হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4901)


4901 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الاسْتِجْمَارُ تَوٌّ، وَرَمْيُ الْجِمَارِ تَوٌّ، وَالسَّعْيُ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ تَوٌّ، وَالطَّوَافُ تَوٌّ، وَإِذَا اسْتَجْمَرَ أَحَدُكُمْ فَلْيَسْتَجْمِرْ بِتَوّ".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1300) عن سلمة بن شبيب، حدّثنا الحسن بن أعين، حدّثنا معقل (وهو ابن عبيد الله الجزريّ)، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.

قوله:"توٌّ" التَّوُّ: بفتح التاء المثناة فوق، وتشديد الواو، وهو الوتر.

وأمّا ما رُوي عن سعد بن مالك، قال: طفنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فمنا من طاف سبعًا، ومنا من طاف ثمانيًا، ومنا من طاف أكثر من ذلك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا حرج" فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (1603) عن سريج بن النعمان، حدّثنا أبو شهاب، عن الحجاج، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن سعد بن مالك، فذكره.

والحجاج هو ابن أرطاة مدلس، وقد عنعن. ومجاهد لم يسمع من سعد بن مالك فيه انقطاع مع الضّعف.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইস্তিজমার (পাথর বা মাটি দ্বারা পবিত্রতা অর্জন) বিজোড় (সংখ্যায় করা) হয়, জামারায় কঙ্কর নিক্ষেপ বিজোড় (সংখ্যায় করা) হয়, সাফা ও মারওয়ার মধ্যে সাঈ বিজোড় (সংখ্যায় করা) হয় এবং তাওয়াফ বিজোড় (সংখ্যায় করা) হয়। আর যখন তোমাদের কেউ ইস্তিজমার করে, তখন সে যেন বিজোড় সংখ্যায় ইস্তিজমার করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4902)


4902 - عن ابن عمر: أَنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا طَافَ فِي الْحَجِّ وَالْعُمْرَةِ أَوَّلَ مَا يَقْدَمُ فَإِنَّهُ يَسْعَى ثَلاثَةَ أَطْوَافٍ بِالْبَيْتِ، ثُمَّ يَمْشِي أَرْبَعَةً، ثُمَّ يُصَلِّي سَجْدَتَيْنِ، ثُمَّ يَطُوفُ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1616)، ومسلم في الحج (1261: 231) كلاهما من طريق موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره، واللفظ لمسلم.

وقال البخاريّ أيضًا: قال إسماعيل بن أمية، قال: قلت للزهري:"إنّ عطاءٌ يقول: تجْزئه المكتوبة من ركعتي الطواف؟ فقال: السنة أفضل، لم يطف النبيّ صلى الله عليه وسلم سُبوعًا قطّ إلّا صلّى ركعتين".

هكذا رواه الإمام البخاريّ معلقًا ومرسلًا، قال الحافظ في"الفتح" (3/ 485):"وصله ابن أبي شيبة مختصرًا قال: حدّثنا يحيى بن سليم، عن إسماعيل بن أمية، عن الزهري، قال: مضت السنة أن مع كلّ أسبوع ركعتين" ووصله عبد الرزاق عن معمر، عن الزهري، بتمامه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হজ্জ বা উমরার উদ্দেশ্যে প্রথম আগমন করতেন, তখন তিনি বায়তুল্লাহর চারপাশে তিন চক্কর দ্রুত পদক্ষেপে (রামল) তাওয়াফ করতেন, অতঃপর চার চক্কর হেঁটে তাওয়াফ করতেন, এরপর দু’টি সিজদা (দু’রাকআত সালাত) আদায় করতেন, অতঃপর সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করতেন।

বুখারী (রহ.) আরও বলেছেন, ইসমাঈল ইবনু উমাইয়াহ বলেন, আমি যুহরীকে জিজ্ঞেস করলাম: ‘আতা তো বলেন যে, ফরয সালাত আদায় করলেই তাওয়াফের দু’রাকআত সালাতের জন্য যথেষ্ট হবে?’ তিনি (যুহরী) বললেন: সুন্নাতই উত্তম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও সাত চক্কর তাওয়াফ সম্পন্ন করেননি, তবে দু’রাকআত সালাত আদায় করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4903)


4903 - عن ابن عمر، قال: قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَطَافَ بِالْبَيْتِ سَبْعً وَصَلَّى خَلْفَ الْمَقَامِ رَكْعَتَيْنِ ثُمَّ خَرَجَ إِلَى الصَّفَا وَقَدْ قَالَ الله تَعَالَى: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ}
[سورة الأحزاب: 21].

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1627) عن آدم، حدّثنا شعبة، حدّثنا عمرو بن دينار، قال: سمعت ابن عمر، فذكره.

ورواه البخاريّ أيضًا في الحج (1623، 1644)، ومسلم في الحج (1234: 189) من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، قال: سَأَلْنَا ابْنَ عُمَرَ رضي الله عنه عن رَجُلٍ طَافَ بِالْبَيْتِ فِي عُمْرَةٍ وَلَمْ يَطُفْ بَيْنَ الصَّفَا والْمَرْوَةِ أَيَأُتِي امْرَأَتَهُ فَقَال: (فذكره).

وزاد البخاريّ: وَسَأَلْنَا جَابر بنَ عبد الله رضي الله عنهما، فقال:"لا يَقْرَبنَّها حَتى يَطُوفَ بين الصَّفا والمرَّوَةِ".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন, অতঃপর তিনি সাতবার বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করলেন এবং মাকামের (মাকামে ইবরাহীম) পেছনে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি সাফার দিকে গেলেন। আর আল্লাহ তাআলা অবশ্যই বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের জন্য রয়েছে আল্লাহর রাসূলের (চরিত্রে) উত্তম আদর্শ।" (সূরা আহযাব: ২১)।









আল-জামি` আল-কামিল (4904)


4904 - عن جابر بن عبد الله قال: ثُمَّ نَفَذَ (يعني رسول الله صلى الله عليه وسلم) إِلَى مَقَام إِبْرَاهِيمَ عليه السلام فَقَرَأَ: {وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى}، فَجَعَلَ الْمَقَامَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْبَيْتِ - فَكَانَ أَبِي يَقُولُ: وَلا أَعْلَمُهُ ذَكَرَهُ إِلا عَن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم: كَانَ يَقْرَأُ فِي الرَّكْعَتَيْنِ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، وَ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)} ثُمَّ رَجَعَ إِلَى الرُّكْنِ فَاسْتَلَمَه.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره بطوله في صفة حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

هكذا رواه حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه محمد بالشّك في قراءة النبيّ صلى الله عليه وسلم بالسورتين في الركعتين.

واختلف على جعفر بن محمد، فرواه سليمان بن بلال عنه بالجزم بالرفع.

وكذلك رواه مالك بالجزم في رواية الوليد بن مسلم عنه، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره.

