হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4648)


4648 - عن عبد الله بن عباس: أَنَّ رَجُلا سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ أَبِي أَدْرَكَهُ الْحَجُّ، وَهُوَ شَيْخٌ كَبِيرٌ لا يَثْبُتُ عَلَى رَاحِلَتِهِ فَإِنْ شَدَدْتُهُ خَشِيتُ أَنْ يَمُوتَ أَفَأَحُجُّ عَنْهُ؟ قَالَ:"أَرَأَيْتَ لَوْ كَانَ عَلَيْهِ دَيْنٌ فَقَضَيْتَهُ أَكَانَ مُجْزِئًا؟". قَال: نَعَمْ، قَال:"فَحُجَّ عَنْ أَبِيكَ".

صحيح: رواه النسائيّ (2640، 5393) عن مجاهد بن موسى، عن هُشيم، عن يحيى بن أبي إسحاق، عن سليمان بن يسار، عن عبد الله بن عباس، قال: فذكره.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (1812) عن هشيم، بإسناده إلا أنه قال: عن ابن عباس أو الفضل بن عباس، فذكره.

لأنه وقع الخلاف على يحيى بن أبي إسحاق فروى هكذا كما مرّ، ورواه أيضًا عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس هكذا.

ورواه شعبة، عن يحيى بن أبي إسحاق، قال: سمعت سليمان بن يسار، حدّثنا الفضل، قال:"كنت رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله رجل، فقال: إنّ أبي -أو أمي- شيخ كبير، لا يستطيع الحج" فذكر الحج. رواه الإمام أحمد (1813) من طريقه.

ورواه النسائيّ من طريقين: من طريقه (5395)، ومن طريق محمد (هو ابن سيرين) (2643، 5394) كلاهما عن يحيى بن أبي إسحاق.

قال النسائي:"سليمان لم يسمع من الفضل بن العباس".

قلت: وهو كما قال؛ لأنّ الفضل بن العباس توفي سنة (18 هـ) في طاعون عمواس، وسليمان ابن يسار ولد في خلافة عثمان، فالصحيح أن بينهما واسطة، وهو ابن عباس.

فمرة يروي ابن عباس عن الفضل، وأخرى بدونه.

قال الترمذيّ (3/ 259): سألت محمدًا عن هذه الرّوايات فقال:"أصحّ شيء في هذا الباب ما رُوي عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم. وقال: ويحتمل أن يكون ابن عباس سمعه من الفضل وغيره عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، ثم روى هذا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم وأرسله. ولم يذكر الذي سمعه منه".




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করল, আমার পিতা হজ্জের সময় পেয়েছেন, অথচ তিনি এমন বৃদ্ধ লোক যে তাঁর উটের পিঠে স্থির থাকতে পারেন না। যদি আমি তাঁকে বেঁধেও রাখি, তবে আমার আশঙ্কা হয় যে তিনি মারা যাবেন। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ করব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমার কী মনে হয়, যদি তার উপর ঋণ থাকত আর তুমি তা পরিশোধ করে দিতে, তবে কি তা যথেষ্ট হতো? লোকটি বলল: হ্যাঁ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তাহলে তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ্জ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4649)


4649 - عن أبي رزين -رجل من بني عامر- أنه قال: يا رَسُول اللهِ! إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ لا يَسْتَطِيعُ الْحَجَّ وَلا الْعُمْرَةَ وَلا الظَّعْنَ؟ قَال:"حُجَّ عَنْ أَبِيكَ وَاعْتَمِرْ".

صحيح: رواه أبو داود (1810)، والترمذي (930)، والنسائي (2637)، وابن ماجه (2906) كلّهم من طريق شعبة، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن أبي رزين، فذكره.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (16184)، وصحّحه ابن خزيمة (3040)، وابن حبان (3991)، والحاكم (481/ 1) وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقي (4/ 350) وقال: قال الإمام أحمد:"لا أعلم في إيجاب العمرة حديثًا أجود من هذا، ولا أصح منه. ولم يجوده أحد كما جوّده شعبة".

قلت: وأبو رزين هو لقيط العقيليّ.




আবূ রাজীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার পিতা অনেক বৃদ্ধ, যিনি হজ্ব, উমরাহ এবং সফর (যানবাহনে আরোহণ) করতেও সক্ষম নন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ্ব ও উমরাহ আদায় করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4650)


4650 - عن عبد الله بن الزبير، قال: جَاءَ رَجُلٌ مِنْ خَثْعَمَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ لا يَسْتَطِيعُ الرُّكُوبَ وَأَدْرَكَتْهُ فَرِيضَةُ اللَّهِ فِي الْحَجِّ فَهَلْ يُجْزِئُ أَنْ أَحُجَّ عَنْهُ؟ قَالَ:"آنْتَ أَكْبَرُ وَلَدِهِ؟". قَالَ: نَعَمْ، قَالَ:"أَرَأَيْتَ لَوْ كَانَ عَلَيْهِ دَيْنٌ أَكُنْتَ تَقْضِيهِ؟" قَالَ: نَعَمْ. قَال:"فَحُجَّ عَنْهُ".

حسن: رواه النسائيّ (2638) عن إسحاق بن إبراهيم، أنبأنا جرير، عن منصور، عن مجاهد، عن يوسف بن الزبير، عن عبد الله بن الزبير فذكره.

وإسناده حسن من أجل يوسف بن الزبير فإنه حسن الحديث، وروى عنه جماعة، وذكره ابن حبان في الثقات.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (16102) مختصرًا، وأبو يعلى (6812)، والدارمي (1879)، والبيهقي (4/ 329) كلّهم من طريق منصور بإسناده إلّا أنّ البعض قال: عن ابن الزبير، أنّ سودة بنت زمعة قالت:"جاء رجل" فذكرته. كما في رواية الإمام أحمد (27417)، والطبراني في"الكبير" (24/ 37) وقد صحّح البيهقي حديث مجاهد، عن يوسف بن الزبير، عن ابن الزبير، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

كما أنه لا يضر هذا الخلاف لأنه من الممكن أن ابن الزبير سمع الحديث من الوجهين، فلا يلتفت إلى من جعل هذا الخلاف، والخلاف الآخر في شك مجاهد في قوله:"يوسف بن الزبير أو الزبير بن يوسف" أو إرسال من أرسله سببًا للاضطراب.

لأنّ الصّحيح لا يُعلّ بالضّعيف كما هو معلوم لدى طلبة هذا العلم.

وقد صحّح الذّهبي في"الميزان" في ترجمة يوسف بن الزبير حديثًا آخر بهذا الإسناد.

وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 282) بعد أن عزاه إلى أحمد والطبراني:"رجاله ثقات".

وذكره الدّارقطنيّ في"علله" (4032) وقال:"وقول جرير ومن تابعه أشبه بالصواب" أي الذين
رووه بدون شك من مجاهد كما هو عند النسائي وغيره.

وفي الباب ما رُوي عن أبي الغوث بن حصين -رجل من الفرع- أنه استفتى النبيّ صلى الله عليه وسلم عن حجّة كانت على أبيه مات ولم يحج؟ قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"حج عن أبيك" وقال:"وكذلك الصيام في النّذر يقضي عنه".

رواه ابن ماجه (2905) عن هشام بن عمار، حدّثنا الوليد بن مسلم، حدّثنا عثمان بن عطاء، عن أبيه، عن أبي الغوث بن حصين، فذكره.

قال البوصيريّ في"الزوائد":"ليس لأبي الغوث بن حصين عند ابن ماجه سوى هذا الحديث.

