আল-জামি` আল-কামিল
4721 - عن عبد الله بن عباس قال: يا زيد بن أرقم، هل علمت أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدي له بيضات نعام وهو حرام فردّهنّ؟ قال: نعم.
حسن: رواه ابن خزيمة (2644)، والحاكم (1/ 452) كلاهما من حديث إسحاق بن عيسي، ثنا حماد بن سلمة، عن قيس، عن طاوس، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وإسناده حسن من أجل إسحاق بن عيسى بن الطباع، وهو إن كان من رجال مسلم إلا أنه لا يرتقي إلى درجة"الثقة".
وأما ما رُوي عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في بيض النعام يصيبه المحرم ثمنه" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (3086)، والدارقطني (2562) كلاهما من حديث حسين المعلم، عن أبي المهزّم، عن أبي هريرة، فذكره. وأبو المهزم ضعيف جدًا.
وروي مثل هذا عن كعب بن عجرة، وهو ضعيف أيضًا.
وكذلك لا يصح في بيضة نعام صيام يوم أو إطعام مسكين. انظر تخريجه في"المنة الكبرى" (4/ 98 - 99).
ورواه أبو داود (1853) من وجه آخر عن محمد بن عيسى، حدّثنا حماد، عن ميمون بن جابان، عن أبي رافع، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الجراد من صيد البحر".
قال أبو داود:"أبو المهزّم ضعيف، والحديثان جميعًا وهم".
ثم رواه عن حماد، عن ميمون بن جابان، عن أبي رافع، عن كعب من قوله:"الجراد من صيد البحر" وكأنه يشير إلى صحة الموقوف.
وميمون بن جابان البصريّ أبو الحكم ذكره ابن حبان في الثقات، وقال العجلي: بصري ثقة، وقال العقيلي: لا يصح حديثه. وقال الأزدي: لا يحتج بحديثه. وقال البيهقي: غير معروف.
وقوله:"رِجل من جراد" بكسر الراء وسكون الجيم هو من الجراد كالجماعة الكثيرة من الناس.
قال الترمذي:"رخّص قومٌ من أهل العلم للمحرم أن يصيد الجراد ويأكله، ورأى بعضهم عليه صدقة إذا اصطاده وأكله".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যায়দ ইবনে আরকামকে বললেন, “হে যায়দ ইবনে আরকাম! আপনার কি জানা আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ইহরাম অবস্থায় উটপাখির ডিম উপহার দেওয়া হয়েছিল এবং তিনি তা ফেরত দিয়েছিলেন?” তিনি (যায়দ) বললেন, “হ্যাঁ।”
4722 - عن ابن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خَمْسٌ مِن الدَّوَابِّ لَيْسَ عَلَى الْمُحْرِمِ فِي قَتْلِهِنَّ جُنَاحٌ: الْغُرَابُ، وَالْحِدَأَةُ، وَالْعَقْرَبُ، والْفَأْرَةُ، وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (88) عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه البخاري في جزاء الصيد (1826)، ومسلم في الحج (1199: 76) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটি প্রাণী রয়েছে, যা ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তির হত্যা করলে কোনো দোষ হয় না: দাঁড়কাক, চিল, বিচ্ছু, ইঁদুর এবং হিংস্র কুকুর।"
4723 - عن حفصة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خمس من الدّواب كلّها فاسق، لا حرج على من قتلهن: العقرب، والغراب، والحدأة، والفأرة، والكلب العقور".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1828)، ومسلم في الحج (1200) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن عمر، قال: قالت حفصة، فذكرته.
واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه، وليس عنده:"كلّها فاسق".
হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচটি প্রাণী রয়েছে, এগুলোর সবই ক্ষতিকর (ফাসিক)। এদেরকে যে হত্যা করে তার কোনো দোষ নেই: বিচ্ছু, কাক, চিল, ইঁদুর এবং হিংস্র কুকুর।”
4724 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خَمْسٌ مِنَ الدَّوَابِّ كُلُّهُنَّ فَاسِقٌ يَقْتُلُهُنَّ فِي الْحَرَمِ: الْغُرَابُ، وَالْحِدَأَةُ، وَالْعَقْرَبُ، وَالْفَأْرَةُ، وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1829)، ومسلم (1198: 71) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته، واللفظ للبخاريّ.
আয়শা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচটি ক্ষতিকর প্রাণী রয়েছে, যাদের সবগুলোই ফাসিক (ক্ষতিকর)। এগুলিকে হারাম শরীফের মধ্যেও হত্যা করা যায়: দাঁড়কাক, চিল, বিচ্ছু, ইঁদুর এবং হিংস্র কুকুর।”
4725 - عن عبد الله بن مسعود، قال: بَيْنَمَا نَحْنُ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي غَارٍ بِمِنًى إِذْ نَزَلَ عَلَيْهِ: {وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا} [سورة المرسلات: 1] وَإِنَّهُ لَيَتْلُوهَا وَإِنِّي لأَتَلَقَّاهَا مِنْ فِيهِ وَإِنَّ فَاهُ لَرَطْبٌ بِهَا إِذْ وَثَبَتْ عَلَيْنَا حَيَّةٌ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"اقْتُلُوهَا"، فَابْتَدَرْنَاهَا فَذَهَبَتْ، فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"وُقِيَتْ شَرَّكُمْ كَمَا وُقِيتُمْ شَرَّهَا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1830)، ومسلم في السلام (2234) كلاهما من طريق الأعمش، حدّثني إبراهيم (هو النخعي)، عن الأسود (هو ابن يزيد النخعي)، عن ابن مسعود، به.
واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه، وليس عنده:"بمني". قال البخاريّ عقبه:"إنّما أردنا بهذا أنّ منى من الحرم، وأنّهم لم يروا بقتل الحيّة بأسًا".
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদা আমরা মিনার একটি গুহায় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, যখন তাঁর উপর অবতীর্ণ হলো: {ওয়াল মুরসালাতি উরফা} [সূরা মুরসালাত: ১]। তিনি তা তিলাওয়াত করছিলেন এবং আমি সরাসরি তাঁর মুখ থেকে তা গ্রহণ করছিলাম। সেই তিলাওয়াতের কারণে তাঁর মুখ সজীব ছিল। হঠাৎ আমাদের দিকে একটি সাপ লাফিয়ে এলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা এটাকে মেরে ফেলো।" আমরা দ্রুত সেটিকে মারতে উদ্যত হলাম, কিন্তু সেটি চলে গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের অনিষ্ট থেকে এটিকে রক্ষা করা হয়েছে, যেমন তোমরা এর অনিষ্ট থেকে রক্ষা পেয়েছ।"
4726 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"خَمْسٌ قَتْلُهُنَّ حَلالٌ في الْحُرُمِ: الْحَيَّةُ، وَالْعَقْرَبُ، وَالْحِدَأَةُ، وَالْفَأْرَةُ، وَالْكَلْبُ الْعَقُورُ".
حسن: رواه أبو داود (1847) عن علي بن بحر، حدّثنا حاتم بن إسماعيل، حدّثني محمد بن عجلان، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عجلان فإنه حسن الحديث.
وفي الباب ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم سئل عمّا يقتل المحرم؟ قال:"الحية، والعقرب، والفويسقة، ويرمي الغراب ولا يقتله، والكلب العقور، والحدأة، والسّبع العادي".
رواه أبو داود (1848) عن الإمام أحمد وهو في مسند (10990) -، والترمذي (838)، وابن ماجه (3098) كلّهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن عبد الرحمن بن أبي نعيم البجلي، عن أبي سعيد، فذكره. واللّفظ لأبي داود.
وإسناده ضعيف من أجل يزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي القرشي مولاهم، جمهور أهل العلم متفقون على تضعيفه. ومع ذلك قال الترمذي:"هذا حديث حسن".
قلت: وفي الحديث لفظ منكر وهو قوله:"يرمي الغراب ولا يقتله" فإنه لم يتابعه عليه أحد فيما أعلم.
ورواه الإمام أحمد (11755) من وجه آخر عن يزيد بن أبي زياد، وزاد فيه:"وما شأن الفأرة؟ قال: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم استيقظ، وقد أخذت الفتيلة، فصعدت بها إلى السقف لتحرق عليه".
وفي الأدب المفرد للبخاري (1223):"استيقظ النبيّ صلى الله عليه وسلم ذات ليلة فإذا فأرة قد أخذت الفتيلة، فصعدت بها إلى السقف لتحرق عليهم البيت، فلعنها النبيّ صلى الله عليه وسلم وأحلّ قتلها للمحرم".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خمس كلهنّ فاسقة، يَقْتُلُهنَّ المحرمُ، ويُقْتلْنَ في الحرم: الفأرة، والعقرب، والحية، والكلب العقور، والغراب".
رواه الإمام أحمد (2330)، والبزار -كشف الأستار (1097) -، وأبو يعلى (2428، 2693) كلّهم من طريق ليث، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
وليث هو ابن أبي سليم أهل العلم مطبقون على تضعيفه؛ لأنه اختلط أخيرًا، ولم يتميّز حديثه فترك.
وفي الباب أيضًا عن أبي رافع قال:"بينا رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاته إذ ضرب شيئًا في صلاته، فإذا هي عقرب ضربها فقتلها، وأمر بقتل العقرب، والحية، والفأرة، والحدأة للمحرم".
رواه البزار -كشف الأستار (1096) -، عن غسَّان بن عبد الله، ثنا يوسف بن نافع، ثنا عبد الرحمن بن أبي الموال، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، فذكره.
وفيه يوسف بن نافع لم يوثقه أحد سوى ابن حبان، فهو في درجة"مقبول" عند الحافظ ابن حجر، وهو لا يقبل بدون متابعة وإلا فلين الحديث.
وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 229) وقال:"رواه البزار، وفيه يوسف بن نافع، ذكره ابن أبي حاتم ولم يجرحه، ولم يوثقه، وذكره ابن حبان في"الثقات"" انتهى.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটি প্রাণী রয়েছে, হারাম শরীফের ভেতরেও যাদেরকে হত্যা করা হালাল: সাপ, বিচ্ছু, চিল, ইঁদুর, এবং হিংস্র কুকুর।"
4727 - عن نبيه بن وهب -أخي بني عبد الدار-: أَنَّ عمر بن عبيد الله أَرْسَلَ إِلَى أَبَانَ ابْنِ عُثْمَانَ -وَأَبَانُ يَوْمَئِذٍ أَمِيرُ الْحَاجِّ-: وَهُمَا مُحْرِمَانِ إِنِّي قَدْ أَرَدْتُ أَنْ أُنْكِحَ طَلْحَةَ ابْنَ عُمَرَ بِنْتَ شَيْبَةَ بْنِ جُبَيْرٍ وَأَرَدْتُ أَنْ تَحْضُرَ، فَأَنْكَرَ ذَلِكَ عَلَيْهِ أَبَانُ وَقَالَ: سَمِعْتُ عُثْمَانَ بْنَ عَفَّانَ يَقُولُ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"لا يَنْكِحِ الْمُحْرِمُ، وَلا يُنْكِحُ وَلا يَخْطُبُ".
