হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (48)


48 - عن أبي سعيد الخدريّ، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يدخل أهلُ الجنة الجنةَ، وأهلُ النار النارَ، ثم يقول اللَّه تعالى: أخرجوا من النار مَنْ كان في قلبه مثقال حبّة من خردل من إيمان، فيخرجون منها قد اسودّوا، فيلقون في نهر الحيا أو الحياة -شك مالك- فينبتون كما تنبتُ الحِبّةُ في جانب السّيل، ألم تر أنّها تخرج صفراء ملتويةً".

متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (22) عن إسماعيل، ومسلم في الإيمان (184) من حديث ابن وهب - كلاهما عن مالك، عن عمرو بن يحيى بن عمارة المازنيّ، قال: حدثني أبي، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث، واللفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم:"يدخل اللَّه أهل الجنة الجنةَ، يدخل من يشاء برحمته، ويدخلُ أهل النار النار، ثم يقول: انظروا من وجدتم في قلبه مثقال حبة من خردل من إيمان فأخرجوه، فيخرجون منها حُمَمًا قد امتحشوا" ثم ذكر مثله.

وفي رواية:"كما تنبت الغُثاء في جانب السيل".

هذا الحديث لم يخرجه يحيى بن يحيى اللّيثيّ في موطأ مالك كما لم يذكره الجوهريّ في مسند الموطأ، مع أنه جمع فيه رواية عبد اللَّه بن وهب، فالظاهر أن الحديث في خارج الموطأ.

وقوله:"امتحشوا" أي احترقوا.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাতবাসীরা জান্নাতে প্রবেশ করবে এবং জাহান্নামবাসীরা জাহান্নামে প্রবেশ করবে। অতঃপর আল্লাহ তাআলা বলবেন: তোমরা জাহান্নাম থেকে এমন ব্যক্তিকে বের করে আনো, যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণ ঈমান আছে। তখন তাদের সেখান থেকে বের করে আনা হবে এমন অবস্থায় যে তারা (কয়লার মতো) কালো হয়ে গেছে। অতঃপর তাদের 'নাহরুল হায়া' অথবা 'নাহরুল হায়াত'—(এ ব্যাপারে মালিকের সন্দেহ)—নামক নদীতে নিক্ষেপ করা হবে। ফলে তারা দ্রুত বেড়ে উঠবে, যেমন শস্যদানা বন্যার স্রোতের তীরে গজায়। তুমি কি দেখোনি যে তা হলুদ ও মোচড়ানো অবস্থায় বের হয়ে আসে?









আল-জামি` আল-কামিল (49)


49 - عن أنس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يخرج من النار من قال: لا إله إلا اللَّه، وفي قلبه وزن شعيرة من خير، ويخرج من النار من قال: لا إله إلا اللَّه، وفي قلبه وزن بُرّة من خير، ويخرج من النار من قال: لا إله إلا اللَّه وفي قلبه وزن ذرّة من خير".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (44)، ومسلم في الإيمان (193: 325) كلاهما من حديث هشام صاحب الدستوائيّ، قال: حدثنا قتادة، عن أنس، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহান্নাম থেকে সে ব্যক্তি বের হয়ে আসবে, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর যার অন্তরে এক যব পরিমাণ নেকি বিদ্যমান। এবং জাহান্নাম থেকে সে ব্যক্তি বের হয়ে আসবে, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর যার অন্তরে এক গম পরিমাণ নেকি বিদ্যমান। এবং জাহান্নাম থেকে সে ব্যক্তি বের হয়ে আসবে, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর যার অন্তরে এক অণু পরিমাণ নেকি বিদ্যমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (50)


50 - عن ابن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يدخل النارَ أحدٌ في قلبه مثقال حبّة خردل من إيمان. ولا يدخل الجنة أحدٌ في قلبه مثقال حبّة خردل من كبرياء".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (91: 148) من طرق عن علي بن مسهر، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণ ঈমান আছে, সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে না। আর যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণ অহংকার আছে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (51)


51 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا مُيِّز أهلُ الجنّة وأهلُ النار، فدخل أهلُ الجنة الجنة، وأهل النار النار، قامت الرُّسلُ فشفعوا فيقول: انطلقوا -أو اذهبوا- فمن عرفتم فأخرجوه. فيخرجونهم قد امْتَحَشُوا فيلقونهم في نهر -أو على نهر- يقال له: الحياة. قال فتسقطُ مُحَاشهم على حافة النّهر ويخرجون بِيضًا مثل الثعارير. ثم يشفعون، فيقول: اذهبوا -أو انطلقوا- فمن وجدتم في قلبه مثقال قيراط من إيمان فأخرجوهم. قال: فيخرجون بَشَرًا، ثم يشفعون فيقول اذهبوا -أو انطلقوا- فمن وجدتم في قلبه مثقال حبة من خردلة من إيمان فأخرجوه، ثم يقول اللَّه عز وجل: أنا الآن أُخْرجُ بعلمي ورحمتي. قال: فيُخرجُ أضعافَ ما أخرجُوا وأضعافه فيكتب في رقابهم: عُتَقاءُ اللَّه، ثم يَدخلون الجنّة فيسمَّوْن فيها الجهنّميّين".

حسن: رواه الإمام أحمد (14491، 15048) من وجهين عن أبي الزبير، قال: حدثني جابر، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.

وصحّحه ابن حبان (183)، وأصله في الصحيحين من وجوه أخرى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন জান্নাতবাসীদের ও জাহান্নামবাসীদের পৃথক করা হবে, আর জান্নাতবাসীরা জান্নাতে ও জাহান্নামবাসীরা জাহান্নামে প্রবেশ করবে, তখন রাসূলগণ (নবীগণ) উঠে সুপারিশ করবেন। আল্লাহ বলবেন: ‘যাও (অথবা ‘চলে যাও’)। যাদেরকে তোমরা চিনতে পারো, তাদেরকে বের করে আনো।’ তারা (জাহান্নাম থেকে) এমন কিছু লোককে বের করে আনবেন, যারা সম্পূর্ণরূপে জ্বলে কালো হয়ে গেছে। অতঃপর তারা তাদেরকে একটি নদীর মধ্যে—অথবা একটি নদীর ধারে—নিক্ষেপ করবেন, যার নাম ‘আল-হায়াত’ (জীবন)। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাদের (শরীরের) কালো অংশগুলো নদীর কিনারে পড়ে যাবে এবং তারা ‘থা’আরীর’ (ছোট শসার মতো বা বীজকোশের মতো সাদা জিনিস) এর মতো উজ্জ্বল সাদা হয়ে বেরিয়ে আসবে। এরপর তারা আবার সুপারিশ করবেন। আল্লাহ বলবেন: ‘যাও (অথবা ‘চলে যাও’)। যার অন্তরে তোমরা এক কীরাত পরিমাণও ঈমান পাবে, তাকে বের করে আনো।’ বর্ণনাকারী বলেন: ফলে তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা আবার সুপারিশ করবেন। আল্লাহ বলবেন: ‘যাও (অথবা ‘চলে যাও’)। যার অন্তরে তোমরা সরিষার দানা পরিমাণও ঈমান পাবে, তাকে বের করে আনো।’ এরপর আল্লাহ তাআলা বলবেন: ‘এখন আমি আমার জ্ঞান ও রহমত দ্বারা বের করব।’ বর্ণনাকারী বলেন: ফলে তিনি (আল্লাহ) তাদের (রাসূলগণের) বের করে আনা সংখ্যার বহুগুণ এবং তারও বহুগুণ বের করবেন এবং তাদের ঘাড়ে লিখে দেওয়া হবে: ‘এরা আল্লাহর মুক্তিকৃত দাস।’ এরপর তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে এবং সেখানে তাদের ‘জাহান্নামী’ নামে ডাকা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (52)


52 - عن جندب بن عبد اللَّه قال: كنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم ونحن فتيانٌ حزاورةٌ، فتعلمنا الإيمان قبل أن نتعلم القرآن، ثم تعلمنا القرآن، فازددنا به إيمانًا.

