمد على من يُغرب على أقرانه بالحديث، عرف ذلك بالاستقراء من حاله، وقد احتج بابن خصيفة مالك والأئمة كلّهم" انتهى.

وهذا الأثر صحّحه ابن الملقن في"البدر المنير" (4/ 350) بعد أن عزاه للبيهقي، والنووي في"الخلاصة" كما في نصب الراية (2/ 154).

وأظنه كذلك، فإمّا أن تكون هي الرّواية الثانية عن السائب بن يزيد، بأن عمر بن الخطاب لما رأى طول القيام فيه مشقة خفّف عنهم القراءة وجعلها عشرين ركعة، أو أن يزيد بن خصيفة انفرد برواية هذا الأثر، وهو مخالف لما رواه غيره، وثبت عن عائشة أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم ما كان يزيد في رمضان أو في غير رمضان على إحدى عشرة ركعة، فحكم عليه الشذوذ؛ لأنّ يزيد بن خصيفة ومحمد بن يوسف كلاهما ثقتان يرويان عن السائب بن يزيد، والأول يقول في روايته:"إحدى وعشرين" والثاني يقول:"إحدى عشرة" فيرجح القول الثاني لأنه أوثق من صاحبه؛ ولذا اقتصر الحافظ في وصف يزيد بن خصيفة بأنه"ثقة" وقال في وصف محمد بن يوسف"ثقة ثبت".

ومنها ما رواه مالك في"الموطأ" في الصلاة في رمضان (5) عن يزيد بن رومان أنه قال:"كان الناسُ يقومون في زمان عمر بن الخطاب بثلاث وعشرين ركعة" ولكن فيه انقطاع.

لأن يزيد بن رومان من أقران ابن شهاب الزهريّ -كما في تهذيب الكمال- توفي سنة (130 هـ) ولم يدرك زمن عمر رضي الله عنه، بل قال المزي: عن أبي هريرة مرسل.

ونصَّ الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 154) بأنه لم يدرك عمر بن الخطاب، وقال العيني في"عمدة القاري" (11/ 126):"سنده منقطع".

وقال البيهقي في"فضائل الأوقات" (ص 277):"مرسل".

ومنها ما رواه ابن أبي شيبة (2/ 393) عن وكيع، عن مالك بن أنس، عن يحيى بن سعيد:"أنّ عمر بن الخطاب أمر رجلًا يصلي بهم عشرين ركعة".

وفيه انقطاع أيضًا. لأنّ يحيى بن سعيد وهو الأنصاري لم يدرك عمر بن الخطاب.

قال علي بن المديني:"لا أعلمه سمع من صحابي غير أنس" كما في"التهذيب" (11/ 223).

وكذلك منها ما رواه ابن أبي شيبة، عن حميد بن عبد الرحمن، عن حسن (كذا ولعله: الحسن البصري، عن) عبد العزيز بن رفيع، قال:"كان أُبي بن كعب يصلي بالناس في رمضان بالمدينة عشرين ركعة ويوتر بثلاث".
وعبد العزيز بن رُفيع لم يدرك أبي بن كعب فإنه مات سنة ثلاثين ومائة أو بعدها، وقد أتى عليه نيّف وتسعون سنة، كما في تهذيب الكمال.

وعليه فتكون ولادته بعد الثلاثين، وأما أُبي بن كعب رضي الله عنه فإنه توفي سنة (19 هـ) أو (32 هـ).

وأيضًا فإنّ ابن رُفيع إنما يروي عن صغار الصحابة وكبار التابعين.

وروى الضياء المقدسي في المختارة (1161) من طريق أحمد بن منيع، أنا الحسن بن موسي، نا أبو جعفر الرازي، عن الربيع بن أنس، عن أبي العالية، عن أبي بن كعب، أنّ عمر أمر أبيَّا أن يُصلي بالناس في رمضان، فقال: إنّ الناس يصومون النّهار ولا يحسنون أن يقرأوا فلو قرأتَ عليهم بالليل. فقال: يا أمير المؤمنين، هذا شيء لم يكن؟ فقال: قد علمتُ، ولكنه أحسن، فصلّى بهم عشرين ركعة. وفيه أبو العالية وهو رفيع ثقة ولكنه كان يرسل كثيرا، وفيه ربيع بن أنس البكري، صدوق له أوهام وخاصة فيما رواه عنه أبو جعفر الرازي، قال ابن حبان:"الناس يتقون من حديثه ما كان من رواية أبي جعفر عنه لأن في أحاديثه عنه اضطرابا كثيرا".

ومنها ما رواه عبد الرزاق (7733) عن الأسلميّ، عن الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذُباب، عن السائب بن يزيد، قال:"كنا نتصرف من القيام على عهد عمر وقد دنا فروع الفجر، وكان القيام على عهد عمر ثلاثة وعشرين ركعة".

وإسناده واهٍ جدًّا، من أجل الأسلميّ، وهو إبراهيم بن محمد بن أبي يحيى، قال الحافظ:"متروك".