أخرجه النسائيّ (2963) -بإسناد صحيح كما قال الإشبيلي في"الجمع بين الصحيحين" (2/ 246) -، وعنه ابن عبد البر في التمهيد (24/ 413) عن عمرو بن عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار، عن الوليد، عن مالك، بإسناده.

وكذلك رواه عن مالك القعنبي بالجزم. كما أخرجه البيهقيّ (5/ 91).

وكذلك رواه بالجزم حفص بن غياث، عن جعفر، عن أبيه، عن جابر. رواه ابن أبي شيبة (4/ 110) وعنه ابن عبد البر في التمهيد (24/ 416).

وكذلك رواه بالجزم عبد العزيز بن عمران، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ في ركعتي الطواف بسورة الإخلاص: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}".
رواه الترمذيّ (869) عن أبي مصعب المدني -قراءة عن عبد العزيز بن عمران- فذكره.

وقال: وحدثنا هناد، حدثنا وكيع، عن سفيان، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، أنه كان يستحب أن يقرأ في ركعتي الطواف بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، وَ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}.

قال الترمذيّ:"وهذا أصح من حديث عبد العزيز بن عمران، وحديث جعفر بن محمد، عن أبيه في هذا أصح من حديث جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، وعبد العزيز بن عمران ضعيف في الحديث" انتهى.

ورواه الإمام أحمد (14440) عن يحيى بن سعيد القطان عنه، وفيه: قال أبو عبد الله -يعني جعفرًا-:"فقرأ فيها بالتوحيد: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، وَ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}".

فقوله:"فقرأ فيها" يحتمل أن يكون الفاعل هو النبيّ صلى الله عليه وسلم، وهذا هو الظاهر لأنه عطف عليه قوله:"ثم استلم الحجر، وخرج إلى الصّفا، ثم قرأ {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} [البقرة: 158]، ثم قال:"نبدأ بما بدأ الله به" …" الحديث؛ لأنّ هذا الفعل كله كان من النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولا يعقل أن يجعل جزءًا منه من فعل والده جعفر -وهو محمد بن علي بن حسين الباقر-، والباقي من النبيّ صلى الله عليه وسلم.

ولكن رواه أبو داود (1909) من حديث يحيي بن سعيد القطان، وقال:"وأدرج في الحديث عند قوله {وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى}، قال: فقرأ فيها بالتوحيد، {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}".

وقال فيه: قال علي رضي الله عنه بالكوفة. قال أبي: هذا الحرف لم يذكره جابر: فذهبت محرّشًا، وذكر قصة فاطمة رضي الله عنها" انتهى.

فذهب أبو داود إلى التأكيد بأنّ يحيى بن سعيد القطّان قد أدرج في الحديث.

وكذلك قال الخطيب في"المدرج" (2/ 671) بأن يحيى بن سعيد كان يدرج في روايته أحرفًا ويجعلها مرفوعةً، وذكر قراءة هاتين السورتين خاصة في هذا الحديث وقال:"إنّما هو حكاية جعفر ابن محمد، عن أبيه كما بينه أبو إدريس، عن جعفر. وكذلك رواه وهيب، عن ابن جريج، عن جعفر، عن أبيه وقالا: لم يذكر ذلك في حديث جابر".

ثم ساق الخطيب رواية أبي أويس بن عبد الله، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، وجاء فيه: قال جعفر:"وكان يقرأ فيهما بـ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}، و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}".

قلت: لا تختلف رواية أبي أويس عن رواية يحيى بن سعيد القطان في عدم تحديد الفاعل، والسياق واحد.

ورواية وهيب بن خالد، أخرجها أبو داود الطيالسي في"مسنده" (1773)، والخطيب في"المدرج" (2/ 672) عنه، عن جعفر بن محمد بن علي بن حسين بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن جابر. وجاء فيه:"وصلى ركعتين. قال أبي: وكان يستحبّ أن يقرأ فيها بالتوحيد {قُلْ
هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، وَ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}، ولم يذكر ذلك عن جابر، ثم رجع إلى حديث جابر فذكره".

فقول جعفر:"يستحب أن يقرأ فيهما …" فيه إشارة إلى رفعه؛ ولذا استحبّه؛ لأنّ الاستحباب حكم شرعيّ لا يثبت إلّا بنصّ شرعيّ كما هو مقرّر في علم الأصول.

وأمّا رواية ابن جريج عن جعفر بن محمد فهي موافقة لرواية وهيب كما قال الخطيب، وساقه بإسناده وفيه:"قال أبي: ويُقرأ فيهما بالتوحيد {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، وَ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)}". وذكر بقية الحديث.

فقوله:"ويُقرأ فيهما بالتوحيد" بصيغة البناء للمفعول، فيه إشارة إلى استحباب قراءة هاتين السورتين.

والخلاصة: أن قراءة هاتين السورتين رُويت مرفوعة بالجزم، ورويت بالشّك، ورُويت بالإبهام من غير تحديد الفاعل، والعلم باليقين مقدّم على الشّك، أو كما يقال: اليقين لا يزول بالشّك.

ولعلّ مسلمًا رحمه الله تعالى مما يذهب إليه أيضًا حيث أخرجه في"صحيحه" من حديث جابر الطويل من رواية حاتم بن إسماعيل كما سمع، ولولا يري ثبوت ذلك لحذف هذا الجزء من الحديث كما هي عادته، عرف ذلك بالاستقراء. والله تعالى أعلم.

وقد رُوي بإسناد فيه إعضال عن يعقوب بن زيد، قال:"إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ في ركعتي الطواف" ورواه ابن أبي عمر، حدّثنا وكيع، عن موسى بن عبيدة، عن يعقوب بن زيد، فذكره. رواه ابن أبي شيبة (4/ 110).

وأورده الحافظ في"المطالب العالية" (1227) وقال:"هذا مرسل، وموسي ضعيف". والله تعالى أعلم.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর তিনি (অর্থাৎ আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) মাকামে ইবরাহীমের দিকে গেলেন এবং পাঠ করলেন: {তোমরা মাকামে ইবরাহীমকে সালাতের স্থান বানাও} (সূরা বাকারা: ১২৫)। অতঃপর তিনি মাকামকে তাঁর ও কাবা ঘরের মাঝখানে রাখলেন। আমার পিতা বলতেন—আর আমি এ বিষয়ে কেবল নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রেই জানি: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই রাকা‘আতে সূরাতুল ইখলাস (ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ) এবং সূরাতুল কাফিরূন (ক্বুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরূন) পাঠ করতেন। এরপর তিনি রুকনে (হাজরে আসওয়াদের দিকে) ফিরে গেলেন এবং তা চুম্বন করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4905)


4905 - عن جبير بن مطعم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يَا بَنِي عَبْدِ مَنَافٍ، لا تَمْنَعُوا أَحَدًا يَطُوفُ بِهَذَا الْبَيْتِ وَيُصَلِّي أَيِّ سَاعَةٍ شَاءَ مِنْ لَيْلٍ أَوْ نَهَارٍ".

