হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4868)


4868 - عن وَبَرَة، قال: كُنْتُ جَالِسًا عِنْدَ ابْنِ عُمَر، فَجَاءَهُ رَجُلٌ فَقَال: أَيَصْلُحُ لِي أَنْ أَطُوفَ بِالْبَيْتِ قَبْلَ أَنْ آتِيَ الْمَوْقِفَ؟ فَقَال: نَعَمْ. فَقَال: فَإِنَّ ابْنَ عَبَّاسٍ يَقُولُ: لا تَطُفْ بِالْبَيْتِ حَتَّى تَأْتِيَ الْمَوْقِفَ؟ فَقَالَ ابْنُ عُمَرَ: فَقَدْ حَجَّ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَطَافَ بِالْبَيْتِ قَبْلَ أَنْ يَأْتِيَ الْمَوْقِفَ، فَبِقَوْلِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَحَقُّ أَنْ تَأْخُذَ أَوْ بِقَوْلِ ابْنِ عَبَّاسٍ إِنْ كُنْتَ صَادِقًا؟ ! .

صحيح: رواه مسلمٌ في الحجّ (1233) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن وَبَرة (وهو ابن عبد الرحمن المسْليّ)، به، فذكره.

ورواه من طريق بيان (هو ابن بشر الأحمسي) عن وبرة قال: سَأَلَ رَجُلٌ ابْنَ عُمَرَ رضي الله عنهما أَطُوفُ بِالْبَيْتِ وَقَدْ أَحْرَمْتُ بِالْحَجِّ؟ فَقَال: وَمَا يَمْنَعُكَ؟ قَال: إِنِّي رَأَيْتُ ابْنَ فُلانٍ يَكْرَهُهُ، وَأَنْتَ أَحَبُّ إِلَيْنَا مِنْهُ رَأَيْنَاهُ قَدْ فَتَنَتْهُ الدُّنْيَا! ، فَقَال: وَأَيُّنَا أَوْ أَيُّكُمْ لَمْ تَفْتِنْهُ الدُّنْيَا؟ ثُمَّ قَالَ: رَأَيْنَا رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَحْرَمَ بِالْحَجِّ، وَطَافَ بِالْبَيْتِ، وَسَعَى بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ؛ فَسُنَّةُ اللهِ وَسُنَّةُ رَسُولِهِ صلى الله عليه وسلم أَحَقُّ أَنْ تَتَّبِعَ مِنْ سُنَّةِ فُلانٍ إِنْ كُنْتَ صَادِقًا.

قلت: وما نسبه السائل لابن عباس، فالظّاهر منه أنه يريد بالطّواف طواف الإفاضة؛ لأنه لا يخفى على مثله طواف رسول الله صلى الله عليه وسلم بالبيت أوّل قدومه إلى مكة في حجّة الوداع، وقد كان طاف معه كما في الصّحيحين.




ওবারাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট বসা ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বলল: আরাফাতের অবস্থানস্থলে (মাওকিফে) যাওয়ার পূর্বে কি আমার জন্য বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করা সঠিক হবে? তিনি বললেন: হ্যাঁ। লোকটি বলল: কিন্তু ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো বলেন, আপনি আরাফাতের অবস্থানস্থলে না যাওয়া পর্যন্ত বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করবেন না। তখন ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো হজ্জ করেছিলেন এবং তিনি মাওকিফে (আরাফাতে) যাওয়ার পূর্বেই বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করেছিলেন। যদি তুমি সত্যবাদী হও, তবে তোমার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা অনুসরণ করা অধিক হক্ব (উচিত), নাকি ইবনে আব্বাসের কথা?

সহীহ: এটি মুসলিম 'কিতাবুল হজ্জ'-এ (১২৩৩) ইসমাঈল ইবনু আবী খালিদ হতে, তিনি ওবারাহ (আল-মুসলী) হতে বর্ণনা করেছেন।

এবং এটি [মুসলিম] বর্ণনা করেছেন بيان ইবনু বিশর আল-আহমাসীর সূত্রে, তিনি ওবারাহ হতে বর্ণনা করেন যে, এক ব্যক্তি ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করল: আমি হজ্জের ইহরাম বেঁধেছি, এখন কি আমি বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করব? তিনি বললেন: তোমাকে কিসে বাধা দিচ্ছে? লোকটি বলল: আমি অমুককে দেখেছি যে, তিনি এটিকে অপছন্দ করেন। আর আপনি তার চেয়ে আমাদের কাছে বেশি প্রিয়—আমরা তো দেখেছি, দুনিয়া তাকে প্রলুব্ধ করেছে! তখন ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমাদের মধ্যে কে, কিংবা তোমাদের মধ্যে কে আছে যাকে দুনিয়া প্রলুব্ধ করেনি? অতঃপর তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি হজ্জের ইহরাম বাঁধলেন, বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করলেন এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করলেন। অতএব, যদি তুমি সত্যবাদী হও, তবে আল্লাহর সুন্নাহ এবং তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুন্নাহ অনুসরণ করা অন্যের সুন্নাহ অনুসরণ করার চেয়ে অধিক হক্ব (উচিত)।









আল-জামি` আল-কামিল (4869)


4869 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه قال: طُفْتُ مَعَ عبد الله بن عمرو بن العاص فَلَمَّا جِئْنَا دُبُرَ الْكَعْبَةِ، قُلْتُ: أَلا تَتَعَوَّذُ؟ قَالَ: نَعُوذُ بِاللهِ مِن النَّارِ، ثُمَّ مَضَى حَتَّى اسْتَلَمَ الْحَجَرَ، وَأَقَامَ بَيْنَ الرُّكْنِ وَالْبَابِ فَوَضَعَ صَدْرَهُ وَوَجْهَهُ وَذِرَاعَيْهِ وَكَفَّيْهِ هَكَذَا وَبَسَطَهُمَا بَسْطًا، ثُمَّ قَال: هَكَذَا رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَفْعَلُهُ.

حسن: رواه أبو داود (1899) من طريق عيسي بن يونس، وابن ماجه (2962) من طريق عبد الرزاق - كلاهما عن المثنى بن الصباح، قال: حدّثني عمرو بن شعيب، به، فذكره، واللفظ لأبي داود.

وفي لفظ ابن ماجه، قال: طفتُ مع عبد الله بن عمرو، فلما فرغنا من السّبع ركعنا في دبر
الكعبة، فقلت: (فذكره).

ووقع عنده: عن أبيه، عن جدّه. وهو الصّواب في حديث عبد الرزاق كما في"مصنفه" (9043)، وكذلك رواه أيضًا الدارقطني.

ويؤيّد هذا ما رواه عبد الرزاق أيضًا عن ابن جريج قال: قال عمرو بن شعيب: طاف محمد -جدّه- مع أبيه عبد الله بن عمرو، فلما كان سبعها، قال محمد لعبد الله حيث يتعوّذون: فاستعذ، فقال عبد الله: أعوذ بالله من الشيطان، فلما استلم الرّكن تعوّذ بين الرّكن والباب، وألصق جبهته وصدره بالبيت ثم قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع ذلك.

وإسناده حسن، والمثنى بن الصبّاح ضعيف، ولكن يقويه الطريق الثاني طريق ابن جريج.

وقوله:"عن أبيه" قال المنذريّ في"المختصر":"هو شعيب بن محمد بن عبد الله بن عمرو، وقد سمع من عبد الله بن عمرو على الصّحيح، ووقع في كتاب ابن ماجه: عن أبيه، عن جدّه. فيكون شعيب ومحمد طافًا جميعا مع عبد الله".

قلت: وهو كما قال، فقد أخرج الأزرقي في"أخبار مكة" (1/ 349) من طريق ابن جريج، والمثنى بن الصبّاح، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، أنه قال:"طاف محمد بن عبد الله مع أبيه عبد الله بن عمرو" فذكره.

وفي الباب ما روي عن عبد الرحمن بن صفوان، قال:"لَمَّا فَتَحَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَكَّةَ قُلْتُ: لأَلْبَسَنَّ ثِيَابِي -وَكَانَتْ دَارِي عَلَى الطَّرِيقِ- فَلأَنْظُرَنَّ كَيْفَ يَصْنَعُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَانْطَلَقْتُ فَرَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَدْ خَرَجَ مِن الْكَعْبَةِ هُوَ وَأَصْحَابُهُ وَقَد اسْتَلَمُوا الْبَيْتَ مِن الْبَابِ إِلَى الْحَطِيمِ، وَقَدْ وَضَعُوا خُدُودَهُمْ عَلَى الْبَيْتِ، وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَسْطَهُمْ".

رواه أبو داود (1898)، والإمام أحمد (15552)، وصحّحه ابن خزيمة (3017) كلّهم من حديث جرير بن عبد الحميد، عن يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن صفوان، فذكره.

