আল-জামি` আল-কামিল
4688 - عن أمّ الحصين، قالت: حَجَجْتُ مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَجَّةَ الْوَدَاعِ، فَرَأَيْتُ أُسَامَةَ وَبِلالًا وَأَحَدُهُمَا آخِذٌ بِخِطَامِ نَاقَةِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم والآخَرُ رَافِعٌ ثَوْبَهُ يَسْتُرُهُ مِن الحَرِّ حَتَّي رَمَي جَمْرَةَ الْعَقَبَةِ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1298: 312) عن أحمد بن حنبل، حدّثنا محمد بن سلمة، عن أبي
عبد الرحيم، عن زيد بن أبي أنيسة، عن يحيى بن الحصين، عن أمّ الحصين جدته قالت، فذكرته.
উম্মুল হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জ আদায় করেছিলাম। তখন আমি উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেলাম। তাঁদের একজনের হাতে ছিল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটের লাগাম, আর অন্যজন নিজের কাপড় উঁচিয়ে ধরে তাঁকে গরম থেকে আড়াল করছিলেন (ছায়া দিচ্ছিলেন)। এই অবস্থা আকাবার জামরায় কঙ্কর নিক্ষেপ করা পর্যন্ত চলতে থাকে।
4689 - عن عبد الله بن عمر، قال: قَامَ رَجُلٌ فَقَالَ: يَا رَسُول اللهِ! مَاذَا تَأْمُرُنَا أَنْ نَلْبَسَ مِن الثِّيَابِ فِي الإِحْرَام؟ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"لا تَلْبَسُوا الْقَمِيصَ وَلا السَّرَاوِيلاتِ، وَلا الْعَمَائِمَ، وَلا الْبَرَانِسَ إِلا أَنْ يَكُونَ أَحَدٌ لَيْسَتْ لَهُ نَعْلَانِ فَلْيَلْبَس الْخُفَّيْنِ وَلْيَقْطَعْ أَسْفَلَ مِن الْكَعْبَيْن، وَلا تَلْبَسُوا شَيْئًا مَسَّهُ زَعْفَرَانٌ، وَلا الْوَرْسُ وَلا تَنْتَقِب الْمَرْأَةُ الْمُحْرِمَةُ وَلا تَلْبَس الْقُفَّازَيْنِ".
تابعه موسى بن عقبة، وإسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، وجويرية، وابن إسحاق في النّقاب والقفازين.
صحيح: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1838) عن عبد الله بن يزيد، حدّثنا اللّيث، حدّثنا نافع، عن ابن عمر، به.
وقول البخاريّ:"تابعه موسى بن عقبة … إلخ" يعني تابعوا ليثًا عن نافع في ذكر النّقاب والقفازين مرفوعًا.
ورواه مالك عن نافع، ولم يرفعه، فرجّح البخاريّ أن زيادة الثقة مقبولة.
وذكر أيضًا أبو داود (1825) بعد أن روى من طريق اللّيث مرفوعًا أن حاتم بن إسماعيل، ويحيى بن أيوب، وموسى بن عقبة رووا هذه الزيادة عن نافع على ما قال الليث.
ثم قال: ورواه موسي بن طارق عن موسى بن عقبة موقوفًا على ابن عمر، وكذلك رواه عبيد الله ابن عمر ومالك وأيوب موقوفًا.
وذكر أبو داود ممن رفعه إبراهيم بن سعيد المديني وهو شيخ من أهل المدينة ليس له كبير حديث.
وأخرجه (1826) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا إبراهيم بن سعيد المديني، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"المحرمة لا تنتقب ولا تلبس القفازين".
قلت: إبراهيم بن سعيد هذا مجهول كما أشار إليه أبو داود بأنه غير معروف. قال الحافظ في التقريب:"مجهول الحال". ولكنه توبع كما سبق.
আবদুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক দাঁড়িয়ে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ইহরাম অবস্থায় আমরা কী ধরনের কাপড় পরিধান করব বলে আপনি আমাদের নির্দেশ দেন? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা জামা (কামীস) পরিধান করবে না, পায়জামা (সারাওয়িল) পরিধান করবে না, পাগড়ি পরিধান করবে না, আর বারনুস (টুপিযুক্ত লম্বা পোশাক) পরিধান করবে না। তবে যদি এমন কেউ থাকে যার পরিধানের জন্য স্যান্ডেল নেই, সে যেন মোজা (খুফ্ফাইন) পরিধান করে এবং তা যেন গোড়ালির নিচ থেকে কেটে ফেলে। আর তোমরা এমন কোনো কাপড় পরিধান করবে না যা জাফরান অথবা ওয়ার্স (এক প্রকার সুগন্ধি গাছ) দ্বারা রঞ্জিত হয়েছে। আর ইহরামকারিণী মহিলা মুখ ঢাকবে না (নিকাব পরবে না) এবং দস্তানা (গ্লাভস) পরিধান করবে না।
4690 - عن ابن عمر: أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم نَهَي النِّسَاءَ فِي إحْرَامِهِنَّ عَن الْقُفَّازَيْنِ وَالنِّقَابِ وَمَا مَسَّ الْوَرْسُ والزَّعْفَرَانُ مِن الثِّيَابِ، وَلْتَلْبَسْ بَعْدَ ذَلِكَ مَا أَحَبَّتْ مِنْ أَلْوَانِ الثِّيَابِ مُعَصْفَرًا أَوْ خَزًّا أَوْ حُلِيًّا أَوْ سَرَاوِيلَ أَوْ قَمِيصًا أَوْ خُفًّا.
حسن: رواه أبو داود (1827) عن أحمد بن حنبل، حدّثنا يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: فإن نافعًا مولى عبد الله بن عمر حدثني عن عبد الله بن عمر، فذكره.
