আল-জামি` আল-কামিল
4848 - عن الزّبير بن عَرَبِيٍّ قَال: سَأَلَ رَجُلٌ ابنَ عُمَرَ رضي الله عنهما عَن اسْتِلامِ الْحَجَرِ؟ فَقَالَ: رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَسْتَلِمُهُ وَيُقَبِّلُهُ. قَال: قُلْتُ: أَرَأَيْتَ إِنْ زُحِمْتُ، أَرَأَيْتَ إِنْ غُلِبْتُ؟ قَال: اجْعَلْ أَرَأَيْتَ بِالْيَمَنِ! رَأَيْتُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَسْتَلِمُهُ وَيُقَبِّلُهُ.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1611) عن مسدّد، حدثنا حماد (هو ابن زيد)، عن الزبير بن عربي، به، فذكره.
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যুবাইর ইবন আরাবী বলেন: এক ব্যক্তি তাঁকে হাজরে আসওয়াদ স্পর্শ করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি তা স্পর্শ করতেন এবং চুম্বন করতেন। সে বলল, আপনি যদি দেখেন যে আমি ভিড়ের কারণে (কাছে যেতে) বাধাগ্রস্ত হয়েছি, আপনি যদি দেখেন যে আমি পরাভূত হয়েছি? তিনি বললেন, তোমার ‘যদি দেখেন’ (যদি এমন হয়) জাতীয় কথাগুলো ইয়েমেনে রাখো! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি তা স্পর্শ করতেন এবং চুম্বন করতেন।
4849 - عن قدامة بن عبد الله قال: رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم على ناقة يَسْتَلِمُ الحجر بمحجنه.
حسن: رواه أحمد (15414) وأبو يعلى (928) والطبراني في الكبير (19/ 80) وفي الأوسط (8024) كلهم من حديث محرز بن عون بن أبي عون، قال: حدثنا قُران بن تَمَّام الأسدي، حدثنا أيمن بن نابل، عن قدامة بن عبد الله، فذكره. وإسناده حسن من أجل أيمن بن نابل الحبشي المكي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
قال ابن عدي:"له أحاديث وهو لا بأس به".
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 243) بعد أن عزاه إلى هؤلاء:"رجاله ثقات، وفي بعضهم كلام لا يضر".
কুদামা বিন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে তিনি উটনীর উপর আরোহণরত অবস্থায় তাঁর বাঁকানো লাঠি (মিহজান) দ্বারা হাজরে আসওয়াদ স্পর্শ করছিলেন।
4850 - عن عبيد بن جريج أنه قال لعبد الله بن عمر: يَا أَبَا عبد الرحمن رَأَيْتُكَ تَصْنَعُ أَرْبَعًا لَمْ أَرَ أَحَدًا مِنْ أَصْحَابِكَ يَصْنَعُهَا! قَال: وَمَا هُنَّ يَا ابْنَ جُرَيْجٍ؟ قَال: رَأَيْتُكَ لا تَمَسُّ مِن الأَرْكَانِ إِلا الْيَمَانِيَّيْنِ، وَرَأَيْتُكَ تَلْبَسُ النِّعَالَ السِّبْتِيَّةَ، وَرَأَيْتُكَ تَصْبُغُ بِالصُّفْرَةِ، وَرَأَيْتُكَ إِذَا كُنْتَ بِمَكَّةَ أَهَلَّ النَّاسُ إِذَا رَأَوُا الْهِلالَ وَلَمْ تُهْلِلْ أَنْتَ حَتَّى يَكُونَ يَوْمُ التَّرْوِيَةِ؟
فَقَالَ عبد الله بْنُ عُمَر: أَمَّا الأَرْكَانُ فَإِنِّي لَمْ أَرَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَمَسُّ إِلا الْيَمَانِيَّيْنِ، وَأَمَّا النِّعَالُ السِّبْتِيَّةُ فَإِنِّي رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَلْبَسُ النِّعَالَ الَّتِي لَيْسَ فِيهَا شَعَرٌ
وَيَتَوَضَّأُ فِيهَا، فَأَنَا أُحِبُّ أَنْ أَلْبَسَهَا، وَأَمَّا الصُّفْرَةُ فَإِنِّي رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَصْبُغُ بِهَا فَأَنَا أُحِبُّ أَنْ أَصْبُغَ بَهَا، وَأَمَّا الإِهْلالُ فَإِنِّي لَمْ أَرَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يُهِلُّ حَتَّى تَنْبَعِثَ بِهِ رَاحِلَتُه.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (31) عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن عبيد بن جريج، به، فذكره. ورواه البخاريّ في الوضوء (166)، ومسلم في الحج (1187) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
قوله:"إلّا اليمانيين" قال النوويّ في شرح مسلم (8/ 93):"والمراد بالركنين اليمانيين: الركن اليماني والركن الذي فيه الحجر الأسود … ويقال لهما اليمانيان تغليبًا لأحد الاسمين … فاليمانيان باقيان على قواعد إبراهيم بخلاف الشاميين؛ فلهذا لم يستلما واستُلم اليمانيان … قال القاضي عياض: وقد اتفق أئمّة الأمصار والفقهاء اليوم على أن الركنين الشاميين لا يستلمان، وإنما كان الخلاف في ذلك العصر الأول من بعض الصّحابة وبعض التابعين، ثم ذهب".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উবাইদ ইবনে জুরাইজ তাঁকে বললেন: "হে আবূ আব্দুর রহমান! আমি আপনাকে চারটি কাজ করতে দেখেছি, যা আপনার সাথীদের মধ্যে আর কাউকে করতে দেখিনি!"
তিনি (ইবনে উমর) বললেন, "হে ইবনে জুরাইজ! সেগুলো কী?"
উবাইদ বললেন, "আমি দেখেছি যে আপনি (খানায়ে কা'বার) রুকনগুলোর মধ্যে কেবল ইয়ামানী রুকন দু'টিতেই স্পর্শ করেন; এবং আমি দেখেছি যে আপনি লোমহীন চামড়ার জুতা পরিধান করেন; এবং আমি দেখেছি যে আপনি হলুদ রং দ্বারা খেজাব ব্যবহার করেন; এবং আমি দেখেছি যে আপনি যখন মক্কায় থাকেন, তখন লোকেরা চাঁদ দেখেই ইহরাম বাঁধলেও আপনি তারাবিয়ার দিন না আসা পর্যন্ত ইহরাম বাঁধেন না!"
