আল-জামি` আল-কামিল
4668 - عن عمرو بن حريث، قال:"كَأَنِّي أَنْظُرُ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى الْمِنْبَرِ وَعَلَيْهِ عِمَامَةٌ سَوْدَاءُ قَدْ أَرْخَى طَرَفَيْهَا بَيْنَ كَتِفَيْهِ".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1359) من طريق مساور الورّاق، قال: سمعت جعفر بن عمرو ابن حريث، عن أبيه، فذكره.
وأما ما رُوي عن ابن عباس:"الرجل يهل من أهله، ومن بعد ما يجاوز أين شاء، ولا يجاوز
الميقات إلا محرما" فالصّواب أنه موقوف على ابن عباس.
رواه الشافعي في الأم (2/ 138) وإن صح مسندًا فمعناه: لمن أراد الحج أو العمرة لا يتجاوز الميقات إلا بإحرام حتى لا يكون بينه وبين الأحاديث تعارض.
আমর ইবনু হুরাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি যেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বারের ওপর দেখছি এবং তাঁর মাথায় একটি কালো পাগড়ি ছিল, যার দুই দিক তিনি তাঁর দু’কাঁধের মাঝখানে ঝুলিয়ে দিয়েছিলেন।
4669 - عن * *
৪৬৬৯ - ... থেকে বর্ণিত।
4670 - عن عائشة قالت: نفِستْ أسماءُ بنت عُميس بمحمد بن أبي بكر بالشَّجرة، فأمر رسولُ الله أبا بكر يأمُرها أن تغتسل وتهلّ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1209) من أوجه عن عبدة بن سليمان، عن عبيد الله بن عمر، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসমা বিনত উমায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাজারাহ নামক স্থানে মুহাম্মাদ ইবনু আবী বকরকে জন্ম দেন (বা তার নিফাস শুরু হয়)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন, যেন তিনি আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গোসল করতে এবং তালবিয়া পাঠ করে ইহরাম বাঁধতে আদেশ করেন।
4671 - عن عائشة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يُحرم غسل رأسه بخطْمي وأُشنان، ودهنه بشيء من زيت غير كثير.
حسن: رواه أحمد (24490)، والبزار -كشف الأستار (1085) -، والدارقطني (2451) كلّهم من حديث زكريا بن عديّ، حدّثنا عبيد الله بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
واللّفظ للبزار والدارقطني. وأما أحمد فذكر فيه قصة اعتمارها من التنعيم.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الله بن محمد بن عقيل إلا أنه حسن الحديث كما مرّ تفصيله مرارًا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইহরাম বাঁধতে চাইতেন, তখন তিনি খিতমী ও উশনান দ্বারা তাঁর মাথা ধুতেন এবং সামান্য পরিমাণ তেল দ্বারা তাতে মালিশ করতেন।
4672 - عن جابر بن عبد الله، قال: فَخَرَجْنَا مَعَهُ حَتَّى أَتَيْنَا ذَا الْحُلَيْفَةِ فَوَلَدَتْ أَسْمَاءُ بِنْتُ عُمَيْسٍ مُحَمَّدَ بْنَ أَبِي بَكْرٍ فَأَرْسَلَتْ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم: كَيْفَ أَصْنَعُ؟ قَالَ:"اغْتَسِلِي وَاسْتَثْفِرِي بِثَوْبٍ وَأَحْرِمِي".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره، وهو جزء من حديث طويل.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম, এমনকি আমরা যুল-হুলাইফায় পৌঁছলাম। তখন আসমা বিনত উমাইস সেখানে মুহাম্মাদ ইবনু আবূ বাকরকে প্রসব করলেন। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দূত পাঠালেন (এবং জিজ্ঞেস করলেন): আমি কী করব? তিনি বললেন: তুমি গোসল করো, কাপড় দিয়ে (লজ্জাস্থান শক্ত করে) বেঁধে নাও এবং ইহরাম বাঁধো।
4673 - عن ابن عباس: أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"الْحَائِضُ وَالنُّفَسَاءُ إِذَا أَتَتَا عَلَى الْوَقْتِ تَغْتَسِلانِ وَتُحْرِمَانِ وتَقْضِيَانِ الْمَنَاسِكَ كُلَّهَا غَيْرَ الطَّوَافِ بِالْبَيْتِ".
قَالَ أَبُو مُعَمَرٍ فِي حَدِيثِهِ:"حَتَّى تَطْهُرَ".
وَلَمْ يَذْكُر ابْنُ عِيسَي عِكْرِمَةَ وَمُجَاهِدًا، قَالَ: عَنْ عَطَاءٍ عَن ابْنِ عَبَّاسٍ.
وَلَمْ يَقُل ابْنُ عِيسَي:"كُلَّهَا". قَالَ:"الْمَنَاسِكَ إِلا الطَّوَافَ بِالْبَيْت".
حسن: رواه أبو داود (1744)، والترمذي (945) كلاهما من طريق مروان بن شجاع الجزري، عن خصيف، عن عكرمة ومجاهد وعطاء، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه.