قال أبو داود:"روي هذا الحديث عن ابن إسحاق عن نافع. وعبدة بن سليمان، ومحمد بن
سلمة عن محمد بن إسحاق إلى قوله:"وما مسّ الورس والزعفران من الثياب" ولم يذكرا ما بعده.
وصحّحه الحاكم (1/ 486) ورواه من طريق الإمام أحمد وقال:"صحيح على شرط مسلم"، ووافقه الذهبي.
قلت: وذلك على منهج الحاكم، وإلا فإن مسلمًا لم يحتج بابن إسحاق، والحديث في مسند الإمام أحمد من وجهين:
أحدهما: عن يعلى بن عبيد، حدّثنا محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم"ينهى النساء في الإحرام عن القفاز والنقاب، وما مسّ الورس والزّعفران من الثياب" (4740).
والثاني: عن يزيد، أخبرنا محمد -يعني ابن إسحاق-، عن نافع، عن ابن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول على هذا المنبر، وهو ينهي الناس إذا أحرموا عما يكره لهم:"لا تلبسوا العمائم، ولا القميص، ولا السّراويلات، ولا البرانس، ولا الخفين، إلا أن يضطر مضطر إليهما فليقطعهما أسفل من الكعبين، ولا ثوبًا مسّه الورس ولا الزّعفران". قال: وسمعته ينهى النساء عن القفازين والنقاب، وما مسّ الورس والزعفران من الثياب".
وأمّا رواية يعقوب بن إبراهيم، عن أبيه، عن ابن إسحاق فلم أجدها في المسند
وأمّا المعصفر فليس بطيب، روي ذلك عن جابر؛ ولذا كانت عائشة رضي الله عنها تلبس الثياب المعصفرة وهي محرمة.
ورُوي عن حقة بنت عمرو وكانت قد صلت إلى القبلتين مع رسول الله صلى الله عليه وسلم"أنها كانت إذا أرادت أن تحرم وضعت عبيتها في حجرها ولبست من ثيابها ما تشاء والمعصفر، فتهل".
رواه الطبرانيّ في"المعجم الكبير" (24/ 215) من حديث شريك، عن عاصم الأحول، عن أبي مجلز، عنها.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 220):"ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال إلا أن شريكًا وهو ابن عبد الله النخعيّ تغيّر حفظه منذ ولي القضاء، فلا يؤمن من وقوع الوهم والخطأ في حديثه.
وقد ذهب أكثر أهل العلم إلى جواز استعمال الثياب المعصفرة للمحرمة.
وقال أصحاب الرأي هو طيب تجب به الفدية. انظر:"شرح السنة" (7/ 244 - 245).
والعُصْفُر: نبات صيفيٌّ من الفصيلة المركبة أنبوبية الزهر، يستعمل زهره تابلًا، ويستخرج منه صبغ أحمر يصبغ به الحرير ونحوه. كذا في المعجم الوسيط.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নারীদেরকে তাদের ইহরাম অবস্থায় হাতমোজা (গ্লাভস), নেকাব এবং পোশাকের যে অংশে ওয়ারস (urs) বা জাফরান লেগে আছে তা পরিধান করতে নিষেধ করতে শুনেছেন। এরপর তারা যে রঙের কাপড় পছন্দ করে, তা পরিধান করতে পারে— তা কুসুম ফুলের রং (আসফর)-এ রঞ্জিত হোক, অথবা খায বস্ত্র, অথবা অলঙ্কার, অথবা পাজামা, অথবা জামা, অথবা মোজা হোক।
4691 - عن سالم بن عبد الله، أن عبد الله (يعني ابن عمر): كان يصنع ذلك -يَعْنِي يَقْطَعُ الْخُفَّيْنِ لِلْمَرْأَةِ الْمُحْرِمَةِ-، ثُمَّ حَدَّثَتْهُ صَفِيَّةُ بِنْتُ أَبِي عُبَيْدٍ أَنَّ عَائِشَةَ حَدَّثَتْهَا أَنَّ
رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ كَانَ رَخَّص لِلنِّسَاءِ فِي الْخُفَّيْنِ فَتَرَك ذلك.
حسن: رواه أبو داود (1831) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا ابن أبي عدي، عن محمد بن إسحاق، قال: ذكرت لابن شهاب فقال: حدثني سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن عمر كان يصنع ذلك، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (4836) عن محمد بن أبي عدي، بإسناده، مثله.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق لأنه صرّح بسماعه من الزهري.
ورواه الشافعي عن ابن عيينة، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، أنه كان يُفتي النساء إذا أحرمن أن يقطعن الخفين حتى أخبرته صفية، عن عائشة، أنها تفتي النساء أن لا يقطعن، فانتهى عنه."الأم" (2/ 147) وعنه أخرجه البيهقيّ (5/ 52).
আব্দুল্লাহ (ইবনে উমর) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইহরামকারী মহিলাদের মোজা (খুফ্ফাইন) কেটে দিতেন। এরপর সাফিয়্যাহ বিনতে আবূ উবাইদ তাকে জানালেন যে, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মহিলাদের জন্য মোজা পরিধানের অনুমতি দিয়েছিলেন। ফলে তিনি (ইবনে উমর) তা (মোজা কেটে দেওয়ার আমল) পরিত্যাগ করলেন।
4692 - عن فاطمة بنت المنذر قالت: كنا نخمر وجوهنا ونحن محرمات، ونحن مع أسماء بنت أبي بكر الصّديق.
صحيح: رواه مالك في الحج (18) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، فذكرته. وإسناده صحيح.
قلت: وفعلهن هذا بحضرة أسماء بنت أبي بكر مشعر بأنّ هذا العمل كان مستمرًا من عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم كما تدل عليه الرواية التالية.
