আল-জামি` আল-কামিল
4881 - عن أسلم مولي عمر، أنّ عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال لِلرُّكْنِ: أَمَا وَالله إِنِّي لأَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لا تَضُرُّ وَلا تَنْفَعُ، وَلَوْلا أَنِّي رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اسْتَلَمَكَ مَا اسْتَلَمْتُكَ، فَاسْتَلَمَهُ. ثُمَّ قَالَ: فَمَا لَنَا وَلِلرَّمَلِ إِنَّمَا كُنَّا رَاءَيْنَا بِهِ الْمُشْرِكِينَ وَقَدْ أَهْلَكَهُم الله. ثُمَّ قَالَ: شَيْءٌ صَنَعَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَلا نُحِبُّ أَنْ نَتْرُكَهُ.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1605) عن سعيد بن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد بن أسلم، عن أبيه، به، فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (হাজরে আসওয়াদ সংলগ্ন) রুক্নকে লক্ষ্য করে বললেন: "সাবধান! আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই জানি যে তুমি একটি পাথর, যা ক্ষতিও করতে পারো না এবং উপকারও করতে পারো না। যদি আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তোমাকে চুম্বন করতে বা স্পর্শ করতে না দেখতাম, তবে আমি তোমাকে চুম্বন/স্পর্শ করতাম না।" অতঃপর তিনি তা চুম্বন/স্পর্শ করলেন। এরপর তিনি বললেন: "আর 'রামল'-এর (দ্রুতগতিতে তাওয়াফ করা) সাথে আমাদের কী প্রয়োজন? আমরা তো কেবল মুশরিকদেরকে দেখানোর জন্যই এটি করতাম, অথচ আল্লাহ তাদের ধ্বংস করে দিয়েছেন।" অতঃপর তিনি বললেন: "তবে (এটা এমন) একটি কাজ যা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করেছেন, তাই আমরা তা পরিহার করতে পছন্দ করি না।"
4882 - عن عمر بن الخطاب، قال: فِيمَ الرَّمَلانُ الْيَوْمَ، وَالْكَشْفُ عَن الْمَنَاكِبِ، وَقَدْ أَطَّأَ الله الإِسْلامَ وَنَفَى الْكُفْرَ وَأَهْلَهُ؟ ! مَعَ ذَلِكَ لا نَدَعُ شَيْئًا كُنَّا نَفْعَلُهُ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (1887) عن أحمد بن حنبل -وهو في مسنده (317) -، وابن ماجه (2952) كلّهم من حديث هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، قال: سمعت عمر يقول (فذكره).
وإسناده حسن من أجل الكلام في هشام بن سعد، وهو المدني أبو عماد مختلف فيه، فضعّفه ابن معين والنسائي، ومشّاه غيرهم فهو حسن الحديث.
وصحّحه ابن خزيمة (2708)، والحاكم (1/ 454) كلاهما من هذا الوجه وقال:"صحيح على شرط مسلم". وأصله في صحيح البخاريّ (1605) كما مضى.
قال ابن خزيمة:"إنّ السنة قد كان يسنّها النبيّ صلى الله عليه وسلم لعلّة حادثة، فتزول العلّة، وتبقى السنة إلى الأبد؛ إذ النبيّ صلى الله عليه وسلم رمل في الابتداء، واضطبع ليُري المشركين قوّته وقوّة أصحابه، فبقي الاضطباع والرَّمل سنتان إلى الأبد".
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আজ কেন রমল করা হবে এবং কাঁধ উন্মুক্ত রাখা হবে? অথচ আল্লাহ্ ইসলামকে সুপ্রতিষ্ঠিত করেছেন এবং কুফর ও তার অনুসারীদের বিতাড়িত করেছেন! এত কিছুর পরেও, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা যা কিছু করতাম, তার কিছুই আমরা ছাড়ব না।
4883 - عن ابن عباس، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اضْطَبَعَ، فَاسْتَلَمَ وَكَبَّرَ، ثُمَّ رَمَلَ ثَلاثَةَ أَطْوَافٍ، وَكَانُوا إِذَا بَلَغُوا الرُّكْنَ الْيَمَانِيَ وَتَغَيَّبُوا مِنْ قُرَيْشٍ مَشَوْا، ثُمَّ يَطْلُعُونَ عَلَيْهِمْ يَرْمُلُونَ، تَقُولُ قُرَيْشٌ: كَأَنَّهُم الْغِزْلانُ. قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: فَكَانَتْ سُنَّةً.
حسن: رواه أبو داود (1889)، وابن ماجه (2953) كلاهما من حديث ابن خثيم، عن أبي الطفيل، عن ابن عباس، فذكر الحديث، واللّفظ لأبي داود.
وفي لفظ لابن ماجه: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم لأصحابه حين أرادوا دخول مكة في عمرته بعد الحديبية:"إنّ قومكم غدًا سيرونكم، فليرونكم جلدًا".
ورواه الإمام أحمد (2792)، وصحّحه ابن خزيمة (2700)، وابن حبان (3814) كلّهم من هذا الوجه، واختصره ابن خزيمة.
وإسناده حسن من أجل الكلام في ابن خثيم فإنه صدوق، وقد حسّنه أيضًا الحافظ المنذريّ وغيره.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইযতিবা' করলেন (ডান কাঁধ উন্মুক্ত করলেন), এরপর তিনি (হাজরে আসওয়াদ) স্পর্শ করে তাকবীর বললেন। অতঃপর তিনি তিন চক্করে (তাওয়াফে) 'রামল' করলেন (দ্রুত গতিতে চললেন)। আর তারা যখন রুকন ইয়ামানীর কাছে পৌঁছতেন এবং কুরাইশদের দৃষ্টির আড়ালে চলে যেতেন, তখন হেঁটে চলতেন। এরপর তারা তাদের সামনে প্রকাশিত হলে পুনরায় রামল করতেন। কুরাইশরা তখন বলত: তারা যেন হরিণ। ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর তা (রামল করা) সুন্নাত হয়ে গেল।
4884 - عن يعلى بن أميّة، قال: طافَ النّبيُّ صلى الله عليه وسلم مُضطبعًا بُبردٍ.
حسن: رواه أبو داود (1883)، والترمذيّ (859)، وابن ماجه (2954) كلّهم من طريق سفيان، عن ابن جريج، عن عبد الحميد، عن ابن علي بن أمية، عن أبيه، فذكره.