حسن: رواه ابن ماجه (61) عن علي بن محمد، قال: حدثنا وكيع، قال: حدثنا حماد بن نجيح -وكان ثقة-، عن أبي عمران الجوني، عن جندب، فذكره.

وإسناده حسن من أجل حماد بن نجيح الإسكاف السّدوسيّ، فإنّه حسن الحديث.

قوله:"حزاورة" جمع حزور، وهو الغلام إذا اشتد وقوي وحزم.




জুনদুব ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম যখন আমরা পূর্ণ যুবক ছিলাম। তখন আমরা কুরআন শেখার পূর্বে ঈমান শিক্ষা করেছিলাম। অতঃপর আমরা কুরআন শিক্ষা করেছিলাম, ফলে তা দ্বারা আমাদের ঈমান আরও বৃদ্ধি পেয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (53)


53 - عن أبي أيوب: أنّ رجلًا قال للنّبيّ صلى الله عليه وسلم: أخبرني بعمل يُدخلني الجنّة. قال (أي القوم): ما له ما له! وقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"أَرَبٌ ما له، تعبد اللَّه ولا تشركْ به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتُؤتي الزّكاة، وتصلُ الرَّحم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1396)، ومسلم في الإيمان (13/ 13) كلاهما من
حديث شعبة، حدثنا محمد بن عثمان بن عبد اللَّه بن موهب، وأبوه عثمان كلاهما سمعا موسى بن طلحة بحدّث عن أبي أيوب، فذكره.

واللّفظ للبخاريّ؛ إلّا أنه قال في أحد الإسنادين:"عن ابن عثمان بن عبد اللَّه بن موهب، عن موسى بن طلحة" وقال أيضًا:"أخشى أن يكون محمد غير محفوظ إنما هو عمرو".

إلّا أنّ مسلمًا لم يذكر لفظ الحديث، وإنّما أحال على ما سبقه وهو ما رواه عن عبد اللَّه بن نمير، عن عمرو بن عثمان -كما رجّحه البخاريّ-، عن موسى بن طلحة، قال: حدثني أبو أيوب: أنّ أعرابيًّا عرض لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو في سفر، فأخذ بخطام ناقته -أو بزمامها- ثم قال: يا رسول اللَّه -أو يا محمد- أخبرني بما يقرّبني من الجنّة وما يباعدني من النّار. قال: فكفّ النبي صلى الله عليه وسلم ثم نظر في أصحابه ثم قال:"لقد وُفَّق -أو لقد هُدِى-". قال:"كيف قلت؟". قال: فأعاد فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"تعبد اللَّه لا تشرك به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتؤتي الزّكاة، وتصل الرّحم، دع النَّاقة".

وزاد في رواية أبي إسحاق، عن موسى بن طلحة:"إن تمسّك بما أُمر به دخل الجنّة".

ورواه أيضًا البغويّ في"شرح السنة" (1/ 20) من طريق أبي نعيم، فقال:

"عن عمرو بن عثمان" إلّا أنّه فاته العزو إلى البخاريّ.

وعمرو بن عثمان هو الصّحيح، قال النَّووي:"اتفقوا على أنَّه وهم من شعبة، وأنَّ الصّواب: عمرو".

وقوله:"أرب" فيه ثلاث روايات: إحدها:"أَرِبَ" بوزن عَلِم، ومعناه الدّعاء عليه أي: أُصيبت آرابه وسقطت، وهي كلمة لا يراد بها وقوع الأمر، وإنما تذكر في معرض التعجّب. والثانية:"أَرَبٌ ما له" بوزن جَمَلٌ، أي: حاجة له، و"ما" زائدة للتقليل، أي حاجة يسيرة: والثالثة:"أَرِبٌ" بوزن كتف، والأرِبُ: الحاذق الكامل، أي: هو أرِبٌ، فحذف المبتدأ ثم سأل فقال: ماله؟ أي ما شأنه. راجع: النهاية (1/ 35).




আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আমাকে এমন একটি কাজের কথা বলুন যা আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে। (উপস্থিত) লোকেরা বললো: তার কী হলো! তার কী হলো! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তার একটি প্রয়োজন আছে (বা তার কী হয়েছে!)। তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না, সালাত কায়েম করবে, যাকাত দেবে এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (54)


54 - عن أبي هريرة، أنّ أعرابيًّا أتى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: دُلّني على عمل إذا عملتُه دخلتُ الجنّةَ. قال:"تعبد اللَّه لا تشركُ به شيئًا، وتقيم الصّلاة المكتوبة، وتؤدّي الزّكاة المفروضة، وتصوم رمضان". قال: والذي نفسي بيده! لا أزيد على هذا. فلما ولَّى قال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من سرَّه أن ينظر إلى رجل من أهل الجنّة فلينظرْ إلى هذا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1397)، ومسلم في الإيمان (14)، كلاهما من حديث عفّان بن عثمان، حدّثنا وهيب، عن يحيى بن سعيد بن حيّان، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমাকে এমন কাজের সন্ধান দিন, যা করলে আমি জান্নাতে প্রবেশ করব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না; ফরয সালাত (নামায) প্রতিষ্ঠা করবে; ফরয যাকাত আদায় করবে; এবং রমাযানের সাওম (রোযা) পালন করবে।" সে বলল, সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার জীবন! আমি এর চেয়ে বেশি কিছু করব না। যখন সে চলে গেল, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো জান্নাতী লোককে দেখতে আনন্দিত হয়, সে যেন এই লোকটিকে দেখে নেয়।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (55)


55 - عن أبي جمرة قال: كنتُ أقعدُ مع ابن عباس يُجلسني على سريره فقال: أَقِمْ عندي حتى أجعل لك سهمًا من مالي. فأقمتُ معه شهرين، ثم قال: إنّ وفد عبد
القيس لما أتوا النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من القوم؟ -أو من الوفد؟ -" قالوا: ربيعة. قال:"مرحبا بالقوم -أو بالوفد- غير خزايا ولا ندامى". فقالوا: يا رسول اللَّه، إنّا لا نستطيع أن نأتيك إلا في الشّهر الحرام، وبيننا وبينك هذا الحيُّ من كفار مُضر، فُمرْنا بأمر فَصْل نُخْبر به مَنْ وراءَنا، وندخل به الجنّة. وسألوه عن الأشرية، فأمرهم بأربع، ونهاهم عن أربع، أمرهم: بالإيمان باللَّه وحده، قال:"أتدرون ما الإيمان باللَّه وحده؟" قالوا: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"شهادةُ أن لا إله إلا اللَّه، وأنّ محمدًا رسولُ اللَّه، وإقامُ الصّلاة، وإيتاءُ الزّكاة، وصيامُ رمضان، وأنْ تُعطوا من المغنم الخمس". ونهاهم عن أربع: عن الحنتم، والدُّباء والنّقير، والمزفّت، وربما قال: المقير، وقال:"احفظوهن وأخبروا بهنّ من وراءكم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (53)، ومسلم في الإيمان (17) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي جمرة، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.

وزاد مسلمٌ في رواية قرّة بن خالد، عن أبي جمرة: وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للأشجّ -أشجّ عبد القيس-:"إن فيك خصلتين يحبُّهما اللَّه: الحِلمُ والأناةُ".

