হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4968)


4968 - عن جابر قال: فخطب الناس وقال (فذكر خطبته صلى الله عليه وسلم" … ثم أذّن، ثم أقام فصلّى الظهر، ثم أقام فصلّى العصر، ولم يصلِّ بينهما شيئًا … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث بطوله في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.

ورواه أبو داود (1905) من هذا الوجه مسندًا، كما رواه أيضًا (1906) من وجه آخر عن عبد الله بن مسلمة، حدّثنا سليمان - يعني ابن بلال ح. وعن أحمد بن حنبل، حدّثنا عبد الوهاب الثقفيّ -المعنى واحد-، عن جعفر بن محمد، عن أبيه:"أن النبيّ صلى الله عليه وسلم صلّى الظهر والعصر بأذان واحد بعرفة، ولم يسبِّح بينهما وإقامتين، وصلى المغرب والعشاء بجمع بأذان واحد وإقامتين ولم يسبّح بينهما" مرسلًا؛ فإنّ والد جعفر هو محمد بن علي بن حسين بن علي بن أبي طالب أبو جعفر الباقر لم يدرك النبيّ صلى الله عليه وسلم إلّا أن هذا المرسل لا يُعلُّ الموصولَ، وفي كلام أبي داود إشارة إلى ذلك فإنه قال عقب حديث محمد بن علي بن حسين:"هذا الحديث أسنده حاتم بن إسماعيل في الحديث الطويل (وهو حديث جابر في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم"، ووافق حاتم بنَ إسماعيل على إسناده (أي الموصول) محمد بنُ علي الجعفيّ، عن جعفر (أي ابن محمد)، عن أبيه، عن جابر إلّا أنه قال:"فصلي المغرب والعتمة بأذان وإقامة".

فرجَّح رواية حاتم بن إسماعيل بمتابعة محمد بن علي الجعفيّ كلاهما عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر على رواية سليمان بن بلال، وعبد الوهاب الثقفيّ، كلاهما عن جعفر بن محمد، عن أبيه محمد المرسلة. وهو الحقّ إلّا أن في رواية محمد بن علي الجعفيّ بأذان وإقامة.

ومحمد بن علي الجعفيّ ترجمه البخاري في التاريخ الكبير (1/ 184)، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (8/ 27) ولم يقولا فيه شيئًا، فهو من عداد المجهولين.

وقوله:"بأذان وإقامة" شاذّ؛ لأنّ المحفوظ:"بأذان وإقامتين" كما في رواية حاتم بن إسماعيل الموصولة، وفي رواية محمد بن علي بن حسين الباقر المرسلة.

ثم وجدت أن سليمان بن بلال روي عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر أيضًا مسندًا.

رواه الإمام أحمد (15243) عن موسى بن داود عنه، فذكر جزءًا من الحديث. وأمّا جمع الصّلاتين في المزدلفة فسيأتي بعد عدّة أبواب.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন... অতঃপর আযান দেওয়া হলো, তারপর ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি যুহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর আবার ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন। এ দুই সালাতের মাঝে তিনি আর কিছুই আদায় করেননি... (সম্পূর্ণ হাদীসটি)।









আল-জামি` আল-কামিল (4969)


4969 - عن عائشة، قالت: كانت قريش ومن دان دينها يقفون بالمزدلفة وكانوا يسمّون الْحُمْس، وكان سائر العرب يقفون بعرفات فلمّا جاء الإسلام أمر الله نبيه صلى الله عليه وسلم أن يأتي عرفات ثم يقف بها، ثم يفيض منها فذلك قوله تعالي: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} [البقرة: 199].

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4520)، ومسلم في الحج (1219) كلاهما من طريق أبي معاوية محمد بن خازم، حدثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

وفي رواية ابن ماجه (3018):"نحن قواطن البيت، لا نجاوز الحرم. فأنزل الله عز وجل". وفي لفظ الترمذي:"نحن قطين الله".

قال الترمذيّ: ومعنى هذا الحديث أنّ أهل مكة كانوا لا يخرجون من الحرم، وعرفة خارج من الحرم. وأهل مكة كانوا يقفون بالمزدلفة ويقولون: نحن قطين الله، يعني سكان الله، ومَنْ سوي أهل مكة كانوا يقفون بعرفات، فأنزل الله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ}".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশ এবং যারা তাদের ধর্ম অনুসরণ করত, তারা মুযদালিফায় অবস্থান করত এবং তাদেরকে ‘আল-হুমস’ বলা হতো। আর আরবের অন্যান্যরা আরাফাতে অবস্থান করত। এরপর যখন ইসলাম আসলো, আল্লাহ তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নির্দেশ দিলেন যে, তিনি যেন আরাফাতে যান, সেখানে অবস্থান করেন, এরপর সেখান থেকে প্রত্যাবর্তন করেন (ইফা'দা করেন)। আর এটাই হলো মহান আল্লাহর বাণী: "অতঃপর তোমরাও প্রত্যাবর্তন করো, যেখান থেকে লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে।" (সূরা আল-বাকারা: ১৯৯)।

ইবনু মাজাহর এক বর্ণনায় (৩০১৮) আছে, (কুরাইশরা বলত): "আমরা কা’বার স্থায়ী বাসিন্দা, আমরা হারাম এলাকার সীমা অতিক্রম করি না।" অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল (এ আয়াত) নাযিল করলেন। তিরমিযীর এক শব্দে আছে: "(তারা বলত) আমরা আল্লাহর প্রতিবেশী/আশ্রিত।"

