হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4708)


4708 - عن الصّعب بن جثّامة اللّيثيّ، أَنَّهُ أَهْدَى لِرُسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِمَارًا وَحْشِيًّا، وَهُوَ بِالأبْوَاءِ أو بِوَدَّانَ فَرَدَّهُ عَلَيْهِ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم قال: فَلَمَّا رَأَى رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَا فِي وَجْهِي. قَال:"إِنَّا لَمْ نَرُدَّهُ عَلَيْكَ إِلا أَنَّا حُرُمٌ".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (83) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عبد الله بن عباس، عن الصعب بن جثامة، به.

ورواه البخاريّ في جزاء الصيد (1825)، ومسلم في الحج (1193) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

وبوّب له البخاري بقوله:"إذا أهدي للمحرم حمارًا وحشيًا حيًّا لم يقبل".

قال الترمذي عقب إخراج الحديث من طريق الزهري:"وقد روى بعض أصحاب الزهري عن الزهري هذا الحديث وقال: أهدى له لحم حمار وحش، وهو غير محفوظ".

قلت: وكذلك قال الشافعي كما سيأتي.




সা'ব ইবনু জাচ্ছামা আল-লাইছী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি বন্য গাধা হাদিয়া (উপহার) দিলেন, যখন তিনি আবওয়া অথবা ওয়াদ্দান নামক স্থানে ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা তাঁকে ফিরিয়ে দিলেন। তিনি (সা'ব) বললেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার মুখমণ্ডলে (বিমর্ষতার চিহ্ন) দেখতে পেলেন, তখন তিনি বললেন, "আমরা তোমাকে তা ফিরিয়ে দেইনি শুধু এ কারণে যে, আমরা ইহরাম অবস্থায় আছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (4709)


4709 - عن عبد الله بن عباس، قال: أَهْدَى الصَّعْبُ بْنُ جَثَّامَةَ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم حِمَارَ وَحْشٍ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَرَدَّهُ عَلَيْهِ وَقَال:"لَوْلا أَنَّا مُحْرِمُونَ لَقَبِلْنَاهُ مِنْكَ".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1194) من طرق، عن حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وفي رواية:"رجْل حمار وحْش".

وفي رواية:"عجز حمار وحش يقطر دمًا".

وفي رواية:"شقُّ حمار وحش".

قال الشافعي: وحديث مالك أن الصّعب أهدى للنبيّ صلى الله عليه وسلم حمارًا أثبت من حديث من حدّث أنه أهدي له من لحم حمار".

وأما ما روي عن يحيى بن سليمان الجعفي، قال: حدثني ابن وهب، أخبرني يحيى بن أيوب، عن يحيى بن سعيد، عن جعفر بن عمرو بن أمية الضّمريّ، عن أبيه، أنّ الصّعب بن جثّامة أهدي
للنبيّ صلى الله عليه وسلم عجز حمار وحشي، وهو بالجحفة فأكل منه، وأكل القوم" فهو منكر.

رواه البيهقي (5/ 193) من هذا الوجه.

ويحيى بن سليمان الجعفي مختلف فيه، فقال أبو حاتم:"شيخ"، وقال الدارقطني:"ثقة"، وذكره ابن حبان في الثقات.

ولكن قال النسائي: ليس بثقة، والراوي عنه يحيى بن أيوب، وهو الغافقي قال النسائي: ليس بذاك القوي، وقال أبو حاتم: لا يحتج به. وقال أحمد: يخطئ خطأ كبيرًا. وكذّبه مالك في حديثين.

ولذا قال ابن التركماني بعد أن نقل أقوال أهل العلم فيهما:"فعلي هذا لا يشتغل بتأويل هذا الحديث لأجل سنده، ولمخالفته للحديث الصحيح. وقول البيهقي: وقبل اللحم. يردّه ما في الصحيح أنه عليه السلام ردّه" انتهى كلام ابن التركمانيّ.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সা’ব ইবনু জাস্সামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি বন্য গাধা হাদিয়া (উপহার) দিলেন। তখন তিনি (নবী) ছিলেন ইহরাম অবস্থায়। তাই তিনি তা ফেরত দিয়ে দিলেন এবং বললেন: "আমরা যদি ইহরাম অবস্থায় না থাকতাম, তবে অবশ্যই তোমার পক্ষ থেকে তা গ্রহণ করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (4710)


4710 - عن ابن عباس، قال: قَدِمَ زَيْدُ بْنُ أَرْقَمَ، فَقَالَ لَهُ عَبْدُ اللهِ بْنُ عَبَّاسٍ -يَسْتَذْكِرُهُ-: كَيْفَ أَخْبَرْتَنِي عَنْ لَحْمِ صَيْدٍ أُهْدِيَ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَهُوَ حَرَامٌ؟ قَال: قَال: أُهْدِيَ لَهُ عُضْوٌ مِنْ لَحْمِ صَيْدٍ فَرَدَّهُ فَقَال:"إِنَّا لا نَأْكُلُهُ إِنَّا حُرُمٌ".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1195) عن زهير بن حرب، حدثنا يحيى بن سعيد، عن ابن جريج، أخبرني الحسن بن مسلم، عن طاوس، عن عبد الله بن عباس قال: فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আগমন করলেন। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে স্মরণ করিয়ে দিতে গিয়ে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হারাম অবস্থায় (ইহরামের মধ্যে) উপহার হিসেবে পেশ করা শিকার করা পশুর গোশত সম্পর্কে কী বলেছিলেন? তিনি (যায়েদ ইবনে আরকাম) বললেন: তাঁর নিকট শিকার করা পশুর গোশতের একটি টুকরা উপহার হিসেবে পেশ করা হয়েছিল। তখন তিনি তা ফিরিয়ে দিলেন এবং বললেন: “আমরা এটি খাই না। কেননা আমরা ইহরাম অবস্থায় আছি।”









আল-জামি` আল-কামিল (4711)


4711 - عن عبد الرحمن بن عامر بن ربيعة، قال: رَأَيْتُ عُثْمَانَ بْنَ عَفَّانَ بِالْعْرَجِ وَهُوَ مُحْرِمُ فِي يَوْم صَائِفٍ قَدْ غَطَّى وَجْهَهُ بِقَطِيفَةِ أُرْجُوَانٍ، ثُمَّ أُتِيَ بِلَحْمٍ صَيْدٍ فَقَالَ لأَصْحَابِهِ: كُلُوا، فَقَالُوا: أَوَ لا تَأُكُلُ أَنْتَ؟ فَقَال: إِنِّي لَسْتُ كَهَيْئَتِكُمْ إِنَّمَا صِيدَ مِنْ أَجْلِي.

صحيح: رواه مالك في الحج (87) عن عبد الله بن أبي بكر، عن عبد الرحمن بن عامر بن ربيعة، فذكره.

قال مالك:"في الرجل المحرم يصاد من أجله صيد، فيصنع له ذلك الصيد، فيأكل منه وهو يعلم أنه من أجله صيد، فإن عليه جزاء ذلك الصيد كله".