قوله:"والمقير" هو المزقّت، وهو المطلي بالقار -وهو الزّفت-، وقيل: الزفت نوع من القار.

والمقصود من النهي عن هذه الأربع هو أنه نهى عن الانتباذ فيها، وإنّما خُصّت هذه بالنهي لأنه يسرع إليها الإسكار فيها فيصير حرامًا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু জামরাহ বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসতাম। তিনি আমাকে তাঁর খাটের উপর বসাতেন এবং বলতেন: তুমি আমার কাছে থাকো, যাতে আমি আমার সম্পদ থেকে তোমার জন্য একটি অংশ নির্ধারণ করে দিতে পারি। আমি তাঁর সঙ্গে দু'মাস ছিলাম। এরপর তিনি বললেন: আবদ কায়স গোত্রের প্রতিনিধিদল যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: “তোমরা কারা? - অথবা, প্রতিনিধিদল কারা?” তারা বলল: আমরা রাবী'আহ (গোত্রের লোক)। তিনি বললেন: “তোমাদেরকে স্বাগত! তোমরা অপমানিতও নও, লজ্জিতও নও।”

তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আপনাকে হারাম মাস ছাড়া আসতে পারি না। কারণ আমাদের ও আপনার মাঝে মুদার গোত্রের কাফিরদের এ জনপদ অবস্থিত। অতএব, আমাদের এমন কিছু চূড়ান্ত নির্দেশের আদেশ দিন যা আমরা আমাদের পেছনে যারা আছে, তাদেরকে জানাতে পারি এবং যার দ্বারা আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি। তারা তাঁকে পানীয় সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করল।

তিনি তাদের চারটি জিনিসের আদেশ দিলেন এবং চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করলেন। তিনি তাদের একমাত্র আল্লাহর প্রতি ঈমান আনার আদেশ দিলেন। তিনি বললেন: “তোমরা কি জানো, একমাত্র আল্লাহর প্রতি ঈমান আনা মানে কী?” তারা বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: “এ হলো: এই সাক্ষ্য দেওয়া যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই এবং নিশ্চয়ই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল, সালাত প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত আদায় করা, রমাযানের সাওম পালন করা এবং গণীমতের মাল হতে এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করা।”

আর তিনি তাদের চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করলেন: হানতাম, দুব্বা, নাকীর ও মুযাফফাত (পাত্র ব্যবহার) থেকে। আর কখনো কখনো (রাবী) ‘আল-মুকায়্যার’ বলেছেন। আর তিনি বললেন: “এগুলো তোমরা ভালোভাবে মনে রেখো এবং তোমাদের পেছনে যারা আছে, তাদেরকেও এ সম্পর্কে অবহিত করবে।”

(মুসলিমে কুরাহ ইবনু খালিদ সূত্রে আবু জামরাহ থেকে অতিরিক্ত রয়েছে): আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আশাজ্জকে – অর্থাৎ আবদ কায়স গোত্রের আশাজ্জকে – বললেন: “নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে এমন দু’টি গুণ আছে, যা আল্লাহ পছন্দ করেন: ধৈর্য ও সহনশীলতা (ধীরস্থিরতা)।”









আল-জামি` আল-কামিল (56)


56 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: إنّ أناسا من عبد القيس قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالوا: يا نبيَّ اللَّه، إنّا حيٌّ من ربيعة وبيننا وبينك كفار مضر، ولا نقدر عليك إلا في أشهر الحرم فمرْنا بأمر نأْمُرُ به مَنْ وَراءَنا وندخل به الجنّة، إذا نحن أخذنا به فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"آمركم بأربع، وأنهاكم عن أربع: اعبدوا اللَّه ولا تشركوا به شيئًا، وأقيموا الصّلاة، وآتوا الزّكاة، وصُوموا رمضان وأعطوا الخمس من الغنائم، وأنهاكم عن أربع: عن الدُّبّاء، والحَنْتَم، والمزفَّت والنّقِير". قالوا: يا نبي اللَّه، ما علمُك بالنّقير؟ قال:"بلي جِذعٌ تنقرونه فتقذفون فيه من القُطَيْعاء -قال سعيدٌ: أو قال من التمر-، ثم تصبُّون فيه من الماء، حتى إذا سكن غلَيانُه شربتموه، حتى إنّ أحدكم -أو إنَّ أحدهم- ليضربُ ابنَ عمِّه بالسّيف" قال: وفي القوم رجل أصابته جراحة كذلك. قال: وكنتُ أَخْبأُها حياءً من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقلتُ: ففيم نشرب يا رسول اللَّه؟ قال:"في أَسْقِية الأَدَم التي يُلاثُ على أفواهها". قالوا: يا رسول اللَّه،
إنّ أرضنا كثيرةُ الجِرْذان، ولا تبقى بها أسقية الأَدَم. فقال نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وإن أكلتها الجرذانُ، وإن أكلتها الجرذانُ، وإن أكلتها الجرذان" قال: وقال نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم لأشج عبد القيس:"إنّ فيك لخصلتين يحبُّهما اللَّه الحِلْم والأَنَاة".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (18) عن يحيى بن أيوب، حدثنا ابنُ عليّة، حدّثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، قال: حدّثنا من لقي الوفدَ الذين قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من عبد القيس. قال سعيد (ابن أبي عروبة): وذكر قتادة أبا نضرة، عن أبي سعيد في حديثه هذا:"أنّ ناسًا من عبد القيس" فذكره.

ورواه من وجه آخر عن ابن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة، قال: حدثني غيرُ واحد لقي ذاك الوفد. وذكر أبا نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ: أنّ وفد عبد القيس لما قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بمثل حديث ابن عليّة، غير أنّ فيه:"وتَذيفُون فيه من القُطَيْعاء أو التمر والماء" ولم يقل:"قال سعيد: أو قال: من التمر".

ورواه من طريق أبي عاصم وعبد الرزّاق، قال عبد الرزّاق: أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أنّ أبا نضرة أخبره وحسنًا أخبرهما، أنّ أبا سعيد الخدريّ أخبره: أنّ وفد عبد القيس لما أتوا نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم قالوا: يا نبيّ اللَّه، جعلنا اللَّه فداءك، ماذا يصلح لنا من الأشربة؟ فقال:"لا تشرَبوا في النّقير". قالوا: يا نبي اللَّه، جعلنا اللَّه فداءك، أو تدري ما النّقير؟ قال: نعم الجِذْع يُنقرُ وسطه، ولا في الدّبّاء، ولا في الحنتمة، وعليكم بالموكَى".

وقوله:"إنّ أبا نضرة وحسنًا أخبرهما" قال ابن الصّلاح في صيانة صحيح مسلم (ص 159 - 161):"إحدى المعضلات، ولا عضال ذلك وقع فيه تغييرات من جماعة واهمة، فمن ذلك: رواية أبي نعيم الأصبهاني الحافظ في مستخرجه على كتاب مسلم بإسناده: أخبرني أبو فزعة، أنّ أبا نضرةَ وحسنًا أخبرهما أنّ أبا سعيد الخدريّ، وهذا يلزم منه أن يكون أبو قزعة هو الذي أخبر أبا نضرة وحسنًا عن أبي سعيد، فيكون أبو قزعة هو الذي سمع من أبي سعيد ذلك. وذلك منتفٍ، واللَّه أعلم.