ইমাম তিরমিযী বলেন: এই হাদীসের মর্মার্থ হলো, মক্কার লোকেরা হারাম এলাকার বাইরে যেত না, অথচ আরাফাত হারাম এলাকার বাইরে অবস্থিত। মক্কাবাসীরা মুযদালিফায় অবস্থান করত এবং বলত: আমরা আল্লাহর প্রতিবেশী—অর্থাৎ আল্লাহর বাসিন্দা। আর মক্কাবাসী ব্যতীত অন্য যারা ছিল, তারা আরাফাতে অবস্থান করত। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করেন: "অতঃপর তোমরাও প্রত্যাবর্তন করো, যেখান থেকে লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে।" (আল-বাকারা: ১৯৯)।









আল-জামি` আল-কামিল (4970)


4970 - عن عروة قال: كانت العرب تطوف بالبيت عراةً إلّا الْحُمْس -والحمس: قريش وما ولدت- كانوا يطوفون عراة إلا أن تعطيهم الحمس ثيابا فيعطي الرجالُ الرّجالَ والنّساءُ النساءَ، وكانت الحمس لا يخرجون من المزدلفة وكان الناس كلهم يبلغون عرفات.

قال هشام: فحدثني أبي عن عائشة رضي الله عنها قالت: الحمس هم الذين أنزل الله عز وجل فيهم: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ}. قالت: كان الناس يفيضون من عرفات وكان الحمس يفيضون من المزدلفة يقولون لا نفيض إلا من الحرم فلما نزلتْ: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} رجعوا إلى عرفات.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1665) من حديث علي بن مسهر، ومسلم في الحج (1219: 152) من حديث أسامة - كلاهما عن هشام، عن أبيه، فذكره، واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري قريب منه، وفيه:"فدفعوا إلى عرفات". أي أُمروا أن يتوجّهوا إلى عرفات ليقفوا بها ثم يفيضوا منها. وسوف يأتي تفسير الآية.

والْحُمْس: بضم المهملة، وسكون الميم بعدها مهملة.

وتفسيره كما روى إبراهيم الحربيّ في"غريب الحديث" من طريق ابن جريج، عن مجاهد،
قال:"الحمس قريش ومن كان يأخذ قريش مأخذها من القبائل كالأوس والخزرج وخزاعة وثقيف وغزوان وبني عامر وبني صعصعة وبني كنانة إلا بني بكر، والأحمس في كلام العرب: الشديد، سموا بذلك لما شدّدوا على أنفسهم، وكانوا إذا أهلوا بحج أو عمرة لا يأكلون لحمًا ولا يضربون وبرًا، ولا شعرًا. وإذا قدموا مكة وضعوا ثيابهم التي كانت عليهم".

وروى إبراهيم أيضًا من طريق عبد العزيز بن عمران المدني قال:"سموا حُمْسًا بالكعبة؛ لأنها حمساء حجرها أبيض يضرب إلى السواد، وقال أبو عبيدة معمر بن المثنى: تحمّس تشدّد، ومنه حمس الوغى إذا اشتدّ".




উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আরবরা খালি গায়ে বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করত, শুধু 'আল-হুমস' ছাড়া। আর আল-হুমস হলো কুরাইশ এবং তাদের বংশধররা। তারা (অন্য আরবরা) খালি গায়ে তাওয়াফ করত, তবে যদি আল-হুমস তাদেরকে কাপড় দিত। তখন পুরুষরা পুরুষদেরকে দিত এবং নারীরা নারীদেরকে দিত। আর আল-হুমস মুযদালিফা থেকে বের হতো না (সেখান থেকেই প্রত্যাবর্তন করত), অথচ অন্য সব মানুষ আরাফাত পর্যন্ত যেত।

হিশাম বলেন, আমার পিতা আমাকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: 'আল-হুমস' হলো তারা, যাদের সম্পর্কে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল এই আয়াত নাযিল করেছেন: {অতঃপর যে স্থান থেকে অন্য লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে, তোমরাও সে স্থান থেকে প্রত্যাবর্তন কর।} তিনি (আয়েশা) বলেন: লোকেরা আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করত, কিন্তু আল-হুমস মুযদালিফা থেকে প্রত্যাবর্তন করত। তারা বলত: আমরা হারাম (হারাম শরীফ) এলাকা ছাড়া অন্য কোথাও থেকে প্রত্যাবর্তন করব না। অতঃপর যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {অতঃপর যে স্থান থেকে অন্য লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে, তোমরাও সে স্থান থেকে প্রত্যাবর্তন কর।} তখন তারা (আল-হুমস) আরাফাতের দিকে ফিরে গেল (এবং অন্যদের সাথে আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করা শুরু করল)।









আল-জামি` আল-কামিল (4971)


4971 - عن جبير بن مطعم، قال: أضللتُ بعيرًا لي، فذهبتُ أطلبه يوم عرفة، فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم واقفًا مع الناس بعرفة. فقلتُ: واللهِ، إنّ هذا لمن الحمس، فما شأنه ههنا؟ وكانتْ قريش تُعدُّ من الحمس.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1664)، ومسلم في الحج (1220) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، حدثنا عمرو (هو ابن دينار)، حدثنا محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه، فذكره.

والتحقيق في هذا أن قصة جبير بن مطعم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقعت في الجاهلية. وأسلم جبير بن مطعم يوم الفتح وكان ذهابه إلى عرفة ليطلب بعيره الشارد لا ليقف بها.

