আল-জামি` আল-কামিল
4681 - عن يعلى بن أمية أنه كَانَ يَقُولُ لِعُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضي الله عنه: لَيْتَنِي أَرَى نَبِيَّ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ يُنْزَلُ عَلَيْه، فَلَمَّا كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بالْجِعْرَانَةِ وَعَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ثَوْبٌ قَدْ أُظِلَّ بِهِ عَلَيْهِ مَعَهُ نَاسٌ مِنْ أَصْحَابِهِ فِيهِمْ عُمَرُ، إِذْ جَاءَهُ رَجُلٌ عَلَيْهِ جُبَّةٌ صُوفٍ مُتَضَمِّخٌ بِطيبٍ فَقَال: يَا رَسُول اللهِ، كَيْفَ تَرَى فِي رَجُلٍ أَحْرَمَ بِعُمْرَةٍ فِي جُبَّةٍ بَعْدَ مَا تَضَمَّخَ بِطِيبٍ؟ فَنَظَرَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم سَاعَةً ثُمَّ سَكَتَ، فَجَاءَهُ الْوَحْيُ فَأَشَارَ عُمَرُ بِيَدِهِ إِلَى يَعْلَي بْنِ أُمَيَّةَ: تَعَالَ فَجَاءَ يَعْلَي فَأَدْخَلَ رَأْسَهُ فَإِذَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مُحْمَرُّ الْوَجْهِ يَغِطُّ سَاعَةً ثُمَّ سُرِّيَ عَنْهُ فَقَال:"أَيْنَ الَّذِي سَأَلَنِي عَن الْعُمْرَةِ آنِفًا؟". فَالْتُمِسَ الرَّجُلُ فَجِيءَ بِهِ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"أَمَّا الطِّيبُ الَّذِي بِكَ فَاغْسِلْهُ ثَلاثَ مَرَّاتٍ، وأَمَّا الْجُبَّةُ فَانْزِعْهَا ثُمَّ اصْنَعْ فِي عُمْرَتِكَ مَا تَصْنَعُ فِي حَجِّكَ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1536)، ومسلم في الحج (1180: 8) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أن صفوان بن يعلى ابن أمية أخبره، أن يعلي كان يقول لعمر بن الخطاب، فذكره. واللفظ لمسلم.
وزاد النسائيّ (2668) في آخر الحديث:"ثم أحدث إحرامًا". وقال:"ما أعلم أحدًا قاله غير نوح بن حبيب (شيخه) ولا أحسبه محفوظًا" انتهى.
ইয়া'লা ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতেন, "হায়! যদি আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তখন দেখতে পেতাম, যখন তাঁর ওপর ওহী নাযিল হয়।"
এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জি'ইর্রানাতে ছিলেন, আর তাঁর ওপর একখানা কাপড় দ্বারা ছায়া দেওয়া হয়েছিল এবং তাঁর সাথে তাঁর সাহাবীগণের একটি দল ছিল, যাঁদের মধ্যে উমারও ছিলেন, তখন তাঁর কাছে এক ব্যক্তি এলো, যার পরনে ছিল পশমের জুব্বা (পোশাক), আর সে সুগন্ধি মাখা ছিল। লোকটি বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এক ব্যক্তি জুব্বা পরিহিত অবস্থায় সুগন্ধি মেখে উমরার ইহরাম বেঁধেছে—এ বিষয়ে আপনি কী বলেন?"
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ তার দিকে তাকিয়ে রইলেন, তারপর নীরব থাকলেন। এরপর তাঁর ওপর ওহী নাযিল হলো। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাত দ্বারা ইয়া'লা ইবনু উমাইয়াকে ইশারা করলেন, "এসো!" ইয়া'লা এলেন এবং তাঁর মাথা প্রবেশ করালেন (ছায়ার নিচে)। তিনি দেখলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক লাল হয়ে গেছে এবং তিনি কিছুক্ষণ 'ঘড়-ঘড়' শব্দ করছেন। এরপর তাঁর থেকে (ওহীর তীব্রতা) দূর হলো।
তিনি বললেন, "কোথায় সে লোকটি, যে এইমাত্র আমাকে উমরাহ সম্পর্কে প্রশ্ন করেছিল?" তখন লোকটিকে খোঁজা হলো এবং তাকে আনা হলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার শরীরে যে সুগন্ধি আছে, তা তিনবার ধুয়ে ফেলো, আর জুব্বাটি খুলে ফেলো। এরপর তোমার উমরাহর ক্ষেত্রে তাই করো, যা তুমি তোমার হাজ্জের (হজের) ক্ষেত্রে করে থাকো।"
4682 - عن عبد الله بن عمر، أَنَّ رَجُلل سَأَلَ رَسُول اللهِ صلى الله عليه وسلم مَا يَلْبَسُ الْمُحْرِمُ مِن الثِّيَابِ؟ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"لا تَلْبَسُوا الْقُمُصَ، وَلا الْعَمَائِمَ، وَلا السَّرَاوِيلاتِ، وَلا الْبَرَانِسَ، وَلا الْخِفَافَ، إِلا أَحَدٌ لا يَجِدُ نَعْلَيْنِ فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ وَلْيَقْطَعْهُمَا أَسْفَلَ مِنَ الْكَعْبَيْنِ، وَلا تَلْبَسُوا مِنَ الثِّيَابِ شَيْئًا مَسَّهُ الزَّعْفَرَانُ وَلا الْوَرْسُ".
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (8) عن نافع، عن ابن عمر، به.
ورواه البخاريّ في الحج (1542)، ومسلم في الحج (1177) كلاهما من طريق مالك، به، مثله. قوله:"الورْس" نبت أصفر طيب الريح يصبغ به.
قال ابن العربي:"ليس الورْس بطيب، ولكنه نبّه به على اجتناب الطيب وما يشبهه في ملاءمة الشّم، فيؤخذ منه تحريم أنواع الطيب على المحرم وهو مجمع عليه فيما يقصد به التطيّب". فتح الباري (3/ 404).