حسن: رواه أبو داود (1894)، والترمذيّ (868)، والنسائي (2924)، وابن ماجه (1254) كلّهم من حديث سفيان بن عيينة، عن أبي الزبير، عن عبد الله بن باباه، عن جبير بن مطعم، فذكر الحديث.

وصحّحه ابن خزيمة (1280)، وابن حبان (1552)، والحاكم (1/ 448) وقال:"صحيح على شرط مسلم". وقد روي أيضًا من أوجه أخرى تقوّيه.

قال الترمذيّ:"وقد رواه عبد الله بن أبي نجيح، عن عبد الله بن باباه أيضًا" وقال:"حديث جبير ابن مطعم حديث حسن صحيح".

قلت: وحديث عبد الله بن أبي نجيح رواه الإمام أحمد (16753) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن
ابن إسحاق، قال: حدثني عبد الله بن أبي نجيح، عن عبد الله بن باباه مولى آل حُجير بن أبي إهاب، قال: سمعت جبير بن مطعم يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يا بني عبد مناف! لأعزِمَنَّ ما منعتُم طائفًا يطوف بهذا البيت ساعةً من ليلٍ أو نهار".

وبهذا الحديث قال الشافعي، وأحمد، وإسحاق.

وكان عبد الله بن الزبير يطوف بعد الفجر ويصلي ركعتين. رواه البخاري في صحيحه (1630).




জুবাইর ইবন মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে বানু আবদ মানাফ! তোমরা এমন কাউকে বাধা দিও না যে এই ঘরে (কা'বা ঘরে) তাওয়াফ করে এবং দিন বা রাতের যে কোনো সময়ে ইচ্ছা সালাত আদায় করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4906)


4906 - عن أمِّ سلمة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: شَكَوتُ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَنِّي أشْتَكِي، فقال:"طُوفِي مِنْ وَرَاءِ النَّاس وأنت راكبةٌ".

وفي رواية:"إذا أقمت صلاةُ الصُّبح فطوفي على بعيرك والنّاسُ يصلّون". ففعلتْ ذلك، فلم تصلِّ حتى خرجتْ.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (123) عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن بن نوفل، عن عروة بن الزبير، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، فذكرته.

ورواه البخاريّ في الحج (1633)، ومسلم في الحج (1276) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

والرواية الثانية: رواها البخاريّ في الحج (1626) من وجه آخر عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن أمّ سلمة.

وقد قال النسائيّ:"عروة لم يسمعه من أمّ سلمة"، وقال الدّارقطني:"منقطع". ولكن قال الحافظ:"سماع عروة من أمّ سلمة ممكن فإنّه أدرك من حياتها نيفًا وثلاثين سنة، وهو معها في بلد واحد".

وروى مالك في الحجّ (117) عن ابن شهاب، عن حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أنّ عبد الرحمن بن عبدٍ القاريّ أخبره: أنّه طاف بالبيت مع عمر بن الخطاب بعد صلاة الصبح، فلمّا قضى عمر طوافه نظر فلم يرَ الشّمس طلعتْ، فركبَ حتى أناخ بذي طُوى، فصلّي ركعتين.

وعلقه البخاريّ في"صحيحه" (3/ 488 - مع الفتح) عن عمر مختصرًا.

وإليه ذهب أبو حنيفة، ومالك، وسفيان الثوريّ فإنّهم قالوا: من طاف بعد الصبح لا يصلي ركعتي الطّواف حتى تطلع الشمس، وكذلك من طاف بعد العصر لا يصلي ركعتي الطواف حتي تغرب الشمس ليخرج وقت الكراهة.

وأمّا ما رُوي عن أبي الزبير، قال: سألت جابرًا عن الطواف بالكعبة؟ فقال: كنا نطوف فنمسح الرّكن الفاتحة والخاتمة، ولم نكن نطوف بعد صلاة الصبح حتى تطلع الشمس، ولا بعد العصر حتى تغرب. وقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تطلع الشمس في قرني الشّيطان" فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (15232) عن حسن، حدّثنا ابن لهيعة، حدّثنا أبو الزبير، فذكره. وابن لهيعة فيه كلام معروف.

وقوله:"لم نكن نطوف بعد صلاة الصبح …" فيه نكارة واضحة، فإنّ المنع ليس من الطواف بعد الصبح وبعد العصر، وإنما النهي عن الصلاة بعدهما. ولذا من كره الصلاة بعدهما أخرها بعد طلوع الشمس أو بعد غروبها. كما قال به أبو حنيفة ومالك وغيرهما.

وفي الموطأ في الحج (119) عن مالك، عن أبي الزبير المكي أنه قال:"لقد رأيت البيت يخلو بعد صلاة الصبح، وبعد صلاة العصر، ما يطوف به أحد".

قال ابن عبد البر في"الاستذكار" (12/ 176):"هذا خبر منكر، يدفعه كلّ من رأي الطّواف بعد الصبح والعصر، ولا يرى الصلاة حتى تغرب الشمس".




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অভিযোগ করলাম যে আমি অসুস্থ। তিনি বললেন: "তুমি সাওয়ার অবস্থায় লোকজনের পিছন দিক থেকে তাওয়াফ করো।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যখন ফজরের সালাত শুরু হবে, তখন তুমি তোমার উটের পিঠে চড়ে তাওয়াফ করো, যখন লোকজন সালাত আদায় করছে।" তিনি সেটাই করলেন, এবং তাওয়াফ সম্পন্ন করার পর (মসজিদ থেকে) বের না হওয়া পর্যন্ত সালাত আদায় করলেন না।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক এটি বর্ণনা করেছেন 'আল-হাজ্জ' (১২৩)-এ, আবুল আসওয়াদ মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান ইবনু নাওফাল হতে, তিনি উরওয়াহ ইবনু যুবাইর হতে, তিনি যাইনাব বিনত আবী সালামা হতে, তিনি উম্মে সালামা হতে—এবং তা উল্লেখ করেছেন।

আর ইমাম বুখারী 'আল-হাজ্জ' (১৬৩৩)-এ এবং ইমাম মুসলিম 'আল-হাজ্জ' (১২৭৬)-এ উভয়েই মালিকের সূত্রে তা তাঁর মতোই বর্ণনা করেছেন।

দ্বিতীয় বর্ণনাটি ইমাম বুখারী 'আল-হাজ্জ' (১৬২৬)-এ অন্য একটি সূত্রে হিশাম ইবনু উরওয়াহ হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম নাসায়ী বলেছেন: "উরওয়াহ এটি উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে শোনেননি।" আর ইমাম দারাকুতনী বলেছেন: "এটি মুনকাতি (বিচ্ছিন্ন সনদ)।" কিন্তু হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: "উরওয়াহ উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে শুনে থাকা সম্ভব। কেননা তিনি তার জীবনের তিরিশ বছরেরও অধিককাল পেয়েছিলেন এবং তারা একই শহরে বসবাস করতেন।"