وأمّا الحارث بن عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد بن أبي ذباب، فمختلف فيه، فقال أبو حاتم:"يروي عنه الدراوردي أحاديث منكرة، ليس بالقوي". وقال أبو زرعة:"ليس به بأس".

ويظهر من هذه الآثار مع رواية يزيد بن خصيفة أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه أمر أولًا بإحدى عشرة ركعة، ثم أمر بعد ذلك بإحدى وعشرين ركعة.

قال ابن عبد البر:"يحتمل أن يكون القيام في أول ما عمل به عمر بإحدى عشر ركعة، ثم خفّف عليهم طول القيام، ونقلهم إلى إحدى وعشرين ركعة، يخفّفون فيها القراءة، ويزيدون في الركوع والسجود". الاستذكار (5/ 154).

وإلى نحو هذا الجمع جنح البيهقي فقال في"السنن" (2/ 496):

"ويمكن الجمع بين الروايتين، فإنهم كانوا يقومون بإحدى عشرة، ثم كانوا يقومون بعشرين ويوترون بثلاث" اهـ.

وقال عبد الحق الإشبيلي في كتابه"الصلاة والتهجد" (ص 287):"ويروى أنّ الناس اشتدّ عليهم طول القيام فشكوا ذلك إلى عمر بن الخطاب، فأمر القارئين أن يخفِّفا من طول القيام ويزيدا في عدد الركوع، فكانا يقومان بثلاث وعشرين ركعة، ثم شكوا فنقصوا من طول القيام زيدوا في
الركوع حتى أتمّوا ستًا وثلاثين، والوتر بثلاث، فاستقرّ الأمر على هذا" اهـ.

ولذا ذهب بعض أهل العلم إلى الزيادة على ثلاثين وعشرين، فروى ابن القاسم في"المدونة" عن الإمام مالك أنها تسع وثلاثون، وهو الأمر القديم الذي أدرك عليه أهل المدينة.

وقال صالح مولى التوأمة: أدركت الناس يقومون بإحدى وأربعين ركعة، يوترون منها بخمس، ذكره صاحب المغني (2/ 604).

وكان الأسود بن يزيد يصلي أربعين ركعة ويوتر بسبع إلى غير ذلك من الأقوال المذكورة في كتب السنة والفقه. (انظر: مختصر كتاب قيام رمضان ص 41 - 45).

وكأنّهم رأوا أنّ الأمر فيه سعة؛ لأنه داخل في مطلق النوافل، وليس من السنن الرواتب.

قال الشافعي:"وليس في شيء من هذا ضيق، ولا حدّ ينتهي إليه، لأنه نافلة فإنْ أطالوا القيام وأقلُّوا السجود فحسن -وهو أحبُّ إليَّ-، وإن أكثروا الركوع والسجود فحسن". المعرفة للبيهقي (4/ 42).

وقال إسحاق بن منصور: قلت لأحمد بن حنبل: كم من ركعة يصلَّي في قيام شهر رمضان؟ فقال: قد قيل فيه ألوان نحوًا من أربعين إنّما هو تطوّع. مختصر كتاب قيام رمضان (ص 45) إلا أن المختار عند الإمام أحمد عشرون ركعة، كما في المغني (2/ 604).

قلت: وقد يختلف باختلاف المصلين.

كما قال شيخ الإسلام ابن تيمية في"المجموع" (22/ 272):"إن نفس قيام رمضان لم يوقت النبيّ صلى الله عليه وسلم فيه عددًا معينًا، بل كان هو صلى الله عليه وسلم لا يزيد في رمضان ولا غيره على ثلاث عشرة ركعة، لكن كان يطيل الركعات، فلما جمعهم عمر على أبي بن كعب كان يصلي بهم عشرين ركعة، ثم يوتر بثلاث، وكان يخفف القراءة بقدر ما زاد من الركعات، لأنّ ذلك أخف على المأمومين من تطويل الركعة الواحدة، ثم كان طائفة من السلف يقومون بأربعين ركعة ويوترون بثلاث، وآخرون قاموا بست وثلاثين، وأوتروا بثلاث. وهذا كلّه سائغ، فكيفما قام في رمضان من هذه الوجوه، فقد أحسن.

والأفضل يختلف باختلاف أحوال المصلين، فإن كان فيهم احتمال لطول القيام، فالقيام بعشر ركعات وثلاث بعدها، كما كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يصلي لنفسه في رمضان وغيره هو الأفضل، وإن كانوا لا يحتملونه فالقيام بعشرين هو الأفضل" انتهى.




সা'ইব ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উবাই ইবনু কা'ব এবং তামীম আদ-দারীকে লোকদের নিয়ে এগারো রাকাত সালাত আদায় করার নির্দেশ দেন। তিনি (সা'ইব ইবনু ইয়াযীদ) বলেন: আর ক্বারী (ইমাম) শত শত আয়াত তিলাওয়াত করতেন। এমনকি দীর্ঘ কিয়াম করার কারণে আমরা লাঠির উপর ভর দিয়ে দাঁড়াতাম। আর আমরা কেবল ফজরের কাছাকাছি সময়েই (সালাত থেকে) ফিরতাম।