وقوله:"ولا تلبسوا من الثياب شيئًا …" فيه دليل على أنّ المحرم ممنوع عن استعمال الطيب في بدنه وثيابه رجلًا كان أو امرأة.
وكذلك لا يجوز له أن يشم شيئًا من نبات الأرض مما يعدّ طيبًا كالورد والزّعفران والورس.
واختلفوا في الرّيحان، سئل عثمان عن المحرم: هل يدخل البستان؟ قال:"نعم ويشم الرّيحان". وقال جابر:"لا يشم".
والعُصفر ليس بطيب روي ذلك عن جابر، وإن عائشة لبست الثياب المعصفرة وهي محرمة. ويجوز للمحرم الادّهان إذا لم يكن فيه خلط من الطيب.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল যে, ইহরামকারী (মুহ্রিম) কী ধরনের পোশাক পরিধান করবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা জামা, পাগড়ি, পায়জামা, হুডযুক্ত আলখাল্লা (বারানিস) এবং মোজা পরিধান করবে না। তবে যদি কেউ জুতা না পায়, তবে সে মোজা পরিধান করবে এবং সেটিকে গোড়ালির নিচ থেকে কেটে নিবে। আর জাফরান বা ওয়ার্স (নামক হলুদ সুগন্ধি রঞ্জক) মিশ্রিত কোনো পোশাক তোমরা পরিধান করবে না।"
4683 - عن ابن عمر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يلبس المحرم ثوبًا مصبوغًا بورْس أو بزعفران، وقال:"من لم يجد نعلين فليلبس خفين وليقطعهما أسفل من الكعبين".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (9) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ورواه مسلم في الحج (1177: 3) من طريق مالك بإسناده، مثله.
ورواه البخاريّ في اللباس (5847) من حديث سفيان، عن عبد الله بن دينار، بإسناده، مثله إلّا أنه لم يذكر فيه قوله:"من لم يجد نعلين …".
আবদুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইহরামকারীকে ওয়ারস (wars) অথবা জাফরান দ্বারা রং করা পোশাক পরিধান করতে নিষেধ করেছেন। আর তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুতা খুঁজে পাবে না, সে যেন মোজা (খুফ্ফাইন) পরিধান করে এবং সে দুটোকে যেন গোড়ালির নিচে কেটে ফেলে।"
4684 - عن ابن عمر، أَنَّهُ وَجَدَ الْقُرَّ فَقَال: أَلْقِ عَلَيَّ ثَوْبًا يَا نَافِعُ، فَأَلْقَيْتُ عَلَيْهِ بُرْنُسًا. فَقَال: تُلْقِي عَلَيَّ هَذَا! وَقَدْ نَهَى رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَلْبَسَهُ الْمُحْرِمُ.
صحيح: رواه أبو داود (1828) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا حماد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده صحيح، وقد رواه أيضًا الإمام أحمد (6266) عن محمد بن عبد الرحمن الطّفاويّ، حدّثنا أيوب، بإسناده، نحوه.
وهذه متابعة قوية لحماد وهو ابن سلمة فإنه تغيّر في آخره.
وعند الإمام أحمد (4856) إسناد آخر. رواه عن يزيد، أخبرنا جرير بن حازم، حدّثنا نافع، قال: وجد ابن عمر القُرّ وهو محرم، فذكر نحوه.
والقرّ: البرد.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঠাণ্ডা অনুভব করলেন এবং বললেন: "হে নাফি', আমার উপর একটি কাপড় দাও।" তখন আমি তাঁর উপর একটি 'বুরনুস' (টুপিওয়ালা পোশাক) দিলাম। তিনি বললেন: "তুমি কি আমার উপর এইটা দিচ্ছো! অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহরিম ব্যক্তিকে তা পরিধান করতে নিষেধ করেছেন।
4685 - عن عبد الله بن عباس، قال: خَطَبَنَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بَعَرَفَاتٍ فَقَالَ:"مَنْ لَمْ يَجِد الإِزَارَ فَلَيَلْبَس السَّرَاوِيل، وَمَنْ لَمْ يَجِد النَّعْلَيْنِ فَلْيَلْبَس الْخُفَّيْنِ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1841)، ومسلم في الحج (1178) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن دينار، سمعت جابر بن زيد، سمعت ابن عباس، فذكره، واللفظ للبخاريّ.
ورواه مسلم أيضًا من أوجه أخرى، عن عمرو بن دينار، به، بلفظ:"سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ويخطب يقول ...." ولم يذكروا"عرفات".
قال الإمام مسلم:"ولم يذكر أحدٌ منهم:"يخطب بعرفات" غير شعبة وحده".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাতের ময়দানে আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা প্রদান করলেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি লুঙ্গি (ইযার) না পায়, সে যেন পায়জামা (সারাওয়িল) পরিধান করে, আর যে ব্যক্তি জুতা (না'লাইন) না পায়, সে যেন মোজা (খুফফাইন) পরিধান করে।"
4686 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَنْ لَمْ يَجِدْ نَعْلَيْنِ فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ وَمَنْ لَمْ يَجِدْ إِزَارًا فَلْيَلْبَسْ سَرَاوِيلَ".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1179) عن أحمد بن عبد الله بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا أبو الزبير، عن جابر، به.
اختلف أهل العلم في الجمع بين حديث ابن عمر في قطع الخفين، وحديث ابن عباس فإنه لم يذكر فيه القطع.
فذهب جمهور أهل العلم منهم الإمام أحمد إلى أن حديث ابن عباس عام، وحديث ابن عمر خاص ومقيد، وحمل المطلق على المقيد معروف في الشرع.