ইমাম মালিক 'আল-হাজ্জ' (১১৭)-এ ইবনু শিহাব হতে, তিনি হুমাইদ ইবনু আবদির রহমান ইবনু আওফ হতে বর্ণনা করেছেন যে, আবদুর রহমান ইবনু আবদিল কারী তাকে জানিয়েছেন যে, তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ফজরের সালাতের পর বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করেন। যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার তাওয়াফ শেষ করলেন, তখন তাকিয়ে দেখলেন সূর্য তখনও উদিত হয়নি। অতঃপর তিনি সাওয়ার হলেন এবং যি তুওয়া নামক স্থানে অবতরণ করে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন।

আর ইমাম বুখারী তাঁর 'সহীহ' (ফাতহুল বারীর সাথে ৩/৪৮৮)-এ উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা সংক্ষেপে তা'লীক হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

আবূ হানীফা, মালিক ও সুফিয়ান সাওরী (রাহিমাহুল্লাহ) এই মত অবলম্বন করেছেন। তারা বলেছেন: যে ব্যক্তি ফজরের পর তাওয়াফ করে, সে যেন সূর্যের উদয় না হওয়া পর্যন্ত তাওয়াফের দুই রাকাত সালাত আদায় না করে। অনুরূপভাবে, যে ব্যক্তি আসরের পর তাওয়াফ করে, সে যেন সূর্য অস্ত না যাওয়া পর্যন্ত তাওয়াফের দুই রাকাত সালাত আদায় না করে, যাতে মাকরুহ (নিষিদ্ধ) সময় পেরিয়ে যায়।

আর আবূ যুবাইর থেকে যা বর্ণিত হয়েছে—তিনি বলেছেন: আমি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কা'বা শরীফের তাওয়াফ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম? তিনি বললেন: আমরা তাওয়াফ করতাম এবং তাওয়াফের শুরু ও শেষে রুকন স্পর্শ করতাম। আমরা ফজরের সালাতের পর সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত এবং আসরের পর সূর্য অস্তমিত না হওয়া পর্যন্ত তাওয়াফ করতাম না। তিনি আরও বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সূর্য শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যবর্তী স্থানে উদিত হয়।" এই বর্ণনাটি দুর্বল (দাঈফ)।

ইমাম আহমাদ (১৫২৩২) এটি হাসান হতে, তিনি ইবনু লাহী‘আহ হতে, তিনি আবূ যুবাইর হতে বর্ণনা করেছেন। ইবনু লাহী‘আহ সম্পর্কে সমালোচনা সুপরিচিত।

আর তার (জাবিরের) এই উক্তি: "আমরা ফজরের সালাতের পর তাওয়াফ করতাম না..." এতে স্পষ্ট ব্যতিক্রম (নাকারাহ) রয়েছে। কেননা, নিষেধ ফজরের পর বা আসরের পর তাওয়াফ করার জন্য নয়, বরং নিষেধ হলো এই দুই সালাতের পর সালাত আদায় করার জন্য। এই কারণেই যারা এই দুই সময়ের পর সালাতকে মাকরুহ মনে করেন, তারা তা সূর্যের উদয়ের পর বা অস্ত যাওয়ার পর পর্যন্ত বিলম্বিত করেন। যেমনটি আবূ হানীফা, মালিক ও অন্যান্যরা বলেছেন।

আর মুওয়াত্তা'র 'আল-হাজ্জ' (১১৯)-এ মালিক, আবূ যুবাইর আল-মাক্কী থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি বলেছেন: "আমি দেখেছি যে ফজরের সালাতের পর এবং আসরের সালাতের পর কা'বা ঘর খালি থাকত, কেউ তাতে তাওয়াফ করত না।"

ইবনু আবদিল বার্র 'আল-ইসতিযকার' (১২/১৭৬)-এ বলেছেন: "এটি একটি মুনকার (অস্বীকৃত) খবর। যারা ফজরের পর ও আসরের পর তাওয়াফ হতে দেখেছে এবং (নিষেধের কারণে) সূর্য অস্তমিত না হওয়া পর্যন্ত সালাত আদায় করেনি, তারা সকলেই এই বর্ণনাকে প্রত্যাখ্যান করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4907)


4907 - عن جابر بن عبد الله، قال: فَجَعَلَ (يعني النبيّ صلى الله عليه وسلم) الْمَقَامَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْبَيْتِ، فَكَانَ أَبِي يَقُولُ وَلا أَعْلَمُهُ ذَكَرَهُ إِلا عَن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقْرَأُ فِي الرَّكْعَتَيْنِ: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1)}، وَ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ (1)} ثُمَّ رَجَعَ إِلَى الرَّكْنِ فَاسْتَلَمَهُ.

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث بطوله.




জাবের ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, অতঃপর তিনি (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাকামকে (মাকামে ইব্রাহীমকে) তাঁর ও বাইতুল্লাহর মাঝখানে রাখলেন। আর আমার পিতা বলতেন, আমি জানি না যে তিনি এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে ছাড়া বর্ণনা করেছেন—তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ দুই রাকআতে সূরা ইখলাস (ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ) এবং সূরা কাফিরুন (ক্বুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন) পাঠ করতেন। এরপর তিনি রুকন (হাজারে আসওয়াদ) -এর কাছে ফিরে এলেন এবং তা স্পর্শ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4908)


4908 - عن عروة، قال: قلتُ لِعَائِشَةَ أُمِّ الْمُؤْمِنينَ -وَأَنَا يَوْمَئِذٍ حَدِيثُ السِّنِّ-: أَرَأَيْتِ قَوْلَ اللهِ تبارك وتعالى: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا} [البقرة: 158]، ، فَمَا عَلَى الرَّجُلِ شَيْءٌ أَنْ لا يَطَّوَّفَ بِهِمَا؟ فَقَالَتْ عَائِشَةُ: كَلا! لَوْ كَانَ كَمَا تَقُولُ، لَكَانَتْ فَلا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ لا يَطَّوَّفَ بِهِمَا؛ إِنَّمَا أُنْزِلَتْ هَذِهِ الآيَةُ فِي الأَنْصَارِ كَانُوا يُهِلُّونَ لِمَنَاةَ، وَكَانَتْ مَنَاةُ حَذْوَ قُدَيْدٍ وَكَانُوا يَتَحَرَّجُونَ أَنْ يَطُوفُوا بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ، فَلَمَّا جَاءَ الإِسْلامُ سَأَلُوا رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ ذَلِكَ فَأَنْزَلَ الله تبارك وتعالى: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا}.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (129) عن هشام بن عروة، عن أبيه، قال (فذكره). ورواه البخاريّ في الحج (1790) من طريق مالك، به، مثله.

وقال: زاد سفيان وأبو معاوية عن هشام:"مَا أَتَمَّ الله حَجَّ امْرِئٍ وَلا عُمْرتَهُ لَمْ يَطُفْ بين الصّفا
والمرْوَة".

ولم يروه مسلم من طريق مالك، ولكن رواه من طريق أبي معاوية (1277: 259)، وأبي أسامة (260) كلاهما عن هشام، به، وزاد الزيادة المذكورة.