صحيح: رواه مالك في الحج (70) عن نافع، عن نُبيه بن وهب، به، فذكره.
ورواه مسلم في النكاح (1409) من طريق مالك، به، نحوه.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। নুবাইহ ইবনে ওয়াহাব (বনি আব্দুল দার গোত্রের ভাই) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনে উবাইদুল্লাহ আবান ইবনে উসমানের কাছে বার্তা পাঠালেন—আবান তখন হজ্জের আমির ছিলেন—এবং তারা দুজনেই তখন ইহরাম অবস্থায় ছিলেন। (উমর বললেন), 'আমি তালহা ইবনে উমরকে শাইবা ইবনে জুবাইরের মেয়ের সাথে বিবাহ দিতে চেয়েছি এবং আমি চেয়েছি তুমি যেন উপস্থিত থাকো।' আবান তার এই প্রস্তাব প্রত্যাখ্যান করলেন এবং বললেন, 'আমি উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুহ্রিম (ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তি) বিবাহ করবে না, বিবাহ করাবেও না এবং বিবাহের প্রস্তাবও দেবে না।"
4728 - عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الْمُحْرِمُ لا يَنْكِح، وَلا يُنْكِحُ وَلا يَخْطُبُ".
حسن: رواه الدارقطني (3650) عن أبي طالب أحمد بن نصر الحافظ، حدثنا هلال بن العلاء، حدثنا النقيلي، حدثنا مسلم بن خالد، حدثنا إسماعيل بن أمية، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه أيضًا (3651) من وجه آخر عن المغيرة بن عبد الرحمن، عن الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر.
قال: لا أعلمه إلا عن النبي صلى الله عليه وسلم:"لا ينكح المحرم ولا يُنكح، ولا يخطب، ولا يخطب على غيره".
والإسناد الأول حسن من أجل الكلام في مسلم بن خالد وهو الزنجيّ، مختلف فيه، فقال ابن المديني:"ليس بشيء"، وقال ابن معين:"ثقة"، ووثقه أيضًا الدّارقطني، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال ابن عدي:"حسن الحديث، وأرجو أنه لا بأس به". قلت: وهو كما قال.
وقال البيهقيّ (7/ 210):"روي عن إسماعيل بن أمية، عن نافع، عن ابن عمر، مرفوعًا. وعن
الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر -بالشّك-. والصحيح عن ابن عمر موقوف" انتهى.
قلت: ويؤيده أن مالكًا رواه في الموطأ (72) عن نافع، عن ابن عمر، قوله. ولفظه:"لا يَنْكِحُ الْمُحْرِمُ، ولا يَخْطُبُ عَلَى نَفْسِهِ ولا على غَيْرِهِ".
ولكن يجوز أن يكون الموقوف على سبيل الفتوى، والمرفوع على سبيل الرّواية، وكلاهما صحيح.
وأما ما رواه عبد الله بن أحمد (5958) قال: وجدت هذا الحديث في كتاب أبي بخطّ يده: حدّثنا أسود بن عامر، حدّثنا أيوب بن عتبة، حدّثنا عكرمة بن خالد، قال: سألت عبد الله بن عمر عن امرأة أراد أن يتزوجها رجل، وهو خارج من مكة، فأراد أن يعتمر أو يحجّ؟ فقال:"لا تتزوجها وأنت محرم، نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عنه".
ورواه الدارقطني (3649) من وجه آخر عن الأسود بن عامر، بإسناده، مثله.
وأيوب بن عتبة اليمامي أبو يحيى القاضي، ضعّفه جمهور أهل العلم، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 268).
قال الترمذي (840) -عقب إخراج حديث عثمان-:"حديث عثمان حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند بعض أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم منهم: عمر بن الخطاب، وعلي بن أبي طالب، وابن عمر، وهو قول فقهاء التابعين، وبه يقول مالك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، لا يرون أن يتزوج المحرم قالوا: فإن نكح فنكاحه باطل".
قال البيهقي: وروينا عن عمر، وعلي، وزيد بن ثابت، وابن عمر في ردّ نكاح المحرم.
قلت: حديث عمر بن الخطاب، رواه مالك (1/ 349) وعنه البيهقي (5/ 66)، والدّارقطني (3646) عن يحيى بن سعيد كلاهما عن داود بن الحصين، أن أبا غطفان بن طريف المري أخبره، أن أباه طريفًا تزوّج امرأة وهو محرم، فردّ عمر بن الخطاب نكاحه". وإسناده صحيح.
وحديث علي بن أبي طالب. رواه البيهقي عن الحسن، عنه، قال:"من تزوّج وهو محرم نزعنا منه امرأته".
ورواه أيضًا من طريق جعفر بن محمد، عن أبيه، عن علي، قال:"لا ينكح المحرم، فإن نكح ردّ نكاحه".
وحديث زيد بن ثابت. رواه أيضًا البيهقي أن مولاه شوذب تزوج وهو محرم ففرق بينهما.
وروى البيهقي عن سعيد بن المسيب، أن رجلًا تزوج وهو محرم، فأجمع أهل المدينة على أن يفرق بينهما.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুহ্রিম (ইহরাম অবস্থায় থাকা ব্যক্তি) নিজে বিবাহ করবে না, (অন্যের) বিবাহ সম্পন্ন করাবে না এবং বিবাহের প্রস্তাবও দিবে না।"
4729 - عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم تزوّج ميمونة وهو مُحرم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5114)، ومسلم في النكاح (1410: 46) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، أخبرنا عمرو بن دينار، حدثنا جابر بن زيد أبو الشّعثاء، أن ابن عباس أخبره، به، فذكره.
