আল-জামি` আল-কামিল
4948 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم نَصْرُخُ بِالْحَجِّ صُرَاخًا، فَلَمَّا قَدِمْنَا مَكَّةَ أَمَرَنَا أَنْ نَجْعَلَهَا عُمْرَةً إِلا مَنْ سَاقَ الْهَدْيَ فَلَمَّا كَانَ يَوْمُ التَّرْوِيَةِ وَرُحْنَا إِلَى مِنًى أَهْلَلْنَا بِالْحَجِّ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1247) عن عبيد الله بن عمر القواريريّ، حدّثنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، حدّثنا داود (هو ابن أبي هند)، عن أبي نضرة (هو المنذر بن مالك بن قطعة العبدي)، عن أبي سعيد، قال (فذكره).
إذا تبين أن النهي عن البناء في منى غير صحيح، فالمسألة على البراءة الأصلية يُنظر فيه تحقيق المصلحة للحجاج.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উচ্চস্বরে হজ্বের তালবিয়াহ্ পাঠ করতে করতে বের হলাম। যখন আমরা মক্কায় পৌঁছলাম, তখন তিনি আমাদেরকে নির্দেশ দিলেন যেন আমরা সেটিকে (আমাদের ইহরামকে) উমরায় পরিণত করি, তবে যে ব্যক্তি কুরবানীর পশু (হাদী) সাথে নিয়ে এসেছে সে ব্যতীত। অতঃপর যখন ইয়াউমুত তারবিয়াহ (যিলহজ মাসের ৮ তারিখ) এলো এবং আমরা মিনায় গেলাম, তখন আমরা হজ্বের ইহরাম বাঁধলাম।
4949 - عن عبد العزيز بن رُفيع، قال: سَأَلْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ، قُلْتُ: أَخْبِرْنِي عَنْ شَيْءٍ عَقَلْتَهُ عَنْ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم أَيْنَ صَلَّى الظُّهْرَ يَوْمَ التَّرْوِيَةِ؟ قَالَ: بِمِنًى. قُلْتُ: فَأَيْنَ صَلَّي الْعَصْرَ يَوْمَ النَّفْرِ؟ قَال: بِالأَبْطَحِ. ثُمَّ قَالَ: افْعَلْ مَا يَفْعَلُ أُمَرَاؤُكَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1653)، ومسلم في الحج (1309) كلاهما عن إسحاق ابن يوسف الأزرق، حدّثنا سفيان (هو الثوريّ)، عن عبد العزيز بن رفيع، به، ولفظهما سواء إلّا أنه وقع عند البخاريّ زيادة لفظة (العصر) في قوله:"أين صلّى الظّهر والعصر يوم التروية".
وهي زيادة شاذّة تفرّد بها شيخ البخاريّ وهو عبد الله بن محمد الجعفيّ، عن إسحاق الأزرق.
قال الحافظ في الفتح (3/ 508):"فإنّ لفظ"العصر" لم يذكره غيره، فسيأتي في أواخر صفة الحج [1763] عن أبي موسى محمد بن المثني عند المصنف".
ثم ذكر اثني عشر نفسًا ممن رواه عن إسحاق الأزرق، ولم يقلْ أحدٌ منهم:"والعصر".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তাঁকে (আনাসকে) জিজ্ঞাসা করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আপনার স্মরণ আছে এমন একটি বিষয় আমাকে বলুন: তিনি ইয়াওমুত তারবিয়াহ (যিলহজের ৮ তারিখ)-এ যুহরের সালাত কোথায় আদায় করেছিলেন? তিনি বললেন: মিনায়। আমি বললাম: আর ইয়াওমুন নাফর (মিনায় অবস্থান শেষে প্রত্যাবর্তনের দিন)-এর আসরের সালাত তিনি কোথায় আদায় করেছিলেন? তিনি বললেন: আবতাহ নামক স্থানে। অতঃপর তিনি বললেন: তোমার শাসকবর্গ যা করে, তুমিও তাই করো।
4950 - عن جابر بن عبد الله، قال: … فَلَمَّا كَانَ يَوْمُ التَّرْوِيَةِ تَوَجَّهُوا إِلَى مِنًى فَأَهَلُّوا بِالْحَجِّ وَرَكِبَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم فَصَلَّى بِهَا الظُّهْرَ وَالْعَصْرَ وَالْمَغْرِبَ وَالْعِشَاءَ وَالْفَجْرَ … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث بطوله.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... যখন ইয়াওমুত তারবিয়াহ (তারবিয়ার দিন) এলো, তখন তারা মিনার দিকে রওনা হলেন এবং হজ্জের জন্য ইহরাম বাঁধলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহণ করলেন (বাহনে), অতঃপর তিনি সেখানে যোহর, আসর, মাগরিব, ইশা ও ফজরের সালাত আদায় করলেন...
4951 - عن ابن عباس، قال: صلّى رسول الله صلى الله عليه وسلم الظُّهرَ يوم التّروية والفجر يوم عرفة بمنى.
صحيح: رواه أبو داود (1911) -واللفظ له-، والترمذي (880) كلاهما من حديث الأعمش، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره.
ولفظ الترمذيّ:"صلّي بمنى الظّهر والفجر، ثم غدا إلى عرفات".
ورواه الإمام أحمد (2701)، وصحّحه ابن خزيمة (2799)، والحاكم (1/ 461) كلّهم من هذا الطّريق.
قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ".
ولكن أعلّه الترمذي فقال:"حديث مقسم عن ابن عباس، قال علي بن المديني: قال يحيي: قال شعبة: لم يسمع الحكم من مقسم إلّا خمسة أشياء وعدّها وليس هذا الحديث فيما عدّ شعبة".
والحكم هو ابن عتيبة من الثقات الضّابطين من أثبت الناس في إبراهيم النّخعي إلّا أنّ شعبة كان شديدًا عليه؛ لأنه كان فيه تشيّع لم يظهر منه إلّا بعد موته.
يقول أبو عوانة:"سمعت منه أربعمائة حديث، ولم أحدِّث منها إلّا بحديثين وتركتُ الباقي من أجل شعبة".