ويؤكّد هذا ما رواه ابن خزيمة في صحيحه كما في الحديث الآتي.




জুবাইর ইবনে মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার একটি উট হারিয়ে ফেলেছিলাম, তাই আমি আরাফার দিনে সেটিকে খুঁজতে গেলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখলাম যে তিনি জনগণের সাথে আরাফাতে দাঁড়িয়ে আছেন। তখন আমি (নিজে নিজে) বললাম: আল্লাহর কসম, ইনি তো 'আল-হুমস'-এর অন্তর্ভুক্ত, এখানে তাঁর কী কাজ? (কারণ) কুরাইশদের 'আল-হুমস'-এর অন্তর্ভুক্ত গণ্য করা হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (4972)


4972 - عن جبير بن مطعم قال: كانت قريش إنما تدفع من المزدلفة ويقولون: نحن الحمس فلا نخرج من الحرم، وقد تركوا الموقف على عرفة. قال: فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجاهلية يقف مع الناس بعرفة على جمل له ثم يصبح مع قومه بالمزدلفة فيقف معهم يدفع إذا دفعوا.

حسن: رواه ابن خزيمة (2823) عن نصر بن علي، أخبرنا وهب بن جرير، ثنا أبي، عن محمد ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن عثمان بن أبي سليمان، عن عمه نافع بن جبير، عن أبيه جبير بن مطعم، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه يُحسّن حديثه إذا صرّح.

ورواه أيضًا (3057) من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بإسناده وقال فيه:"لقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن ينزل عليه، وإنه لواقف على بعير له بعرفات مع الناس يدفع معهم منها، ما ذاك إلا توفيقًا من الله".

وهذا إسناد حسن أيضًا، كما جاء التصريح بالتحديث عن ابن إسحاق في الرّواية السّابقة.

فقوله:"قبل أن ينزل عليه" أي قوله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} فالنبيّ صلى الله عليه وسلم -
كان يقف بعرفات قبل نزول الآية.

وفيه دليل لقوله:"ما ذاك إلا توفيقًا من الله" أي تقريرًا من الله سبحانه وتعالى لفعل النبي صلى الله عليه وسلم.

قال جبير بن مطعم:"فلما أسلمت علمتُ أن الله وفّقه لذلك".

هكذا رواه إسحاق بن راهويه عن الفضل بن موسى، عن عثمان بن الأسود، عن عطاء، أن جبير بن مطعم قال:"أضللت حمارًا لي في الجاهلية فوجدته بعرفة، فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم واقفًا بعرفات مع الناس، فلما أسلمتُ علمت أن الله وفقه لذلك". انظر الفتح (3/ 516).




জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশরা কেবল মুযদালিফা থেকেই প্রত্যাবর্তন করত। আর তারা বলত: আমরা হলাম ‘আল-হুমস’ (ধর্মে দৃঢ়), তাই আমরা হারামের এলাকা থেকে বের হব না। অথচ তারা আরাফাতে অবস্থান করা ছেড়ে দিয়েছিল। তিনি বলেন: অতঃপর আমি জাহেলিয়াতের যুগে দেখেছি যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উটের উপর আরোহণ করে লোকদের সাথে আরাফাতে অবস্থান করছিলেন। এরপর তিনি মুযদালিফায় তাঁর গোত্রের সাথে সকাল যাপন করতেন এবং তাদের সাথে অবস্থান করতেন, যখন তারা (মুযদালিফা থেকে) প্রত্যাবর্তন করত, তিনিও প্রত্যাবর্তন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4973)


4973 - عن ابن عباس قال: يطوفُ الرّجلُ بالبيت ما كان حلالًا حتى يهلّ بالحجّ، فإذا ركب إلى عرفةَ فمن تيسر له هَديَّةٌ من الإبل أو البقر أو الغنم، ما تيسر له من ذلك، أيَّ ذلك شاء، غير أنه إن لم يتيسر له فعليه ثلاثةُ أيّام في الحجّ، وذلك قبل يوم عرفة، فإن كان آخر يوم من الأيام الثلاثة يومَ عرفة فلا جناح عليه، ثم لِينطلقْ حتى يقف بعرفات من صلاة العصر إلى أن يكون الظلام، ثم لِيدفعوا من عرفات إذا أفاضوا منها حتى يبلغوا جَمْعًا الذي يبيتون به، ثم ليذكرِوا الله كثيرًا، وأَكْثِرُوا التكبير والتهليل قبل أن تُصبحوا، ثم أفيضوا فإن الناس كانوا يُفيضون، وقال الله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ وَاسْتَغْفِرُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [البقرة: 199] حتى تَرْمُوا الجمرة.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4521) عن محمد بن أبي بكر، حدّثنا فضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، أخبرني كريب، عن ابن عباس، فذكره.

وأما قوله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} [سورة البقرة: 199] فظاهر سياق الآية أنها الإفاضة من المزدلفة؛ لأنّها ذكرت بلفظ"ثم" بعد ذكر الأمر بالذكر عند المشعر الحرام، فأجاب بعضُ المفسّرين بأنّ الأمر بالذّكر عند المشعر الحرام بعد الإفاضة من عرفات التي سيقت بلفظ الخبر لما ورد منه على المكان الذي تشرع الإفاضة منه، فالتقدير: فإذا أفضتم اذكروا ثم لتكن إفاضتكم من حيث أفاض الناس لا من حيث كان الحمس يفيضون. أو التقدير: فإذا أفضتم من عرفات إلى المشعر الحرام فاذكروا الله عنده، ولتكن إفاضتكم من المكان الذي يفيض فيه الناس غير الحمس.