ورواه البخاري في المغازي (4258) من طريق عكرمة، عن عبد الله بن عباس، قال:"تزوّج النبيّ صلى الله عليه وسلم ميمونة وهو مُحرم، وبنى بها وهو حلال، وماتتْ بسرف".
قال البخاريّ: وزاد ابن إسحاق: حدثني ابن أبي نجيح، وأبان بن صالح، عن عطاء ومجاهد، عن عبد الله بن عباس، قال:"تزوّج النبيّ صلى الله عليه وسلم ميمونة في عمرة القضاء".
قال الحافظ:"هو موصول في السيرة، وزاد في آخره:"وكان الذي زوّجها منه العباس بن عبد المطلب" ولابن حبان، والطبراني من طريق إبراهيم بن سعد، عن ابن إسحاق بلفظ:"تزوّج ميمونة بنت الحارث في سفره ذلك -يعني عمرة القضاء- وهو حرام، وكان الذي زوّجه إيّاها العباس". ونحوه للنسائي من وجه آخر عن ابن عباس" انتهى. فتح الباري (7/ 510).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মায়মূনাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিবাহ করেছিলেন যখন তিনি ইহরাম অবস্থায় ছিলেন।
আরেকটি বর্ণনায় আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মায়মূনাকে বিবাহ করেছিলেন যখন তিনি ইহরাম অবস্থায় ছিলেন, এবং তিনি তাঁর সাথে সহবাস করেছিলেন যখন তিনি হালাল (ইহরাম মুক্ত) অবস্থায় ছিলেন। আর তিনি (মায়মূনা) 'সারিফ' নামক স্থানে ইন্তিকাল করেন।
তিনি ক্বাদা উমরার সময় তাঁকে বিবাহ করেছিলেন। আর তাঁকে বিবাহ দিয়েছিলেন তাঁর চাচা আব্বাস ইবন আবদুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
4730 - عن عائشة، قالت: تزوّج النبيّ صلى الله عليه وسلم بعض نسائه وهو محرم، واحتجم وهو محرم.
صحيح: رواه ابن حبان (4132)، والطحاوي في"مشكله" (5798)، و"معانيه" (2/ 269)، والبيهقي (7/ 212) كلهم من طريق أبي عوانة، عن مغيرة، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن عائشة، فذكرته. واللفظ لابن حبان وليس عند غيره:"واحتجم وهو محرم".
وإسناده صحيح، المغيرة هو ابن مقسم الضبيّ، وأبو الضّحى هو مسلم بن صبيح.
قال الطّحاوي:"وهذا مما لا نعلمه روي عن عائشة رضي الله عنها مما يخالفه. وقد روي عن أبي هريرة أيضًا ما يوافق ذلك".
ولكن أعلّه البيهقيّ بالإرسال، والصّواب أن من أسنده ثقة، وعنده زيادة علم وهي مقبولة عند المحدثين.
وأمّا حديث أبي هريرة الذي أشار إليه الطّحاويّ فهو ما رواه الدارقطني (3662)، والطحاوي في"مشكله" (5799) كلاهما من حديث خالد بن عبد الرحمن الخراسانيّ، عن كامل أبي العلاء، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال:"تزوّج رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو محرم".
قال الطّحاويّ:"وهذا مما لا نعلم أيضًا عن أبي هريرة فيه خلافًا لذلك".
قلت: بل فيه كامل أبو العلاء مختلف فيه، فوثقه ابن معين، وضعفه النسائيّ، وقال ابن عدي عقب رواية هذا الحديث من طريق خالد بن عبد الرحمن، عن كامل أبي العلاء بإسناده:"ولكامل غير ما ذكرت من الحديث، وليس بالكثير، ولم أر من المتقدمين فيه كلامًا، فأذكره إلا أني رأيت في بعض رواياته أشياء أنكرتها، فذكرته من أجل ذلك، ومع هذا أرجو أن لا بأس به"."الكامل" (6/ 2101 - 2102).
ومن أجله ضعفه الحافظ في"الفتح" (9/ 166) ولكنه قال:"لكنه يعتضد بحديث ابن عباس وعائشة، وفيه رد على قول ابن عبد البر أن ابن عباس انفرد من بين الصّحابة بأن النبيّ صلى الله عليه وسلم تزوج وهو محرم".
ورُوي عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يتزوّج المحرم، ولا يزوِّج".
رواه الدارقطني (3652) عن محمد بن علي بن حبيش، حدّثنا أحمد بن القاسم بن مساور، حدّثنا القواريري، حدّثنا محمد بن دينار الطاحي، عن أبان، عن أنس، فذكره.
وفيه محمد بن دينار الطّاحي تكلّم فيه غير واحد من أهل العلم، فقال أبو داود: تغيّر قبل موته، وقال الدارقطنيّ: ضعيف، وقال العقيلي: في حديثه وهم.
وأما النسائي فقال: ليس به بأس، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال العجليّ: لا بأس به. فمثله يحسن حديثه في الشواهد إذا لم يخالف.
وقد ثبت عنه ما يخالف هذا لما رواه الطحاويّ في شرح"مشكل الآثار" (14/ 520) من طريق عبد الله بن محمد بن أبي بكر قال: سألت أنسًا عن نكاح المحرم فقال:"لا بأس به، وهل هو إلّا كالبيع".