তখন আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "রুকনগুলোর ব্যাপারে কথা হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ইয়ামানী রুকন দু'টি ছাড়া অন্য কোথাও স্পর্শ করতে দেখিনি। আর লোমহীন চামড়ার জুতা পরিধান করার বিষয়ে কথা হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লোমহীন চামড়ার জুতা পরিধান করতে দেখেছি এবং তিনি তা পরিহিত অবস্থায়ই ওযু করতেন। তাই আমি তা পরিধান করতে পছন্দ করি। আর হলুদ রংয়ের খেজাবের বিষয়ে কথা হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই রং দিয়ে খেজাব দিতে দেখেছি, তাই আমিও তা ব্যবহার করতে পছন্দ করি। আর ইহরাম বাঁধার বিষয়ে কথা হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর সওয়ারী চলতে শুরু করার আগ পর্যন্ত ইহরাম বাঁধতে দেখিনি।"
4851 - عن ابن عمر، قال: ما تركتُ استلام هذين الرُّكنين اليماني والحجر منذ رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يستلمهما في شدّة ولا رخاء.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1606)، ومسلم في الحج (1268) كلاهما من طريق يحيى القطان، عن عبيد الله (هو ابن عمر)، عن نافع، عن ابن عمر. واللفظ لمسلم.
وله في رواية أخرى عن عبيد الله، عن نافع، قال: رأيت ابن عمر يستلم الحجر بيده ثم قبَّل بده. وقال:"ما تركته منذ رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله".
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এই দুইটি রুকন—রুকনে ইয়ামানি এবং হাজারে আসওয়াদ—স্পর্শ করা কখনও পরিত্যাগ করিনি, যখন থেকে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কঠিন বা সহজ, যেকোনো অবস্থাতেই এগুলো স্পর্শ করতে দেখেছি।
4852 - عن عبد الله بن عمر أنه قال: لم أرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسحُ من البيت إلّا الرّكنين اليمانيين.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1609) ومسلم في الحج (1267) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن ابن شهاب الزهريّ، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বাইতুল্লাহর ইয়ামানি রুকন দু’টি ছাড়া অন্য কিছু স্পর্শ করতে দেখিনি।
4853 - عن ابن عمر، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يدع أن يستلم الرّكن اليمانيّ، والحجر في كلّ طواف.
حسن: رواه أبو داود (1876)، والنسائيّ (2950) وأحمد (4686) وصححه ابن خزيمة (2723) والحاكم (1/ 456) كلهم من حديث عبد العزيز بن أبي رواد، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وقال: وكان عبد الله بن عمر يفعله.
وإسناده حسن من أجل ابن أبي رواد، فإنه حسن الحديث.
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতিবার তাওয়াফে রুকন ইয়ামানি এবং (হাজারে আসওয়াদ) পাথর স্পর্শ করা বাদ দিতেন না। (বর্ণনাকারী) বলেন: আর আব্দুল্লাহ ইবন উমারও (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই কাজটি করতেন।
4854 - عن عبد الله بن عباس، قال: لم أرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يستلمُ غير الرُّكنين اليمانيين.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1269) عن أبي الطّاهر (هو أحمد بن عمرو بن سرح)، عن ابن وهب، أخبرنا عمرو بن الحارث، أن قتادة بن دعامة، حدثه، أن أبا الطّفيل البكريّ حدّثه أنه سمع ابن عباس، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দুই ইয়েমেনী রুকন (কোণ) ছাড়া অন্য কিছু ইস্তিলাম (স্পর্শ বা চুম্বন) করতে দেখিনি।
4855 - عن أبي الطّفيل، قال: كُنْتُ مَعَ ابْنِ عَبَّاسٍ وَمُعَاوِيَةُ لا يَمُرُّ بِرُكْنٍ إِلا اسْتَلَمَهُ، فَقَالَ لَهُ ابْنُ عَبَّاسٍ: إِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم لَمْ يَكُنْ يَسْتَلِمُ إِلا الْحَجَرَ الأَسْوَدَ، وَالرُّكْنَ الْيَمَانِيَ. فَقَالَ مُعَاوِيَةُ: لَيْسَ شَيْءٌ مِن الْبَيْتِ مَهْجُورًا.
صحيح: رواه الترمذيّ (858)، والإمام أحمد (3074) كلاهما من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (8944) -، عن معمر والثوريّ، عن ابن خثيم، عن أبي الطفيل، قال (فذكره). وإسناده صحيح.
وأصل هذه القصّة في صحيح البخاريّ (1608) رواها معلّقة فقال: قال محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، أخبرني عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، أنه قال:"ومن يتقي شيئًا من البيت؟ وكان معاوية يستلم الأركان. فقال له ابن عباس: إنّه لا يستلم من البيت هذان الركنان. فقال ليس شيء من البيت مهجورًا، وكان ابن الزبير يستلمهن كلّهن".
وهذا معلّق فإنّ البخاريّ لم يلق محمد بن بكر وهو البرسانيّ البصريّ المتوفى سنة (203 هـ) أو (204 هـ)، وكان عمر البخاريّ إذ ذاك عشر سنوات، وهذا من الأسانيد التي لم تصل إلينا؛ ولذا قال الحافظ في"الفتح":"لم أره من طريق محمد بن بكر" أي موصولًا. ثم قال في"تغليق التعليق" (3/ 71):"ورواه الجوزقي من حديث عثمان بن الهيثم، عن ابن جريج، به".
قلت: الجزء المرفوع من الحديث رواه مسلم أيضًا كما سبق مختصرًا بدون القصّة.
وروى شعبة هذا الحديث، فوقع في متنه قلب، وقد اعترف هو بذلك فقال: الناس يخالفونه.
وهو ما رواه أحمد (16858) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة وحجاج، قال: حدثني شعبة، قال: سمعت قتادة، يحدث عن أبي الطفيل. قال حجاج في حديثه قال: سمعت أبا الطفيل، قال: قدم معاوية وابن عباس، فطاف ابن عباس، فاستلم الأركان كلها، فقال له معاوية: إنما استلم رسول الله صلى الله عليه وسلم الركنين اليمانيين. قال ابن عباس: ليس من أركانه شيء مهجور.