ويزيد بن أبي زياد هو الهاشميّ مولاهم، جمهور أهل العلم مطبقون على تضعيفه.

ومن نكارته سؤال عبد الرحمن بن صفوان لعمر بن الخطاب:"وكيف صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين دخل الكعبة؟ قال: صلّى ركعتين".

رواه أحمد (15553) من وجه آخر عن جرير، بإسناده.

ولم يرد في الرِّوايات الصّحيحة أن عمر كان ممن دخل البيت حتى يُسأل: كيف صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وفي الباب أيضًا عن ابن عباس قال: سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم رجلًا بين الباب والركن وهو يقول:"اللهم اغفر لفلان بن فلان، فقال:"ما هذا؟"، فقال: حملني رجل أن أدعو له ها هنا، فقال:"قد غُفر لصاحبك".

رواه الفاكهيّ في"أخبار مكة" (1/ 177) وفيه الحارث بن عمران الجعفري المدني، قال ابن
حبان:"كان يضع الحديث على الثقات"، وقال الدارقطني:"متروك"، وهو من رجال"التهذيب"، قال الحافظ في"التقريب":"ضعيف".

وكذلك لا يصح ما روي عن محمد بن عبد الله بن السائب، عن أبيه أنه كان يقود ابن عباس، فيقيمه عند الشّقة الثالثة مما يلي الرّكن الذي يلي الحجر مما يلي الباب، فيقول له ابنُ عباس:"أُنبئت أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصلي هنا؟ فيقول: نعم. فيقوم فيصلي".

رواه أبو داود (1900)، والنسائي (2921) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، حدّثنا السائب بن عمرو المخزوميّ، حدثني محمد بن عبد الله بن السائب، فذكره. ومحمد هذا مجهول، قاله أبو حاتم.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما بين الركن والباب ملتزم من دعا مِنْ ذي حاجة أو كربة أو ذي غمّة فرّج عنه بإذن الله".

رواه الطبرانيّ في"الكبير" (11/ 321)، وابن عدي في"الكامل" واللفظ له. وفيه عباد بن كثير الثقفيّ البصريّ متروك. قال أحمد:"روى أحاديث كذب". وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 246).

وروي عن ابن عباس بأسانيد أخرى كلّها هالكة. وروي عنه موقوفًا بإسناد صحيح.

رواه عبد الرزاق (9047) عن ابن عيينة، عن عبد الكريم الجزريّ، عن مجاهد، قال: قال ابن عباس:"هذا الملتزم بين الركن والباب".

وروى عبد الرزاق (9045) بسند صحيح عن مجاهد قال:"جئتُ ابن عباس وهو يتعوّذ بين الرّكن والباب".

ورواه البيهقي (5/ 164) من حديث أبي الزبير عنه: أنه كان يلزم ما بين الركن والباب، ويقول:"ما بين الركن والباب يدعى الملتزم لا يلزم ما بينهما أحدٌ يسأل الله شيئًا إلّا أعطاه إياه".

قال النوويّ في"المجموع" (8/ 261):"رواه البيهقيّ موقوفًا على ابن عباس بإسناد ضعيف" ثم قال:"وقد سبق مرّات أن العلماء متفقون على التّسامح في الأحاديث الضّعيفة في فضائل الأعمال ونحوها مما ليس في الأحكام" انتهى.

ورُوي عن هشام بن عروة، عن أبيه:"أنه كان يلصق بالبيت صدره ويده وبطنه".

وقال منصور: سألت مجاهدًا: إذا أردت الوداعَ كيف أصنع؟ قال:"تطوف بالبيت سبعًا، وتصلي ركعتين خلف المقام، ثم تأتي زمزم فتشرب من مائها، ثم تأتي الملتزم ما بين الحجر والباب، فتستلمه، ثم تدعو، ثم تسألُ حاجتك، ثم تستلم الحجر وتنصرف".

واستحبّ الشافعيّ للحاج إذا طاف للوداع أن يأتي الملتزم فيلصق بطنه وصدره بحائط البيت ويبسط يديه على الجدار، فيجعل اليمني مما يلي الباب، واليسرى مما يلي الحجر الأسود، ويدعو بما أحبّ من أمر الدنيا والآخرة.
قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله في"مجموع الفتاوى" (26/ 142 - 143):"إن أحبَّ أن يأتي الملتزم وهو ما بين الحجر الأسود والباب، فيضع عليه صدره ووجهه وذراعيه وكفيه، ويدعو، ويسأل الله تعالي حاجته فَعَلَ ذلك. وله أن يفعل ذلك قبل طواف الوداع؛ فإنّ هذا الالتزام لا فرق بين أن يكون حال الوداع أو غيره. والصحابة كانوا يفعلون ذلك حين يدخلون مكة" إلى أن قال:"ولو وقف عند الباب ودعا هناك من غير التزام للبيت كان حسنًا".

واختلف عن ابن عمر رضي الله عنهما: هل كان يلزم شيئًا من البيت؟ فالصّحيح الذي رواه عبد الرزاق (9051) عن معمر، عن أيوب، عن نافع، عنه:"أنه ما كان يلزم شيئًا من البيت".

وما رواه عبد الرزاق (9050) عن ابن جريج، قال: حُدِّثتُ عن ابن عمر:"أنه كان يتعوّذ بين الرّكن والباب" ففيه انقطاع.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা (শুআইব) বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তাওয়াফ করছিলাম। যখন আমরা কা'বার পেছনের দিকে এলাম, তখন আমি বললাম: আপনি কি (আল্লাহর কাছে) আশ্রয় চাইবেন না? তিনি বললেন: আমরা জাহান্নামের আগুন থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। এরপর তিনি চললেন, এমনকি হাজরে আসওয়াদ চুম্বন করলেন, এবং রুকন (হাজরে আসওয়াদ) ও দরজা (কা'বার প্রবেশপথ)-এর মধ্যবর্তী স্থানে দাঁড়ালেন। অতঃপর তিনি তাঁর বুক, মুখমণ্ডল, দুই বাহু এবং দুই হাতের তালু সেখানে এভাবে রাখলেন এবং সেগুলোকে উত্তমরূপে বিছিয়ে দিলেন। এরপর বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবে করতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (4870)


4870 - عن عائشة، قالت: سَأَلْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَن الْجَدْرِ أَمِن الْبَيْتِ هُو؟ قَال:"نَعَمْ". قُلْتُ: فَلِمَ لَمْ يُدْخِلُوهُ فِي الْبَيْتِ؟ قَالَ:"إِنَّ قَوْمَكِ قَصَّرَتْ بِهِمُ النَّفَقَةُ". قُلْتُ: فَمَا شَأْنُ بَابِهِ مُرْتَفِعًا؟ قَالَ:"فَعَلَ ذَلِك قَوْمُكِ لِيُدْخِلُوا مَنْ شَاءُوا وَيَمْنَعُوا مَنْ شَاءُوا، وَلَوْلا أَنَّ قَوْمَكِ حَدِيثٌ عَهْدُهُمْ فِي الْجَاهِلِيَّةِ؛ فَأَخَافُ أَنْ تُنْكِرَ قُلُوبُهُمْ لَنَظَرْتُ أَنْ أُدْخِلَ الْجَدْرَ فِي الْبَيْتِ، وَأَنْ أُلْزِقَ بَابَهُ بِالأَرْضِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1584)، ومسلم في الحج (1333: 405) كلاهما من حديث أبي الأحوص، حدّثنا أشعث بن أبي الشّعثاء، عن الأسود بن يزيد، عن عائشة، فذكرته.

والجدْر: هو حِجْر الكعبة، يوضِّح ذلك ما رواه مسلم بعده من وجه آخر عن شيبان، عن أشعث بن أبي الشعثاء، وفيه:"سَأَلْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَن الْحِجْرِ"، وَسَاقَ الْحَدِيثَ بِمَعْنَى حَدِيثِ أَبِي الأَحْوَص.



ابن معين أنه قال: ليس بشيء.

وقال عن سليم بن مسلم:"قد تبرأنا من عهدته".

قلت: سعيد بن سالم القداح هذا قد اضطرب في متن الحديث، فرواه الأزرقي عن جدّه كما سبق.

ورواه الحارث بن أبي أسامة في مسنده -بغية الباحث (392) - عن شيخه أبي عبد الله أحمد بن يزيد من أهل كرمان، ثنا سعيد بإسناده، وفيه:"ستون منها للطائفين، وعشرون منها لأهل مكة، وعشرون منها لسائر النّاس".

قال ابن الجوزي وغيره:"هذا حديث لا يصح". انظر: العلل المتناهية (2/ 573). وللحديث أسانيد أضعف من هذا والذي ذكرته هو أصحها.