قال الحافظ في"الفتح" (9/ 166):"إسناده قوي، لكنه قياس في مقابل النّص، فلا عبرة به، وكأن أنسًا لم يبلغه حديث عثمان" انتهى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের কাউকে বিবাহ করেছিলেন যখন তিনি ইহরাম অবস্থায় ছিলেন, এবং তিনি ইহরাম অবস্থায় শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন।
4731 - عن يزيد بن الأصم قال: حدثتني ميمونة بنت الحارث؛ أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوّجها وهو حلال.
قال: وكانت خالتي وخالة ابن عباس.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1411) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا يحيى بن آدم، حدّثنا جرير بن حازم، حدّثنا أبو فزارة (هو راشد بن كيسان العبسيّ)، عن يزيد بن الأصم، حدّثتني ميمونة، فذكرته.
وقوله: قال:"وكانت خالتي …" القائل هو يزيد بن الأصمّ.
ورواه أحمد (26828) من وجه آخر عن أبي فزارة يحدث عن يزيد بن الأصم، عن ميمونة: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوجها حلالًا، وبنى بها حلالًا، وماتت بسرف، فدفنها في الظُّلة التي بنى فيها، فنزلنا في قبرها أنا وابن عباس.
وزاد ابن حبان (4134) والحاكم (4/ 31): فلما وضعناها في اللحد، مال رأسها، وأخذت ردائي، فوضعته تحت رأسها، فاجتذبه ابن عباس، فألقاه، وكانت حلقت في الحج رأسها، فكان رأسها محمما، وعند الحاكم بعد قوله:"فألقاه": ووضع عند رأسها كنانة، أي: حجارة.
وقوله:"حلقت في الحج" - لعلها لأسباب الأذى، وإلا فقد نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن حلق
المرأة رأسها.
وقوله:"فكان رأسها محمما" أي: بدأ ينبت فيه الشعر.
মায়মূনা বিনত আল-হারিছ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে এমন অবস্থায় বিবাহ করেছিলেন যখন তিনি হালাল ছিলেন (অর্থাৎ ইহরাম অবস্থায় ছিলেন না)।
(বর্ণনাকারী ইয়াযিদ ইবনে আসম) বলেন: তিনি (মায়মূনা) ছিলেন আমার খালা এবং ইবনে আব্বাসেরও খালা।
4732 - عن ميمونة، قالت: تزوّجني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا حلال بعدما رجعنا من مكة.
صحيح: رواه أحمد (26815) عن يحيى بن إسحاق، ثنا حماد بن سلمة، عن حبيب الشهيد، عن ميمون بن مهران، عن يزيد بن الأصم، عن ميمونة، فذكرته.
ورواه أبو داود (1839)، والطحاوي في"مشكله" (5804)، وابن حبان في"صحيحه" (4137) كلهم من حديث حماد، بنحوه: تزوجني النبيّ صلى الله عليه وسلم ونحن حلالان بسرف.
قولها:"تزوجني رسول الله صلى الله عليه وسلم … بعدما رجعنا من مكة" أي: بني بها.
মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মক্কা থেকে ফিরে আসার পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিবাহ করেছিলেন, যখন আমি ইহরামমুক্ত অবস্থায় ছিলাম।
4733 - عن أبي رافع، قال: تزوّج رسول الله صلى الله عليه وسلم ميمونة وهو حلال، وبنى بها وهو حلال، وكنت أنا الرسول فيما بينهما.
حسن: رواه الترمذيّ (841)، وأحمد (27197)، والطحاوي في"مشكل الآثار" (5800)، وصحّحه ابن حبان (4130) كلّهم من طريق حماد بن زيد، حدّثنا مطر الوراق، عن ربيعة بن عبد الرحمن، عن سليمان بن يسار، عن أبي رافع، فذكره.
قال الترمذي:"حسن، ولا نعلم أحدًا أسنده غير حماد بن زيد، عن مطر الوراق، عن ربيعة وقال: وروى مالك بن أنس، عن ربيعة، عن سليمان بن يسار، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم تزوّج ميمونة وهو حلال. رواه مالك مرسلًا. ورواه أيضًا سليمان بن بلال عن ربيعة مرسلًا. وقال: ورُوي عن يزيد ابن الأصم، عن ميمونة، قالت: تزوّجني رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو حلال، ويزيد بن الأصم هو ابن أخت ميمونة" انتهى كلام الترمذيّ.
قلت: إسناده حسن من أجل مطر الوراق فإنه صدوق كثير الخطأ كما في"التقريب". ورواه مالك عن ربيعة، عن سليمان بن يسار مرسلًا.
وقد رجّح ابن عبد البر المرسل في"التمهيد" (13/ 151)، ولكن إن كان سليمان بن يسار ولد سنة سبع وعشرين كما قيل، ومات أبو رافع بالمدينة بعد قتل عثمان بيسير، كان قتل عثمان في ذي الحجة سنة خمس وثلاثين، فيكون عمر سليمان بن يسار فوق ثماني سنوات، فسماعه منه ممكن، ثم تأكد ذلك من ميمونة نفسها، فلا استحالة في ذلك؛ ولذا رجّح الحافظ ابن القيم في"زاده"، وفي"تهذيب السنن" الموصول. وقال:"وهذا صريح في تزوجها بالوكالة قبل الإحرام" انتهى.
وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن عمر:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم تزوّج ميمونة وهو حلال" ففيه رجل لم يسم.
