আল-জামি` আল-কামিল
4741 - عن عبد الله بن عباس، قال: انطلق النبيّ صلى الله عليه وسلم من المدينة … وذلك لخمس بقين من ذي القَعْدة، فقدم مكة لأربعِ ليالٍ خَلَوْن من ذي الحجّة … الحديث.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1545) عن محمد بن أبي بكر المقدّمي، حدّثنا فضيل بن سليمان، حدّثني موسى بن عقبة، أخبرني كريب، عن عبد الله بن عباس، به.
تنبيه: وأما قول ابن القيم في"زاد المعاد" (2/ 102): أن خروج النبيّ صلى الله عليه وسلم من المدينة لستِّ بقين من ذي القعدة يعني بذلك خروجه من المدينة إلى ذي الحليفة حيث صلى بها الظهر وبقية الصلوات، وبات بها فصلى الصبح والظهر، ثم خرج منها لخمس بقين كما في حديث عائشة وابن عباس رضي الله عنهما.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনা থেকে রওয়ানা হলেন... আর তা ছিল যিলকদ মাসের পাঁচ রাত বাকি থাকতে। অতঃপর তিনি মক্কায় পৌঁছালেন যিলহজ মাসের চার রাত অতিবাহিত হওয়ার পর...।
4742 - عن جابر بن عبد الله، قال: إِنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَكَثَ تِسْعَ سِنِينَ لَمْ يَحُجَّ ثُمَّ
أَذَّنَ فِي النَّاسِ فِي الْعَاشِرَةِ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَاجٌّ .... الحديث بطوله.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد (هو ابن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب)، عن أبيه، عن جابر، به، فذكره في حديث طويل في صفة حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় বছর হজ্জ না করে অবস্থান করলেন। অতঃপর দশম বছরে তিনি মানুষের মধ্যে ঘোষণা দিলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করবেন। (এটি দীর্ঘ হাদীসের অংশ)।
4743 - عن ابن عباس، قال: كَانُوا يَرَوْنَ أَنَّ الْعُمْرَةَ فِي أَشْهُرِ الْحَجِّ مِنْ أَفْجَرِ الْفُجُورِ فِي الأَرْضِ ، وَيَجْعَلُونَ الْمُحَرَّمَ صَفَرًا ، وَيَقُولُونَ: إِذَا بَرَأَ الدَّبَرْ وَعَفَا الأَثَرْ وَانْسَلَخَ صَفَرْ حَلَّت الْعُمْرَةُ لِمَنْ اعْتَمَرْ.
قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَأَصْحَابُهُ صَبِيحَةَ رَابِعَةٍ مُهِلِّينَ بِالْحَجِّ فَأَمَرَهُمْ أَنْ يَجْعَلُوهَا عُمْرَةً فَتَعَاظَمَ ذَلِكَ عِنْدَهُمْ فَقَالُوا: يَا رَسُولَ اللهِ! أَيُّ الْحِلِّ؟ قَالَ:"حِلٌّ كُلُّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1564)، ومسلم في الحج (1240: 198) كلاهما من طريق وهيب، حدّثنا عبد الله بن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره، ولفظهما سواء.
وفي رواية عند مسلم (199) من طريق أبي العالية البراء، عن ابن عباس، به، وفيه:"فقدم لأربع مَضْين من ذي الحجة".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা মনে করত যে, হজের মাসগুলোতে উমরাহ করা পৃথিবীর সবচেয়ে বড় পাপগুলোর অন্যতম। আর তারা মুহাররম মাসকে সফর মাস বানিয়ে নিত এবং বলত: যখন পিঠের ক্ষত শুকিয়ে যাবে, পদচিহ্ন মুছে যাবে এবং সফর মাস শেষ হয়ে যাবে, তখন উমরাহকারীর জন্য উমরাহ হালাল হবে। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ (যিলহজ মাসের) চার তারিখের সকালে হজের ইহরাম বেঁধে মক্কায় আগমন করলেন। অতঃপর তিনি তাঁদেরকে নির্দেশ দিলেন, তাঁরা যেন এটিকে উমরায় পরিণত করেন। এই নির্দেশ তাঁদের কাছে কঠিন মনে হলো। তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! কোন ধরনের হালাল হওয়া?" তিনি বললেন, "সম্পূর্ণ হালাল হওয়া।"
4744 - عن عبد الله بن عباس، قال: انطلق النبيُّ صلى الله عليه وسلم من المدينة … وذلك لخمس بقين من ذي القعدة، فقدم مكة لأربع ليال خَلوْن من ذي الحجة … الحديث.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1545) عن محمد بن أبي بكر المقدمي، حدّثنا فضيل بن سليمان، حدثني موسى بن عقبة، أخبرني كريب، عن ابن عباس فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনা থেকে রওয়ানা হলেন। ...আর তা ছিল যিলকদ মাসের পাঁচ দিন বাকি থাকতে। অতঃপর তিনি মক্কায় পৌঁছলেন যিলহজ মাসের চার রাত গত হওয়ার পর...।
4745 - عن عبد الله بن عمر، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَنْزِلُ بِذِي طُوًى وَيَبِيتُ بِهِ حَتَّى يُصَلِّيَ الصُّبْحَ حِينَ يَقْدَمُ مَكَّةَ وَمُصَلَّى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ذَلِكَ عَلَى أَكَمَةٍ غَلِيظَةٍ، لَيْسَ فِي الْمَسْجِدِ الَّذِي بُنِيَ ثَمَّ وَلَكِنْ أَسْفَلَ مِنْ ذَلِكَ عَلَى أَكَمَةٍ غَلِيظَةٍ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (491)، ومسلم في الحج (1259: 228) كلاهما من طريق أنس بن عياض، حدّثنا موسى بن عقبة، عن نافع، أن عبد الله حدثه، فذكره، واللفظ لمسلم.
قوله:"بذي طُوى" بضم الطاء المهملة بعدها واو، وآخره ألف مقصورة، هو اسم وادي بين مقبرة الجحون بالمعلاة، وبين ريع الكحل المسمى بالثنية الخضراء في محلة"جرول" الآن.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় আগমন করার সময় ‘যী-তুওয়া’ নামক স্থানে অবস্থান করতেন এবং সেখানে রাত্রি যাপন করতেন, যতক্ষণ না তিনি ফজরের সালাত আদায় করতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই সালাতের স্থানটি ছিল একটি উঁচু, শক্ত টিলার উপর। সেখানে যে মসজিদ নির্মিত হয়েছে, এটা তার মধ্যে ছিল না, বরং তা ছিল তার চেয়ে নিচে একটি শক্ত টিলার উপর।
4746 - عن نافع، قال: كان ابن عمر، إذا دَخَلَ أَدْنَي الْحَرَمِ أَمْسَكَ عَنْ التَّلْبِيَةِ، ثُمَّ يَبِيتُ بِذِي طوى، ثُمَّ يُصَلِّي بِهِ الصُّبْحَ وَيَغْتَسِلُ وَيُحَدِّثُ أَنَّ نَبِيَّ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَفْعَلُ ذَلِكَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1573) من طريق إسماعيل بن علية، ومسلم في الحج (1259) من طريق حماد بن زيد، كلاهما عن أيوب، عن نافع، به، واللفظ للبخاريّ.
وحديث إسماعيل بن علية، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، رواه أحمد (4628) بسياق أطول، وهذا لفظه:"كان ابن عمر إذا دخل أدنى الحرم أمسك عن التّلبية فإذا انتهى إلى ذي طوى بات فيه حتى يصبح، ثم يصلي الغداة ويغتسل ويحدّث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفعله، ثم يدخل مكة ضُحى فيأتي البيت فيستلم الحجر ويقول: بسم الله والله أكبر، ثم يَرَمُل ثلاثة أطراف يمشي ما بين الرُّكنين، فإذا أتي على الحجر استلمه وكبَّر أربعة أطراف مشيًا، ثم يأتي المقام فيصلي ركعتين، ثم يرجع إلى الحجر فيستلمه، ثم يخرج إلى الصَّفا من الباب الأعظم فيقوم عليه فيكبر سبع مرار ثلاثا يكبر ثم يقول:"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير". اهـ.
قوله:"سبع مرار" أي يقوم على الصّفا سبع مرات، يكبّر في كلّ مرة ثلاثًا.