قال حجاج: قال شعبة: الناس يختلفون في هذا الحديث، يقولون: معاوية هو الذي قال: ليس من البيت شيء مهجور. ولكنه حفظه من قتادة هكذا.
ظاهر إسناده الصحة، ولكن وقع القلب في المتن، والخطأ ليس من شعبة، وإنما الخطأ من قتادة كما هو الظاهر من كلام شعبة، فحمله على شعبة خطأ إلا أنه كان يروي هكذا مقلوبا.
وأما قول معاوية:"ليس شيء من البيت مهجورًا".
فقال الشافعيّ:"لم يدع أحد استلامها هجرة لبيت الله، ولكنه استلم ما استلم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأمسك عمّا أمسك عنه". البيهقي في السّنن الكبرى (5/ 77).
আবুত তুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। (একবার তাওয়াফের সময়) মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাবা ঘরের এমন কোনো রুকন (কোণ) অতিক্রম করতেন না, যা তিনি চুম্বন বা স্পর্শ (ইস্তিলাম) না করতেন। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজরে আসওয়াদ এবং রুকনে ইয়ামানী ব্যতীত অন্য কোনো রুকন চুম্বন বা স্পর্শ করতেন না। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কাবা ঘরের কোনো কিছুই পরিত্যাজ্য নয়।
4856 - عن عائشة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أَلَمْ تَرَيْ أَنَّ قَوْمَكِ حِينَ بَنَوا الْكَعْبَةَ اقْتَصَرُوا عَنْ قَوَاعِدِ إِبْرَاهِيمَ". قَالَت: فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ! أَفَلا تَرُدُّهَا عَلَى قَوَاعِدِ إِبْرَاهِيم؟ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"لَولا حِدْثَانُ قَوْمِكِ بِالْكُفْرِ لَفَعَلْتُ".
قَالَ: فَقَالَ عبد الله بْنُ عُمَرَ: لَئِنْ كَانَتْ عَائِشَةُ سَمْعَتْ هَذَا مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَا أُرَى رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم تَرَكَ اسْتِلامَ الرُّكْنَيْنِ اللَّذَيْنِ يَلِيَانِ الْحِجْرَ إِلا أَنَّ الْبَيْتَ لَمْ يُتَمَّمْ عَلَى قَوَاعِدِ إِبْرَاهِيمَ.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (109) عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن محمد بن أبي بكر الصّديق أخبر عبد الله بن عمر، عن عائشة فذكرته. ورواه البخاريّ في الحجّ (1583)، ومسلم في الحج (1333: 399) كلاهما من طريق مالك به إلّا أنّ مسلمًا اختصره.
والحِجْر -بكسر الجيم-: هو الموضع المسمى بالحطيم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তুমি কি দেখোনি, তোমার কওম যখন কা'বা ঘর নির্মাণ করেছিল, তখন তারা ইবরাহীম (আঃ)-এর ভিত্তিমূল থেকে কম করে নির্মাণ করেছে?"
তিনি (আয়িশা) বললেন, আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি সেটিকে ইবরাহীম (আঃ)-এর ভিত্তিমূলের ওপর ফিরিয়ে দেবেন না (পুনঃনির্মাণ করবেন না)?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমার কওমের লোকেরা (সম্প্রতি) কুফুরি ত্যাগ না করত, তবে আমি অবশ্যই তা করতাম।"
(বর্ণনাকারী) বলেন, এরপর আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "যদি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই কথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনে থাকেন, তবে আমার মনে হয়, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিজরের নিকটবর্তী দু'টি রুকন (কোণ) স্পর্শ করা পরিত্যাগ করেননি কেবল এ কারণেই যে, বায়তুল্লাহ (কা'বা) ইবরাহীম (আঃ)-এর ভিত্তিমূলের উপর সম্পূর্ণরূপে নির্মিত হয়নি।"
4857 - عن ابن عمر أَنَّهُ أُخْبِرَ بِقَوْلِ عَائِشَةَ رضي الله عنها إِنَّ الْحِجْرَ بَعْضُهُ مِن الْبَيْتِ فَقَالَ ابْنُ عُمَر: وَاللهِ! إِنِّي لأَظُنُّ عَائِشَةَ إِنْ كَانَتْ سَمِعَتْ هَذَا مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِنِّي لأَظُنُّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم لَمْ يَتْرُك اسْتِلامَهُمَا إِلا أَنَّهُمَا لَيْسَا عَلَى قَوَاعِدِ الْبَيْتِ، وَلا طَافَ النَّاسُ وَرَاءَ الْحِجْرِ إِلا لِذَلِكَ.
صحيح: رواه أبو داود (1875) عن مخلد بن خالد، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهريّ، عن سالم، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই উক্তি সম্পর্কে অবহিত করা হয়েছিল যে, হিজর (হাতীম)-এর কিছু অংশ বায়তুল্লাহর (কা'বার) অংশ। তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমার ধারণা, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যদি এই কথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনে থাকেন, তবে আমার ধারণা, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (হিজরের) এই দুটি কোণকে স্পর্শ করা শুধু এই কারণেই পরিত্যাগ করেছিলেন যে, এগুলি বায়তুল্লাহর মূল ভিত্তির উপর স্থাপিত ছিল না, আর মানুষ হিজরের পিছন দিক দিয়ে তাওয়াফ করে শুধু এই কারণেই।
4858 - عن عبد الله بن عباس، قال: ما طاف رسول الله صلى الله عليه وسلم بشيء إلّا وهو من البيت.
صحيح: رواه أبو يعلى (2566) عن زهير، حدّثنا بشر بن السّري، حدّثنا سيف بن سليمان، عن عبد الله بن يسار، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح، وحسّنه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 247).
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কোনো কিছুর তাওয়াফ করেননি, যা বাইতুল্লাহর (কা'বার) অংশ ছিল না।
4859 - عن ابن عباس، قال: الحجر من البيت؛ لأنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم طاف بالبيت من ورائه، وقال الله: {وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ} [سورة الحج: 29].
حسن: رواه ابن خزيمة (2740)، والبيهقيّ (5/ 90) كلاهما من حديث سفيان، عن هشام بن حجير، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل هشام بن حجير وهو المكيّ مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
قالت عائشة: ما أُبالي صليت في الحجر أو في البيت.