وللعلماء توجيهات أخرى ذكرتها في"المنة الكبرى" (4/ 30) بالتفصيل فراجعه تجد فيه ما يغنيك عن المطولات.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি দু’টি জুতো (নাল) পাবে না, সে যেন মোজা (খুফ্ফাইন) পরে নেয়। আর যে ব্যক্তি লুঙ্গি (ইযার) পাবে না, সে যেন পায়জামা (সারাওয়ীল) পরে নেয়।’
4687 - عن عبد الله بن عباس، أَنَّ رَجُلا كَانَ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَوَقَصَتْهُ نَاقَتُهُ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَمَاتَ فَقَال رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم:"اغْسِلُوهُ بِمَاءٍ وَسِدْرٍ، وَكَفِّنُوهُ فِي ثَوْبَيْهِ، وَلا تَمَسُّوهُ بِطِيبٍ، وَلا تُخَمِّرُوا رَأْسَهُ فَإِنَّهُ يُبْعَثُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مُلَبِّيًا".
وفي رواية:"ولا تخمِّروا رأسه ولا وجهه فإنّه يبعث يوم القيامة ملبيًّا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1851)، ومسلم في الحج (1206: 99) كلاهما من طريق هشيم (هو ابن بشير الواسطيّ)، أخبرنا أبو بِشْر (هو جعفر بن إياس اليشكريّ)، حدّثنا سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره، ولفظهما سواء غير أنّ مسلمًا قال:"ملبِّدًا" بدل"ملبِّيًا".
والرواية الثانية عند مسلم من طريق وكيع، عن سفيان، عن عمرو بن دينار، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس.
ورواه زهير، عن أبي الزبير، قال: سمعت سعيد بن جبير، وفيه:"وأن يكشفوا وجهه - حسبته قال: ورأسه".
ورواه إسرائيل عن منصور، عن سعيد بن جبير، وفيه:"لا تغطّوا وجهه" ولم يذكر الرّأس.
ورواه شعبة، قال: سمعت أبا بشر يحدّث عن سعيد بن جبير، وذكر فيه:"خارج رأسه". قال شعبة: ثم حدّثني بعد ذلك:"خارج رأسه ووجهه". وهذه الرّوايات كلّها في صحيح مسلم.
فالذي يظهر أنّ الخلاف كان على سعيد بن جبير نفسه، فمرة كان يجمع بين الرأس والوجه، وأخرى يذكر الرّأس وحده، وثالثة الوجه وحده، وهي كلّها صحيحة.
فلا وجه لإعلال هذه الزيادة كقول الحاكم في"معرفة علوم الحديث" (ص 148):"ذكر الوجه تصحيف من الرواة؛ لإجماع الثقات الأثبات من أصحاب عمرو بن دينار على روايته عنه:"ولا تغطّوا رأسه" وهو المحفوظ" وذلك من وجهين:
الأول: لقد ثبت ذكر الوجه في غير رواية عمرو بن دينار كما رأيت.
والثاني: كما قال الزيلعيّ في نصب الراية (3/ 28):"المرجع في ذلك إلى مسلم لا إلى الحاكم، فإنّ الحاكم كثير الأوهام، وأيضًا فالتصحيف إنّما يكون في الحروف المتشابهة، وأيّ مشابهة بين الوجه والرأس في الحروف؟ ! هذا على تقدير أن لا يذكر في الحديث غير الوجه، فكيف وقد جمع بينهما -أعني الرأس والوجه- والروايتان عند مسلم …" إلى قال:"هذا بعيد من التصحيف".
وقول البيهقيّ (3/ 393):"وذكر الوجه غريب" قول غريب؛ ولذا تعقبه ابن التركماني بقوله:"قد صح النهي عن تغطيتهما، فجمعهما بعضهم، وأفرد بعضهم الرأس، وبعضهم الوجه، والكل صحيح، ولا وهم في شيء منه، وهذا أولي من تغليط مسلم". وكذلك انتقده الحافظ في الفتح (8/ 54) قائلا:"فيه نظر، فإن الحديث ظاهره الصحة"، ثم سرد ألفاظ مسلم في ذكر الوجه.
قلت: وقد أجمع العلماء سلفًا وخلفًا على تحريم المحرم تغطية رأسه لقول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"ولا يلبس العمامة ولا البرنس".
واختلفوا في تغطية وجهه، فذهب أبو حنيفة ومالك وأحمد في رواية إلى ما في هذا الحديث من منع المحرم الذي مات من تخمير وجهه.
وكان ابن عمر يقول:"ما فوق الذقن من الرأس، فلا يخمره المحرم" رواه مالك في الحج (15).
وأما الإمام أحمد فعنده ثلاث روايات، الرواية الثانية: لا يغطي وجهه مستدلًا بحديث ابن عباس:"اغسلوه بما وسدر، وكفِّنوه في ثوبين، ولا تخمّروا وجهه ولا رأسه، فإنه يبعث يوم القيامة مُلَبِّيًا".
هذه رواية ابن منصور، وإسماعيل بن سعيد الشالنجي كلاهما عن أحمد.
وأما في رواية مهنا عنه، عن المحرم يموت هل يُغطّى وجهه؟ فقال: قد اختلفوا فيه عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال بعضهم: لا يغطى رأسه. قلت: أيهما أعجب إلك، يغطى وجه المحرم إذا مات أو لا يغطى؟ قال: أما الرأس فلا أرى أن يغطوه، وأما الوجه فأرجو أن لا يكون به بأس". انظر: شرح العمدة لشيخ الإسلام (2/ 52 - 53).
وقد رُوي عن جماعة من الصحابة منهم ابن عباس نفسه، وعثمان، وعبد الرحمن بن عوف، وابن الزبير، وزيد بن ثابت، وسعد بن أبي وقاص، وجابر بن عبد الله أنهم أجازوا للمحرم أن يغطى وجهه، فهم مخالفون لا بن عمر في ذلك.
وأمّا ما روي عن عثمان بن عفان، قال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يخمِّر وجهه وهو محرم". فالصواب أنه موقوف.