وأما قول الترمذيّ بعد أن رواه من طريق عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن ابن عمر، قال:"اغتسل النبيّ صلى الله عليه وسلم لدخوله مكة بفتح":"هذا حديث غير محفوظ، والصّحيح ما روي نافع عن ابن عمر أنه كان يغتسل لدخول مكة".
وقال:"عبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيف في الحديث؛ ضعّفه أحمد بن حنبل، وعلي بن المديني، وغيرهما ولا نعرف هذا الحديث مرفوعًا إلا من حديثه". انتهي.
ففيه نظر؛ لما ثبت في الصحيحين مرفوعًا من حديث ابن عمر، فإن الظّاهر من قوله: أن النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يفعل ذلك أي بما سبق ذكره، ومنه الغسل.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি হারাম শরীফের কাছাকাছি প্রবেশ করতেন, তখন তালবিয়া পাঠ করা বন্ধ করে দিতেন। এরপর তিনি যী-তুওয়া নামক স্থানে রাত্রি যাপন করতেন, সেখানে ফজরের সালাত আদায় করতেন এবং গোসল করতেন। আর তিনি বলতেন যে, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরূপ করতেন।
4747 - عن مُحرّش الكعبيّ: أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم خَرَجَ لَيْلا مِن الْجِعِرَّانَةِ حِينَ مَشَي مُعْتَمرًا فَأَصْبَحَ بِالْجِعِرَّانَةِ كَبَائِتٍ حَتَّى إِذَا زَالَت الشَّمْسُ خَرَجَ عَن الْجِعِرَّانَةِ فِي بَطْنِ سَرِفَ حَتَّى جَاء مَعَ الطَّرِيق طَريق الْمَدِينَةِ مِنْ سَرِف.
حسن: رواه النسائي (2863)، والترمذي (925) والإمام أحمد في مسنده (15513) كلّهم من حديث ابن جريج، قال: حدثني مزاحم بن أبي مزاحم، عن عبد العزيز بن عبد الله (بن أسيد)، عن محرش الكعبيّ، فذكره.
قال الترمذي كما في بعض النسخ:"هذا حديث حسن غريب، ولا نعرف لمحرش الكعبي، عن النبي صلى الله عليه وسلم غير هذا الحديث، ويقال: جاء من الطريق الموصول".
ورواه أبو داود (1996) من طريق سعيد بن مزاحم بن أبي مزاحم، قال: حدثني أبي مزاحم، بإسناده، نحوه.
وإسناده حسن من أجل مزاحم بن عبد الله بن مزاحم المكي مولى عمر بن عبد العزيز. روى عنه جماعة منهم الزهري مع تقدمه، وابن جريج كما مضى، وكان قليل الحديث كما قال ابن سعد، وبالغ فيه الذهبي فقال في"الكاشف":"ثقة". والحقّ أنه حسن الحديث.
وقد حسّن حديثه هذا ابن حجر في"الإصابة".
মুহাররিশ আল-কা'বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতের বেলায় জি'ইররানা থেকে বের হলেন যখন তিনি হেঁটে উমরাহ করছিলেন। অতঃপর তিনি জি'ইররানাতেই এমনভাবে সকাল করলেন যেন তিনি সেখানে রাত্রি যাপনকারী। যখন সূর্য ঢলে গেল, তখন তিনি জি'ইররানা থেকে সরিফ উপত্যকার দিকে বের হলেন, অবশেষে তিনি সরিফ থেকে মদীনার রাস্তার সাথে যুক্ত হলেন।
4748 - عن عبد الله بن عمر: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَخْرُجُ مِنْ طَرِيقِ الشَّجَرَةِ وَيَدْخُلُ مِنْ طَرِيقِ الْمُعَرَّسِ، وَإِذَا دَخَلَ مَكَّةَ دَخَلَ مِن الثَّنِيَّةِ الْعُلْيَا وَيَخْرُجُ مِن الثَّنِيَّةِ السُّفْلَي.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1576)، ومسلم في الحج (1257) كلاهما من طريق عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
واللفظ لمسلم. ورواه البخاريّ (1575) من طريق معن بن عيسى، عن مالك، عن ابن عمر، مختصرًا. وليس الحديث في موطأ الليثيّ، ولا ذكره الجوهريّ في مسند الموطأ.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আশ-শাজারাহ নামক পথ দিয়ে বের হতেন এবং আল-মুআররাস নামক পথ দিয়ে (মদীনায়) প্রবেশ করতেন। আর যখন তিনি মক্কায় প্রবেশ করতেন, তখন উচ্চ গিরিপথ (আস-সানিয়্যাতুল ‘উলইয়া) দিয়ে প্রবেশ করতেন এবং নিম্ন গিরিপথ (আস-সানিয়্যাতুস সুফলা) দিয়ে বের হতেন।
4749 - عن عائشة: أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمَّا جَاءَ إِلَى مَكَّةَ دَخَلَ مِنْ أَعْلاهَا وَخَرَجَ مِنْ أَسْفَلِهَا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1577)، ومسلم في الحج (1258: 224) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
ورواه البخاريّ أيضًا (1578)، ومسلم (1258: 225) كلاهما من طريق أبي أسامة (هو حماد ابن أسامة)، حدّثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عام الفتح من كَداء، وخرج من كُدا من أعلى مكة، والسياق للبخاريّ.
وليس عند مسلم:"وخرج من كُدا … إلخ". وزاد: قال هشام: فكان أبي يدخل منهما كليهما، وكان أبي أكثر ما يدخل من كَدَاء.
قوله:"كَداء" بفتح الكاف والمدّ، هي الثنية التي ينزل منها إلى المعلى مقبرة أهل مكة، وهي التي يقال لها الحجون.
وقوله:"وخرج من كُدا" بضم الكاف والقصر: هي عند باب شبيكة، وكان بناء هذا الباب عليها في القرن السابع.
قوله:"من أعلى مكة" قال الحافظ في"الفتح" (3/ 437):"كذا رواه أبو أسامة فقلبه،
والصّواب: ما رواه عمرو وحاتم عن هشام:"دخل من كَدَاء من أعلى مكة" ثم ظهر لي أن الوهم فيه ممن دون أبي أسامة، فقد رواه أحمد عن أبي أسامة على الصواب".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মক্কায় আগমন করলেন, তখন তিনি মক্কার উপরের দিক দিয়ে প্রবেশ করেছিলেন এবং নিচের দিক দিয়ে বের হয়েছিলেন।
4750 - عن عبد الله مولى أسماء بنت أبي بكر حدّثه؛ أَنَّهُ كَانَ يَسْمَعُ أَسْمَاءَ تَقُولُ كُلَّمَا مَرَّتْ بِالحَجُونِ: صَلَّى الله عَلَى رَسُولِهِ مُحَمَّدٍ لَقَدْ نَزَلْنَا مَعَهُ هَا هُنَا وَنَحْنُ يَؤْمَئِذٍ خِفَافٌ الحقائب، قَلِيلٌ ظَهْرُنَا، قَلِيلَةٌ أَزْوَادُنَا فَاعْتَمَرْتُ أَنَا وَأُخْتِي عَائِشَةُ وَالزُّبَيْرُ وَفُلانٌ وَفُلانٌ فَلَمَّا مَسَحْنَا الْبَيْتَ أَحْلَلْنَا، ثُمَّ أَهْلَلْنَا مِن الْعَشِيِّ بِالْحَجِّ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1796)، ومسلم في الحج (1237) كلاهما من طريق أحمد بن عيسى، حدثنا ابن وهب، أخبرني عمرو (هو ابن الحارث)، عن أبي الأسود، أن عبد الله مولي أسماء، به، فذكره.
واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري قريب منه.