فقد رواه إبراهيم بن حميد، حدّثنا هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء، قالت:"كنا نغطي وجوهنا من الرجال، وكنا نمتشط قبل ذلك". رواه ابن خزيمة (2690) من هذا الوجه.
ورواه الحاكم (1/ 454) من وجه آخر عن علي بن مسهر، عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر قالت:"كنا نغطي وجوهنا من الرجال، وكنا نتمشط قبل ذلك في الإحرام".
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين" ووافقه الذهبيّ.
وأمّا ما رُوي عن عائشة، قالت:"كنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم ونحن محرمون، فإذا لقينا الرّاكب أسدلْنا ثيابَنا من فوق رؤوسنا، فإذا جاوزنا رفعناها"، فهو ضعيف.
رواه أبو داود (1833)، وابن ماجه (2935)، والإمام أحمد (24021)، وصحّحه ابن خزيمة (2691) كلّهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن عائشة، فذكرته.
قال ابن خزيمة:"وفي القلب منه".
قلت: ويزيد بن أبي زياد وهو الهاشميّ مولاهم الكوفي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه
أعلّه المنذريّ في"مختصره".
وأما قوله: ذكر شعبة ويحيى بن سعيد القطان، ويحيى بن معين أنّ مجاهدًا لم يسمع من عائشة. وقال أبو حاتم الرازي:"مجاهد عن عائشة مرسل".
فالصّحيح كما يقول المنذري:"قد أخرج البخاري ومسلم في صحيحيهما من حديث مجاهد عن عائشة، وفيها ما هو ظاهر في سماعه منها" انتهى.
قلت: وهو كما قال، بل قال العلائي:"وقد صرّح في غير حديث بسماعه منها".
ولكن الصحيح عن عائشة رضي الله عنها أنها كانت تلبس من الثياب ما شاءت إلا ثوبًا مسّه ورس أو زعفران، ولا تتبرقع، ولا تلثم، وتسدل الثوب على وجهها إن شاءت. موقوف عليها كما رواه البيهقي (5/ 47).
تمسّك بهذا الحديث جمهور أهل العلم منهم: مالك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، فقالوا: لها أن تسدل على وجهها من فوق رأسها إذا احتاجت إلى ذلك عند مرور الرّجال، إلّا أن أصحاب الشافعي اشترطوا أن يكون الثوب متجافيًا عن وجهها بحيث لا يصيب البشرة.
إلا أن تحقّق هذا الشرط لا يمكن؛ لأن الثوب المسدول لا يكاد يسلم من إصابة البشرة.
وأما ما رُوي عن ابن عمر:"إحرام المرأة في وجهها، وإحرام الرجل في رأسه" فهو موقوف عليه.
رواه الدارقطني (2761)، والبيهقي (5/ 47) من حديث حماد بن زيد، عن هشام بن حسان، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. وكذلك رواه الدّارورديّ وغيره موقوفًا عليه.
ورواه أيوب بن محمد أبو الجمل، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:"ليس على المرأة إحرام إلا في وجهها". ومن طريقه رواه الدارقطني (2760).
قال أبو أحمد بن عدي:"لا أعلم يرفعه عن عبيد الله غير أبي الجمل هذا". وقال البيهقي:"أيوب بن محمد أبو الجمل ضعيف عند أهل العلم بالحديث، فقد ضعّفه يحيى بن معين وغيره. وقد روي هذا الحديث من وجه آخر مجهول عن عبيد الله بن عمر مرفوعًا، والمحفوظ موقوف" انتهى.
وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 219) وعزاه إلى الطبراني في الكبير والأوسط، وعلّله بأيوب بن محمد اليماميّ (وهو أبو الجمل) فقال:"هو ضعيف".
ফাতেমা বিনতে মুনযির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ইহরাম অবস্থায় থাকাকালীন আমাদের মুখমণ্ডল ঢেকে রাখতাম, যখন আমরা আসমা বিনতে আবি বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে ছিলাম।
4693 - عن إبراهيم بن عبد الله بن حُنَيْن، عَنْ أَبِيه: أَنَّ عَبْدَ اللهِ بْنَ عَبَّاسِ وَالْمِسْوَرَ ابْنَ مَخْرَمَةَ اخْتَلَفَا بِالأَبْوَاءِ، فَقَالَ عَبْدُ اللهِ: يَغْسِلُ الْمُحْرِمُ رَأْسَهُ. وَقَالَ الْمِسْوَرُ بْنُ مَخْرَمَةَ: لا يَغْسِلُ الْمُحْرِمُ رَأُسَهُ. قَال: فَأَرْسَلَنِي عَبْدُ اللهِ بْنُ عَبَّاسٍ إِلَى أَبِي أَيُّوبَ الأَنْصَارِيّ فَوَجَدْتُهُ يَغْتَسِلُ بَيْنَ الْقَرْنَيْنِ -وَهُوَ يُسْتَرُ بِثَوْبٍ- فَسَلَّمْتُ عَلَيْهِ فَقَال: مَنْ
هَذَا؟ فَقُلْتُ: أَنَا عَبْدُ اللهِ بْنُ حُنَيْنٍ أَرْسَلَنِي إِلَيْكَ عَبْدُ اللهِ بْنُ عَبَّاسٍ أَسْأَلُكَ كَيْفَ كَانَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَغْسِلُ رَأْسَهُ وَهُوَ مُحْرِمٌ؟ قَالَ: فَوَضَعَ أَبُو أَيُّوبَ يَدَهُ عَلَى الثَّوْبِ فَطَأْطَأَهُ حَتَّى بَدَا لِي رَأْسُهُ ثُمَّ قَال لإِنْسَانٍ يَصُبُّ عَلَيْهِ: اصْبُبْ، فَصَبَّ عَلَى رَأْسِهِ، ثُمَّ حَرَّكَ رَأْسَهُ بِيَدَيْهِ فَأَقْبَلَ بِهِمَا وَأَدْبَرَ ثُمَّ قَال: هَكَذَا رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَفْعَلُ.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (4) عن زيد بن أسلم، عن إبراهيم بن عبد الله بن حسين، به.
رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1840)، ومسلم في الحج (1205) كلاهما من طريق مالك، به.
আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস ও মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবওয়া নামক স্থানে একটি বিষয়ে মতভেদ করলেন। আবদুল্লাহ (ইবনু আব্বাস) বললেন: ইহরামকারী তার মাথা ধৌত করতে পারবে। আর মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ বললেন: ইহরামকারী তার মাথা ধৌত করতে পারবে না। আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস তখন আমাকে (আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইনকে) আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে গিয়ে দেখলাম, তিনি দুটি খুঁটির মাঝখানে গোসল করছেন—আর তাকে একটি কাপড় দ্বারা আড়াল করা হয়েছিল। আমি তাকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: কে এটি? আমি বললাম, আমি আবদুল্লাহ ইবনু হুনাইন। আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস আমাকে আপনার কাছে এই প্রশ্ন জিজ্ঞাসা করতে পাঠিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় কিভাবে তাঁর মাথা ধৌত করতেন?
আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন কাপড়ের ওপর হাত রেখে তা নিচে নামিয়ে দিলেন, যাতে তার মাথা আমার কাছে প্রকাশিত হলো। এরপর তিনি তার উপর পানি ঢেলে দেওয়া ব্যক্তিকে বললেন: ঢেলে দাও। লোকটি তাঁর মাথায় পানি ঢালল। অতঃপর তিনি নিজের মাথাকে উভয় হাত দ্বারা নাড়লেন এবং হাত দুটিকে সামনে ও পেছনে ফিরালেন। এরপর বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবেই করতে দেখেছি।
4694 - عن حفصة أمّ المؤمنين أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: ما شأن النّاس حلُّوا ولم تَحْلِل أنتَ من عمرتك؟ فقال:"إنّي لبّدتُ رأسي، وقلّدتُ هدي، فلا أَحِلُّ حتى أنحر".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (180) عن نافع، عن ابن عمر، عن حفصة، به.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1566)، ومسلم في الحج (1229) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
وتلبيد الشّعر قد يكون بالصمغ، وقد يكون بالعسل، وإنما يفعل ذلك بالشعر ليجتمع ويتلبّد، فلا يتخلله الغبار، ولا يصيبه الشعث، ولا يقع فيه الدبيب. قاله الخطابيّ.
হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি উম্মুল মু'মিনীন, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: মানুষের কী হলো যে তারা (উমরাহ শেষ করে) ইহরাম খুলে ফেলেছে, অথচ আপনি আপনার উমরাহ থেকে ইহরাম খুলেননি? তিনি বললেন: "আমি আমার চুল তালবিদ করেছি (আঠালো কিছু দ্বারা জমাট করে রেখেছি), এবং আমি আমার হাদীর পশুকে চিহ্নিত করেছি। সুতরাং, আমি কুরবানী না করা পর্যন্ত ইহরাম মুক্ত হব না।"
4695 - عن عبد الله بن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُهلُّ ملبِّدًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1540)، ومسلم في الحج (1184: 21) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، به. ولفظهما سواء. وزاد مسلم كلمات التلبية.
وأما ما رواه أبو داود (1748) من طريق محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لبّد رأسه بالعسل". ففيه محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن ولم يصرح، ولم أجد من تابعه على ذلك.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এমন অবস্থায় তালবিয়াহ পাঠ করতে শুনেছি যখন তিনি চুল লেপনকারী (বা জটা বাঁধাধারী) ছিলেন।
4696 - عن عبد الله بن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم.
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1202) من وجوه عن سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن طاوس وعطاء، عن ابن عباس، به.
ورواه البخاريّ في جزاء الصيد (1835) من طريق سفيان، قال: قال عمرو: أول شيء سمعت عطاء يقول: سمعت ابن عباس (فذكره).
قال: ثم سمعته يقول: حدثني طاوس، عن ابن عباس. فقلت: لعله سمعه منهما.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন (হিজামা করিয়েছিলেন)।
4697 - عن ابن بُحينة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم احتجم بطريق مكة وهو محرم، وسط رأسه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1836)، ومسلم في الحج (1203) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن علقمة بن أبي علقمة، عن عبد الرحمن الأعرج، عن ابن بحينة، به. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاري بنحوه إلا أنه قال:"بلَحْيِ جَمل" بدل"بطريق مكة". ولحي جمل موضع بطريق مكة.
قال الحافظ:"ووهم من ظنّه فكي الجمل الحيوان المعروف، وأنه كان آلة الحجم" الفتح (4/ 51). وابن بحينة نسب إلى أمّه واسمه: عبد الله بن مالك.
ইবনু বুহাইনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় মক্কার পথে তাঁর মাথার মাঝখানে শিঙ্গা লাগালেন (রক্তমোক্ষণ করালেন)।
4698 - عن أنس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم على ظهر القدم من وجع كان به.
صحيح: رواه أبو داود (1837)، والنسائي (2849)، والترمذي في الشمائل (358) كلّهم من حديث عبد الرزاق، حدثنا معمر، عن قتادة، عن أنس، فذكره.
ومن هذ الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (12682) وصحّحه ابن خزيمة (2659)، وابن حبان (3952)، والحاكم (1/ 435) وقال: صحيح على شرط الشيخين.
ولكنه أعلّه أبو داود فقال: سمعت أحمد قال:"ابن أبي عروبة أرسله -يعني عن قتادة-".