فقول شعبة:"لم يسمع منه مقسم إلّا خمسة أشياء وليس منها هذا الحديث" فيه مبالغة؛ ولذا لم يأخذ أهل العلم بقول شعبة فأخرجوا حديثه في صحاحهم كما تقدم، ثم يقال: إنّه أخذ باقي الأحاديث من كتاب، فإن كان هذا الكتاب مناولة من مقسم فهو أحد طرق التحمّل، وأما كونه نسخة بدون علم الشيخ فهو بعيد من مثل الحكم الذي اتفق أهل العلم على توثيقه.
وللحديث طريق آخر يقويه، وهو ما رواه الترمذي (879)، وابن ماجه (3004) كلاهما من حديث إسماعيل بن مسلم، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى: الظهر والعصر والمغرب والعشاء والفجر، ثم غدا إلى عرفات.
قال الترمذي:"وإسماعيل بن مسلم قد تكلّموا فيه من قبل حفظه".
قلت: وهو كذلك إلّا أنه لم يخطئ في هذا لوجود المتابعة وله شواهد صحيحة، كما مضى.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তারবিয়াহর দিন (৮ই যুলহাজ্জাহ) যোহরের সালাত এবং আরাফার দিন (৯ই যুলহাজ্জাহ) ফজরের সালাত মিনার মধ্যে আদায় করেছেন।
4952 - عن ابن عمر، أَنَّهُ كَانَ يُحِبُّ إِذَا اسْتَطَاعَ أَنْ يُصَلِّيَ الظُّهْرَ بِمِنًى مِنْ يَوْمِ التَّرْوِيَةِ وَذَلِكَ أَنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم صَلَّى الظُّهْرَ بِمِنًى.
حسن: رواه الإمام أحمد (6131) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، ثنا أبي، عن ابن إسحاق، ثني نافع، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده حسن؛ لأنّ محمد بن إسحاق صرَّح بالتحديث.
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (হজ্বের অষ্টম দিন) ইয়াওমুত তারবিয়াহর দিন মিনায় যুহরের সালাত আদায় করতে সক্ষম হলে তা পছন্দ করতেন। এর কারণ হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনায় যুহরের সালাত আদায় করেছিলেন।
4953 - عن عبد الله بن الزبير قال: من سنّة الحج أن يصلي الإمام الظّهر والعصر والمغرب والعشاء الآخرة والصّبح بمنى … الحديث.
صحيح: رواه ابن خزيمة (2800) عن يوسف بن موسي، ثنا جرير، عن يحيى، عن القاسم بن محمد، عن عبد الله بن الزبير، قال (فذكره). وسيأتي بتمامه في باب بماذا يحصل التّحلل الأول.
আব্দুল্লাহ ইবনুয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হজ্জের সুন্নাতের অন্তর্ভুক্ত হলো এই যে ইমাম যোহর, আসর, মাগরিব, এশা এবং ফজর সালাত মিনায় আদায় করবেন...
4954 - عن عبد الله قال: صليتُ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم بمني ركعتين، وأبي بكر وعمر، ومع عثمان صدرًا من إمارته ثم أتمّها.
متفق عليه: رواه البخاريّ في تقصير الصلاة (1082)، ومسلم في صلاة المسافرين (694) كلاهما من حديث عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ذهب جمهور أهل العلم أبو حنيفة والشافعي وأحمد وغيرهم إلى أن هذا القصر خاص لمن كان بمني مسافرًا. قالوا: وأما أهل مكة فليس لهم أن يقصروا الصلاة بمنى، وقد كان عمر بن الخطاب
رضي الله عنه يصلي بهم فيقصر فإذا سلّم التفتَ فقال:"أتمّوا يا أهل مكّة، فإنّا قوم سَفر".
ولم ينقل عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مثل ذلك لاشتهار ذلك عنه صلى الله عليه وسلم، فصار إتمام الصلاة للمقيمين من العلم الظاهر العام.
قال الخطّابي في"معالمه" (2/ 415):"حدثني إسماعيل بن محمد بن خشك بن محرز، حدثنا سلمة بن شبيب، قال: قال الوليد بن مسلم: وافيت مكة وعليها محمد بن إبراهيم، وقد كتب إليه أن يقصر الصلاة بمنى وعرفة، فقصر، فرأيت سفيان الثوري قام فأعاد الصلاة، وقام ابن جريج فبني على صلاته فأتمّها. قال الوليد: ثم دخلتُ المدينة، فلقيت مالك بن أنس فذكرت له ذلك، وأخبرته بفعل الأمير وفعل سفيان وابن جريج؟ فقال: أصاب الأمير وأخطأ ابن جريج. ثم قدمت الشام فلقيت الأوزاعي، فذكرت له ذلك، فقال: أصاب مالك، وأصاب الأمير، وأخطأ سفيان وابن جريج. قال: ثم دخلت مصر فلقيت الشافعي، فذكرت ذلك له، فقال: أخطأ الأمير، وأخطأ مالك، وأخطأ الأوزاعي، وأصاب سفيان، وأصاب ابن جريج".
وقال:"أما ابن جريج فإنما بني على صلاته؛ لأنّ من مذهبه أن المفترض يجوز له أن يصلي خلف المتنفّل، وأعاد سفيان الصلاة؛ لأنه لا يرى للمفترض أن يصلي خلف المتنفِّل، وكانت صلاة الأمير عنده نافلة حين قصرها وهو مقيم بمكة واليا عليها، فاستأنف سفيان صلاته، وكذلك مذهب أصحاب الرأي في هذا"انتهي.
وذهب مالك والأوزاعي وإسحاق إلى أنّ الإمام إذا قصر قصروا معه، وسواء في ذلك أهل مكة وغيرهم.
وقد سئل سماحة الشيخ عبد العزيز بن باز رحمه الله: هل قصْرُ الصّلاة لأهل مكة في المشاعر خاص بالحجّاج فقط أم يشمل حتى الباعة منهم وغيرهم ممن يوجدون في المشاعر من غير حج؟ .
فأجاب بقوله: المشهور عند العلماء أنّ هذا القصر خاص بالحجاج من أهل مكة فقط على قول من أجازه لهم.
أما الجمهور فيرون أن أهل مكة لا يقصرون ولا يجمعون لأنهم غير مسافرين وعليهم أن يتمّوا كلّهم ويصلّوا الصّلاة في أوقاتها.
ولكن من أجازه للحجّاج فهو خاص بالحجّاج فقط من أهل مكة وهو الأصحّ؛ لأنّ الرسول صلى الله عليه وسلم لم يأمرهم بالإتمام.