وليس له رواية في شيء من الكتب الخمسة، وإسناد حديثه ضعيف، وعثمان بن عطاء الخراساني، قال فيه ابن معين ومسلم والدارقطني ضعيف الحديث، وقال الفلاس: منكر الحديث، وقال النسائي: ليس بثقة، وقال الحاكم: روي عن أبيه أحاديث موضوعة" انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খাস'আম গোত্রের একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “আমার পিতা অতিশয় বৃদ্ধ, তিনি বাহনে আরোহণ করতে পারেন না। অথচ আল্লাহর পক্ষ থেকে হজ্জের ফরয তাঁর ওপর এসে পড়েছে। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ আদায় করতে পারি?” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তুমি কি তাঁর সবচেয়ে বড় সন্তান?” লোকটি বলল, “হ্যাঁ।” তিনি বললেন, “তোমার কী মনে হয়, যদি তাঁর ওপর কোনো ঋণ থাকত, তবে কি তুমি তা পরিশোধ করতে?” লোকটি বলল, “হ্যাঁ।” তিনি বললেন, “তাহলে তার পক্ষ থেকে হজ্জ আদায় করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (4651)


4651 - عن عبد الله بن عباس، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم سَمِعَ رَجُلًا يَقُولُ: لَبَّيْكَ عَنْ شُبْرُمَةَ. قَالَ:"مَنْ شُبْرُمَةُ؟". قَالَ: أَخٌ لِي أَوْ قَرِيبٌ لِي. قَالَ:"حَجَجْتَ عَنْ نَفْسِكَ؟". قَالَ: لا. قَال:"حُجَّ عَنْ نَفْسِكَ، ثُمَّ حُجَّ عَنْ شُبْرُمَةَ".

صحيح: رواه أبو داود (1811)، وابن ماجه (2903)، وصحّحه ابن خزيمة (3039)، وابن حبان (3988) كلّهم من طريق عبدة بن سليمان، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن عزْرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه الدارقطني (2658)، والبيهقي (4/ 336) وقال:"هذا إسناد صحيح، ليس في هذا الباب أصح منه".

وعن أحمد روايتان:

الأولى: ما ذكره الأثرم عن أحمد أن رفعه خطأ. وقال:"رواه عدّة موقوفًا على ابن عباس".

والثانية: ما رواه ابنه صالح عن الإمام أنه حكم بأنه مسند، وأنه من قول رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال شيخ الإسلام ابن تيمية في"شرح العمدة" (1/ 292):"فيكون قد اطلع على ثقة من رفعه، وقرّر رفعه جماعة، على أنه إن كان موقوفًا فليس لابن عباس مخالف" انتهى.

وكذا رجّح رفعه عبد الحق وابن القطّان كما في"بيان الوهم والإيهام" (5/ 451). ورجّح الحافظ ابن حجر رفعه أيضًا بالنظر إلى أن له شاهدًا مرسلًا وهو ما رواه سعيد بن منصور، عن سفيان بن عيينة، عن ابن جريج، عن عطاء، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.

ولكن خالفه ابن أبي ليلى، فرواه عن عطاء، عن عائشة.
وخالفه الحسن بن ذكوان، فرواه عن عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عباس. قال الدّارقطني: إنه أصح.

قال الحافظ: وهو كما قال؛ لكنه يقوي المرفوع لأنه من غير رجاله، وقد رواه الإسماعيلي في"معجمه" من طريق أخرى عن أبي الزبير، عن جابر. وفي إسنادها من يحتاج إلى النظر في حاله. فيجتمع من هذا صحة الحديث"، انتهى. انظر:"التلخيص الحبير" (958).

قلت: رواه الدارقطني من عدة طرق علّل بعضها، وصحّح بعضها.

وقد كثر الكلام حول هذا الحديث، وخلاصته كما قال ابن الملقن في"خلاصة البدر المنير" (1/ 345):"أعلّه الطّحاويّ بالوقف، والدّارقطني بالإرسال، وابن المغلس الظاهريّ بالتدليس، وابن الجوزي بالضّعف، وغيرهم بالاضطراب والانقطاع، وقد زال ذلك كله بما أوضحناه في الأصل". يعني"البدر المنير" (6/ 45 - 51).

قلت: لقد أجبت عن كلّ هذه العلل في"المنة الكبرى" (3/ 480) ولا حاجة إلى إعادته، فراجعه.

وعزرة هو ابن عبد الرحمن الخزاعيّ الكوفي، ثقة من رجال مسلم، ومن قال غيره فقد وهم.

وهذا الخبر المفسّر لا يعارضه حديث المرأة الخثعمية وحديث أبي رزين لأسباب لا يحتاج إلى بيانها، وهو أمر معلوم لدى طلبة هذا العلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে (হজ্জের তালবিয়াতে) বলতে শুনলেন: "আমি শুর্‌বুমার পক্ষ থেকে হাযির (লাব্বাইক বলছি)।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "শুর্‌বুমা কে?" সে বলল: আমার ভাই অথবা আমার কোনো নিকটাত্মীয়। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি নিজের পক্ষ থেকে হজ্জ করেছো?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "প্রথমে তোমার নিজের পক্ষ থেকে হজ্জ করো, তারপর শুর্‌বুমার পক্ষ থেকে হজ্জ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4652)


4652 - عن ابن عباس، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَرَّ بِامْرَأَةٍ وَهِيَ فِي مِحَفَّتِهَا فَقِيلَ لَهَا: هَذَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَأَخَذَتْ بِضَبْعَيْ صَبِيٍّ كَانَ مَعَهَا فَقَالَتْ: أَلِهَذَا حَجٌّ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَال:"نَعَمْ وَلَكِ أَجْرٌ".

صحيح: رواه مالك في الحج (244) عن إبراهيم بن عقبة، عن كريب مولى عبد الله بن عباس، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (1336) من طريق سفيان بن عيينة، عن إبراهيم بن عقبة، به، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم لقي ركبًا بالرّوحاء، فقال:"من القوم؟". قالوا: المسلمون، فقالوا: من أنت؟ قال:"رسول الله" فرفعتْ إليه امرأة صبيًّا، فقالت: ألهذا حجّ؟ قال (فذكره).

ورواه مختصرًا من طريق سفيان، عن محمد بن عقبة، عن كريب، به.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন সে তার হাওদার মধ্যে ছিল। তখন তাকে বলা হলো: ইনি আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। অতঃপর সে তার সাথে থাকা একটি শিশুর বাহু ধরে জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহ্‌র রাসূল! এর কি হজ হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, আর তোমার জন্য রয়েছে প্রতিদান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4653)


4653 - عن الجعيد بن عبد الرحمن، قال: سمعت عمر بن عبد العزيز يقول للسائب ابن يزيد وكان قد حُجَّ به في ثقل النّبيّ صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1859) عن عمرو بن زُرارة، أخبرنا القاسم بن مالك، عن الجعيد بن عبد الرحمن، به، فذكره.
ورواه أيضًا (1858) من طريق محمد بن يوسف (هو الكنديّ)، عن السائب بن يزيد، قال:"حُجّ بي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا ابن سبع سنين".




সায়িব ইবনে ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ্জ করানো হয়েছিল, যখন আমার বয়স ছিল সাত বছর।









আল-জামি` আল-কামিল (4654)


4654 - عن جابر بن عبد الله قال: رفعتْ امرأةٌ صبيًّا لها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! ، لهذا حجّ؟ قال:"نعم، ولك أجر".

صحيح: رواه الترمذي (924)، وابن ماجه (2910)، والبيهقي (5/ 156) كلّهم من حديث محمد بن سوقة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وإسناده صحيح، وقول الترمذي:"هذا حديث غريب" لم أعرف وجه الغرابة.

وفي الباب ما رُوي عن جابر، قال: كنا إذا حججنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم، فكنا نلبّي عن النساء، ونرمي عن الصبيان.

رواه الترمذي (927)، وابن ماجه (3038)، والبيهقي (5/ 156) كلهم من طريق أشعث، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه، وقد أجمع أهل العلم على أن المرأة لا يلبي عنها غيرُها، بل هي تلبي عن نفسها، ويكره لها رفع الصوت بالتلبية".

قلت: أشعث هو ابن سوَّار الكنديّ قاضي الأهواز، ضعَّفه جمهور أهل العلم.