رواه الدارقطنيّ (3653) من حديث أحمد بن حسين بن جعفر اللهبي، حدثني بعض أصحابنا، عن أبي وهب البصريّ، عن عبيد الله بن عمر بن حفص، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وأما دفع التعارض الذي وقع في حديث ابن عباس ومن وافقه، وفي حديث ميمونة ومن وافقها فذكرته بالتفصيل في"المنة الكبري" (4/ 78 - 83)، فراجعه إن شئت.
وأما مذاهب العلماء: فذهب جمهور أهل العلم إلى تحريم نكاح المحرم كما سبق.
وذهب أبو حنيفة والثوري وقبلهما: سعيد بن جبير، وعطاء، وطاوس، ومجاهد، وعكرمة، وجابر بن زيد من أصحاب ابن عباس، وعمرو بن دينار، وأيوب السختياني، وعبد الله بن أبي نجيح، والقاسم بن محمد، وإبراهيم النخعي وغيرهم إلى أنه لا كراهة في تزويج المحرم. وهو مذهب ابن مسعود، وابن عباس، وأنس. وحجّة هؤلاء: أنّ الحرام في الإحرام هو الوطأ لا التزويج.
فقوله:"لا ينكح" معناه: لا يطأ. وشبّهوا تزويج المحرم بشراء الجارية.
وقد سئل أنس بن مالك عن نكاح المحرم فقال:"لا بأس به". رواه الطحاوي بإسناد قوي كما سبق.
وكان ابن مسعود أيضًا لا يرى بأسًا أن يتزوج المحرم. رواه الطحاوي في"شرح مشكل الآثار" (14/ 519).
وقد أجبتُ عن هذه الشّبهات وغيرها بالتفصيل في"المنة الكبرى" فلا أرى حاجة لإعادتها.
আবু রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করেছিলেন যখন তিনি হালাল (ইহরামমুক্ত) ছিলেন, এবং তিনি যখন হালাল (ইহরামমুক্ত) ছিলেন, তখনই তাঁর সাথে বাসর করেছিলেন। আর আমিই ছিলাম তাঁদের দুজনের মাঝে (বিবাহের) দূত।
4734 - عن عبد الله بن عباس، قال: كَانَتْ عُكَاظٌ، وَمَجَنَّةُ، وَذُو الْمَجَازِ أَسْوَاقًا فِي الجَاهِلِيَّةِ فَلَمَّا كَانَ الإِسْلَامُ فَكَأَنَّهُمْ تَأَثَّمُوا فِيه فَنَزَلَتْ: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ}.
فِي مَوَاسِمِ الْحَجِّ قَرَأَهَا ابْنُ عَبَّاسٍ.
صحيح: رواه البخاريّ في مواضع منها في البيوع (2050) عن عبد الله بن محمد، حدّثنا سفيان، عن عمرو، عن ابن عباس، فذكره.
وفي رواية:"كانوا لا يتجرون بمني، فأمروا بالتجارة إذا أفاضوا من عرفات".
رواه أبو داود (1731) وفيه يزيد بن أبي زياد وهو الهاشميّ من رجال مسلم في المتابعة إلا أنه ضعيف عند جمهور أهل العلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উকাজ, মাজান্নাহ এবং যুল-মাজাজ ছিল জাহিলিয়াতের (অন্ধকার যুগের) সময়কালের বাজার। যখন ইসলাম এলো, তখন তারা যেন (হজ্বের মওসুমে) সেগুলোতে ব্যবসা করাকে গুনাহ মনে করল। তখন এই আয়াত নাযিল হলো: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} (তোমাদের প্রতিপালকের পক্ষ থেকে অনুগ্রহ অনুসন্ধান করায় তোমাদের কোনো পাপ নেই)। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি হজ্বের মওসুম সম্পর্কে পাঠ করতেন।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "তারা মিনায় ব্যবসা করত না, তাই যখন তারা আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করত, তখন তাদের ব্যবসায় করার নির্দেশ দেওয়া হয়।"
4735 - عن عبد الله بن عباس، قال:"إنَّ النَّاسَ فِي أَوَّلِ الْحَجِّ كَانُوا يَتَبَايَعُونَ بِمِنًى وَعَرَفَةَ وَسُوقِ ذِي الْمَجَازِ وَمَوَاسِمِ الْحَجِّ فَخَافُوا الْبَيْعَ وَهُمْ حُرُمٌ فَأَنْزَلَ اللهُ
سُبْحَانَهُ: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} فِي مَوَاسِمِ الْحَجِّ.
قال: فحدَّثني عبيد بن عمير أنّه كان يقرَؤُهَا في المُصْحَفِ.
حسن: رواه أبو داود (1734) عن محمد بن بشار، حدّثنا حماد بن مسعدة، حدّثنا ابن أبي ذئب، عن عطاء بن أبي رباح، عن عبيد بن عمير، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمير بن عبيد مولي ابن عباس.
ورواه أبو داود أيضًا (1735) عن أحمد بن صالح، حدّثنا ابن أبي فديك، أخبرني ابن أبي ذئب، عن عبيد بن عمير، قال أحمد بن صالح كلامًا معناه أنه مولي ابن عباس، عن عبد الله بن عباس، أن الناس في أول ما كان الحج كانوا يبيعون فذكر معناه إلى قوله:"مواسم الحج".
ورواية أحمد بن صالح رواها أيضًا أبو بكر بن أبي داود في كتاب"المصاحف" (193) (1/ 328 - 329) بإسناده مثله.
قال ابن أبي ذئب: فحدثني عبيد أنه كان يقرؤها في المصحف.