واختار الطّحاويّ أن"ثم" بمعنى الواو، وليس للترتيب، فيكون معناه لقصد التأكيد لا لمحض الترتيب. والمعنى: فإذا أفضتم من عرفات فاذكروا الله عند المشعر الحرام، ثم اجعلوا الإفاضة التي تفيضون منها من حيث أفاض الناس يعني من عرفات لا من حيث كنتم تفيضون في الجاهلية من المزدلفة، وقيل غير ذلك. انظر"الفتح".
وأما الإفاضة من عرفات وكون الحجّ لا يتم إلّا بالإفاضة منها فتكفي الآية السابقة وهي قوله تعالي: {فَإِذَا أَفَضْتُمْ مِنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِنْدَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ} [سورة البقرة: 198].

إلّا أن حمل الآية على ظاهرها لا يتمشى مع الأحاديث الصحيحة الواردة في الباب، والله تعالى أعلم.

ومن المفسرين مَنْ قالوا بظاهر الآية بأنّ الأمر بالإفاضة في قوله تعالى بأنّ الإفاضة هنا من المزدلفة حيث أفاض الناس - أي جنس سواء كان كانوا في الجاهليّة منذ إبراهيم عليه السلام أو في الإسلام بعد مشروعية الحجّ.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষ ততক্ষণ পর্যন্ত বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করবে যতক্ষণ না সে হজের ইহরাম বাঁধে। অতঃপর যখন সে আরাফার দিকে যাত্রা করবে, তখন যে ব্যক্তি উট, গরু বা ছাগল থেকে কুরবানি (হাদি) দিতে সক্ষম হয়, সে তার যেকোনো একটি পছন্দমতো দিতে পারে। তবে যদি সে কুরবানি দিতে না পারে, তবে তার উপর হজের সময় তিন দিন রোজা রাখা আবশ্যক। আর তা আরাফার দিনের পূর্বে। যদি তিন দিনের শেষ দিনটি আরাফার দিন হয়, তবে তাতে কোনো সমস্যা নেই। অতঃপর সে যেন চলতে শুরু করে, যাতে সে আসরের সালাতের সময় থেকে সন্ধ্যা হওয়া পর্যন্ত আরাফাতে অবস্থান করে। এরপর যখন তারা আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করবে, তখন যেন তারা জম' (মুযদালিফা) পর্যন্ত যায়, যেখানে তারা রাত যাপন করে। এরপর তারা যেন বেশি বেশি আল্লাহর যিকির করে, এবং সকাল হওয়ার পূর্বে তাকবীর ও তাহলীল বেশি করে পড়ে। অতঃপর তোমরা প্রত্যাবর্তন করো, কারণ লোকেরা এভাবে প্রত্যাবর্তন করত। আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "অতঃপর তোমরা প্রত্যাবর্তন করো যেখান থেকে লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে এবং আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাও। নিশ্চয় আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।" [সূরা বাকারা: ১৯৯]—যতক্ষণ না তোমরা জামরায় কঙ্কর নিক্ষেপ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4974)


4974 - عن عبد الرحمن بن يعمر الدّيليّ، قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم وهو بعرفة فجاء ناسٌ أو نفر من أهل نجد فأمروا رجلًا فنادي رسول الله صلى الله عليه وسلم كيف الحج؟ فأمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رجلًا، فنادى:"الحجّ يوم عرفة من جاء قبل صلاة الصّبح من ليلة جمع فتمَّ حجُّه أيام منى ثلاثة: {فَمَنْ تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ}. قال: ثم أردف رجلا خلفه فجعل ينادي بذلك.

صحيح: رواه أبو داود (1949)، والترمذي (889)، والنسائي (210) (3047)، وابن ماجه (3015) كلّهم من حديث سفيان الثوريّ، عن بكير بن عطاء، عن عبد الرحمن بن يعمر الدّيليّ، فذكره واللفظ لأبي داود.

رواه الإمام أحمد (18774)، وصحّحه ابن خزيمة (2822)، وابن حبان (3892)، والحاكم (1/ 464) كلّهم من هذا الطّريق.

قال الترمذيّ:"هذا أجود حديث رواه سفيان الثوريّ".

وقال أيضًا:"وقد روي شعبة عن بكير بن عطاء نحو حديث الثوريّ. قال: وسمعت الجارود يقول: سمعت وكيعًا أنه ذكر هذا الحديث فقال: هذا الحديث أمُّ المناسك".

وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين.




আবদুর রহমান ইবনু ইয়া'মুর আদ-দাইলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম যখন তিনি আরাফাতে ছিলেন। তখন নজদবাসী কিছু লোক বা একটি দল এলো। তারা একজনকে দায়িত্ব দিল, ফলে লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডেকে জিজ্ঞেস করল: হজ্জ কেমন হবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজনকে নির্দেশ দিলেন, ফলে তিনি ডেকে বললেন: "হজ্জ হলো আরাফার দিন। যে ব্যক্তি মুযদালিফার রাতের ফজরের সালাতের পূর্বে এসে পৌঁছাল, তার হজ্জ পূর্ণ হলো। মিনায় অবস্থান তিন দিন। {আর যে তাড়াহুড়ো করে দু'দিনে চলে যাবে, তার কোনো পাপ নেই।} [সূরা বাকারা: ২০৩]" তিনি (আবদুর রহমান) বলেন, এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পেছনে একজনকে আরোহণ করালেন এবং তিনি তা (উপরে বর্ণিত ঘোষণা) ডেকে বলতে লাগলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4975)


4975 - عن عروة بن مضرس الطائي قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بالموقف -يعني بجمع- قلت: جئت يا رسول الله من جبل طي أكلَلْت مطيتي وأتعبتُ نفسي، والله! ما تركت من حبل إلا وقفتُ عليه! فهل لي من حجّ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك معنا هذه الصّلاة، وأتي عرفات قبل ذلك ليلًا أو نهارًا فقد تم حجُّه وقضى تفثه".