আব্দুর রহমান ইবনে আমের ইবনে রাবী'আ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল-আ'রাজ নামক স্থানে উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম। তিনি ছিলেন ইহরামরত অবস্থায়, এক গ্রীষ্মের দিনে তিনি বেগুনী রঙের একটি চাদর দিয়ে তাঁর মুখমণ্ডল আবৃত করে রেখেছিলেন। অতঃপর তাঁর কাছে শিকার করা গোশত আনা হলো। তিনি তাঁর সঙ্গীদের বললেন, তোমরা খাও। তারা জিজ্ঞেস করলেন, আপনি কি খাবেন না? তিনি বললেন, আমি তোমাদের মতো নই। এটা তো কেবল আমার জন্যই শিকার করা হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (4712)


4712 - عن عبد الله بن الحارث -وَكَانَ الْحَارِثُ، خَلِيفَةُ عُثْمَانَ عَلَى الطَّائِفِ -فَصَنَعَ لِعُثْمَانَ طَعَامًا فِيهِ مِنَ الْحَجَلِ وَالْيَعَاقِيبِ وَلَحْمِ الْوَحْشِ، قَالَ: فَبَعَثَ إِلَى عَلِيٍّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ فَجَاءَهُ الرَّسُولُ وَهُوَ يَخْبِطُ لأَبَاعِرَ لَهُ، فَجَاءَهُ وَهُوَ يَنْفُضُ الْخَبَطَ عَنْ يَدِهِ. فَقَالُوا لَهُ: كُلْ، فَقَال: أَطْعِمُوهُ قَوْمًا حَلَالًا؛ فَإنّا حُرُمٌ. فَقَالَ: عَلِيٌّ رضي الله عنه: أَنْشُدُ اللَّهَ مَنْ كَانَ هَا هُنَا مِنْ أَشْجَعَ أَتَعْلَمُونَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَهْدَى إِلَيْهِ رَجُلٌ حِمَارَ وَحْشٍ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَأَبَى أَنْ يَأْكُلَهُ؟ قَالُوا: نَعَمْ.

حسن: رواه أبو داود (1849) عن محمد بن كثير، حدّثنا سليمان بن كثير، عن حميد الطويل،
عن إسحاق بن عبد الله بن الحارث بن نوفل الهاشمي، عن أبيه، فذكره.

وإسناده حسن من أجل سليمان بن كثير العبدي البصري فإنه مختلف فيه غير أنه يُقبل في غير الزهري، وقد توبع ..

وهو ما رواه أحمد (783)، والبزار -كشف الأستار (1100) - مطوّلًا من طريق سليمان بن المغيرة، عن علي بن زيد، حدّثنا عبد الله بن الحارث بن نوفل الهاشمي، قال: كان أبي الحارث على أَمْرٍ مِنْ أُمُورِ مَكَّةَ فِي زَمَنِ عُثْمَانَ، فَأَقْبَلَ عُثْمَانُ رضي الله عنه إِلَى مَكَّةَ فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْحَارِثِ: فَاسْتَقْبَلْتُ عُثْمَانَ بِالنُّزُلِ بِقُدَيْدٍ فَاصْطَادَ أَهْلُ الْمَاءِ حَجَلا فَطَبَخْنَاهُ بِمَاءٍ وَمِلْحٍ فَجَعَلْنَاهُ عُرَاقًا لِلثَّرِيدِ فَقَدَّمْنَاهُ إِلَى عُثْمَانَ وَأَصْحَابِهِ فَأَمْسَكُوا، فَقَالَ عُثْمَانُ: صَيْدٌ لَمْ أَصْطَدْهُ وَلَمْ آمُرْ بِصَيْدِهِ، اصْطَادَهُ قَوْمٌ حِلٌّ فَأَطْعَمُونَاهُ، فَمَا بَأْسٌ، فَقَالَ عُثْمَانُ: مَنْ يَقُولُ فِي هَذَا؟ فَقَالُوا: عَلِيٌّ، فَبَعَثَ إِلَى عَلِيٍّ رضي الله عنه فَجَاءَ -قَالَ: عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْحَارِثِ: فَكَأَنِّي أَنْظُرُ إِلَى عَلِيٍّ حِينَ جَاءَ وَهُوَ يَحُتُّ الْخَبَطَ عَنْ كَفَّيْهِ-، فَقَالَ لَهُ عُثْمَانُ: صَيْدٌ لَمْ نَصْطَدْهُ وَلَمْ نَأُمُرْ بِصَيْدِهِ، اصْطَادَهُ قَوْمٌ حِلٌّ، فَأَطْعَمُونَاهُ، فَمَا بَأْسٌ؟ قَالَ: فَغَضِبَ عَلِيٌّ، وَقَالَ: أَنْشُدُ اللَّهَ رَجُلا شَهِدَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ أُتِيَ بِقَائِمَةِ حِمَارِ وَحْشٍ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّا قَوْمٌ حُرُمٌ فَأَطْعِمُوهُ أَهْلَ الْحِلِّ". قَالَ: فَشَهِدَ اثْنَا عَشَرَ رَجُلًا مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، ثُمَّ قَالَ عَلِيٌّ: أُشْهِدُ اللَّهَ رَجُلا شَهِدَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ أُتِيَ بِبَيْضِ النَّعَامِ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّا قَوْمٌ حُرُمٌ أَطْعِمُوهُ أَهْلَ الْحِلِّ". قَال: فَشَهِدَ دُونَهُمْ مِن الْعِدَّةِ مِنَ الِاثْنَيْ عَشَرَ. قَال: فَثَنَى عُثْمَانُ وَرِكَهُ عَنِ الطَّعَامِ، فَدَخَلَ رَحْلَهُ وَأَكَلَ ذَلِكَ الطَّعَامَ أَهْلُ الْمَاءِ.

وعلي بن زيد هو ابن جدعان ضعيف، ولذا وقع في حديثه بعض المناكير.

وقد رواه أيضًا الإمام أحمد (784)، وأبو يعلى (356، 423) من أوجه أخرى عن علي بن زيد بدون ذكر العدد الذي شهدوا.

وأما قول البزار:"وهذا أحسن ما يروى عن علي في هذا الباب" فإن كان يقصد به أحسن إسنادًا فالأمر ليس كذلك، فالذي رواه أبو داود قد يكون أحسن منه، وإن قصد به أصل الحديث فهو كما قال.

فقد رُوي عن علي بإسناد ضعيف أنه قال:"أتي النبيّ صلى الله عليه وسلم بلحم صيد وهو محرم فلم يأكله".

رواه ابن ماجه (3091) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا عمران بن محمد بن أبي ليلى، عن أبيه، عن عبد الكريم، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل محمد بن أبي ليلى، وشيخه عبد الكريم بن أبي المخارق وهما ضعيفان.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا عبد الله بن أحمد في زياداته على المسند (830)، وأبو يعلى (433).

وأعله البوصيري في"الزوائد" بعيد الكريم بن أبي المخارق.

وقوله:"الحَجَل" بالتحريك: الطائر المعروف، واحده حَجَلة.
واليعاقيب: جمع يعقوب وهو ذكر الحجل.

والخبْط -بسكون الباء الموحدة-: ضرب الشجر بالعصا ليتناثر الورق لعلف الإبل.

وقوله:"أشجع" بسكون الشين المعجمة - وهو أشجع بن ريث بن غطفان بن سعد بن قيس من مضر، وهي بطن.

وفي الحديث إشارة إلى أن علي بن أبي طالب قد علم أن الحارث إنما اتخذ هذا الطعام من أجل عثمان ومن يحضر معه من أصحابه، فلم ير أن يأكله، ولا أحد ممن بحضرته.