إلّا أنّ أبا داود لم يذكر بين ابن جريج وبين ابن يعلى"عبد الحميد" والصواب إثباته وكذلك رواه الدارمي (1885)، والإمام أحمد (17952) إلا أنه أبهم الرجل.
قال الترمذيّ:"هذا حديث الثوري عن ابن جريج، ولا نعرفه إلا من حديثه. وهو حديث حسن صحيح، وعبد الحميد هو ابن جبيرة بن شيبة، عن ابن يعلى، عن أبيه، وهو يعلى بن أمية".
وأما ابن يعلى بن أمية فرجّح المزي والحافظ ابن حجر وغيرهما أنه صفوان بن يعلى، إذ إن ليعلى ابن أمية أربعة أولاد وهم: صفوان، ومحمد، وعثمان، وعبد الرحمن، وكلّهم يروون عن أبيهم.
قال المزي: إن لم يكن صفوان بن يعلي فلا أدري من هو؟ .
وصفوان ثقة من رجال الشيخين، وهو أشهرهم
ইয়ালা বিন উমাইয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি চাদর পরিধান করে ইযতিবা (ডান কাঁধ উন্মুক্ত করে) অবস্থায় তাওয়াফ করেছেন।
4885 - عن أمِّ سلمة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: شَكَوْتُ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنِّي أَشْتَكِي، فَقَالَ:"طُوفِي مِنْ وَرَاءِ النَّاسِ وَأَنْتِ رَاكِبَةٌ". قَالَتْ: فَطُفْتُ رَاكِبَةً بَعِيرِي وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِينَئِذٍ يُصَلِّي إِلَى جَانِبِ الْبَيْتِ وَهُوَ يَقْرَأُ بِ {وَالطُّورِ (1) وَكِتَابٍ مَسْطُورٍ (2)}.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (123) عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن بن نوفل، عن عروة بن الزبير، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الحج (1633)، ومسلم في الحج (1276) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী) বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অভিযোগ করলাম যে আমি অসুস্থ। তিনি বললেন: "তুমি আরোহণ করা অবস্থায় মানুষের পেছন দিক দিয়ে তাওয়াফ কর।" তিনি বলেন: আমি তখন আমার উটের পিঠে আরোহণ করে তাওয়াফ করলাম, আর তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর একপাশে সালাত আদায় করছিলেন এবং তিনি {وَالطُّورِ (1) وَكِتَابٍ مَسْطُورٍ (2)} পড়ছিলেন।
4886 - عن ابن عباس: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم طاف في حجّة الوداع على بعير، يستلم الرُّكن بمِحْجَن.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1607)، ومسلم في الحج (1272) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه البخاريّ (1632) من وجه آخر عنه وزاد فيه:"وكبّر".
قوله:"بمحجن" المحجن: عصا معوجة الرّأس.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জে একটি উটের পিঠে তাওয়াফ করেছিলেন। তিনি (হাজরে আসওয়াদ) রুকনটি একটি বাঁকা লাঠি দ্বারা স্পর্শ করছিলেন।
4887 - عن جابر، قال: طَافَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم بِالْبَيْتِ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ عَلَى رَاحِلَتِهِ يَسْتَلِمُ الْحَجَرَ بِمِحْجَنِهِ لأَنْ يَرَاهُ النَّاسُ وَلِيُشْرِفَ وَلِيَسْأَلُوهُ فَإِنَّ النَّاسَ غَشُوهُ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1273) من طرق، عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله، يقول (فذكره).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় তাঁর আরোহী পশুর উপর আরোহণ করে কা'বা শরীফ তাওয়াফ করেছিলেন। তিনি তাঁর বাঁকানো লাঠি (মিহজান) দ্বারা হাজারে আসওয়াদকে স্পর্শ করেছিলেন। (তিনি এমনটি করেছিলেন) যেন লোকেরা তাঁকে দেখতে পায়, তিনি যেন (উঁচু হওয়ার কারণে) সবার উপরে দৃশ্যমান থাকেন এবং লোকেরা তাঁকে প্রশ্ন করতে পারে। কারণ লোকেরা তাঁকে ঘিরে ধরেছিল।
4888 - عن أبي الطفيل عامر بن واثلة، قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يطوف بالبيت ويستلمُ الرُّكنَ بمحجن معه، ويقبِّلُ المحجن.
صحيح: رواه مسلم (1275) عن محمد بن المثنى، حدّثنا سليمان بن داود، حدثنا معروف بن خرّبوذ، قال: سمعت أبا الطفيل، فذكره.
আবুত তুফাইল আমের ইবনে ওয়াছিলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করছেন এবং তাঁর সাথে থাকা একটি বাঁকা লাঠি (মিহজান) দ্বারা রুকন (হাজারে আসওয়াদ) স্পর্শ করছেন, আর তিনি সেই লাঠিটিকে চুম্বন করছেন।
4889 - عن عائشة، قالت: طاف النبيُّ صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع حول الكعبة على بعيره، يستلم الرُّكن كراهية أن يُضرب عنه النّاس.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1274) عن الحكم بن موسى القنطريّ، حدّثنا شعيب بن إسحاق، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
ورواه الطبراني في الأوسط (2636) من وجه آخر عن الدّراورديّ عن هشام بن عروة، بإسناده،
إلا أنه قال فيه:"عام الفتح".
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن هشام إلّا الدّراورديّ".
وهو كما قال، ويمكن حمل حديث عائشة على التّعدد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বিদায় হজ্জের সময় নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উটের পিঠে চড়ে কা'বার চারপাশে তাওয়াফ করেছিলেন। তিনি রুকন স্পর্শ করছিলেন এই অপছন্দবশত যে (তাঁকে জায়গা করে দেওয়ার জন্য) যেন মানুষজন তাঁর কাছ থেকে সরিয়ে দেওয়া না হয়।
4890 - عن صفيّة بنت شيبة، قالت: لما اطمأنَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بمكّة عام الفتح طاف على بعير يستلم الرُّكنَ بمحجن في يده. قالت: وأنا أنظرُ إليه.
حسن: رواه أبو داود (1878)، وابن ماجه (2947) كلاهما من حديث يونس بن بكير، حدثنا ابن إسحاق، حدثني محمد بن جعفر بن الزبير، عن عبيد الله بن عبد الله بن أبي ثور، عن صفية بنت شيبة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس، وإذا صرّح فهو حسن الحديث على خلاف في صفية بنت شيبة هل لها صحبة أم لا؟ فحكي عن أبي عبد الرحمن النسائي أن حديثها مرسل، ولكن ذكرها ابن السكن وابن عبد البر في الصحابة، ولها حديث في صحيح البخاري، وقولها:"وأنا أنظر إليه" صريح في إثبات الصحبة.