قولها:"الحجون" بحاء مهملة مفتوحة، بعدها جيم مضمومة: ثنية بأعلى مكة، وهي لا تزال معروفة بهذا الاسم إلا أن العامة ينطقونها"الحُجُون" بضم المهملة، وبها مقبرة أهل مكة التي تسمى مقبرة المعلي
আসমা বিনত আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখনই হাজূন নামক স্থানটি অতিক্রম করতেন, তখন বলতেন: "আল্লাহ তাঁর রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত (রহমত) দান করুন! আমরা নিশ্চয়ই তাঁর (রাসূলুল্লাহর) সাথে এখানে অবস্থান করেছিলাম। তখন আমাদের মাল-সামানা ছিল হালকা, আমাদের বাহন ছিল কম, এবং আমাদের খাদ্যসামগ্রীও ছিল অল্প। এরপর আমি, আমার বোন আয়িশা, যুবাইর, এবং অমুক ও অমুক উমরাহ পালন করেছিলাম। যখন আমরা বায়তুল্লাহর তাওয়াফ সম্পন্ন করলাম, তখন আমরা ইহরাম খুলে ফেললাম। এরপর সন্ধ্যার দিকে আমরা আবার হজ্জের জন্য ইহরাম বাঁধলাম।"
4751 - عن عائشة قالت: نُزُولُ الَأبْطَحِ لَيْسَ بِسُنَّةٍ، إِنَّمَا نَزَلَهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، لأَنَّهُ كَانَ أَسْمَحَ لِخُرُوجِهِ إِذَا خَرَجَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1765)، ومسلم في الحج (1311) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، واللفظ لمسلم.
ورواه مسلم أيضًا من طريق الزهريّ، عن سالم، أنّ أبا بكر وعمر، وابن عمر كانوا ينزلون الأبطح. قال الزهريّ: وأخبرني عروة عن عائشة، أنها لم تكن تفعل ذلك وقالت:"إنما نزله رسول الله صلى الله عليه وسلم لأنه كان منزلًا أسمح لخروجه".
قوله:"الأبطح" أي البطحاء التي بين مكة ومني، وهي ما انبطح من الوادي واتسع، وهي التي يقال لها: المحصّب، والمعرّس، وحدُّها ما بين الجبلين إلى المقبرة.
والمحصّب، والأبطح، وخيف بني كنانة اسم لشيء واحد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবত্বাহে (মুহস্সাব নামক স্থানে) অবস্থান করা কোনো সুন্নত নয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে অবস্থান করেছিলেন কারণ সেখান থেকে তাঁর (মক্কা থেকে) বেরিয়ে যাওয়ার জন্য স্থানটি অপেক্ষাকৃত সুবিধাজনক ছিল।
4752 - عن عبد الله بن عباس، قال: لَيْسَ التَّحْصِيبُ بِشَيءٍ، إِنَّمَا هُوَ مَنْزِلٌ نَزَلَهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1766)، ومسلم في الحج (1312) من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাহসীব (মুহাস্সাব উপত্যকায় অবস্থান) তেমন কোনো গুরুত্বপূর্ণ বিষয় নয়, বরং তা একটি মনযিল মাত্র, যেখানে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবস্থান করেছিলেন।
4753 - عن عبد الله بن عباس، قال: … فَقَدِمَ مَكَّةَ لأَرْبَعِ لَيَالٍ خَلَوْنَ مِنْ ذِي الْحَجَّةِ، فَطَافَ بِالْبَيْتِ وَسَعَي بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ وَلَمْ يَحِلَّ مِنْ أَجْلِ بُدْنِهِ؛ لأَنَّهُ قَلَّدَهَا، ثُمَّ نَزَلَ بِأَعْلَى مَكَّةَ عِنْدَ الْحَجُونِ وَهُوَ مُهِلٌّ بِالْحَجِّ … الحديث.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1545) عن محمد بن أبي بكر المقدّميّ، حدثنا فضيل بن سليمان، حدثني موسى بن عقبة، أخبرني كريب، عن ابن عباس، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিলহজ মাসের চার রাত অতিবাহিত হওয়ার পর মক্কায় আগমন করলেন, অতঃপর তিনি বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করলেন এবং সাফা-মারওয়ার মাঝে সা'ঈ করলেন, কিন্তু তিনি তাঁর কুরবানীর পশুর কারণে হালাল (ইহরাম মুক্ত) হননি; কেননা তিনি সেগুলোকে (চিহ্নিত করে) গলায় মালা পরিয়েছিলেন। এরপর তিনি মক্কার উঁচু অংশে হাজুনের কাছে অবতরণ করলেন, তখন তিনি হজ্জের ইহরাম অবস্থায় ছিলেন। ... (অবশিষ্ট হাদিস)।
4754 - عن أبي هريرة، قال: قَالَ لَنَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم. وَنَحْنُ بِمِنًى -"نَحْنُ نَازِلُونَ غَدًا بِخَيْفِ بَنِي كِنَانَةَ حَيْثُ تَقَاسَمُوا عَلَى الْكُفْرِ -وَذَلِكَ إِنَّ قُرَيْشًا وَبَنِي كِنَانَةَ تَحَالَفَتْ عَلَى بَنِي هَاشِم وبني عبد المطلب -أو بَنِي الْمُطَّلِبِ- أَنْ لا يُنَاكِحُوهُمْ وَلا يُبَايِعُوهُمْ حَتَّى يُسْلِمُوا إِلَيْهِمْ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم- يَعْنِي بِذَلِكَ الْمُحَصَّبَ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1590)، ومسلم في الحج (1314: 344) من طريق الوليد بن مسلم، حدّثنا الأوزاعي، حدثني الزّهري، حدثني أبو سلمة، حدثنا أبو هريرة، فذكره. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاريّ نحوه وزاد في أوله:"قال النبيّ صلى الله عليه وسلم من الغد يوم النحر -وهو بمني- … إلخ".
وفي رواية للبخاريّ في المغازي (4284)، ومسلم من طريق الأعرج (عبد الرحمن بن هرمز)، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"منزلنا إن شاء الله -إذا فتح الله- الخَيْف، حيث تقاسموا على الكفر".
وفي رواية للبخاريّ في الحج (1589) من طريق شعيب، عن الزهريّ، به، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم -حين أراد قدوم مكة-:"منزلنا (فذكره إلى قوله): على الكفر".
وفي رواية للبخاري في المناقب (3882) من طريق إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب، به، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم -حين أراد حنينًا-:"منزلنا غدًا" الحديث إلى قوله:"على الكفر".
قلت: ولا تنافي بين هذه الروايات لإمكان حملها على تعدد الوقائع.
وقوله:"بخيف بني كنانة" فُسِّر في الحديث بالمحصَّب، والظاهر أنه تفسير الإمام الزهري رحمه الله. قال ابن حجر:"ويختلج في خاطري أن جميع ما بعد قوله:"يعني المحصب" إلى آخر الحديث من قول الزهريّ أدرج في الخبر".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা যখন মিনায় ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে বললেন: "আমরা আগামীকাল খায়ফে বানী কিনানাহ-তে অবতরণ করব, যেখানে তারা কুফরীর ওপর শপথ করেছিল। আর তা এই জন্য যে, কুরাইশ ও বানী কিনানাহ গোত্র বানী হাশিম ও বানী আব্দুল মুত্তালিব (বা বানী মুত্তালিব)-এর বিরুদ্ধে এই মর্মে শপথ করেছিল যে, তারা যেন তাদের সাথে বৈবাহিক সম্পর্ক স্থাপন না করে এবং কোনো প্রকার লেনদেন না করে, যতক্ষণ না তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাদের হাতে তুলে দেয়।" তিনি এর দ্বারা মুহাসসাব-কে বুঝিয়েছেন।
4755 - عن عبد الله بن عمر: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم وأبا بكر، وعمر كانوا ينزلون الأبطح.
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1310: 337) عن محمد بن مهران الرازيّ، حدّثنا عبد الرزاق، عن معمر، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1768) عن عبد الله بن عبد الوهاب، حدّثنا خالد بن الحارث، قال:
سئل عبيد الله عن المحضب، فحدثنا عبيد الله، عن نافع، قال:"نزل بها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وعمر وابن عمر".
وعن نافع أن ابن عمر رضي الله عنهما كان يصلي بها -يعني المحصَّب- الظهر والعصر -أحسبه قال: والمغرب-، قال خالد: لا أشك في العشاء، ويهجع هجعة، ويذكر ذلك عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.
আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবত্বাহ নামক স্থানে অবস্থান করতেন।
নাফি’ (রহ.) থেকে বর্ণিত যে, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল-মুহাস্সাব নামক স্থানে যুহ্র এবং আসরের সালাত আদায় করতেন—আমার মনে হয় তিনি মাগরিবের কথাও বলেছিলেন—খালিদ (রাবী) বলেন, ইশার ব্যাপারে আমার কোনো সন্দেহ নেই। আর তিনি (ইবনু উমর) সেখানে কিছুক্ষণ বিশ্রাম নিতেন এবং এ কাজটি তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন।
4756 - عن أبي رافع، قال: لَمْ يَأْمُرْنِي رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ أَنْزِلَ الأَبْطَحَ حِينَ خَرَجَ مِنْ مِنًى وَلَكِنِّي جِئْثُ فَضَرَبْتُ فِيهِ قُبَّتَهُ فَجَاءَ فَنَزَلَ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1313) من طريق سفيان بن عيينة، عن صالح بن كيسان، عن سليمان بن يسار، قال: قال أبو رافع، فذكره.
وزاد في رواية:"عن أبي رافع وكان على ثقل النبيّ صلى الله عليه وسلم".
والثقل: العيال، وما يثقل حمله من الأمتعة.
আবু রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনা থেকে বের হওয়ার সময় আমাকে আবতাহ নামক স্থানে অবস্থান করতে নির্দেশ দেননি; কিন্তু আমি এসে সেখানে তাঁর তাঁবু স্থাপন করলাম। অতঃপর তিনি আসলেন এবং সেখানে অবস্থান করলেন।
4757 - عن * *
৪৭৫৭ - আন * *
4758 - عن حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، قال: دَخَلْنَا عَلَى جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللهِ، فَسَأَلَ عَنِ الْقَوْمِ حَتَّى انْتَهَى إِلَيَّ فَقُلْتُ: أَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنٍ، فَأَهْوَى بِيَدِهِ إِلَى رَأْسِي فَنَزَعَ زِرِّي الأَعْلَى ثُمَّ نَزَعَ زِرِّي الأَسْفَلَ ثُمَّ وَضَعَ كَفَّهُ بَيْنَ ثَدْيَيَّ وَأَنَا يَوْمَئِذٍ غُلَامٌ شَابٌّ، فَقَالَ: مَرْحَبًا بِكَ، يَا ابْنَ أَخِي، سَلْ عَمَّا شِئْتَ، فَسَأَلْتُهُ وَهُوَ أَعْمَى وَحَضَرَ وَقْتُ الصَّلَاةِ، فَقَامَ فِي نِسَاجَةٍ مُلْتَحِفًا بِهَا، كُلَّمَا وَضَعَهَا عَلَى مَنْكِبِهِ رَجَعَ طَرَفَاهَا إِلَيْهِ مِنْ صِغَرِهَا وَرِدَاؤُهُ إِلَى جَنْبِهِ عَلَى الْمِشْجَبِ فَصَلَّى بِنَا، فَقُلْتُ أَخْبِرْنِي عَنْ حَجَّةِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ بِيَدِهِ فَعَقَدَ تِسْعًا فَقَالَ: إِنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَكَثَ تِسْعَ سِنِينَ لَمْ يَحُجَّ، ثُمَّ أَذَّنَ فِي النَّاسِ فِي الْعَاشِرَةِ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَاجٌّ فَقَدِمَ الْمَدِينَةَ بَشَرٌ كَثِيرٌ كُلُّهُمْ يَلْتَمِسُ أَنْ يَأْتَمَّ بِرَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَيَعْمَلَ مِثْلَ عَمَلِهِ فَخَرَجْنَا مَعَهُ حَتَّى أَتَيْنَا ذَا الْحُلَيْفَةِ، فَوَلَدَتْ أَسْمَاءُ بِنْتُ عُمَيْسٍ مُحَمَّدَ بْنَ أَبِي بَكْرٍ فَأَرْسَلَتْ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَيْفَ أَصْنَعُ؟ قَالَ:"اغْتَسِلِي، وَاسْتَثْفِرِي بِثَوْبٍ وَأَحْرِمِي". فَصَلَّى رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِي الْمَسْجِدِ ثُمَّ رَكِبَ الْقَصْوَاءَ حَتَّى إِذَا اسْتَوَتْ بِهِ نَاقَتُهُ عَلَى الْبَيْدَاءِ، نَظَرْتُ إِلَى مَدِّ بَصَرِي بَيْنَ يَدَيْهِ مِنْ رَاكِبٍ وَمَاشٍ وَعَنْ يَمِينِهِ مِثْلَ ذَلِكَ وَعَنْ يَسَارِهِ مِثْلَ ذَلِكَ وَمِنْ خَلْفِهِ مِثْلَ ذَلِكَ وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم بَيْنَ أَظْهُرِنَا، وَعَلَيْهِ يَنْزِلُ الْقُرْآنُ وَهُوَ يَعْرِفُ تَأْوِيلَهُ وَمَا عَمِلَ بِهِ مِنْ شَيْءٍ عَمِلْنَا بِهِ فَأَهَلَّ بِالتَّوْحِيدِ:"لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ، لَبَّيْكَ لَبَّيْكَ لا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ، وَالْمُلْكَ لا شَرِيكَ لَكَ" وَأَهَلَّ النَّاسُ بِهَذَا الَّذِي يُهِلُّونَ بِهِ فَلَمْ يَرُدَّ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَيْهِمْ شَيْئًا مِنْهُ، وَلَزِمَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم تَلْبِيَتَهُ.
قَالَ جَابِرٌ رضي الله عنه: لَسْنَا نَنْوِي إِلا الْحَجَّ لَسْنَا نَعْرِفُ الْعُمْرَةَ حَتَّى إِذَا أَتَيْنَا الْبَيْتَ مَعَهُ اسْتَلَمَ الرُّكْنَ فَرَمَلَ ثَلاثًا وَمَشَى أَرْبَعًا ثُمَّ نَفَذَ إِلَى مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ عليه السلام، فَقَرَأَ: {وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى} [البقرة: 125].
فَجَعَلَ الْمَقَامَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْبَيْتِ، فَكَانَ أَبِي يَقُولُ ولا أَعْلَمُهُ ذَكَرَهُ إِلا عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقْرَأُ فِي الرَّكْعَتَيْنِ: {قُلْ هُوَ اللهُ أَحَدٌ (1)} و {قُلْ يَا أَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)} ، ثُمَّ رَجَعَ إِلَى الرُّكْنِ فَاسْتَلَمَهُ ثُمَّ خَرَجَ مِنَ الْبَابِ إِلَى الصَّفَا، فَلَمَّا دَنَا مِنَ الصَّفَا قَرَأَ: {إِنَّ الصَّفَا والْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللهِ}"أَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ اللهُ بِهِ".