رواه أبو يعلى -المقصد العلي (587) - بإسناد صحيح.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হিজর (হাতীম) বাইতুল্লাহর অংশ; কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর পিছন দিক দিয়ে তাওয়াফ করেছেন। আর আল্লাহ বলেছেন: {وَلْيَطَّوَّفُوا بِالْبَيْتِ الْعَتِيقِ} ‘আর তারা যেন প্রাচীন ঘরের তাওয়াফ করে।’ (সূরা আল-হাজ্জ: ২৯)।
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি হিজরে (হাতীমে) সালাত আদায় করি বা বাইতুল্লাহর ভেতরে, তাতে আমার কোনো পরোয়া নেই।
4860 - عن يعلى قال: طُفتُ مع عمر بن الخطاب، فلما كنتُ عند الركن الذي يلي الباب مما يلي الحجر، أخذتُ بيده ليستلم، فقال: أما طفتَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قلت: بلى. قال: فهل رأيته يستلمه؟ قلت: لا. قال: فانفذ عنك، فإنّ لك في رسول الله أسوةً حسنةً.
صحيح: رواه الإمام أحمد (253)، وأبو يعلى (182) كلاهما من حديث يحيى، عن ابن جريج، حدثني سليمان بن عتيق، عن عبد الله بن بابيه، عن يعلى بن أمية، فذكره. وإسناده صحيح.
وعبد الله بن بابيه يقال له:"باباه" أيضًا، وهو من رجال مسلم ثقة.
إذا صحّ هذا فلا يضرّ ما جاء في بعض الروايات الواسطة بين عبد الله بن بابيه وبين يعلى بن أمية بقوله:"عن بعض بني يعلى بن أمية" هكذا رواه أيضًا الإمام أحمد (313) عن روح، عن ابن جريج، أخبرني سليمان بن عتيق، عن عبد الله بن بابيه، عن بعض بني يعلى، فذكره.
ومثله ما رواه عبد الرزاق (8945) عن ابن جريج بإسناده، ولفظه:"طفت مع عمر فاستلم الركن، فكنت مما يلي البيت، فلما بلغنا الركن الغربي الذي يلي الأسود جررت يده لأن يستلم. قال: ما شأنك؟ فقلت: ألا تستلم؟ فقال: ألم تطف مع رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قلت: بلى. قال: فرأيتَه يستلم هذين الركنين الغربيين؟ قال: فقلت: لا. قال: أليس لك في رسول الله أسوة حسنة؟ قلت: بلى. قال: فابعد عنك" انتهى.
ورواه البيهقيّ (5/ 77) من طريق يعقوب بن سفيان، ثنا أبو عاصم، عن ابن جريج، بإسناده، وفيه:"أنفذ عنك".
ونقل عن الشّافعيّ قوله:"وأما العلة فيهما فنرى أنّ البيت لم يتمم على قواعد إبراهيم، فكانا كسائر البيت" انتهى.
ইয়া'লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তাওয়াফ করছিলাম। যখন আমি সেই কোণটির (রুকন) কাছে পৌঁছলাম যা (কা'বা ঘরের) দরজা সংলগ্ন এবং হিজর (হিজরে ইসমাঈল)-এর দিক থেকে আসে, তখন আমি তাঁর হাত ধরলাম যেন তিনি ইস্তিলাম করেন (স্পর্শ করেন)। তিনি বললেন: তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাওয়াফ করনি? আমি বললাম: হ্যাঁ, করেছি। তিনি বললেন: তুমি কি তাঁকে (রাসূলুল্লাহকে) সেটি ইস্তিলাম করতে দেখেছো? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: তাহলে তুমি এটা ছেড়ে দাও। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে তোমার জন্য উত্তম আদর্শ রয়েছে।
4861 - عن عبد الله بن السائب، قال: سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ مَا بَيْنَ الرُّكْنَيْنِ: {رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ} [سورة البقرة: 201]".
حسن: رواه أبو داود (1892) عن مسدّد، حدّثنا عيسى بن يونس، حدّثنا ابن جريج، عن يحيى ابن عبيد، عن أبيه، عن عبد الله بن السّائب، فذكره.
وإسناده حسن من أجل والد يحيى وهو عبيد مولى السائب المخزوميّ ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 139).
وأخرجه عنه في صحيحه (3826) وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (2721)، والحاكم (1/ 455)
وقال: صحيح على شرط مسلم" إلّا أن يحيى بن عبيد ووالده لم يخرج لهما مسلم.
وقيل: إنّ لعبيد صحبة؛ ولذا ذكره ابن قانع، وابن منده، وأبو نعيم في الصحابة، ولكن الصحيح أنه تابعي كما قال الحافظ في الإصابة.
وصرَّح ابن جريج عند الإمام أحمد (15398، 15399)، وابن خزيمة.
وفي الرواية الثانية عند الإمام أحمد:"فيما بين ركن بني جمح والركن الأسود".
وركن بني جمح يعني الركن اليماني نسب إلى بني جمح وهم بطن من قريش وكانت بيوتهم إلى جهته. ثم عمل السّلف يقوّي هذا الحديث.
فقد روى عبد الرزاق (8966) عن معمر، قال: أخبرني من أثق به، عن رجل، قال: سمعت لعمر بن الخطاب هجّيرًا حول هذا البيت يقول: {رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ (201)}. وفيه جهالة في موضعين، ولكن رواه البيهقي (5/ 84) من وجه آخر متصلًا عن عاصم، عن حبيب بن صهبان: أنه رأى عمر رضي الله عنه يطوف بالبيت يقول (فذكر الآية) وقال: ما له هجيرى غيرها.
وعن أبي شعبة البكريّ قال: طفت مع ابن عمر فسمعته يقول حين حاذى الركن اليماني قال:"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وبيده الخير وهو على كل شيء قدير. فلما جاء الحجر قال: {رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ (201)} ، فلما انصرف قلت: يا أبا عبد الرحمن، سمعتك تقول كذا وكذا. قال: سمعتني؟ قلت: نعم. قال: فهو ذلك، أثنيت على ربي، وشهدت شهادة الحق، وسألته من خير الدنيا والآخرة.
رواه عبد الرزاق (8965) قال: سمعت رجلا يحدث هشام بن حسان، عن عمّ له، عن أبي شعبة، فذكره. قال: فدعا هشام بدواة فكتبه.