সাফিয়্যাহ বিনত শাইবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর মক্কায় স্বস্তি লাভ করলেন, তখন তিনি একটি উটের ওপর আরোহণ করে তাওয়াফ করলেন। তিনি তাঁর হাতের বাঁকানো লাঠি (মিহজন) দ্বারা রুকন (কোণ) স্পর্শ করছিলেন। তিনি (সাফিয়্যাহ) বলেন: আর আমি তাঁর দিকে তাকিয়ে ছিলাম।
4891 - عن قدامة بن عبد الله، قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم على ناقة يستلم الحجر بمحجنه.
حسن: رواه الإمام أحمد (15412)، وأبو يعلى (928)، والطبراني في الكبير (19/ 38)، وفي"الأوسط" (8024) كلهم من طريق محرز بن عون، عن قرّان بن تمام الأسدي، عن أيمن بن نابل، عن قدامة بن عبد الله، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في قران بن تمام، وشيخه أيمن بن نابل فهما مختلف فيهما غير أنهما حسنا الحديث إذا لم يخطئا.
কুদামা ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি উটনীর উপর দেখেছিলাম। তিনি তাঁর মিহজান (বাঁকানো লাঠি/আঁকশি) দ্বারা (হাজরে আসওয়াদ) স্পর্শ করছিলেন।
4892 - عن ابن عمر قال: طاف رسول الله صلى الله عليه وسلم على راحلته القصواء يوم الفتح واستلم الركن بمحجنه وما وجد لها مناخا في المسجد حتى أخرجت إلى بطن الوادي فأنيخت، ثم حمد الله وأثنى عليه ثم قال:"أما بعد، أيّها الناس! فإنّ الله قد أذهب عنكم عبية الجاهلية. يا أيّها الناس! إنما النّاس رجلان: بر تقي كريم على ربه وفاجر شقي هين على ربه". ثم تلا: {يَاأَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنْثَى وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا} [الحجرات: 13] حتى قرأ الآية ثم قال:"أقول هذا واستغفر الله لي لكم".
صحيح: رواه ابن حبان (3828) -واللّفظ له-، وابن خزيمة (2781) كلاهما من حديث محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، ثنا عبد الله بن رجاء، عن موسى بن عقبة، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.
واختصره ابن خزيمة بقوله:"طاف رسول الله صلى الله عليه وسلم على راحلته القصوى يوم الفتح، ليستلم
الركن بمحجنه". وإسناده صحيح.
وأما قول الترمذيّ في"جامعه" في كتاب التفسير (3270) بعد أن رواه من طريق جعفر بن عبد الله، حدثنا عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكر الحديث:"هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، إلّا من هذا الوجه، وعبد الله بن جعفر يضعّف، ضعّفه يحيي ابن معين وغيره، وعبد الله بن جعفر هو والد علي بن المديني". فهو حسب علمه وإلّا فقد روي أيضًا موسى بن عقبة عن عبد الله بن دينار كما رأيت.
وأما ما رواه أبو يعلى (5761) من وجه آخر عن روح بن عبادة، حدثنا موسي بن عبيدة، حدّثنا عبد الله بن عبيدة، عن ابن عمر، قال:"طاف رسول الله صلى الله عليه وسلم على راحلته يوم فتح مكة يستلم الأركان بمحجن معه". ففيه موسي بن عبيدة ضعيف، وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (3/ 243) وقال:"وقد وُثق فيما رواه عن غير عبد الله بن دينار. وهذا منها".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন তাঁর উটনী কাসওয়ার পিঠে আরোহণ করে তাওয়াফ করেন এবং তাঁর বাঁকা লাঠি (মিহজান) দিয়ে রুকন (হাজারে আসওয়াদ) স্পর্শ করেন। আর মাসজিদের ভেতরে তিনি সেটিকে বসানোর (বিশ্রামের) জায়গা পেলেন না, অবশেষে সেটিকে উপত্যকার অভ্যন্তরে নিয়ে যাওয়া হয় এবং সেখানে বসানো হয়। এরপর তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, অতঃপর বললেন: "আম্মা বা'দ (যাহোক), হে লোক সকল! নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের থেকে জাহিলিয়াতের ঔদ্ধত্য দূর করেছেন। হে মানবজাতি! মানুষ মূলত দুই প্রকার: নেককার, মুত্তাকী, যে তার রবের কাছে সম্মানিত, আর পাপিষ্ঠ, হতভাগ্য, যে তার রবের কাছে নিকৃষ্ট।" এরপর তিনি এই আয়াত তিলাওয়াত করলেন: "হে মানবজাতি! আমরা তোমাদেরকে এক পুরুষ ও এক নারী থেকে সৃষ্টি করেছি এবং তোমাদেরকে বিভিন্ন জাতি ও গোত্রে বিভক্ত করেছি, যাতে তোমরা পরস্পরকে চিনতে পারো।" [সূরা হুজুরাত: ১৩] — এই পর্যন্ত পুরো আয়াতটি তিনি পাঠ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আমি এই কথাগুলো বললাম, আর আমার ও তোমাদের জন্য আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি।"
4893 - عن ابن عباس، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم مَرَّ وَهُوَ يَطُوفُ بِالْكَعْبَةِ بِإِنْسَانٍ رَبَطَ يَدَهُ إِلَى إِنْسَانٍ بِسَيْرٍ أَوْ بِخَيْطٍ أَوْ بِشَيْءٍ غَيْرِ ذَلِكَ، فَقَطَعَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِيَدِهِ ثُمَّ قَالَ:"قُدْهُ بِيَدِهِ".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1620)، عن إبراهيم بن موسي، حدّثنا هشام، أن ابن جريج أخبرهم قال: أخبرني سليمان الأحول، أنّ طاوسًا أخبره، عن ابن عباس، فذكره كما مضى.
ورواه في الأيمان والنذور (6703) بالإسناد نفسه، وقال فيه:"يقود إنسانًا بخزامة في أنفه".
والخزامة: حلقة من شعر أو وبر، تجعل في الحاجز الذي بين منخري البعير، يشدّ فيها الزّمام ليسهل انقياده. قاله الحافظ في الفتح (11/ 589).