ومن ذلك: أنّ أبا عليّ الغسّاني صاحب"تقييد المهمل" ردّ رواية مسلم هذه، وقلّده في ذلك صاحب"المُعِلمِ"، ومن شأنه تقليده فيما يذكره من علم الأسانيد، مع أنه لا يسمّيه ولا ينصفه، وصوّبهما في ذلك القاضي أبو الفضل عياض بن موسى، فقال أبو عليّ: الصّواب في الإسناد عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أن أبا نضرةً وحسنًا أخبراه، أنّ أبا سعيد أخبره. وذكر أنه إنما قال:"أخبره" ولم يقل:"أخبرهما"؛ لأنّه ردّ الضّمير إلى أبي نضرة وحده، وأسقط الحسن لموضع الإرسال، فإنّه لم يسمع من أبي سعيد الخدريّ ولم يلْقَه، وذكر أنّه بهذا اللّفظ الذي ذكره خرّجه أبو عليّ بن السّكن في"مصنّفه" بإسناده قال: وأظنُّ هذا من إصلاح ابن السَّكن.
وذكر الغسّاني أيضًا: أنه رواه كذلك أبو بكر البزّار في"مسنده الكبير" بإسناده وحكى عنه، وعن عبد الغني بن سعيد الحافظ: أنّهما ذكرا أنّ حسنًا هذا هو الحسن البصريّ.

وليس الأمر في ذلك على ما ذكروه، بل ما أورده مسلمٌ في هذا الإسناد هو الصواب، وكما أورده رواه أحمد بن حنبل، عن روح بن عبادة، عن ابن جريج.

وقد انتصر له الحافظ أبو موسى الأصبهانيّ، وألّف في ذلك كتابًا لطيفًا تبجّح فيه بإجادته وإصابته، مع وهم غير واحد من الحفّاظ فيه.

فذكر: أنّ حسنًا هذا هو الحسن بن مسلمٌ بن ينّاق الذي روى عنه ابن جريج غير هذا الحديث، وأن معنى هذا الكلام: أنّ أبا نضرة أخبر بهذا الحديث أبا قزعة وحسن بن مسلم كليهما، ثم أكّد ذلك بأن أعاد فقال: أخبرهما أن أبا سعيد أخبره -يعني أبو سعيد أبا نضرة- وهذا كما تقول: إن زيدًا جاءني وعمرًا جاءاني فقالا: كذا وكذا.

وهذا من فصيح الكلام، واحتجّ على أنّ حسنًا فيه هو الحسن بن مسلم: بأنّ سلمة بن شبيب وهو ثقة، رواه عن عبد الرزّاق، وعن ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أنّ أبا نضرة أخبره، وحسن بن مسلم أخبرهما، أنّ أبا سعيد أخبره. الحديث. رواه أبو الشيخ الحافظ في كتابه"المخرّج على صحيح مسلم".

وقد أسقط أبو مسعود الدمشقي وغيره، ذكر حسن أصلًا من الإسناد؛ لأنّه مع إشكاله لا مدخل له في رواية الحديث.

وذكر الحافظ أبو موسى ما حكاه أبو علي الغسّاني في كتابه"تقييد المهمل" في ذلك، وبيّن بطلانه، وبطلان رواية من غيّر الضمير في قوله:"أخبرهما" وعبر ذلك من تغيير، ولقد أجاد وأحسن، واللَّه أعلم، انتهى كلام ابن الصّلاح.

ونقل هذا الكلام النووي في شرح مسلم وأقرّه.

قوله:"أشج عبد القيس" اسمه منذر بن عائذ كما قال الترمذي، وهو المنذر بن عائذ بن المنذر ابن الحارث القصري -بمفتوحتين- صحابي نزل البصرة ومات بها.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই আব্দুল কায়স গোত্রের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তারা বলল, "হে আল্লাহর নবী! আমরা রবীআ গোত্রের একটি শাখা, এবং আমাদের ও আপনার মাঝে মুদার গোত্রের কাফিররা রয়েছে। আমরা হারাম মাসগুলো ছাড়া আপনার কাছে আসতে পারি না। অতএব, আপনি আমাদেরকে এমন কিছু কাজের নির্দেশ দিন, যা আমরা আমাদের পিছনের লোকদেরকেও বলতে পারি এবং যা গ্রহণ করলে আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি।"

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তোমাদেরকে চারটি কাজের নির্দেশ দিচ্ছি এবং চারটি কাজ থেকে নিষেধ করছি: তোমরা আল্লাহর ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করো না; সালাত প্রতিষ্ঠা করো; যাকাত দাও; রমযান মাসের সওম পালন করো; এবং গনীমতের মালের এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করো। আর আমি তোমাদেরকে চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করছি: দুব্বা (কুমড়োর খোলা), হানতাম (সবুজ রঙের মাটির পাত্র), মুজাফফাত (আলকাতরা মাখানো পাত্র) এবং নাকীর (কাঠের পাত্র) ব্যবহার করতে।"

তারা বলল, "হে আল্লাহর নবী! নাকীর সম্পর্কে আপনি কী জানেন?" তিনি বললেন, "তা হলো কাণ্ডের ভেতরের অংশ, যা তোমরা কেটে ফাঁপা করো এবং তাতে কুত্বাইআ' নামক ফল— সাঈদ বলেন: অথবা খেজুর— রাখো। এরপর তাতে পানি ঢালো। যখন সেটির বুদবুদ ওঠা থেমে যায়, তখন তোমরা তা পান করো। ফলে তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার চাচাতো ভাইকে তরবারি দ্বারা আঘাত করতে থাকে।"

রাবী বলেন: সেই গোত্রের একজন লোক এমন আঘাতে আহত ছিল। লোকটি বলল: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লজ্জায় তা লুকিয়ে রেখেছিলাম। আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আমরা কিসে পান করব?" তিনি বললেন, "চামড়ার তৈরি মশকগুলোতে, যেগুলোর মুখ শক্ত করে বাঁধা হয়।"

তারা বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের এলাকায় ইঁদুরের উপদ্রব খুব বেশি, চামড়ার মশক সেখানে টিকে থাকে না।" তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে), ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে), ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে)।"

রাবী বলেন: আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল কায়সের আশাজ্জকে বললেন, "নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে এমন দুটি গুণ রয়েছে, যা আল্লাহ তাআলা ভালোবাসেন: সহনশীলতা (ধৈর্য) ও স্থিরতা (ধীরস্থিরতা)।"









আল-জামি` আল-কামিল (57)


57 - عن جابر بن عبد اللَّه، قال: أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم النعمانُ بن قوقل، فقال: يا رسول اللَّه، أرأيت إذا صليتُ المكتوبة، وحرّمتُ الحرام، وأحللْتُ الحلال، أأدخلُ الجنّة؟ فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"نعم".