ولا تفيد ما رواه البيهقي (5/ 156) من وجه آخر عن أيمن بن نابل، عن أبي الزبير لأنه لم يذكر فيه:"كنا نلبي عن النساء".

وأما ما رُوي عن ابن عباس قال:"أيها الناس! أسمعوني ما تقولون، وافهموا ما أقول لكم، أيما مملوك حجّ به أهله فمات قبل أن يُعتق فقد قضى حجّه، وإن عتق قبل أن يموت فليحجج، وأيّما غلام حجّ به أهله فمات قبل أن يدرك، فقد قضى عنه حجّه وإن بلغ فليحجج" فهو موقوف.

رواه الشافعي في الأمّ (2/ 177) عن سعيد، عن مالك بن مغول، عن أبي السفر، قال: قال ابن عباس (فذكره).

وقد رُوي مرفوعًا: رواه الحاكم (1/ 481)، والبيهقيّ (4/ 325) كلاهما من حديث محمد بن المنهال، ثنا يزيد بن زريع، ثنا شعبة، عن سليمان الأعمش، عن أبي ظبيان، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيّما صبي حجّ، ثم بلغ الحدث فعليه أن يحجّ حجّة أخرى، وأيّما أعرابي حجّ ثم هاجر فعليه حجة أخرى، وأيما عبد حجّ ثم أعتق فعليه حجة أخرى".

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ولكن قال الحافظ في"التلخيص" (2/ 220):"رواه ابن خزيمة (3050)، والإسماعيلي في"مسند الأعمش"، والحاكم، والبيهقي، وابن حزم -وصحّحه-، والخطيب في"التاريخ" من حديث محمد بن المنهال، عن يزيد بن زريع، عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عنه. قال
ابن خزيمة: الصحيح موقوف. وأخرجه كذلك من رواية ابن أبي عدي عن شعبة. وقال البيهقي: تفرّد برفعه محمد بن منهال. ورواه الثوري عن شعبة موقوفًا".

قلت: وقد رفعه أيضًا الحارث بن سريج الخوارقيّ، عن يزيد بن زريع، عن شعبة.

ومن طريقه رواه ابن عدي في"الكامل" (2/ 615) في ترجمة الحارث بن سريج النقال، وقال:"وهذا الحديث معروف بمحمد بن المنهال، عن يزيد بن زريع. وأظن الحارث بن سريج هذا سرقه منه. وهذا الحديث لا أعلم يرويه عن يزيد بن زريع غيرهما. ورواه ابن أبي عدي وجماعة معه عن شعبة موقوف" انتهى.

قلت: الحارث بن سريج هذا مختلف فيه فوثقه ابن معين وابن حبان وغيرهما، وضعّفه ابن معين في رواية، بل كذّبه واتهمه موسي بن هارون الحمال كما ذكره ابن عدي في"الكامل"، فمثله لا تنفع متابعته.

وقال الترمذيّ:"وقد أجمع أهل العلم أنّ الصبيّ إذا حجّ قبل أن يدرك، فعليه الحجّ إذا أدرك لا تجزئ عنه تلك الحجة عن حجة الإسلام. وكذلك المملوك إذا حجّ في رقِّه ثم أُعتق، فعليه الحج إذا وجد إلى ذلك سبيلا. لا يجزئ عنه ما حجّ في حال رقّه، وهو قول سفيان الثوريّ، والشافعيّ، وأحمد، وإسحاق". انتهى.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন মহিলা তার একটি শিশুকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উঁচু করে ধরলেন এবং বললেন, ‘ইয়া রাসূলাল্লাহ! এই শিশুর জন্য কি হজ্ব আছে?’ তিনি বললেন, “হ্যাঁ, এবং তোমার জন্য রয়েছে সওয়াব।”

(এই হাদীসটি) সহীহ: এটি ইমাম তিরমিযী (৯২৪), ইবনু মাজাহ (২৯১০), এবং বায়হাকী (৫/১৫৬) বর্ণনা করেছেন। এঁরা সকলেই মুহাম্মাদ ইবনু সুওকাহ, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু মুনকাদির, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ। ইমাম তিরমিযীর বক্তব্য, “এই হাদীসটি গরীব (অর্থাৎ, একাকী সূত্রে বর্ণিত)”—এর ‘গরীব’ হওয়ার কারণ আমি জানতে পারিনি।

এই অধ্যায়ে জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরেকটি বর্ণনা রয়েছে, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ্ব করতাম, তখন আমরা মহিলাদের পক্ষ থেকে তালবিয়া পাঠ করতাম এবং শিশুদের পক্ষ থেকে (শয়তানকে) পাথর নিক্ষেপ করতাম।
এটি বর্ণনা করেছেন ইমাম তিরমিযী (৯২৭), ইবনু মাজাহ (৩০৩৮), এবং বায়হাকী (৫/১৫৬)। এঁরা সকলে আশ‘আস, তিনি আবুয যুবাইর, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেছেন: “এই হাদীসটি গরীব, আমরা এই সূত্র ছাড়া এটি অন্য কোনো সূত্রে জানি না। কিন্তু আহলে ইলম (মুহাদ্দিস ও ফকীহগণ) ঐকমত্যে পৌঁছেছেন যে, কোনো নারীর পক্ষ থেকে অন্য কেউ তালবিয়া পাঠ করবে না, বরং সে নিজেই তার নিজের জন্য তালবিয়া পাঠ করবে। তবে তার জন্য উচ্চস্বরে তালবিয়া পাঠ করা মাকরূহ।”

আমি (ভাষ্যকার) বলি: আশ‘আস হলেন আশ‘আস ইবনু সাওয়ার আল-কিন্দী, আহওয়ায-এর কাজী। জমহূর আহলে ইলম তাকে দুর্বল বলেছেন।

আয়মান ইবনু নাবিল, তিনি আবুয যুবাইর, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বায়হাকীর (৫/১৫৬) অপর বর্ণনাটি থেকে, “আমরা মহিলাদের পক্ষ থেকে তালবিয়া পাঠ করতাম” অংশটি না থাকায় সেটিও কোনো সুবিধা দেয় না।

আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: “হে লোক সকল! আমি কী বলছি তা শোনো এবং তোমরা কী বলছো তা আমাকে শুনতে দাও। কোনো দাসকে যদি তার মালিক হজ্ব করায় এবং সে স্বাধীন হওয়ার আগে মারা যায়, তবে তার হজ্ব আদায় হয়ে গেল। আর যদি সে মারা যাওয়ার আগে স্বাধীন হয়, তবে তাকে অবশ্যই হজ্ব করতে হবে। আর কোনো শিশুকে যদি তার পরিবার হজ্ব করায় এবং সে বালেগ হওয়ার আগে মারা যায়, তবে তার হজ্ব আদায় হয়ে গেল। আর যদি সে বালেগ হয়, তবে তাকে অবশ্যই হজ্ব করতে হবে।” এটি মাওকুফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি)।

এটি ইমাম শাফেঈ আল-উম্ম গ্রন্থে (২/১৭৭) সাঈদ, তিনি মালিক ইবনু মিগওয়াল, তিনি আবুস সাফার, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

আর এটি মারফূ’ (রাসূলের বাণী হিসেবে) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে: এটি হাকিম (১/৪৮১) এবং বায়হাকী (৪/৩২৫) উভয়েই মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল, তিনি ইয়াযীদ ইবনু যুরায়', তিনি শু'বাহ, তিনি সুলাইমান আল-আ’মাশ, তিনি আবু যবইয়ান, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যে তিনি বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে কোনো শিশু হজ্ব করে, অতঃপর সে বালেগ হয়, তবে তার উপর আরেকটি হজ্ব করা আবশ্যক। আর যে কোনো বেদুইন (আরবী) হজ্ব করে, অতঃপর হিজরত করে, তার উপর আরেকটি হজ্ব আবশ্যক। আর যে কোনো দাস হজ্ব করে, অতঃপর সে আযাদ হয়, তার উপর আরেকটি হজ্ব আবশ্যক।”