رواه الدارقطني في"العلل" (3/ 13) عن أبي بكر الشافعيّ، قال: حدّثنا موسى بن الحسن، ثنا القعنبيّ، ثنا ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن أبان بن عثمان، عن عثمان بن عفان، فذكره.
قال الدارقطني:"هكذا كان في كتاب أبي بكر مرفوعًا، والصواب موقوف". ثم ساق بإسناده عن سفيان (هو ابن عيينة)، قال: سمعت عبد الله بن أبي بكر يقول: أخبرني عبد الله بن عامر بن ربيعة:"أنه رأى عثمان بن عفان بالعرج مخمرًا وجهه بقطيفة أرجوان في يوم صائف وهو محرم".
قال ابن عيينة: كان سفيان الثوريّ يغلط فيه، يقول عن الفُرافصة. انتهى.
والفُرافصة هو ابن عمير الحنفيّ أنه رأى عثمان بن عفان بالعرج يغطي وجهه وهو محرم. رواه مالك في الحج (14) عن يحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد أنه قال: أخبرني الفُرافصة بن عمير الحنفيّ، فذكره.
وأخرجه البيهقيّ (5/ 54) من وجه آخر عن يحيى بن سعيد.
والخلاصة فيه كما قال بعض أهل العلم أن حديث الباب خاص بالمحرم الذي يموت، وحديث عثمان للمحرم الحي عند الحاجة.
وهو عكس ما قال به العلماء الحنفية أن حديث ابن عباس يحمل على المحرم الحي دون الميت المحرم، فحكمه عندهم كسائر الأموات في تغطية الرأس والوجه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিল। সে ইহরাম অবস্থায় ছিল। তখন তার উট তাকে আঘাত করে (বা ফেলে দেয়), ফলে সে মারা যায়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা তাকে পানি ও বরই পাতা (সিদর) দিয়ে গোসল দাও। তাকে তার (ইহরামের) দু’কাপড়েই কাফন দাও। তাকে সুগন্ধি লাগাবে না এবং তার মাথা ঢাকবে না। কারণ কিয়ামতের দিন তাকে তালবিয়াহ পাঠকারী অবস্থায় উঠানো হবে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমরা তার মাথা ও মুখমণ্ডল ঢাকবে না। কারণ কিয়ামতের দিন তাকে তালবিয়াহ পাঠকারী অবস্থায় উঠানো হবে।"
4688 - عن أمّ الحصين، قالت: حَجَجْتُ مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَجَّةَ الْوَدَاعِ، فَرَأَيْتُ أُسَامَةَ وَبِلالًا وَأَحَدُهُمَا آخِذٌ بِخِطَامِ نَاقَةِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم والآخَرُ رَافِعٌ ثَوْبَهُ يَسْتُرُهُ مِن الحَرِّ حَتَّي رَمَي جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1298: 312) عن أحمد بن حنبل، حدّثنا محمد بن سلمة، عن أبي
عبد الرحيم، عن زيد بن أبي أنيسة، عن يحيى بن الحصين، عن أمّ الحصين جدته قالت، فذكرته.
উম্মুল হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জ আদায় করেছিলাম। তখন আমি উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেলাম। তাঁদের একজনের হাতে ছিল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটের লাগাম, আর অন্যজন নিজের কাপড় উঁচিয়ে ধরে তাঁকে গরম থেকে আড়াল করছিলেন (ছায়া দিচ্ছিলেন)। এই অবস্থা আকাবার জামরায় কঙ্কর নিক্ষেপ করা পর্যন্ত চলতে থাকে।
4689 - عن عبد الله بن عمر، قال: قَامَ رَجُلٌ فَقَالَ: يَا رَسُول اللهِ! مَاذَا تَأْمُرُنَا أَنْ نَلْبَسَ مِن الثِّيَابِ فِي الإِحْرَام؟ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"لا تَلْبَسُوا الْقَمِيصَ وَلا السَّرَاوِيلاتِ، وَلا الْعَمَائِمَ، وَلا الْبَرَانِسَ إِلا أَنْ يَكُونَ أَحَدٌ لَيْسَتْ لَهُ نَعْلَانِ فَلْيَلْبَس الْخُفَّيْنِ وَلْيَقْطَعْ أَسْفَلَ مِن الْكَعْبَيْن، وَلا تَلْبَسُوا شَيْئًا مَسَّهُ زَعْفَرَانٌ، وَلا الْوَرْسُ وَلا تَنْتَقِب الْمَرْأَةُ الْمُحْرِمَةُ وَلا تَلْبَس الْقُفَّازَيْنِ".
تابعه موسى بن عقبة، وإسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، وجويرية، وابن إسحاق في النّقاب والقفازين.
صحيح: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1838) عن عبد الله بن يزيد، حدّثنا اللّيث، حدّثنا نافع، عن ابن عمر، به.
وقول البخاريّ:"تابعه موسى بن عقبة … إلخ" يعني تابعوا ليثًا عن نافع في ذكر النّقاب والقفازين مرفوعًا.
ورواه مالك عن نافع، ولم يرفعه، فرجّح البخاريّ أن زيادة الثقة مقبولة.
وذكر أيضًا أبو داود (1825) بعد أن روى من طريق اللّيث مرفوعًا أن حاتم بن إسماعيل، ويحيى بن أيوب، وموسى بن عقبة رووا هذه الزيادة عن نافع على ما قال الليث.
ثم قال: ورواه موسي بن طارق عن موسى بن عقبة موقوفًا على ابن عمر، وكذلك رواه عبيد الله ابن عمر ومالك وأيوب موقوفًا.
وذكر أبو داود ممن رفعه إبراهيم بن سعيد المديني وهو شيخ من أهل المدينة ليس له كبير حديث.
وأخرجه (1826) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا إبراهيم بن سعيد المديني، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"المحرمة لا تنتقب ولا تلبس القفازين".