قلت: وهو كما قال، فإنّ خصيفًا هو ابن عبد الرحمن الجزري مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد تكلم فيه لسوء حفظه إلا أنه لازم مجاهدًا، فروايته عنه أعدل من غيره، ويشهد له الحديثان السابقان.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ঋতুমতী নারী এবং সন্তান প্রসবের পর রক্তস্রাবযুক্ত নারী যখন (ইহরামের) নির্ধারিত সময়ে পৌঁছবে, তখন তারা গোসল করবে, ইহরাম বাঁধবে এবং বাইতুল্লাহর তাওয়াফ ব্যতীত সমস্ত হজের অনুষ্ঠানাদি (মানাসিক) পালন করবে।"
4674 - عن زيد بن ثابت، أنه رأى النبيّ صلى الله عليه وسلم تجرّد لإهلاله واغتسل.
حسن: رواه الترمذي (830) عن عبد الله بن أبي زياد، حدَّثنا عبد الله بن يعقوب المدني، عن ابن أبي الزناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه، فذكره.
قال الترمذيّ: هذا حديث حسن غريب.
قلت: وهو كما قال فإنّ فيه ابن أبي الزّناد وهو عبد الرحمن، وهو كما في التقريب:"صدوق تغير حفظه لما قدم بغداد، وكان فقيهًا".
ولكن الراوي عنه عبد الله بن يعقوب المدني"مجهول الحال" كما في"التقريب" إلّا أنه توبع لما رواه الدارقطنيّ (2434)، وعنه البيهقيّ (5/ 32) قال: ثنا يحيى بن صاعد، ثنا يحيى بن خالد أبو سليمان المخزوميّ، حدّثني أبو غزية محمد بن موسى، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، بإسناده، مثله. قال البيهقيّ:"أبو غزية ليس بالقوي".
ثم رواه البيهقيّ من وجه آخر عن الأسود بن عامر شاذان، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، بإسناده، مثله. وهي متابعة أخري لعبد الله بن يعقوب المدني.
والأسود بن عامر الشاميّ، يلقب بشاذان ثقة من رجال الجماعة. وبهذه المتابعة صار الحديث حسنًا، وإنما لم يصحّحه الترمذيّ للكلام الذي في عبد الرحمن بن أبي الزّناد.
যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছেন যে তিনি তাঁর ইহরামের জন্য (কাপড় পরিবর্তন করে/খুলে) প্রস্তুত হয়েছেন এবং গোসল করেছেন।
4675 - عن ابن عمر، قال: من السنة أن يغتسل الرجل إذا أراد أن يُحرم، وإذا أراد أن يدخل مكة.
صحيح: رواه الدارقطنيّ (2433)، والحاكم (1/ 447)، والبيهقيّ (5/ 33)، والبزار -كشف الأستار (1084) - كلّهم من طريق سهل بن يوسف، حدّثنا حميد، عن بكر بن عبد الله، عن ابن عمر، فذكره إلّا أن الأخير لم يذكر دخول مكة.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: بل هو على شرط البخاريّ وحده، فإن سهل بن يوسف وهو الأنماطيّ لم يخرج له مسلم. وبكر بن عبد الله هو المزنيّ، وحميد هو ابن أبي حميد الطويل.
وقول ابن عمر:"من السنة" أي من المرفوع، كما قال جمهور أهل العلم بأن قول الصحابي: من السنة يراد به المرفوع.
وفي الباب ما روي عن ابن عباس قال: اغتسل رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم لبس ثيابه، فلما أتي ذا الحليفة صلى ركعتين، ثم قعد على بعيره، فلما استوى به على البيداء أحرم بالحج.
رواه الدارقطني (2432)، والحاكم (1/ 447) وعنه البيهقي (5/ 33) عن يعقوب بن عطاء بن أبي رباح، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.
قال البيهقي: يعقوب بن عطاء غير قوي.
قلت: وهو كما قال، فقد ضعّفه أبو زرعة والنسائي، وابن معين وغيرهم. وقال أحمد:"منكر الحديث" لأنّ الصحيح الثابت أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بات في ذي الحليفة فأصبح واغتسل ولبس الإحرام.
وأحاديث الباب تدل على مشروعية الغسل للإحرام، وهو سنة مؤكدة لدى الأئمة الأربعة وجمهور الفقهاء، فإن توضأ ولم يغتسل فلا بأس به.
وأما الحائض والنفساء ففي حقهنّ الغسل آكد من غسل الرجال والنساء الطاهرات وليس بواجب. انظر:"المنة الكبري" (3/ 538).
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সুন্নাত হলো, যখন কোনো ব্যক্তি ইহরাম বাঁধতে চায় এবং যখন মক্কায় প্রবেশ করতে চায়, তখন সে গোসল করবে।
4676 - عن عائشة، أنها قالت: كنتُ أطيّب رسولَ الله صلى الله عليه وسلم لإحرامه قبل أن يحرم، ولحلّه قبل أن يطوف بالبيت.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (17) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، به.
ورواه البخاريّ في الحج (1539)، ومسلم في الحج (1189: 33) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর ইহ্রাম বাঁধার আগে ইহ্রামের জন্য এবং বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করার আগে হালাল হওয়ার জন্য সুগন্ধি মাখিয়ে দিতাম।
4677 - عن عائشة قالت: كأنّي أنظر إلى وَبيص الطّيب في مَفْرَق رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو محرم.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1538)، ومسلم في الحج (1190: 39) كلاهما من طريق منصور، عن إبراهيم النخعيّ، عن الأسود، عن عائشة، به، واللفظ لمسلم.