وفي رواية:"صليتُ الصلوات المكتوبات، وصمتُ رمضان، وأحللتُ الحلال، وحرمتُ الحرام، ولم أزد على ذلك، أأدخلُ الجنة؟ قال:"نعم" قال: واللَّه لا أزيد على ذلك شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (15) من طرق عن جابر، به.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নু'মান ইবনে কাওকাল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি বলুন, যদি আমি ফরয নামায আদায় করি, হারামকে হারাম মনে করি (তা থেকে বিরত থাকি), আর হালালকে হালাল মনে করি (তা পালন করি), তাহলে কি আমি জান্নাতে প্রবেশ করব?" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।"

অপর এক বর্ণনায় এসেছে, (তিনি জিজ্ঞেস করলেন:) "যদি আমি ফরয নামাযগুলো আদায় করি, রমযানের রোযা রাখি, হালালকে হালাল মনে করি এবং হারামকে হারাম মনে করি, আর এর থেকে অতিরিক্ত আর কিছু না করি, তবুও কি আমি জান্নাতে প্রবেশ করব?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (নু'মান) বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি এর থেকে আর কিছুই অতিরিক্ত করব না।"









আল-জামি` আল-কামিল (58)


58 - عن معاذ بن جبل، قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم في سفر فأصبحتُ يوما قريبا منه ونحن نسيرُ، فقلت: يا رسولَ اللَّه، أخبرني بعمل يدخلني الجنة، ويباعدني من النار. قال:"لقد سألتني عن عظيم، وإنّه ليسيرٌ على من يسّره اللَّه عليه؛ تعبد اللَّه ولا تشركُ به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتُؤتي الزّكاة، وتصوم رمضان، وتحجّ البيت". ثم قال:"ألا أدلك على أبواب الخير؟ الصّومُ جُنّة، والصّدقةُ تُطفئ الخطيئةَ كما يطفئ الماءُ النّارَ، وصلاةُ الرّجل من جوف الليل" قال: ثم تلا: {تَتَجَافَى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ} حتى بلغ {يَعْمَلُونَ} [سورة السجدة: 16 - 17]، ثم قال:"ألا أخبرك برأس الأمر كلّه وعموده وذروة سنامه؟" قلت: بلى يا رسول اللَّه، قال:"رأس الأمر الإسلام، وعموده الصّلاة، وذروة سنامه الجهاد". ثم قال:"ألا أخبرك بملاك ذلك كله؟" قلت: بلى يا نبي اللَّه، فأخذه بلسانه قال:"كفّ عليك هذا" فقلت: يا نبي اللَّه، وإنّا لمؤاخذون بما نتكلم به؟ فقال:"ثكلتك أمُّك يا معاذ! وهل يكبُّ الناس في النار على وُجُوههم -أو على مناخرهم- إلّا حصائدُ ألسنتهم؟ !".

حسن: رواه الترمذي (2616) واللّفظ له، وابن ماجه (3973) كلاهما عن محمد بن أبي عمر العدنيّ، حدثنا عبد اللَّه بن معاذ الصنعانيّ، عن معمر، عن عاصم بن أبي النَّجود، عن أبي وائل، عن معاذ بن جبل، فذكر الحديث.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

ورواه عبد الرزّاق في مصنفه (20303)، وعنه الإمام أحمد (22016).

وإسناده حسن لأجل الكلام في عاصم بن أبي النّجود، غير أنه حسن الحديث.

وأبو وائل شقيق بن سلمة، ولد في السنة الأولى من الهجرة، ولكن لم تثبت صحبتُه، روى عن جماعة من الصّحابة منهم معاذ بن جبل، وكان من أعلم أهل الكوفة بحديث عبد اللَّه بن مسعود توفي سنة (82 هـ) روايته عن أبي بكر مرسلة، وشك الناس في سماعه من عائشة وأبي الدرداء غير أنّه لم يعرف بالتدليس.

وهذا الإسناد هو من أجود ما روي به هذا الحديث، وللحديث أسانيد أخرى سيأتي بعضها في كتاب الجهاد.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি এক সফরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম। একদিন সকালে পথ চলার সময় আমি তাঁর কাছাকাছি হলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে এমন একটি আমলের কথা বলে দিন, যা আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে এবং জাহান্নাম থেকে দূরে রাখবে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তুমি তো একটি বিরাট (গুরুত্বপূর্ণ) বিষয় সম্পর্কে প্রশ্ন করেছ। আর এটি তার জন্য সহজ, যার জন্য আল্লাহ তা সহজ করে দেন। (তা হলো:) তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না; সালাত প্রতিষ্ঠা করবে; যাকাত দেবে; রমযানে সাওম (রোযা) পালন করবে এবং বাইতুল্লাহর হজ্জ করবে।’ এরপর তিনি বললেন: ‘আমি কি তোমাকে কল্যাণের দুয়ারগুলো সম্পর্কে বলে দেব না? সাওম (রোযা) হলো ঢালস্বরূপ, আর সদকা (দান) গুনাহকে এমনভাবে মিটিয়ে দেয় যেমন পানি আগুনকে নিভিয়ে দেয়। আর রাতের মধ্যভাগে কোনো ব্যক্তির সালাত (নামাজ)।’ তিনি বললেন: এরপর তিনি এই আয়াতগুলো তিলাওয়াত করলেন: {تَتَجَافَى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ} [অর্থাৎ—তাদের পার্শ্বদেশ শয্যা থেকে বিচ্ছিন্ন থাকে]... থেকে {يَعْمَلُونَ} [অর্থাৎ—তারা যা করে] পর্যন্ত (সূরা আস-সাজদাহ: ১৬-১৭)। এরপর তিনি বললেন: ‘আমি কি তোমাকে সব বিষয়ের মূল, তার স্তম্ভ এবং তার সর্বোচ্চ শিখর সম্পর্কে অবহিত করব না?’ আমি বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি বললেন: ‘বিষয়টির মূল হলো ইসলাম, তার স্তম্ভ হলো সালাত এবং তার সর্বোচ্চ শিখর হলো জিহাদ।’ এরপর তিনি বললেন: ‘আমি কি তোমাকে এই সবকিছুর নিয়ন্ত্রক সম্পর্কে অবহিত করব না?’ আমি বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর নবী! অতঃপর তিনি তাঁর জিহ্বা ধরে বললেন: ‘এটাকে সংযত রাখো।’ আমি বললাম: হে আল্লাহর নবী! আমরা কি আমাদের কথার জন্যেও পাকড়াও হবো? তিনি বললেন: ‘মু’আয! তোমার মা তোমাকে হারিয়ে ফেলুক! (আশ্চর্যবোধক বাক্য) মানুষকে কি তাদের মুখের উপর ভর করে—অথবা তাদের নাকের উপর ভর করে— জাহান্নামে নিক্ষেপ করে শুধু তাদের জিহ্বার ফসল ছাড়া অন্য কিছু?’









আল-জামি` আল-কামিল (59)


59 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تدخلون الجنّة حتى تؤمنوا، ولا تؤمنوا حتى تحابُّوا. أولا أدلكم على شيء إذا فعلتموه تحاببتم؟ أفشُوا السّلام بينكم".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (54) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا أبو معاوية، ووكيع،
عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وفي رواية جرير عن الأعمش:"والذي نفسي بيده لا تدخلون الجنّة حتى تؤمنوا" بمثل حديث أبي معاوية ووكيع.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারবে না, যতক্ষণ না তোমরা ঈমান আনো। আর তোমরা ঈমানদার হতে পারবে না, যতক্ষণ না তোমরা একে অপরকে ভালোবাসো। আমি কি তোমাদের এমন একটি বিষয় বলে দেব না, যা তোমরা করলে একে অপরকে ভালোবাসতে শুরু করবে? তোমরা নিজেদের মধ্যে সালাম (বিনিময়) ব্যাপকভাবে প্রচার করো।









আল-জামি` আল-কামিল (60)


60 - عن أبي هريرة، قال: قلت: يا رسول اللَّه، إني إذا رأيتُك طابتْ نفسي، وقرَّتْ عيني، فأنبئني عن كلّ شيء، فقال:"كلُّ شيء خلق من ماء". قال: قلت: أنبئني عن أمر إذا أخذتُ به دخلتُ الجنّة، قال:"أفْشِ السّلام، وأطعم الطّعام، وصِل الأرحام، وقُمْ باللّيل والناس نيام، ثم ادخل الجنّة بسلام".