আব্দুল্লাহ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত। (হারিস ছিলেন তাইফের উপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিযুক্ত শাসক)। তিনি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য একটি খাবার তৈরি করলেন, যাতে ছিল তিতির পাখি, পুরুষ তিতির এবং বন্য পশুর মাংস। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট দূত পাঠালেন। দূত যখন তাঁর কাছে পৌঁছাল, তখন তিনি তাঁর উটগুলোর জন্য গাছের পাতা (খাবত) ঝরাচ্ছিলেন। তিনি তাঁর হাত থেকে সেই পাতা ঝেড়ে দ্রুত আসলেন। তারা তাঁকে বললেন: আপনি খান। তিনি (আলী) বললেন: "এগুলো এমন লোকদের খেতে দাও যারা ইহরামমুক্ত (হালাল); কারণ আমরা ইহরামরত।" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আশজা' গোত্রের যারা এখানে উপস্থিত আছো, আমি তোমাদেরকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি জানো না যে, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইহরামরত অবস্থায় একটি বন্য গাধা উপহার দিয়েছিলেন, কিন্তু তিনি তা খেতে অস্বীকার করেছিলেন?" তারা বলল: "হ্যাঁ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4713)


4713 - عن عائشة، قالت: أهدي لرسول الله صلى الله عليه وسلم وشيقة ظبي وهو محرم، فلم يأكله.

صحيح: رواه الإمام أحمد (25882) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (8324) - عن الثوريّ، عن قيس بن مسلم، عن الحسن بن محمد، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده صحيح. والحسن بن محمد هو ابن علي بن أبي طالب ووالده محمد هو المعروف بابن الحنفية.

وقيس بن مسلم هو الجدليّ من رجال الشيخين.

ولكن رواه الإمام أحمد (24128)، وأبو يعلى (4616) كلاهما من حديث سفيان، عن عبد الكريم، عن قيس بن مسلم الجدليّ، بإسناده مثله.

فأدخلا بين سفيان وقيس بن مسلم"عبد الكريم" وهو ابن أبي المخارق ضعيف.

ورواه أيضًا عبد الرزاق (8325) عن معمر، عن عبد الكريم، به.

وهي متابعة قوية لترجيح رواية سفيان عن عبد الكريم. ولكن يجوز أن يقال: لعلّ سفيان سمع أولًا عن عبد الكريم، عن قيس بن مسلم، ثم تيسّر له السماع من قيس بن مسلم مباشرة. ولم يتيسّر لمعمر فيكون كلاهما محفوظا إلّا أنّ الأول صحيح، والثاني ضعيف.

وصحّح الهيثميّ في المجمع (3/ 230) رجال أحمد دون رجال أبي يعلي.

وقوله:"وشيقة ظبي" والوشيقة أن يؤخذ اللّحم فيغلي قليلًا، وتحمل في الأسفار.

ولعلّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يأكله لأنه صيد له.

وفي الباب ما روي عن جابر بن عبد الله قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صيد البر لكم حلال ما لم تصيدوه، أو يُصد لكم".

رواه أبو داود (1851)، والترمذي (846)، والنسائي (2827) كلهم عن قتيبة بن سعيد، حدثنا يعقوب -الأسكندراني القاري-، عن عمرو، عن المطلب، عن جابر، فذكره.

قال الترمذي:"المطلب لا نعرف له سماعًا عن جابر".

وقال النسائي:"عمرو بن أبي عمرو ليس بالقوي في الحديث، وإن كان قد روي عنه مالك".
قلت: ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (14894)، وعبد الرزاق (8349)، وصحّحه ابن خزيمة (2641)، وابن حبان (3971)، والحاكم (1/ 452، 476) وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وهذا وهم منه؛ فإن المطلب وهو ابن عبد الله بن حنطب لم يخرج له واحد من الشّيخين في صحيحه.

والمطلب هذا قال فيه البخاري: لا أعرف له سماعًا من أحد من الصحابة.

وقال عبد الرحمن بن أبي حاتم: سمعت أبي يقول:"المطلب بن عبد الله بن حنطب عامة حديثه مراسيل لم يدرك أحدًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا سهل بن سعد وأنسًا وسلمة بن الأكوع، ومن كان قريبًا منهم، ولم يسمع من جابر ولا من زيد بن ثابت، ولا من عمران بن حصين" انظر:"المراسيل".

وضعّف هذا الحديث ابن حزم في"المحلي" (7/ 253) من أجل عمرو بن أبي عمرو فقال:"هذا خبر ساقط من أجله".

قلت: عمرو بن أبي عمرو سبق فيه كلام النسائي بأنه ليس بالقوي، وقال يحيى بن معين: لا يحتج بحديثه، وقال مرة: ليس بقوي، وليس بحجة. وقال أبو داود: ليس بالقوي. وقال ابن القطان في"الوهم والإيهام" (4/ 184): هو مستضعف وأحاديثه تدل على حاله.

ولكن قال أحمد: ليس به بأس. وقال العجلي: ثقة. وقال ابن عدي: لا بأس به.

والخلاصة: أنه"صدوق وله أخطاء"، وحديثه حسن إذا لم يخطئ، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه، ولعل هذا الحديث مما أخطأ فيه؛ لأنه ليس في الأحاديث الصحيحة ما يدل على ذلك.

وللحديث طرق أخرى ذكرتها في"المنة الكبرى" (4/ 100 - 103).

ولوجود طرق أخرى قوى البيهقي (5/ 190) هذا الحديث.

وقال الشافعي:"هذا أحسن حديث روي في هذا الباب وأقيس".

وقلت: وبه قال مالك والشافعي وأحمد وجمهور من السلف.

وقال أبو حنيفة وطائفة من الملف: إنه يجوز للمحرم أكل لحم الصيد مطلقًا ما لم يصده تمسكًا بحديث أبي قتادة.

وذهب طائفة من الناس: أن لحم الصيد يحرم على المحرمين في كل حال مستدلين بقوله تعالى: {وَحُرِّمَ عَلَيْكُمْ صَيْدُ الْبَرِّ مَا دُمْتُمْ حُرُمًا} [سورة المائدة: 96].

وهو مذهب علي، وابن عباس، وابن عمر، ومعاذ وغيرهم كما نقل ذلك عنهم عبد الرزاق في المصنف (4/ 425).

واستدلوا أيضًا بحديث الصعب بن جثامة الليثي:"إنا حرم لا نأكل الصيد". وجمع الجمهور
بين أحاديث الرد والقبول فقالوا: أحاديث القبول محمولة على ما يصيده الحلال لنفسه، ثم يهدي منه للمحرم.