وفيه جهالة في موضعين، ولكن رواه من وجه آخر متصلًا عن الثوري، عن منصور، عن هلال ابن يساف، عن أبي شعبة غير أنه لم يذكر فيه سؤال أبي شعبة ولا جواب ابن عمر.
ورُوي مثل هذا عن علي بن أبي طالب، وابن عباس، وغيرهما بأسانيد ضعاف، كما في الدعاء للطبراني (860، 861)، وأخبار مكة للأزرقي (1/ 340).
وقال الشافعي: أحب كلما حاذي به يعني بالحجر الأسود أن يكبّر ويقول في رمله:"اللهم اجعله حجًّا مبرورًا، وذنبًا مغفورًا، وسعيًا مشكورًا".
ويقول في الأطواف الأربعة:"اللهمّ اغفر وارحم واعف عمّا تعلم، وأنت الأعزّ الأكرم، اللهم آتنا في الدينا حسنة وفي الآخرة حسنة، وقنا عذاب النار" رواه البيهقي (5/ 84) بسنده عن الشّافعي.
আবদুল্লাহ ইবনুস সা'ইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দুই রুকনের (কোণের) মধ্যবর্তী স্থানে (এই দুআটি) বলতে শুনেছি: "হে আমাদের প্রতিপালক, আপনি আমাদের দুনিয়াতে কল্যাণ দিন এবং আখিরাতেও কল্যাণ দিন। আর আমাদের জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করুন।" (সূরা আল-বাকারা: ২০১)
4862 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فِي الْحَجَرِ:"وَاللهِ! لَيَبْعَثَنَّهُ اللهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ لَهُ عَيْنَانِ يُبْصِرُ بِهِمَا، وَلِسَانٌ يَنْطِقُ بِهِ يَشْهَدُ عَلَى مَنِ اسْتَلَمَهُ بِحَقٍّ".
حسن: رواه الترمذيّ (961)، وابن ماجه (2944) كلاهما من طريق ابن خثيم، عن سعيد بن جبير، قال: سمعت ابن عباس يقول: (فذكره).
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن خثيم فإنه حسن الحديث.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (2215، 2398، 2643) وصحّحه ابن خزيمة (2735)، وابن حبان (3712)، والحاكم (1/ 457) كلّهم من هذا الوجه.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
ورواه الطبراني في الكبير (11/ 182) من طريق بكر بن محمد القرشيّ، ثنا الحارث بن غسان، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس ولفظه:"يبعث الله الحجر الأسود، والرّكن اليمانيّ يوم القيامة، ولهما عينان ولسان وشفتان يشهدان لمن استلمهما بالوفاء".
فزاد فيه:"الركن اليماني" وفيه بكر بن محمد القرشيّ وشيخه الحارث بن غسان لا يعرفان كما قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 242).
وفي الباب ما روي عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يأتي الركن يوم القيامة أعظم من أبي قبيس له لسان وشفتان".
رواه أحمد (6978) وابن خزيمة (2737) والحاكم (1/ 457) كلهم من حديث عبد الله بن المؤمل، عن عطاء بن أبي رباح، عن عبد الله بن عمرو بن العاصي، فذكره.
قال الحاكم:"وقد روي لهذا الحديث شاهد مفسر غير أنه ليس من شرط الشيخين، فإنهما لم يحتجا بأبي هارون عمارة بن جوين العبدي".
وقال الذهبي في تلخيصه:"عبد الله بن المؤمل واه".
قلت: عبد الله بن المؤمل ابن هبة المخزومي المكي ضعيف باتفاق أهل العلم إلا ابن معين، فروى عباس الدوري عنه:"صالح الحديث" وقال ابن أبي خيثمة وغير واحد عنه:"ضعيف".
وأما الشاهد الذي أشار إليه الحاكم فهو ما رواه بإسناده عن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه قال: حججنا مع عمر بن الخطاب، فلما دخل الطواف استقبل الحجر فقال: إني أعلم أنك حجر لا تضر ولا تنفع، ولولا أني رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قبلك ما قبلتك، ثم قبَّله، فقال له علي بن أبي طالب: بلى يا أمير المؤمنين إنه يضر وينفع. قال: ثم قال: بكتاب الله تبارك وتعالى قال: وأين ذلك من كتاب الله؟ قال: قال الله عز وجل: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ
أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى} [الأعراف: 172] خلق الله آدم ومسح على ظهره فقررهم بأنه الرب وأنهم العبيد، وأخذ عهودهم ومواثيقهم وكتب ذلك في رق، وكان لهذا الحجر عينان ولسان، فقال له: افتح فاك، قال: ففتح فاه، فألقمه ذلك الرق، وقال: اشهد لمن وافاك بالموافاة يوم القيامة، وإني أشهد لسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يؤتى يوم القيامة بالحجر الأسود وله لسان ذلق يشهد لمن يستلمه بالتوحيد" فهو يا أمير المؤمنين يضر وينفع، فقال عمر: أعوذ بالله أن أعيش في قوم لست فيهم يا أبا حسن.
قال الذهبي في تلخيصه:"أبو هارون ساقط".
قلت: هو عمارة بن جوين -بجيم مصغرا- مشهور بكنيته، كَذَّبَه غير واحد من أهل العلم، وهو شيعي محترق.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজ্জার (হাজরে আসওয়াদ) সম্পর্কে বলেছেন: "আল্লাহর কসম! আল্লাহ অবশ্যই কিয়ামতের দিন তাকে এমন অবস্থায় পুনরুত্থিত করবেন যে, তার দুটি চোখ থাকবে যা দিয়ে সে দেখতে পাবে এবং একটি জিহ্বা থাকবে যা দিয়ে সে কথা বলবে। যে ব্যক্তি সত্য ও নিষ্ঠার সাথে তাকে চুম্বন বা স্পর্শ করেছে, সে তাদের পক্ষে সাক্ষ্য দেবে।"
4863 - عن جعفر بن عبد الله بن عثمان، قال: رَأَيْتُ مُحَمَّدَ بْنَ عَبَّادَ بْنِ جَعْفَرٍ يَسْتَلِمُ الْحَجَرَ ثُمَّ يُقَبِّلُهُ وَيَسْجُدُ عَلَيْهِ، فَقُلْتُ لَهُ: مَا هَذَا؟ فَقَالَ: رَأَيْتُ خَالَكَ عبد الله بْنَ عَبَّاسٍ يَفْعَلُهُ. ثُمَّ قَالَ: رَأَيْتُ عُمَرَ فَعَلَهُ، ثُمَّ قَالَ: إِنِّى لأَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ وَلَكِنِّي رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَفْعَلُ هَذَا.