صحيح: رواه أبو داود (1950)، والترمذيّ (891)، والنسائيّ (3039)، وابن ماجه (3016) كلّهم من طريق إسماعيل بن أبي خالد، حدّثنا عامر الشعبيّ، عن عروة بن مضرس، فذكر الحديث.

ومنهم من قرن مع إسماعيل بن أبي خالد زكريا -وهو ابن أبي زائدة-، ومنهم من قرن معهما
داود بن أبي هند، هؤلاء الثلاثة عن عامر الشعبي بإسناده.

قال الترمذي: حسن صحيح.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (18300) وصحّحه ابن خزيمة (2820)، وابن حبان (3850)، والحاكم (1/ 463) وقال:"هذا حديث صحيح على شرط كافة أئمة الحديث، وهي قاعدة من قواعد الإسلام. وقد أمسك عن إخراجه الشّيخان محمد بن إسماعيل، ومسلم بن الحجّاج على أصلهما أنّ عروة بن مضرس لم يحدّث عنه غير عامر الشعبيّ، وقد وجدنا عروة بن الزبير بن العوّام حدّث عنه".

وقال المروزيّ في اختلاف العلماء (ص 90):"روى عنه أيضًا إبراهيم والحسن".

على هذا فلا أرى أن عدم إخراج الشيخين كان بسبب تفرّد الشعبيّ عن عروة بن مضرس، إذ ليس من شرط الشيخين أن يروي الحديث اثنان فما فوقهما.

وخالفهم جميعًا مطرف بن طريف، عن الشعبيّ بإسناده فقال:"من أدرك جمعًا والإمام واقف، فوقف مع الإمام، ثم أفاض مع الناس فقد أدرك الحجّ، ومن لم يدرك فلا حجّ له".

رواه النسائيّ (3040)، والطحاويّ في"مشكله" (4688) كلاهما من وجهين، عن مطرف بن طريف - واللفظ للطّحاويّ، ولفظ النّسائيّ نحوه.

قال الطّحاويّ:"فتأملنا هذا المعنى الذي زاده مطرِّف عن الشعبي على أصحاب الشعبي في هذا الحديث بعد وقوفنا على أن فقهاء الأمصار الذين تدور الفتيا عليهم بالحرمين، وبسائر الأمصار سواهما لا يختلفون أنّ من فاته الوقوف بجمع، وقد كان وقف بعرفة قبل ذلك، أنه ليس في حكم من فاته الحج، وأنه قد أدرك الحجَّ، وقد فاته منه ما يكفيه عنه الدّم، غير طائفة منهم قليلة العدد، فإنّها زعمتْ أنّ من فاته الوقوف بجمع في حجّه بعدما يطلعُ الفجر، فقد فاته الحجُّ، وجعلوا فوتَ الوقوف بجمع قبل طلوع الفجر، كفوت الوقوف بعرفة في الحج حتى يطلع الفجر، ولا نعلم أحدًا ممن تقدَّمهم رُوي عنه هذا القول غير علقمة بن قيس" انتهي.

وذكر ابن عبد البر في"التمهيد" (9/ 272) أنّ القائلين بهذا القول مع علقمة: عامر الشعبيّ، وإبراهيم النخعيّ، والحسن البصريّ، قالوا: من لم ينزل بالمزدلفة وفاته الوقوف بها فقد فاته الحج، ويجعلها عمرة. وهو قول عبد الله بن الزبير، وبه قال الأوزاعي أنّ الوقوف بالمزدلفة فرض واجب يفوت الحج بفواته، وقد رُوي عن الثوري مثل ذلك ولا يصح عنه. والأصح عنه إن شاء الله ما قدمنا ذكره.

وروي عن حماد بن أبي سليمان أنه قال: من فاتته الإفاضة من جمع فقد فاته الحجّ فلحل بعمرة ثم يحجّ قابلًا" انتهى.




উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস আত-ত্বাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট মাওক্বিফে (অর্থাৎ, মুযদালিফায়) এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি ত্বাই পাহাড় থেকে এসেছি। আমি আমার বাহনকে ক্লান্ত করেছি এবং নিজেকে পরিশ্রান্ত করেছি। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো পর্বতমালা বা উঁচু স্থান বাকি রাখিনি যেখানে আমি অবস্থান করিনি! আমার কি তাহলে হজ্জ হয়েছে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাতে (মুযদালিফায় ফজর) শামিল হয়েছে এবং এর পূর্বে দিন কিংবা রাতে আরাফাতে এসেছে (অবস্থান করেছে), তার হজ্জ পূর্ণ হয়েছে এবং সে তার আবশ্যকীয় কাজ সম্পন্ন করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4976)


4976 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك عرفات فوقف بها والمزدلفة
فقد تم حجّه، ومن فاته عرفات فقد فاته الحج فليحل بعمرة وعليه الحج من قابل".

حسن: رواه الدارقطنيّ (2519) من طريق ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.