وأحاديث الرد محمولة على ما صاده الحلال لأجل المحرم حتى لا يلزم طرح شيء من الأحاديث، وهو الذي رجّحه أيضًا الحافظ ابن القيم في زاده (2/ 165)، والله تعالى أعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ইহরাম অবস্থায় একটি হরিণের গোশতের 'ওয়াশীকাহ' (সংরক্ষিত মাংস) উপহার হিসেবে আনা হয়েছিল, কিন্তু তিনি তা খাননি।









আল-জামি` আল-কামিল (4714)


4714 - عن عبد الله بن أبي قتادة، قال: انْطَلَقَ أَبِي مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَامَ الْحُدَيْبِيَةِ فَأَحْرَمَ أَصْحَابُهُ وَلَمْ يُحْرِمْ، وَحُدِّثَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، أَنَّ عَدُوًّا بِغَيْقَةَ، فَانْطَلَقَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، قَالَ: فَبَيْنَمَا أَنَا مَعَ أَصْحَابِهِ، يَضْحَكُ بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ، إِذْ نَظَرْتُ فَإِذَا أَنَا بِحِمَارِ وَحْشٍ، فَحَمَلْتُ عَلَيْهِ، فَطَعَنْتُهُ فَأَثْبَتُّهُ، فَاسْتَعَنْتُهُمْ فَأَبَوْا أَنْ يُعِينُونِي، فَأَكَلْنَا مِنْ لَحْمِهِ، وَخَشِينَا أَنْ نُقْتَطَعَ، فَانْطَلَقْتُ أَطْلُبُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَرْفَعُ فَرَسِي شَأْوًا وَأَسِيرُ شَأْوًا، فَلَقِيتُ رَجُلًا مِنْ بَنِي غِفَارٍ فِي جَوْفِ اللَّيْلِ، فَقُلْتُ: أَيْنَ لَقِيتَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم؟ قَالَ: تَرَكْتُهُ بِتَعْهِنَ وَهُوَ قَائِلٌ السُّقْيَا، فَلَحِقْتُهُ، فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ! إِنَّ أَصْحَابَكَ يَقْرَءُونَ عَلَيْكَ السَّلَامَ وَرَحْمَةَ اللهِ، وَإِنَّهُمْ قَدْ خَشُوا أَنْ يُقْتَطَعُوا دُونَكَ، انْتَظِرْهُمْ، فَانْتَظَرَهُمْ، فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ! إِنِّي أَصَدْتُ وَمَعِي مِنْهُ فَاضِلَةٌ، فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: لِلْقَوْمِ:"كُلُوا" وَهُمْ مُحْرِمُونَ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصيد (1821)، ومسلم في الحج (1196: 59) كلاهما من طريق هشام بن أبي عبد الله الدَّستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني عبد الله بن أبي قتادة، به. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري قريب منه.

قوله:"بغيقة" موضع من بلاد بني غفار بين مكة والمدينة.

قوله:"وخشينا أن نقتطع" أي يقطعنا العدوّ عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.

قوله:"أرفع فرسي شأوًا" أي أكلفة السير السريع، والشأو: الغاية والأمد.

قوله:"أَصَدْت" أي اصطدت.

ورواه البخاري في الصيد أيضًا (1824)، ومسلم في الحج (1196: 60) من طريق عثمان بن عبد الله بن مَوْهَب، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه، به، نحوه.

وفيه، فقال:"هل منكم أحدٌ أمره أو أشار إليه بشيء؟" قال: قالوا: لا. قال:"فكلوا ما بقي من لحمها".




আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহ বলেন) আমার পিতা হুদায়বিয়ার বছরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলেন। তাঁর সাথীরা ইহরাম বাঁধলেন, কিন্তু তিনি ইহরাম বাঁধলেন না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানানো হলো যে, গায়কা নামক স্থানে শত্রুদের অবস্থান আছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেদিকে রওনা হলেন। তিনি বললেন: আমি যখন তাঁর সাথীদের সাথে ছিলাম, তাদের কেউ কেউ একে অপরের দিকে তাকিয়ে হাসছিল, তখন আমি তাকালাম এবং দেখলাম একটি বন্য গাধা। আমি সেটির উপর আক্রমণ করলাম, তাকে আঘাত করলাম এবং কাবু করে ফেললাম। আমি তাদের সাহায্য চাইলাম, কিন্তু তারা আমাকে সাহায্য করতে অস্বীকার করল। অতঃপর আমরা তার গোশত থেকে খেলাম। আমরা আশঙ্কা করলাম যে, শত্রুরা আমাদের (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাফেলা থেকে) বিচ্ছিন্ন করে ফেলবে। তাই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুঁজতে বের হলাম। আমি কখনো আমার ঘোড়াকে দ্রুত চালিয়ে দিচ্ছিলাম আবার কখনো ধীরে চলছিলাম। মাঝরাতে আমি বনু গিফার গোত্রের এক ব্যক্তির সাথে সাক্ষাৎ করলাম। আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কোথায় পেয়েছিলেন? সে বলল: আমি তাঁকে তাহান নামক স্থানে ছেড়ে এসেছি এবং তিনি আস-সুকইয়ার দিকে যাচ্ছিলেন। আমি তাঁর কাছে পৌঁছলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার সাথীরা আপনাকে সালাম ও আল্লাহর রহমত জানাচ্ছেন। তাঁরা আশঙ্কা করছেন যে, আপনার কাছে পৌঁছানোর পূর্বেই শত্রুরা তাঁদের বিচ্ছিন্ন করে ফেলবে। আপনি তাঁদের জন্য অপেক্ষা করুন। অতঃপর তিনি তাঁদের জন্য অপেক্ষা করলেন। তারপর আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি শিকার করেছি এবং আমার কাছে সেই গোশতের কিছু অংশ অবশিষ্ট আছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকেদেরকে বললেন: তোমরা খাও। অথচ তাঁরা তখন ইহরাম অবস্থায় ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4715)


4715 - عن أبي قتادة، ، أَنَّهُ كَانَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، حَتَّى إِذَا كَانُوا بِبَعْضِ طَرِيقِ مَكَّةَ تَخَلَّفَ مَعَ أَصْحَابٍ لَهُ مُحْرِمِينَ وَهُوَ غَيْرُ مُحْرِمٍ فَرَأَى حِمَارًا وَحْشِيًّا، فَاسْتَوَى عَلَى فَرَسِهِ فَسَأَلَ أَصْحَابَهُ أَنْ يُنَاوُلُوهُ سَوْطَهُ فَأَبَوْا عَلَيْهِ فَسَأَلَهُمْ رُمْحَهُ فَأَبَوْا فَأَخَذَهُ، ثُمَّ شَدَّ عَلَى الْحِمَارِ فَقَتَلَهُ فَأَكَلَ مِنْهُ بَعْضُ أَصْحَابِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، وَأَبَى بَعْضُهُمْ، فَلَمَّا
أَدْرَكُوا رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم سَأَلُوهُ عَنْ ذَلِك، فَقَالَ:"إِنَّمَا هِيَ طُعْمَةٌ أَطْعَمَكُمُوهَا اللَّهُ".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (76) عن أبي النضر مولي عمر بن عبيد الله التيمي، عن نافع مولى أبي قتادة الأنصاري، عن أبي قتادة، به، فذكره.

قال مالك: وعن زيد بن أسلم؛ أن عطاء بن يسار أخبره، عن أبي قتادة في الحمار الوحشي مثل حديث أبي النضر، إلا أن في حديث زيد بن أسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"هل معكم من لحمه شيء".