حسن: رواه الدارميّ (1907)، وابن خزيمة (2714)، والبزار -كشف الأستار (1114) - كلّهم من حديث أبي عاصم النّبيل، وأبو داود الطّيالسيّ (8) كلاهما عن جعفر بن عبد الله بن عثمان، فذكره.
إلّا أنّ أبا داود نسب جعفر هذا إلى جده عثمان، كما أنّ البزار قال: جعفر بن محمد، وأنه أيضًا لم يذكر فيه ابن عباس.
وإسناده حسن من أجل الكلام في جعفر بن عبد الله بن عثمان وهو القرشيّ الحميديّ المكي، قال العقيليّ في الضعفاء (228):"في حديثه وهم واضطراب". وساق الحديث من وجه آخر عن جعفر بن عبد الله ولكنه جعله من مسند ابن عباس ثم قال:"ورواه أبو عاصم، وأبو داود الطيالسيّ عن جعفر فقالا: عن ابن عباس، عن عمر مرفوعًا".
ثم رواه عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (8912) - عن ابن جريج قال: أخبرني محمد بن عباد ابن جعفر أنه رأى ابن عباس قبّل الحجر وسجد عليه، وقال:"حديث ابن جريج أولى" انتهى.
قلت: اختلف على جعفر بن عبد الله بن عثمان فمنهم من جعله من مسند ابن عباس، ومنهم من جعله من مسند عمر، والذي عليه الرواة الثقات عنه أنه من مسند عمر بن الخطاب مرفوعًا.
ومن قال غير ذلك فالوهم منه، فإن جعفر بن عبد الله بن عثمان وإن قال فيه العقيليّ في حديثه
وهم واضطراب، فقد وثقه الإمام أحمد وأبو حاتم، فلا يترك من حديثه ما اجتمع عليه الثقات، وقد يكون الوهم من دونه في جعل الحديث من مسند ابن عباس.
وأما ترجيح العقيليّ رواية ابن جريج الموقوفة على ابن عباس فترجيح بدون مرجّح فإنّ محمد ابن عباد بن جعفر لم يسأله لماذا يسجد عليه، وإنما يحكي ما رآه فقط، وهو لا يمنع أن يكون ما فعله مرفوعًا لو سئل لأجاب لا سيما قد جاء من طريق آخر أخرجه البيهقيّ (5/ 75) من طريق يحيى ابن سليمان الجعفيّ، ثنا يحيى بن يمان، ثنا سفيان، عن ابن أبي حسين، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: رأيت النبيّ صلى الله عليه وسلم يسجد على الحجر.
وقال:"لم يروه عن سفيان إلا ابن يمان، وابن أبي حسين هو عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين".
قلت: وابن يمان مختلف فيه، فقال ابن معين: أرجو أن يكون صدوقًا.
وقال ابن المديني: كان فلج فتغيّر حفظه.
والظاهر أنه لم يخطئ في هذا الحديث لأنه تابعه فيه غيره في رفعه.
وبهذا تبين أنّ الحديث مرفوع، وهو لا ينزل عن درجة الحسن، والنّفس تطمئن أن يكون من مسند عمر بن الخطاب، ومن قال غير ذلك فإما اختصره أو وهم فيه كما وهم البعض في تعيين جعفر بن عبد الله بن عثمان فقال الحاكم في"المستدرك" (1/ 455) بعد أن ساق الحديث من طريق أبي عاصم: جعفر بن عبد الله هو ابن الحكم.
وقال:"صحيح الإسناد" وهذا وهم منه، كما أن محقق مصنف عبد الرزاق أدخل بين محمد بن عباد وبين ابن عباس رجلًا كناه"أبا جعفر" وهذا كلّه وهم أو خطأ من النساخ كما وهم أبو يعلى (219) في نقله عن أبي داود الطيالسي، فلم يذكر بين محمد بن عباد وعمر بن الخطاب"ابن عباس" فصار الإسناد منقطعًا.
ولكن قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 241): عن ابن عمر قال:"رأيت عمر بن الخطاب قبّل الحجر وسجد عليه، ثم عاد فقبّله وسجد عليه، ثم قال: هكذا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم".
وقال:"رواه أبو يعلى بإسنادين، وفي أحدهما جعفر بن محمد المخزومي وهو ثقة وفيه كلام، وبقية رجاله رجال الصحيح. ورواه البزار من الطريق الجيد".
قلت: البزار أيضًا رواه من طريق جعفر بن محمد المخزوميّ كما سبق. وأما رواية أبي يعلى من طريق جعفر بن محمد ففيها انقطاع كما رأيت أو سقط، وهذا السقط ليس هو ابن عمر، بل هو ابن عباس.
وأمّا الرّواية الثانية عند أبي يعلى فهي كما يأتي من طريق ابن عمر، فالهيثمي وهو آخر من خلّط بين حديث ابن عباس وبين حديث ابن عمر والله المستعان.
وأمّا الرّواية الثانية التي أشار إليها الهيثميّ فهي ما رواه أبو يعلى (220) عن زكريا بن يحيى زحموية الواسطيّ، حدّثنا عمر بن هارون، عن حنظلة بن أبي سفيان، عن سالم بن عبد الله، عن
أبيه، قال: رأيت عمر بن الخطّاب قبّل الحجر وسجد عليه، ثم عاد فقبّله وسجد عليه، ثم قال: هكذا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم صنع.
وعمر بن هارون هو البلخيّ، متروك.
وفيه ردّ على البزّار في قوله:"لا نعلمه عن عمر إلّا بهذا الإسناد".
فإنه روي عنه أيضًا بهذا الإسناد الثاني إلا أن يقال: إنه يقصد به الإسناد الصحيح.
وروي عن ابن عباس أيضًا قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقبّل الركن ويضع خده عليه. رواه أبو يعلى وفيه عبد الله بن مسلم بن هرمز وهو ضعيف كما قال الهيثمي في"المجمع".