ইমাম হাকিম বলেছেন: “এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ।”

কিন্তু হাফেয ইবনু হাজার আত-তালখীস গ্রন্থে (২/২২০) বলেন: “এটি ইবনু খুযায়মা (৩০৫০), ইসমাঈলী তাঁর মুসনাদ আল-আ’মাশ-এ, হাকিম, বায়হাকী, ইবনু হাযম—তিনি এটিকে সহীহ বলেছেন—এবং খতীব আত-তারীখ-এ মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল, তিনি ইয়াযীদ ইবনু যুরায়', তিনি শু'বাহ, তিনি আল-আ’মাশ, তিনি আবু যবইয়ান, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। ইবনু খুযায়মা বলেছেন: সহীহ হলো এটি মাওকুফ। তিনি ইবনু আবী আদী-এর সূত্রে শু’বাহ থেকে এটিকে মাওকুফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। বায়হাকী বলেছেন: মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল একাই এটি মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর সাওরী শু’বাহ থেকে এটিকে মাওকুফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।”

আমি (ভাষ্যকার) বলি: হারিস ইবনু সুরাইজ আল-খাওয়ারিকীও এটিকে ইয়াযীদ ইবনু যুরায়', তিনি শু’বাহ-এর সূত্রে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

তার সূত্রে ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (২/৬১৫) হারিস ইবনু সুরাইজ আন-নাকাল-এর জীবনীতে এটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: “এই হাদীসটি মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল, তিনি ইয়াযীদ ইবনু যুরায়'-এর সূত্রে পরিচিত। আমার মনে হয় হারিস ইবনু সুরাইজ এটি তার কাছ থেকে চুরি করেছেন। আমি জানি না যে, ইয়াযীদ ইবনু যুরায়'-এর সূত্রে এঁরা দুজন ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেছেন। ইবনু আবী আদী ও তাঁর সাথীরা শু’বাহ থেকে এটিকে মাওকুফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।”

আমি (ভাষ্যকার) বলি: এই হারিস ইবনু সুরাইজ সম্পর্কে মতভেদ আছে। ইবনু মাঈন ও ইবনু হিব্বান প্রমুখ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন। আবার এক বর্ণনায় ইবনু মাঈন তাকে দুর্বল বলেছেন। এমনকি মূসা ইবনু হারূন আল-হাম্মাল তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন এবং তার বিরুদ্ধে অভিযোগ এনেছেন, যেমনটি ইবনু আদী ‘আল-কামিল’-এ উল্লেখ করেছেন। তাই তার অনুসরণ (মুতাবা’আহ) কোনো সুবিধা দেয় না।

ইমাম তিরমিযী বলেছেন: “আহলে ইলম ঐকমত্যে পৌঁছেছেন যে, কোনো শিশু বালেগ হওয়ার আগে হজ্ব করলে, বালেগ হওয়ার পর তার উপর আবার হজ্ব করা আবশ্যক। ইসলামের ফরজ হজ্বের জন্য সেই হজ্ব যথেষ্ট হবে না। একইভাবে কোনো দাস যদি তার দাসত্বকালে হজ্ব করে, অতঃপর সে স্বাধীন হয়, তবে পথ পেলে তার উপরও হজ্ব করা আবশ্যক। তার দাসত্বকালে করা হজ্ব তার জন্য যথেষ্ট হবে না। এটি সুফিয়ান সাওরী, শাফেঈ, আহমাদ এবং ইসহাক (রহ.)-এর বক্তব্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (4655)


4655 - عن * *




৪৬৫৫ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (4656)


4656 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مهلّين بالحجّ في أشهر الحجّ، وفي حُرُم الحجّ، وليالي الحجّ حتى نزلنا بسرف … الحديث.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1560)، ومسلم في الحج (1211: 123) كلاهما من طريق أفلح بن حميد، قال: سمعت القاسم بن محمد، عن عائشة، به، فذكرته بطوله.

قوله:"وحُرُم الحج" بضم الحاء المهملة والرّاء أي أزمنته وأمكنته وحالاته، ورُوي بفتح الراء"حَرَم" جمع حُرْمة أي ممنوعات الحج ومحرماته. انظر: فتح الباري (3/ 4




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হাজ্জের ইহরামের তালবিয়াহ পাঠকারী অবস্থায় বের হলাম, হাজ্জের মাসগুলোতে, হাজ্জের পবিত্র সময় ও সীমাগুলোতে এবং হাজ্জের রাতগুলোতে, যতক্ষণ না আমরা সারাফ নামক স্থানে অবতরণ করলাম। ... হাদীস।









আল-জামি` আল-কামিল (4657)


4657 - عن عبد الله بن عمر؛ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَال:"يُهِلُّ أَهْلُ الْمَدِينَةِ مِنْ ذِي الْحُلَيْفَةِ، وَيُهِلُّ أَهْلُ الشَّامِ مِن الْجُحْفَةِ، وَيُهِلُّ أَهْلُ نَجْدٍ مِنْ قَرْنٍ".

قَالَ عَبْدُ الله بْنُ عُمَرَ: وبَلَغَنِي أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"وَيُهِلُّ أَهْلُ الْيَمَنِ مِنْ يَلَمْلَمَ".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (22) عن نافع، عن ابن عمر، به.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1525)، ومسلم في الحج (1182: 13) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه مالك أيضًا (23) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر أنه قال:"أَمَرَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَهْلَ الْمَدِينَةِ أَن يُهِلُّوا من ذِي الْحُلَيْفَةِ وَأَهْلَ الشَّامِ من الْجُحْفَةِ وَأَهْلَ نَجْدٍ من قَرْنٍ".

قال عبد الله بن عمر: أَمَّا هَؤُلاءِ الثَّلاثُ فَسَمِعْتُهُنَّ مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَأَخْبِرْتُ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"وَيُهِلُّ أَهْلُ الْيَمَنِ مِنْ يَلَمْلَمَ".

ورواه البخاريّ أيضًا (1528)، ومسلم (1182: 14) من طريق يونس، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، به، نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মদীনার অধিবাসীরা যুল-হুলাইফা থেকে ইহরাম বাঁধবে, সিরিয়াবাসীরা জুহফা থেকে ইহরাম বাঁধবে, এবং নাজদবাসীরা কার্ন (কার্নুল মানাযিল) থেকে ইহরাম বাঁধবে।"

আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার নিকট এই সংবাদ পৌঁছেছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এবং ইয়ামানবাসীরা ইয়ালামলাম থেকে ইহরাম বাঁধবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4658)


4658 - عن عبد الله بن عمر، أنه قال: بَيْدَاؤُكُمْ هَذِهِ الَّتِي تَكْذِبُون عَلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِيهَا! مَا أَهَلَّ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِلا مِنْ عِنْدِ الْمَسْجِدِ يَعْنِي مَسْجِدَ ذِي الْحُلَيْفَة.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (30) عن موسى بن عقبة، عن سالم بن عبد الله، أنه سمع أباه يقول (فذكره).

ورواه البخاريّ في الحج (1541)، ومسلم في الحج (1186) كلاهما من طريق مالك، به، ولفظ مسلم مثله. واقتصر البخاريّ على الشّطر الأخير.

قوله:"بيداؤكم" البيداء: أرض واسعة عند نهاية ذي الحليفة في الاتجاه إلى مكة.

قال المطري:"رأيت كثيرًا من الحجّاج يتجاوزون ما حول المسجد -يعني مسجد ذي الحليفة- إلى جهة الغرب ويصعدون إلى البيداء، فيتجاوزون الميقات بيقين …"."معجَم الأمكنة الوارد ذكرها في صحيح البخاري" (ص 97).