ورواه البخاري في الجهاد (2914)، ومسلم في الحج (1196: 57، 58) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। এমনকি যখন তাঁরা মক্কার পথে কোনো এক স্থানে ছিলেন, তখন তিনি তাঁর কিছু সাহাবীর সাথে পেছনে থেকে গেলেন, যারা ইহরাম অবস্থায় ছিলেন, কিন্তু তিনি নিজে ইহরাম অবস্থায় ছিলেন না। অতঃপর তিনি একটি বন্য গাধা দেখতে পেলেন এবং তাঁর ঘোড়ার ওপর আরোহণ করলেন। তিনি তাঁর সঙ্গীদেরকে তাঁর চাবুকটি দিতে বললেন, কিন্তু তাঁরা অস্বীকার করলেন। তিনি তাঁদের কাছে তাঁর বর্শা চাইলেন, তাঁরা তাও অস্বীকার করলেন। এরপর তিনি নিজেই তা (বর্শা) নিলেন, অতঃপর গাধাটির ওপর আক্রমণ করে তাকে হত্যা করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কিছু সাহাবী তা থেকে খেলেন এবং কিছু সাহাবী খেতে অস্বীকার করলেন। যখন তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলেন, তখন তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি বললেন: "এটি তো একটি খাদ্য, যা আল্লাহ্ তোমাদেরকে খাইয়েছেন (খাওয়ার ব্যবস্থা করেছেন)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4716)


4716 - عن أبي قتادة، قال: أَنَّهُمْ خَرَجُوا مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَهُمْ مُحْرِمُونَ، وَأَبُو قَتَادَةَ مُحِلٌّ. وَسَاقَ الْحَدِيثَ وَفِيهِ: فَقَال:"هَلْ مَعَكُمْ مِنْهُ شَيْءٌ". قَالُوا: مَعَنَا رِجْلُهُ. قَال: فَأَخَذَهَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَأَكَلَهَا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد (2854)، ومسلم في الحج (1196: 63) كلاهما من طريق فضيل بن سليمان النمري، حدّثنا أبو حازم، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه، فذكره.

وحديث أبي قتادة رُوي بأسانيد كثيرة وألفاظ مختلفة وقد ذكرت كثيرًا منها في"المنة الكبرى" (4/ 106).

وأما ما رواه عبد الرزاق (8337) ومن طريقه ابن ماجه (3093) عن معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه، قال:"خرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم زمن الحديبية فأحرم أصحابه ولم أحرم، قال: فرأيت حمار وحش، فحملت عليه فاصطدته، فذكرت شأنه لرسول الله صلى الله عليه وسلم، وذكرت أني لم أكن أحرمت، وأني إنما اصطدته لك. فأمر أصحابه بالأكل ولم يأكل منه حين أخبرته أني اصطدته له".

ففيه نكارة فإن أحدًا لم يقل في حديث أبي قتادة:"اصطدته لك"، وقوله:"ولم يأكل منه حين أخبرته أني اصطدته لك".

وبين ذلك ابن خزيمة (2642) وعنه الدارقطني (2749).

قال ابن خزيمة:"هذه الزيادة:"إنّما اصطدته لك"، وقوله:"ولم يأكل منه حين أخبرته أني اصطدته لك" لا أعلم أحدًا ذكره في خبر أبي قتادة غير معمر في هذا الإسناد".

ونقل أيضًا عنه الدارقطني وقال:"وهو موافق لما رُوي عن عثمان".

قلت: وحديث عثمان هو ما رواه الدارقطني (2750) من طريق عبد الرزاق -وهو في مصنفه (8345) - عن معمر، عن الزهري، عن عروة بن الزبير، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن أبيه، أنه اعتمر مع عثمان في ركب، فلما كانوا بالرّوحاء قُدّم إليهم لحم طير، قال عثمان: كلوا،
وكره أن يأكل منه. فقال عمرو بن العاص: أنأكل مما لست منه آكلًا؟ قال: إني لست في ذلكم مثلكم، إنما صيدتُ لي، وأُميتت باسمي -أو قال: من أجلي-" وإسناده صحيح.




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হয়েছিলেন। তারা তখন ইহরাম অবস্থায় ছিল, কিন্তু আবু কাতাদাহ ইহরামমুক্ত ছিলেন। এরপর তিনি পুরো হাদীসটি বর্ণনা করেন। তাতে রয়েছে: রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, "এর (শিকারকৃত জন্তুর) কোনো অংশ কি তোমাদের কাছে আছে?" তারা উত্তর দিল, "এর একটি পা আমাদের কাছে আছে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা গ্রহণ করলেন এবং খেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4717)


4717 - عن عبد الرحمن بن عثمان التيميّ، قال: كُنَّا مَعَ طَلْحَةَ بْنِ عُبَيْدِ اللهِ وَنَحْنُ حُرُمٌ، فَأُهْدِيَ لَهُ طَيْرٌ وَطَلْحَةً رَاقِدٌ فَمِنَّا مَنْ أَكَلَ وَمِنَّا مَنْ تَوَرَّعَ فَلَمَّا اسْتَيْقَظَ طَلْحَهُ وَفَّقَ مَنْ أَكَلَهُ، وَقَال: أَكَلْنَاهُ مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1197) عن زهير بن حرب، حدثني يحيى بن سعيد (هو القطان)، عن ابن جريج، أخبرني محمد بن المنكدر، عن معاذ بن عبد الرحمن بن عثمان التيمي، عن أبيه، به، فذكره.




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আবদুর রহমান ইবনে উসমান আত-তাইমী বলেন,] আমরা ইহরাম অবস্থায় তাঁর সঙ্গে ছিলাম। তখন তাঁকে একটি পাখি উপহার দেওয়া হলো, আর তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন ঘুমাচ্ছিলেন। তখন আমাদের মধ্যে কেউ কেউ সেটি খেলেন এবং কেউ কেউ (হারাম মনে করে) বিরত থাকলেন। যখন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘুম থেকে উঠলেন, তখন যারা সেটি খেয়েছিল তাদের তিনি সমর্থন করলেন এবং বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে এটি খেয়েছি।









আল-জামি` আল-কামিল (4718)


4718 - عن عُمير بن سلمة الضّمريّ، عن البهزيّ؛ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم خَرَجَ يُرِيدُ مَكَّةَ وَهُوَ مُحْرِمٌ حَتَّى إِذَا كَانَ بِالرَّوْحَاءِ إِذَا حِمَارٌ وَحْشِيٌّ عَقِيرٌ فَذُكِرَ ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ:"دَعُوهُ فَإِنَّهُ يُوشِكُ أَنْ يَأْتِيَ صَاحِبُهُ". فَجَاءَ الْبَهْزِيُّ -وَهُوَ صَاحِبُهُ- إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، شَأْنَكُمْ بِهَذَا الْحِمَارِ، فَأَمَرَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَبَا بَكْرٍ فَقَسَمَهُ بَيْنَ الرِّفَاقِ، ثُمَّ مَضَى، حَتَّى إِذَا كَانَ بِالأُثَابَةِ بَيْنَ الرُّوَيْثَةِ وَالْعَرْجِ إِذَا ظَبْيٌ حَاقِفٌ فِي ظِلٍّ فِيهِ سَهْمٌ فَزَعَمَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمَرَ رَجُلا أَنْ يَقِفَ عِنْدَهُ لا يَرِيبُهُ أَحَدٌ مِنَ النَّاسِ حَتَّى يُجَاوِزَهُ".