ومعنى السجود على الحجر الأسود هو وضع الجبهة عليه كما ورد تفسيره في بعض الآثار، استحبه الشافعي وأحمد بعد التقبيل، وكرهه مالك، فلعله لم تبلغه هذه الآثار.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
জাফর ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উসমান বর্ণনা করেন: আমি মুহাম্মাদ ইবনু আব্বাদ ইবনু জা'ফরকে দেখলাম, তিনি হাজরে আসওয়াদ স্পর্শ করলেন, তারপর তা চুম্বন করলেন এবং তার উপর সিজদা করলেন। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: এটা কী? তিনি বললেন: আমি আপনার মামা আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তা করতে দেখেছি। এরপর তিনি বললেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও তা করতে দেখেছি। অতঃপর তিনি (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর বক্তব্য উদ্ধৃত করে) বললেন: আমি নিশ্চয়ই জানি যে, তুমি একটি পাথর মাত্র, কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এটি করতে দেখেছি।
4864 - عن عبد الرحمن بن عوف، قال: قال لي النبيّ صلى الله عليه وسلم:"كيف صَنَعْتَ في اسْتِلامِ الحجر؟". فقلتُ: اسْتَلَمْتُ وتركتُ. قال النَّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"أَصَبْتَ".
صحيح: رواه ابن حبان في صحيحه (3823) عن الحسين بن محمد بن أبي معشر، قال: حدّثنا عبد الجبار بن العلاء، حدثنا بشر بن السري، حدثنا الثوري، عن هشام بن عروة، عن عروة بن الزبير، عن عبد الرحمن بن عوف، فذكره.
ورواه البزار (1113)، والطبراني في الصغير (650) كلاهما من وجهين آخرين عن هشام بن عروة، بإسناده، مثله.
إلا أنّ البزّار علّله بقوله:"لا نعلمه عن عبد الرحمن إلا بهذا الإسناد، وقد رواه جماعة فلم يقولوا: عن عبد الرحمن. رواه الثوريّ عن هشام، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لعبد الرحمن: إلّا أن محمد بن عمر بن هياج قد حدّثنا به فقال: حدّثنا أبو نعيم، عن سفيان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن عوف، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم".
قلت: اختلف على هشام في الوصل والإرسال، فرواه عنه مالك في الموطأ في الحج (118)، وعبد الرزاق في المصنف (8900) عن معمر، والبيهقي (5/ 80) عن جعفر بن عون كلّهم عن هشام ابن عروة، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لعبد الرحمن بن عوف:"كيف فعلت يا أبا محمد! في استلام الحجر؟" قال: كل ذلك! استلمت وتركت. قال:"أصبت". ورجاله رجال الصحيح.
ورواه عنه الثوريّ واختلف عليه، فمرة رواه مرسلًا، وأخرى متصلًا.
وممن رواه عنه متصلًا بشر بن السريّ وهو حافظ ضابط، ومحمد بن عمر بن هياج كما قال البزار، ثم هو لم ينفرد بوصله.
فقد وصله أيضًا اثنان: عبيد الله بن عمر عند الطبراني في"الصغير"، وزهير بن معاوية عند البزار - كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن عوف، قال: فذكر الحديث.
وأخرجه ابن عبد البر في"التمهيد" (22/ 262) من وجه آخر مسندًا عن القاسم بن محمد، عن ابن أبي نجيح، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبيه، أنه عليه السلام قال له (فذكر الحديث).
فلا وجه لتعليل الحديث بالإرسال كما قال البزّار، ثم استدركهـ بقوله:"إلّا أن محمد بن عمر ابن هياج قد حدثناه فذكره متصلًا، وفيه زيادة علم".
وقد فسّر الشافعي فعل عبد الرحمن بن عوف فقال: أحسب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لعبد الرحمن:"أصبتَ" أنه وصف له أنه استلم في غير زحام، وترك في زحام. الأم (2/ 172).
قلت: وعمل السّلف يقوّي هذا.
فعن عطاء قال: إنه سمع ابن عباس يقول: إذا وجدتَ على الرّكن زحامًا فلا تؤذِ أحدًا، ولا تؤذ وامضِ.
رواه عبد الرزاق (8908) عن ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، فذكره.
وعن منبوذ بن أبي سليمان، عن أمّه أنها كانت عند عائشة أمّ المؤمنين، فدخلتْ عليها مولاة لها فقالت: يا أمّ المؤمنين! طفتُ بالبيت سبعًا، واستلمت الرّكن مرتين أو ثلاثًا! فقالت عائشة: لا أجرك الله، لا أجرك الله، تدافعين الرجال؟ ! ألا كبّرت ومررت.
رواه الشافعي في الأم (2/ 172) عن سعيد بن سالم، عن عمر بن سعيد بن أبي حسين، عن منبوذ بن أبي سليمان، فذكره.
قال البيهقيّ (5/ 81): وروينا عن سعد بن أبي وقاص أنه كان يقول لهن: إذا وجدتن فرجة من الناس فاستلمن، وإلا فكبّرن وامضين.
وأما ما رُوي عن عمر بن الخطاب أن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال له:"يا عمر؟ ! إنّك رجلٌ قويٌّ، لا تزاحم على الحجر فتؤذي الضّعيف، إن وجدتَ خلوةٌ فاستلمه، وإلّا فاستقبله فهلّل وكبّر" فهو ضعيف.
روي من وجهين أحدهما مرفوعًا متصلًا.
وهو ما رواه البيهقيّ (5/ 80) عن شيخه أبي عبد الله الحافظ، ثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، ثنا أبو الحسن محمد بن إسحاق بن إبراهيم الحنظليّ إملاء في مسجد رجاء بن معاوية، أنبأ علي بن عبد الله، ثنا مفضل بن صالح، عن محمد بن المنكدر، عن سعيد بن المسيب، عن عمر بن الخطاب، فذكره.
ومفضل بن صالح هو الأسديّ النّخاس، قال فيه البخاري:"منكر الحديث"، وقال أبو حاتم:"منكر الحديث"، وفي"التقريب":"ضعيف" مع خلاف في سماع سعيد بن المسيب من عمر بن الخطاب.
والطريق الثاني هو ما رواه عبد الرزاق (8910)، والإمام أحمد (190) كلاهما من حديث
سفيان (وهو الثوريّ) -وقرنه عبد الرزاق بابن عيينة- كلاهما عن أبي يعفور العبديّ، قال: سمعت شيخًا بمكة في إمارة الحجّاج يحدّث عن عمر بن الخطاب، فذكره.