ورواه البخاريّ (4861) من حديث سفيان، حدّثنا الزهريّ، قال: سمعت عروة: قلت لعائشة رضي الله عنها، فقالت: إِنَّمَا كَانَ مَنْ أَهَلَّ بِمَنَاةَ الطَّاغِيَةِ الَّتِي بِالْمُشَلَّلِ لا يَطُوفُونَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ فأَنْزَلَ الله تَعَالَى: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} فَطَافَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم وَالْمُسْلِمُونَ. هكذا مختصرًا.

ورواه مسلم (1277/ 262) من وجه آخر عن عقيل، عن ابن شهاب، أنه قال: أخبرني عروة ابن الزبير، فذكر الحديث وقال عائشة: قد سنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم الطواف بينهما، فليس لأحد أن يترك الطّواف بهما.

ورواه ابن خزيمة (2769) من حديث عبد الرحيم -يعني ابن سليمان-، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرت الحديث، وقالت: فلعمري! ما أتَمَّ الله حجَّ من لم يطف بين الصفا والمروة؛ لأنّ الله عز وجل يقول: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} فهما شعائر الله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, 'উরওয়াহ (রহ.) বলেন: আমি একদিন উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম—তখন আমি অল্পবয়স্ক ছিলাম— আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে আপনার কী অভিমত: “নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা'বার হজ বা উমরাহ করবে, তার জন্য এই দু'টির মধ্যে সাঈ (তাওয়াফ) করলে কোনো গুনাহ নেই।” (সূরাহ বাক্বারা: ১৫৮) [এই আয়াতের ভিত্তিতে কি এমন মনে হয় যে] কেউ যদি এই দু'টির মাঝে সাঈ না করে, তবে তার কোনো ক্ষতি নেই?

তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কক্ষনো না! যদি তোমার কথা অনুযায়ী হতো, তবে আল্লাহ বলতেন: “তার জন্য এই দু'টির মধ্যে সাঈ না করলে কোনো গুনাহ নেই।” বরং এই আয়াতটি আনসারদের (মদীনার সাহাবাগণ) সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। তারা (ইসলামের পূর্বে) 'মানাত'-এর নামে ইহরাম বাঁধতো, আর মানাত ছিল কুদাইদের বরাবর। তারা সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করতে সংকোচবোধ করতো।

এরপর যখন ইসলাম এলো, তখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলেন। ফলে আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: “নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা'বার হজ বা উমরাহ করবে, তার জন্য এই দু'টির মধ্যে সাঈ করলে কোনো গুনাহ নেই।”

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরো বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফা ও মারওয়ার মাঝে তাওয়াফ (সাঈ) করাকে সুন্নাত করেছেন, তাই কারো জন্য তা পরিত্যাগ করা বৈধ নয়। আমার জীবনের শপথ! যে ব্যক্তি সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করে না, আল্লাহ তার হজ সম্পূর্ণ করেন না; কারণ আল্লাহ তাআলা বলেন: “নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত।” সুতরাং তারা উভয়েই আল্লাহর নিদর্শন।

তিনি আরও বলেন: আল্লাহ কোনো ব্যক্তির হজ বা উমরাহ সম্পূর্ণ করেন না, যে সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (4909)


4909 - عن عاصم، قال: قلت لأنس بن مالك رضي الله عنه: أَكُنْتُمْ تَكْرَهُونَ السَّعْيَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ؟ قَال: نَعَمْ لِأَنَّهَا كَانَتْ مِنْ شَعَائِرِ الْجَاهِلِيَّةِ حَتَّى أَنْزَلَ الله: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَا}.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1648)، ومسلم في الحجّ (1278) كلاهما من طريق عاصم (هو ابن سليمان الأحول)، به، واللفظ للبخاري.

قوله تعالى: يدلّ على أنّ السّعي بينهما أمر حتم لا بدّ منه؛ لأنّ شعائر الله عظيمة لا يجوز التهاون بها، وقد أشار البخاريّ في"صحيحه" إلى ذلك فقال:"باب وجوب الصفا والمروة وجعل من شعائر الله".

قال الحافظ نقلًا من ابن المنيّر:"وجوب السعي مستفاد من كونهما جعلا من شعائر الله".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, 'আসিম (রহ.) বলেন, আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনারা কি সাফা ও মারওয়ার সা'ঈ করা অপছন্দ করতেন? তিনি বললেন, হ্যাঁ। কারণ তা ছিল জাহিলিয়াতের নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা'বা ঘরে হজ বা উমরাহ করবে, তাদের উভয়ের মাঝে সা'ঈ (তাওয়াফ) করলে তার কোনো দোষ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (4910)


4910 - عن علي بن أبي طالب: أنه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم يسعى بين الصّفا والمروة في المسعى كاشفًا عن ثوبه، قد بلغ إلى ركبتيه.

حسن: رواه عبد الله بن أحمد من زياداته على المسند (597) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن أبي زياد القطوانيّ، حدّثنا زيد بن الحباب، أخبرني حرب أبو سفيان المنقريّ، حدّثنا محمد بن علي أبو جعفر، حدّثني عمّي، عن أبي، أنه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.

ورواه أبو بكر البزار -"كشف الأستار" (1117) - من طريق زيد بن الحباب، ثنا حرب بن
سريج، عن محمد بن علي بن الحسين، عن ابن الحنفية، عن علي، قال (فذكره).

وفي هذا الإسناد التصريح بأن العم هو ابن الحنفية، والأب هو علي بن أبي طالب.

وإسناده حسن من أجل الكلام في حرب أبي سفيان، وهو ابن سريج بن المنذر المنقري غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه؛ لأنه كان يخطئ كثيرًا كما قال ابن حبان.

وقال البخاريّ:"فيه نظر". ولكن وثقه ابن معين. وقال الإمام أحمد:"لا بأس به". وقال أبو الوليد الطيالسيّ:"كان جارنا لم يكن به بأس ولم أسمع منه".

ومعنى حديثه قريب من حديث حبيبة بنت أبي تجراة.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাফা ও মারওয়ার মাঝখানে সা'ঈ করার স্থানে এমন অবস্থায় দেখেছেন যে, তিনি তাঁর কাপড় হাঁটু পর্যন্ত তুলে রেখেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4911)


4911 - عن حبيبة بنت أبي تَجراة، قالت: دَخَلْنَا دَارَ أَبِي حُسَيْنٍ فِي نِسْوَةٍ مِنْ قُرَيْشٍ وَالنَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَطُوفُ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ، قَالَتْ: وَهُوَ يَسْعَى يَدُورُ بِهِ إِزَارُهُ مِنْ شِدَّةِ السَّعْيِ، وَهُوَ يَقُولُ لأَصْحَابِهِ:"اسْعَوْا فَإِنَّ الله كَتَبَ عَلَيْكُم السَّعْيَ".

حسن: وله طرق منها:

ما رواه الإمام أحمد (27367) - واللفظ له، والطبراني 24/ (227)، والدارقطني (2584)، والحاكم (4/ 70)، والبيهقي (5/ 98) كلّهم من طريق عبد الله بن المؤمل، عن عمر بن عبد الرحمن، حدّثنا عطاء، عن صفية بنت شيبة، عن حبية بنت أبي تجراة، فذكرته.