وقولها:"وبيص الطيب" وفي رواية أخرى:"وبيص المسك" أي بريقه. يقال: وبص الشيء وبصَّ بصيصًا إذا برق. ذكره الخطابيّ.
وفي الحديث دليل على أن الطيب لو بقي أثره على المحرم في حال إحرامه لا يضره خلافًا لمن كره استعمال الطيب عند الإحرام، أو لمن كره بقاء أثره بعد الإحرام.
وأما ما رواه ابن ماجه (2928) من طريق شريك، عن أبي إسحاق السبيعي، عن الأسود، عن
عائشة، قالت:"كأني أرى وبيص الطيب في مفرق رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ثلاثة، وهو محرم" فهو ضعيف؛ لسوء حفظ شريك فإن أحدًا لم يتابعه على قوله"بعد ثلاثة".
وفي الإسناد أيضًا أبو إسحاق وهو مدلّس مختلط، وتابعه إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، ولكن الراوي عنه عطاء بن السائب وهو مختلط أيضًا.
رواه البيهقيّ في الكبرى (5/ 35)، والصغرى -المنة الكبرى (1507) - من حديث سعيد بن زيد، عن عطاء بن السائب.
ولم يكن سعيد بن زيد ممن سمع من عطاء قبل الاختلاط.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথার সিঁথিতে সুগন্ধির চাকচিক্য দেখতে পাচ্ছি, অথচ তিনি ইহরাম অবস্থায় ছিলেন।
4678 - عن عائشة، قالت: كُنَّا نَخْرُجُ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم إِلَى مَكَّةَ فَنُضَمِّدُ جِبَاهَنَا بِالسُّكِّ الْمُطَيَّبِ عِنْدَ الإِحْرَامِ، فَإِذَا عَرِقَتْ إِحْدَانَا سَالَ عَلَى وَجْهِهَا فَيَرَاهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَلا يَنْهَاهَا.
صحيح: رواه أبو داود (1830) عن الحسين بن الجنيد الدامغانيّ، حدّثنا أبو أسامة، أخبرني عمر بن سويد الثقفيّ، حدثتني عائشة بنت طلحة، أنّ عائشة أمّ المؤمنين حدّثتها قالت (فذكرته).
وإسناده حسن من أجل شيخ أبي داود وهو الحسين بن الجنيد فإنه لا بأس به، ولم يرتق إلى الثقات الضابطين.
وحسّن إسناده أيضًا المنذريّ في"مختصره".
ولكن رواه الإمام أحمد (24502) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، حدثنا عمر بن سويد، قال: سمعت عائشة بنت طلحة تذكر -أو ذكر عندها- المحرم يتطيب، فذكرت عن عائشة أم المؤمنين:"أنهن كنّ يخرجن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عليهن الضِّماد، قد اضطمدن قبل أن يحرمن، ثم يغتسلن وهو عليهنّ، يعرقن ويغتسلن لا ينهاهنّ عنه".
وهذا إسناد رجاله ثقات، وبهذا صحَّ الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হতাম। ইহরামের সময় আমরা আমাদের কপালে সুগন্ধিযুক্ত ‘সুক্ক’ (সুক্কুল মুতায়্যিব) দিয়ে প্রলেপ দিতাম। যখন আমাদের কারো শরীর থেকে ঘাম বের হতো, তখন তা তার চেহারার উপর গড়িয়ে পড়ত। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা দেখতে পেতেন, কিন্তু তিনি তাকে নিষেধ করতেন না।
4679 - عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر، عن أبيه، قال: سَأَلْتُ عَبْدَ اللهِ بن عُمَرَ رضي الله عنهما عَن الرَّجُلِ يَتَطَيَّبُ ثُمَّ يُصْبِحُ مُحْرِمًا؟ فَقَال: مَا أُحِبُّ أَنْ أُصْبِحَ مُحْرِمًا أَنْضَخُ طِيبًا لأَنْ أَطَّلِيَ بِقَطِرَانٍ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْ أَنْ أَفْعَلَ ذَلِكَ. فَدَخَلْتُ عَلَى عَائِشَةَ رضي الله عنها فَأَخْبَرْتُهَا أَنَّ ابْنَ عُمَرَ قَالَ مَا أُحِبُّ أَنْ أُصْبِحَ مُحْرِمًا أَنْضَخُ طِيبًا لأَنْ أَطَّلِيَ بِقَطِرَانٍ أَحَبُّ إِلَيَّ مِنْ أَنْ أَفْعَلَ ذَلِكَ! فَقَالَتْ عَائِشَةُ: أَنَا طَيَّبْتُ رَسُول اللهِ صلى الله عليه وسلم عِنْدَ إِحْرَامِهِ، ثُمَّ طَافَ فِي نِسَائِهِ ثُمَّ أَصْبَحَ مُحْرِمًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الغسل (270)، ومسلم في الحج (1192: 47) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر، به. واللفظ لمسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (মুহাম্মাদ ইবনুল মুনতাশিরের পিতা বলেন) আমি আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেই ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, যে ব্যক্তি সুগন্ধি ব্যবহার করে এবং এরপর সকালে মুহরিম