فَبَدَأَ بِالصَّفَا فَرَقِيَ عَلَيْهِ حَتَّى رَأَى الْبَيْتَ فَاسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ فَوَحَّدَ اللهَ وَكَبَّرَهُ، وَقَالَ:"لا إِلَهَ إِلا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ لَا إِلَهَ إِلا اللهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ وَنَصَرَ عَبْدَهُ وَهَزَمَ الأَحْزَابَ وَحْدَهُ"، ثُمَّ دَعَا بَيْنَ ذَلِكَ قَالَ مِثْلَ هَذَا ثَلَاثَ مَرَّاتٍ، ثُمَّ نَزَلَ إِلَى الْمَرْوَةِ حَتَّى إِذَا انْصَبَّتْ قَدَمَاهُ فِي بَطْنِ الْوَادِي سَعَى حَتَّى إِذَا صَعِدَتَا مَشَى حَتَّى أَتَى الْمَرْوَةَ فَفَعَلَ عَلَى الْمَرْوَةِ كَمَا فَعَلَ عَلَى الصَّفَا، حَتَّى إِذَا كَانَ آخِرُ طَوَافِهِ عَلَى الْمَرْوَةِ، فَقَالَ:"لَوْ أَنِّي اسْتَقْبَلْتُ مِنْ أَمْرِي مَا اسْتَدْبَرْتُ لَمْ أَسُقِ الْهَدْيَ، وَجَعَلْتُهَا عُمْرَةً، فَمَنْ كَانَ مِنْكُمْ لَيْسَ مَعَهُ هَدْيٌ فَلْيَحِلَّ وَلْيَجْعَلْهَا عُمْرَةً"، فَقَامَ سُرَاقَةُ بْنُ مَالِكِ بْنِ جُعْشُمٍ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ! أَلِعَامِنَا هَذَا أَمْ لِأَبَدٍ؟ فَشَبَّكَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَصَابِعَهُ وَاحِدَةً فِي الأُخْرَى، وَقَالَ:"دَخَلَتِ الْعُمْرَةُ فِي الْحَجِّ مَرَّتَيْنِ لا بَلْ لِأَبَدِ أَبَدٍ" وَقَدِمَ عَلِيٌّ مِنَ الْيَمَنِ بِبُدْنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فَوَجَدَ فَاطِمَةَ رضي الله عنها مِمَّنْ حَلَّ وَلَبِسَتْ ثِيَابًا صَبِيغًا، وَاكْتَحَلَتْ، فَأَنْكَرَ ذَلِكَ عَلَيْهَا، فَقَالَتْ: إِنَّ أَبِي أَمَرَنِي بِهَذَا، قَالَ: فَكَانَ عَلِيٌّ يَقُولُ بِالْعِرَاقِ فَذَهَبْتُ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم مُحَرِّشًا عَلَى فَاطِمَةَ لِلَّذِي صَنَعَتْ مُسْتَفْتِيًا لِرَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِيمَا ذَكَرَتْ عَنْهُ فَأَخْبَرْتُهُ أَنِّي أَنْكَرْتُ ذَلِكَ عَلَيْهَا، فَقَالَ:"صَدَقَتْ صَدَقَتْ! مَاذَا قُلْتَ حِينَ فَرَضْتَ الْحَجَّ؟" قَالَ: قُلْتُ: اللَّهُمَّ! إِنِّي أُهِلُّ بِمَا أَهَلَّ بِهِ رَسُولُكَ، قَالَ:"فَإِنَّ مَعِيَ الْهَدْيَ فَلَا تَحِلُّ". قَالَ: فَكَانَ جَمَاعَةُ الْهَدْيِ الَّذِي قَدِمَ بِهِ عَلِيٌّ مِنَ الْيَمَنِ وَالَّذِي أَتَى بِهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مِائَةً قَالَ: فَحَلَّ النَّاسُ كُلُّهُمْ وَقَصَّرُوا، إلا النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَمَنْ كَانَ مَعَهُ هَدْيٌ، فَلَمَّا كَانَ يَوْمُ التَّرْوِيَةِ تَوَجَّهُوا إِلَى مِنًى فَأَهَلُّوا بِالْحَجِّ، وَرَكِبَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَصَلَّى بِهَا الظُّهْرَ وَالْعَصْرَ وَالْمَغْرِبَ وَالْعِشَاءَ وَالْفَجْرَ، ثُمَّ مَكَثَ قَلِيلا حَتَّى طَلَعَتِ الشَّمْسُ وَأَمَرَ بِقُبَّةٍ مِنْ شَعَرٍ تُضْرَبُ لَهُ بِنَمِرَةَ، فَسَارَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَلا تَشُكُّ قُرَيْشٌ إِلا أَنَّهُ وَاقِفٌ عِنْدَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ كَمَا كَانَتْ قُرَيْشٌ تَصْنَعُ فِي الْجَاهِلِيَّةِ فَأَجَازَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى أَتَى عَرَفَةَ فَوَجَدَ الْقُبَّةَ قَدْ ضُرِبَتْ لَهُ بِنَمِرَةَ فَنَزَلَ بِهَا، حَتَّى إِذَا زَاغَتِ الشَّمْسُ أَمَرَ بِالْقَصْوَاءِ فَرُحِلَتْ لَهُ فَأَتَى بَطْنَ الْوَادِي، فَخَطَبَ النَّاسَ وَقَالَ:"إِنَّ دِمَاءَكُمْ وَأَمْوَالَكُمْ حَرَامٌ
عَلَيْكُمْ كَحُرْمَةِ يَوْمِكُمْ هَذَا فِي شَهْرِكُمْ هَذَا فِي بَلَدِكُمْ هَذَا، أَلا كُلُّ شَيْءٍ مِنْ أَمْرِ الْجَاهِلِيَّةِ تَحْتَ قَدَمَيَّ مَوْضُوعٌ وَدِمَاءُ الْجَاهِلِيَّةِ مَوْضُوعَةٌ، وَإِنَّ أَوَّلَ دَمٍ أَضَعُ مِنْ دِمَائِنَا دَمُ ابْنِ رَبِيعَةَ بْنِ الْحَارِثِ -كَانَ مُسْتَرْضِعًا فِي بَنِي سَعْدٍ فَقَتَلَتْهُ هُذَيْلٌ-، وَرِبَا الْجَاهِلِيَّةِ مَوْضُوعٌ وَأَوَّلُ رِبًا أَضَعُ رِبَانَا رِبَا عَبَّاسِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ، فَإِنَّهُ مَوْضُوعٌ كُلُّهُ، فَاتَّقُوا اللهَ فِي النِّسَاءِ فَإِنَّكُمْ أَخَذْتُمُوهُنَّ بِأَمَانِ اللهِ وَاسْتَحْلَلْتُمْ فُرُوجَهُنَّ بِكَلِمَةِ اللهِ وَلَكُمْ عَلَيْهِنَّ أَنْ لَا يُوطِئْنَ فُرُشَكُمْ أَحَدًا تَكْرَهُونَهُ، فَإِنْ فَعَلْنَ ذَلِكَ فَاضْرِبُوهُنَّ ضَرْبًا غَيْرَ مُبَرِّحٍ، وَلَهُنَّ عَلَيْكُمْ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ، وَقَدْ تَرَكْتُ فِيكُمْ مَا لَنْ تَضِلُّوا بَعْدَهُ إِنِ اعْتَصَمْتُمْ بِهِ كِتَابُ اللهِ، وَأَنْتُمْ تُسْأَلُونَ عَنِّي فَمَا أَنْتُمْ قَائِلُونَ؟" قَالُوا: نَشْهَدُ أَنَّكَ قَدْ بَلَّغْتَ وَأَدَّيْتَ وَنَصَحْتَ. فَقَالَ بِإِصْبَعِهِ السَّبَّابَةِ يَرْفَعُهَا إِلَى السَّمَاءِ وَيَنْكُتُهَا إِلَى النَّاسِ:"اللَّهُمَّ اشْهَدْ، اللَّهُمَّ اشْهَدْ" ثَلَاثَ مَرَّاتٍ، ثُمَّ أَذَّنَ ثُمَّ أَقَامَ فَصَلَّى الظُّهْرَ ثُمَّ أَقَامَ فَصَلَّى الْعَصْرَ، وَلَمْ يُصَلِّ بَيْنَهُمَا شَيْئًا، ثُمَّ رَكِبَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى أَتَى الْمَوْقِفَ فَجَعَلَ بَطْنَ نَاقَتِهِ الْقَصْوَاءِ إِلَى الصَّخَرَاتِ، وَجَعَلَ حَبْلَ الْمُشَاةِ بَيْنَ يَدَيْهِ وَاسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ فَلَمْ يَزَلْ وَاقِفًا حَتَّى غَرَبَتِ الشَّمْسُ وَذَهَبَتِ الصُّفْرَةُ قَلِيلا حَتَّى غَابَ الْقُرْصُ، وَأَرْدَفَ أُسَامَةَ خَلْفَهُ، وَدَفَعَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَقَدْ شَنَقَ لِلْقَصْوَاءِ الزِّمَامَ حَتَّى إِنَّ رَأْسَهَا لَيُصِيبُ مَوْرِكَ رَحْلِهِ وَيَقُولُ بِيَدِهِ الْيُمْنَى:"أَيُّهَا النَّاسُ السَّكِينَةَ السَّكِينَةَ" كُلَّمَا أَتَى حَبْلا مِنَ الْحِبَالِ أَرْخَى لَهَا قَلِيلا، حَتَّى تَصْعَدَ حَتَّى أَتَى الْمُزْدَلِفَةَ فَصَلَّى بِهَا الْمَغْرِبَ وَالْعِشَاءَ بِأَذَانٍ وَاحِدٍ وَإِقَامَتَيْنِ، وَلَمْ يُسَبِّحْ بَيْنَهُمَا شَيْئًا، ثُمَّ اضْطَجَعَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى طَلَعَ الْفَجْرُ، وَصَلَّى الْفَجْرَ حِينَ تَبَيَّنَ لَهُ الصُّبْحُ بِأَذَانٍ وَإِقَامَةٍ ثُمَّ رَكِبَ الْقَصْوَاءَ، حَتَّى أَتَى الْمَشْعَرَ الْحَرَامَ فَاسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ فَدَعَاهُ وَكَبَّرَهُ وَهَلَّلَهُ وَوَحَّدَهُ، فَلَمْ يَزَلْ وَاقِفًا حَتَّى أَسْفَرَ جِدًّا، فَدَفَعَ قَبْلَ أَنْ تَطْلُعَ الشَّمْسُ وَأَرْدَفَ الْفَضْلَ بْنَ عَبَّاسٍ وَكَانَ رَجُلا حَسَنَ الشَّعْرِ أَبْيَضَ وَسِيمًا فَلَمَّا دَفَعَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَرَّتْ بِهِ ظُعُنٌ يَجْرِينَ، فَطَفِقَ الْفَضْلُ يَنْظُرُ إِلَيْهِنَّ، فَوَضَعَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَدَهُ عَلَى وَجْهِ الْفَضْلِ، فَحَوَّلَ الْفَضْلُ وَجْهَهُ إِلَى الشِّقِّ الآخَرِ يَنْظُرُ، فَحَوَّلَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَدَهُ مِنَ الشِّقِّ الآخَرِ عَلَى وَجْهِ الْفَضْلِ يَصْرِفُ وَجْهَهُ مِنَ الشِّقِّ الآخَرِ يَنْظُرُ، حَتَّى أَتَى بَطْنَ مُحَسِّرٍ فَحَرَّكَ قَلِيلا، ثُمَّ سَلَكَ الطَّرِيقَ الْوُسْطَى الَّتِي تَخْرُجُ عَلَى الْجَمْرَةِ الْكُبْرَى حَتَّى أَتَى الْجَمْرَةَ الَّتِي عِنْدَ الشَّجَرَةِ فَرَمَاهَا بِسَبْعِ حَصَيَاتٍ يُكَبِّرُ مَعَ كُلِّ حَصَاةٍ مِنْهَا مِثْلِ حَصَى الْخَذْفِ رَمَى مِنْ بَطْنِ الْوَادِي، ثُمَّ انْصَرَفَ إِلَى الْمَنْحَرِ فَنَحَرَ ثَلاثًا وَسِتِّينَ بِيَدِهِ، ثُمَّ أَعْطَى عَلِيًّا فَنَحَرَ مَا غَبَرَ
وَأَشْرَكَهُ فِي هَدْيِهِ ثُمَّ أَمَرَ مِنْ كُلِّ بَدَنَةٍ بِبَضْعَةٍ فَجُعِلَتْ فِي قِدْرٍ فَطُبِخَتْ، فَأَكَلَا مِنْ لَحْمِهَا وَشَرِبَا مِنْ مَرَقِهَا ثُمَّ رَكِبَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَأَفَاضَ إِلَى الْبَيْتِ، فَصَلَّى بِمَكَّةَ الظُّهْرَ، فَأَتَى بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ يَسْقُونَ عَلَى زَمْزَمَ فَقَالَ:"انْزِعُوا بَنِي عَبْدِ الْمُطَّلِبِ، فَلَوْلا أَنْ يَغْلِبَكُمُ النَّاسُ عَلَى سِقَايَتِكُمْ لَنَزَعْتُ مَعَكُمْ". فَنَاوَلُوهُ دَلْوًا فَشَرِبَ مِنْهُ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طرق، عن حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، به، فذكره.
জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মুহাম্মাদ ইবন আলী ইবন হুসাইন) বলেন, আমরা জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি (উপস্থিত) লোকজনের সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে লাগলেন, এক পর্যায়ে আমার কাছে পৌঁছলেন। আমি বললাম: আমি মুহাম্মাদ ইবন আলী ইবন হুসাইন। তিনি হাত দিয়ে আমার মাথার দিকে ইশারা করলেন, আমার উপর ও নিচের বোতাম খুলে দিলেন, তারপর তাঁর হাত আমার বুকের ওপর রাখলেন। সে সময় আমি এক যুবক বালক ছিলাম। তিনি বললেন: স্বাগতম, হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র! যা ইচ্ছা জিজ্ঞেস করো।
আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি তখন অন্ধ ছিলেন। যখন সালাতের সময় হলো, তিনি একটি ছোট চাদর গায়ে জড়িয়ে দাঁড়ালেন। যখনই তিনি তা কাঁধের ওপর রাখছিলেন, ছোট হওয়ার কারণে চাদরের দুই পাশই তার দিকে ফিরে আসছিল। তাঁর বড় চাদরটি একটি খুঁটির উপর তাঁর পাশেই রাখা ছিল। এরপর তিনি আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন।
আমি বললাম: আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হজ্জ সম্পর্কে বলুন। তখন তিনি তাঁর হাত দিয়ে ইশারা করে নয়টি আঙ্গুল ধরলেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় বছর মদীনায় অবস্থান করেছেন, কিন্তু হজ্জ করেননি। দশম বছরে জনগণের মধ্যে ঘোষণা করা হলো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করবেন। তখন অনেক লোক মদীনায় আসলো। তাদের প্রত্যেকেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুকরণে হজ্জ করতে এবং তাঁর অনুরূপ আমল করতে আগ্রহী ছিল। আমরাও তাঁর সঙ্গে বের হলাম। আমরা যুল-হুলাইফাতে পৌঁছলাম। আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে মুহাম্মাদ ইবন আবূ বকরকে প্রসব করলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে লোক পাঠিয়ে জানতে চাইলেন: আমি এখন কী করব? তিনি বললেন: "তুমি গোসল করো, একটি কাপড় দিয়ে দৃঢ়ভাবে রক্ত ঠেকিয়ে রাখো এবং ইহরাম বাঁধো।"
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদে সালাত আদায় করলেন, তারপর কাসওয়া নামক উটের পিঠে আরোহণ করলেন। যখন তাঁর উট 'বাইদা' প্রান্তরে তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়াল, তখন আমি আমার দৃষ্টি যত দূর গেল, দেখলাম—তাঁর সামনে সওয়ারী ও পদচারী মানুষ, তাঁর ডানেও অনুরূপ, বামেও অনুরূপ এবং পেছনেও অনুরূপ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে ছিলেন। তাঁর ওপর কুরআন নাযিল হচ্ছিল, আর তিনি এর তাফসীর জানতেন। তিনি যে আমলই করেছেন, আমরাও তা করেছি।
তিনি তাওহীদের (একত্ববাদের) তালবিয়াহ পড়লেন: "লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইক, লাব্বাইকা লা শারীকা লাকা লাব্বাইক। ইন্নাল হামদা ওয়াননি'মাতা লাকা ওয়াল মুলক, লা শারীকা লাকা।" (আমি উপস্থিত, হে আল্লাহ! আমি উপস্থিত, আমি উপস্থিত। তোমার কোনো শরীক নেই, আমি উপস্থিত। নিশ্চয়ই সকল প্রশংসা ও নিয়ামত তোমারই এবং রাজত্ব তোমারই, তোমার কোনো শরীক নেই।)
অন্যান্য লোকেরাও তাদের তালবিয়াহ পড়ল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেগুলোর কোনোটিই রদ করেননি। তবে তিনি তাঁর তালবিয়াহটি দৃঢ়ভাবে ধরে রাখলেন।
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা কেবল হজ্জের নিয়ত করেছিলাম, উমরাহ সম্পর্কে আমরা জানতাম না। অবশেষে যখন আমরা তাঁর সঙ্গে বাইতুল্লাহ পৌঁছলাম, তখন তিনি রুকন (হাজারে আসওয়াদ) স্পর্শ করলেন, তিনবার দ্রুত হেঁটে (রামল) গেলেন এবং চারবার স্বাভাবিকভাবে হাঁটলেন। এরপর তিনি মাকামে ইব্রাহীম (আঃ)-এর দিকে গেলেন এবং পাঠ করলেন: "وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى" (তোমরা মাকামে ইব্রাহীমকে সালাতের স্থান হিসেবে গ্রহণ করো)। (সূরা বাকারা: ১২৫)
তিনি মাকামটিকে নিজের ও বাইতুল্লাহর মাঝখানে রাখলেন। আমার পিতা বলতেন—আর আমি নিশ্চিত যে, তিনি এ কথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকেই বর্ণনা করেছেন—যে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই রাক‘আতে সূরা কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ ও কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরূন পড়তেন।