صحيح: رواه الإمام أحمد (7932)، وصحّحه ابن حبان (508)، والحاكم (4/ 160) كلهم من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، عن أبي ميمون، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، ورجاله رجال الشيخين غير أبي ميمونة، وهو الفارسيّ المدنيّ الأبار، وثّقه النسائيّ والعجليّ وغيرهما، وهو من رجال السنن.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (5/ 16) وقال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح خلا أبا ميمونة وهو ثقة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি যখন আপনাকে দেখি, তখন আমার মন সন্তুষ্ট হয়ে যায় এবং চোখ শীতল হয়। আপনি আমাকে সবকিছু সম্পর্কে বলুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “প্রত্যেক জিনিস পানি থেকে সৃষ্টি করা হয়েছে।” তিনি বললেন: আমি বললাম, আমাকে এমন একটি আমল সম্পর্কে বলুন, যা আমি গ্রহণ করলে জান্নাতে প্রবেশ করতে পারব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সালামের প্রসার ঘটাও, (ক্ষুধার্তকে) খাবার দাও, আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখো, আর মানুষ যখন ঘুমিয়ে থাকে, তখন রাতে সালাত (নামাজ) আদায় করো। তাহলে শান্তির সাথে জান্নাতে প্রবেশ করবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (61)


61 - عن عبد اللَّه بن عمرو، قال: قال رسول اللَّه:"اعبدوا الرحمن، وأفشوا السّلام، وأطعموا الطّعام تدخلون الجنان".

صحيح: رواه الترمذيّ (1855) من طريق أبي الأحوص-، وابن ماجه (3694) من طريق محمد ابن فضيل-، والإمام أحمد (6587) من طريقين أبي عوانة وعبد الرزاق - وابن حبان في صحيحه (489، 507) من طريق جرير بن عبد الحميد-، وعبد بن حميد في المنتخب (355) من طريق زائدة ابن قدامة - كلّهم عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو. . . فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، وعطاء بن السائب ثقة، وثّقه الأئمة إلا أنه اختلط في آخره، ولكن رواية زائدة ابن قدامة كانت قبل اختلاطه.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা রহমানের (আল্লাহর) ইবাদত কর, সালামের প্রসার ঘটাও (অধিক পরিমাণে সালাম দাও), এবং (ক্ষুধার্তকে) খাদ্য দাও, তাহলে তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (62)


62 - عن عبد اللَّه بن سلام، قال: لما قدم رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم يعني المدينة انجفل الناس إليه، وقيل: قدم رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم فجئتُ في الناس أنظر إليه، فلما اسْتثبتُ وجهَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عرفتُ أنّ وجهه ليس بوجه كذّاب، وكان أوّل شيء تكلّم به أن قال:"يا أيُّها الناس، أفشوا السّلام، وأطعموا الطّعام، وصلّوا والناسُ نيام، تدخلوا الجنة بسلام".

صحيح: رواه الترمذيّ (1485)، وابن ماجه (1334)، وصحّحه الحاكم (3/ 13)، (4/ 159 - 160) كلهم من طريق عوف بن أبي جميلة، حدثنا زرارة ابن أبي أوفي، عن عبد اللَّه بن سلام،
فذكر الحديث. قال الترمذي:"حديث صحيح".

وقال الحاكم في الموضع الأول:"صحيح على شرط الشيخين"، وقال في الموضع الثاني:"صحيح الإسناد".

قلت: وهو كما قالوا، وسيأتي في قيام اللّيل.




আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় আগমন করলেন, তখন মানুষ তাঁর দিকে দ্রুত ছুটে গেল। বলা হতে লাগল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসেছেন। আমিও মানুষের সাথে তাঁকে দেখার জন্য গেলাম। যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা ভালোভাবে দেখলাম, তখন আমি চিনতে পারলাম যে তাঁর চেহারা কোনো মিথ্যাবাদীর চেহারা হতে পারে না। আর তিনি সর্বপ্রথম যে কথাটি বলেছিলেন, তা হলো: "হে লোক সকল, তোমরা সালামের ব্যাপক প্রচার করো, (ক্ষুধার্তকে) খাবার দাও, এবং যখন মানুষ ঘুমিয়ে থাকে, তখন তোমরা সালাত আদায় করো, তাহলে তোমরা নিরাপদে জান্নাতে প্রবেশ করতে পারবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (63)


63 - عن هانئ بن يزيد، أنه لما وفد إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم مع قومه، فسمعهم النبيُّ صلى الله عليه وسلم وهم يُكنّونه بأبي الحكم، فدعاه النبيّ فقال: إنّ اللَّه هو الحكم، وإليه الحُكم، فلِمَ تكنيتَ بأبي الحكم؟" قال: لا، ولكنّ قومي إذا اختلفوا في شيء أتوني فحكمتُ بينهم، فرضيَ كلا الفريقين. قال:"ما أحسن هذا!". ثم قال: ما لك من الولد؟". قلتُ: لي شريحٌ، وعبد اللَّه، ومسلمٌ بنو هانئ. قال:"فمن أكبرهم؟". قلت: شريح. قال:"فأنت أبو شريح"، ودعا له ولولده. وسمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم قومًا يسمُّون رجلًا منهم: عبد الحجر، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ما اسمُك؟" قال: عبد الحجر. قال:"لا، أنت عبد اللَّه" قال شريح: وإنّ هانئًا لما حضر رجوعُه إلى بلاده أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: أخبرني بأيّ شيء يُوجب لي الجنة؟ قال:"عليك بحسن الكلام، وبذل الطّعام".

حسن: رواه البخاريّ في الأدب المفرد (811)، وابن حبان (504)، وأبو داود (4955)، وابن حبان (490)، والحاكم (1/ 23)، والطبرانيّ في الكبير (22/ 180) كلّهم من طرق عن يزيد ابن المقدام بن شريح، عن أبيه المقدام، عن أبيه شريح، عن أبيه هانئ بن يزيد، فذكره.

واللفظ للبخاري وابن حبان في الموضع الأول، والآخرون اختصروه.

وإسناده حسن من أجل يزيد بن المقدام فإنه"صدوق". وصحّحه الحاكم.




হানী ইবনে ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি তাঁর সম্প্রদায়ের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে শুনতে পেলেন যে তারা তাঁকে 'আবুল হাকাম' নামে ডাকছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ডেকে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ই হলেন 'আল-হাকাম' (বিচারক), এবং তাঁর দিকেই বিচার (ফায়সালা) ফিরে যায়। তাহলে তুমি কেন 'আবুল হাকাম' উপনামটি গ্রহণ করলে?" তিনি (হানী) বললেন: "না, বরং আমার সম্প্রদায় যখন কোনো বিষয়ে মতভেদ করে, তখন তারা আমার কাছে আসে এবং আমি তাদের মধ্যে ফায়সালা করি। আর উভয় দলই তাতে সন্তুষ্ট হয়।" তিনি (নবী) বললেন: "এটা কতই না সুন্দর!" অতঃপর তিনি বললেন: "তোমার সন্তান কারা?" আমি বললাম: আমার সন্তান হলো শুরাইহ, আব্দুল্লাহ ও মুসলিম—যারা হানী-এর পুত্র। তিনি বললেন: "তাদের মধ্যে সবচেয়ে বড় কে?" আমি বললাম: শুরাইহ। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি আবু শুরাইহ।" আর তিনি তার এবং তার সন্তানদের জন্য দু'আ করলেন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সম্প্রদায়কে শুনতে পেলেন যে তারা তাদের এক ব্যক্তিকে 'আব্দুল হাজার' (পাথরের বান্দা) নামে ডাকছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার নাম কী?" সে বলল: আব্দুল হাজার। তিনি বললেন: "না, তুমি আব্দুল্লাহ (আল্লাহর বান্দা)।" শুরাইহ বললেন: হানী যখন নিজ দেশে ফিরে যাওয়ার জন্য প্রস্তুত হলেন, তখন তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: আমাকে এমন কিছু সম্পর্কে জানান, যার দ্বারা আমি জান্নাতের অধিকারী হতে পারি। তিনি বললেন: "তোমার জন্য আবশ্যক হলো উত্তম কথা বলা এবং খাদ্য দান করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (64)