অবস্থায় প্রবেশ করে? তিনি বললেন: আমি এমন অবস্থায় সকালে মুহরিম হতে পছন্দ করি না যে আমি সুগন্ধি দ্বারা সিক্ত থাকি। আমি যেন আলকাতরা মেখে নেই, তা আমার নিকট এর চেয়ে অধিক প্রিয় যে আমি এরূপ করি। অতঃপর আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম এবং তাঁকে জানালাম যে, ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, আমি এমন অবস্থায় সকালে মুহরিম হতে পছন্দ করি না যে আমি সুগন্ধি দ্বারা সিক্ত থাকি। আমি যেন আলকাতরা মেখে নেই, তা আমার নিকট এর চেয়ে অধিক প্রিয় যে আমি এরূপ করি! তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি নিজেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর ইহরামের সময় সুগন্ধি লাগিয়ে দিয়েছিলাম, এরপর তিনি তাঁর স্ত্রীদের সঙ্গে ছিলেন, অতঃপর সকালে মুহরিম অবস্থায় প্রবেশ করলেন।
4680 - عن نافع، قال: كَانَ ابْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما إذا أَرَادَ الْخُرُوجَ إِلَى مَكَّةَ ادَّهَنَ
بِدُهْنٍ لَيْسَ لَهُ رَائِحَةٌ طَيِّبَةٌ، ثُمَّ يَأْتِي مَسْجِدَ ذِي الْحُلَيْفَةِ فَيُصَلِّي، ثُمَّ يَرْكَبُ وَإِذَا اسْتَوَتْ بِهِ رَاحِلَتُهُ قَاِئمَةً أَحْرَمَ ثُمَّ قَال:"هَكَذَا رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَفْعَلُ".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1554) عن سليمان بن داود أبي الربيع، حدّثنا فليح، عن نافع، به.
وأما ما رُوي عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم"أنّه ادّهن بزيت غير مقتّت وهو محرم" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (962)، وابن ماجه (3083)، والإمام أحمد (4782) وابن خزيمة (2652) كلّهم من طريق حماد بن سلمة، عن فرقد السّبخيّ، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر، فذكره.
المقتّت: المطيّب. قاله الترمذي، وقال:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من حديث فرقد السّبخيّ عن سعيد بن جبير، وقد تكلم يحيى بن سعيد في فرقد السبخيّ، وروى عنه الناس".
قلت: وهو كما قال فإنه تكلم فيه غير واحد من أهل العلم.
قال ابن خزيمة: أنا خائف أن يكون فرقد السبخيّ واهمًا في رفعه هذا الخبر. فإنّ الثوريّ روي عن منصور، عن سعيد بن جبير، قال:"كان ابن عمر يدهن بالزيت حين يريد أن يحرم".
ومن هذا الوجه أخرجه البخاريّ في الحجّ (1537)، وابن خزيمة في صحيحه (2653) وقال:"ومنصور بن المعتمر أحفظ وأعلم بالحديث وأتقن من عدد مثلي فرقد السبخي، وهكذا رواه حجاج بن منهال، عن حماد" انتهى.
ثم قال: ورواه وكيع بن الجراح، عن حماد بن سلمة، فقال:"عند الإحرام". ورواه الهيثم بن جميل، عن حماد فقال:"إذا أراد أن يحرم".
وردّ عليه ابن خزيمة فقال:"اللّفظة التي ذكرها وكيع والتي ذكرها الهيثم ابن جميل لو كان الدُّهن مقتّتًا بأطيب الطيب جاز الادّهان به إذا أراد الإحرام، إذ النبيّ صلى الله عليه وسلم قد تطيّب حين أراد الإحرام بطيب فيه مسك، والمسك أطيب الطيب على ما خبّر المصطفي صلى الله عليه وسلم".
وفي صحيح البخاريّ (1537) عن سعيد بن جبير، قال:"كان ابن عمر يدّهن بالزيت" فذكرته لإبراهيم: فقال: ما تصنع بقوله: حدثني الأسود، عن عائشة، قالت:"كأني أنظر إلى وبيص الطيب في مفارق رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو محرم".
والخلاصة فيه أن حديث ابن عمر موقوف عليه؛ لأنّ أصحاب حماد بن سلمة اختلفوا عليه، فوهم فرقد السّبخيّ فرفعه وغيره وقفوه.
كان ابن عمر بن الخطاب رضي الله عنه يكره استدامة الطيب بعد الإحرام، وابنه عبد الله يتبعه في ذلك، وكانت عائشة تنكر عليه.
روي سعيد بن منصور من طريق عبد الله بن عبد الله بن عمر، أنّ عائشة كانت تقول:"لا بأس بأن يمس الطيب عند الإحرام" قال:"فدعوت رجلًا وأنا جالس بجنب ابن عمر، فأرسلته إليها،
وقد علمت قولها ولكن أحببتُ أن يسمعه أبي، فجاءني رسولي، فقال: إن عائشة تقول: لا بأس بالطيب عند الإحرام فأصبْ ما بدا لك. قال: فسكت ابن عمر".
وكذلك كان سالم بن عبد الله بن عمر يخالف أباه وجده في ذلك لحديث عائشة.