أما الباعة ونحوهم ممن لم يقصد الحجّ فإنه يتم ولا يجمع كسائر سكان مكة.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করেছি, আর আবূ বকর এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও। আর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতের প্রথম অংশেও (দুই রাকাত আদায় করেছি), এরপর তিনি তা পূর্ণ (চার রাকাত) আদায় করলেন।
4955 - عن ابن عمر، قال: صَلَّى النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِمِنًى صَلاةَ الْمُسَافِرِ وَأَبُو بَكْرٍ وَعُمَرُ وَعُثْمَانُ ثَمَانِيَ سِنِينَ أَوْ قَالَ سِتَّ سِنِينَ.
قَالَ حَفْصٌ: وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يُصَلِّي بِمِنًى رَكْعَتَيْنِ، ثُمَّ يَأْتِي فِرَاشَهُ، فَقُلْتُ: أَيْ عَمِّ، لَوْ صَلَّيْتَ
بَعْدَهَا رَكْعَتَيْنِ. قَال: لَوْ فَعَلْتُ لأَتْمَمْتُ الصَّلاةَ.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (694: 18) عن عبيد الله بن معاذ، حدّثنا أبي، حدّثنا شعبة، عن خُبيب بن عبد الرحمن سمع حفص بن عاصم، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনাতে মুসাফিরের সালাত (কসর) আদায় করেছেন। তাঁর পর আবূ বাকর, উমার ও উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আট বছর – অথবা তিনি বলেছেন ছয় বছর – কসরের সালাত আদায় করেছেন। হাফস বলেন: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনাতে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন, এরপর তিনি তাঁর বিছানায় চলে যেতেন। তখন আমি তাঁকে বললাম: হে আমার চাচা, আপনি যদি এরপর আরও দুই রাকাত (নফল) সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: যদি আমি তা করতাম, তবে আমি সালাত পূর্ণ করে ফেলতাম।
4956 - عن حارثة بن وهب، قال: صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمني آمن ما كان الناس وأكثره ركعتين.
متفق عليه: رواه البخاريّ في تقصير الصلاة (1083)، ومسلم في صلاة المسافرين (696) كلاهما من وجهين عن أبي إسحاق قال -في رواية أحدهما- سمعت حارثة بن وهب، فذكره.
قال مسلم: حارثة بن وهب الخزاعيّ هو أخو عبيد الله بن عمر بن الخطاب لأمّه.
হারিছাহ ইবনু ওয়াহব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় সালাত আদায় করেছি। যখন মানুষ সবচেয়ে নিরাপদ ও অধিক সংখ্যক ছিল, তখনও তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’রাকআত সালাত আদায় করেছিলেন।
4957 - عن عبد الرحمن بن يزيد قال: صَلَّى بِنَا عُثْمَانُ بْنُ عَفَّانَ رضي الله عنه بِمِنًى أَرْبَعَ رَكَعَاتٍ، فَقِيلَ ذَلِكَ لِعبد الله بْنِ مَسْعُودٍ رضي الله عنه فَاسْتَرْجَعَ ثُمَّ قَالَ: صَلَّيْتُ مَعَ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم بِمِنًى رَكْعَتَيْنِ، وَصَلَّيْتُ مَعَ أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ رضي الله عنه بِمِنًى رَكْعَتَيْنِ، وَصَلَّيْتُ مَعَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضي الله عنه بِمِنًى رَكْعَتَيْنِ فَلَيْتَ حَظِّي مِنْ أَرْبَعِ رَكَعَاتٍ رَكْعَتَانِ مُتَقَبَّلَتَانِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في تقصير الصلاة (1084)، ومسلم في صلاة المسافرين (695) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد الواحد، عن الأعمش، قال: حدّثنا إبراهيم، قال: سمعت عبد الرحمن بن يزيد، فذكره.
ورواه أبو داود (1960) من طريق أبي معاوية، عن الأعمش وزاد فيه: ثم تفرّقت بكم الطرق، فلوددت أنّ لي من أربع ركعات ركعتين متقبّلتين.
قال الأعمش: فحدثني معاوية بن قرّة، عن أشياخه، أنّ عبد الله صلّى أربعًا، قال: فقيل له: عبت عثمان ثم صليت أربعًا. قال: الخلاف شرّ".
وفيه شيوخ معاوية بن مرة مجهولون؛ ولكن لوجود جمع يجبر بعضهم بعضًا كما يقال.
وقال البيهقي (3/ 144) وقد رُوي بإسناد موصول: فأخرجه من طريق يونس بن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق، عن عبد الرحمن بن يزيد قال: كنا مع عبد الله بن مسعود بجمع، فلما دخل مسجد مني فقال: كم صلى أمير المؤمنين؟ قالوا: أربعًا. فصلي أربعًا. قال: فقلنا: ألم تحدّثنا أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم صلى ركعتين، وأبا بكر صلى ركعتين؟ قال: بلى. وأنا أحدثكموه الآن، ولكن عثمان كان إمامًا فما أخالفه، والخلاف شرّ".
وفي الإسناد أبو إسحاق وهو السبيعي مختلط ومدلس.
ولكن رُوي بأسانيد أخرى عند أبي يعلى وأبي عوانة والبزّار والطبراني في الأوسط وغيرهم يقوّي بعضُها بعضًا فتصح هذه الزيادة بمجموع هذه الطّرق.
আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনাতে আমাদের নিয়ে চার রাকা‘আত সালাত আদায় করলেন। যখন এ বিষয়টি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বলা হলো, তখন তিনি 'ইন্নালিল্লা-হ...' (ফেরত নেওয়ার দোয়া) পড়লেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে মিনাতে দু’ রাকা‘আত সালাত আদায় করেছি। আবূ বাকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গেও মিনাতে দু’ রাকা‘আত সালাত আদায় করেছি এবং উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গেও মিনাতে দু’ রাকা‘আত সালাত আদায় করেছি। চার রাকা‘আতের স্থলে আল্লাহ যদি আমার দু’ রাকা‘আত কবুল করেন, তবে সেটাই আমার পাওনা হিসেবে যথেষ্ট হবে।
4958 - عن عائشة قالت: الصَّلاةُ أَوَّلُ مَا فُرِضَتْ رَكْعَتَيْنِ فَأْقِرَّتْ صَلاةُ السَّفَرِ وَأُتِمَّتْ صَلاةُ الْحَضَرِ.