64 - عن سعد بن أبي وقاص: أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أعطى رهطًا -وسعدٌ جالسٌ- فترك رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم رجلًا هو أعجبُهم إليَّ. فقلت: يا رسول اللَّه، مالك عن فلان؟ فواللَّه إنّي لأراهُ مؤمنًا. فقال:"أو مسلمًا" فسكتُ قليلًا، ثم غلبني ما أعلمُ منه فعدتُ لمقالتي فقلت: مالك عن فلان؟ فواللَّهِ إنّي لأراه مؤمنًا. فقال:"أو مسلمًا".
ثم غلبني ما أعلمُ منه فعدتُ لمقالتي، وعاد رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم. ثم قال:"يا سعد، إنّي لأعطي الرّجلَ وغيرُه أحبُّ إليّ منه، خشية أن يكبَّه اللَّهُ في النّار".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (27)، ومسلم في الإيمان (150) كلاهما من حديث الزهري، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن سعد. . . فذكر مثله.

قال الزّهريّ:"نرى أنّ الإسلام الكلمة، والإيمان العمل" ذكره ابن حبان في صحيحه (163).

والإسلام إذا أطلق إطلاقًا حقيقيًّا شرعيًّا فيرادف الإيمان، لقوله تعالى: {إِنَّ الدِّينَ عِنْدَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ} [سورة آل عمران: 19]، وكقوله تعالى: {وَمَنْ يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَنْ يُقْبَلَ مِنْهُ} [سورة آل عمران: 85].

وإذا أطلق إطلاقًا لغويًّا فيرادف الانقياد والاستسلام أي خوفًا من السّيف، كقوله تعالى: {قُلْ لَمْ تُؤْمِنُوا وَلَكِنْ قُولُوا أَسْلَمْنَا} [سورة الحجرات: 14].

وفيه ردٌّ على غلاة المرجئة في اكتفائهم في الإيمان بنطق اللسان.

وفيه ترك القطع بالإيمان الكامل لمن لم ينص عليه، وأما منع القطع بالجنّة فلا يؤخذ من هذا صريحًا. انظر للمزيد"فتح الباري" (1/ 79).

وفي الباب ما روي عن أنس قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"الإسلام علانية، والإيمان في القلب" قال: ثم يشير إلى صدره ثلاث مرات. قال: ثم يقول:"التقوى هاهنا، التقوى هاهنا".

رواه الإمام أحمد (12381)، وأبو يعلى (2923)، والبزار -كشف الأستار (20) - كلهم من طريق علي بن مسعدة، حدثنا قتادة، عن أنس. . . فذكر مثله.

قال البزار: تفرد به علي بن مسعدة.

قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 52): رواه أحمد، وأبو يعلى بتمامه، والبزار باختصار، ورجاله رجال الصحيح ما خلا علي بن مسعدة، وقد وثقه ابن حبان وأبو داود الطيالسي وأبو حاتم وابن معين، وضعفه آخرون".




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদল লোককে (কিছু দান) দিলেন – আর সা'দও সেখানে উপবিষ্ট ছিলেন – কিন্তু আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন একজন ব্যক্তিকে বাদ দিলেন, যে ছিল আমার কাছে তাদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়। আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল, অমুক ব্যক্তিকে কী হয়েছে? আল্লাহর শপথ, আমি তো তাকে মু'মিন হিসেবেই দেখি।' তিনি বললেন, "অথবা মুসলিম?" আমি কিছুক্ষণ চুপ রইলাম। এরপর তার সম্পর্কে আমার যে জ্ঞান ছিল তা আমাকে পুনরায় বলতে উৎসাহিত করল, তাই আমি আমার কথা আবার বললাম: 'অমুককে কী হয়েছে? আল্লাহর শপথ, আমি তো তাকে মু'মিন হিসেবেই দেখি।' তিনি বললেন, "অথবা মুসলিম?" এরপর (তৃতীয়বার) তার সম্পর্কে আমার জ্ঞান আমাকে আবার তার কাছে যেতে বাধ্য করল, আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও (একই জবাব) দিলেন। এরপর তিনি বললেন, "হে সা'দ! আমি কোনো ব্যক্তিকে দান করি, যদিও তার চেয়ে অন্য কেউ আমার কাছে বেশি প্রিয়; (আমি এই দান করি) এই ভয়ে যে আল্লাহ তাকে জাহান্নামের আগুনে উপুড় করে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (65)


65 - عن قلت: ضعّفه البخاريّ، وأبو داود، والنسائيّ، والعقيليّ، وابن عدي، وغيرهم.

ولم أجده في النسخة المطبوعة من الثقات لابن حبان، ولم ينسبه إليه الحافظ ابن حجر في التهذيب، بل ذكره ابن حبان في المجروحين (684) وقال:"كان ممن يخطئ على قلة روايته، وينفرد بما لا يتابع عليه، فاستحق ترك الاحتجاج به لِما لا يوافق الثقات من الأخبار" ثم أورد الحديث المذكور.

فلعل الحافظ الهيثمي رحمه الله التبس عليه برجل بآخر؛ والحاصل أنه ضعيف.

وأما قوله:"التقوى ههنا" فهو ثابت في حديث آخر رواه أبو هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تحاسدوا، ولا تناجشوا، ولا تباغضوا، ولا تدابروا، ولا يبع بعضُكم على بيع بعض، وكونوا
عباد اللَّه إخوانًا، المسلم أخو المسلم، لا يظلمه ولا يخذُلُه ولا يحقره، التقوى ههنا" ويشير إلى صدره ثلاث مرات". ثم ذكر بقية الأحاديث.

رواه مسلم في كتاب البر والصلة (2564)، وسيأتي في موضعه كاملًا.




৬৫ - [এই রাবী] সম্পর্কে আমি বলি: তাকে বুখারী, আবূ দাউদ, নাসাঈ, উকাইলী, ইবনু আদী এবং অন্যান্যরা দুর্বল বলেছেন। আমি ইবনু হিব্বানের ‘কিতাবুস সিক্বাত’-এর মুদ্রিত সংস্করণে তাকে পাইনি। হাফিয ইবনু হাজার ‘আত-তাহযীব’-এ তাকে ইবনু হিব্বানের দিকে সম্বন্ধযুক্ত করেননি, বরং ইবনু হিব্বান তাকে ‘আল-মাজরূহীন’ (৬৮৪)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: “সে ছিল এমন একজন যে স্বল্প সংখ্যক বর্ণনা সত্ত্বেও ভুল করত এবং এমন কিছু বর্ণনা করত যা অন্যেরা সমর্থন করত না। ফলে সে নির্ভরযোগ্য রাবীদের সংবাদের সাথে যা মিলে না, সেগুলোর কারণে তাকে দলীল হিসেবে বর্জন করার উপযুক্ত।” এরপর উল্লেখিত হাদীসটি তিনি এনেছেন। সম্ভবত হাফিয হাইসামী (রহিমাহুল্লাহ)-এর অন্য কারো সাথে এই ব্যক্তির নাম নিয়ে বিভ্রান্তি হয়েছিল; সারকথা হলো, সে দুর্বল।