قال ابن عيينة: أخبرنا عمرو بن دينار، عن سالم، أنه ذكر قول عمر في الطيب، ثم قال: قالت عائشة (فذكر الحديث).
قال سالم:"سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم أحق أن نتبع" ذكره الحافظ في"الفتح".
নাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন মক্কার উদ্দেশ্যে বের হতে চাইতেন, তখন তিনি এমন তেল ব্যবহার করতেন যার কোনো সুগন্ধি ছিল না। এরপর তিনি যুল-হুলাইফা মসজিদে আসতেন এবং সালাত আদায় করতেন, তারপর আরোহণ করতেন। যখন তাঁর সওয়ারি সোজা হয়ে দাঁড়াতো, তখন তিনি ইহরাম বাঁধতেন। এরপর তিনি বলতেন: "আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঠিক এভাবেই করতে দেখেছি।"
4681 - عن يعلى بن أمية أنه كَانَ يَقُولُ لِعُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضي الله عنه: لَيْتَنِي أَرَى نَبِيَّ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ يُنْزَلُ عَلَيْه، فَلَمَّا كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بالْجِعْرَانَةِ وَعَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ثَوْبٌ قَدْ أُظِلَّ بِهِ عَلَيْهِ مَعَهُ نَاسٌ مِنْ أَصْحَابِهِ فِيهِمْ عُمَرُ، إِذْ جَاءَهُ رَجُلٌ عَلَيْهِ جُبَّةٌ صُوفٍ مُتَضَمِّخٌ بِطيبٍ فَقَال: يَا رَسُول اللهِ، كَيْفَ تَرَى فِي رَجُلٍ أَحْرَمَ بِعُمْرَةٍ فِي جُبَّةٍ بَعْدَ مَا تَضَمَّخَ بِطِيبٍ؟ فَنَظَرَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم سَاعَةً ثُمَّ سَكَتَ، فَجَاءَهُ الْوَحْيُ فَأَشَارَ عُمَرُ بِيَدِهِ إِلَى يَعْلَي بْنِ أُمَيَّةَ: تَعَالَ فَجَاءَ يَعْلَي فَأَدْخَلَ رَأْسَهُ فَإِذَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مُحْمَرُّ الْوَجْهِ يَغِطُّ سَاعَةً ثُمَّ سُرِّيَ عَنْهُ فَقَال:"أَيْنَ الَّذِي سَأَلَنِي عَن الْعُمْرَةِ آنِفًا؟". فَالْتُمِسَ الرَّجُلُ فَجِيءَ بِهِ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"أَمَّا الطِّيبُ الَّذِي بِكَ فَاغْسِلْهُ ثَلاثَ مَرَّاتٍ، وأَمَّا الْجُبَّةُ فَانْزِعْهَا ثُمَّ اصْنَعْ فِي عُمْرَتِكَ مَا تَصْنَعُ فِي حَجِّكَ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1536)، ومسلم في الحج (1180: 8) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أن صفوان بن يعلى ابن أمية أخبره، أن يعلي كان يقول لعمر بن الخطاب، فذكره. واللفظ لمسلم.
وزاد النسائيّ (2668) في آخر الحديث:"ثم أحدث إحرامًا". وقال:"ما أعلم أحدًا قاله غير نوح بن حبيب (شيخه) ولا أحسبه محفوظًا" انتهى.
ইয়া'লা ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতেন, "হায়! যদি আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তখন দেখতে পেতাম, যখন তাঁর ওপর ওহী নাযিল হয়।"
এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জি'ইর্রানাতে ছিলেন, আর তাঁর ওপর একখানা কাপড় দ্বারা ছায়া দেওয়া হয়েছিল এবং তাঁর সাথে তাঁর সাহাবীগণের একটি দল ছিল, যাঁদের মধ্যে উমারও ছিলেন, তখন তাঁর কাছে এক ব্যক্তি এলো, যার পরনে ছিল পশমের জুব্বা (পোশাক), আর সে সুগন্ধি মাখা ছিল। লোকটি বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এক ব্যক্তি জুব্বা পরিহিত অবস্থায় সুগন্ধি মেখে উমরার ইহরাম বেঁধেছে—এ বিষয়ে আপনি কী বলেন?"