وفي الباب أيضًا عن عبد الله بن عمرو بن العاص، وأبي هريرة، وأبي أمامة وغيرهم إلا أنها كلها ضعيفة. ذكر بعضها ابن الجوزي في العلل المتناهية، وبيّن عللها.

وأورد محبّ الطبريّ في كتابه"القرى" (ص 341) آثارًا عن الصحابة والتابعين بأنّ النّظر إلى الكعبة عبادة.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ‘আল-জাদর’ (হিজরে কা’বা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, এটা কি বায়তুল্লাহর অংশ? তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" আমি বললাম, তাহলে তারা কেন এটাকে (পুরোপুরি) ঘরের (কা'বার) ভেতরে প্রবেশ করালো না? তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই তোমার কওমের (কুরাইশদের) নিকট (পুনর্নির্মাণের সময়) অর্থ (নেফকা) কম পড়ে গিয়েছিল।" আমি বললাম, তাহলে এর দরজা এত উঁচু করার কারণ কী? তিনি বললেন, "তোমার কওম এটা করেছে যেন তারা যাকে ইচ্ছা প্রবেশ করাতে পারে এবং যাকে ইচ্ছা ফিরিয়ে দিতে পারে। আর যদি তোমার কওম জাহিলিয়াতের যুগ থেকে (ইসলাম গ্রহণের) একেবারে নতুন না হতো, যার ফলে আমি আশঙ্কা করছি যে তাদের অন্তরগুলো এটাকে অস্বীকার করবে, তবে আমি আল-জাদরকে ঘরের ভেতরে প্রবেশ করিয়ে দিতাম এবং এর দরজাটি মাটির সাথে মিশিয়ে দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (4871)


4871 - عن سعيد بن ميناء، قال: سمعتُ ابن الزبير يقول وهو على المنبر حين أراد أن يهدم الكعبة ويبنيها: حدّثتني عائشة خالتي، أنَّ رسُولَ الله صلى الله عليه وسلم قال لها:"يَا عَائِشَةُ! لَوْلا أَنَّ قَوْمَكِ حَدِيثُو عَهْدٍ بِشِرْكٍ لَهَدَمْتُ الْكَعْبَةَ فَأَلْزَقْتُهُا بِالأَرْضِ، وَجَعَلْتُ لَهَا بَابَيْنِ بَابًا شَرْقِيًّا وَبَابًا غَرْبِيًّا وَزِدْتُ فِيهَا سِتَّةَ أَذْرُعٍ مِن الْحِجْرِ فَإِنَّ قُرَيْشًا اقْتَصَرَتْهَا حَيْثُ بَنَت الْكَعْبَة".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1333: 401) عن محمد بن حاتم، حدّثني ابن مهدي، حدّثنا سليم بن حيان، عن سعيد بن ميناء، فذكره.

واللفظ لابن حبان (3818) من وجه آخر عن سليم بن حيان، فإنّ مسلمًا لم يذكر"على المنبر حين أراد أن يهدم الكعبة ويبنيها".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বলেন: "হে আয়িশা! যদি তোমার কওম শিরক থেকে সদ্য মুক্ত না হতো, তাহলে আমি কা'বাকে ভেঙে মাটির সাথে মিশিয়ে দিতাম, এবং তার জন্য দুটি দরজা তৈরি করতাম— একটি পূর্বমুখী ও অপরটি পশ্চিমমুখী। আর আমি হিজর (হাতিম)-এর ছয় হাত অংশ তার মধ্যে বাড়িয়ে দিতাম। কারণ, কুরাইশরা যখন কা'বা নির্মাণ করেছিল, তখন তারা (অর্থের অভাবে) তা সংক্ষিপ্ত করেছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (4872)


4872 - عن عطاء قال: لَمَّا احْتَرَقَ الْبَيْتُ زَمَنَ يَزِيدَ بْنِ مُعَاوِيَةَ حِينَ غَزَاهَا أَهْلُ الشَّامِ فَكَانَ مِنْ أَمْرِهِ مَا كَانَ، تَرَكَهُ ابْنُ الزُّبَيْرِ حَتَّى قَدِمَ النَّاسُ الْمَوْسِمَ يُرِيدُ أَنْ يُجَرِّئَهُمْ -أَوْ يُحَرِّبَهُمْ- عَلَى أَهْل الشَّامِ، فَلَمَّا صَدَرَ النَّاسُ، قَال: يَا أَيُّهَا النَّاسُ! أَشِيرُوا عَلَيَّ فِي الْكَعْبَةِ أَنْقُضُهَا ثُمَّ أَبْنِي بِنَاءَهَا أَوْ أُصْلِحُ مَا وَهَى مِنْهَا؟ .

قَالَ ابْنُ عَبَّاس: فَإِنِّي قَدْ فُرِقَ لِي رَأْيٌ فِيهَا، أَرَى أَنْ تُصْلِحَ مَا وَهَى مِنْهَا وَتَدَعَ
بَيْتًا أَسْلَمَ النَّاسُ عَلَيْهِ، وَأَحْجَارًا أَسْلَمَ النَّاسُ عَلَيْهَا، وَبُعِثَ عَلَيْهَا النِّبِيُّ صلى الله عليه وسلم.

فَقَالَ ابْنُ الزُّبَيْرِ: لَوْ كَانَ أَحَدُكُمْ احْتَرَقَ بَيْتُهُ مَا رَضِيَ حَتَّى يُجِدَّهُ فَكَيْفَ بَيْتُ رَبِّكُمْ؟ ! إِنِّي مُسْتَخِيرٌ رَبِّي ثَلاثًا ثُمَّ عَازِمٌ عَلَى أَمْرِي، فَلَمَّا مَضَى الثَّلاثُ أَجْمَعَ رَأْيَهُ عَلَى أَنْ يَنْقُضَهَا فَتَحَامَاهُ النَّاسُ أَنْ يَنْزِلَ بِأَوَّلِ النَّاسِ يَصْعَدُ فِيهِ أَمْرٌ مِن السَّمَاءِ، حَتَّى صَعِدَهُ رَجُلٌ فَأَلْقَى مِنْهُ حِجَارَةً، فَلَمَّا لَمْ يَرَهُ النَّاسُ أَصَابَهُ شَيْءٌ تَتَابَعُوا فَنَقَضُوهُ حَتَّى بَلَغُوا بِهِ الأَرْضَ، فَجَعَلَ ابْنُ الزُّبَيْرِ أَعْمِدَةً فَسَتَّرَ عَلَيْهَا السُّتُورَ حَتَّى ارْتَفَعَ بِنَاؤُهُ.

وَقَالَ ابْنُ الزُّبَيْرِ: إِنِّي سَمِعْتُ عَائِشَةَ تَقُولُ: إِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَال:"لَوْلا أَنَّ النَّاسَ حَدِيثٌ عَهْدُهُمْ بِكُفْرٍ، وَلَيْسَ عِنْدِي مِن النَّفَقَةِ مَا يُقَوِّي عَلَى بِنَائِهِ لَكُنْتُ أَدْخَلْتُ فِيهِ مِن الْحِجْرِ خَمْسَ أَذْرُعٍ، وَلَجَعَلْتُ لَهَا بَابًا يَدْخُلُ النَّاسُ مِنْهُ، وَبَابًا يَخْرُجُونَ مِنْهُ".

قَال: فَأَنَا الْيَوْمَ أَجِدُ مَا أُنْفِقُ وَلَسْتُ أَخَافُ النَّاسَ. قَال: فَزَادَ فِيهِ خَمْسَ أَذْرُعٍ مِن الْحِجْرِ حَتَّى أَبْدَى أُسًّا نَظَرَ النَّاسُ إِلَيْهِ، فَبَنَى عَلَيْهِ الْبِنَاءَ وَكَانَ طُولُ الْكَعْبَةِ ثَمَانِيَ عَشْرَةَ ذِرَاعًا، فَلَمَّا زَادَ فِيهِ اسْتَقْصَرَهُ فَزَادَ فِي طُولِهِ عَشْرَ أَذْرُعٍ، وَجَعَلَ لَهُ بَابَيْنِ أَحَدُهُمَا يُدْخَلُ مِنْهُ وَالآخَرُ يُخْرَجُ مِنْهُ.