فإنْ صحّ قول أحمد بن صالح فإن عبيد بن عمير روي عنه ابن أبي ذئب كما روى عنه عطاء بن أبي رباح، وبه صار الإسناد حسنًا لأن له أصلا ثابتا.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই প্রথম দিকে লোকেরা হজ্জের সময় মিনা, আরাফা, যুল-মাজায বাজার এবং হজ্জের অন্যান্য মৌসুমে বেচাকেনা করত। অতঃপর ইহরাম অবস্থায় তারা বেচাকেনা করতে ভয় পেল। তখন আল্লাহ্ সুবহানাহু অবতীর্ণ করলেন: “তোমাদের প্রতিপালকের পক্ষ থেকে অনুগ্রহ অনুসন্ধান করাতে তোমাদের কোনো পাপ নেই” – হজ্জের মৌসুমগুলোতে। তিনি বলেন, উবাইদ ইবনে উমাইর আমাকে বর্ণনা করেন যে তিনি এই অংশটি মুসহাফে পাঠ করতেন।
4736 - عن أبي أمامة التيميّ، قال: كُنْتُ رَجُلًا أَكَرِّي فِي هَذَا الْوَجْهِ، وَكَانَ نَاسٌ يَقُولُونَ لِي: إِنَّهُ لَيْسَ لَكَ حَجٌّ، فَلَقِيتُ ابْنَ عُمَرَ فَقُلْتُ: يَا أَبَا عَبْدِ الرَّحْمَنِ! إِنِّي رَجُلٌ أَكْرِّي فِي هَذَا الْوَجْهِ، وَإِنَّ نَاسًا يَقُولُونَ لِي إِنَّهُ لَيْسَ لَكَ حَجٌّ، فَقَالَ ابْنُ عُمَر: أَلَيْسَ تُحْرِمُ وَتُلَبِّي وَتَطُوفُ بِالْبَيْتِ وَتُفِيضُ مِنْ عَرَفَاتٍ وَتَرْمِي الْجِمَارَ؟ قَالَ: قُلْتُ: بَلَى قَالَ: فَإِنَّ لَكَ حَجًّا، جَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَسَأَلَهُ عَنْ مِثْلِ مَا سَأَلْتَنِي عَنْهُ فَسَكَتَ عَنْهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَلَمْ يُجِبْهُ حَتَّى نَزَلَتْ هَذِهِ الآيَةُ {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ}. فَأَرْسَلَ إِلَيْهِ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَقَرَأَ عَلَيْهِ هَذِهِ الآيَةَ وقَالَ:"لَكَ حَجٌّ".
حسن: رواه أبو داود (1733) عن مسدّد، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدّثنا العلاء بن المسيب، حدّثنا أبو أمامة، قال: فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل أبي أمامة التيمي الذي لا يعرف اسمه غير أنه معروف بكنيته، قال ابن معين: أبو أمامة الذي يروي عن ابن عمر ثقة لا يعرف اسمه، وقال أبو زرعة: لا بأس به.
আবূ উমামা আত-তাইমী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এই পথে (হজের সময়) ভাড়া খাটাতাম (অন্যদের বাহন বহন করতাম)। কিছু লোক আমাকে বলত: তোমার জন্য কোনো হজ নেই। অতঃপর আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করে বললাম: হে আবূ আব্দুর রহমান! আমি এই পথে ভাড়া খাটিয়ে থাকি, আর কিছু লোক আমাকে বলে যে আমার জন্য কোনো হজ নেই। তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি ইহরাম বাঁধো না, তালবিয়াহ্ পাঠ করো না, বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করো না, আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করো না এবং জামরাতে পাথর নিক্ষেপ করো না? তিনি (আবূ উমামা) বলেন, আমি বললাম: হ্যাঁ (করি)। তিনি বললেন: তবে তোমার জন্য হজ রয়েছে। এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তুমি আমাকে যা জিজ্ঞেস করলে ঠিক সেই বিষয়েই তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জবাব না দিয়ে নীরব রইলেন, যতক্ষণ না এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমাদের প্রতিপালকের অনুগ্রহ সন্ধান (ব্যবসা করা) করাতে তোমাদের কোনো পাপ নেই।" (সূরা বাকারা: ১৯৮) অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিকট লোক পাঠালেন এবং তাকে এই আয়াতটি পড়ে শোনালেন এবং বললেন: "তোমার জন্য হজ রয়েছে।"
4737 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من حَجَّ هذا البيتَ، فلم يرْفث، ولم يفسُق رجع كما ولدَتْه أمُّه".
متفق عليه: رواه البخاري في المحصر (1819)، ومسلم في الحج (1350) كلاهما من طريق شعبة، عن منصور، عن أبي حازم -هو سلمان الأشجعيّ-، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ للبخاري.
ورواه البخاري أيضًا (1820)، ومسلم من طريق سفيان (هو الثوري)، عن منصور، به، مثله إلا أنه قال:"كيوم" بدل"كما".
قوله:"فلم يرفث" المراد بالرَّفث الجماع، ويطلق على التعريض به، وعلى الفحش في القول.