وابن أبي ليلي سيء الحفظ إلّا أنه لم يتفرّد به، فقد رواه البيهقي (5/ 174) من طريق عبد الله بن حبيب بن أبي ثابت، عن عطاء به، مثله، إلا أنه لم يذكر المزدلفة.

ولا يلتفت إلى متابعة عمر بن قيس عن عطاء فإنه متروك، ومن طريقه رواه الطبرانيّ في"الكبير" (11/ 202).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আরাফাত পেল এবং সেখানে অবস্থান করল (এবং মুযদালিফায়ও), তার হজ্ব পূর্ণ হলো। আর যার আরাফাত ছুটে গেল, তার হজ্ব ছুটে গেল। সুতরাং সে যেন উমরার মাধ্যমে ইহরাম মুক্ত হয় এবং পরবর্তী বছর তার উপর হজ্ব করা আবশ্যক।"









আল-জামি` আল-কামিল (4977)


4977 - عن جابر أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نحرتُ ههنا ومنى كلُّها مَنْحر، فانْحَروا في رحالكم، ووقفتُ ههنا وعرفة كلُّها موقف، ووقفت ههنا وجَمْعٌ كّلها موقف".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218: 149) عن عمر بن حفص بن غياث، حدّثنا أبي، عن جعفر (وهو ابن محمد بن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب)، حدّثني أبي، عن جابر، به.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি এখানেই নহর করেছি, আর মিনা পুরোটাই নহরের স্থান। অতএব, তোমরা তোমাদের নিজ নিজ অবস্থানস্থলেই নহর করো। আমি এখানে অবস্থান করেছি, আর আরাফাহ পুরোটাই অবস্থানের স্থান। আর আমি এখানে অবস্থান করেছি, আর জাম' (মুযদালিফা) পুরোটাই অবস্থানের স্থান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4978)


4978 - عن علي بن أبي طالب، قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة فقال:"هذه عرفة وهذا هو الموقف وعرفة كلّها موقف. ثم أفاض حين غربت الشمس وأردف أسامة ابن زيد، وجعل يشير بيده على هينته والناس يضربون يمينا وشمالا يلتفت إليهم ويقول:"أيها الناس! عليكم السّكينة ثم أتي جمعا فصلّى بهم الصلاتين جميعا فلما أصبح أتي قزح فوقف عليه، وقال:"هذا قزح وهو الموقف وجمع كلّها موقف". ثم أفاض حتى انتهى إلى وادي محسر فقرع ناقته فخبَّتْ حتى جاوزَ الوادي فوقف وأردف الفضل، ثم أتي الجمرة فرماها، ثم أتي المنحرَ، فقال:"هذا المنحر ومِنى كلّها منحر".

واستفتته جارية شابة من خثعم فقالت: إن أبي شيخ كبير قد أدركته فريضة الله في الحج أفيجزئ أن أحج عنه؟ قال:"حُجِّي عن أبيك". قال: ولوي عنقَ الفضل، فقال العباس: يا رسول الله، لم لويت عنقَ ابن عمِّك؟ . قال:"رأيت شابًا وشابّة فلم آمن الشّيطان عليهما". ثم أتاه رجل فقال: يا رسول الله، إنّي أَفضْتُ قبل أن أحلق، قال:"احْلقْ أو قصِّر ولا حرج".

قال: وجاء آخر فقال: يا رسول الله، إنّي ذبحتُ قبل أن أرمي، قال:"ارْمِ ولا حرج". قال: ثم أتي البيت فطاف به ثم أتي زمزم فقال:"يا بني عبد المطلب، لولا أن يغلبكم الناس عنه لنزعتُ".
حسن: رواه الترمذيّ (885)، وأبو داود (1922، 1935)، وابن ماجه (3010) كلّهم من حديث سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب، فذكره واللفظ للترمذي وغيره رووه مختصرًا.

قال الترمذي:"حديث علي حديث حسن صحيح، لا نعرفه من حديث علي إلّا من هذا الوجه من حديث عبد الرحمن بن الحارث بن عياش. وقد رواه غير واحد عن الثوريّ مثل هذا. والعمل على هذا عند أهل العلم، رأوا أن يجمع بين الظهر والعصر بعرفة في وقت الظهر، وقال بعض أهل العلم: إذا صلى الرجل في رحله ولم يشهد الصلاة مع الإمام إن شاء جمع هو بين الصلاتين مثل ما صنع الإمام.

وقال: وزيد بن علي هو ابن حسين بن علي بن أبي طالب" انتهي.

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش المخزوميّ غير أنه حسن الحديث.

وزيد بن علي هو عمّ جعفر بن محمد الصادق ذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 249)، وقال الحافظ في"التهذيب":"وأعاد ابن حبان ذكره في طبقة أتباع التابعين وقال: روى عن أبيه" انظر:"الثقات" (6/ 313).

وفي الباب ما روي عن ابن عباس مرفوعًا:"عرفة كلّها موقف، ومني كلّها موقف". رواه البزّار - كشف الأستار (1127) عن حوثرة بن محمد المنقريّ من كتابه، ثنا سفيان بن عينة، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.

وقال: وحدّثناه أحمد بن عبدة، أنبأ سفيان بن عيينة، فذكره عن طاوس مرسلًا.

قال البزّار:"لا نعلم أحدًا قال:"عن ابن عباس" إلا حرثرة ولم يتابع" انتهى.