فَلَمَّا قُتِلَ ابْنُ الزُّبَيْرِ كَتَبَ الْحَجَّاجُ إِلَى عبد الملك بْنِ مَرْوَانَ يُخْبِرُهُ بِذَلِكَ وَيُخْبِرُهُ أَنَّ ابْنَ الزُّبَيْرَ قَدْ وَضَعَ الْبِنَاءَ عَلَى أُسٍّ نَظَرَ إِلَيْهِ الْعُدُولُ مِنْ أَهْلِ مَكَّةَ، فَكَتَبَ إِلَيْهِ عبد الملك: إِنَّا لَسْنَا مِنْ تَلْطِيخِ ابْنِ الزُّبَيْرِ فِي شَيْءٍ! أَمَّا مَا زَادَ فِي طُولِهِ فَأَقِرَّهُ، وَأَمَّا مَا زَادَ فِيهِ مِن الْحِجْرِ فَرُدَّهُ إِلَى بِنَائِهِ، وَسُدَّ الْبَابَ الَّذِي فَتَحَهُ. فَنَقَضَهُ وَأَعَادَهُ إِلَى بِنَائِه".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1333: 402) عن هنّاد بن السّريّ، حدّثنا ابن أبي زائدة، أخبرني ابن أبي سليمان، عن عطاء قال (فذكره).




আতা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়াযিদ ইবনু মু'আবিয়ার (শাসন) আমলে যখন সিরিয়াবাসী মক্কা আক্রমণ করল এবং সে সময় যা ঘটবার তা ঘটল, তখন বায়তুল্লাহ (কা'বা শরীফ) পুড়ে গিয়েছিল। ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটিকে সেভাবেই ফেলে রাখলেন, যতক্ষণ না মানুষ হজ্জের মওসুমে মক্কায় আগমন করল। তিনি এর মাধ্যমে সিরিয়াবাসীর বিরুদ্ধে (মানুষকে) সাহস যোগাতে অথবা উত্তেজিত করতে চাচ্ছিলেন। যখন লোকেরা (হজ্জ শেষে) ফিরে গেল, তিনি বললেন: হে লোকসকল! কা'বা সম্পর্কে আমাকে পরামর্শ দিন, আমি কি এটিকে ভেঙে তার অবকাঠামো নতুন করে নির্মাণ করব, নাকি যা ক্ষতিগ্রস্ত হয়েছে কেবল তা মেরামত করব?

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এ ব্যাপারে আমার একটি সুচিন্তিত মতামত রয়েছে। আমি মনে করি, আপনি যা ক্ষতিগ্রস্ত হয়েছে তা মেরামত করুন এবং সেই ঘরকে (ঐ অবস্থায়) রেখে দিন, যার উপরে লোকেরা ইসলাম গ্রহণ করেছে, আর সেই পাথরগুলোকেও রেখে দিন, যার উপরে লোকেরা ইসলাম গ্রহণ করেছে এবং যার উপর ভিত্তি করে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরিত হয়েছেন।

তখন ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমাদের কারো ঘর পুড়ে গেলে সে তা সম্পূর্ণরূপে নতুন করে নির্মাণ না করা পর্যন্ত সন্তুষ্ট হবে না। সুতরাং তোমাদের রবের ঘরের ক্ষেত্রে কী অবস্থা?! আমি আমার রবের কাছে তিন দিনের জন্য ইস্তিখারা করছি, এরপর আমি আমার সিদ্ধান্ত কার্যকর করব। তিন দিন অতিবাহিত হওয়ার পর তিনি তা ভেঙে ফেলার সিদ্ধান্ত চূড়ান্ত করলেন।

লোকেরা ভয় পাচ্ছিল যে, প্রথম যে ব্যক্তি এর উপর উঠবে, আসমান থেকে তার উপর কোনো বিপদ নেমে আসে কিনা। অবশেষে একজন লোক উপরে উঠে সেখান থেকে কিছু পাথর ফেলে দিল। যখন লোকেরা দেখল যে তার কোনো ক্ষতি হয়নি, তখন তারা একে একে সবাই অংশ নিল এবং তারা (পুরাতন কা'বা) ভেঙে জমিন পর্যন্ত পৌঁছে দিল। এরপর ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খুঁটি স্থাপন করলেন এবং তার উপর পর্দা টাঙিয়ে দিলেন, যতক্ষণ না এর নির্মাণ কাজ উঁচু হলো।

ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি লোকেরা সদ্য কুফরী থেকে ফিরে না আসত এবং আমার কাছে এর নির্মাণ কাজ সম্পন্ন করার মতো পর্যাপ্ত অর্থ না থাকত, তবে আমি অবশ্যই 'হিজর' (হাতিম)-এর দিক থেকে পাঁচ হাত পরিমাণ কা'বার অন্তর্ভুক্ত করতাম এবং এর জন্য একটি দরজা রাখতাম যেখান দিয়ে মানুষ প্রবেশ করবে এবং অন্য একটি দরজা রাখতাম যেখান দিয়ে তারা বের হবে।"

তিনি (ইবনু যুবাইর) বললেন: আজ আমি (নির্মাণের জন্য) অর্থও পাচ্ছি এবং আমি মানুষকে ভয়ও করছি না। তিনি (আতা) বলেন: তিনি (ইবনু যুবাইর) 'হিজর' (হাতিম)-এর দিক থেকে পাঁচ হাত পরিমাণ বাড়িয়ে দিলেন, এমনকি লোকেরা যে ভিত্তিপ্রস্তর দেখতে পেল, তিনি তার উপরই নির্মাণ কাজ করলেন। কা'বার দৈর্ঘ্য ছিল আঠারো হাত। যখন তিনি এর দৈর্ঘ্য বাড়ালেন, তখন এটিকে (তুলনামূলকভাবে) খাটো মনে হলো। তাই তিনি এর দৈর্ঘ্যেও দশ হাত বাড়িয়ে দিলেন এবং এর জন্য দুটি দরজা করলেন—একটি দিয়ে প্রবেশ করা হতো এবং অন্যটি দিয়ে বের হওয়া হতো।

এরপর যখন ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিহত হলেন, তখন হাজ্জাজ বিন ইউসুফ আব্দুল মালিক ইবনু মারওয়ানের কাছে এ বিষয়ে চিঠি লিখলেন। তিনি তাকে অবহিত করলেন যে, ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কার বিশ্বস্ত লোকজনের দৃষ্টিতে আসা ভিত্তির উপর কা'বা নির্মাণ করেছেন। তখন আব্দুল মালিক তাকে লিখলেন: ইবনু যুবাইরের সংস্কারের সাথে আমাদের কোনো সম্পর্ক নেই। তবে তিনি এর দৈর্ঘ্যে যা বৃদ্ধি করেছেন, তা বহাল রাখো। আর 'হিজর' (হাতিম)-এর দিক থেকে যা কিছু বাড়ানো হয়েছে, তা পূর্বের কাঠামোতে ফিরিয়ে দাও এবং তিনি যে দরজাটি খুলেছিলেন, তা বন্ধ করে দাও। এরপর হাজ্জাজ তা ভেঙে ফেললেন এবং পূর্বের (কুরাইশদের) নির্মাণ কাঠামোতে ফিরিয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4873)


4873 - عن عبد الله بن عبيدٍ قال: وَفَدَ الْحَارِثُ بْنُ عبد الله عَلَى عبد الملك بْنِ مَرْوَانَ فِي خِلافَتِهِ، فَقَالَ عبد الملك: ما أَظُنُّ أَبَا خُبَيْبٍ -يَعْنِي ابْنَ الزُّبَيْرِ- سَمِعَ مِنْ عَائِشَةَ مَا كَانَ يَزْعُمُ أَنَّهُ سَمِعَهُ مِنْهَا! قَالَ الْحَارِثُ: بَلَى أَنَا سَمْعْتُهُ مِنْهَا.

قَال: سَمْعْتَهَا تَقُولُ مَاذَا؟ قَال: قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّ قَوْمَكِ اسْتَقْصَرُوا مِنْ بُنْيَانِ الْبَيْتِ وَلَوْلا حَدَاثَةُ عَهْدِهِمْ بِالشِّرْكِ أَعَدْتُ مَا تَرَكُوا مِنْهُ، فَإِنْ بَدَا لِقَوْمِكِ مِنْ بَعْدِي أَنْ يَبْنُوهُ فَهَلُمِّي لأُرِيَكِ مَا تَرَكُوا مِنْهُ". فَأَرَاهَا قَرِيبًا مِنْ سَبْعَةِ أَذْرُعٍ.