وقال السيوطيّ:"يجعل في أحد جانبي منخري البعير".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাবা তাওয়াফ করার সময় এমন এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে এক ব্যক্তিকে চামড়ার ফিতা, বা সুতা কিংবা অন্য কোনো কিছু দিয়ে তার হাতের সাথে বেঁধে রেখেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে সেটি কেটে দিলেন। এরপর বললেন: "তাকে তার হাত দিয়ে পরিচালনা করো।"
4894 - عن عبد الله بن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الطَّوَافُ حَوْلَ الْبَيْتِ مِثْلُ الصَّلاةِ إِلا أَنَّكُمْ تَتَكَلَّمُونَ فِيهِ، فَمَنْ تَكَلَّمَ فِيهِ فَلا يَتَكَلَّمَنَّ إِلا بِخَيْرٍ".
حسن: رواه الترمذيّ (960) عن قتيبة، حدّثنا جرير، عن عطاء بن السائب، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (2739)، ورواه من طريق جرير بإسناده، مثله.
ومداره على عطاء بن السائب، وأعل الحديث من وجهين:
أحدهما: أنه اختُلف في رفعه ووقفه، فرجح الموقوفَ النسائيُّ، والبيهقي، وابنُ الصلاح، والمنذري، والنووي، وزاد: إن رواية الرفع ضعيفة.
وتعقبه الحافظُ ابن حجر في التلخيص (1/ 129) فقال:"وفي إطلاق ذلك نظر، فإن عطاء بن
السائب صدوق، وإذا روي عنه الحديثُ مرفوعًا تارةً، وموقوفًا أخرى، فالحكم عند هؤلاء الجماعة للرفع، والنووي ممن يعتمد ذلك، ويُكثر منه، ولا يلتفت إلى تعليل الحديث به إذا كان الرافعُ ثقةً، فيجيء على طريقته أن المرفوع صحيح".
الثاني: أن عطاء بن السائب اختلط في آخره، وجرير ممن روى عنه بعد الاختلاط.
ولكن رواه الحاكم (1/ 459) والبيهقي (5/ 87) من طريق سفيان الثوري عنه، والثوري ممن سمع منه قبل اختلاطه باتفاق، وإن كان قد اختلف علي سفيان، فرجح ابن حجر أنه عن سفيان موقوف.
وممن رواه عن عطاء بن السائب فُضيل بن عياض، ومن طريقه رواه الطحاوي في مشكله (5574) وابن حبان (3836) والحاكم (2/ 267) وابن عدي (5/ 2001) والبيهقي (5/ 85) وابن الجارود (461) من وجهين، فُضيل بن عياض، وموسي بن أعين.
وللحاكم إسناد آخر رواه من طريق الحميدي، ثنا سفيان بن عيينة، عن عطاء بن السائب فذكره مرفوعًا، ومن طريقه رواه البيهقي أيضًا.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه، وقد أوقفه جماعة".
قال ابن عدي:"لا أعلم روي هذا عن عطاء بن السائب غير هؤلاء الذين ذكرتهم: موسي بن أعين، وفُضيل، وجرير".
كذا قال، وقد رواه أيضًا سفيان الثوري، وسفيان بن عيينة كما مضى، إلا أنه قد اختلف عليهما في الرفع والوقف.
وأما قول الترمذي:"وقد رُوي هذا الحديث عن ابن طاوس وغيره عن طاوس، عن ابن عباس موقوفًا، ولا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث عطاء بن السائب" ففيه نظر.
فإنه رُوي عن طاوس من وجوه:
منها: روي عنه موقوفًا كما قال الترمذي، وممن رواه عنه موقوفًا: عبد الله بن طاوس، وإبراهيم ابن ميسرة، كما ذكره البيهقي.
أخرج النسائي في الكبرى (3944) من رواية إبراهيم بن ميسرة.
ومنها روي عنه مرفوعًا: رواه عبد الرزاق في مصنفه (9788) ورواه عنه وعن روح -الإمامُ أحمد (15423) قالا: ثنا ابنُ جريج قال: أخبرني حسن بن مسلم، عن طاوس، عن رجل قد أدرك النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنما الطوافُ صلاة، فإذا طفتم فأقلوا الكلام".
ورواه النسائي في الكبرى (3945) والبيهقي (5/ 87) عن عبد الرزاق وحده، وقال البيهقي:"وكذلك قاله عثمان بن عمر، وحجاجُ بن محمد عن ابن جريج" أي هؤلاء رفعوا هذا الحديث.
ولكن قال الإمام أحمد:"ولم يرفعه محمد بن بكر -وهو البرساني- ورفعه غيره كما رأيتَ".
قال الحافظ ابن حجر:"وهذه الرواية صحيحة، وهي تعضد رواية عطاء بن السائب، وترجح
الرواية المرفوعة، والظاهر أن المبهم فيها هو ابنُ عباس، وعلى تقدير: أن يكون غيره، فلا يضر إبهام الصحابة".
ومنها: حنظلة عنه، قال: سمعت ابن عمر يقول: أقلوا الكلام في الطواف، فإنما أنتم في صلاة.
ومنها: ما رواه عطاء بن السائب عنه، ولكنه اختلف عليه:
فرواه جرير، وسفيانُ الثوري، وفضيل بن عياض كلهم عنه مرفوعًا، وإن كان الصحيح عن سفيان موقوفًا، كما سيأتي.
وقول الترمذي:"لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث عطاء بن السائب" فهو ليس كذلك، فقد رواه غير عطاء بن السائب عن طاوس مرفوعًا:
منهم: ليثُ بن أبي سليم عن طاوس عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الطوافُ بالبيت صلاة، ولكن الله أحل فيه المنطقَ، فمن نطقَ فلا ينطق إلا بخير" رواه البيهقي (5/ 87) من حديث موسي ابن أعين، عن ليث به.
وليث بن أبي سليم صدوق اختلط أخيرًا، ولم يتميز حديثُه فترك كما في"التقريب"، وقال في التلخيص:"وليثٌ يستشهد به".
ومنهم: مَن رواه من طريق أخرى مرفوعة أخرجها الحاكم في أوائل تفسير سورة البقرة من المستدرك (2/ 266، 267) من طريق القاسم بن أبي أيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: قال الله لنبيه: {وَطَهِّرْ بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْقَائِمِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ} [الحج: 26].
فالطواف مثل الصلاة، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطوافُ بمنزلة الصلاة إلا أن الله قد أحل فيه المنطقَ، فمن نطقَ، فلا ينطق إلا بخير" وصحح إسناده. انتهى.