قلت: معمر من أصحاب قتادة المعروفين، وإن كان ابن أبي عروبة أحفظ من معمر، فإرساله لا يعلل من أسنده إما لزيادة الثقة، أو لعل قتادة نفسه يروي على الوجهين.
وقوله:"على ظهر القدم" يحمل على التعدد كما هو معروف في مثل هذه الحالة، وإليه جنح ابن خزيمة، وعليه فلا تعارض بين حديثي ابن عباس وأنس. في حين أبهمه معتمر بن سليمان فإنه قال: سمعت حميدًا قال: سئل أنس عن الحجامة للمحرم، فقال:"احتجم رسول الله صلى الله عليه وسلم من وجع كان به".
رواه الإمام أحمد (13816) عن علي بن عبد الله، حدّثنا معتمر، فذكره. ولكن رواه ابن خزيمة (2658) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعاني، ثنا المعتمر وقال فيه:"من وجع وجده في رأسه".
فرجع الحديث إلى حديث ابن عباس.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় তাঁর পায়ে যে ব্যথা ছিল, তার কারণে পায়ের উপরিভাগে শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন (রক্ত বের করেছিলেন)।
4699 - عن جابر بن عبد الله:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم من وَثْي كان بوركهـ أو ظهره".
حسن: رواه أحمد (14280، 14857) من طرق عن هشام، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا أبو داود (3863) وصحّحه ابن خزيمة (2660) إلّا أن أبا داود لم يذكر قوله:"وهو محرم".
ورواه ابن ماجه (3082) من وجه آخر عن ابن خُثيم، عن أبي الزبير، بإسناده وفيه:"أنّ النبيّ
- صلى الله عليه وسلم احتجم وهو محرم عن رهصة أخذته"، أي الوهن.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.
قوله:"وَثْي" وقيل:"وَثْء" - بفتح الواو، وسكون الثاء، وآخره همزة، وهو: وجع يصيب اللحم، ولا يبلغ العظم.
فقه الباب:
لم يكره أحدٌ من أهل العلم الحجامة للمحرم، إن احتجم من موضع لا شعر فيه، وإن احتجم في موضع الشعر وقطعه فله أن يحتجم إلا أنه يفتدي، هذا هو رأي الجمهور من أهل العلم، منهم أبو حنيفة، والشافعي، وأحمد، وإسحاق وغيرهم. وقال مالك: لا يحتجم المحرم إلا من ضرورة لا بد منها.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় থাকা সত্ত্বেও তাঁর নিতম্ব বা পিঠে হওয়া কোনো ব্যথার কারণে শিঙা লাগিয়েছিলেন (রক্তমোক্ষণ করেছিলেন)।
4700 - عن كعب بن عجرة، قال: أَتَى عَلَيَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم زَمَنَ الْحُدَيْبِيَةِ وَالْقَمْلُ يَتَنَاثَرُ عَلَى وَجْهِي! فَقَال:"أَيُؤْذِيكَ هَوَامُّ رَأْسِكَ؟". قُلْتُ: نَعَم. قَال:"فَاحْلِقْ وَصُمْ ثَلاثَةَ أَيَّام، أَوْ أَطْعِمْ سِتَّةَ مَسَاكِينَ، أَو انْسُكْ نَسيِكَةً". قَالَ أَيُّوب: لا أَدْرِي بِأَيِّ هَذَا بَدَأَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4190)، ومسلم في الحج (1201: 80) كلاهما من طريق حماد بن زيد، حدّثنا أيوب، قال: سمعت مجاهدًا، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عجرة، به، واللّفظ للبخاريّ.
ورواه البخاريّ في المغازي (4191) من طريق ورقاء أبي بشر، عن مجاهد، به، عن كعب بن عجرة، قال:"كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالحديبية ونحن محرمون …".
কাব ইবনে উজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুদায়বিয়ার সময়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন, আর উকুন আমার চেহারার উপর ঝরে পড়ছিল! তখন তিনি বললেন, "তোমার মাথার কীট-পতঙ্গ কি তোমাকে কষ্ট দিচ্ছে?" আমি বললাম, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তাহলে তুমি (মাথা) মুণ্ডন করে নাও এবং তিন দিন রোযা রাখো, অথবা ছয়জন মিসকীনকে আহার করাও, অথবা একটি কুরবানি করো।" আইয়ুব বলেন, আমার জানা নেই, তিনি এর মধ্যে কোনটি দিয়ে শুরু করেছিলেন।
4701 - عن كعب بن عجرة، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَال لَهُ:"لَعَلَّكَ آذَاكَ هَوَامُّكَ؟". فَقُلْت: نَعَمْ يَا رَسُولَ اللهِ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"احْلِقْ رَأْسَكَ، وَصُمْ ثَلاثَةَ أَيَّامٍ، أَوْ أَطْعِمْ سِتَّةَ مَسَاكِينَ، أَو انْسُكْ بِشَاةٍ".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (238) عن حُميد بن قيس، عن مجاهد أبي الحجّاج، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عجرة، فذكره.
ورواه البخاريّ في المحصر (1814) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به مثله.
ورواه البخاري (1815)، ومسلم (1201) كلاهما من حديث سيف (وهو ابن سليمان)، عن مجاهد، قال: سمعت عبد الرحمن بن أبي ليلى، أن كعب بن عجرة حدّثه، قال: وقف عليَّ رسول
الله صلى الله عليه وسلم بالحديبية، ورأسي يتهافت قملًا! فقال:"يؤذيك هوامك؟" قلت: نعم. قال:"فأحلق رأسك" أو قال:"احلق". قال: فيَّ نزلت هذه الآية (فذكر الآية). فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"صم ثلاثة أيام، أو تصدّق بفرق بين ستة، أو انسك بما تيسر".