قَالَ الزُّهْرِيُّ فَقُلْتُ لِعُرْوَةَ: مَا بَالُ عَائِشَةَ تُتِمُّ؟ قَال: تَأَوَّلَتْ مَا تَأَوَّلَ عُثْمَانُ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في تقصير الصلاة (1090)، ومسلم في صلاة المسافرين (685: 3) كلاهما من حديث سفيان، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
ومعنى تأويلهما كما قال جمهور أهل العلم أنهما رأيا القصْر جائزًا لا واجبًا، وقيل غير ذلك. انظر"خلاصة النووي" (2/ 725).
وأما ما رُوي عن عثمان رضي الله عنه مرفوعًا:"من تأهّل في بلد فليصل صلاة المقيم" فهو حديث ضعيف. انظر تخريجه في كتاب الصلاة - جموع أبواب صلاة المسافر.
وأضيف هنا ما قاله الحافظ في"الفتح" (2/ 570):"هذا الحديث لا يصح لأنه منقطع، وفي رواته من لا يحتج به، ويردّه قول عروة: إنّ عائشة تأوّلتْ ما تأوّل عثمان، ولا جائز أن تتأهل عائشة أصلًا، فدلّ على وهن الخبر".
وقال:"ثم ظهر لي أنه يمكن أن يكون مراد عروة بقوله:"كما تأوّل عثمان" التشبيه بعثمان في الإتمام بتأويل لا اتحاد تأويلهما، ويقويه أن الأسباب اختلفت في تأويل عثمان فتكاثرت بخلاف تأويل عائشة.
وقيل: إن عثمان إنما أتمّ الصلاة لأنه نوى الإقامة بعد الحجّ إلا أنه مرسل. رواه عبد الرزاق عن الزهريّ أن عثمان فذكره.
وقيل: إنّ عثمان بن عفّان أتمّ الصلاة بمني من أجل الأعراب؛ لأنهم كثروا عامئذ، فصلي بالناس أربعًا ليعلمهم أنّ الصلاة أربع.
رواه أبو داود (1964) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا حماد، عن أيوب، عن الزهري، أنّ عثمان بن عفان، فذكره. وهذا أيضًا مرسل.
ولكن يقويه ما رواه البيهقيّ (3/ 144) من طريق عبد الرحمن بن حميد بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن عثمان أنه أتمّ بمني ثم خطب فقال:"إنّ القصر سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم وصاحبيه، ولكنه حدث طَغَام (بفتح الطاء والمعجمة، كما في الفتح) - فخفت أن يستنوا".
وعن ابن جريج أنّ أعرابيًّا ناداه في منى: يا أمير المؤمنين، ما زلتُ أصليها منذ رأيتك عام أوّل ركعتين".
قال ابن حجر:"هذه طرق يقوي بعضها بعضًا".
وقال البيهقي عقب حديث عبد الرحمن بن حميد:"وقد قيل غير هذا، والأشبه أن يكون رآه رخصة، فرأى الإتمام جائزًا كما رأته عائشة، وقد رُوي ذلك عن غير واحد من الصحابة مع اختيارهم القصر".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালাত (নামাজ) যখন প্রথম ফরয করা হয়েছিল, তখন তা দু'রাকাত করে ফরয করা হয়েছিল। অতঃপর সফরের সালাত (দু'রাকাত) বহাল রাখা হলো এবং মুকিম অবস্থার সালাত পূর্ণ (চার রাকাত) করা হলো।
যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি উরওয়া (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কী হলো যে তিনি পূর্ণ সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি সেই একই ব্যাখ্যা গ্রহণ করেছিলেন যা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গ্রহণ করেছিলেন।
[হাদীসটি] মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী ‘তাকসীরুস সালাত’ অধ্যায়ে (হাঃ ১০৯০) এবং মুসলিম ‘সালাতুল মুসাফিরীন’ অধ্যায়ে (হাঃ ৬৮৫/৩) এটি বর্ণনা করেছেন। উভয়ই সুফিয়ান থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি উরওয়া থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর তাঁদের (আয়েশা ও উসমান) ব্যাখ্যার অর্থ অধিকাংশ উলামায়ে কিরামের মতে এই যে, তাঁরা সালাত কসর করাকে বৈধ মনে করতেন, তবে ওয়াজিব মনে করতেন না। অন্য মতও রয়েছে। দেখুন: 'খুলাসাতুন নাববী' (২/৭২৫)।
পক্ষান্তরে, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: "যে ব্যক্তি কোনো শহরে বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ হবে (সেখানে অবস্থান করবে), সে যেন মুকিমের সালাত আদায় করে", তা দুর্বল হাদীস। সালাত অধ্যায়ে - সালাতুল মুসাফির সম্পর্কিত সকল পরিচ্ছেদে এর তাখরীজ দেখুন। এখানে আমি হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-ফাতহ’ (২/৫৭০) গ্রন্থে করা মন্তব্য যোগ করছি: “এই হাদীসটি সহীহ নয়, কারণ এটি মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন)। এর রাবীদের মধ্যে এমন ব্যক্তিও আছে যার দ্বারা দলীল গ্রহণ করা যায় না। আর উরওয়ার এই উক্তিটিও এর বিপক্ষে যায় যে, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই ব্যাখ্যা গ্রহণ করেছিলেন যা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গ্রহণ করেছিলেন। কিন্তু আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষে কখনোই বিবাহ বন্ধনে আবদ্ধ হওয়া সম্ভব নয় (কারণ তিনি মক্কা/মিনায় মুকীম হননি)। সুতরাং তা (উসমানের মারফূ’ হাদীসটি) দুর্বল হওয়ার প্রমাণ বহন করে।” তিনি (হাফিয) আরও বলেন: "এরপর আমার কাছে স্পষ্ট হয় যে, উরওয়ার ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতো ব্যাখ্যা গ্রহণ করেছিলেন’ বলার উদ্দেশ্য হতে পারে এই যে, উভয়ের ব্যাখ্যা এক না হলেও, তাঁরা একই পদ্ধতিতে ইতমাম (পূর্ণ সালাত আদায়) করার ক্ষেত্রে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সাদৃশ্যপূর্ণ ছিলেন। এই মতকে শক্তিশালী করে এই বিষয়টি যে, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাখ্যার কারণের তুলনায় উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাখ্যার কারণগুলো বিভিন্ন ও অনেক ছিল।"