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ তার দিকে তাকিয়ে রইলেন, তারপর নীরব থাকলেন। এরপর তাঁর ওপর ওহী নাযিল হলো। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাত দ্বারা ইয়া'লা ইবনু উমাইয়াকে ইশারা করলেন, "এসো!" ইয়া'লা এলেন এবং তাঁর মাথা প্রবেশ করালেন (ছায়ার নিচে)। তিনি দেখলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক লাল হয়ে গেছে এবং তিনি কিছুক্ষণ 'ঘড়-ঘড়' শব্দ করছেন। এরপর তাঁর থেকে (ওহীর তীব্রতা) দূর হলো।
তিনি বললেন, "কোথায় সে লোকটি, যে এইমাত্র আমাকে উমরাহ সম্পর্কে প্রশ্ন করেছিল?" তখন লোকটিকে খোঁজা হলো এবং তাকে আনা হলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার শরীরে যে সুগন্ধি আছে, তা তিনবার ধুয়ে ফেলো, আর জুব্বাটি খুলে ফেলো। এরপর তোমার উমরাহর ক্ষেত্রে তাই করো, যা তুমি তোমার হাজ্জের (হজের) ক্ষেত্রে করে থাকো।"
4682 - عن عبد الله بن عمر، أَنَّ رَجُلل سَأَلَ رَسُول اللهِ صلى الله عليه وسلم مَا يَلْبَسُ الْمُحْرِمُ مِن الثِّيَابِ؟ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"لا تَلْبَسُوا الْقُمُصَ، وَلا الْعَمَائِمَ، وَلا السَّرَاوِيلاتِ، وَلا الْبَرَانِسَ، وَلا الْخِفَافَ، إِلا أَحَدٌ لا يَجِدُ نَعْلَيْنِ فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ وَلْيَقْطَعْهُمَا أَسْفَلَ مِنَ الْكَعْبَيْنِ، وَلا تَلْبَسُوا مِنَ الثِّيَابِ شَيْئًا مَسَّهُ الزَّعْفَرَانُ وَلا الْوَرْسُ".
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (8) عن نافع، عن ابن عمر، به.
ورواه البخاريّ في الحج (1542)، ومسلم في الحج (1177) كلاهما من طريق مالك، به، مثله. قوله:"الورْس" نبت أصفر طيب الريح يصبغ به.
قال ابن العربي:"ليس الورْس بطيب، ولكنه نبّه به على اجتناب الطيب وما يشبهه في ملاءمة الشّم، فيؤخذ منه تحريم أنواع الطيب على المحرم وهو مجمع عليه فيما يقصد به التطيّب". فتح الباري (3/ 404).
وقوله:"ولا تلبسوا من الثياب شيئًا …" فيه دليل على أنّ المحرم ممنوع عن استعمال الطيب في بدنه وثيابه رجلًا كان أو امرأة.
وكذلك لا يجوز له أن يشم شيئًا من نبات الأرض مما يعدّ طيبًا كالورد والزّعفران والورس.
واختلفوا في الرّيحان، سئل عثمان عن المحرم: هل يدخل البستان؟ قال:"نعم ويشم الرّيحان". وقال جابر:"لا يشم".
والعُصفر ليس بطيب روي ذلك عن جابر، وإن عائشة لبست الثياب المعصفرة وهي محرمة. ويجوز للمحرم الادّهان إذا لم يكن فيه خلط من الطيب.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল যে, ইহরামকারী (মুহ্রিম) কী ধরনের পোশাক পরিধান করবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা জামা, পাগড়ি, পায়জামা, হুডযুক্ত আলখাল্লা (বারানিস) এবং মোজা পরিধান করবে না। তবে যদি কেউ জুতা না পায়, তবে সে মোজা পরিধান করবে এবং সেটিকে গোড়ালির নিচ থেকে কেটে নিবে। আর জাফরান বা ওয়ার্স (নামক হলুদ সুগন্ধি রঞ্জক) মিশ্রিত কোনো পোশাক তোমরা পরিধান করবে না।"
4683 - عن ابن عمر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يلبس المحرم ثوبًا مصبوغًا بورْس أو بزعفران، وقال:"من لم يجد نعلين فليلبس خفين وليقطعهما أسفل من الكعبين".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (9) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ورواه مسلم في الحج (1177: 3) من طريق مالك بإسناده، مثله.
ورواه البخاريّ في اللباس (5847) من حديث سفيان، عن عبد الله بن دينار، بإسناده، مثله إلّا أنه لم يذكر فيه قوله:"من لم يجد نعلين …".
আবদুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইহরামকারীকে ওয়ারস (wars) অথবা জাফরান দ্বারা রং করা পোশাক পরিধান করতে নিষেধ করেছেন। আর তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুতা খুঁজে পাবে না, সে যেন মোজা (খুফ্ফাইন) পরিধান করে এবং সে দুটোকে যেন গোড়ালির নিচে কেটে ফেলে।"
4684 - عن ابن عمر، أَنَّهُ وَجَدَ الْقُرَّ فَقَال: أَلْقِ عَلَيَّ ثَوْبًا يَا نَافِعُ، فَأَلْقَيْتُ عَلَيْهِ بُرْنُسًا. فَقَال: تُلْقِي عَلَيَّ هَذَا! وَقَدْ نَهَى رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَلْبَسَهُ الْمُحْرِمُ.
صحيح: رواه أبو داود (1828) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا حماد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده صحيح، وقد رواه أيضًا الإمام أحمد (6266) عن محمد بن عبد الرحمن الطّفاويّ، حدّثنا أيوب، بإسناده، نحوه.
وهذه متابعة قوية لحماد وهو ابن سلمة فإنه تغيّر في آخره.
وعند الإمام أحمد (4856) إسناد آخر. رواه عن يزيد، أخبرنا جرير بن حازم، حدّثنا نافع، قال: وجد ابن عمر القُرّ وهو محرم، فذكر نحوه.