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের এই বাইদা, যে ব্যাপারে তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যা আরোপ করো! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদ সংলগ্ন স্থান ছাড়া (তালবিয়ার মাধ্যমে) ইহরামের ঘোষণা দেননি। অর্থাৎ যুল-হুলায়ফার মসজিদ।









আল-জামি` আল-কামিল (4659)


4659 - عن زيد بن جبير: أنه أتي عبد الله بن عمر في منزله -وله فُسطاط وسُرادق-، فسألته: من أين يجوز أن أعتمر؟ قال: فرضها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لأهل نجد قرْنًا، ولأهل المدينة ذا الحليفة، ولأهل الشّام الجُحْفة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1522) عن مالك بن إسماعيل، حدّثنا زهير (هو ابن معاوية)، حدّثني زيد بن جبير، به، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (1182) من أوجه أخرى عن ابن عمر -من غير طريق زيد بن جبير-، وليس في ألفاظها ذكر العمرة.

قوله:"وله فسطاط وسرادق" المراد بالفسطاط: الخيمة، وهو أيضًا مما يغطى به صحن الدّار من الشمس وغيرها.

والسّرادق: هو ما أحاط بالشيء، ومنه قوله تعالى: {إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا} [الكهف: 29].




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যায়দ ইবনু জুবায়র বলেন: তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়িতে এলেন—তখন তাঁর একটি তাবু ও একটি চাঁদোয়া ছিল—আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: কোন্ স্থান থেকে ইহরাম বাঁধলে আমার উমরাহ করা বৈধ হবে? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নজদবাসীদের জন্য ‘কর্ন’, মদীনা বাসীদের জন্য ‘যুল-হুলাইফা’ এবং সিরিয়াবাসীদের জন্য ‘জুহফা’ মীকাত হিসেবে নির্ধারণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4660)


4660 - عن ابن عبّاس، قال: وَقَّتَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لأَهْلِ الْمَدِينَةِ ذَا الْحُلَيْفَةِ وَلأَهْلِ الشَّامِ الْجُحْفَةَ، وَلأَهْلِ نَجْدٍ قَرْنَ الْمَنَازِلِ، وَلأَهْلِ الْيَمَنِ يَلَمْلَمَ فَهُنَّ لَهُنَّ وَلِمَنْ أَتَى عَلَيْهِنَّ مِنْ غَيْرِ أَهْلِهِنَّ مِمَنْ أَرادَ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ فَمَنْ كَانَ دُونَهُنَّ فَمُهَلُّهُ مِنْ أَهْلِهِ وَكَذَاكَ حَتَّى أَهْلُ مَكَّةَ يُهِلُّونَ مِنْهَا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1526)، ومسلم في الحج (1181: 11) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس، ولفظهما سواء.

رواه البخاريّ أيضًا (1530)، ومسلم (1181: 12) من طريق وُهيب، عن عبد الله بن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، به، نحوه.

وقوله:"ممن أراد الحجّ والعمرة" فيه بيان أن الإحرام من هذه المواقيت إنما يجب على من كان مروره بها قاصدًا حجًّا أو عمرة دون من لم يرد شيئًا منهما.

فلو أنّ مدنيًّا مرّ بذي الحليفة وهو لا يريد حجًا ولا عمرة فسار حتى قرب من الحرم، فأراد الحج أو العمرة، فإنه يحرم من حيث حضرته النية ولا يجب عليه دم كما يجب على من خرج من بيته يريد الحجّ أو العمرة فطوى الميقات وأحرم بعد ما جاوزه. أفاده الخطابي.

قوله:"فمن كان دونهن فمهله من أهله" أي ميقاته منزله وبيته ولا يجاوزه من غير إحرام إنْ أراد الحج والعمرة، وأما أهل مكة فإن أرادوا الحج فيهل من بيته، وإن أراد العمرة فيخرج إلى الحل، ويحرم منه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনাবাসীদের জন্য যুল-হুলাইফা, শামবাসীদের জন্য জুহ্ফা, নজদবাসীদের জন্য কারনুল-মানাঝিল এবং ইয়ামানবাসীদের জন্য ইয়ালামলাম নির্ধারণ করেছেন। এই স্থানগুলো ঐ অঞ্চলের অধিবাসীদের জন্য, এবং যারা হজ্জ অথবা উমরার উদ্দেশ্যে অন্যান্য অঞ্চল থেকে ঐ স্থানগুলোর উপর দিয়ে আসে তাদের জন্যও। আর যারা এই মীকাতগুলোর ভেতরের দিকে (মক্কার নিকটবর্তী) বসবাস করে, তাদের ইহরাম বাঁধার স্থান হলো তাদের নিজেদের বাড়ি থেকে। এমনকি মক্কাবাসীরাও মক্কা থেকে ইহরাম বাঁধবে।









আল-জামি` আল-কামিল (4661)


4661 - عن أَبي الزُّبَير أَنَّهُ سَمِعَ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللهِ رضي الله عنهما يُسْأَلُ عَنِ المُهَلِّ؟ فَقَالَ: سَمِعْتُ -أَحْسَبُهُ رَفَعَ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم- فَقَالَ:"مُهَلُّ أَهْلِ الْمَدِينَةِ مِنْ ذِي الْحُلَيْفَةِ، وَالطَّرِيقُ الآخَرُ الْجُحْفَةُ، وَمُهَلُّ أَهْلِ الْعِرَاقِ مِنْ ذَاتِ عِرْقٍ، وَمُهَلُّ أَهْلِ نَجْدٍ مِنْ قَرْنٍ، وَمُهَلُّ أَهْلِ الْيَمَنِ مِنْ يَلَمْلَمَ".

صحيح: رواه مسلم (1183) من طرق عن محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، به، فذكره.

هكذا رواه ابن جريج على الشّك، وبناء عليه ضعّفه النووي في"المجموع" (7/ 194) وذكر أن ابن ماجه (2915) رواه من طريق إبراهيم بن يزيد الخوري -بضم المعجمة- باسناده عن جابر مرفوعًا بغير شكّ. لكن الخوزيّ ضعيف لا يحتجّ بروايته.

ورواه الإمام أحمد (6697) عن جابر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بلا شك أيضًا، لكن من رواية الحجاج ابن أرطاة وهو ضعيف" انتهى.
وفاتته طريق ثالثة وهي ما رواه البيهقي (5/ 27) بإسناد حسن من طريق ابن وهب قال: أخبرني ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ومهلّ العراق من ذات عرق". ورواية عبد الله بن وهب عن ابن لهيعة مستقيمة.

ورواه الإمام أحمد (14615) عن حسن، حدّثنا ابن لهيعة، حدّثنا أبو الزبير، قال: سألت جابرًا عن المهلّ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"مهل أهل المدينة من ذي الحليفة، ومهل أهل الطريق الأخرى من الجحفة، ومهل أهل العراق من ذات عرق، ومهل أهل نجد من قرن، ومهل أهل اليمن من يلملم".

وفاتته أيضًا طريق رابعة، وهي ما أشار إليها البيهقيّ عن ابن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن أبي الزبير إلّا أنّ البيهقيّ قال:"والصحيح رواية ابن جريج" انتهى.

وترجيح البيهقيّ رواية ابن جريج المشكوك في رفعها من دون اعتبار من لم يشك في رفعه فيه نظر، وخاصة رواية ابن لهيعة التي عن أحد العبادلة عنه.

وقد قال كثير من أهل العلم: إذا روى عنه أحد العبادلة وهم: ابن المبارك، وابن وهب، والمقرئ فهو صحيح. ذكره عبد الغني بن سعيد الأزديّ، والسّاجي وغيرهما.