আর বলা হয়েছে: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শুধু এই কারণে পূর্ণ সালাত আদায় করেছিলেন যে, তিনি হজ্জের পর সেখানে (মক্কায়) থাকার নিয়ত করেছিলেন। কিন্তু এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন)। আব্দুর রাযযাক যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনাটি বর্ণনা করেছেন। আর এও বলা হয়েছে: উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনায় পূর্ণ সালাত আদায় করেছিলেন বেদুঈনদের কারণে; কারণ সে বছর তাদের সংখ্যা অনেক বেড়ে গিয়েছিল। তাই তিনি লোকদের নিয়ে চার রাকাত সালাত আদায় করেন যাতে তারা জানতে পারে যে সালাত চার রাকাত। এটি আবূ দাঊদ (১৯৬৪) মূসা ইবনু ইসমাঈল থেকে, তিনি হাম্মাদ থেকে, তিনি আইয়ূব থেকে, তিনি যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনাটি বর্ণনা করেছেন। এটিও মুরসাল।
কিন্তু এটিকে বায়হাকী (৩/১৪৪) কর্তৃক বর্ণিত একটি বর্ণনা শক্তিশালী করে, যা আব্দুর রহমান ইবনু হুমাইদ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আউফ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি মিনায় ইতমাম (পূর্ণ সালাত) করেন, এরপর খুতবা দেন এবং বলেন: “নিশ্চয়ই কসর করা হলো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর দুই সঙ্গীর (আবূ বকর ও উমার) সুন্নাত। কিন্তু (বর্তমানে) তাগাম (নিকৃষ্ট ও মূর্খ) শ্রেণির উদ্ভব হয়েছে— তাই আমি ভয় করলাম যে তারা (কসরের বিধানকেই স্থায়ীভাবে) সুন্নাত মনে করে নেবে।” (যেমনটি আল-ফাতহ গ্রন্থে বলা হয়েছে)। ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণিত: মিনায় এক বেদুঈন তাঁকে (উসমানকে) ডেকে বলেছিল: হে আমীরুল মুমিনীন! গত বছর আমি আপনাকে দেখার পর থেকে তা (নামাজ) এখনও দু’রাকাতই আদায় করে যাচ্ছি।
ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "এই সূত্রগুলো একে অপরকে শক্তিশালী করে।" বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ) আব্দুর রহমান ইবনু হুমাইদ-এর হাদীসের পরে মন্তব্য করেন: "অন্য কিছুও বলা হয়েছে। তবে সবচেয়ে সাদৃশ্যপূর্ণ মত হলো এই যে, তিনি কসর করাকে রুখসাত (ছাড়/সুবিধা) হিসেবে দেখেছিলেন এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতো তিনিও ইতমামকে (পূর্ণ সালাতকে) বৈধ মনে করেছিলেন। কসর করা পছন্দ করা সত্ত্বেও সাহাবীগণের একাধিক ব্যক্তি থেকে এই মতটি বর্ণিত হয়েছে।"
4959 - عن عبّاد بن عبد الله بن الزبير، قال: لما قدم علينا معاوية حاجًّا قدمنا معه مكّة، قال: فصلّي بنا الظّهر ركعتين، ثم انصرف إلى دار النّدوة، قال: وكان عثمان حين أتمّ الصّلاة إذا قدم مكة صلّى بها الظّهر والعصر والعشاء الآخرة أربعًا أربعًا فإذا خرج إلى منى وعرفات قصر الصّلاة فإذا فرغ من الحج وأقام بمنى أتم الصّلاة حتى يخرج من مكة، فلما صلّى بنا الظهر ركعتين نهض إليه مروان بن الحكم وعمرو بن عثمان فقالا له: ما عابَ أحدٌ ابنَ عمِّك بأقبحَ ما عبْتَه به! فقال لهما: وما ذاك؟ قال: فقالا له: ألم تعلمْ أنّه أتّم الصّلاة بمكة؟ قال: فقال لهما: ويحكما! وهل كان غير ما صنعتُ قد صليتُهما مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ومع أبي بكر وعمر رضي الله عنهما. قالا: فإنّ ابنَ عمِّك قد كان أتَمّها وإنّ خلافك إيّاه له عيب! قال: فخرج معاوية إلى العصر فصلاها بنا أربعًا.
حسن: رواه الإمام أحمد (16857)، والطبراني في الكبير (19/ 333) كلاهما من حديث يعقوب بن إبراهيم، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدّثنا يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه عباد، فذكره. واللفظ لأحمد ولفظ الطبرانيّ مختصر.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلّس، ولكنّه صرَّح وحسّنه أيضًا الحافظ في"الفتح". وذكره الهيثميّ في"المجمع" (2/ 156 - 157) وقال: رواه أحمد، وروى الطبرانيّ بعضه في الكبير، ورجال أحمد موَّثقون.
ويفهم من هذا الحديث أنّ عثمان رضي الله عنه كان يرى القصر مختصًا بمن كان شاخصًا سائرًا، وأمّا من أقام في مكان في أثناء سفره فله حكم المقيم فيُتم. انظر:"الفتح" (2/ 571).
আব্বাদ ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আমাদের কাছে হজ্জ করতে এলেন, তখন আমরাও তাঁর সাথে মক্কায় গেলাম। তিনি বলেন: তিনি আমাদের নিয়ে যুহরের সালাত দুই রাকাত আদায় করলেন, অতঃপর দারুন-নাদওয়ার দিকে চলে গেলেন।
তিনি (আব্বাদ) বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন সালাত পূর্ণরূপে (চার রাকাত) আদায় করতেন, তখন তিনি মক্কায় যুহর, আসর ও এশার সালাত চার রাকাত করেই পড়তেন। কিন্তু যখন তিনি মিনা ও আরাফাতের দিকে বের হতেন, তখন কসর করতেন। আর যখন তিনি হজ্জ শেষ করে মিনায় অবস্থান করতেন, তখন মক্কা থেকে বের না হওয়া পর্যন্ত পূর্ণ সালাত আদায় করতেন।
যখন তিনি (মুআবিয়া) আমাদের নিয়ে যুহরের সালাত দুই রাকাত আদায় করলেন, তখন মারওয়ান ইবনুল হাকাম এবং আমর ইবনে উসমান তাঁর কাছে উঠে দাঁড়ালেন এবং তাঁকে বললেন: আপনার চাচার ছেলেকে (উসমানকে) কেউ এত খারাপভাবে ত্রুটিযুক্ত করেনি, যতটা আপনি করলেন! মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদেরকে বললেন: সেটা কী? তাঁরা বললেন: আপনি কি জানেন না যে তিনি (উসমান) মক্কায় পূর্ণ সালাত (চার রাকাত) আদায় করতেন?