قلت: إبراهيم بن سعيد هذا مجهول كما أشار إليه أبو داود بأنه غير معروف. قال الحافظ في التقريب:"مجهول الحال". ولكنه توبع كما سبق.
আবদুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক দাঁড়িয়ে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ইহরাম অবস্থায় আমরা কী ধরনের কাপড় পরিধান করব বলে আপনি আমাদের নির্দেশ দেন? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা জামা (কামীস) পরিধান করবে না, পায়জামা (সারাওয়িল) পরিধান করবে না, পাগড়ি পরিধান করবে না, আর বারনুস (টুপিযুক্ত লম্বা পোশাক) পরিধান করবে না। তবে যদি এমন কেউ থাকে যার পরিধানের জন্য স্যান্ডেল নেই, সে যেন মোজা (খুফ্ফাইন) পরিধান করে এবং তা যেন গোড়ালির নিচ থেকে কেটে ফেলে। আর তোমরা এমন কোনো কাপড় পরিধান করবে না যা জাফরান অথবা ওয়ার্স (এক প্রকার সুগন্ধি গাছ) দ্বারা রঞ্জিত হয়েছে। আর ইহরামকারিণী মহিলা মুখ ঢাকবে না (নিকাব পরবে না) এবং দস্তানা (গ্লাভস) পরিধান করবে না।
4690 - عن ابن عمر: أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم نَهَي النِّسَاءَ فِي إحْرَامِهِنَّ عَن الْقُفَّازَيْنِ وَالنِّقَابِ وَمَا مَسَّ الْوَرْسُ والزَّعْفَرَانُ مِن الثِّيَابِ، وَلْتَلْبَسْ بَعْدَ ذَلِكَ مَا أَحَبَّتْ مِنْ أَلْوَانِ الثِّيَابِ مُعَصْفَرًا أَوْ خَزًّا أَوْ حُلِيًّا أَوْ سَرَاوِيلَ أَوْ قَمِيصًا أَوْ خُفًّا.
حسن: رواه أبو داود (1827) عن أحمد بن حنبل، حدّثنا يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: فإن نافعًا مولى عبد الله بن عمر حدثني عن عبد الله بن عمر، فذكره.
قال أبو داود:"روي هذا الحديث عن ابن إسحاق عن نافع. وعبدة بن سليمان، ومحمد بن
سلمة عن محمد بن إسحاق إلى قوله:"وما مسّ الورس والزعفران من الثياب" ولم يذكرا ما بعده.
وصحّحه الحاكم (1/ 486) ورواه من طريق الإمام أحمد وقال:"صحيح على شرط مسلم"، ووافقه الذهبي.
قلت: وذلك على منهج الحاكم، وإلا فإن مسلمًا لم يحتج بابن إسحاق، والحديث في مسند الإمام أحمد من وجهين:
أحدهما: عن يعلى بن عبيد، حدّثنا محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم"ينهى النساء في الإحرام عن القفاز والنقاب، وما مسّ الورس والزّعفران من الثياب" (4740).
والثاني: عن يزيد، أخبرنا محمد -يعني ابن إسحاق-، عن نافع، عن ابن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول على هذا المنبر، وهو ينهي الناس إذا أحرموا عما يكره لهم:"لا تلبسوا العمائم، ولا القميص، ولا السّراويلات، ولا البرانس، ولا الخفين، إلا أن يضطر مضطر إليهما فليقطعهما أسفل من الكعبين، ولا ثوبًا مسّه الورس ولا الزّعفران". قال: وسمعته ينهى النساء عن القفازين والنقاب، وما مسّ الورس والزعفران من الثياب".
وأمّا رواية يعقوب بن إبراهيم، عن أبيه، عن ابن إسحاق فلم أجدها في المسند
وأمّا المعصفر فليس بطيب، روي ذلك عن جابر؛ ولذا كانت عائشة رضي الله عنها تلبس الثياب المعصفرة وهي محرمة.
ورُوي عن حقة بنت عمرو وكانت قد صلت إلى القبلتين مع رسول الله صلى الله عليه وسلم"أنها كانت إذا أرادت أن تحرم وضعت عبيتها في حجرها ولبست من ثيابها ما تشاء والمعصفر، فتهل".
رواه الطبرانيّ في"المعجم الكبير" (24/ 215) من حديث شريك، عن عاصم الأحول، عن أبي مجلز، عنها.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 220):"ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال إلا أن شريكًا وهو ابن عبد الله النخعيّ تغيّر حفظه منذ ولي القضاء، فلا يؤمن من وقوع الوهم والخطأ في حديثه.
وقد ذهب أكثر أهل العلم إلى جواز استعمال الثياب المعصفرة للمحرمة.
وقال أصحاب الرأي هو طيب تجب به الفدية. انظر:"شرح السنة" (7/ 244 - 245).
والعُصْفُر: نبات صيفيٌّ من الفصيلة المركبة أنبوبية الزهر، يستعمل زهره تابلًا، ويستخرج منه صبغ أحمر يصبغ به الحرير ونحوه. كذا في المعجم الوسيط.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নারীদেরকে তাদের ইহরাম অবস্থায় হাতমোজা (গ্লাভস), নেকাব এবং পোশাকের যে অংশে ওয়ারস (urs) বা জাফরান লেগে আছে তা পরিধান করতে নিষেধ করতে শুনেছেন। এরপর তারা যে রঙের কাপড় পছন্দ করে, তা পরিধান করতে পারে— তা কুসুম ফুলের রং (আসফর)-এ রঞ্জিত হোক, অথবা খায বস্ত্র, অথবা অলঙ্কার, অথবা পাজামা, অথবা জামা, অথবা মোজা হোক।
4691 - عن سالم بن عبد الله، أن عبد الله (يعني ابن عمر): كان يصنع ذلك -يَعْنِي يَقْطَعُ الْخُفَّيْنِ لِلْمَرْأَةِ الْمُحْرِمَةِ-، ثُمَّ حَدَّثَتْهُ صَفِيَّةُ بِنْتُ أَبِي عُبَيْدٍ أَنَّ عَائِشَةَ حَدَّثَتْهَا أَنَّ
رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ كَانَ رَخَّص لِلنِّسَاءِ فِي الْخُفَّيْنِ فَتَرَك ذلك.