هَذَا حَدِيثُ عبد الله بْنِ عُبَيْدٍ، وَزَادَ عَلَيْهِ الْوَلِيدُ بْنُ عَطَاءٍ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"وَلَجَعَلْتُ
لَهَا بَابَيْنِ مَوْضُوعَيْنِ فِي الأَرْضِ شَرْقِيًّا وَغَرْبِيًّا. وَهَلْ تَدْرِينَ لِمَ كَانَ قَوْمُكِ رَفَعُوا بَابَهَا؟". قَالَتْ: قُلْتُ: لا، قَال:"تَعَزُّزًا أَنْ لا يَدْخُلَهَا إِلا مَنْ أَرَادُوا، فَكَانَ الرَّجُلُ إِذَا هُوَ أَرَادَ أَنْ يَدْخُلَهَا يَدَعُونَهُ يَرْتَقِي حَتَّى إِذَا كَادَ أَنْ يَدْخُلَ دَفَعُوهُ فَسَقَطَ". قَالَ عبد الملك لِلْحَارِثِ:"أَنْتَ سَمِعْتَهَا تَقُولُ هَذَا؟". قَال: نَعَمْ قَالَ: فَنَكَتَ سَاعَةً بِعَصَاهُ ثُمَّ قَالَ: وَدِدْتُ أَنِّي تَرَكْتُهُ وَمَا تَحَمَّلَ".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1333: 403) عن محمد بن حاتم، حدّثنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، قال: سمعت عبد الله بن عبيد بن عمير، والوليد بن عطاء يحدّثان عن الحارث ابن عبد الله بن أبي ربيعة، قال عبد الله بن عبيد:"وفد الحارث بن عبد الله على عبد الملك بن مروان في خلافته" فذكر بقية الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত।

আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইদ (রহ.) থেকে বর্ণিত, হারিস ইবনে আবদুল্লাহ খিলাফতের সময়ে আবদুল মালিক ইবনে মারওয়ানের নিকট আগমন করলেন। তখন আবদুল মালিক বললেন, আমার মনে হয় না যে আবূ খুবাইব—অর্থাৎ ইবনুয যুবাইর—আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সেই কথাগুলো শুনেছেন, যা তিনি শুনেছেন বলে দাবি করেন! হারিস বললেন, হ্যাঁ, আমি নিজেই তাঁর (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) থেকে তা শুনেছি।

(আবদুল মালিক) জিজ্ঞেস করলেন, আপনি তাঁকে কী বলতে শুনেছেন? হারিস বললেন, তিনি (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেছেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই তোমার কওম (কুরাইশ) কা'বার গৃহ নির্মাণে ঘাটতি করেছে। যদি তাদের শিরক হতে (ইসলাম গ্রহণের) যুগটা নিকটবর্তী না হতো, তবে আমি কা'বার যে অংশ তারা বাদ দিয়েছে, তা পুনরায় নির্মাণ করতাম। যদি আমার পরে তোমার কওম তা নির্মাণ করতে চায়, তবে তুমি এসো! আমি তোমাকে দেখিয়ে দিচ্ছি তারা কতটুকু অংশ বাদ দিয়েছে।” অতঃপর তিনি তাঁকে প্রায় সাত হাত পরিমাণ জায়গা দেখালেন।

এটি আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইদের বর্ণিত হাদীস। আর এর সাথে ওয়ালীদ ইবনে আতা যোগ করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আর আমি এর জন্য দু'টি দরজা তৈরি করে দিতাম, যা যমীনে স্থাপন করা থাকত – একটি পূর্ব দিকে এবং অপরটি পশ্চিম দিকে। তুমি কি জানো, তোমার কওম কেন এর দরজা উঁচু করেছিল?” তিনি (আয়িশা) বললেন, আমি বললাম: না। তিনি (নবী) বললেন: “অহংকারবশত, যাতে তারা যাদেরকে চাইবে কেবল তারাই প্রবেশ করতে পারে। কোনো ব্যক্তি যখন তাতে প্রবেশ করতে চাইত, তখন তারা তাকে ওপরে ওঠার সুযোগ দিত, কিন্তু যখন সে প্রায় প্রবেশ করতে উদ্যত হতো, তখন তারা তাকে ধাক্কা দিত আর সে পড়ে যেত।”

আবদুল মালিক হারিসকে বললেন, "আপনি কি তাঁকে এ কথা বলতে শুনেছেন?" হারিস বললেন, হ্যাঁ। আবদুল মালিক তখন কিছুক্ষণ তাঁর লাঠি দিয়ে মাটিতে আঘাত করতে থাকলেন, তারপর বললেন: "আহ! যদি আমি তাকে (অর্থাৎ ইবনুয যুবাইরকে) তার বহন করা (পুনঃনির্মাণের) কাজের ওপর ছেড়ে দিতাম!"









আল-জামি` আল-কামিল (4874)


4874 - عن أَبِي قَزَعَةَ أَنَّ عبد الملك بْنَ مَرْوَانَ بَيْنَمَا هُوَ يَطُوفُ بِالْبَيْتِ إِذْ قَال: قَاتَلَ اللهُ ابْنَ الزُّبَيْرِ حَيْثُ يَكْذِبُ عَلَى أُمِّ الْمُؤْمِنِينَ يَقُولُ سَمْعْتُهَا تَقُولُ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"يَا عَائِشَةُ! لَوْلا حِدْثَانُ قَوْمِكِ بِالْكُفْرِ لَنَقَضْتُ الْبَيْتَ حَتَّى أَزِيدَ فِيهِ مِن الْحِجْرِ، فَإِنَّ قَوْمَكِ قَصَّرُوا فِي الْبِنَاءِ".

فَقَالَ الْحَارِثُ بْنُ عبد الله بْنِ أَبِي رَبِيعَةَ: لا تَقُلْ هَذَا يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ، فَأَنَا سَمِعْتُ أُمَّ الْمُؤْمِنِينَ تُحَدِّثُ هَذَا.

قَال: لَوْ كُنْتُ سَمِعْتُهُ قَبْلَ أَنْ أَهْدِمَهُ لَتَرَكْتُهُ عَلَى مَا بَنَى ابْنُ الزُّبَيْرِ.

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1333: 404) عن محمد بن حاتم، حدّثنا عبد الله بن بكر السهميّ، حدّثنا حاتم بن أبي صغيرة، عن أبي قزعة، فذكره.




আবু ক্বাযা'আহ থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ান বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করছিলেন, তখন তিনি বললেন: আল্লাহ ইবনুয যুবাইরকে ধ্বংস করুন! তিনি উম্মুল মু'মিনীন-এর নামে মিথ্যা আরোপ করেন এই বলে যে, আমি তাকে বলতে শুনেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আইশা! তোমার কওম সদ্য কুফরি ত্যাগ করেছে— এই আশঙ্কার কারণে যদি না হতো, তবে আমি বাইতুল্লাহ ভেঙে ফেলতাম যেন আমি হিজর (হাতিম) অংশ থেকে তাতে বৃদ্ধি করতে পারি। কারণ তোমার কওমের লোকেরা (অর্থের অভাবে) এর নির্মাণে সংক্ষিপ্ত করেছে।"

তখন আল-হারিস ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আবী রাবীআহ বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! আপনি এমন কথা বলবেন না, কারণ আমি উম্মুল মু'মিনীনকে এটি বর্ণনা করতে শুনেছি।

তিনি (আব্দুল মালিক) বললেন: যদি আমি এটি (এই হাদীস) তা (কা'বা) ভেঙে ফেলার আগে শুনতাম, তাহলে তিনি (ইবনুয যুবাইর) যেমনটি নির্মাণ করেছিলেন, আমি এটিকে তেমনই রেখে দিতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (4875)


4875 - عن ابن عمر، أنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا طَافَ بِالْبَيْتِ الطَّوَافَ الأَوَّلَ يَخُبُّ ثَلاثَةَ أَطْوَافٍ، وَيَمْشِي أَرْبَعَةً، وَأَنَّهُ كَانَ يَسْعَى بَطْنَ الْمَسِيلِ إِذَا طَافَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1617)، ومسلم في الحج (1261: 230) كلاهما من طريق عبيد الله (هو ابن عمر)، عن نافع، عن ابن عمر، واللّفظ للبخاريّ.

وفي رواية عند البخاريّ (1604) من طريق فليح، عن نافع، عن ابن عمر، قال:"سعى النبيّ صلى الله عليه وسلم ثلاثة أشواط، ومشى أربعة في الحجّ والعمرة".

وفي رواية أخرى عند مسلم (1262) عن عبيد الله بن عمر، به، بلفظ:"رَمَل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من
الْحَجَرِ إلى الْحَجَرِ ثَلاثًا، ومَشَى أربعًا".




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন বাইতুল্লাহর প্রথম তাওয়াফ করতেন, তখন তিনি তিন চক্করে রমল (দ্রুতপায়ে চলা) করতেন এবং চার চক্করে হেঁটে চলতেন। আর তিনি সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা'ঈ করার সময় উপত্যকার নিচু স্থান দিয়ে দ্রুত হাঁটতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4876)


4876 - عن ابن عمر، قال: رمل رسول الله صلى الله عليه وسلم من الحجر إلى الحجر ثلاثًا ومشى أربعًا.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1262) من طريق ابن المبارك، عن عبيد الله بن نافع، عن ابن عمر، فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজারে আসওয়াদ থেকে হাজারে আসওয়াদ পর্যন্ত তিনবার হালকা দৌড় (রমল) করেছিলেন এবং চারবার হেঁটেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4877)


4877 - عن جابر بن عبد الله قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم رمل من الحجر الأسود حتى انتهى إليه ثلاثة أطواف.