তিনি (মুআবিয়া) তাঁদেরকে বললেন: তোমাদের দুর্ভোগ! আমি যা করেছি, তার বাইরে কি আর কিছু হতে পারত? আমি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও এই (দুই রাকাত) সালাতই আদায় করেছি।
তাঁরা বললেন: কিন্তু আপনার চাচার ছেলে তো তা পূর্ণ (চার রাকাত) আদায় করেছেন, আর আপনি তাঁর বিরোধিতা করলেন—এটা দোষণীয়! আব্বাদ বলেন: এরপর মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসরের জন্য বের হলেন এবং আমাদের নিয়ে তা চার রাকাত আদায় করলেন।
4960 - عن أنس بن مالك، أنه قال: صليتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى، ومع أبي بكر وعمر ركعتين، ومع عثمان ركعتين صدرًا من إمارته.
حسن: رواه النسائيّ (1447) عن قتيبة، حدّثنا الليث، عن بكير بن عبد الله، عن محمد بن عبد الله بن أبي سليم، عن أنس، فذكره.
وإسناده صحيح من أجل محمد بن عبد الله بن أبي سليم، وهو"صدوق" كما في التقريب، ووثقه النسائيّ، وروى له، وذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 362) فلا معنى لقول الذهبي في"الميزان":"لا يعرف".
وأخرجه أيضًا الإمام أحمد (12464) من حديث الليث وهو ابن سعد بإسناده مثله.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় সালাত আদায় করেছি, এবং আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও দুই রাকাত সালাত আদায় করেছি, আর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম দিকে তাঁর সাথেও দুই রাকাত সালাত আদায় করেছি।
4961 - عن أبي جحيفة، قال: صليتُ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم بمنى الظّهر ركعتين، ثم لم نزل نصلي ركعتين حتى رجع إلى المدينة.
صحيح: رواه أبو بكر بن أبي شيبة (2/ 448)، والطبرانيّ في الكبير (22/ 102) كلاهما من حديث وكيع، ثنا سفيان، وابن أبي ليلى، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح.
আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় যুহরের সালাত দুই রাকাত আদায় করলাম। এরপর তিনি মদীনায় ফিরে আসা পর্যন্ত আমরা সর্বদা দুই রাকাতই সালাত আদায় করে গেছি।
4962 - عن عمران بن حصين عن صلاة المسافر فقال: حججت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلّى ركعتين، وحججت مع أبي بكر فصلّى ركعتين، ومع عمر فصلى ركعتين، ومع عثمان ست سنين من خلافته أو ثماني سنين فصلى ركعتين - ثم إنّ عثمان صلّى بعد ذلك أربعًا.
حسن: رواه الترمذيّ (545) -واللفظ له-، وأبو داود (1229) مختصرًا، والإمام أحمد (19865)، وأبو بكر بن أبي شيبة (2/ 450) في سياق أطول من هذا - كلّهم من طريق علي بن جدعان، عن أبي نضرة، أنّ فتي سأل عمران بن حصين، عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال (فذكره).
وزاد الإمام أحمد:"ثم إن عثمان صلّى بعد ذلك أربعًا".
وعلي بن جدعان هو: علي بن زيد بن عبد الله بن زهير بن عبد الله بن جدعان التيميّ البصريّ ضعيف إلّا ما رُوي عن الترمذي فإنه قال:"صدوق"، ولذا حسّن هذا الحديث.
قلت: وهو كذلك في هذا الحديث لوجود شواهده بأن عثمان كان يُتمّ في منى بعد ذلك.
وفي الباب ما رُوي عن أبي ذر، رواه القاسم بن عوف الشيباني عن رجل، قال:"كنا قد حملنا لأبي ذر شيئًا نريد أن نعطيه إياه، فأتينا الرَّبذة فسألنا عنه فلم نجده، قيل استأذن في الحجّ فأذن له فأتيناه بالبلدة وهي مني، فبينا نحن عنده إذ قيل له: إن عثمان صلّي أربعًا فاشتدّ ذلك على أبي ذر وقال قولا شديدًا، وقال:"صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلى ركعتين، وصليت مع أبي بكر وعمر" ثم قام أبو ذر فصلّي أربعًا فقيل له: عبْتَ على أمير المؤمنين شيئًا ثم صنعت! قال: الخلافُ أشدّ، إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خطبنا فقال:"إنّه كائن بعدي سلطان فلا تُذلوه، فمنْ أراد أن يذلَّه فقد خلع رِبْقَةَ الإسلام من عنقه، وليس بِمقبولٍ منه توبةٌ حتى يسُدَّ ثلمته التي ثَلَم وليس بفاعل، ثم يعود فيكون فيمن يُعزّه"."أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا يغلبونا على ثلاثٍ: أنْ نأمر بالمعروف، ونهى عن المنكر، ونعلم الناس السنن".