ورواه البيهقيّ من طريق أبي عوانة، عن أبي يعفور، عن شيخ من خزاعة، قال: وكان استخلفه الحجاج على مكة.
ورواه الشافعي عن ابن عيينة، عن أبي يعفور، عن الخزاعي، قال سفيان: وهو عبد الرحمن بن الحارث كان الحجاج استعمله عليها منصرفه منها.
ورواه البيهقي وقال: وهو شاهد لرواية ابن المسيب.
قلت: وفيه إرسال لأن عبد الرحمن بن الحارث، وهو عبد الرحمن بن نافع بن الحارث من أولاد الصحابة لم يدرك عمر بن الخطاب، وهو الذي استعمله الحجاج على ولاية مكة، كما أن أباه أيضًا كان عاملًا عليها في عهد عمر بن الخطاب إلّا أن هذا المرسل يقوي ما رواه سعيد بن المسيب فيكون للحديث أصل، وهو ليس على شرط هذا الكتاب. والله الموفق.
আব্দুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: "হাজরে আসওয়াদ চুম্বন করার ক্ষেত্রে তুমি কী করেছ?" আমি বললাম: আমি চুম্বনও করেছি, আবার ছেড়েও দিয়েছি (চুম্বন করিনি)। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সঠিক করেছ।"
4865 - عن عروة بن الزبير، قال: أخبرتني عائشة رضي الله عنها: أَنَّ أَوَّلَ شَيْءٍ بَدَأَ بِهِ حِينَ قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ تَوَضَّأَ، ثُمَّ طَافَ ثُمَّ لَمْ تَكُنْ عُمْرَةً، ثُمَّ حَجَّ أَبُو بَكْرٍ وَعُمَرُ رضي الله عنهما مِثْلَهُ، ثُمَّ حَجَجْتُ مَعَ أَبِي الزُّبَيْرِ رضي الله عنه فَأَوَّلُ شَيْءٍ بَدَأَ بِهِ الطَّوَافُ، ثُمَّ رَأَيْتُ الْمُهَاجِرِينَ وَالأَنْصَارَ يَفْعَلُونَهُ، وَقَدْ أَخْبَرَتْنِي أُمِّي أَنَّهَا أَهَلَّتْ هِيَ وَأُخْتُهَا وَالزُّبَيْرُ وَفُلانٌ وَفُلانٌ بِعُمْرَةٍ فَلَمَّا مَسَحُوا الرُّكْنَ حَلُّوا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1614)، ومسلم في الحجّ (1235) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن محمد بن عبد الرحمن، قال: ذكرتُ لعروة، قال (فذكره) والسياق للبخاريّ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (মক্কায়) আগমন করলেন, তখন তিনি সর্বপ্রথম যা শুরু করলেন, তা হলো তিনি ওযু করলেন, এরপর তাওয়াফ করলেন। তবে সেটি উমরাহ ছিল না। এরপর আবূ বাকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ঠিক অনুরূপভাবে হজ্জ করেছিলেন। (রাবী) উরওয়াহ বলেন, এরপর আমি আমার বাবা যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে হজ্জ করলাম, তখন সর্বপ্রথম তিনি যা শুরু করলেন, তা হলো তাওয়াফ। এরপর আমি মুহাজিরীন ও আনসারগণকেও অনুরূপ করতে দেখেছি। আমার মা আমাকে আরও জানিয়েছেন যে, তিনি, তাঁর বোন, যুবাইর, অমুক ও অমুক—তাঁরা সবাই উমরার ইহরাম বেঁধেছিলেন। যখন তাঁরা রুকন স্পর্শ করলেন (তাওয়াফ শেষ করলেন), তখন তাঁরা হালাল হয়ে গেলেন।
4866 - عن ابن عمر: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا طَافَ فِي الْحَجِّ أَو الْعُمْرَةِ أَوَّلَ مَا يَقْدَمُ سَعَى ثَلاثَةَ أَطْوَافٍ، وَمَشَى أَرْبَعَةً، ثُمَّ سَجَدَ سَجْدَتَيْنِ ثُمَّ يَطُوفُ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1616)، ومسلم في الحجّ (1261: 231) كلاهما من حديث موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন হজ্জ বা উমরাহর উদ্দেশ্যে (মক্কায়) আগমন করে তাওয়াফ করতেন, তখন প্রথমে তিন চক্কর দ্রুত চলতেন (রমল করতেন), এবং চার চক্কর হেঁটে চলতেন (সাধারণ গতিতে)। অতঃপর তিনি দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন এবং তারপর সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা'ঈ করতেন।
4867 - عن عبد الله بن أبي أوفى، قال: اعْتَمَرَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَاعْتَمَرْنَا مَعَهُ، فَلَمَّا دَخَلَ مَكَّةَ طَافَ وَطُفْنَا مَعَهُ، وَأَتَى الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ وَأَتَيْنَاهَا مَعَهُ وَكُنَّا نَسْتُرُهُ مِنْ أَهْلِ مَكَّةَ أَنْ يَرْمِيَهُ أَحَدٌ.
فَقَالَ لَهُ صَاحِبٌ لِي: أَكَانَ دَخَلَ الْكَعْبَةَ؟ قَالَ: لا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1791) عن إسحاق بن إبراهيم، عن جرير، عن إسماعيل، عن عبد الله بن أبي أوفى، فذكره. ورواه مسلم في الحج (1332) من وجه آخر عن إسماعيل بن أبي خالد عنه مختصرا.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাহ করেছেন এবং আমরাও তাঁর সাথে উমরাহ করেছি। যখন তিনি মক্কায় প্রবেশ করলেন, তখন তিনি তাওয়াফ করলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে তাওয়াফ করলাম। আর তিনি সাফা ও মারওয়ার (পাহাড়ের) কাছে এলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে সেখানে এলাম। আর আমরা মক্কাবাসীদের থেকে তাঁকে আড়াল করে রাখতাম এই ভয়ে যে, কেউ তাঁকে আঘাত করতে পারে। আমার এক সঙ্গী তাঁকে (আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফাকে) জিজ্ঞেস করলেন: তিনি কি কা'বায় প্রবেশ করেছিলেন? তিনি বললেন: না।