قال الحافظ ابن حجر: وهو كما قال، فإنهم ثقات، وقال أيضًا في نهاية التخريج:"فأوضحُ الطرقِ وأسلمُها روايةُ القاسم بن أبي أيوب … فإنها سالمة من الاضطراب إلا أني أظنُّ أن فيها إدراجًا"، ولم يبين هذا الإدراج.
قلت: والخلاصة فيه أن هذه الطرق يعضد بعضُها بعضًا، فيصير الحديث حسنًا لغيره، فإن هذا هو السبيل للحديث الحسن بأنه رُوي من غير وجه، والله تعالى أعلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বায়তুল্লাহর চারপাশে তাওয়াফ সালাতের (নামাযের) মতোই, তবে তোমরা এতে কথা বলতে পারো। সুতরাং যে এতে কথা বলবে, সে যেন ভালো কথা ছাড়া আর কিছু না বলে।"
4895 - عن ابن جريج، قال: أخبرني عطاء إِذْ مَنَعَ ابْنُ هِشَامٍ النِّسَاءَ الطَّوَافَ مَعَ الرِّجَالِ. قَال: كَيْفَ يَمْنَعُهُنَّ وَقَدْ طَافَ نِسَاءُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مَعَ الرِّجَالِ؟ ! قُلْتُ: أَبَعْدَ الْحِجَابِ أَوْ قَبْلُ؟ قَال: إِي لَعَمْرِي لَقَدْ أَدْرَكْتُهُ بَعْدَ الْحِجَابِ. قُلْتُ: كَيْفَ يُخَالِطْنَ الرِّجَالَ؟ قَالَ: لَمْ يَكُنَّ يُخَالِطْنَ، كَانَتْ عَائِشَةُ رضي الله عنها تَطُوفُ حَجْرَةً مِن
الرِّجَالِ لا تُخَالِطُهُمْ، فَقَالَت امْرَأَةٌ: انْطَلِقِي نَسْتَلِمْ يَا أُمَّ الْمُؤْمِنِينَ. قَالَتْ: انْطَلِقِي عَنْكِ، وَأَبَتْ. يَخْرُجْنَ مُتَنَكِّرَاتٍ بِاللَّيْلِ فَيَطُفْنَ مَعَ الرِّجَالِ، وَلَكِنَّهُنَّ كُنَّ إِذَا دَخَلْنَ الْبَيْتَ قُمْنَ حَتَّى يَدْخُلْنَ وَأُخْرِجَ الرِّجَالُ، وَكُنْتُ آتِي عَائِشَةَ أَنَا وَعُبَيْدُ بْنُ عُمَيْرٍ وَهِيَ مُجَاوِرَةٌ فِي جَوْفِ ثَبِيرٍ. قُلْتُ: وَمَا حِجَابُهَا؟ قَالَ: هِيَ فِي قُبَّةٍ تُرْكِيَّةٍ لَهَا غِشَاءٌ وَمَا بَيْنَنَا وَبَيْنَهَا غَيْرُ ذَلِكَ وَرَأَيْتُ عَلَيْهَا دِرْعًا مُوَرَّدًا".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1618) عن عمرو بن علي، حدّثنا أبو عاصم، عن ابن جريج، به، فذكره.
قلت: وهذا الحديث ظاهره الوقف؛ لأنّ عطاء لم يرفعه إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم لكنه يروي عن أزواج النبيّ فعلًا جرى عليه العمل في عهد النبيّ إلى زمانه، فمن هنا كان له حكم الرفع، والله أعلم.
قوله:"ابن هشام" هو إبراهيم أو أخوه محمد بن هشام المخزوميّ، وكان ذلك في خلافة هشام ابن عبد الملك بن مروان.
وقوله:"حَجْرَة" بفتح الحاء المهملة، وسكون الجيم بعدها راء أي ناحية.
وفي رواية:"حَجْزة" بالزّاي بدل الراء يعني محجوزًا بينها وبين الرجال بثوب.
'আতা থেকে বর্ণিত, ইবনু হিশাম যখন মহিলাদেরকে পুরুষদের সাথে তাওয়াফ করতে নিষেধ করলেন, তখন তিনি বললেন: তিনি কীভাবে তাদের বাধা দিচ্ছেন, অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ তো পুরুষদের সাথেই তাওয়াফ করতেন! আমি (বর্ণনাকারী) জিজ্ঞাসা করলাম: এটা কি পর্দার বিধান নাযিলের পরে, নাকি পূর্বে? তিনি বললেন: আমার জীবনের কসম! আমি নিশ্চিতভাবে পর্দার বিধান নাযিলের পরেও তা হতে দেখেছি। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তারা কীভাবে পুরুষদের সাথে মিশতেন? তিনি বললেন: তারা মিশতেন না। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পুরুষদের থেকে আলাদা হয়ে একপাশে তাওয়াফ করতেন, তাদের সাথে মিশতেন না। তখন এক মহিলা তাঁকে বললেন: হে উম্মুল মু'মিনীন, চলুন, আমরা ইসতিলাম করি (হাজরে আসওয়াদ স্পর্শ করি)। তিনি বললেন: তুমি তোমার পথে যাও, এবং তিনি তা করতে অস্বীকার করলেন। মহিলারা রাতে ছদ্মবেশে বের হতেন এবং পুরুষদের সাথে তাওয়াফ করতেন। তবে তারা যখন বাইতুল্লাহ (কা'বা) তে প্রবেশ করতেন, তখন তারা অপেক্ষা করতেন যতক্ষণ না তারা ভেতরে প্রবেশ করতে পারেন এবং পুরুষদেরকে বের করে দেওয়া হয়। আমি এবং উবাইদ ইবনু উমায়র আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যেতাম যখন তিনি ছাবীর পর্বতের ভেতরে ই'তিকাফে (অবস্থানে) ছিলেন। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তাঁর পর্দা কেমন ছিল? তিনি বললেন: তিনি একটি তুর্কি তাঁবুর মধ্যে ছিলেন, যার একটি আবরণ (পর্দা) ছিল। আমাদের এবং তাঁর মাঝে সেটি ছাড়া আর কিছুই ছিল না। আর আমি তাঁর গায়ে গোলাপী রঙের একটি জামা দেখেছিলাম।
4896 - عن أمِّ سلمة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: شَكَوْتُ إِلَى رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم أَنِّي أَشْتَكِي، فَقَالَ:"طُوفِي مِنْ وَرَاءِ النَّاسِ وَأَنْتِ رَاكِبَةٌ". قَالَتْ: فَطُفْتُ رَاكِبَةً بَعِيرِي وَرَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِينَئِذٍ يُصَلِّي إِلَى جَانِبِ الْبَيْتِ وَهُوَ يَقْرَأُ بِالطُّورِ وَكِتَابٍ مَسْطُور.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (123) عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن بن نوفل، عن عروة بن الزبير، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الحج (1626)، ومسلم في الحج (1276) كلاهما من طريق مالك، به.