ورواه البخاريّ في التفسير (4517)، ومسلم في الحج (1201: 85) من طريق شعبة، عن عبد الرحمن بن الأصبهانيّ، قال: سمعت عبد الله بن معقل، قال: قعدت إلى كعب بن عُجْرة في هذا المسجد -يعني مسجد الكوفة-، فسألته عن {فَفِدْيَةٌ مِنْ صِيَامٍ} فقال: حُملتُ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم والقملُ يتناثر على وجهي، فقال:"ما كنتُ أرى أنَّ الجهد قد بلغ بك هذا، أما تجدُ شاة؟" قلت: لا، قال:"صُمْ ثلاثةَ أيام، أو أطعم ستّة مساكين لكلّ مسكين نصف صاع من طعام، وأحلق رأسك". فنزلت فيَّ خاصة، وهي لكم عامة.
وأمّا ما رواه مالك في الحج (252) عن عبد الكريم بن مالك الجزريّ، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عجرة، أنه كان مع رسول الله صلى الله عليه وسلم محرمًا، فأذاه القمل في رأسه، فأمره رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يحلق رأسه وقال:"صُمْ ثلاثة أيام، أو أطعم ستة مساكين، مدين مدين لكل إنسان أو انسك بشاة، أي ذلك فعلت أجزأ عنك". ففيه انقطاع بين عبد الكريم بن مالك وبين عبيد الرحمن بن أبي ليلى.
هكذا رواه يحيى عن مالك بإسقاط مجاهد بينهما.
قال ابن عبد البر:"وتابعه أبو المصعب، وابن بكير، والقعنبي، ومطرف، والشافعي، ومعن بن عيسي، وسعيد بن عفير، وعبد الله بن يوسف التنيسي، ومصعب الزبيري، ومحمد بن المبارك الصوريّ كلّ هؤلاء رووه عن مالك كما رواه يحيى، لم يذكروا مجاهدًا في إسناد هذا الحديث.
ورواه ابن وهب، وابن القاسم، ومكي بن إبراهيم عن مالك عن عبد الكريم الجزريّ، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عجرة".
وقال:"الصّواب في إسناد هذا الحديث قول من جعل فيه مجاهدًا بين عبد الكريم، وبين ابن أبي ليلى، ومن أسقطه فقد أخطأ فيه. وزعم الشافعي أن مالكًا هو الذي وهم فيه" انتهى. انظر: التمهيد (20/ 62).
رواه البيهقيّ (5/ 55) من طريق الحسين بن الوليد، ثنا مالك بن أنس، عن عبد الكريم الجزريّ، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عجرة، فذكره.
قال البيهقيّ:"جوّده الحسين بن الوليد النيسابوريّ، عن مالك. وكذلك رواه ابن وهب عن مالك. ورواه جماعة عن مالك دون ذكر مجاهد في إسناده، وذكر الشعير في رواية الحسين بن الوليد دون غيره".
وقد ذهب مالك إلى هذا الخيار الذي في حديث عبد الكريم، فقال:"كلّ شيء في كتاب الله
في الكفارات كذا أو كذا" فصاحبه مخير في ذلك أي شيء أحبّ أن يفعل ذلك فعل".
وقال: أما النسك فشاة، وأما الصيام فثلاثة أيام، وأما الطعام فيُطعم ستة مساكين، لكل مسكين مدان بمد النبيّ صلى الله عليه وسلم" انتهى.
وانظر لمزيد من التفاصيل وأقوال أهل العلم في ذلك"المنة الكبرى" (4/ 44 - 50).
وأما ما رُوي أنه صلى الله عليه وسلم أمره أن يهدي بقرة فهو ضعيف.
رواه أبو داود (1859) وفيه رجل لم يُسم كما أن فيه مخالفة للثقات الذين نصُّوا على الشّاة أو على ما تيسَّر.
কাব ইবনে উজরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "সম্ভবত তোমার মাথার পোকা-মাকড় তোমাকে কষ্ট দিচ্ছে?" আমি বললাম: 'হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ।' অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার মাথা মুণ্ডন করো, এবং তিন দিন রোজা রাখো, অথবা ছয়জন মিসকিনকে খাবার দাও, অথবা একটি বকরি যবেহ করো।"
4702 - عن عَنْ نُبَيْهِ بن وَهْبٍ، قَالَ: خَرَجْنَا مَعَ أَبَانَ بْنِ عُثْمَانَ حَتَّى إِذَا كُنَّا بِمَلَلٍ اشْتَكَي عُمَرُ بْنُ عُبَيْدِ اللهِ عَيْنَيْهِ، فَلَمَّا كُنَّا بِالرَّوْحَاءِ اشْتَدَّ وَجَعُهُ، فَأَرْسَلَ إِلَى أَبَانَ بْنِ عُثْمَانَ يَسْأَلُهُ، فَأَرْسَلَ إِلَيْهِ أَن اضْمِدْهُمَا بِالصَّبِرِ فَإِنَّ عُثْمَانَ رضي الله عنه حَدَّثَ عَنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِي الرَّجُلِ إِذَا اشْتَكَي عَيْنَيْهِ وَهُوَ مُحْرِمٌ ضَمَّدَهُمَا بِالصَّبِرِ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1204) من طريق سفيان بن عيينة وعبد الوارث بن سعيد -فرقهما-، عن أيوب بن موسي، حدّثني نبيه بن وهب، به.
والصَّبِر: عُصارة شجر مُرٍّ مفرده صَبرة، والجمع: صُبور.
قال الترمذي:"العمل على هذا عند أهل العلم، لا يرون بأسًا أن يتداوى المحرم بدواء ما لم يكن فيه طيب".