صحيح: رواه مالك في الحج (107) عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر بن عبد الله، فذكره. ومن طريقه رواه مسلم في الحج (1263).




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি হাজরে আসওয়াদ থেকে শুরু করে তিন চক্কর পর্যন্ত (তাওয়াফের প্রথম তিন চক্করে) দ্রুতপদে রামল করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4878)


4878 - عن ابن عباس، قال: قَدِمَ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم وَأَصْحَابُهُ مَكَّةَ وَقَدْ وَهَنَتْهُمْ حُمَّى يَثْرِبَ. قَالَ الْمُشْرِكُونَ: إِنَّهُ يَقْدَمُ عَلَيْكُمْ غَدًا قَوْمٌ قَدْ وَهَنَتْهُم الْحُمَّى، وَلَقُوا مِنْهَا شِدَّةً، فَجَلَسُوا مِمَّا يَلِي الْحِجْرَ وَأَمَرَهُم النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَنْ يَرْمُلُوا ثَلاثَةَ أَشْوَاطٍ وَيَمْشُوا مَا بَيْنَ الرُّكْنَيْنِ لِيَرَى الْمُشْركُونَ جَلَدَهُمْ. فَقَالَ الْمُشْرِكُونَ: هَؤُلاءِ الَّذِينَ زَعَمْتُمْ أَنَّ الْحُمَّى قَدْ وَهَنَتْهُمْ؟ هَؤْلاءِ أَجْلَدُ مِنْ كَذَا وَكَذَا! ! .

قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: وَلَمْ يَمْنَعْهُ أَنْ يَأْمُرَهُمْ أَنْ يَرْمُلُوا الأَشْوَاطَ كُلَّهَا إِلا الإِبْقَاءُ عَلَيْهِمْ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1602)، ومسلم في الحج (1266) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن أيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره، واللفظ لمسلم.

قوله:"ويمشوا ما بين الرّكنين" أي حيث لا تقع عليهم أعين المشركين، فإنهم ما كانوا في تلك الجهة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও তাঁর সাহাবীগণ যখন মক্কায় আগমন করলেন, তখন ইয়াছরিবের (মদীনার) জ্বর তাদেরকে দুর্বল করে দিয়েছিল। মুশরিকরা বলেছিল: আগামীকাল এমন একদল লোক তোমাদের সামনে আসবে, যাদেরকে জ্বর দুর্বল করে দিয়েছে এবং তারা এর কারণে কষ্টের সম্মুখীন হয়েছে। তাই (যখন তারা এলেন), মুশরিকরা হিজর সংলগ্ন স্থানে বসে পড়ল। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে নির্দেশ দিলেন যেন তারা (তাওয়াফের সময়) প্রথম তিন চক্করে রমল (দ্রুত পদক্ষেপে চলা) করে এবং দুই রুকনের মধ্যবর্তী স্থানে স্বাভাবিকভাবে চলে, যাতে মুশরিকরা তাদের শৌর্য-বীর্য দেখতে পায়। তখন মুশরিকরা বলল: এরাই কি সেই লোক যাদের সম্পর্কে তোমরা ধারণা করেছিলে যে, জ্বর তাদের দুর্বল করে দিয়েছে? এরা তো অমুক অমুক লোকের চেয়েও বেশি শক্তিশালী!

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সমস্ত চক্করে রমল করার নির্দেশ দেওয়া থেকে বিরত রেখেছিল কেবল তাদের প্রতি দয়া ও সহানুভূতি।









আল-জামি` আল-কামিল (4879)


4879 - عن أبي الطّفيل، قال: قُلْتُ لابْنِ عَبَّاسٍ: أَرَأَيْتَ هَذَا الرَّمَلَ بِالْبَيْتِ ثَلاثَةَ أَطْوَافٍ وَمَشْيَ أَرْبَعَةِ أَطْوَافٍ أَسُنَّةٌ هُوَ، فَإِنَّ قَوْمَكَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُ سُنَّةٌ؟ . قَالَ: فَقَال: صَدَقُوا وَكَذَبُوا! . قَال: قُلْتُ: مَا قَوْلُكَ: صَدَقُوا وَكَذَبُوا؟ قَال: إِنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم قَدِمَ مَكَّةَ فَقَالَ الْمْشْرِكُونَ: إِنَّ مُحَمَّدًا وَأَصْحَابَهُ لا يَسْتَطِيعُونَ أَنْ يَطُوفُوا بِالْبَيْتِ مِن الْهُزَالِ، وَكَانُوا يَحْسُدُونَهُ. قَالَ: فَأَمَرَهُمْ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم أَنْ يَرْمُلُوا ثَلاثًا وَيَمْشُوا أَرْبَعًا. قَال: قُلْتُ لَهُ: أَخْبِرْنِي عَن الطَّوَافِ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ رَاكِبًا أَسُنَّهٌ هُوَ، فَإِنَّ قَوْمَكَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُ سُنَّةٌ؟ . قَال: صَدَقُوا وَكَذَبُوا! . قَال: قُلْتُ: وَمَا قَوْلُكَ: صَدَقُوا وَكَذَبُوا؟ قَال: إِنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم كَثُرَ عَلَيْهِ النَّاسُ، يَقُولُونَ: هَذَا مُحَمَّدٌ، هَذَا مُحَمَّدٌ حَتَّى خَرَجَ الْعَوَاتِقُ مِن الْبُيُوتِ.

قَالَ: وَكَانَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم لا يُضْرَبُ النَّاسُ بَيْنَ يَدَيْهِ فَلَمَّا كَثُرَ عَلَيْهِ رَكِبَ وَالْمَشْي
وَالسَّعْيُ أَفْضَلُ.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1264) من حديث سعيد بن إياس الجريريّ، وعبد الله بن أبي حسين، وعبد الملك بن سعيد بن الأبحر، كلّهم من حديث أبي الطفيل.

ورواه الإمام أحمد (2707) من حديث أبي عاصم الغنويّ، عن أبي الطفيل بأطول مما رواه مسلم. ورواه أيضًا أبو داود (1885) إلا أنه اختصره.

وأبو عاصم الغنويّ هذا وثقه ابن معين كما في"التهذيب"، وذكره ابن حبان في"الثقات"، ولكن لم يعرفه أبو حاتم، كما أنه لم يرو عنه سوى حماد بن سلمة؛ ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي إذا توبع، وقد توبع في أكثر أجزاء الحديث. انظر حديثه كاملًا في باب سبب رمي الجمرات.

وقوله:"صدقوا وكذبوا" يعني صدقوا في أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم رمل بالبيت ثلاثًا، وكذبوا في قولهم: إنه سنة مقصودة متأكدة؛ لأنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يجعله سنة مطلوبة دائمًا على تكرار السنين، وإنما أمر به تلك السنة لإظهار القوّة عند الكفّار، وقد زال ذلك المعني.

هذا معنى كلام ابن عباس وهو مذهبه بأنّ الرّمَل ليس بسنة، والجمهور من الصحابة والتابعين ومن بعدهم ذهبوا إلى أنّ الرمل سنة مستحبة يصح الطواف بدونه، ولكنه تفوته الفضيلة ولا دم عليه.

وإليه يشير قول عمر بن الخطاب رضي الله عنه:"شيء فعله رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا نحب أن نتركهـ" كما سيأتي.

وقد جاء عن ابن عباس خلاف هذا بأن الرّمل سنة، وهو ما يأتي:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু আত্ব-তুফাইল (রহ.) বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: বায়তুল্লাহর চারপাশে তিন চক্কর রমল (দ্রুত পদক্ষেপে চলা) করা এবং চার চক্কর হেঁটে যাওয়া—আপনি এ সম্পর্কে কী মনে করেন? এটা কি সুন্নাহ? কারণ আপনার গোত্রের লোকেরা দাবি করে যে এটা সুন্নাহ।

তিনি বললেন: তারা সত্য বলেছে এবং তারা মিথ্যাও বলেছে!

তিনি (আত্ব-তুফাইল) বলেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম, আপনার এই কথার অর্থ কী—'তারা সত্য বলেছে এবং তারা মিথ্যাও বলেছে'?

তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মক্কায় আগমন করেন, তখন মুশরিকরা বলছিল: 'মুহাম্মাদ ও তাঁর সাহাবীরা দুর্বলতার কারণে বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করতে পারবে না।'—তারা তাঁকে হিংসা করত। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে আদেশ করলেন যে তারা যেন তিন চক্কর রমল করে এবং চার চক্কর হেঁটে যায়।

তিনি (আত্ব-তুফাইল) বলেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: আমাকে সাফা ও মারওয়ার মাঝে সওয়ার হয়ে সা'ঈ করা সম্পর্কে বলুন—এটা কি সুন্নাহ? কারণ আপনার গোত্রের লোকেরা দাবি করে যে এটা সুন্নাহ।

তিনি বললেন: তারা সত্য বলেছে এবং তারা মিথ্যাও বলেছে!

তিনি (আত্ব-তুফাইল) বলেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম, আপনার এই কথার অর্থ কী—'তারা সত্য বলেছে এবং তারা মিথ্যাও বলেছে'?

তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চারপাশে বহু লোক ভিড় করেছিল, তারা বলছিল: 'এই তো মুহাম্মাদ! এই তো মুহাম্মাদ!'—এমনকি ঘরের পর্দানশীল কুমারী মেয়েরাও (তাঁকে দেখার জন্য) বের হয়ে এসেছিল। তিনি বললেন: আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে লোকজনকে সরিয়ে দেওয়ার জন্য প্রহার করা হতো না (বা ভিড় সরানো হতো না)। কিন্তু যখন তাঁর চারপাশে ভিড় অত্যধিক বেড়ে গেল, তখন তিনি সওয়ার হলেন। আর হেঁটে যাওয়া ও সা'ঈ করাই সর্বোত্তম।









আল-জামি` আল-কামিল (4880)


4880 - عن ابن عباس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما نزل مر الظهران في عمرته بلغ أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أنّ قريشا تقول: ما يَتَباعَثُونَ من العَجَف، فقال أصحابه: لو انْتحرنا من ظهرنا فأكلنا من لحمه وحَسَوْنا من مَرَقِه، أَصْبحنا غدًا حين ندخلُ على القومِ وبنا جَمامة قال: لا تَفعلُوا ولكن اجْمعُوا لي من أزوادِكم فجمعوا له وبَسَطُوا الأنطاعَ، فأكلوا حتى تولّوا، وحَثَا كلُّ واحدٍ منهم في جرابه، ثم أقبل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتى دخل المسجدَ، وقعدتْ قريش نحو الحجْر، فاضطَبعَ بردائِه، ثم قال:"لا يَرَي القومُ فيكم غَميزةً". فاستلم الرُّكن، ثم دخل حتى إذا تغَيَّبَ بالرُّكن اليماني مشي إلى الرُّكن الأسود، فقالتْ قريش: ما يرضون بالمشي إنّهم لَينْقُزُون نَقْزَ الظِّبَاء، ففعل ذلك ثلاثةَ أطْوافٍ، فكانت سنّة.

قال أبو الطُّفيل: وأخبرني ابن عباس: أنّ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فعل ذلك في حجّة الوداع.

حسن: رواه الإمام أحمد (2782) عن محمد بن الصباح، حدّثنا إسماعيل -يعني ابن زكريا-،
عن عبد الله -يعني ابن عثمان-، عن أبي الطفيل، عن ابن عباس، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 279):"هو في الصحيح باختصار، ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، إلا أن عبد الله بن عثمان -وهو ابن خثيم- صدوق"، وهو من رجال مسلم. ورواه أبو داود (1889) وصحّحه ابن خزيمة (2707)، وابن حبان (3812) كلّهم من طرق عن يحيي بن سليم، عن ابن خثيم إلا أن أبا داود وابن خزيمة اختصراه.

فقوله:"كانت سنة" لعلّه رجع عن قوله الأوّل لما تبين له، وأبو الطّفيل سمع منه في المرة الأولى الإنكار، ثم سمع منه الإقرار، فروى على وجهين، والله تعالى أعلم. ثم قصة ابن عباس كانت في عمرة القضاء، وحديث جابر وابن عمر وغيرهما كان في حجة الوداع، وهو متأخر.

وقوله فيما مضى:"إلّا إبقاء عليهم".

أي إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يمنعهم من الرمل في الأشواط الثلاثة إلا استمرارًا لما فعله هو وأصحابه في عمرة القضاء، وهذا التفسير يكون موافقًا لقوله:"كانت سنة".

وقول أبي الطفيل: وأخبرني ابن عباس:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم فعل ذلك في حجة الوداع" أي أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أعاد الرمل في حجة الوداع أيضًا.

وفيه إشارة إلى استمراره وإن كان السبب الذي من أجله رمل قد انتهى.

وهذا القول الثاني من ابن عباس كان موافقًا لجمهور أهل العلم بأنّ الرّمل في الأشواط الثّلاثة سنة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর উমরা পালনের উদ্দেশ্যে মাররুয যাহরান নামক স্থানে অবতরণ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের কাছে এ খবর পৌঁছল যে কুরাইশরা বলছে: দুর্বলতার কারণে তারা (যিয়ারতের জন্য) দ্রুত হাঁটতে পারবে না। তখন সাহাবীগণ বললেন: যদি আমরা আমাদের কিছু বাহন (উট) জবাই করি এবং এর গোশত খাই ও এর ঝোল পান করি, তবে আগামীকাল যখন আমরা লোকদের কাছে প্রবেশ করব, তখন আমাদের মধ্যে সতেজতা (শক্তিমত্তা) থাকবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা তা করো না। বরং তোমাদের পাথেয় থেকে আমার জন্য একত্র করো। অতঃপর তারা তাঁর জন্য পাথেয় একত্র করল এবং চামড়ার দস্তরখানা (কাপড়) বিছানো হলো। তারা পেট ভরে খেলো, আর তাদের প্রত্যেকে নিজ নিজ থলিতে ভরে নিল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্মুখে অগ্রসর হয়ে মাসজিদে প্রবেশ করলেন। কুরাইশরা তখন কা'বার হাতীমের (হিজর) দিকে বসা ছিল। তিনি তাঁর চাদরটি ইযতিবা' করলেন (ডান বগল উন্মুক্ত রেখে বাম কাঁধে ফেললেন), অতঃপর বললেন: "লোকেরা যেন তোমাদের মধ্যে দুর্বলতার কোনো লক্ষণ না দেখে।" এরপর তিনি রুকন (হাজারে আসওয়াদ) স্পর্শ করলেন, অতঃপর তিনি হেঁটে চলতে লাগলেন, যখন রুকনে ইয়ামানীতে পৌঁছানোর পর অদৃশ্য হলেন, তখন তিনি রুকনে আসওয়াদের দিকে (দ্রুত পায়ে) হেঁটে গেলেন। তখন কুরাইশরা বলল: এরা কেবল হেঁটে সন্তুষ্ট নয়, এরা তো হরিণের মতো লাফিয়ে চলছে। তিনি তিন চক্কর পর্যন্ত এরূপ করলেন। অতঃপর এটি সুন্নাতে পরিণত হলো।

আবু তুফাইল বলেন: আর ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জেও এরূপ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4881)


4881 - عن أسلم مولي عمر، أنّ عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال لِلرُّكْنِ: أَمَا وَالله إِنِّي لأَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لا تَضُرُّ وَلا تَنْفَعُ، وَلَوْلا أَنِّي رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اسْتَلَمَكَ مَا اسْتَلَمْتُكَ، فَاسْتَلَمَهُ. ثُمَّ قَالَ: فَمَا لَنَا وَلِلرَّمَلِ إِنَّمَا كُنَّا رَاءَيْنَا بِهِ الْمُشْرِكِينَ وَقَدْ أَهْلَكَهُم الله. ثُمَّ قَالَ: شَيْءٌ صَنَعَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَلا نُحِبُّ أَنْ نَتْرُكَهُ.

صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1605) عن سعيد بن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد بن أسلم، عن أبيه، به، فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (হাজরে আসওয়াদ সংলগ্ন) রুক্নকে লক্ষ্য করে বললেন: "সাবধান! আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই জানি যে তুমি একটি পাথর, যা ক্ষতিও করতে পারো না এবং উপকারও করতে পারো না। যদি আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তোমাকে চুম্বন করতে বা স্পর্শ করতে না দেখতাম, তবে আমি তোমাকে চুম্বন/স্পর্শ করতাম না।" অতঃপর তিনি তা চুম্বন/স্পর্শ করলেন। এরপর তিনি বললেন: "আর 'রামল'-এর (দ্রুতগতিতে তাওয়াফ করা) সাথে আমাদের কী প্রয়োজন? আমরা তো কেবল মুশরিকদেরকে দেখানোর জন্যই এটি করতাম, অথচ আল্লাহ তাদের ধ্বংস করে দিয়েছেন।" অতঃপর তিনি বললেন: "তবে (এটা এমন) একটি কাজ যা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করেছেন, তাই আমরা তা পরিহার করতে পছন্দ করি না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4882)


4882 - عن عمر بن الخطاب، قال: فِيمَ الرَّمَلانُ الْيَوْمَ، وَالْكَشْفُ عَن الْمَنَاكِبِ، وَقَدْ أَطَّأَ الله الإِسْلامَ وَنَفَى الْكُفْرَ وَأَهْلَهُ؟ ! مَعَ ذَلِكَ لا نَدَعُ شَيْئًا كُنَّا نَفْعَلُهُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (1887) عن أحمد بن حنبل -وهو في مسنده (317) -، وابن ماجه (2952) كلّهم من حديث هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، قال: سمعت عمر يقول (فذكره).