والقرّ: البرد.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঠাণ্ডা অনুভব করলেন এবং বললেন: "হে নাফি', আমার উপর একটি কাপড় দাও।" তখন আমি তাঁর উপর একটি 'বুরনুস' (টুপিওয়ালা পোশাক) দিলাম। তিনি বললেন: "তুমি কি আমার উপর এইটা দিচ্ছো! অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহরিম ব্যক্তিকে তা পরিধান করতে নিষেধ করেছেন।
4685 - عن عبد الله بن عباس، قال: خَطَبَنَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بَعَرَفَاتٍ فَقَالَ:"مَنْ لَمْ يَجِد الإِزَارَ فَلَيَلْبَس السَّرَاوِيل، وَمَنْ لَمْ يَجِد النَّعْلَيْنِ فَلْيَلْبَس الْخُفَّيْنِ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1841)، ومسلم في الحج (1178) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن دينار، سمعت جابر بن زيد، سمعت ابن عباس، فذكره، واللفظ للبخاريّ.
ورواه مسلم أيضًا من أوجه أخرى، عن عمرو بن دينار، به، بلفظ:"سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ويخطب يقول ...." ولم يذكروا"عرفات".
قال الإمام مسلم:"ولم يذكر أحدٌ منهم:"يخطب بعرفات" غير شعبة وحده".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাতের ময়দানে আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা প্রদান করলেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি লুঙ্গি (ইযার) না পায়, সে যেন পায়জামা (সারাওয়িল) পরিধান করে, আর যে ব্যক্তি জুতা (না'লাইন) না পায়, সে যেন মোজা (খুফফাইন) পরিধান করে।"
4686 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَنْ لَمْ يَجِدْ نَعْلَيْنِ فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ وَمَنْ لَمْ يَجِدْ إِزَارًا فَلْيَلْبَسْ سَرَاوِيلَ".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1179) عن أحمد بن عبد الله بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا أبو الزبير، عن جابر، به.
اختلف أهل العلم في الجمع بين حديث ابن عمر في قطع الخفين، وحديث ابن عباس فإنه لم يذكر فيه القطع.
فذهب جمهور أهل العلم منهم الإمام أحمد إلى أن حديث ابن عباس عام، وحديث ابن عمر خاص ومقيد، وحمل المطلق على المقيد معروف في الشرع.
وللعلماء توجيهات أخرى ذكرتها في"المنة الكبرى" (4/ 30) بالتفصيل فراجعه تجد فيه ما يغنيك عن المطولات.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি দু’টি জুতো (নাল) পাবে না, সে যেন মোজা (খুফ্ফাইন) পরে নেয়। আর যে ব্যক্তি লুঙ্গি (ইযার) পাবে না, সে যেন পায়জামা (সারাওয়ীল) পরে নেয়।’
4687 - عن عبد الله بن عباس، أَنَّ رَجُلا كَانَ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَوَقَصَتْهُ نَاقَتُهُ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَمَاتَ فَقَال رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم:"اغْسِلُوهُ بِمَاءٍ وَسِدْرٍ، وَكَفِّنُوهُ فِي ثَوْبَيْهِ، وَلا تَمَسُّوهُ بِطِيبٍ، وَلا تُخَمِّرُوا رَأْسَهُ فَإِنَّهُ يُبْعَثُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مُلَبِّيًا".
وفي رواية:"ولا تخمِّروا رأسه ولا وجهه فإنّه يبعث يوم القيامة ملبيًّا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1851)، ومسلم في الحج (1206: 99) كلاهما من طريق هشيم (هو ابن بشير الواسطيّ)، أخبرنا أبو بِشْر (هو جعفر بن إياس اليشكريّ)، حدّثنا سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره، ولفظهما سواء غير أنّ مسلمًا قال:"ملبِّدًا" بدل"ملبِّيًا".
والرواية الثانية عند مسلم من طريق وكيع، عن سفيان، عن عمرو بن دينار، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس.
ورواه زهير، عن أبي الزبير، قال: سمعت سعيد بن جبير، وفيه:"وأن يكشفوا وجهه - حسبته قال: ورأسه".
ورواه إسرائيل عن منصور، عن سعيد بن جبير، وفيه:"لا تغطّوا وجهه" ولم يذكر الرّأس.
ورواه شعبة، قال: سمعت أبا بشر يحدّث عن سعيد بن جبير، وذكر فيه:"خارج رأسه". قال شعبة: ثم حدّثني بعد ذلك:"خارج رأسه ووجهه". وهذه الرّوايات كلّها في صحيح مسلم.
فالذي يظهر أنّ الخلاف كان على سعيد بن جبير نفسه، فمرة كان يجمع بين الرأس والوجه، وأخرى يذكر الرّأس وحده، وثالثة الوجه وحده، وهي كلّها صحيحة.
فلا وجه لإعلال هذه الزيادة كقول الحاكم في"معرفة علوم الحديث" (ص 148):"ذكر الوجه تصحيف من الرواة؛ لإجماع الثقات الأثبات من أصحاب عمرو بن دينار على روايته عنه:"ولا تغطّوا رأسه" وهو المحفوظ" وذلك من وجهين:
الأول: لقد ثبت ذكر الوجه في غير رواية عمرو بن دينار كما رأيت.