নুবাইহ ইবনু ওয়াহব থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা আবান ইবনু উসমানের সঙ্গে বের হলাম। যখন আমরা 'মালালে' পৌঁছলাম, তখন উমার ইবনু উবাইদুল্লাহর চোখে ব্যথা শুরু হলো। যখন আমরা 'রাওহাতে' পৌঁছলাম, তখন তার ব্যথা আরও তীব্র হলো। তিনি আবান ইবনু উসমানের কাছে লোক পাঠালেন, যেন তাকে (এ বিষয়ে) জিজ্ঞাসা করেন। তখন (আবান) তার কাছে এই বার্তা পাঠালেন যে, তুমি সিবর (তিক্ত লতার রস দ্বারা তৈরি ঔষধ) দ্বারা চোখদ্বয়ে পট্টি বেঁধে দাও। কারণ উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, কোনো ব্যক্তি ইহরাম অবস্থায় তার চোখে ব্যথার অভিযোগ করলে সে যেন তা সিবর দ্বারা পট্টি বাঁধে।
4703 - عن عائشة، قالت: دَخَلَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى ضُبَاعَةَ بِنْتِ الزُّبَيْرِ فَقَالَ لَهَا:"لَعَلَّكِ أَرَدْتِ الْحَجَّ؟". قَالَت: وَاللهِ، لا أَجِدُني إِلا وَجِعَةً. فَقَالَ لَهَا:"حُجِّي وَاشْتَرِطِي، وَقُولِي: اللَّهُمَّ! مَحِلِّي حَيْثُ حَبَسْتَنِي". وَكَانَتْ تَحْتَ الْمِقْدَادِ بْنِ الأَسْوَدِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5089)، ومسلم في الحج (1207: 104) كلاهما من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته، ولفظهما سواء.
قوله:"مَحِلِّي" بكسر الحاء، اسم مكان بمعني موضع التحلل من الإحرام.
وهذا الحديث لم يبلغ الشّافعيَّ إلا مرسلًا كما رواه في"الأم" (2/ 158) عن سفيان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مرّ بضباعة بنت الزبير، فقال لها:"أما تريدين الحجّ؟"
فذكر الحديث.
قال الشافعيّ:"ولو ثبت حديث عروة عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في الاستثناء لم أعده إلى غيره لأنه لا يحلُّ عندي خلاف ما ثبت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم".
وكذلك رواه ابن ماجه (2937) من طريق وكيع، عن هشام بإسناده مرسلًا.
وعلّق البيهقيّ (5/ 221) على كلام الشافعيّ بقوله:"قد ثبت الحديث من أوجه عن النبيّ صلى الله عليه وسلم. أما حديث ابن عيينة عن هشام فقد روي موصولًا".
ثم رواه من طريق الدارقطني، ثنا ابن صاعد، ثنا عبد الجبار بن العلاء، ثنا سفيان بن عيينة، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكر الحديث.
وقال: وقد وصله أبو أسامة حماد بن أسامة، ومعمر بن راشد، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكره. وحديث أبي أسامة في الصحيحين كما رأيت.
وضباعة بنت الزبير بن عبد المطلب هي ابنة عمّ النبيّ صلى الله عليه وسلم، وقد تنسب إلى جدّها عبد المطلب، وهي زوجة المقداد بن الأسود، ولم يكن للزبير بن عبد المطلب عقب إلّا من ضباعة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুবা'আ বিনত আয-যুবাইরের নিকট প্রবেশ করলেন। অতঃপর তিনি তাকে বললেন: "সম্ভবত তুমি হজ্জের ইচ্ছা করেছ?" তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! আমি নিজেকে অসুস্থ ছাড়া আর কিছু মনে করছি না। তখন তিনি তাকে বললেন: "তুমি হজ্জ করো এবং শর্তারোপ করো, আর বলো: 'হে আল্লাহ! যেখানে তুমি আমাকে বাধা দেবে, সেখানেই আমার ইহরাম শেষ হওয়ার স্থান।'" আর তিনি ছিলেন মিক্বদাদ ইবনুল আসওয়াদের স্ত্রী।
4704 - عن ابن عباس، أَنَّ ضُبَاعَةَ بِنْتَ الزُّبَيْرِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ رضي الله عنها أَتَتْ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَت: إِنِّي امْرَأَةٌ ثَقِيلَةٌ وَإِنِّي أُرِيدُ الْحَجَّ فَمَا تَأْمُرُنِي؟ قَال:"أَهِلِّي بِالْحَجِّ وَاشْتَرِطِي أَنَّ مَحِلِّي حَيْثُ تَحْبِسُنِي". قَال: فَأَدْرَكَتْ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1208) من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع طاوسًا وعكرمة مولى ابن عباس، عن ابن عباس، به.
قوله:"فأدركتْ" أي أدركت الحجَّ ولم تتحلّل حتى فرغت منه.
وفي الحديث دليل على أن المحصر يحل حيث يُحبس وينحر بدنه هناك حرمًا كان أو حلًا، وكذلك فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم في عام الحديبية حين أحصر فنحر هديه وحلّ.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই দুবা'আহ বিনতুয যুবাইর ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, আমি একজন দুর্বল/অসুস্থ নারী, আর আমি হজ্জ করতে চাই। আপনি আমাকে কী নির্দেশ দেন? তিনি বললেন, "তুমি হজ্জের ইহরাম বাঁধো এবং (আল্লাহর কাছে) এই শর্ত করো যে, যেখানে তুমি (বাধাগ্রস্ত হয়ে) আটকে যাবে, সেখানেই তুমি হালাল হয়ে যাবে।" (রাবী) বলেন, অতঃপর তিনি (সেই শর্ত সাপেক্ষে) হজ্জ সম্পন্ন করলেন।
4705 - عن ضُباعة بنت الزّبير، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لها:"حجّي واشترطي".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 336)، والبيهقي (5/ 222) كلاهما من حديث سليمان ابن كثير، عن حميد الطويل، عن زينب بنت نبيط امرأة أنس بن مالك، عن ضباعة، فذكرته.