وإسناده حسن من أجل الكلام في هشام بن سعد، وهو المدني أبو عماد مختلف فيه، فضعّفه ابن معين والنسائي، ومشّاه غيرهم فهو حسن الحديث.
وصحّحه ابن خزيمة (2708)، والحاكم (1/ 454) كلاهما من هذا الوجه وقال:"صحيح على شرط مسلم". وأصله في صحيح البخاريّ (1605) كما مضى.

قال ابن خزيمة:"إنّ السنة قد كان يسنّها النبيّ صلى الله عليه وسلم لعلّة حادثة، فتزول العلّة، وتبقى السنة إلى الأبد؛ إذ النبيّ صلى الله عليه وسلم رمل في الابتداء، واضطبع ليُري المشركين قوّته وقوّة أصحابه، فبقي الاضطباع والرَّمل سنتان إلى الأبد".




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আজ কেন রমল করা হবে এবং কাঁধ উন্মুক্ত রাখা হবে? অথচ আল্লাহ্ ইসলামকে সুপ্রতিষ্ঠিত করেছেন এবং কুফর ও তার অনুসারীদের বিতাড়িত করেছেন! এত কিছুর পরেও, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা যা কিছু করতাম, তার কিছুই আমরা ছাড়ব না।









আল-জামি` আল-কামিল (4883)


4883 - عن ابن عباس، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اضْطَبَعَ، فَاسْتَلَمَ وَكَبَّرَ، ثُمَّ رَمَلَ ثَلاثَةَ أَطْوَافٍ، وَكَانُوا إِذَا بَلَغُوا الرُّكْنَ الْيَمَانِيَ وَتَغَيَّبُوا مِنْ قُرَيْشٍ مَشَوْا، ثُمَّ يَطْلُعُونَ عَلَيْهِمْ يَرْمُلُونَ، تَقُولُ قُرَيْشٌ: كَأَنَّهُم الْغِزْلانُ. قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: فَكَانَتْ سُنَّةً.

حسن: رواه أبو داود (1889)، وابن ماجه (2953) كلاهما من حديث ابن خثيم، عن أبي الطفيل، عن ابن عباس، فذكر الحديث، واللّفظ لأبي داود.

وفي لفظ لابن ماجه: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم لأصحابه حين أرادوا دخول مكة في عمرته بعد الحديبية:"إنّ قومكم غدًا سيرونكم، فليرونكم جلدًا".

ورواه الإمام أحمد (2792)، وصحّحه ابن خزيمة (2700)، وابن حبان (3814) كلّهم من هذا الوجه، واختصره ابن خزيمة.

وإسناده حسن من أجل الكلام في ابن خثيم فإنه صدوق، وقد حسّنه أيضًا الحافظ المنذريّ وغيره.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইযতিবা' করলেন (ডান কাঁধ উন্মুক্ত করলেন), এরপর তিনি (হাজরে আসওয়াদ) স্পর্শ করে তাকবীর বললেন। অতঃপর তিনি তিন চক্করে (তাওয়াফে) 'রামল' করলেন (দ্রুত গতিতে চললেন)। আর তারা যখন রুকন ইয়ামানীর কাছে পৌঁছতেন এবং কুরাইশদের দৃষ্টির আড়ালে চলে যেতেন, তখন হেঁটে চলতেন। এরপর তারা তাদের সামনে প্রকাশিত হলে পুনরায় রামল করতেন। কুরাইশরা তখন বলত: তারা যেন হরিণ। ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর তা (রামল করা) সুন্নাত হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (4884)


4884 - عن يعلى بن أميّة، قال: طافَ النّبيُّ صلى الله عليه وسلم مُضطبعًا بُبردٍ.

حسن: رواه أبو داود (1883)، والترمذيّ (859)، وابن ماجه (2954) كلّهم من طريق سفيان، عن ابن جريج، عن عبد الحميد، عن ابن علي بن أمية، عن أبيه، فذكره.

إلّا أنّ أبا داود لم يذكر بين ابن جريج وبين ابن يعلى"عبد الحميد" والصواب إثباته وكذلك رواه الدارمي (1885)، والإمام أحمد (17952) إلا أنه أبهم الرجل.

قال الترمذيّ:"هذا حديث الثوري عن ابن جريج، ولا نعرفه إلا من حديثه. وهو حديث حسن صحيح، وعبد الحميد هو ابن جبيرة بن شيبة، عن ابن يعلى، عن أبيه، وهو يعلى بن أمية".

وأما ابن يعلى بن أمية فرجّح المزي والحافظ ابن حجر وغيرهما أنه صفوان بن يعلى، إذ إن ليعلى ابن أمية أربعة أولاد وهم: صفوان، ومحمد، وعثمان، وعبد الرحمن، وكلّهم يروون عن أبيهم.

قال المزي: إن لم يكن صفوان بن يعلي فلا أدري من هو؟ .

وصفوان ثقة من رجال الشيخين، وهو أشهرهم




ইয়ালা বিন উমাইয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি চাদর পরিধান করে ইযতিবা (ডান কাঁধ উন্মুক্ত করে) অবস্থায় তাওয়াফ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4885)


4885 - عن أمِّ سلمة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: شَكَوْتُ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنِّي أَشْتَكِي، فَقَالَ:"طُوفِي مِنْ وَرَاءِ النَّاسِ وَأَنْتِ رَاكِبَةٌ". قَالَتْ: فَطُفْتُ رَاكِبَةً بَعِيرِي وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِينَئِذٍ يُصَلِّي إِلَى جَانِبِ الْبَيْتِ وَهُوَ يَقْرَأُ بِ {وَالطُّورِ (1) وَكِتَابٍ مَسْطُورٍ (2)}.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (123) عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن بن نوفل، عن عروة بن الزبير، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، فذكرته.

ورواه البخاريّ في الحج (1633)، ومسلم في الحج (1276) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী) বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অভিযোগ করলাম যে আমি অসুস্থ। তিনি বললেন: "তুমি আরোহণ করা অবস্থায় মানুষের পেছন দিক দিয়ে তাওয়াফ কর।" তিনি বলেন: আমি তখন আমার উটের পিঠে আরোহণ করে তাওয়াফ করলাম, আর তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর একপাশে সালাত আদায় করছিলেন এবং তিনি {وَالطُّورِ (1) وَكِتَابٍ مَسْطُورٍ (2)} পড়ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4886)


4886 - عن ابن عباس: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم طاف في حجّة الوداع على بعير، يستلم الرُّكن بمِحْجَن.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1607)، ومسلم في الحج (1272) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه البخاريّ (1632) من وجه آخر عنه وزاد فيه:"وكبّر".

قوله:"بمحجن" المحجن: عصا معوجة الرّأس.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জে একটি উটের পিঠে তাওয়াফ করেছিলেন। তিনি (হাজরে আসওয়াদ) রুকনটি একটি বাঁকা লাঠি দ্বারা স্পর্শ করছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4887)


4887 - عن جابر، قال: طَافَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم بِالْبَيْتِ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ عَلَى رَاحِلَتِهِ يَسْتَلِمُ الْحَجَرَ بِمِحْجَنِهِ لأَنْ يَرَاهُ النَّاسُ وَلِيُشْرِفَ وَلِيَسْأَلُوهُ فَإِنَّ النَّاسَ غَشُوهُ.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1273) من طرق، عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله، يقول (فذكره).




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় তাঁর আরোহী পশুর উপর আরোহণ করে কা'বা শরীফ তাওয়াফ করেছিলেন। তিনি তাঁর বাঁকানো লাঠি (মিহজান) দ্বারা হাজারে আসওয়াদকে স্পর্শ করেছিলেন। (তিনি এমনটি করেছিলেন) যেন লোকেরা তাঁকে দেখতে পায়, তিনি যেন (উঁচু হওয়ার কারণে) সবার উপরে দৃশ্যমান থাকেন এবং লোকেরা তাঁকে প্রশ্ন করতে পারে। কারণ লোকেরা তাঁকে ঘিরে ধরেছিল।