رواه الإمام أحمد (21460) عن يزيد ومحمد بن يزيد قالا: حدّثنا العوّام. قال محمد: عن القاسم، وقال يزيد في حديثه: حدثني القاسم بن عوف الشيباني، عن رجل، قال: فذكره. وفيه رجل مبهم لا يُعرف.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মুসাফিরের সালাত (নামাজ) সম্পর্কে বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ করেছি, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। আমি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে হজ করেছি, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও হজ করেছি, তখন তিনিও দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের ছয় বছর বা আট বছর পর্যন্ত আমি তাঁর সাথেও হজ করেছি, তখন তিনিও দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চার রাকাত সালাত আদায় করেন।
এই বিষয়ে আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও একটি বর্ণনা রয়েছে (যাতে বলা হয়েছে): আমরা আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেওয়ার জন্য কিছু জিনিসপত্র বহন করেছিলাম। আমরা রাবাযায় গেলাম এবং তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, কিন্তু তাঁকে পেলাম না। বলা হলো, তিনি হজের অনুমতি চেয়েছেন এবং তাঁকে অনুমতি দেওয়া হয়েছে। আমরা তাঁকে মিনায় পেলাম। আমরা যখন তাঁর কাছে ছিলাম, তখন তাঁকে জানানো হলো: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চার রাকাত সালাত আদায় করেছেন। এতে আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অত্যন্ত মর্মাহত হলেন এবং কঠোর ভাষায় কিছু বললেন। তিনি বললেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করেছি, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। আমি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও সালাত আদায় করেছি (তখনও দুই রাকাত ছিল)।"
এরপর আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং চার রাকাত সালাত আদায় করলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: আপনি আমীরুল মুমিনীন-এর কৃতকর্মের সমালোচনা করলেন, অথচ আপনি নিজেই তাই করলেন! তিনি বললেন: মতবিরোধ তার চেয়েও কঠিন। নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিয়েছিলেন এবং বলেছিলেন: "আমার পরে নেতৃত্ব আসবে, তোমরা তাদেরকে অপমানিত করো না। যে ব্যক্তি তাদেরকে অপমানিত করতে চাইবে, সে তার গলা থেকে ইসলামের রশি খুলে ফেলল। এবং তার তওবা ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল হবে না যতক্ষণ না সে তার সৃষ্ট ফাটল মেরামত করে, আর সে তা করবেও না। তারপর সে ফিরে আসবে এবং সে তাদের অন্তর্ভুক্ত হবে যারা সেই শাসককে সম্মান করে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে তিনটি বিষয়ে পরাজিত না হওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন: আমরা যেন সৎকাজের আদেশ দেই, মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করি এবং মানুষকে সুন্নাত শিক্ষা দেই।
4963 - عن جابر بن عبد الله قال: فلما كان يوم التروية توجهوا إلى منى فأهلوا بالحج وركب رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلّي به الظّهر والعصر والمغرب والعشاء والفجر، ثم مكث
قليلا حتى طلعت الشمس وأمر بقبة من شعر تضرب له بنمرة، فسار رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا تشكّ قريش إلا أنه واقف عند المشعر الحرام -كما كانت قريش تصنع في الجاهليّة-، فأجاز رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أتي عرفة فوجد القبّة قد ضُربت له بنمرة فنزل بها.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر بطوله في حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم.
قوله:"نمرة" هي موضع بجنب عرفات وليس من عرفات.
أما قوله:"حتى أتى عرفة، فوجد القبة قد ضربت له بنمرة" ففيه تجوّز، والمراد قارب عرفات. انظر شرح مسلم للنوويّ (8/ 180).
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তারবিয়াহর দিন (৮ যুলহিজ্জা) এলো, তারা মিনার দিকে রওনা হলেন এবং হজের ইহরাম বাঁধলেন। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হলেন এবং সেখানে (মিনায়) তিনি যোহর, আসর, মাগরিব, ইশা ও ফজর সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি সূর্যোদয় হওয়া পর্যন্ত সেখানে কিছুক্ষণ অবস্থান করলেন। এবং তিনি নামিরাহতে তাঁর জন্য পশমের একটি তাঁবু স্থাপনের নির্দেশ দিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলতে শুরু করলেন। কুরাইশরা সন্দেহ করছিল না যে, তিনি অবশ্যই মাশ‘আরুল হারামের কাছে অবস্থান করবেন—যেমন জাহেলিয়াতের যুগে কুরাইশরা করতো—কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মাশ‘আরুল হারাম) পার হয়ে চলে গেলেন, অবশেষে তিনি আরাফাতে পৌঁছলেন এবং দেখতে পেলেন তাঁর জন্য নামিরাহতে তাঁবু স্থাপন করা হয়েছে। অতঃপর তিনি সেখানে অবতরণ করলেন।
4964 - عن ابن عمر، قال: غدا رسول الله صلى الله عليه وسلم من مني حين صلي الصبح صبيحة يوم عرفة حتى أتي عرفة، فنزل بنمرة وهي منزل الإمام الذي ينزل فيه بعرفة، حتى إذا كان عند صلاة الظهر راح رسول الله صلى الله عليه وسلم مهجِّرًا، فجمع بين الظهر والعصر ثم خطب الناس ثم راح فوقف على الموقف من عرفة.
حسن: رواه أبو داود (1913) عن أحمد وهو في مسنده (6130) عن يعقوب بن إبراهيم، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو حسن الحديث إذا صرَّح بالتحديث كما في هذا الحديث.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফার দিনের সকালে ফজরের সালাত আদায় করার পর মিনা থেকে রওনা হলেন, যতক্ষণ না তিনি আরাফায় পৌঁছলেন। অতঃপর তিনি নামিরাহ-তে অবতরণ করলেন। এটি হলো সেই স্থান যেখানে আরাফায় ইমাম অবস্থান করেন। যখন যোহরের সালাতের সময় হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুপুর বেলায় (তাজির করে) যাত্রা শুরু করলেন, এবং যোহর ও আসরের সালাত একত্রে আদায় করলেন। এরপর তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। অতঃপর তিনি যাত্রা করে আরাফার (নির্ধারিত) স্থানে গিয়ে অবস্থান নিলেন।
4965 - عن محمد بن أبي بكر الثقفيّ: أنه سأل أنس بن مالك -وهما غاديان من مني إلى عرفة-: كيف كنتم تصنعون في هذا اليوم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: كان يهلُّ المهلُّ منا فلا يُنكر عليه، ويُكبِّر المكبِّرُ فلا يُنكر عليه.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (43) عن محمد بن أبي بكر الثقفيّ، بالإسناد.
ورواه البخاريّ في الحج (1659)، ومسلم في الحج (1285) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم من طريق موسى بن عقبة، حدّثني محمد بن أبي بكر قال: قلت لأنس بن مالك غداة عرفة: ما تقول في التلبية هذا اليوم؟ قال (فذكره بنحوه).
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনে আবি বকর আস-সাকাফী তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলেন—যখন তারা মিনা থেকে আরাফার দিকে যাচ্ছিলেন—: "এই দিনে আপনারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কেমন করতেন?" তিনি বললেন: "আমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি তালবিয়া পাঠ করত, তার প্রতি আপত্তি করা হতো না; এবং যে ব্যক্তি তাকবীর পাঠ করত, তার প্রতিও আপত্তি করা হতো না।"
4966 - عن عبد الله بن عمر، قال: غدونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من مِني إلى عرفات، مِنَّا الملبِّي، ومِنَّا المكبِّر.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1284) من طريق يحيي بن سعيد (هر الأنصاريّ)، عن عبد الله ابن أبي سلمة (هو الماجشون)، عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، به.