قلت: وهو كما قال؛ فإن حوثرة بن محمد المنقري أبو الأزهر البصريّ الورّاق، روى عنه عدد منهم ابن خزيمة، ولم يوثقه غير ابن حبان، فهو"مقبول" على اصطلاح ابن حجر أي إذا توبع، ولم يتابع كما قال البزّار، فهو لين الحديث.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফায় অবস্থান করলেন এবং বললেন: “এটা আরাফা এবং এটাই অবস্থানের স্থান। আর আরাফার সবটাই অবস্থানের স্থান।”

এরপর যখন সূর্য ডুবে গেল, তিনি সেখান থেকে যাত্রা করলেন। তিনি উসামা ইবনু যায়িদকে (তাঁর বাহনে) আরোহী করলেন এবং শান্তভাবে হাত দিয়ে ইশারা করতে লাগলেন। লোকেরা ডানে-বামে তাড়াহুড়ো করে ছুটছিল। তিনি তাদের দিকে ফিরে বললেন: “হে লোক সকল! তোমাদের উপর আবশ্যক হলো প্রশান্তি বজায় রাখা।”

এরপর তিনি জুমআ’ (অর্থাৎ মুযদালিফাহ) এলেন এবং সেখানে তাদের নিয়ে দুই সালাত (মাগরিব ও ইশা) একত্র করে আদায় করলেন। এরপর যখন সকাল হলো, তিনি কুযাহ পাহাড়ের কাছে এলেন এবং তার উপর দাঁড়ালেন এবং বললেন: “এটা কুযাহ এবং এটা অবস্থানের স্থান, আর জুমআ’ (মুযদালিফাহ)-এর সবটাই অবস্থানের স্থান।”

এরপর তিনি যাত্রা করলেন যতক্ষণ না ওয়াদি মুহাসসির-এ পৌঁছলেন। সেখানে তিনি তার উটকে আঘাত করলেন, ফলে সেটি দ্রুত চলতে শুরু করল যতক্ষণ না উপত্যকা পার হলো। এরপর তিনি থামলেন এবং ফাদ্বলকে (তাঁর বাহনে) আরোহী করলেন। এরপর তিনি জামরাতুল আকাবার কাছে এলেন এবং তাতে কংকর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি কুরবানীর স্থানে এলেন এবং বললেন: “এটা কুরবানীর স্থান, আর মিনার সবটাই কুরবানীর স্থান।”

এরপর খাসআম গোত্রের এক যুবতী মহিলা তাঁর নিকট ফাতওয়া চাইলেন এবং বললেন: “আমার পিতা খুবই বৃদ্ধ, এমতাবস্থায় তাঁর উপর আল্লাহর ফরযকৃত হাজ্জ (হজ্জ) করার সময় হয়েছে। আমি কি তার পক্ষ থেকে হাজ্জ আদায় করলে যথেষ্ট হবে?” তিনি বললেন: “তোমার পিতার পক্ষ থেকে তুমি হাজ্জ করো।”

বর্ণনাকারী বলেন: তিনি ফাদ্বল-এর ঘাড় ঘুরিয়ে দিলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আপনার চাচাতো ভাইয়ের ঘাড় ঘুরিয়ে দিলেন কেন?” তিনি বললেন: “আমি একজন যুবক ও একজন যুবতীকে দেখলাম। তাই তাদের উভয়ের উপর শয়তানের প্রভাব নিয়ে আমি নিরাপদ বোধ করিনি।”

এরপর তাঁর কাছে এক লোক এসে বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আমি হালাল (তাকসীর বা চুল কাটার আগে) হওয়ার পূর্বেই তাওয়াফে ইফাদাহ করেছি।” তিনি বললেন: “চুল কাটো বা ছোট করো, এতে কোনো সমস্যা নেই (হারাজ নেই)।” বর্ণনাকারী বলেন: এরপর আরেকজন এসে বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আমি কংকর নিক্ষেপের আগে কুরবানী করেছি।” তিনি বললেন: “কংকর নিক্ষেপ করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।”

বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি বায়তুল্লাহর কাছে এলেন এবং তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি যমযমের কাছে এলেন এবং বললেন: “হে আবদুল মুত্তালিবের বংশধরেরা! যদি মানুষের ভিড়ে তোমাদের উপর (পানি তোলার) কর্তৃত্ব হারানোর ভয় না থাকত, তবে আমি নিজেই (বালতি দিয়ে পানি) উঠাতাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (4979)


4979 - عن يزيد بن شيبان، قال: كنّا وقوفًا بعرفة مكانًا بعيدًا من الموقف، فأتانا ابنُ مِرْبع الأنصاريّ، فقال: إنّي رسولُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إليكم يقول:"كونوا على مشاعركم، فإنّكم على إرْثٍ من إرْثِ أبيكم إبراهيم عليه السلام".

صحيح: رواه أبو داود (1919)، والترمذي (883)، والنسائي (3014)، وابن ماجه (3011) كلّهم من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عمرو بن عبد الله بن صفوان، عن يزيد بن
شيبان، فذكره ولفظهم متقارب.

قال الترمذي:"حديث ابن مِرْبع الأنصاريّ حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلا من حديث ابن عيينة، عن عمرو بن دينار. وابن مِرْبع اسمه يزيد بن مربع الأنصاريّ، وإنما يعرف له هذا الحديث الواحد".

ورواه الإمام أحمد (17233)، وصحّحه ابن خزيمة (2818، 2819)، والحاكم (1/ 462) وقال:"صحيح الإسناد".