ولم يذكر البخاريّ لفظه، ثم رواه من طريق أبي مروان يحيى بن أبي زكريا الغسّاني، عن هشام، عن عروة، عن أمّ سلمة، فذكرته بنحوه.
وفيه:"إذَا أُقيمت صَلاةُ الصّبحِ فَطُوفِي عَلى بَعيرِكِ والنَّاسُ يصّلون".
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করলাম যে, আমি অসুস্থ। তখন তিনি বললেন: "তুমি সওয়ার অবস্থায় মানুষের পেছন দিক দিয়ে তাওয়াফ করো।" তিনি বলেন: অতঃপর আমি আমার উটের উপর সওয়ার হয়ে তাওয়াফ করলাম। সে সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর পাশে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন এবং তিনি 'আত্ব-তূর ওয়া কিতাবিম মাসতূর' (সূরা তূর) পাঠ করছিলেন।
অন্য বর্ণনায় রয়েছে: "যখন ফজরের সালাত কায়েম হবে, তখন লোকেরা সালাত আদায় করা অবস্থায় তুমি তোমার উটের উপর সওয়ার হয়ে তাওয়াফ করো।"
4897 - عن عائشة، قالت: قَدِمْتُ مَكَّةَ وَأَنَا حَائِضٌ وَلَمْ أَطُفْ بِالْبَيْتِ وَلا بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ. قَالَتْ: فَشَكَوْتُ ذَلِكَ إِلَى رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم قَالَ:"افْعَلِي كَمَا يَفْعَلُ الْحَاجُّ غَيْرَ أَنْ لا تَطُوفِي بِالْبَيْتِ حَتَّى تَطْهُرِي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1650) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
والحديث في موطأ الإمام مالك في الحج (244) -برواية يحيى الليثي عنه- بالإسناد نفسه، مثله، إلّا أنه زاد فيه:"ولا بين الصّفا والمروة".
قلت: وقد رواه غير مالك عن عبد الرحمن بن القاسم، بدون ذكر الزّيادة، فرواه البخاريّ أيضًا في الحيض (294)، ومسلم في الحج (1211: 119) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، قال: سمعت عبد الرحمن بن القاسم، قال: سمعت القاسم يقول: سمعت عائشة تقول:"خَرَجْنَا لا نَرَي إِلا الْحَجَّ، فَلَمَّا كُنَّا بِسَرفَ حِضْتُ، فَدَخَلَ عَلَيَّ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم وَأَنَا أَبْكِي: قَال:"مَا لَكِ أَنُفِسْتِ؟". قُلْتُ: نَعَمْ. قَال:"إِنَّ هَذَا أَمْرٌ كَتَبَهُ الله عَلَى بَنَاتِ آدَمَ، فَاقْضِي مَا يَقْضِي الْحَاجُّ غَيْرَ أَنْ لا تَطُوفِي بِالْبَيْتِ".
قَالَتْ:"وَضَحَّي رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم عَنْ نِسَائِهِ بِالْبَقَرِ".
ولفظهما سواء، وزاد مسلمٌ:"حتى تغتسلي".
ورواه البخاريّ في الحيض (305)، ومسلم في الحج (1211: 120) كلاهما من طريق عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن عبد الرحمن بن القاسم، به، وفيه:"فافعلي ما يفعل الحاج غير أن لا تطوفي بالبيت حتى تطهري". وليس فيه ذكر السعي بين الصّفا والمروة.
ولا يشترط الطهارة للسعي عند أكثر أهل العلم، إلّا أن المرأة في هذه الحالة تترك الطّواف والسعي حتى تطهر كما فعلت عائشة رضي الله عنها.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মক্কায় পৌঁছলাম এমন অবস্থায় যে আমি ঋতুমতী ছিলাম। আমি বায়তুল্লাহর তাওয়াফ এবং সাফা-মারওয়ার সা'য়ী করিনি। তিনি বলেন, তখন আমি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট জানালাম। তিনি বললেন: "হাজীরা যা করে তুমিও তাই করো, তবে পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করবে না।"
(মুত্তাফাকুন আলাইহি: বুখারী এটিকে হজ্জ অধ্যায়ে (১৬৫০) আব্দুল্লাহ ইবনু ইউসুফ থেকে, তিনি মালিক থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু কাসিম থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আয়েশা থেকে বর্ণনা করেছেন, অতঃপর তা উল্লেখ করেছেন।)
(ইমাম মালিকের মুওয়াত্তার হজ্জ অধ্যায়ে (২৪৪) - ইয়াহিয়া আল-লাইসির রেওয়ায়েতে, একই সনদসূত্রে অনুরূপ বর্ণনা রয়েছে, তবে এতে এতটুকু অতিরিক্ত আছে: "এবং সাফা-মারওয়ার সা'য়ীও না"।)
আমি (গ্রন্থকার) বলি: মালিক ব্যতীত অন্যান্য বর্ণনাকারীরা আব্দুর রহমান ইবনু কাসিম থেকে এই অতিরিক্ত অংশ উল্লেখ করা ছাড়াই বর্ণনা করেছেন। যেমন বুখারী এটি ‘হায়য’ অধ্যায়ে (২৯৪) এবং মুসলিম ‘হজ্জ’ অধ্যায়ে (১২১১: ১১৯) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই সুফিয়ান ইবনু উয়াইনার সূত্রে, তিনি বলেন, আমি আব্দুর রহমান ইবনু কাসিমকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন, আমি কাসিমকে বলতে শুনেছি, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: "আমরা কেবল হজ্জের উদ্দেশ্যেই বের হয়েছিলাম। যখন আমরা 'সারফ' নামক স্থানে ছিলাম, তখন আমি ঋতুমতী হলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন, আর আমি কাঁদছিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: 'তোমার কী হয়েছে? তুমি কি ঋতুমতী হয়েছ?' আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: 'এটি এমন একটি বিষয় যা আল্লাহ তাআলা আদম-কন্যাদের জন্য নির্ধারণ করে দিয়েছেন। সুতরাং হাজীরা যা করে তুমিও তাই করো, তবে বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করবে না।"