وقوله:"ولم يفسق" أي لم يأت بسيئة ولا معصية."فتح الباري" (3/ 38
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি এই ঘরের (কা'বার) হজ্জ করল, অতঃপর সে অশ্লীলতা থেকে বিরত থাকল এবং কোনো ফাসিকী কাজ (পাপ) করল না, সে তার মায়ের জন্ম দেওয়ার দিনের মতো (নিষ্পাপ হয়ে) ফিরে এলো।”
4738 - عن أسماء بنت أبي بكر، قالت: خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم حُجَّاجًا حَتَّى إِذَا كُنَّا بِالْعَرْجِ نَزَلَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَنَزَلْنَا فَجَلَسَتْ عَائِشَةُ رضي الله عنها إِلَى جَنْبِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَجَلَسْتُ إِلَى جَنْبِ أَبِي وَكَانَتْ زمَالَةُ أَبِي بَكْرٍ وَزِمَالَةُ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَاحِدَةً مَعَ غُلامٍ لَأبِي بَكْرٍ فَجَلَسَ أَبُو بَكْرٍ يَنْتَظِرُ أَنْ يَطْلُعَ عَلَيْهِ فَطَلَعَ وَلَيْسَ مَعَهُ بَعِيرُهُ. قَالَ: أَيْنَ بَعِيرُك؟ قَالَ: أَضَلَلْتُهُ الْبَارِحَةَ. قَال: فَقَالَ أَبُو بَكْرٍ: بَعِيرٌ وَاحِدٌ تُضِلُّهُ؟ قَال: فَطَفِقَ يَضْرِبُهُ وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَتَبَسَّمُ، وَيَقُول:"انْظُرُوا إِلَى هَذَا الْمُحْرِمِ مَا يَصْنَعُ؟".
قَالَ ابْنُ أَبِي رِزْمَةَ فَمَا يَزِيدُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى أَنْ يَقُول:"انْظُرُوا إِلَى هَذَا الْمُحْرِمِ مَا يَصْنَعُ" وَيَتَبَسَّمُ.
حسن: رواه أبو داود (1818) -واللفظ له-، وابن ماجه (2933) كلاهما من حديث عبد الله ابن إدريس، أخبرنا ابن إسحاق، عن يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن أسماء بنت أبي بكر، فذكرته.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (26916)، وصحّحه ابن خزيمة (2679)، والحاكم (1/ 453 - 454).
قال الحاكم:"حديث غريب صحيح على شرط مسلم".
قلت: فيه محمد بن إسحاق وهو مدلس وقد عنعن، ولكنه إمام في المغازي والسير وهذا الحديث منها؛ ولذا تحمل العلماء عنعنته فيها دون العقائد والأحكام منهم البيهقيّ فإنه أخرجه من طريقه في باب المحرم يؤدّب عبده، ولم يذكر في الباب شيئًا غيره وسكت عن محمد بن إسحاق.
وقد تابعه عيسي بن معمر، عن عبّاد بن عبد الله كما أخرجه ابن سعد في طبقاته (8/ 206) عن
محمد بن عمر، حدثني بعقوب بن يحيى بن عباد، عن عيسي بن معمر، بإسناده.
ومحمد بن عمر هو الواقدي المتهم، ولكنه إمام في المغازي والسير مثل ابن إسحاق.
والحديث إسناده حسن وإن كان محمد بن إسحاق مدلسًا وقد عنعن، ولكن لا بأس من تحسين حديثه هذا، لا سيما وقد صحّحه ابن خزيمة والحاكم، وقد توبع وإن كانت لا تنفع هذه المتابعة لأن في إسناده إليه الواقديّ، والحديث ليس في الحلال والحرام الذي يتجنب فيه من أحاديث ابن إسحاق إذا انفرد بها.
وقوله:"زِمالة" بكسر الزاي أي أدوات السّفر وآلاته مما يتعلّق به.
আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হাজ্জের উদ্দেশ্যে বের হলাম। যখন আমরা 'আল-'আরজ' নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবতরণ করলেন এবং আমরাও অবতরণ করলাম। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশে বসলেন, আর আমি আমার পিতার পাশে বসলাম। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সফরের সরঞ্জাম ও মালামাল আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একজন গোলামের সাথে একই ছিল। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার (গোলামের) আগমনের অপেক্ষায় বসলেন। অতঃপর সে এলো, কিন্তু তার সাথে তার উটটি ছিল না। (আবূ বকর) জিজ্ঞেস করলেন, "তোমার উট কোথায়?" সে বলল, "গত রাতে আমি সেটি হারিয়ে ফেলেছি।" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "একটি মাত্র উট, আর তুমি সেটি হারিয়ে ফেললে?" এরপর তিনি তাকে মারতে শুরু করলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসছিলেন এবং বলছিলেন: "তোমরা এই ইহরামকারীর দিকে তাকাও, সে কী করছে?"
ইবনু আবী রিযমাহ বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল এইটুকুই বলছিলেন, "তোমরা এই ইহরামকারীর দিকে তাকাও, সে কী করছে?" আর তিনি মুচকি হাসছিলেন।
4739 - عن * *
৪৭৩৯ - হতে বর্ণিত **
4740 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم لخمسٍ ليالٍ بقين من ذي القعدة … الحديث.
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (179) عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاريّ) قال: أخبرتني عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاريّ في الحج (1709) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به. ورواه أيضًا (1710) هو ومسلم في الحج (1211: 125) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، به، مثله.
ورواه البخاريّ في العمرة (1783)، ومسلم في الحج (1211: 115) كلاهما من طريق هشام ابن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت:"خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع مُوافين لهلال ذي الحجة" الحديث.
فقوله:"موافين لهلال ذي الحجة" أي قرب طلوعه، والخمس قريبة من آخر الشهر، وقد وافاهم هلال ذي الحجة وهم في الطريق؛ لأنهم دخلوا مكة في الرابع من ذي الحجة، كما في حديث ابن عباس الآتي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে যুল-কা‘দাহ মাসের পাঁচ রাত বাকি থাকতে (হজের উদ্দেশ্যে) বের হলাম। ...