وسكت عليه الحاكم، وقال الذهبي:"لم يصح".

قلت: عبد الله بن مؤمل هو ابن هبة المخزوميّ"ضعيف"، وبه أعلّه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1456)، وأسند تضعيفه عن أحمد والنسائي وابن معين. وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 247):"فيه عبد الله بن المؤمّل وثقه ابن حبان، وقال:"يخطئ" وضعّفه غيره".

ومنها ما رواه الدارقطنيّ (2582)، والبيهقي (5/ 97) كلاهما من حديث ابن المبارك، قال: أخبرني معروف بن مُشكان، أخبرني منصور بن عبد الرحمن، عن أمه صفية، قالت: أخبرتني نسوة من بني عبد الدّار اللائي أدركن رسول الله صلى الله عليه وسلم. قلن:"دخلنا دار ابن أبي حسين، فاطلعنا من باب مقطع فرأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم يشتد في المسْعى حتى إذا بلغ بني فلان موضعًا قد سماها من المسعي- استقبل الناس فقال:"يا أيها الناس! ، اسعوا، فإنّ السّعي قد كُتب عليكم".

وهذا إسناد حسن، ومعروف بن مُشكان -بضم أوله وسكون المعجمة- المكيّ حسن الحديث.

وقال الحافظ ابن عبد الهادي في"التنقيح" (3/ 513):"إسناد هذا الحديث صحيح، وإن كان غير مخرّج في السّنن، ومعروف بن مشكان صدوق، لا نعلم أحدًا تكلّم فيه ومنصور بن عبد الرحمن هذا ثقة، مخرج له في الصّحيحين، ولم يتكلّم فيه أبو حاتم، بل قال فيه: صالح الحديث". انتهى.

ومنها ما رواه الإمام أحمد (27463) وصحّحه ابن خزيمة (2765) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن واصل مولى أبي عيينة، عن موسى بن عبيد، عن صفية بنت شيبة،
أنّ امرأة أخبرتها أنها سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم بين الصفا والمروة يقول:"اكتب عليكم السعيّ فاسعوا".

وإسناده لا بأس به؛ فإنّ موسي بن عبيد روى عنه اثنان، ووثقه ابن حبان، وهو من رجال"التعجيل" إلّا أنّ فيه موسى بن عبيدة - بزيادة هاء كما في بعض نسخ المسند، والدارقطني (587). وقد نبّه الحافظ في"التعجيل" بأنه"عبيد" بدون هاء.

ولم ينبه إليه الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 247) فظنّ أنه الرّبذيّ فضعّفه من أجله.

قال ابن خزيمة:"هذه المرأة التي لم تسم في هذا الخبر هي: حبيبة بنت أبي تجراة".

ومنها: ما رواه ابن خزيمة (2764) عن محمد بن عمر بن علي بن عطاء بن مقدم المقدمي، ثنا الخليل بن عثمان، قال: سمعت عبد الله بن بنيه، عن جدته صفية بنت شيبة، عن جدتها بنت أبي تجراة، قالت: كان لنا خلفة في الجاهلية، قالت: اطلعت من كوة بين الصفا والمروة، فأشرفت على النبيّ صلى الله عليه وسلم وإذا هو يسعى، وإذا هو يقول لأصحابه:"اسعوا فإنّ الله كتب عليكم السّعي" فلقد رأيته من شدّة السّعي يدور الإزار حول بطنه حتى رأيت بياض بطنه وفخذيه". وفي الإسناد من لم توجد له ترجمة.

وبجموع هذه الطرق يكون الحديث حسنًا إن شاء الله تعالي.

وأمّا قول الحافظ في"الفتح" (3/ 498):"وله طريق أخرى في صحيح ابن خزيمة مختصرًا، وعند الطبراني عن ابن عباس كالأولي وإذا انضمّت إلى الأولى قويتْ" ففيه نظر؛ فإنّ الحديث من طرقه الكثيرة يشدّ بعضه بعضًا، وحديث ابن عباس لا يفيد شيئًا فإن في إسناده المفضل بن صدقة متروك كما قال الهيثمي (3/ 148)، وهو لا يصح أن يكون شاهدًا، ولذا لم أخرجه. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (4/ 196 - 197).

وفي هذه الأحاديث دلالة واضحة على أنّ السّعي فرض، وهو قول الكافة، وأنه لا يتحلّل ما لم يأت به.

عن عمرو بن دينار، قال: سألنا ابن عمر عن رجل طاف باليت سبعًا في عمرة، ولم يطف بين الصفا والمروة، أيأتي امرأته؟ قال: قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم فطاف بالبيت سبعًا، وصلى خلف المقام ركعتين، وطاف بين الصّفا والمروة سبعًا {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} ..

وسألنا جابر بن عبد الله فقال: لا يقربنّها حتى يطوف بين الصفا والمروة. أخرجهما البخاري (1793، 1794).

وهذا مذهب عائشة، وابن عمر، وجابر بن عبد الله. وهو قول مالك، والشافعي وأحمد في إحدى الروايتين.

وذهب جماعة منهم: أبو حنيفة، وسفيان الثوري، وفي رواية عن أحمد بأنه واجب وليس بفرض، وعلى من تركهـ دم.
وذهب ابن عباس، وابن سيرين، وعطاء، ومجاهد إلى أنّ من طاف فقد حلَّ مستدلين بالآية، وقالوا: رفع الحرج يدل على الإباحة.




হাবীবা বিনতে আবি তাজরাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশের কয়েকজন মহিলার সাথে আমরা আবূ হুসাইনের বাড়িতে প্রবেশ করলাম, আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা'ঈ করছিলেন। তিনি বলেন: তিনি যখন সা'ঈ করছিলেন, তখন দ্রুত চলার কারণে তাঁর পরিহিত লুঙ্গি (ইযার) তাঁর চারপাশে ঘুরে যাচ্ছিল। আর তিনি তাঁর সাহাবীদের বলছিলেন: "তোমরা সা'ঈ করো, কারণ আল্লাহ তোমাদের উপর সা'ঈ করাকে আবশ্যক করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4912)


4912 - عن سعيد بن جبير، قال: رأيت ابن عمر يمشي بين الصّفا والمروة، ثم قال: إنْ مشيتُ فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي، وإن سعيتُ فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يسعي.

صحيح: رواه النّسائيّ (2977)، والإمام أحمد (6393) كلاهما من حديث عبد الرزاق -وصحّحه ابن خزيمة (2772) ورواه من طريق الضّحّاك- كلاهما عن سفيان الثوريّ، عن عبد الكريم الجزريّ، عن سعيد بن جبير، فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أبو داود (1904) من طريق زهير، والترمذي (864) من حديث ابن فضيل، والنسائي (2976)، وابن خزيمة (2771)، والإمام أحمد (5143) كلّهم من حديث سفيان، وابن ماجه (2988) من حديث الجراح بن مليح والد وكيع -كلّهم أعني: زهيرا، وابن فضيل، وسفيان، والجراح- عن عطاء بن السائب، عن كثير بن جمهان، أنّ رجلًا قال لعبد الله بن عمر بين الصّفا والمروة: يا أبا عبد الرحمن! ، إنّي أراك تمشي والناس يسعون؟ . قال:"إن أمشي فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي، وإن أسعى فقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يسعى، وأنا شيخ كبير".