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে গরু দ্বারা কুরবানী করেছিলেন।"
উভয় বর্ণনার শব্দাবলী প্রায় একই, তবে মুসলিম এতে বাড়িয়েছেন: "যতক্ষণ না তুমি গোসল করো"।
আর বুখারী এটি ‘হায়য’ অধ্যায়ে (৩০৫) এবং মুসলিম ‘হজ্জ’ অধ্যায়ে (১২১১: ১২০) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই আব্দুল আযীয ইবনু আবী সালামাহ আল-মাজিশূনের সূত্রে, আব্দুর রহমান ইবনু কাসিম থেকে, যাতে বলা হয়েছে: "সুতরাং হাজীরা যা করে তুমিও তাই করো, তবে পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করবে না।" এতে সাফা-মারওয়ার সা'য়ীর কোনো উল্লেখ নেই।
অধিকাংশ আলেমের মতে সা'য়ীর জন্য পবিত্রতা শর্ত নয়, তবে এই অবস্থায় মহিলা পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত তাওয়াফ ও সা'য়ী উভয়ই ত্যাগ করবে, যেমনটি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) করেছিলেন।
4898 - عن حفصة، قالت: كُنَّا نَمْنَعُ عَوَاتِقَنَا أَنْ يَخْرُجْنَ، فَقَدِمَت امْرَأَةٌ فَنَزَلَتْ قَصْرَ بَنِي خَلَفٍ فَحَدَّثَتْ أَنَّ أُخْتَهَا كَانَتْ تَحْتَ رَجُلٍ مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم قَدْ غَزَا مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم ثِنْتَيْ عَشْرَةَ غَزْوَةً، وَكَانَتْ أُخْتِي مَعَهُ فِي سِتِّ غَزَوَاتٍ، قَالَتْ: كُنَّا نُدَاوِي الْكَلْمَى وَنَقُومُ عَلَى الْمَرْضَى، فَسَأَلَتْ أُخْتِي رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ: هَلْ عَلَى إِحْدَانَا بَأْسٌ إِنْ لَمْ يَكُنْ لَهَا جِلْبَابٌ أَنْ لا تَخْرُجَ؟ قَال:"لِتُلْبِسْهَا صَاحِبَتُهَا مِنْ جِلْبَابِهَا، وَلْتَشْهَد الْخَيْرَ وَدَعْوَةَ الْمُؤْمِنِينَ". فَلَمَّا قَدِمَتْ أُمُّ عَطِيَّةَ رضي الله عنها سَأَلْنَهَا -أَوْ قَالَتْ سَأَلْنَاهَا- فَقَالَتْ -وَكَانَتْ لا تَذْكُرُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَبَدًا إِلا قَالَتْ: بِأَبي-. فَقُلْنَا: أَسَمِعْتِ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم يَقُولُ كَذَا وَكَذَا؟ قَالَتْ: نَعَمْ بِأَبِي، فَقَالَ:"لِتَخْرُج الْعَوَاتِقُ ذَوَاتُ الْخُدُورِ -أَو الْعَوَاتِقُ وَذَوَاتُ الْخُدُورِ- الحيَّضُ فَيَشْهَدْنَ الْخَيْرَ وَدَعْوَةَ الْمُسْلِمِينَ وَيَعْتَزِلُ الحُيَّضُ الْمُصَلَّى".
فَقُلْتُ: أَالْحَائِضُ؟ فَقَالَتْ: أَوَلَيْسَ تَشْهَدُ عَرَفَةَ، وَتَشْهَدُ كَذَا وَتَشْهَدُ كَذَا؟ ! .
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1652) من طريق أيوب، عن حفصة (هي بنت سيرين)، فذكرته.
ورواه مسلم في صلاة العيدين (890) من أوجه أخرى عن حفصة بنت سيرين، عن أمّ عطية، به، مختصرًا، وليس فيه قولها:"أو ليس تشهد عرفة، وتشهد كذا، وتشهد كذا؟".
হাফসা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আমাদের যুবতী মহিলাদের (যারা তখনো স্বামী গ্রহণ করেনি) বাইরে বের হতে বারণ করতাম। অতঃপর একজন মহিলা আগমন করলেন এবং বনী খাফাল গোত্রের প্রাসাদে অবস্থান নিলেন। তিনি বর্ণনা করলেন যে, তাঁর বোন এমন একজন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীর বিবাহাধীনে ছিলেন, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বারোটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। আর আমার বোন তাঁর সাথে ছয়টি যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন। তিনি বলেন, আমরা আহতদের চিকিৎসা করতাম এবং রোগীদের দেখাশোনা করতাম।
আমার বোন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন এবং বললেন, আমাদের মধ্যে কারো যদি জিলবাব (বড় চাদর/বোরকা) না থাকে, তবে তার বাইরে না বের হওয়াতে কি কোনো গুনাহ হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার সাথী যেন তাকে তার জিলবাব থেকে পরিধান করতে দেয়, এবং সে যেন কল্যাণের কাজে ও মুমিনদের দোয়ায় অংশগ্রহণ করে।"
অতঃপর যখন উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন, তখন আমরা তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম—অথবা (বর্ণনাকারী) বললেন: আমরা তাঁকে জিজ্ঞাসা করেছিলাম—তখন তিনি উত্তর দিলেন—আর তিনি যখনই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নাম উল্লেখ করতেন, তখনই বলতেন: আমার পিতা তাঁর জন্য উৎসর্গ হোক—তখন আমরা বললাম: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এরূপ এরূপ বলতে শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমার পিতা তাঁর জন্য উৎসর্গ হোক। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পর্দানশীন যুবতীরা—অথবা (তিনি বললেন:) যুবতীরা ও পর্দানশীনরা—এবং ঋতুমতী মহিলারাও যেন বাইরে যায় এবং কল্যাণের কাজে ও মুসলিমদের দোয়ায় অংশগ্রহণ করে। তবে ঋতুমতী মহিলারা যেন নামাযের স্থান থেকে দূরে অবস্থান করে।"
তখন আমি বললাম: ঋতুমতী মহিলারাও কি? তিনি বললেন: তারা কি আরাফায় এবং অমুক অমুক জায়গায় উপস্থিত থাকে না?!