حسن: رواه أبو داود (1831) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا ابن أبي عدي، عن محمد بن إسحاق، قال: ذكرت لابن شهاب فقال: حدثني سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن عمر كان يصنع ذلك، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (4836) عن محمد بن أبي عدي، بإسناده، مثله.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق لأنه صرّح بسماعه من الزهري.
ورواه الشافعي عن ابن عيينة، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، أنه كان يُفتي النساء إذا أحرمن أن يقطعن الخفين حتى أخبرته صفية، عن عائشة، أنها تفتي النساء أن لا يقطعن، فانتهى عنه."الأم" (2/ 147) وعنه أخرجه البيهقيّ (5/ 52).
আব্দুল্লাহ (ইবনে উমর) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইহরামকারী মহিলাদের মোজা (খুফ্ফাইন) কেটে দিতেন। এরপর সাফিয়্যাহ বিনতে আবূ উবাইদ তাকে জানালেন যে, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মহিলাদের জন্য মোজা পরিধানের অনুমতি দিয়েছিলেন। ফলে তিনি (ইবনে উমর) তা (মোজা কেটে দেওয়ার আমল) পরিত্যাগ করলেন।
4692 - عن فاطمة بنت المنذر قالت: كنا نخمر وجوهنا ونحن محرمات، ونحن مع أسماء بنت أبي بكر الصّديق.
صحيح: رواه مالك في الحج (18) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، فذكرته. وإسناده صحيح.
قلت: وفعلهن هذا بحضرة أسماء بنت أبي بكر مشعر بأنّ هذا العمل كان مستمرًا من عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم كما تدل عليه الرواية التالية.
فقد رواه إبراهيم بن حميد، حدّثنا هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء، قالت:"كنا نغطي وجوهنا من الرجال، وكنا نمتشط قبل ذلك". رواه ابن خزيمة (2690) من هذا الوجه.
ورواه الحاكم (1/ 454) من وجه آخر عن علي بن مسهر، عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر قالت:"كنا نغطي وجوهنا من الرجال، وكنا نتمشط قبل ذلك في الإحرام".
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين" ووافقه الذهبيّ.
وأمّا ما رُوي عن عائشة، قالت:"كنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم ونحن محرمون، فإذا لقينا الرّاكب أسدلْنا ثيابَنا من فوق رؤوسنا، فإذا جاوزنا رفعناها"، فهو ضعيف.
رواه أبو داود (1833)، وابن ماجه (2935)، والإمام أحمد (24021)، وصحّحه ابن خزيمة (2691) كلّهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن عائشة، فذكرته.
قال ابن خزيمة:"وفي القلب منه".
قلت: ويزيد بن أبي زياد وهو الهاشميّ مولاهم الكوفي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه
أعلّه المنذريّ في"مختصره".
وأما قوله: ذكر شعبة ويحيى بن سعيد القطان، ويحيى بن معين أنّ مجاهدًا لم يسمع من عائشة. وقال أبو حاتم الرازي:"مجاهد عن عائشة مرسل".
فالصّحيح كما يقول المنذري:"قد أخرج البخاري ومسلم في صحيحيهما من حديث مجاهد عن عائشة، وفيها ما هو ظاهر في سماعه منها" انتهى.
قلت: وهو كما قال، بل قال العلائي:"وقد صرّح في غير حديث بسماعه منها".
ولكن الصحيح عن عائشة رضي الله عنها أنها كانت تلبس من الثياب ما شاءت إلا ثوبًا مسّه ورس أو زعفران، ولا تتبرقع، ولا تلثم، وتسدل الثوب على وجهها إن شاءت. موقوف عليها كما رواه البيهقي (5/ 47).
تمسّك بهذا الحديث جمهور أهل العلم منهم: مالك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، فقالوا: لها أن تسدل على وجهها من فوق رأسها إذا احتاجت إلى ذلك عند مرور الرّجال، إلّا أن أصحاب الشافعي اشترطوا أن يكون الثوب متجافيًا عن وجهها بحيث لا يصيب البشرة.
إلا أن تحقّق هذا الشرط لا يمكن؛ لأن الثوب المسدول لا يكاد يسلم من إصابة البشرة.
وأما ما رُوي عن ابن عمر:"إحرام المرأة في وجهها، وإحرام الرجل في رأسه" فهو موقوف عليه.
رواه الدارقطني (2761)، والبيهقي (5/ 47) من حديث حماد بن زيد، عن هشام بن حسان، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. وكذلك رواه الدّارورديّ وغيره موقوفًا عليه.
ورواه أيوب بن محمد أبو الجمل، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:"ليس على المرأة إحرام إلا في وجهها". ومن طريقه رواه الدارقطني (2760).
قال أبو أحمد بن عدي:"لا أعلم يرفعه عن عبيد الله غير أبي الجمل هذا". وقال البيهقي:"أيوب بن محمد أبو الجمل ضعيف عند أهل العلم بالحديث، فقد ضعّفه يحيى بن معين وغيره. وقد روي هذا الحديث من وجه آخر مجهول عن عبيد الله بن عمر مرفوعًا، والمحفوظ موقوف" انتهى.
وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 219) وعزاه إلى الطبراني في الكبير والأوسط، وعلّله بأيوب بن محمد اليماميّ (وهو أبو الجمل) فقال:"هو ضعيف".