ورواه مسلم أيضًا من طريق عمر بن حسين، عن عبد الله بن أبي سلمة، عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، قال:"كنّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غداة عرفة، فمنّا المكبِّر، ومنّا المهلّل، فأمّا نحن فنكبِّر". قال: قلت: واللهِ! لعجبًا منكم! ، كيف لم تقولوا له: ماذا رأيتَ رسول الله يصنع؟ ! .
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে মিনা থেকে আরাফাতের দিকে রওনা হলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তালবিয়াহ পাঠ করছিল, আর কেউ তাকবীর বলছিল।
(অন্য এক বর্ণনায় আছে) তিনি বলেন: আমরা আরাফার সকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তাকবীর বলছিল, আর কেউ তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) বলছিল। কিন্তু আমরা তখন তাকবীর বলছিলাম। [রাবী] বলেন: আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের দেখে অবাক হচ্ছি! তোমরা কেন তাকে জিজ্ঞেস করলে না যে তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী করতে দেখেছো?!
4967 - عن سالم بن عبد الله أنه قال: كتب عبد الملك بن مروان إلى الحجاج بن يوسف: أنْ لا تخالف عبد الله بن عمر في شيء من أمر الحجِّ. قال: فلمّا كان يوم عرفة، جاءه عبد الله بن عمر حين زالت الشّمس وأنا معه، فصاح به عند سُرادقِه: أيْنَ هذا؟ فخرج عليه الحجّاج وعليه مِلْحفةٌ مُعَصْفرة، فقال: ما لك يا أبا عبد الرحمن؟ فقال: الرَّواح إنْ كنتَ تُريد السُّنة. فقال: أهذه السّاعة؟ قال: نعم. قال: فأنظرني حتّى أفيض عليَّ ماءً، ثم أخْرُجَ، فنزل عبد الله، حتى خرج الحجّاج فسار بيني وبين أبي، فقلت له: إن كنتَ تريدُ أن تُصيب السُّنة اليوم فاقْصُر الخطبة وعجِّلْ الصَّلاةَ. قال: فجعل ينظر إلى عبد الله بن عمر كيما يسمع ذلك منه، فلمّا رأى ذلك عبد الله قال: صدق سالم.
صحيح: رواه مالك في الحج (194) عن ابن شهاب، عن سالم، به.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1660) من طريق مالك، به، مثله.
ورواه أيضًا (1662) معلقًا عن الليث، حدّثني عقيل، عن ابن شهاب، قال: أخبرني سالمٌ:"أنّ الحجّاج بن يوسف -عام نزل بابن الزبير رضي الله عنهما سأل عبد الله رضي الله عنه: كيف تصنعُ في الموقف يوم عرفة؟ فقال سالم: إن كنتَ تريد السّنة فهجِّر بالصّلاة يوم عرفة. فقال عبد الله بن عمر: صدق إنّهم كانوا يجمعون بين الظهر والعصر في السُّنة. فقلت لسالم: أفعل ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: وهل يتبعون بذلك إلّا سنته؟ !". قال الحافظ في الفتح (3/ 514):"وصله الإسماعيليّ من طريق يحيى بن بكير وأبي صالح جميعًا عن الليث".
وأمّا ما رواه سعيد بن حسان، عن ابن عمر، قال: لما قتل الحجاجّ ابنَ الزّبير أرسل إلى ابن عمر:"أية ساعة كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يروح في هذا اليوم؟ قال: إذا كان ذلك رُحنا، فلما أراد ابن عمر أن يروح قالوا: لم تزغ. قال: أزاغت الشمس؟ قالوا: لم تزغ الشمس. قال: فلما قالوا: زاغت الشمس ارتحل" ففيه سعيد بن حسان لم يوثقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات، ولم يرو عنه إلا اثنان، فهو"مقبول" عند الحافظ ابن حجر.
ومن طريقه رواه أبو داود (1914) عن الإمام أحمد -وهو في مسنده (4782) -، ورواه أيضا ابن ماجه (3009) عن وكيع، حدّثنا نافع بن عمر الجمحيّ، عن سعيد بن حسان، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পুত্র সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল মালিক ইবনু মারওয়ান হাজ্জাজ ইবনু ইউসুফের কাছে লিখলেন যে, হজ্জের কোনো বিষয়েই যেন সে আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরোধিতা না করে।
তিনি (সালিম) বলেন: এরপর যখন আরাফার দিন এলো, সূর্য ঢলে যাওয়ার পর আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর (হাজ্জাজের) কাছে এলেন, আর আমিও তাঁর সাথে ছিলাম। তিনি হাজ্জাজের তাঁবুর কাছে গিয়ে চিৎকার করে ডাকলেন: "কোথায় সে?" হাজ্জাজ একটি জাফরান রঙ করা চাদর পরিহিত অবস্থায় তার সামনে বের হয়ে আসলো এবং বললো: হে আবূ আব্দুর রহমান! আপনার কী চাই? তিনি (ইবনু উমর) বললেন: আপনি যদি সুন্নাহর অনুসরণ করতে চান, তবে (আরাফার দিকে) রওনা হোন। হাজ্জাজ বললো: এখনই? তিনি বললেন: হ্যাঁ। হাজ্জাজ বললো: আমাকে একটু অবকাশ দিন, আমি শরীরে কিছু পানি ঢেলে তারপর বের হচ্ছি। তখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (সওয়ারী থেকে) অবতরণ করলেন, যতক্ষণ না হাজ্জাজ বেরিয়ে এলো এবং আমার ও আমার বাবার মাঝখান দিয়ে হাঁটতে শুরু করলো। আমি (সালিম) তাকে (হাজ্জাজকে) বললাম: আপনি যদি আজ সুন্নাহর উপর আমল করতে চান, তবে খুৎবা সংক্ষিপ্ত করুন এবং সালাত তাড়াতাড়ি আদায় করুন। তিনি (হাজ্জাজ) তখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে এমনভাবে তাকাতে লাগলেন যেন তিনি তাঁর মুখ থেকে ঐ কথাটি শোনেন। যখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ দৃশ্য দেখলেন, তিনি বললেন: সালিম সত্য বলেছে।