আর তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) এই উক্তি, ‘তাকওয়া (খোদাভীতি) হলো এখানে’— এটি অন্য এক হাদীসে প্রমাণিত যা **আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত**, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা একে অপরের প্রতি হিংসা করো না, (দাম বাড়ানোর উদ্দেশ্যে) প্রতারণামূলক দর হাঁকো না, একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করো না, একে অপরের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়ো না, আর তোমাদের কেউ যেন অন্যের বেচাকেনার উপর বেচাকেনা না করে। হে আল্লাহর বান্দাগণ! তোমরা ভাই ভাই হয়ে যাও। মুসলিম মুসলিমের ভাই। সে তাকে যুলুম করে না, তাকে অপমান করে না এবং তাকে তুচ্ছজ্ঞান করে না। তাকওয়া হলো এখানে।" - এই বলে তিনি তিনবার নিজের বুকের দিকে ইঙ্গিত করলেন। অতঃপর তিনি অবশিষ্ট হাদীসগুলো উল্লেখ করলেন। ইমাম মুসলিম এটিকে কিতাবুল বির ওয়া সিলার (সদাচরণ ও আত্মীয়তার সম্পর্ক) মধ্যে বর্ণনা করেছেন (২৫৬৪), এবং এটি যথাস্থানে সম্পূর্ণভাবে আসবে।









আল-জামি` আল-কামিল (66)


66 - عن عبادة بن الصامت، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من شهد أن لا إله إلّا اللَّه وحده لا شريك له، وأنّ محمدًا عبدُه ورسولُه، وأنّ عيسى عبد اللَّه ورسوله، وكلمته ألقاها إلى مريم وروح منه، والجنّة حقّ، والنّار حقّ، أدخله اللَّه الجنّة على ما كان من العمل".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3435) عن صدقة بن الفضل، حدثنا الوليد، عن الأوزاعي، قال: حدثني عمير بن هانئ، قال: حدثني جنادة بن أبي أمية، عن عبادة. . . فذكره.

ورواه مسلم في الإيمان (28) من وجه آخر عن الوليد بن مسلم، عن ابن جابر، قال: حدثني عمير بن هانئ بإسناده، وزاد:"وأدخله اللَّه من أي أبواب الجنة الثمانية شاء".

وقد أشار البخاريّ إلى هذه الرواية وفيه: قال الوليد: حدثني ابن جابر.

وفي بقية الإسناد عنعن فيه.

ورواه مسلم من وجه آخر عن الصُّنابحيّ، عن عبادة بن الصّامت أنه قال:

دخلتُ عليه وهو في الموت، فبكيتُ فقال: مهلا لا تبكي! فواللَّه لئن استشهدتُ لأشهدنّ لك، ولئن شُفِّعتُ لأشفنّ لك، ولئن أستطعتُ لأنفعنَّك ثم قال: واللَّه ما من حديث سمعته من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لكم فيه خير إلّا حدّثتكموه إلا حديثًا واحدًا. وسوف أحدثكموه اليوم، وقد أحيط بنفسي. سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من شهد أن لا إله إلا اللَّه، وأنّ محمدًا رسول اللَّه، حرّم عليه النار".




উবাদা ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেছেন: “যে ব্যক্তি সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো অংশীদার নেই, আর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল, আর ঈসা (আঃ) আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল, এবং তিনি মারইয়ামের প্রতি যে বাণী নিক্ষেপ করেছেন ও তাঁর পক্ষ থেকে একটি রূহ (সত্তা), আর জান্নাত সত্য, জাহান্নাম সত্য—আল্লাহ তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন, তার আমল যেমনই হোক না কেন।”

মুত্তাফাকুন আলাইহি।

মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে যে: “আর আল্লাহ তাকে জান্নাতের আটটি দরজার যে কোনোটি দিয়ে প্রবেশ করাবেন, যা সে চাইবে।”

মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় উবাদা ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি (সুনাবিহী) বলেন: আমি তাঁর নিকট গেলাম যখন তিনি মৃত্যুশয্যায় ছিলেন। তখন আমি কাঁদতে শুরু করলাম। তিনি বললেন: শান্ত হও, কেঁদো না! আল্লাহর শপথ! যদি আমাকে সাক্ষী বানানো হয় তবে আমি অবশ্যই তোমার জন্য সাক্ষ্য দেবো, আর যদি আমাকে শাফা‘আত করার সুযোগ দেওয়া হয়, তবে অবশ্যই আমি তোমার জন্য শাফা‘আত করব, আর যদি আমার সাধ্য থাকে তবে অবশ্যই আমি তোমাকে উপকার করব। এরপর তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে তোমাদের কল্যাণের জন্য আমি এমন কোনো হাদীস শুনিনি যা তোমাদের কাছে বলিনি, শুধু একটি হাদীস ছাড়া। আজ আমি তোমাদেরকে তা বলব, অথচ আমার রূহ বের হওয়ার উপক্রম হয়েছে। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল—আল্লাহ তার জন্য জাহান্নাম হারাম করে দেবেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (67)


67 - عن معاذ بن جبل قال: بينا أنا رديفُ النبيّ صلى الله عليه وسلم ليس بيني وبينه إلّا آخرة الرّحل فقال:"يا معاذ" قلت: لبيك رسول اللَّه وسعديك. ثم سار ساعة ثم قال:"يا معاذ" قلت: لبيك رسول اللَّه وسعديك. ثم سار ساعة، ثم قال:"يا معاذ" قلت: لبيك رسول اللَّه وسعديك. قال:"هل تدري ما حقّ اللَّه على عباده؟" قلت: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"حقّ اللَّه على عباده أن يعبدوه ولا يشركوا به شيئًا". ثم سار ساعةً، ثم قال:"يا معاذ بن جبل". قلت: لبيك رسول اللَّه وسعديك، فقال:"هل تدري ما حقّ العباد على اللَّه إذا فعلوا؟" قلت: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"حقّ العباد على اللَّه أن لا يعذّبهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (5967)، وفي الرقاق (6500)، ومسلم في الإيمان (30)
كلاهما عن هدّاب بن خالد الأزديّ، حدثنا همام، حدثنا قتادة، حدثنا أنس بن مالك، عن معاذ بن جبل، فذكره، ولفظهما سواء.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সওয়ারীতে আরোহী ছিলাম, আমার ও তাঁর মাঝে কেবল হাওদার পেছনের কাঠের অংশটি ছাড়া আর কিছু ছিল না। অতঃপর তিনি বললেন, “হে মু’আয!” আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার খেদমতে হাযির এবং আমি আপনার সৌভাগ্য কামনা করি। এরপর তিনি কিছুক্ষণ চললেন। তারপর আবার বললেন, “হে মু’আয!” আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার খেদমতে হাযির এবং আমি আপনার সৌভাগ্য কামনা করি। এরপর তিনি কিছুক্ষণ চললেন। তারপর আবার বললেন, “হে মু’আয!” আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার খেদমতে হাযির এবং আমি আপনার সৌভাগ্য কামনা করি। তিনি বললেন, “তুমি কি জানো, বান্দাদের উপর আল্লাহর কী হক?” আমি বললাম, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন, “বান্দাদের উপর আল্লাহর হক হলো, তারা একমাত্র তাঁরই ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকেই শরীক করবে না।” অতঃপর তিনি কিছুক্ষণ চললেন, তারপর বললেন, “হে মু’আয ইবনু জাবাল!” আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার খেদমতে হাযির এবং আমি আপনার সৌভাগ্য কামনা করি। তখন তিনি বললেন, “তারা যখন এই কাজ করবে, তখন আল্লাহর উপর বান্দাদের কী হক রয়েছে, তা কি তুমি জানো?” আমি বললাম, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন, “আল্লাহর উপর বান্দাদের হক হলো, তিনি তাদেরকে শাস্তি দেবেন না।”