ফাতেমা বিনতে মুনযির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ইহরাম অবস্থায় থাকাকালীন আমাদের মুখমণ্ডল ঢেকে রাখতাম, যখন আমরা আসমা বিনতে আবি বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে ছিলাম।
4693 - عن إبراهيم بن عبد الله بن حُنَيْن، عَنْ أَبِيه: أَنَّ عَبْدَ اللهِ بْنَ عَبَّاسِ وَالْمِسْوَرَ ابْنَ مَخْرَمَةَ اخْتَلَفَا بِالأَبْوَاءِ، فَقَالَ عَبْدُ اللهِ: يَغْسِلُ الْمُحْرِمُ رَأْسَهُ. وَقَالَ الْمِسْوَرُ بْنُ مَخْرَمَةَ: لا يَغْسِلُ الْمُحْرِمُ رَأُسَهُ. قَال: فَأَرْسَلَنِي عَبْدُ اللهِ بْنُ عَبَّاسٍ إِلَى أَبِي أَيُّوبَ الأَنْصَارِيّ فَوَجَدْتُهُ يَغْتَسِلُ بَيْنَ الْقَرْنَيْنِ -وَهُوَ يُسْتَرُ بِثَوْبٍ- فَسَلَّمْتُ عَلَيْهِ فَقَال: مَنْ
هَذَا؟ فَقُلْتُ: أَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ حُنَيْنٍ أَرْسَلَنِي إِلَيْكَ عَبْدُ اللهِ بْنُ عَبَّاسٍ أَسْأَلُكَ كَيْفَ كَانَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَغْسِلُ رَأْسَهُ وَهُوَ مُحْرِمٌ؟ قَالَ: فَوَضَعَ أَبُو أَيُّوبَ يَدَهُ عَلَى الثَّوْبِ فَطَأْطَأَهُ حَتَّى بَدَا لِي رَأْسُهُ ثُمَّ قَال لإِنْسَانٍ يَصُبُّ عَلَيْهِ: اصْبُبْ، فَصَبَّ عَلَى رَأْسِهِ، ثُمَّ حَرَّكَ رَأْسَهُ بِيَدَيْهِ فَأَقْبَلَ بِهِمَا وَأَدْبَرَ ثُمَّ قَال: هَكَذَا رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَفْعَلُ.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (4) عن زيد بن أسلم، عن إبراهيم بن عبد الله بن حسين، به.
رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1840)، ومسلم في الحج (1205) كلاهما من طريق مالك، به.
আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস ও মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবওয়া নামক স্থানে একটি বিষয়ে মতভেদ করলেন। আবদুল্লাহ (ইবনু আব্বাস) বললেন: ইহরামকারী তার মাথা ধৌত করতে পারবে। আর মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ বললেন: ইহরামকারী তার মাথা ধৌত করতে পারবে না। আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস তখন আমাকে (আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইনকে) আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে গিয়ে দেখলাম, তিনি দুটি খুঁটির মাঝখানে গোসল করছেন—আর তাকে একটি কাপড় দ্বারা আড়াল করা হয়েছিল। আমি তাকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: কে এটি? আমি বললাম, আমি আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইন। আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস আমাকে আপনার কাছে এই প্রশ্ন জিজ্ঞাসা করতে পাঠিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় কিভাবে তাঁর মাথা ধৌত করতেন?
আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন কাপড়ের ওপর হাত রেখে তা নিচে নামিয়ে দিলেন, যাতে তার মাথা আমার কাছে প্রকাশিত হলো। এরপর তিনি তার উপর পানি ঢেলে দেওয়া ব্যক্তিকে বললেন: ঢেলে দাও। লোকটি তাঁর মাথায় পানি ঢালল। অতঃপর তিনি নিজের মাথাকে উভয় হাত দ্বারা নাড়লেন এবং হাত দুটিকে সামনে ও পেছনে ফিরালেন। এরপর বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবেই করতে দেখেছি।
4694 - عن حفصة أمّ المؤمنين أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: ما شأن النّاس حلُّوا ولم تَحْلِل أنتَ من عمرتك؟ فقال:"إنّي لبّدتُ رأسي، وقلّدتُ هدي، فلا أَحِلُّ حتى أنحر".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (180) عن نافع، عن ابن عمر، عن حفصة، به.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1566)، ومسلم في الحج (1229) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
وتلبيد الشّعر قد يكون بالصمغ، وقد يكون بالعسل، وإنما يفعل ذلك بالشعر ليجتمع ويتلبّد، فلا يتخلله الغبار، ولا يصيبه الشعث، ولا يقع فيه الدبيب. قاله الخطابيّ.
হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি উম্মুল মু'মিনীন, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: মানুষের কী হলো যে তারা (উমরাহ শেষ করে) ইহরাম খুলে ফেলেছে, অথচ আপনি আপনার উমরাহ থেকে ইহরাম খুলেননি? তিনি বললেন: "আমি আমার চুল তালবিদ করেছি (আঠালো কিছু দ্বারা জমাট করে রেখেছি), এবং আমি আমার হাদীর পশুকে চিহ্নিত করেছি। সুতরাং, আমি কুরবানী না করা পর্যন্ত ইহরাম মুক্ত হব না।"
4695 - عن عبد الله بن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُهلُّ ملبِّدًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1540)، ومسلم في الحج (1184: 21) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، به. ولفظهما سواء. وزاد مسلم كلمات التلبية.
وأما ما رواه أبو داود (1748) من طريق محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لبّد رأسه بالعسل". ففيه محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن ولم يصرح، ولم أجد من تابعه على ذلك.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এমন অবস্থায় তালবিয়াহ পাঠ করতে শুনেছি যখন তিনি চুল লেপনকারী (বা জটা বাঁধাধারী) ছিলেন।
4696 - عن عبد الله بن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم.
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1202) من وجوه عن سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن طاوس وعطاء، عن ابن عباس، به.
ورواه البخاريّ في جزاء الصيد (1835) من طريق سفيان، قال: قال عمرو: أول شيء سمعت عطاء يقول: سمعت ابن عباس (فذكره).