4899 - عن جابر بن عبد الله قال: أَهَلَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم هُوَ وَأَصْحَابُهُ بِالْحَج … وَحَاضَتْ عَائِشَةُ رضي الله عنها فَنَسَكَت الْمَنَاسِكَ كُلَّهَا غَيْرَ أَنَّهَا لَمْ تَطُفْ بِالْبَيْتِ، فَلَمَّا طَهُرَتْ طَافَتْ بِالْبَيْتِ قَالَتْ: يَا رَسُولَ اللهِ، تَنْطَلقُونَ بِحَجَّةٍ وَعُمْرَةٍ وَأَنْطَلِقُ بِحَجٍّ؟ ! فَأَمَرَ عبد الرحمن بْنَ أَبِي بَكْرٍ أَنْ يَخْرُجَ مَعَهَا إِلَى التَّنْعِيمِ فَاعْتَمَرَتْ بَعْدَ الْحَجِّ.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1651) عن محمد بن المثنى، حدّثنا عبد الوهاب -قال: وقال لي خليفة: حدّثنا عبد الوهاب-، حدّثنا حبيب المعلِّم، عن عطاء، عن جابر، فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ হজ্জের ইহরাম বাঁধলেন... এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঋতুমতী হলেন। এরপর তিনি বায়তুল্লাহর তাওয়াফ ছাড়া হজ্জের অন্যান্য সমস্ত কাজ সম্পন্ন করলেন। যখন তিনি পবিত্র হলেন, তখন তিনি বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করলেন। তিনি বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনারা হজ্জ ও উমরাহ্ সহকারে প্রত্যাবর্তন করছেন, আর আমি শুধু হজ্জ সহকারে প্রত্যাবর্তন করব?!' তখন তিনি আবদুর রহমান ইবনু আবী বাকরকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি তাঁকে নিয়ে তান‘ঈম পর্যন্ত যান। অতঃপর তিনি হজ্জের পর উমরাহ্ আদায় করলেন।
4900 - عن جابر بن عبد الله، قال: أَقْبَلْنَا مُهِلِّينَ مَعَ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم بِحَجٍّ مُفْرَدٍ … ثُمَّ دَخَلَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم عَلَى عَائِشَةَ رضي الله عنها فَوَجَدَهَا تَبْكِي فَقَالَ:"مَا شَأْنُكِ؟". قَالَتْ: شَأْنِي أَنِّي قَدْ حِضْتُ، وَقَدْ حَلَّ النَّاسُ وَلَمْ أَحْلِلْ، وَلَمْ أَطُفْ بِالْبَيْتِ وَالنَّاسُ يَذْهَبُونَ إِلَى الْحَجِّ الآنَ؟ فَقَالَ:"إِنَّ هَذَا أَمْرٌ كَتَبَهُ الله عَلَى بَنَاتِ آدَمَ، فَاغْتَسِليِ، ثُمَّ أَهِلِّي بِالْحَجِّ". فَفَعَلَتْ وَوَقَفَت الْمَوَاقِفَ حَتَّى إِذَا طَهَرَتْ طَافَتْ بِالْكَعْبَةِ وَالصَّفَا وَالْمَرْوَةِ. ثُمَّ قَال:"قَدْ حَلَلْتِ مِنْ حَجَّكِ وَعُمْرَتِكِ جَمِيعًا". فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ الله، إِنِّي أَجِدُ فِي نَفْسِي أَنِّي لَمْ أَطُفْ بِالْبَيْتِ حَتَّى حَجَجْتُ. قَال:"فَاذْهَبْ بَهَا يَا عبد الرحمن فَأَعْمِرْهَا مِن التَّنْعِيمِ". وَذَلِكَ لَيْلَةَ الْحَصْبَةِ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1213) من طريق الليث بن سعد، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
قوله:"حتى طهرت طافتْ بالكعبة، والصّفا والمروة" فيه إشارة إلى أنّ عائشة رضي الله عنها لم تسعى حتى طافت طواف الإفاضة، بل قد صرّحت هي بذلك كما في حديث مالك السابق، وهو قولها:"قدمت مكة وأنا حائض ولم أطف بالبيت ولا بين الصفا والمروة".
وفي تقديم السعي على الطواف خلاف بين أهل العلم، قال الحافظ:"حكى ابنُ المنذر عن عطاء قولين فيمن بدأ بالسعي قبل الطواف بالبيت، وبالإجزاء قال بعضُ أهل الحديث واحتجّ بحديث أسامة بن شريك:"أنّ رجلًا سأل النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: سعيتُ قبل أن أطوف؟ قال: طُفْ ولا حرج". وقال الجمهور: لا يجزئه، وأوّلوا حديث أسامة على من سعي بعد طواف القدوم وقبل طواف الإفاضة". انتهى من"الفتح" (3/ 505).
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ইফরাদ হজ্বের জন্য তালবিয়াহ্ পাঠকারী অবস্থায় আগমন করলাম... এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন এবং দেখলেন তিনি কাঁদছেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কী হয়েছে?" তিনি বললেন: আমার অবস্থা হলো যে, আমার মাসিক শুরু হয়েছে। লোকেরা ইহরাম খুলে ফেলেছে, কিন্তু আমি খুলতে পারিনি এবং বাইতুল্লাহর তাওয়াফও করতে পারিনি। আর এখন লোকেরা হজ্বের উদ্দেশ্যে যাচ্ছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি এমন একটি বিষয় যা আল্লাহ তা'আলা আদম-কন্যাদের জন্য নির্ধারণ করে দিয়েছেন। সুতরাং তুমি গোসল করে নাও, এরপর হজ্বের ইহরাম বাঁধো।" তিনি তাই করলেন এবং (হজ্বের) সকল স্থানে অবস্থান করলেন। যখন তিনি পবিত্র হলেন, তখন তিনি কা'বা, সাফা ও মারওয়ার তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার হজ্ব ও উমরাহ উভয় থেকেই হালাল হয়ে গেলে।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমার মন চাইছে যে আমি বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করিনি যতক্ষণ না আমি হজ্ব সম্পন্ন করেছি (অর্থাৎ তিনি স্বতন্ত্র উমরাহ করতে চাইলেন)। তিনি বললেন: "হে আব্দুর রহমান! তুমি তাকে নিয়ে যাও এবং তান'ঈম থেকে উমরাহ করিয়ে আনো।" আর এটি ছিল হাসবাহর রাতে।