ومتابعة حسن وهو ابن موسى الأشيب لابن وهب يقوّي أن ابن لهيعة لم يخطئ فيه ولم يختلط.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইহরামের স্থান (আল-মুহাল বা মি’কাত) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছেন। তখন তিনি (জাবির) বললেন: আমি শুনেছি – আমার ধারণা, তিনি এটিকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে সম্পৃক্ত করেছেন – তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “মদিনাবাসীদের ইহরাম বাঁধার স্থান হলো যুল-হুলাইফা, এবং অন্য পথের (যাত্রীদের ইহরামের স্থান হলো) জুহফা, ইরাকবাসীদের ইহরাম বাঁধার স্থান হলো যাতু ইরক, নজদবাসীদের ইহরাম বাঁধার স্থান হলো কারন, আর ইয়ামানবাসীদের ইহরাম বাঁধার স্থান হলো ইয়ালামলাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (4662)


4662 - عن عائشة قالت: وقّت رَسُول اللهِ صلى الله عليه وسلم لأَهْلِ الْمَدِينَةِ ذَا الْحُلِيْفَةِ، ولأَهْلِ الشَّامِ وَمِصْرَ الْجُحْفَةَ، ولأَهْلِ الْعِرَاقِ ذَاتَ عِرْقٍ، ولأَهْلِ نجد قرنًا، ولأهل الْيَمَنِ يَلَمْلَمَ.

صحيح: رواه النسائيّ (2656) عن محمد بن عبد الله بن عمار الموصليّ، قال: حدّثنا أبو هاشم محمد بن علي، عن المعافى بن عمران، عن أفلح (هو ابن حميد)، عن القاسم، عن عائشة، فذكرته.

رواه أبو داود (1739)، والنسائيّ (2653) كلاهما من حديث هشام بن بهرام المدائنيّ، حدّثنا المعافي بن عمران، بإسناده فذكره مثله إلّا أنّ أبا داود اختصره بلفظ:"وقّت رسول الله صلى الله عليه وسلم لأهل العراق ذات عرق".

وأبو هاشم محمد بن علي هو الأسدي، قال فيه العجلي:"ثقة رجل صالح". قال محمد بن غالب التمتام: قلت ليحيى بن معين: كتبت"جامع الثوري" عن أبي هاشم عن المعافى. فقال يحيى: بلغني أنّ هذا الرجل نظير المعافي أو أفضل منه. والخلاصة أنه"ثقة".

ثم هو لم ينفرد في ذكر ذات العرق لأهل العراق بل تابعه أيضًا هشام بن بهرام كما في رواية أبي داود، وهشام بن بهرام قال فيه ابن معين: لا بأس به، وقال أبو حاتم: صدوق. ووثقه ابن سعد والعجليّ، وذكره ابن حبان في الثقات. وأخرجه أيضًا البيهقيّ (5/ 28) من طريقه بالتفصيل الذي عند النسائي وقال: رواه أبو داود عن هشام مختصرًا.
ولكن ذكر ابن عدي في"الكامل" في ترجمة (أفلح بن حميد) (1/ 408): أن الإمام أحمد أنكر على أفلح في هذا الحديث قوله:"ولأهل العراق ذات عرق" ولم ينكر الباقي من إسناده ومتنه شيئًا.

وقال: قال ابن صاعد: كان أحمد بن حنبل ينكر هذا الحديث مع غيره على أفلح بن حميد. فقيل له: يروي عنه غير المعافي؟ فقال: المعافي بن عمران ثقة.

قال ابن عدي:"أفلح بن حميد أشهر من ذاك، وقد حدّث عنه ثقات الناس، مثل ابن أبي زائدة، ووكيع، وابن وهب، وآخرهم القعنبي، وهو عندي صالح، وأحاديثه أرجو أن تكون مستقيمة كلها. وهذا الحديث ينفرد به معافي عنه".

قلت: فهو يحمل هذا التفرد على المعافى بن عمران الذي أكّد فيه الإمام أحمد بأنه ثقة.

والمقصود بالتّفرد هنا قوله:"وقّت رسول الله صلى الله عليه وسلم لأهل العراق ذات عرق"، ولكن له شواهد كما تقدم، وكما سيأتي.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনার অধিবাসীদের জন্য যুল-হুলাইফাকে, সিরিয়া ও মিসরের অধিবাসীদের জন্য জুহফাকে, ইরাকের অধিবাসীদের জন্য যাতু ইরক্বকে, নজদের অধিবাসীদের জন্য কারনকে এবং ইয়েমেনের অধিবাসীদের জন্য ইয়ালামলামকে (ইহরামের) মীকাত নির্ধারণ করে দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4663)


4663 - عن ابن عمر، عَنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ وَقَّتَ لأَهْلِ الْمَدِينَةِ ذَا الْحُلَيْفَةِ، وَلَأَهْلِ الشَّامِ الْجُحْفَةَ، وَلأَهْلِ نَجْدٍ قَرْنًا، وَلأَهْلِ الْعِرَاقِ ذَاتَ عِرْقٍ، وَلأَهْلِ الْيَمَنِ يَلَمْلَمَ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (5492) عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، سمعت صدقة بن يسار، قال: سمعت ابن عمر يحدّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"ولأهل العراق … إلخ" لم يسمعه ابن عمر من النبيّ صلى الله عليه وسلم وإنّما سمعه من بعض الصّحابة، كما يدل عليه ما رواه أبو نعيم في"الحلية" (4/ 93 - 94) من طريق جعفر بن برقان، عن ميمون بن مهران، عن ابن عمر قال: وقت رسول الله صلى الله عليه وسلم لأهل المدينة ذا الحليفة، ولأهل اليمن يلملم، ولأهل الشام الجحفة، ولأهل الطّائف قرنًا قال ابن عمر: وحدّثني أصحابنا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم وقّت لأهل العراق ذات عرق.

قال أبو نعيم:"هذا حديث صحيح ثابت من حديث ميمون، لم نكتبه إلّا من حديث جعفر عنه".

وهذا الحديث يكون جوابًا من ابن عمر في قوله في بداية الأمر لما سئل عن العراق، فقال:"لا عراق يومئذ" وهو ما رواه الإمام أحمد (4584) عن سفيان، سمع صدقةُ ابن عمر يقول -يعني عن النبي صلى الله عليه وسلم-:"يهل أهل نجد من قرن، وأهل الشام من الجحفة، وأهل اليمن من يلملم".

ولم يسمعه ابن عمر، وسمع النبي صلى الله عليه وسلم"مُهلّ أهل المدينة ذا الحليفة" قالوا له: فأين أهل العراق؟ قال ابن عمر: لم يكن يومئذ. ورواه أيضًا (6257) عن جرير، عن صدقة بن يسار، نحوه.

وقوله:"ولم يسمعه ابن عمر" أي"أهل اليمن من يلملم" كما ثبت ذلك في الصّحيحين كما سبق.

ثم عرف ذلك بواسطة بعض الصّحابة أن النبي صلى الله عليه وسلم وقت لأهل اليمن يلملم، ولأهل العراق ذات عرق.

فكان ابن عمر أحيانًا يضيف ذلك إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، ومرسل الصحابي حجة باتفاق، وأحيانًا
يضيفه إلى مَنْ أخبره به مِن الصّحابة. ويفهم من هذا أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أخبر بهذه المواقيت في أوقات مختلفة، والله أعلم.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনার অধিবাসীদের জন্য যুল-হুলাইফাহকে, সিরিয়ার (শামের) অধিবাসীদের জন্য জুহফাহকে, নজদের অধিবাসীদের জন্য কর্ণকে, ইরাকের অধিবাসীদের জন্য যাতু ইরক্বকে এবং ইয়ামানের অধিবাসীদের জন্য ইয়ালামলামকে মীকাত (ইহরাম বাঁধার স্থান) হিসেবে নির্দিষ্ট করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4664)


4664 - عن الحارث بن عمرو السّهميّ، قال:"أَتَيْتُ رَسُول الله صلى الله عليه وسلم وَهُوَ بِمِنًى أَوْ بِعَرَفَاتٍ وَقَدْ أَطَافَ بِهِ النَّاسُ قَالَ فَتَجِيءُ الأَعْرَابُ فَإِذَا رَأَوْا وَجْهَهُ قَالُوا: هَذَا وَجْهٌ مُبَارَكٌ. قَال: وَوَقَّتَ ذَاتَ عِرْقٍ لأَهْلِ الْعِرَاقِ".