وعطاء بن السائب مختلط، ولكن روي سفيان عنه قبل الاختلاط، ثم متابعة غيره يدل على أنه لم يختلط في هذا الحديث.

ولكن فيه كثير بن جمهان، قال فيه أبو حاتم:"شيخ يكتب حديثه". وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول".

قلت: وهو كذلك لأنه توبع كما أشار إليه الترمذي، فقال عقب الحديث:"هذا حديث حسن صحيح، وروي عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر، نحوه" وهو كما سبق.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন: আমি ইবনু উমরকে সাফা ও মারওয়ার মাঝে হাঁটতে দেখেছি। অতঃপর তিনি বললেন: “যদি আমি হেঁটে চলি, তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হাঁটতে দেখেছি। আর যদি আমি দ্রুত চলি (সায়ী করি), তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দ্রুত চলতে দেখেছি।”









আল-জামি` আল-কামিল (4913)


4913 - عن ابن عمر: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا طَافَ بِالْبَيْتِ الطَّوَافَ الأَوَّلَ خَبَّ ثَلاثًا وَمَشَى أَرْبَعًا، وَكَانَ يَسْعَي بِبَطْنِ الْمَسِيلِ إِذَا طَافَ بَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ.

وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يَفْعَلُ ذَلِكَ.

متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1617)، ومسلم في الحج (1261/ 230) كلاهما من حديث عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وقوله:"بطن المسيل" وهو المكان الذي يجتمع فيه ماء السيل، وهو الآن يعرف بين العَلَمين الأخضرين.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাইতুল্লাহর প্রথম তাওয়াফ করতেন, তখন তিনি তিন চক্কর দ্রুত চলতেন (রমল করতেন) এবং চার চক্কর হেঁটে চলতেন। আর তিনি যখন সাফা ও মারওয়ার মাঝে তাওয়াফ (সাঈ) করতেন, তখন উপত্যকার মধ্যভাগ দিয়ে দ্রুত চলতেন। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ও এরূপ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4914)


4914 - عن ابن عباس، قال: إِنَّمَا سَعَى رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم بِالْبَيْتِ وَبَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ لِيُرِيَ الْمُشْرِكِينَ قُوَّتَهُ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1649)، ومسلم في الحج (1265: 241) كلاهما من حديث سفيان، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.

قال الترمذيّ عقب حديث ابن عباس:"وهو الذي يستحبه أهل العلم أن يسعى بين الصّفا والمروة، فإن لم يسع، ومشي بين الصفا والمروة رأوه جائزًا".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল্লাহর চারপাশে (তাওয়াফের মধ্যে) এবং সাফা ও মারওয়ার মধ্যখানে দ্রুত হেঁটেছিলেন (সা’ঈ করেছিলেন) কেবল এই জন্য, যাতে মুশরিকদেরকে তাঁর শক্তি ও সামর্থ্য প্রদর্শন করতে পারেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4915)


4915 - عن جابر بن عبد الله: أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا نَزَلَ مِن الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ مَشَي حَتَّى إِذَا انْصَبَّتْ قَدَمَاهُ فِي بَطْنِ الْوَادِي سَعَى حَتَّى يَخْرُجَ مِنْهُ.

صحيح: رواه مالك في الحج (131) عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره. ورواه مسلم في الحج (1218) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، قال:" … ثم نزل إلى المروة، حتى إذا انصبَّتْ قدماه في بطن الوادي سعي، حتّى إذا صعدتا مشي، حتى أتى المروة" الحديث في صفة حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সাফা থেকে মারওয়ার দিকে (বা মারওয়া থেকে সাফার দিকে) নামতেন, তখন তিনি হেঁটে চলতেন। অবশেষে যখন তাঁর দু' পা উপত্যকার তলদেশে পৌঁছাতো, তখন তিনি দ্রুত চলতেন (দৌড়াতেন) যতক্ষণ না তিনি তা থেকে বের হয়ে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4916)


4916 - عن صفية بنت شيبة، عن امرأة قالت: رَأَيْتُ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم يَسْعَى فِي بَطْنِ الْمَسِيلِ، وَيَقُولُ:"لا يُقْطَعُ الْوَادِي إِلا شَدًّا".

صحيح: رواه النسائيّ (2980)، والإمام أحمد (27281)، والبيهقيّ (5/ 98) كلّهم من حديث حماد بن زيد، عن بُديل بن ميسرة، عن المغيرة بن حكيم، عن صفية بنت شيبة، عن امرأة، فذكرته.

واللفظ للنسائيّ، وفي البيهقيّ:"الوادي أو الأبطح" هكذا بالشّك.

ولفظ أحمد: عن امرأة أنّها رأت النبيَّ صلى الله عليه وسلم من خوخةٍ وهو يسعى في بطن المسيل وهو يقول:"لا يقطع الوادي إلّا شدًّا" وأظنه قال: وقد انكشف الثوب عن ركبتيه. ثم قال حماد بعد:"لا يقطع -أو قال: الأبطح- إلّا شدًّا". وسمعته يقول:"لا يُقطع الأبطح إلّا شدًّا" انتهى.

وإسناده صحيح، وصوّبه الدّارقطني في"العلل" (15/ 423).

وأمّا ما رواه ابن ماجه (2987)، والإمام أحمد (27280) وغيرهما من حديث هشام الدّستوائيّ، عن بديل بن ميسرة، عن صفية بنت شيبة، عن أمّ ولد شيبة، أنّها أبصرت النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو يسعى بين الصفا والمروة ويقول:"لا يقطع الأبطح إلّا شدًّا". وذلك بإسقاط المغيرة بن حكيم بين بديل بن ميسرة، وصفية بنت شيبة، فلا يضر ما صحَّ. ويجوز أن يكون بديل نفسه روي من وجهين فإنّ المزي لم ينفِ رواية بديل عن صفية بنت شيبة.

وللحديث أسانيد أخرى ذكر هنا ما صحَّ.
والصّحابيّة غير المسماة هي حبيبة بنت أبي تجراة، ويجوز أن تكون غيرها، وصفية بنت شيبة سمعتْ منهما جميعًا.