এরপর তিনি রুকন (হাজারে আসওয়াদ)-এর দিকে ফিরে আসলেন ও তা স্পর্শ করলেন। তারপর তিনি দরজা দিয়ে সাফার দিকে বের হলেন। সাফার নিকটবর্তী হয়ে তিনি তিলাওয়াত করলেন: "إِنَّ الصَّفَا والْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللهِ" (নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত)। অতঃপর বললেন: "আল্লাহ যা দিয়ে শুরু করেছেন, আমিও তা দিয়ে শুরু করব।"
অতঃপর তিনি সাফা থেকে শুরু করলেন এবং তার ওপর আরোহণ করলেন, যতক্ষণ না বাইতুল্লাহ দেখতে পেলেন। তিনি কিবলামুখী হয়ে আল্লাহ তা‘আলার একত্ব ঘোষণা করলেন ও তাকবীর বললেন: "لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ وَنَصَرَ عَبْدَهُ وَهَزَمَ الْأَحْزَابَ وَحْدَهُ" (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই, প্রশংসা তাঁরই, আর তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান। আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক। তিনি তাঁর ওয়াদা পূর্ণ করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং তিনি একাই সকল দল-গোষ্ঠীকে পরাজিত করেছেন)।
এরপর তিনি এর মাঝে দু‘আ করলেন। এভাবে তিনি তিনবার বললেন। এরপর মারওয়ার দিকে নামলেন। যখন তাঁর পা উপত্যকার মাঝে পৌঁছল, তিনি দ্রুত চললেন। যখন তা উঁচুতে উঠলো, তখন স্বাভাবিকভাবে হাঁটলেন, যতক্ষণ না মারওয়ায় পৌঁছলেন। মারওয়ায় উঠেও তিনি সাফার ওপর যা করেছিলেন, তাই করলেন। যখন মারওয়ায় তাঁর শেষ তাওয়াফ হলো, তখন তিনি বললেন: "আমি যদি আমার পূর্বের বিষয়টি নতুনভাবে গ্রহণ করতাম, তবে আমি কুরবানীর পশু সঙ্গে নিয়ে আসতাম না এবং এটাকে উমরাহ বানিয়ে নিতাম। অতএব, তোমাদের মধ্যে যাদের সঙ্গে কুরবানীর পশু নেই, তারা যেন হালাল হয়ে যায় এবং এটিকে উমরাহ বানিয়ে নেয়।"
সুরাকা ইবন মালিক ইবন জু‘শুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি শুধু এই বছরের জন্য, নাকি চিরকালের জন্য? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আঙ্গুলসমূহ একটির সঙ্গে অপরটি মিলিয়ে দেখিয়ে বললেন: "উমরাহ হজ্জের মধ্যে প্রবেশ করেছে দু'বার—না, বরং চিরকালের জন্য, চিরকালের জন্য।"
আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইয়ামান থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কুরবানীর পশুগুলো নিয়ে আসলেন। তিনি দেখলেন যে, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইহরাম ভেঙে দিয়েছেন, রঙিন পোশাক পরেছেন এবং সুরমা লাগিয়েছেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ কারণে তাঁকে ভর্ৎসনা করলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার পিতাই আমাকে এমনটি করার নির্দেশ দিয়েছেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন (যখন তিনি ইরাকে ছিলেন): আমি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাজের ব্যাপারে অভিযোগ করার জন্য এবং এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফাতওয়া চাওয়ার জন্য তাঁর কাছে গেলাম। আমি তাঁকে জানালাম যে, আমি ফাতিমার এ কাজটি অপছন্দ করেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে সত্য বলেছে, সে সত্য বলেছে! তুমি যখন হজ্জের নিয়ত করেছিলে, তখন কী বলেছিলে?" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি বলেছিলাম: 'হে আল্লাহ! তোমার রাসূল যা দিয়ে ইহরাম করেছেন, আমিও তা দিয়ে ইহরাম করলাম।' তিনি বললেন: "তবে আমার সঙ্গে যেহেতু হাদী (কুরবানী) আছে, তাই তুমি হালাল হয়ো না।"
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইয়ামান থেকে যা নিয়ে এসেছিলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা সঙ্গে এনেছিলেন, সব মিলিয়ে কুরবানীর পশুর সংখ্যা ছিল একশত। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যাদের সঙ্গে কুরবানীর পশু ছিল তারা ব্যতীত বাকি সকলেই হালাল হয়ে গেল এবং চুল ছোট করল।
যখন ইয়াউমুত তারবিয়াহ (৮ যিলহজ্জ) আসলো, তখন তারা মিনার দিকে রওনা হলেন এবং হজ্জের ইহরাম বাঁধলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনাতে আরোহণ করলেন এবং সেখানে যুহর, আসর, মাগরিব, ইশা ও ফজরের সালাত আদায় করলেন। এরপর অল্পক্ষণ অবস্থান করলেন, যখন সূর্যোদয় হলো, তখন তিনি নামিরাহতে তাঁর জন্য পশমের তাঁবু খাটানোর নির্দেশ দিলেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রওনা হলেন। কুরাইশরা নিশ্চিত ছিল যে, তিনি জাহিলিয়াতের যুগে কুরাইশরা যেমন করত, তেমনি মাশ‘আরুল হারামের কাছেই অবস্থান করবেন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে এগিয়ে গেলেন এবং আরাফাতে পৌঁছলেন। সেখানে তিনি দেখতে পেলেন, তাঁর জন্য নামিরাহতে তাঁবু খাটানো হয়েছে। তিনি সেখানে অবতরণ করলেন। যখন সূর্য হেলে গেল, তখন তিনি কাসওয়া নামক উটটিকে প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন। সেটিকে প্রস্তুত করা হলো। তিনি উপত্যকার মাঝে আসলেন এবং লোকদের উদ্দেশে খুতবা দিলেন। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের রক্ত ও তোমাদের সম্পদ তোমাদের জন্য হারাম, যেমন হারাম তোমাদের এই দিন, তোমাদের এই মাস, তোমাদের এই শহর। জেনে রাখো! জাহিলিয়াতের সকল বিষয় আমার পদতলে পিষ্ট হলো। জাহিলিয়াতের সকল রক্ত দাবিহীন করা হলো। আর আমি আমাদের গোত্রের পক্ষ থেকে প্রথম যে রক্তের দাবিহীন ঘোষণা করছি, তা হলো ইবন রবী‘আহ ইবন হারিসের রক্ত—সে বনু সা‘দ-এর মধ্যে দুধ পান করছিল, তখন তাকে হুযাইল গোত্র হত্যা করেছিল। আর জাহিলিয়াতের সুদ রহিত করা হলো। আমি আমাদের গোত্রের পক্ষ থেকে সর্বপ্রথম যে সুদ রহিত ঘোষণা করছি, তা হলো আব্বাস ইবন আবদুল মুত্তালিবের সুদ—এ সব কিছুই রহিত করা হলো।
তোমরা নারীদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো। কেননা তোমরা তাদেরকে আল্লাহর আমানত হিসেবে গ্রহণ করেছ এবং আল্লাহর কালেমার মাধ্যমে তাদের লজ্জাস্থান হালাল করেছ। তাদের ওপর তোমাদের অধিকার এই যে, তারা যেন তোমাদের অপছন্দ হয় এমন কাউকে তোমাদের বিছানায় না আসতে দেয়। যদি তারা এমন করে, তবে তোমরা তাদেরকে এমন হালকা প্রহার করবে যা আঘাত সৃষ্টি করবে না। আর তোমাদের ওপর তাদের অধিকার হলো, নিয়মানুযায়ী তাদের খাবার ও কাপড়ের ব্যবস্থা করা।
আমি তোমাদের মাঝে এমন জিনিস রেখে যাচ্ছি, যা দৃঢ়ভাবে ধরে থাকলে তোমরা এরপর আর পথভ্রষ্ট হবে না—তা হলো আল্লাহর কিতাব (কুরআন)। তোমাদেরকে আমার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হবে, তখন তোমরা কী বলবে?" তারা বলল: আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছেন, দায়িত্ব আদায় করেছেন এবং উপদেশ দিয়েছেন।
অতঃপর তিনি তাঁর শাহাদাত আঙ্গুল আকাশের দিকে উঠালেন এবং মানুষের দিকে ঝুঁকিয়ে তিনবার বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো! হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো!"