والثاني: كما قال الزيلعيّ في نصب الراية (3/ 28):"المرجع في ذلك إلى مسلم لا إلى الحاكم، فإنّ الحاكم كثير الأوهام، وأيضًا فالتصحيف إنّما يكون في الحروف المتشابهة، وأيّ مشابهة بين الوجه والرأس في الحروف؟ ! هذا على تقدير أن لا يذكر في الحديث غير الوجه، فكيف وقد جمع بينهما -أعني الرأس والوجه- والروايتان عند مسلم …" إلى قال:"هذا بعيد من التصحيف".
وقول البيهقيّ (3/ 393):"وذكر الوجه غريب" قول غريب؛ ولذا تعقبه ابن التركماني بقوله:"قد صح النهي عن تغطيتهما، فجمعهما بعضهم، وأفرد بعضهم الرأس، وبعضهم الوجه، والكل صحيح، ولا وهم في شيء منه، وهذا أولي من تغليط مسلم". وكذلك انتقده الحافظ في الفتح (8/ 54) قائلا:"فيه نظر، فإن الحديث ظاهره الصحة"، ثم سرد ألفاظ مسلم في ذكر الوجه.
قلت: وقد أجمع العلماء سلفًا وخلفًا على تحريم المحرم تغطية رأسه لقول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"ولا يلبس العمامة ولا البرنس".
واختلفوا في تغطية وجهه، فذهب أبو حنيفة ومالك وأحمد في رواية إلى ما في هذا الحديث من منع المحرم الذي مات من تخمير وجهه.
وكان ابن عمر يقول:"ما فوق الذقن من الرأس، فلا يخمره المحرم" رواه مالك في الحج (15).
وأما الإمام أحمد فعنده ثلاث روايات، الرواية الثانية: لا يغطي وجهه مستدلًا بحديث ابن عباس:"اغسلوه بما وسدر، وكفِّنوه في ثوبين، ولا تخمّروا وجهه ولا رأسه، فإنه يبعث يوم القيامة مُلَبِّيًا".
هذه رواية ابن منصور، وإسماعيل بن سعيد الشالنجي كلاهما عن أحمد.
وأما في رواية مهنا عنه، عن المحرم يموت هل يُغطّى وجهه؟ فقال: قد اختلفوا فيه عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال بعضهم: لا يغطى رأسه. قلت: أيهما أعجب إلك، يغطى وجه المحرم إذا مات أو لا يغطى؟ قال: أما الرأس فلا أرى أن يغطوه، وأما الوجه فأرجو أن لا يكون به بأس". انظر: شرح العمدة لشيخ الإسلام (2/ 52 - 53).
وقد رُوي عن جماعة من الصحابة منهم ابن عباس نفسه، وعثمان، وعبد الرحمن بن عوف، وابن الزبير، وزيد بن ثابت، وسعد بن أبي وقاص، وجابر بن عبد الله أنهم أجازوا للمحرم أن يغطى وجهه، فهم مخالفون لا بن عمر في ذلك.
وأمّا ما روي عن عثمان بن عفان، قال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يخمِّر وجهه وهو محرم". فالصواب أنه موقوف.
رواه الدارقطني في"العلل" (3/ 13) عن أبي بكر الشافعيّ، قال: حدّثنا موسى بن الحسن، ثنا القعنبيّ، ثنا ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن أبان بن عثمان، عن عثمان بن عفان، فذكره.
قال الدارقطني:"هكذا كان في كتاب أبي بكر مرفوعًا، والصواب موقوف". ثم ساق بإسناده عن سفيان (هو ابن عيينة)، قال: سمعت عبد الله بن أبي بكر يقول: أخبرني عبد الله بن عامر بن ربيعة:"أنه رأى عثمان بن عفان بالعرج مخمرًا وجهه بقطيفة أرجوان في يوم صائف وهو محرم".
قال ابن عيينة: كان سفيان الثوريّ يغلط فيه، يقول عن الفُرافصة. انتهى.
والفُرافصة هو ابن عمير الحنفيّ أنه رأى عثمان بن عفان بالعرج يغطي وجهه وهو محرم. رواه مالك في الحج (14) عن يحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد أنه قال: أخبرني الفُرافصة بن عمير الحنفيّ، فذكره.
وأخرجه البيهقيّ (5/ 54) من وجه آخر عن يحيى بن سعيد.
والخلاصة فيه كما قال بعض أهل العلم أن حديث الباب خاص بالمحرم الذي يموت، وحديث عثمان للمحرم الحي عند الحاجة.
وهو عكس ما قال به العلماء الحنفية أن حديث ابن عباس يحمل على المحرم الحي دون الميت المحرم، فحكمه عندهم كسائر الأموات في تغطية الرأس والوجه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিল। সে ইহরাম অবস্থায় ছিল। তখন তার উট তাকে আঘাত করে (বা ফেলে দেয়), ফলে সে মারা যায়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা তাকে পানি ও বরই পাতা (সিদর) দিয়ে গোসল দাও। তাকে তার (ইহরামের) দু’কাপড়েই কাফন দাও। তাকে সুগন্ধি লাগাবে না এবং তার মাথা ঢাকবে না। কারণ কিয়ামতের দিন তাকে তালবিয়াহ পাঠকারী অবস্থায় উঠানো হবে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমরা তার মাথা ও মুখমণ্ডল ঢাকবে না। কারণ কিয়ামতের দিন তাকে তালবিয়াহ পাঠকারী অবস্থায় উঠানো হবে।"