صحيح: رواه مالك في الحج (79) عن يحيى بن سعيد الأنصاريّ، أخبرني محمد بن إبراهيم ابن الحارث التيمي، عن عيسى بن طلحة بن عبيد الله، عن عمير بن سلمة الضّمريّ، به، فذكره.

وإسناده صحيح. وعمير بن سلمة الضمريّ له صحبة، والبهزي صحابيّ أيضًا اسمه زيد بن كعب.

والحديث يدخل على الصحيح في مسند عمير بن سلمة، كما في التمهيد لابن عبد البر (23/ 343). وكذلك رواه أحمد (15450)، والنسائي (4344)، وابن حبان (5112)، والحاكم (3/ 623 - 624) كلهم من مسند عمير بن سلمة الضمريّ من طريق يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن عيسى بن طلحة بن عبيد الله، عن عمير بن سلمة الضمريّ، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مرّ بالعرج، فإذا هو بحمار عقير فلم يلبث أن جاء رجل من بهز فقال: يا رسول الله، هذه رميتي فشأنكم بها، فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أبا بكر …" فذكره بنحوه.

وأما ما رواه ابن ماجه (3092) من طريق سفيان بن عيينة، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن عيسى بن طلحة، عن طلحة بن عبيد الله:"أن النبي صلى الله عليه وسلم أعطاه حمار وحش وأمره أن يفرقه في الرّفاق وهم محرمون" ففيه خطأ، وقع من ابن عيينة، فإن هذا الحديث لعيسي بن طلحة، عن عمير بن سلمة، كما رواه مالك وغيره.
كشف ذلك علي بن المديني في كتابه"العلل" بعد أن ساق الحديث عن سفيان بن عيينة قال: قلت لسفيان: إنه كان في كتاب الثقفي: عن يحيى بن سعيد، عن عيسى بن طلحة، عن عمير بن سلمة، عن البهزي، قال: فقال لي سفيان: ظنت أنه طلحة …".




উমাইর ইবনু সালামা আয-যামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল-বাহযী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন। যখন তিনি রাওহা নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন একটি আহত বন্য গাধা দেখতে পেলেন। এই বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করা হলে তিনি বললেন: "তোমরা এটিকে ছেড়ে দাও। কারণ শীঘ্রই এর মালিক এসে পড়বে।" অতঃপর আল-বাহযী— যিনি ছিলেন সেটির মালিক— তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল, এই গাধাটি নিয়ে আপনার যা করার তা করুন।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন। তিনি সেটিকে সাথীদের মাঝে বণ্টন করে দিলেন। অতঃপর তাঁরা রওয়ানা হলেন। অবশেষে যখন তাঁরা আর-রুওয়াইসাহ এবং আল-আরজ-এর মধ্যবর্তী আস-সুথাবাহ নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন একটি হরিণ দেখতে পেলেন যা একটি ছায়ার নিচে বিশ্রামরত ছিল এবং তার গায়ে তীর বিদ্ধ ছিল। বর্ণনাকারী ধারণা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন লোককে নির্দেশ দিলেন, সে যেন সেটির কাছে দাঁড়িয়ে থাকে, যাতে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্থানটি অতিক্রম করে যাওয়া পর্যন্ত কেউ তাকে বিরক্ত না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (4719)


4719 - عن جابر بن عبد الله، قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الضّبع؟ فقال:"هو صيد، ويجعل فيه كبش إذا صاده المحرم".

صحيح: رواه أبو داود (3801)، وابن ماجه (3085) وصحّحه ابن خزيمة (2645)، وابن حبان (3964)، والحاكم (1/ 452) كلهم من حديث عبد الله بن عبيد بن عمير، عن ابن أبي عمار، عن جابر، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال البيهقي:"وحديث ابن أبي عمار حديث جيد تقوم به الحجة".

ورواه الدارقطني (5/ 183) من طريق ابن جريج، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن عبد الرحمن ابن أبي عمار، قال: سألت جابر بن عبد الله عن الضبع؟ فقال: فيها كبش. فقلت: فريضة؟ قال: نعم. قلت: أنت سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم. كذا قال: فريضة.

وكذلك رواه الترمذيّ (851)، والنسائي (2836) وابن خزيمة (2645)، وابن حبان (3965) كلهم من طريق ابن جريج بإسناده إلا أنهم لم يذكروا:"فيها كبش"، بل اقتصروا على ذكر كونه صيدا. وقد صرّح ابن جريج عند ابن خزيمة وابن حبان.

قال الترمذي:"حسن صحيح، قال علي بن المديني: قال يحيى بن سعيد: وروي جرير بن حازم هذا الحديث فقال: عن جابر، عن عمر، وحديث ابن جريج أصح، وهو قول أحمد وإسحاق، والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم في المحرم إذا أصاب ضبعا أن عليه الجزاء" انتهي.

قال الحاكم (1/ 452): ولخصه جرير بن حازم، عن عبد الله بن عمير، عن عبد الرحمن بن أبي عمار، عن جابر بن عبد الله، قال: جعل رسول الله صلى الله عليه وسلم في الضبع يصيبه المحرم كبشا نجديا، وجعله من الصيد.

ولجابر طرق أخرى: جعل النبي صلى الله عليه وسلم في الضبع كبشا. رواه ابن خزيمة (2648)
والحاكم والبيهقي (5/ 183) كلهم من حديث إبراهيم الصائغ، عن عطاء، عن جابر بن عبد الله مرفوعًا.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح ولم يخرجاه. وإبراهيم بن ميمون الصائغ، زاهد عالم، أدرك الشهادة".

وعلى هذا يُحمل ما رواه ابن خزيمة (2647) والبيهقي كلاهما من حديث منصور بن زاذان، عن عطاء، عن جابر قال: قضى في الضبع بكبش. أي النبي صلى الله عليه وسلم.

ورواه الدارقطني (2541) وعنه البيهقي (5/ 183) من طريق ابن جريج عن عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"الضّبع صيد" وجعل فيها كبشًا.

اختلف في وصله وإرساله.

فرواه الشافعي في الأم (2/ 192) عن سعيد (ابن سالم)، عن ابن جريج، عن عكرمة مولي ابن عباس، قال:"أنزل رسول الله صلى الله عليه وسلم ضبعًا صيدًا، وقضى فيها بكبش".

قال الشافعي:"هذا حديث لا يثبت مثله لو انفرد، وإنما ذكرناه لأن مسلم بن خالد أخبرنا، عن ابن جريج، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن ابن أبي عمار، قال: سألت جابرًا عن الضبع أصيد هي؟" فذكر الحديث.

قال البيهقي: إنما قاله لانقطاعه، ثم أكده بحديث ابن أبي عمار، عن جابر، وحديث ابن أبي عمار حديث جيد، تقوم به الحجة، كما سبق ذكره. وقال: وقد روي حديث عكرمة موصولا: فرواه من طريق الدارقطني كما سبق.

والخلاصة: أن الحديث صحيح، وأنه جعل في الضبع كبشا، فاختصره البعض بجعل الضبع صيدا، وفصَّله الآخرون بذكر الكبش فيه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হায়েনা (ضبْع) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "এটি শিকার (শিকারযোগ্য পশু), তবে ইহরাম অবস্থায় কোনো ব্যক্তি যদি এটিকে শিকার করে, তবে এর বিনিময়ে একটি ভেড়া (কাবশ) দিতে হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4720)


4720 - عن جابر، أنه قال: قضى عمر بن الخطاب في الضبع بكبش، وفي الغزال بعنز، وفي الأرنب بعناق، وفي الجربوع بجفرة.