তারপর আযান হলো, এরপর ইক্বামত হলো এবং তিনি যুহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর আবার ইক্বামত হলো এবং তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন। এ দু'য়ের মাঝে তিনি কোনো (নফল) সালাত পড়েননি।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হলেন এবং মাওকিফ (অবস্থানের স্থান)-এ আসলেন। তিনি তাঁর কাসওয়া উটের পেট পাথরগুলোর দিকে রাখলেন এবং পায়ে হেঁটে আসা মানুষদের দড়ি সামনে রাখলেন, আর কিবলামুখী হলেন। তিনি দাঁড়িয়েই থাকলেন যতক্ষণ না সূর্য ডুবে গেল এবং সামান্য হলুদ ভাবও দূর হয়ে গেল, অবশেষে সূর্য সম্পূর্ণরূপে অদৃশ্য হলো। তিনি উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর পেছনে বসিয়ে নিলেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রওনা হলেন। তিনি কাসওয়া উটের লাগাম টেনে ধরলেন, ফলে উটটির মাথা তাঁর হাওদার অগ্রভাগের কাঠিতে লেগে যাচ্ছিল। আর তিনি তাঁর ডান হাত দিয়ে ইশারা করে বলছিলেন: "হে লোক সকল! শান্ত! শান্ত!" যখনই তিনি কোনো পাহাড়ের কাছে পৌঁছতেন, তিনি লাগামটি কিছুটা ঢিল দিতেন, যাতে উটটি উপরে উঠতে পারে।
এভাবে তিনি মুযদালিফায় পৌঁছলেন। সেখানে তিনি এক আযান ও দুই ইক্বামত সহকারে মাগরিব ও ইশার সালাত আদায় করলেন। এ দু'য়ের মাঝে তিনি কোনো (নফল) সালাত আদায় করেননি। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুয়ে পড়লেন, যতক্ষণ না ফজর উদিত হলো। সুবহে সাদিক স্পষ্ট হওয়ার পর তিনি এক আযান ও এক ইক্বামত সহকারে ফজরের সালাত আদায় করলেন।
এরপর তিনি কাসওয়াতে আরোহণ করলেন, যতক্ষণ না মাশ‘আরুল হারামে আসলেন। তিনি কিবলামুখী হলেন, দু‘আ করলেন, তাকবীর বললেন, তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) বললেন এবং তাওহীদ (একত্ববাদ) ঘোষণা করলেন। তিনি দাঁড়িয়েই থাকলেন, যতক্ষণ না চারপাশ খুব আলোকময় হয়ে গেল। সূর্য ওঠার আগেই তিনি রওনা হলেন।
তিনি ফাদল ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর পেছনে বসিয়ে নিলেন। ফাদল ছিলেন সুন্দর চুলবিশিষ্ট, ফর্সা ও সুদর্শন পুরুষ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রওনা হলেন, তখন কিছু চলমান মহিলা তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। ফাদল তাদের দিকে তাকাতে লাগলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাদলের মুখের ওপর হাত রাখলেন। ফাদল তাঁর মুখ অন্য দিকে ফিরিয়ে দেখতে লাগলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অন্য দিক থেকেও তাঁর মুখের ওপর হাত রাখলেন, যেন তাঁকে অন্যদিকে দেখতে বাধা দেন।
এভাবে তিনি বাতনে মুহাসসির পর্যন্ত আসলেন। সেখানে সামান্য দ্রুত চললেন। এরপর তিনি মধ্যবর্তী পথ ধরলেন, যা বড় জামারার দিকে গিয়েছে। অবশেষে তিনি গাছের কাছে থাকা জামারার কাছে পৌঁছলেন। তিনি তাকে সাতটি ছোট কঙ্কর দ্বারা নিক্ষেপ করলেন। প্রতিটি কঙ্কর নিক্ষেপের সময়ই তিনি তাকবীর বলছিলেন। তিনি উপত্যকার পেট থেকে কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন।
এরপর তিনি কুরবানীর স্থানের দিকে ফিরলেন এবং নিজ হাতে তেষট্টিটি উট কুরবানী করলেন। এরপর বাকি উটগুলো আলীকে দিয়ে দিলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেগুলোর কুরবানী করলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নিজের কুরবানীর সাথে শরীক করলেন। এরপর তিনি নির্দেশ দিলেন যেন প্রত্যেক উট থেকে এক টুকরা করে গোশত নিয়ে একটি ডেকচিতে রান্না করা হয়। তাঁরা দু‘জনই সে গোশত খেলেন এবং তার ঝোল পান করলেন।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হলেন এবং বাইতুল্লাহর দিকে তাওয়াফে ইফাদার জন্য গেলেন। অতঃপর মক্কায় যুহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি বনু আবদুল মুত্তালিবের কাছে আসলেন, যারা যমযমের পানি পান করানোর দায়িত্বে ছিল। তিনি বললেন: "তোমরা পানি ওঠাও, হে বনু আবদুল মুত্তালিব! যদি তোমাদের ওপর লোকেরা তোমাদের পানি পানের দায়িত্বের ক্ষেত্রে প্রাধান্য বিস্তার করার ভয় না থাকত, তাহলে আমিও তোমাদের সঙ্গে পানি ওঠাতাম।" অতঃপর তারা তাঁকে এক বালতি পানি দিলেন, আর তিনি তা থেকে পান করলেন।
4759 - عن عبد الله بن عمر، قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ركب راحلتَه بذي الحليفة، ثم يُهلُّ حين تستوي به قائمة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1514)، ومسلم في الحج (1187: 29) كلاهما من طريق ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، أنّ سالم بن عبد الله أخبره، أنّ عبد الله بن عمر، قال (فذكره).
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি যুল-হুলাইফায় তাঁর সওয়ারীতে আরোহণ করলেন, অতঃপর যখন সেটি তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়াল, তখন তিনি তালবিয়াহ পাঠ করলেন।
4760 - عن عبد الله بن عمر قال: بيداؤكم هذه التي تكذبون على رسول الله صلى الله عليه وسلم فيها، ما أهلّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلّا من عند المسجد يعني ذا الحليفة.
وفي رواية: كان ابن عمر إذا قيل له: الإحرام من البيداء؟ قال:"البيداء التي تكذبون فيها على رسول الله صلى الله عليه وسلم، ما أهلّ رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا من عند الشجرة حين قام بعيره.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (32) عن موسى بن عقبة، عن سالم بن عبد الله، أنه سمع أباه يقول (فذكره).
ومن طريقه رواه مسلم في الحج (1186)، والبخاريّ في الحج (1541) إلا أنه اختصره. والرواية الثانية عند مسلم من وجه آخر عن موسى بن عقبة.
وقوله:"تكذبون على رسول الله صلى الله عليه وسلم" أي تقولون: إنّه أحرم من البيداء، والصحيح أنه لم يحرم من البيداء، وإنما أحرم قبلها من عند مسجد ذي الحليفة، ومن عند الشجرة التي كانت هناك.
আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমাদের এই ‘বাইদা’ নামক স্থান, যেখানে তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যারোপ কর, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো মসজিদ, অর্থাৎ যুল-হুলাইফা এর নিকট থেকেই ইহরাম বেঁধেছিলেন, অন্য কোনো স্থান থেকে নয়।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: যখন ইবন উমারকে জিজ্ঞেস করা হতো: বাইদা থেকে ইহরাম বাঁধতে হবে? তিনি বলতেন: "এই বাইদা হল সেই স্থান যেখানে তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যারোপ কর। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো কেবল গাছের কাছ থেকেই ইহরাম বেঁধেছিলেন, যখন তাঁর উট সেখানে দাঁড়িয়েছিল।"