সাফিয়্যা বিনত শায়বাহ থেকে বর্ণিত, একজন মহিলা বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে উপত্যকার তলদেশে দ্রুত গতিতে দৌঁড়াতে দেখেছি। আর তিনি বলছিলেন: "উপত্যকা দ্রুত বেগে ব্যতীত অতিক্রম করা হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4917)


4917 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثُمَّ خَرَجَ مِن الْبَابِ إِلَى الصَّفَا فَلَمَّا دَنَا مِنَ الصَّفَا قَرَأَ: {إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ} [البقرة: 158] أَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ الله بِهِ فَبَدَأَ بِالصَّفَا فَرَقِيَ عَلَيْهِ … حَتَّى إِذَا كَانَ آخِرُ طَوَافِهِ عَلَى الْمَرْوَة … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره في الحديث الطّويل.

وأخرجه مالك في الحج (126) عن جعفر بن محمد بن علي، به، مختصرًا.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তারপর তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দরজা দিয়ে সাফার দিকে বের হলেন। যখন তিনি সাফার নিকটবর্তী হলেন, তখন তিনি পাঠ করলেন: {নিশ্চয় সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্যতম} (সূরা বাকারা: ১৫৮)। (তিনি বললেন,) আমি তা দিয়েই শুরু করব যা দিয়ে আল্লাহ শুরু করেছেন। অতঃপর তিনি সাফা দিয়ে শুরু করলেন এবং তাতে আরোহণ করলেন... অবশেষে যখন মারওয়ায় তাঁর শেষ চক্কর হলো...।









আল-জামি` আল-কামিল (4918)


4918 - عن عبد الله بن عباس، قال: قدم النبيُّ صلى الله عليه وسلم مكة، فطاف وسعي بين الصّفا والمروة، ولم يقرب الكعبة بعد طوافه بها حتى رجع من عرفة.

صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1625) عن محمد بن أبي بكر، حدّثنا فضيل، حدّثنا موسي ابن عقبة، أخبرني كريب، عن عبد الله بن عباس، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় আগমন করলেন। অতঃপর তিনি তাওয়াফ করলেন এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করলেন। তিনি তাওয়াফ করার পর কা‘বার কাছে যাননি, বরং আরাফা থেকে ফিরে আসা পর্যন্ত অপেক্ষা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4919)


4919 - عن عائشة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّما جُعل رمي الجمار والسّعي بين الصّفا والمروة لإقامة ذكر الله".

حسن: رواه أبو داود (1888)، والترمذي (902) كلاهما من حديث عيسى بن يونس، عن عبيد الله بن أبي زياد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. قال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في عبيد الله بن أبي زياد اختلف فيه قول ابن معين، فمرة قال: ضعيف، وأخرى: ليس به بأس، وكذلك النسائي، فقال مرة: ليس بالقوي، وقال أخرى: ليس به بأس.

وقال أبو حاتم: ليس بالقوي، ولا المتين، هو صالح الحديث يكتب حديثه، ومحمد بن عمرو أحبّ إليَّ منه، يحوّل من كتاب الضعفاء (يعني كتاب الضعفاء للبخاريّ). والخلاصة فيه كما قال ابن عدي:"قد حدّث عنه الثقات، ولم أر في حديثه شيئًا منكرًا".
فمثله يحسّن حديثه إذا لم يخالف، ولم يرو ما ينكر عليه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কঙ্কর নিক্ষেপ করা এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করা বিধান করা হয়েছে কেবল আল্লাহর স্মরণ প্রতিষ্ঠার জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (4920)


4920 - عن عبد الله بن عباس، قال:" … وَجَعَلَتْ أُمُّ إِسْمَاعِيلَ تُرْضِعُ إِسْمَاعِيلَ وَتَشْرَبُ مِنْ ذَلِكَ الْمَاءِ، حَتَّى إِذَا نَفِدَ مَا فِي السِّقَاءِ عَطِشَتْ وَعَطِشَ ابْنُهَا وَجَعَلَتْ تَنْظُرُ إِلَيْهِ يَتَلَوَّى -أَوْ قَالَ يَتَلَبَّطُ-. فَانْطَلَقَتْ كَرَاهِيَةَ أَنْ تَنْظُرَ إِلَيْهِ فَوَجَدَت الصَّفَا أَقْرَبَ جَبَلٍ فِي الأَرْضِ يَلِيهَا فَقَامَتْ عَلَيْهِ ثُمَّ اسْتَقْبَلَت الْوَادِيَ تَنْظُرُ هَلْ تَرَى أَحَدًا فَلَمْ تَرَ أَحَدًا فَهَبَطَتْ مِن الصَّفَا حَتَّى إِذَا بَلَغَت الْوَادِيَ رَفَعَتْ طَرَفَ دِرْعِهَا، ثُمَّ سَعَتْ سَعْيَ الإِنْسَانِ الْمَجْهُودِ حَتَّى جَاوَزَت الْوَادِيَ ثُمَّ أَتَت الْمَرْوَةَ فَقَامَتْ عَلَيْهَا وَنَظَرَتْ هَلْ تَرَى أَحَدًا فَلَمْ تَرَ أَحَدًا فَفَعَلَتْ ذَلِكَ سَبْعَ مَرَّاتٍ".

قَالَ ابْنُ عَبَّاس: قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"فَذَلِكَ سَعْيُ النَّاسِ بَيْنَهُمَا".

صحيح: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3364) عن عبد الله بن محمد (هو الجعفيّ المسنديّ)، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب السّختيانيّ، وكثير بن كثير بن المطّلب بن أبي وداعة -يزيد أحدهما على الآخر-، عن سعيد بن جبير، قال ابن عباس، فذكر الحديث بطوله.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইসমাঈলের মাতা (হাজেরা) ইসমাঈলকে দুধ পান করাচ্ছিলেন এবং সেই পানি পান করছিলেন। অবশেষে মশকটির পানি শেষ হয়ে গেলে তিনি এবং তাঁর পুত্র পিপাসার্ত হলেন। তিনি তার দিকে তাকাতে লাগলেন, আর সে (শিশুটি) যন্ত্রণায় ছটফট করছিল—অথবা তিনি বলেছিলেন, আছাড় খাচ্ছিল। তার দিকে না তাকানোর অপছন্দ নিয়ে তিনি চলে গেলেন। তিনি সাফা পাহাড়কে তাঁর নিকটতম পাহাড় হিসেবে পেলেন। তিনি তার উপর দাঁড়ালেন, অতঃপর উপত্যকার দিকে মুখ করে তাকালেন, কাউকে দেখতে পান কিনা। কিন্তু তিনি কাউকেই দেখতে পেলেন না। এরপর তিনি সাফা থেকে নেমে এলেন। যখন উপত্যকায় পৌঁছলেন, তখন তিনি তাঁর কামিজের কোণা উঠালেন, অতঃপর তিনি খুব ক্লান্ত মানুষের মতো দ্রুত দৌড়ালেন, যতক্ষণ না উপত্যকা পার হলেন। অতঃপর তিনি মারওয়ার কাছে গেলেন এবং তার উপর দাঁড়ালেন এবং দেখলেন কাউকে দেখতে পান কিনা। তিনি কাউকেই দেখতে পেলেন না। তিনি এভাবে সাতবার করলেন।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই কারণেই মানুষ তাদের উভয়ের (সাফা ও মারওয়া) মধ্যে সাঈ করে।"