صحيح: رواه مالك في الموطأ لأبي مصعب (1244)، والشيباني (503) عن أبي الزبير، عن جابر.

قال الشيباني:"وبهذا كله نأخذ؛ لأنّ هذا مثله من النعم".

وأخطأ يحيى في موطئه (1/ 414) فأسقط من الإسناد جابرًا؛ لأنّ الشافعي أيضًا رواه في الأمّ (2/ 192 - 193) عن مالك وسفيان بن عيينة، كلاهما عن أبي الزبير، عن جابر.

وكذلك رواه البيهقي (5/ 183) عن الشافعي بذكر جابر، وكذلك رواه عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن جابر، عن عمر بن الخطاب، فذكره، مثله.

وأما ما رواه الدارقطني (2546، 2549) من وجهين عن ابن فضيل، وأبي مريم - كلاهما عن
الأجلح بن عبد الله، حدثني أبو الزبير، عن جابر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"في الضّبع إذا أصابها المحرم كبش، وفي الظبي شاة، وفي الأرنب عناق، وفي الجربوع جفرة" فهو معلول.

والأجلح بن عبد الله بن حجية مختلف فيه والخلاصة فيه حسن الحديث إذا لم يخالف، وقد خالف هنا مالكًا وابن عيينة وغيرهما في الرّفع، والصواب أنه موقوف على عمر بن الخطاب رضي الله عنه. وهو الذي رجّحه أيضًا البيهقيّ.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফায়সালা দেন যে, হায়েনার (শিকারের ক্ষতিপূরণস্বরূপ) একটি মেষ, হরিণের (শিকারের ক্ষতিপূরণস্বরূপ) একটি ছাগী, খরগোশের (শিকারের ক্ষতিপূরণস্বরূপ) একটি ছোট ছাগী এবং জারবুর (শিকারের ক্ষতিপূরণস্বরূপ) একটি দুধ ছাড়ানো ছাগশিশু দিতে হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (4721)


4721 - عن عبد الله بن عباس قال: يا زيد بن أرقم، هل علمت أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدي له بيضات نعام وهو حرام فردّهنّ؟ قال: نعم.

حسن: رواه ابن خزيمة (2644)، والحاكم (1/ 452) كلاهما من حديث إسحاق بن عيسي، ثنا حماد بن سلمة، عن قيس، عن طاوس، عن عبد الله بن عباس، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وإسناده حسن من أجل إسحاق بن عيسى بن الطباع، وهو إن كان من رجال مسلم إلا أنه لا يرتقي إلى درجة"الثقة".

وأما ما رُوي عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في بيض النعام يصيبه المحرم ثمنه" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (3086)، والدارقطني (2562) كلاهما من حديث حسين المعلم، عن أبي المهزّم، عن أبي هريرة، فذكره. وأبو المهزم ضعيف جدًا.

وروي مثل هذا عن كعب بن عجرة، وهو ضعيف أيضًا.

وكذلك لا يصح في بيضة نعام صيام يوم أو إطعام مسكين. انظر تخريجه في"المنة الكبرى" (4/ 98 - 99).



ورواه أبو داود (1853) من وجه آخر عن محمد بن عيسى، حدّثنا حماد، عن ميمون بن جابان، عن أبي رافع، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الجراد من صيد البحر".

قال أبو داود:"أبو المهزّم ضعيف، والحديثان جميعًا وهم".

ثم رواه عن حماد، عن ميمون بن جابان، عن أبي رافع، عن كعب من قوله:"الجراد من صيد البحر" وكأنه يشير إلى صحة الموقوف.

وميمون بن جابان البصريّ أبو الحكم ذكره ابن حبان في الثقات، وقال العجلي: بصري ثقة، وقال العقيلي: لا يصح حديثه. وقال الأزدي: لا يحتج بحديثه. وقال البيهقي: غير معروف.

وقوله:"رِجل من جراد" بكسر الراء وسكون الجيم هو من الجراد كالجماعة الكثيرة من الناس.

قال الترمذي:"رخّص قومٌ من أهل العلم للمحرم أن يصيد الجراد ويأكله، ورأى بعضهم عليه صدقة إذا اصطاده وأكله".




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যায়দ ইবনে আরকামকে বললেন, “হে যায়দ ইবনে আরকাম! আপনার কি জানা আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ইহরাম অবস্থায় উটপাখির ডিম উপহার দেওয়া হয়েছিল এবং তিনি তা ফেরত দিয়েছিলেন?” তিনি (যায়দ) বললেন, “হ্যাঁ।”









আল-জামি` আল-কামিল (4722)


4722 - عن ابن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خَمْسٌ مِن الدَّوَابِّ لَيْسَ عَلَى الْمُحْرِمِ فِي قَتْلِهِنَّ جُنَاحٌ: الْغُرَابُ، وَالْحِدَأَةُ، وَالْعَقْرَبُ، والْفَأْرَةُ، وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (88) عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

ورواه البخاري في جزاء الصيد (1826)، ومسلم في الحج (1199: 76) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটি প্রাণী রয়েছে, যা ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তির হত্যা করলে কোনো দোষ হয় না: দাঁড়কাক, চিল, বিচ্ছু, ইঁদুর এবং হিংস্র কুকুর।"









আল-জামি` আল-কামিল (4723)


4723 - عن حفصة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خمس من الدّواب كلّها فاسق، لا حرج على من قتلهن: العقرب، والغراب، والحدأة، والفأرة، والكلب العقور".

متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1828)، ومسلم في الحج (1200) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن عمر، قال: قالت حفصة، فذكرته.

واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه، وليس عنده:"كلّها فاسق".




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচটি প্রাণী রয়েছে, এগুলোর সবই ক্ষতিকর (ফাসিক)। এদেরকে যে হত্যা করে তার কোনো দোষ নেই: বিচ্ছু, কাক, চিল, ইঁদুর এবং হিংস্র কুকুর।”









আল-জামি` আল-কামিল (4724)


4724 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خَمْسٌ مِنَ الدَّوَابِّ كُلُّهُنَّ فَاسِقٌ يَقْتُلُهُنَّ فِي الْحَرَمِ: الْغُرَابُ، وَالْحِدَأَةُ، وَالْعَقْرَبُ، وَالْفَأْرَةُ، وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1829)، ومسلم (1198: 71) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته، واللفظ للبخاريّ.




আয়শা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচটি ক্ষতিকর প্রাণী রয়েছে, যাদের সবগুলোই ফাসিক (ক্ষতিকর)। এগুলিকে হারাম শরীফের মধ্যেও হত্যা করা যায়: দাঁড়কাক, চিল, বিচ্ছু, ইঁদুর এবং হিংস্র কুকুর।”









আল-জামি` আল-কামিল (4725)


4725 - عن عبد الله بن مسعود، قال: بَيْنَمَا نَحْنُ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي غَارٍ بِمِنًى إِذْ نَزَلَ عَلَيْهِ: {وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا} [سورة المرسلات: 1] وَإِنَّهُ لَيَتْلُوهَا وَإِنِّي لأَتَلَقَّاهَا مِنْ فِيهِ وَإِنَّ فَاهُ لَرَطْبٌ بِهَا إِذْ وَثَبَتْ عَلَيْنَا حَيَّةٌ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"اقْتُلُوهَا"، فَابْتَدَرْنَاهَا فَذَهَبَتْ، فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"وُقِيَتْ شَرَّكُمْ كَمَا وُقِيتُمْ شَرَّهَا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1830)، ومسلم في السلام (2234) كلاهما من طريق الأعمش، حدّثني إبراهيم (هو النخعي)، عن الأسود (هو ابن يزيد النخعي)، عن ابن مسعود، به.

واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه، وليس عنده:"بمني". قال البخاريّ عقبه:"إنّما أردنا بهذا أنّ منى من الحرم، وأنّهم لم يروا بقتل الحيّة بأسًا".




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদা আমরা মিনার একটি গুহায় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, যখন তাঁর উপর অবতীর্ণ হলো: {ওয়াল মুরসালাতি উরফা} [সূরা মুরসালাত: ১]। তিনি তা তিলাওয়াত করছিলেন এবং আমি সরাসরি তাঁর মুখ থেকে তা গ্রহণ করছিলাম। সেই তিলাওয়াতের কারণে তাঁর মুখ সজীব ছিল। হঠাৎ আমাদের দিকে একটি সাপ লাফিয়ে এলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা এটাকে মেরে ফেলো।" আমরা দ্রুত সেটিকে মারতে উদ্যত হলাম, কিন্তু সেটি চলে গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের অনিষ্ট থেকে এটিকে রক্ষা করা হয়েছে, যেমন তোমরা এর অনিষ্ট থেকে রক্ষা পেয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4726)


4726 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خَمْسٌ قَتْلُهُنَّ حَلالٌ في الْحُرُمِ: الْحَيَّةُ، وَالْعَقْرَبُ، وَالْحِدَأَةُ، وَالْفَأْرَةُ، وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ".

حسن: رواه أبو داود (1847) عن علي بن بحر، حدّثنا حاتم بن إسماعيل، حدّثني محمد بن عجلان، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عجلان فإنه حسن الحديث.

وفي الباب ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم سئل عمّا يقتل المحرم؟ قال:"الحية، والعقرب، والفويسقة، ويرمي الغراب ولا يقتله، والكلب العقور، والحدأة، والسّبع العادي".

رواه أبو داود (1848) عن الإمام أحمد وهو في مسند (10990) -، والترمذي (838)، وابن ماجه (3098) كلّهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن عبد الرحمن بن أبي نعيم البجلي، عن أبي سعيد، فذكره. واللّفظ لأبي داود.

وإسناده ضعيف من أجل يزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي القرشي مولاهم، جمهور أهل العلم متفقون على تضعيفه. ومع ذلك قال الترمذي:"هذا حديث حسن".

قلت: وفي الحديث لفظ منكر وهو قوله:"يرمي الغراب ولا يقتله" فإنه لم يتابعه عليه أحد فيما أعلم.

ورواه الإمام أحمد (11755) من وجه آخر عن يزيد بن أبي زياد، وزاد فيه:"وما شأن الفأرة؟ قال: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم استيقظ، وقد أخذت الفتيلة، فصعدت بها إلى السقف لتحرق عليه".

وفي الأدب المفرد للبخاري (1223):"استيقظ النبيّ صلى الله عليه وسلم ذات ليلة فإذا فأرة قد أخذت الفتيلة، فصعدت بها إلى السقف لتحرق عليهم البيت، فلعنها النبيّ صلى الله عليه وسلم وأحلّ قتلها للمحرم".

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خمس كلهنّ فاسقة، يَقْتُلُهنَّ المحرمُ، ويُقْتلْنَ في الحرم: الفأرة، والعقرب، والحية، والكلب العقور، والغراب".
رواه الإمام أحمد (2330)، والبزار -كشف الأستار (1097) -، وأبو يعلى (2428، 2693) كلّهم من طريق ليث، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.

وليث هو ابن أبي سليم أهل العلم مطبقون على تضعيفه؛ لأنه اختلط أخيرًا، ولم يتميّز حديثه فترك.

وفي الباب أيضًا عن أبي رافع قال:"بينا رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاته إذ ضرب شيئًا في صلاته، فإذا هي عقرب ضربها فقتلها، وأمر بقتل العقرب، والحية، والفأرة، والحدأة للمحرم".

رواه البزار -كشف الأستار (1096) -، عن غسَّان بن عبد الله، ثنا يوسف بن نافع، ثنا عبد الرحمن بن أبي الموال، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، فذكره.

وفيه يوسف بن نافع لم يوثقه أحد سوى ابن حبان، فهو في درجة"مقبول" عند الحافظ ابن حجر، وهو لا يقبل بدون متابعة وإلا فلين الحديث.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 229) وقال:"رواه البزار، وفيه يوسف بن نافع، ذكره ابن أبي حاتم ولم يجرحه، ولم يوثقه، وذكره ابن حبان في"الثقات"" انتهى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটি প্রাণী রয়েছে, হারাম শরীফের ভেতরেও যাদেরকে হত্যা করা হালাল: সাপ, বিচ্ছু, চিল, ইঁদুর, এবং হিংস্র কুকুর।"









আল-জামি` আল-কামিল (4727)


4727 - عن نبيه بن وهب -أخي بني عبد الدار-: أَنَّ عمر بن عبيد الله أَرْسَلَ إِلَى أَبَانَ ابْنِ عُثْمَانَ -وَأَبَانُ يَوْمَئِذٍ أَمِيرُ الْحَاجِّ-: وَهُمَا مُحْرِمَانِ إِنِّي قَدْ أَرَدْتُ أَنْ أُنْكِحَ طَلْحَةَ ابْنَ عُمَرَ بِنْتَ شَيْبَةَ بْنِ جُبَيْرٍ وَأَرَدْتُ أَنْ تَحْضُرَ، فَأَنْكَرَ ذَلِكَ عَلَيْهِ أَبَانُ وَقَالَ: سَمِعْتُ عُثْمَانَ بْنَ عَفَّانَ يَقُولُ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"لا يَنْكِحِ الْمُحْرِمُ، وَلا يُنْكِحُ وَلا يَخْطُبُ".

صحيح: رواه مالك في الحج (70) عن نافع، عن نُبيه بن وهب، به، فذكره.

ورواه مسلم في النكاح (1409) من طريق مالك، به، نحوه.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। নুবাইহ ইবনে ওয়াহাব (বনি আব্দুল দার গোত্রের ভাই) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনে উবাইদুল্লাহ আবান ইবনে উসমানের কাছে বার্তা পাঠালেন—আবান তখন হজ্জের আমির ছিলেন—এবং তারা দুজনেই তখন ইহরাম অবস্থায় ছিলেন। (উমর বললেন), 'আমি তালহা ইবনে উমরকে শাইবা ইবনে জুবাইরের মেয়ের সাথে বিবাহ দিতে চেয়েছি এবং আমি চেয়েছি তুমি যেন উপস্থিত থাকো।' আবান তার এই প্রস্তাব প্রত্যাখ্যান করলেন এবং বললেন, 'আমি উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুহ্রিম (ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তি) বিবাহ করবে না, বিবাহ করাবেও না এবং বিবাহের প্রস্তাবও দেবে না।"