قال: ثم سمعته يقول: حدثني طاوس، عن ابن عباس. فقلت: لعله سمعه منهما.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন (হিজামা করিয়েছিলেন)।
4697 - عن ابن بُحينة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم احتجم بطريق مكة وهو محرم، وسط رأسه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1836)، ومسلم في الحج (1203) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن علقمة بن أبي علقمة، عن عبد الرحمن الأعرج، عن ابن بحينة، به. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاري بنحوه إلا أنه قال:"بلَحْيِ جَمل" بدل"بطريق مكة". ولحي جمل موضع بطريق مكة.
قال الحافظ:"ووهم من ظنّه فكي الجمل الحيوان المعروف، وأنه كان آلة الحجم" الفتح (4/ 51). وابن بحينة نسب إلى أمّه واسمه: عبد الله بن مالك.
ইবনু বুহাইনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় মক্কার পথে তাঁর মাথার মাঝখানে শিঙ্গা লাগালেন (রক্তমোক্ষণ করালেন)।
4698 - عن أنس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم على ظهر القدم من وجع كان به.
صحيح: رواه أبو داود (1837)، والنسائي (2849)، والترمذي في الشمائل (358) كلّهم من حديث عبد الرزاق، حدثنا معمر، عن قتادة، عن أنس، فذكره.
ومن هذ الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (12682) وصحّحه ابن خزيمة (2659)، وابن حبان (3952)، والحاكم (1/ 435) وقال: صحيح على شرط الشيخين.
ولكنه أعلّه أبو داود فقال: سمعت أحمد قال:"ابن أبي عروبة أرسله -يعني عن قتادة-".
قلت: معمر من أصحاب قتادة المعروفين، وإن كان ابن أبي عروبة أحفظ من معمر، فإرساله لا يعلل من أسنده إما لزيادة الثقة، أو لعل قتادة نفسه يروي على الوجهين.
وقوله:"على ظهر القدم" يحمل على التعدد كما هو معروف في مثل هذه الحالة، وإليه جنح ابن خزيمة، وعليه فلا تعارض بين حديثي ابن عباس وأنس. في حين أبهمه معتمر بن سليمان فإنه قال: سمعت حميدًا قال: سئل أنس عن الحجامة للمحرم، فقال:"احتجم رسول الله صلى الله عليه وسلم من وجع كان به".
رواه الإمام أحمد (13816) عن علي بن عبد الله، حدّثنا معتمر، فذكره. ولكن رواه ابن خزيمة (2658) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعاني، ثنا المعتمر وقال فيه:"من وجع وجده في رأسه".
فرجع الحديث إلى حديث ابن عباس.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় তাঁর পায়ে যে ব্যথা ছিল, তার কারণে পায়ের উপরিভাগে শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন (রক্ত বের করেছিলেন)।
4699 - عن جابر بن عبد الله:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم من وَثْي كان بوركهـ أو ظهره".
حسن: رواه أحمد (14280، 14857) من طرق عن هشام، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا أبو داود (3863) وصحّحه ابن خزيمة (2660) إلّا أن أبا داود لم يذكر قوله:"وهو محرم".
ورواه ابن ماجه (3082) من وجه آخر عن ابن خُثيم، عن أبي الزبير، بإسناده وفيه:"أنّ النبيّ
- صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم عن رهصة أخذته"، أي الوهن.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.
قوله:"وَثْي" وقيل:"وَثْء" - بفتح الواو، وسكون الثاء، وآخره همزة، وهو: وجع يصيب اللحم، ولا يبلغ العظم.
فقه الباب:
لم يكره أحدٌ من أهل العلم الحجامة للمحرم، إن احتجم من موضع لا شعر فيه، وإن احتجم في موضع الشعر وقطعه فله أن يحتجم إلا أنه يفتدي، هذا هو رأي الجمهور من أهل العلم، منهم أبو حنيفة، والشافعي، وأحمد، وإسحاق وغيرهم. وقال مالك: لا يحتجم المحرم إلا من ضرورة لا بد منها.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় থাকা সত্ত্বেও তাঁর নিতম্ব বা পিঠে হওয়া কোনো ব্যথার কারণে শিঙা লাগিয়েছিলেন (রক্তমোক্ষণ করেছিলেন)।
4700 - عن كعب بن عجرة، قال: أَتَى عَلَيَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم زَمَنَ الْحُدَيْبِيَةِ وَالْقَمْلُ يَتَنَاثَرُ عَلَى وَجْهِي! فَقَال:"أَيُؤْذِيكَ هَوَامُّ رَأْسِكَ؟". قُلْتُ: نَعَم. قَال:"فَاحْلِقْ وَصُمْ ثَلاثَةَ أَيَّام، أَوْ أَطْعِمْ سِتَّةَ مَسَاكِينَ، أَو انْسُكْ نَسيِكَةً". قَالَ أَيُّوب: لا أَدْرِي بِأَيِّ هَذَا بَدَأَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4190)، ومسلم في الحج (1201: 80) كلاهما من طريق حماد بن زيد، حدّثنا أيوب، قال: سمعت مجاهدًا، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عجرة، به، واللّفظ للبخاريّ.
ورواه البخاريّ في المغازي (4191) من طريق ورقاء أبي بشر، عن مجاهد، به، عن كعب بن عجرة، قال:"كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالحديبية ونحن محرمون …".
কাব ইবনে উজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুদায়বিয়ার সময়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন, আর উকুন আমার চেহারার উপর ঝরে পড়ছিল! তখন তিনি বললেন, "তোমার মাথার কীট-পতঙ্গ কি তোমাকে কষ্ট দিচ্ছে?" আমি বললাম, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তাহলে তুমি (মাথা) মুণ্ডন করে নাও এবং তিন দিন রোযা রাখো, অথবা ছয়জন মিসকীনকে আহার করাও, অথবা একটি কুরবানি করো।" আইয়ুব বলেন, আমার জানা নেই, তিনি এর মধ্যে কোনটি দিয়ে শুরু করেছিলেন।