وفيه سليمان بن كثير العبديّ مختلف فيه غير أنه لا بأس به في غير الزهريّ وهو هنا كذلك.
ورواه الإمام أحمد (27358) عن الضحاك بن مخلد، عن حجاج الصواف، قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ضباعة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحرمي وقولي: إنّ مَحِلِّي حيث تحبسني. فإن حُبست أو مرضت فقد أحللتِ من ذلك شرطك على ربِّك عز وجل".
ورواه غيره فأدخل بين عكرمة وبين ضباعة"ابن عباس" كما مضى، وكذلك رواه أيضًا البيهقيّ (5/ 222)
عن عباد، عن الحجاج الصواف بذكر ابن عباس.
দুবা'আহ বিন্তুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “ইহরাম পরিধান করো এবং বলো: ‘আমার ইহরাম শেষ হবে সেখানেই, যেখানে আমি বাধাগ্রস্ত হব।’ সুতরাং যদি তুমি বাধাগ্রস্ত হও অথবা অসুস্থ হয়ে পড়ো, তাহলে তুমি ইহরাম থেকে মুক্ত হয়ে গেলে। আর এটা তোমার মহান ও মহিমান্বিত রবের উপর তোমার পক্ষ থেকে শর্তারোপ।”
4706 - عن أسماء بنت أبي بكر أو سُعدي بنت عوف أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على ضباعة بنت عبد المطلب، فقال:"ما يمنعك يا عمّتاه من الحج؟" فقالت: أنا امرأة سقيمة، وأنا أخاف الحبس. قال:"فأحرمي واشترطي أنّ محِلَّكِ حيث حُبسْت".
حسن: رواه ابن ماجه (2936) من طريقين عن عبد الله بن نمير، حدّثنا عثمان بن حكيم، عن أبي بكر بن عبد الله بن الزبير، عن أسماء بنت أبي بكر أو سعدي بنت عوف قالت: فذكرته.
ورواه الإمام أحمد (26953) من هذا الوجه.
وإسناده حسن من أجل أبي بكر بن عبد الله بن الزبير، روى عنه اثنان؛ ولحديثه أصل ثابت، فيحسن حديثه إلا أن قوله:"يا عمتاه" خطأ، والصواب أنها كانتْ ابنة عمه الزبير.
আসমা বিনত আবী বকর অথবা সু'দী বিনত আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দুবা'আ বিনত আব্দুল মুত্তালিবের নিকট গেলেন। অতঃপর তিনি বললেন: “হে ফুফু! হজ্জ করা থেকে তোমাকে কিসে বাধা দিচ্ছে?” তিনি বললেন: আমি একজন অসুস্থ মহিলা, আর আমি (পথে) বাঁধাপ্রাপ্ত হওয়ার ভয় করছি। তিনি বললেন: “তাহলে তুমি ইহরাম বাঁধো এবং শর্ত করে নাও যে, যেখানে তুমি বাঁধাপ্রাপ্ত হবে, সেটাই হবে তোমার হালাল হওয়ার স্থান।”
4707 - عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لضباعة بنت الزبير:"حجي واشترطي أن محلي حيث حبستني"
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (2547)، والبيهقي (5/ 222) كلاهما من طرقٍ عن أبي الزبير، عن جابر قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير فإنه حسن الحديث.
وفي الباب أيضًا ما روي عن أمّ سلمة أيضًا.
رواه الإمام أحمد (26590). وفيه محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن.
فقه الحديث:
قال الترمذيّ عقب حديث ابن عباس (3/ 270):"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، يرون الاشتراط في الحج ويقولون: إن اشترط فعرض له مرض أو عذر، فله أن يحل ويخرج من إحرامه.
وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق، ولم ير بعض أهل العلم الاشتراط في الحج". ولم يسمهم.
وكان ممن ينكر الاشتراط في الحج عبد الله بن عمر، وكان يقول:"أليس حسبكم سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم إنْ حُبس أحدكم عن الحج طاف بالبيت وبالصفا والمروة، ثم حلّ من كلّ شيء حتى يحجّ عامًا قابلًا، فيُهدي أو يصوم إن يجد هديًا".
رواه البخاري في الحج (1810) عن أحمد بن محمد، أخبرنا عبد الله، أخبرنا يونس، عن الزهري، قال: أخبرني سالم قال: كان عبد الله بن عمر يقول (فذكره).
قال البيهقيّ (5/ 223):"ولو بلغه حديث ضباعة بنت الزبير لصار إليه، ولم ينكر الاشتراط كما لم ينكره أبوه".
وفائدة الاشتراط أن مَنْ حُبس بمرض أو غيره يحل حيث ما حُبس فإن كان معه هدي يُذبح، وإن
لم يكن معه هدي فلا شيء عليه، إلّا إن كان حجّه حجّة الإسلام فعليه حجة قابلة، وبه قال الحنابلة.
قال أبو داود في"المسائل" (ص 123): سمعت أحمد سُئل عمن اشترط في الحج ثم أُحصر؟ قال: ليس عليه شيء. ثم ذكر أحمد قول الذي قال: كانوا يشترطون ولا يرونه شيئًا! قال: كلام منكوس، أراد أن يحسِّن ردّ حديث النبيّ صلى الله عليه وسلم لقول ضباعة:"قولي: محلي حيث حبستني". انظر للمزيد"المنة الكبرى" (4/ 372).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুবাআ বিনতে যুবাইরকে বললেন: “তুমি হজ্জ করো এবং এই শর্ত আরোপ করো যে, যেখানে তুমি বাধাপ্রাপ্ত হবে, সেখানেই আমার (ইহরাম মুক্ত হওয়ার) স্থান।”