حسن: رواه أبو داود (1742) عن أبي معمر عبد الله بن عمرو بن أبي الحجاج، حدّثنا عبد الوارث، حدّثنا عتبة بن عبد الملك السّهميّ، حدثني زرارة بن كُريم، أن الحارث بن عمرو السهمي حدّثه فذكره.

ورواه الدارقطني (2502)، والبيهقي (5/ 28) كلاهما من حديث أبي معمر عبد الله بن عمرو، فذكرا مثله. وزاد البيهقي بعد قوله:"ذات عرق لأهل العراق""ولأهل المشرق".

وقال البيهقي: وإلى هذا ذهب عروة بن الزبير فيما رواه هشام بن عروة عنه قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم وقّت لأهل المشرق ذات عرق.

قلت: إنه مرسل جيد.

وحديث الحارث بن عمرو حسن من أجل زرارة بن كريم بن الحارث بن عمرو السهميّ قالوا: له رؤية. ولكن ذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 267) في ثقات التابعين.

وقول البيهقي في"المعرفة" (7/ 96):"وفي إسناده من هو غير معروف" الصواب أنهم معروفون.

وفي الباب أحاديث أخرى ذكرها الزيلعيّ في نصب الراية (3/ 14) إلا أنها معلولة كلها.

وأما ما رُوي عن ابن عباس:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم وقّت لأهل المشرق العقيق" فإسناده ضعيف.

رواه أبو داود (1740)، والترمذيّ (832) كلاهما من حديث وكيع، عن سفيان، عن يزيد بن أبي زياد، عن محمد بن علي بن عبد الله بن عباس، عن ابن عباس، فذكره. ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (3205). قال الترمذي: حسن.

قلت: ليس هو بحسن، بل هو ضعيف لسببين:

السبب الأول: أن فيه يزيد بن أبي زياد فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم.

قال النووي في"المجموع" (7/ 195) رادًا على تحسين الترمذي:"هو ضعيف باتفاق المحدثين".

وقد ضعّفه قبله المنذري، وقال البيهقي في"المعرفة" (3/ 533): تفرّد به يزيد بن أبي زياد.

والسبب الثاني: أن فيه انقطاعًا فإن محمد بن علي لم يسمع من جده ابن عباس، وإنما الصحيح أنه يروي عن أبيه، عن جدّه.

قال ابن القطان في كتابه"بيان الوهم والإيهام":"هذا حديث أخاف أن يكون منقطعًا؛ فإن
محمد بن علي بن عبد الله بن عباس إنما عهد يروي عن أبيه عن جده ابن عباس كما جاء ذلك في صحيح مسلم - في صلاته صلى الله عليه وسلم من الليل".

وقال مسلم في كتاب"التمييز":"لا نعلم له سماعًا من جده ولا أنه لقيه". ولم يذكر البخاريّ ولا ابن أبي حاتم أنه يروي عن جدّه، وذكر أنه يروي عن أبيه" انتهى. انظر:"نصب الراية" (3/ 14).

ولم يخرج هذا الحديث الشافعيّ في"الأم" إلا أنه نفي أن يكون النبي صلى الله عليه وسلم وقت لأهل المشرق ذات عرق، وقال: أخبرنا الثقة عن أيوب، عن ابن سيرين أن عمر بن الخطاب وقّت ذات عرق لأهل المشرق. وقال: وهذا عن عمر بن الخطاب مرسلًا. وذات عرق شبيه بقرن في القرب بيلملم. ولو أهلوا من العقيق كان أحب إليّ."الأم" (2/ 138).

فالظاهر من قوله هذا أنه لم يبلغه إليه توقيت عمر بن الخطاب إلا مرسلًا؛ فلذا لم يقل به، ولو جاءه موصولًا كان أحرص الناس للأخذ به، وبالله التوفيق.

قال البيهقي في الصغرى (1497):"وبين العقيق وذات عرق يسير، وقد استحب الشافعي للإحرام منه".

ونقل النووي في"المجموع" (7/ 197 - 198) فقال الشافعي في المختصر والمصنف، وسائر الأصحاب ولو أحرم أهل الشرق من العقيق كان أفضل، وهو واد وراء ذات عرق مما يلي المشرق.

وقال أصحابنا: والاعتماد في ذلك ما في العقيق من الاحتياط. قيل: وفيه سلامة من التباس وقع في ذات عرق؛ لأنّ ذات عرق قرية خربت وحول بناؤها إلى جهة مكة، فالاحتياط الإحرام قبل موضع بنائها الآن. قالوا: ويجب على من أتي من جهة العراق أن يتحرى ويطلب آثار القرية العتيقة ويُحرم حيث ينتهي إليها.

قال الشافعي:"ومن علاماتها المقابر القديمة، فإذا انتهى إليها أحرم. واستأنس المصنف والأصحاب في ذلك ما ذكرناه من الاحتياط بحديث توقيت العقيق السابق والله أعلم".




হারিস ইবনু আমর আস-সাহমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এলাম যখন তিনি মিনা অথবা আরাফাতের মাঠে ছিলেন, আর লোকেরা তাঁকে ঘিরে রেখেছিল। তিনি বলেন, এরপর বেদুঈনরা (আরব গ্রাম্য লোকেরা) আসত এবং যখন তারা তাঁর চেহারা দেখত, তখন তারা বলত: এই চেহারা বরকতময়। তিনি বলেন, এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরাকবাসীদের জন্য ‘যাতু ইর্ক্ব’কে (মীকা’ত হিসেবে) নির্ধারণ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4665)


4665 - عن ابن عمر قال: لَمَّا فُتِحَ هَذَانِ الْمِصْرَانِ أَتَوْا عُمَر فَقَالُوا: يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ! إِنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَدَّ لأَهْلِ نَجْدٍ قَرْنًا وَهُوَ جَوْرٌ عَنْ طَرِيقِنَا وَإِنَّا إِنْ أَرَدْنَا قَرْنًا شَقَّ عَلَيْنَا؟ قَالَ: فَانْظُرُوا حَذْوَهَا مِنْ طَرِيقِكُمْ فَحَدَّ لَهُمْ ذَاتَ عِرْق.

صحيح: رواه البخاري (1531) عن علي بن مسلم، حدّثنا عبد الله بن نمير، حدثنا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، به.

قوله:"المصران" تثنية مصر والمراد بهما الكوفة والبصرة وهما بالعراق.

قال البيهقي في"معرفة السنن والآثار":"يشبه أن يكون عمر لم يبلغه توقيت النبي صلى الله عليه وسلم ذات
عرق -إن كانت الأحاديث بذلك صحيحة- فوافق تحديده توقيت النبي صلى الله عليه وسلم".

هكذا علقه البيهقي، والصحيح الثابت الذي عليه أكثر أصحاب الشافعي أن توقيت أهل العراق منصوص عليه من النبي صلى الله عليه وسلم، وبه قال مالك وأحمد وأبو حنيفة وأصحابهم.

وأما كون العراق لم تفتح بعد فلا حجة فيه لمن ينكر التوقيت من النبيّ صلى الله عليه وسلم؛ لأنه صلى الله عليه وسلم وقّت لأهل الشام وهو لم يفتح بعد. وفي التمهيد (15/ 140):"قال قائلون: عمر هو الذي وقَّت العقيق لأهل العراق؛ لأنها فتحت في زمانه.

وقال آخرون: هذه غفلة من قائلي هذا القول، لأنه عليه السلام هو الذي وقّت لأهل العراق ذات عرق والعقيق كما وقّت لأهل الشام الجحفة، والشام كلها يومئذ دار كفر كالعراق، فوقّت المواقيت لأهل النواحي، لأنه علم أن الله سيفتح على أمته الشام والعراق وغيرها، ولم يفتح الشام والعراق إلا على عهد عمر بلا خلاف. وقد قال عليه السلام:"منعت العراق دينارها ودرهمها" الحديث معناه عند أهل العلم: ستمنع" انتهى.



سليمان بن سحيم مولي آل جبير، عن يحيى بن أبي سفيان الأخنسي، عن أمه أم حكيم ابنة أمية بن الأخنس، عن أمّ سلمة، قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أهلّ من المسجد الأقصى بعمرة أو بحجّة غفر له ما تقدّم من ذنبه".

قال: فركبت أم حكيم عند ذلك الحديث إلى بيت المقدس حتى أهلّت بعمرة.

ورواه ابن حبان في صحيحه (3701) من طريق أبي خيثمة، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، بإسناده. وفيه"مولي آل حنين" بدلا من"آل جبير". وفيه أيضًا"أم حكيم بنت أبي أمية بن الأخنس" بدلًا من"ابنة أمية" ولم يذكر فيه"أو بحجة".

ورواه أيضًا الإمام أحمد (26557) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا جعفر بن ربيعة، عن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، عن أم حكيم السلمية، عن أم سلمة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أحرم من بيت المقدس غفر الله له ما تقدم من ذنبه".

وللحديث أسانيد أخرى يظهر منها أن الرواة لم يكونوا ضابطين متقنين لإسناده؛ ولذا قال كثير من أهل العلم منهم: ابن حزم، والنووي، وابن تيمية، وغيرهم بأن هذا الحديث لا يثبت لاضطرابه الشديد في الإسناد والمتن.

قال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن":"حديث أم سلمة، قال غير واحد من الحفاظ إسناده ليس بالقوي، وقد سئل عبد الله بن عبد الرحمن بن يحنس: هل قال:"ووجبت له الجنة" أو قال:"أو وجبت" بالشك بدل قوله"غفر له ما تقدم من ذنبه وما تأخّر"، هذا هو الصواب بـ"أو". في كثير من النسخ:"ووجبت" بالواو وهو غلط" انتهى.

وفي الباب أيضًا عن الحسن بن هادية قال: لقيت ابن عمر فقال: ممن أنت؟ قلت: من أهل عمان، قال: من أهل عمان؟ قلت: نعم. قال: أفلا أحدثك ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قلت: بلي. فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّي لأعلم أرضًا يقال لها: عُمان، ينضح بجانبها البحر، الحجّة منها أفضل من حجّتين من غيرهما".

رواه الإمام أحمد (4853)، والبيهقي (4/ 335) عن يزيد، أخبرنا جرير بن حازم، وإسحاق بن عيسي، حدثنا جرير بن حازم، عن الزبير بن الخرّيت، عن الحسن بن هادية، فذكره.

والحسن بن هادية لم يرو عنه إلا الزبير بن الخريت، ولم يؤثر عنه توثيق أحد غير ابن حبان في ثقاته (4/ 123 - 124) ولهذا فهو مجهول عند جمهور أهل العلم.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 217) وقال:"رجاله ثقات".

وقد ذهب جماعة من الصحابة إلى جواز تقديم الإحرام على الميقات من المكان البعيد كما ثبت ذلك عن ابن عمر أنه أهل من إيلياء. ذكره مالك عن الثقة عنه. ووصله البيهقي (5/ 30) من طريق ابن شهاب، عن نافع، عن ابن عمر، وذلك عام حكم الحكمين.
قال الشافعي:"إذا كان ابن عمر روي عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه وقّت المواقيت، وأهَلَّ من إيلياء .... فدلّ على أنه لم يحظر أن يحرم من ورائه، ولكنه أمر أن لا يتجاوزه حاج ولا معتمر إلَّا بإحرام".

وهو مذهب أبي حنيفة، والمذهب الثاني للشافعي.

وذهب الجمهور ومنهم مالك، والشافعي، وأحمد، وغيرهم إلى أن الأفضل أن يحرم من الميقات؛ لأن النبيّ صلى الله عليه وسلم أحرم من الميقات، وهو لا يفعل إلا الأفضل، ولأنه يشبه الإحرام بالحجّ قبل أشهر الحج وهو مكروه.

انظر للمزيد:"المنة الكبري" (3/ 530 - 531) فإن فيها تفاصيل أخرى، وبالله التوفيق.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই দুটি শহর (কুফা ও বসরা) জয় করা হলো, তখন লোকেরা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজদবাসীদের জন্য 'কার্ন'কে মিকাত নির্ধারণ করেছেন, কিন্তু তা আমাদের পথ থেকে কিছুটা দূরে (বা কষ্টকর)। আর আমরা যদি 'কার্ন' পর্যন্ত যেতে চাই, তবে তা আমাদের জন্য কষ্টকর হবে। তিনি (উমর) বললেন: তোমরা তোমাদের পথে এর (কার্ন-এর) বরাবর এমন একটি স্থান দেখো। অতঃপর তিনি তাদের জন্য 'জাতু ইরক্ব'কে মিকাত নির্ধারণ করলেন।

উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি বাইতুল মুকাদ্দাস (মসজিদুল আকসা) থেকে উমরাহ বা হজ্জের ইহরাম বাঁধবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হবে।” রাবী বলেন: এই হাদীস শুনে উম্মু হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাইতুল মুকাদ্দাসের উদ্দেশ্যে যাত্রা করলেন এবং সেখান থেকে উমরার ইহরাম বাঁধলেন।

এই বিষয়ে আরও বর্ণিত আছে, আল-হাসান ইবনু হাদিয়াহ বলেন: আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কোন্ এলাকার? আমি বললাম: আমি উমানবাসী। তিনি বললেন: উমানবাসী? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে যা শুনেছি তা কি তোমাকে বলবো না? আমি বললাম: অবশ্যই। অতঃপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আমি এমন একটি স্থান সম্পর্কে জানি, যাকে উমান বলা হয়, যার একপাশে সমুদ্র তরঙ্গায়িত হয়। সেখান থেকে একটি হজ্জ করা অন্য স্থান থেকে দু’টি হজ্জ করার চেয়েও উত্তম।”









আল-জামি` আল-কামিল (4666)


4666 - عن أنس بن مالك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل مكّة عام الفتح، وعلى رأسه الْمِغْفَر، فلمّا نزعه جاءه رجلٌ فقال له: يا رسول الله! ابنُ خَطَل مُتعلِّقٌ بأستار الكعبة؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اقتُلوه".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (247) عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك، به، فذكره.

ورواه البخاريّ في جزاء الصّيد (1846)، ومسلم في الحج (1357) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

قوله:"المغفر" هو ما يلبس على الرأس من درع الحديد مثل القلنسوة.

وبوّب عليه البخاريّ بقوله:"باب دخول الحرم ومكة بغير إحرام" ولم يقيده بالعذر. وقال:"ودخل ابن عمر، وإنما أمر النبيّ صلى الله عليه وسلم بالإهلال لمن أراد الحج والعمرة، ولم يذكر للحطابين وغيرهم". انتهى.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর মক্কায় প্রবেশ করেছিলেন, আর তাঁর মাথায় ছিল একটি মিগফার (শিরস্ত্রাণ)। যখন তিনি সেটি খুলে ফেললেন, তখন একজন লোক তাঁর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ইবনু খাতাল কাবাঘরের পর্দা ধরে ঝুলে আছে? তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তাকে হত্যা কর।"









আল-জামি` আল-কামিল (4667)


4667 - عن جابر بن عبد الله، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل مكة وعليه عمامة سوداء بغير إحرام.

وفي لفظ: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دخل يوم فتح مكة وعليه عمامة سوداء.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1358) من طريق معاوية بن عمار الدّهني، عن أبي الزبير، عن جابر. واللفظ الآخر من طريق عمار الدّهني، عن أبي الزبير، به.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম ছাড়াই কালো পাগড়ি পরিহিত অবস্থায় মক্কায় প্রবেশ করেছিলেন।

অন্য এক বর্ণনায়: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন প্রবেশ করেছিলেন, যখন তাঁর মাথায় ছিল একটি কালো পাগড়ি।