ইবনু মিরবা' আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইয়াযীদ ইবনু শাইবান বলেন: আমরা আরাফাতে অবস্থানের স্থান থেকে দূরে এক জায়গায় দাঁড়িয়েছিলাম। তখন ইবনু মিরবা' আল-আনসারী আমাদের নিকট আসলেন এবং বললেন: আমি তোমাদের নিকট রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর পক্ষ থেকে প্রেরিত দূত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলছেন: "তোমরা তোমাদের মাশা‘ইরে (নির্ধারিত স্থানে) অবস্থান করো। কেননা তোমরা তোমাদের পিতা ইব্রাহীম (আলাইহিস সালাম)-এর উত্তরাধিকারের অংশের উপরই রয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4980)


4980 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ارفعوا عن بطن عرنة، ارفعوا عن بطن محسّر".

حسن: رواه ابن خزيمة (2816)، والحاكم (1/ 462) وعنه البيهقيّ (5/ 115) كلّهم من حديث محمد بن كثير، ثنا سفيان بن عيينة، عن زياد بن سعد، عن أبي الزبير، عن أبي معبد، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه هولاء أيضا عن يحيى بن سعيد، عن ابن جريج قال: أخبرني عطاء، عن ابن عباس قال: فذكره موقوفا، والحكم لمن رفع.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم قال: وله شاهد على شرط الشيخين إلا أنّ فيه تقصيرًا في سنده.

أما قوله:"العرنات" فالوقوف بعرنة أي لا تقفوا بعرنة.

وأما قوله:"عن محسر" فالنزول بجمع أن لا تنزلوا محسرًا" انتهى.

قلت: هذا إسناد حسن من أجل الكلام في محمد بن كثير الصنعانيّ إلا أنه حسن الحديث، وليس هو العبديّ كما في ابن خزيمة، ولعلّ الحاكم قال:"على شرط مسلم ظنًا منه أنه العبديّ" هكذا قال ابن خزيمة.

ولم يصبْ النّووي في تضعيف الحديث من أجله بقوله:"ضعّفه جمهور الأئمّة ولم يرو له مسلم""المجموع" (8/ 122).

قلت: محمد بن كثير هو الصنعاني ليس ممن اتفق على تضعيفه جمهور الأئمة بل قال فيه ابن معين: كان صدوقًا، وقال ابن سعد: كان ثقة، وقال أبو حاتم: كان رجلًا صالحًا، وذكره ابن حبان في"الثقات" فمثله يُحَسن حديثه في المتابعات وقد وجدنا له متابعًا، رواه الطحاويّ في"مشكله" (1194) من طريق أبي الأشعث أحمد بن المقدام العجليّ، قال: حدثنا ابن عيينة، بإسناده فذكره.

وفي الباب ما روي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عرفة كلّها موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة. ومزدلفة كلّها موقف وارتفعوا عن بطن محسر، ومني كلّها منحر، وفجاج مكة كلها منحر".

رواه عبد الرزاق عن معمر، عن محمد بن المنكدر، عن أبي هريرة، فذكره.
ذكره ابن عبد البر في"الاستذكار" (13/ 10) ولم أجده في"مصنف عبد الرزاق" فيُنظر فيه.

وإسناده منقطع فإن محمد بن المنكدر لم يسمع من أبي هريرة كما قال ابن معين وأبو زرعة.

ورواه البيهقي (5/ 115) من حديث عبد الوهاب بن عطاء، قال ابن جريج: وأخبرني محمد بن المنكدر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكره)، وهو مرسل.

وفي الباب ما روي أيضًا عن جبير بن مطعم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كلّ عرفات موقف، وارفعوا عن بطن عرنة، وكلّ مزدلفة موقف وارفعوا عن محسر، وكلّ فجاج مني منحر، وكلّ أيام التشريق ذبح".

رواه الإمام أحمد (16571)، والبيهقي (5/ 239) كلاهما من حديث أبي المغيرة، قال: حدّثنا سعيد بن عبد العزيز، قال: حدّثني سليمان بن موسى، عن جبير بن مطعم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وسليمان بن موسى هو الأشدق لم يدرك جبير بن مطعم.

ورواه أيضًا الدارقطني (4/ 284)، والبيهقيّ (5/ 239)، والطبراني (2/ 138) كلّهم من حديث سويد بن عبد العزيز، عن سعيد بن عبد العزيز التّنوخيّ، عن سليمان بن موسى، عن نافع بن جبير ابن مطعم، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أيام التشريق كلّها ذبح".

قال البيهقيّ:"الأوّل مرسل، وهذا غير قوي لأنّ راويه سويد".

ورواه البزار من هذا الوجه وقال: تفرّد به سويد، ولا يحتج بما تفرد به. كذا في"كشف الأستار" (1/ 27)، ولكن يبدو أن الإسناد سقط من"كشف الأستار" أو لم يذكره الهيثميّ في"الكشف"، وإلّا فقد نقل عنه الزّيلعيّ أيضًا في"نصب الراية" (3/ 61) وهذا لفظه:"قال البزار: ورواه سويد بن عبد العزيز فقال فيه: عن نافع بن جبير، عن أبيه، وهو رجل ليس بالحافظ، ولا يحتج به إذا انفرد بحديث. وحديث ابن أبي حسين هو الصواب مع أنّ ابن أبي حسين لم يلقَ جبير ابن مطعم، وإنما ذكرنا هذا الحديث لأنا لا نحفظ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في كلّ أيام التشريق ذبح، إلّا في هذا الحديث، فكذلك ذكرناه، وبينا العلّة فيه" انتهى.

وحديث عبد الرحمن بن أبي حسين الذي أشار إليه البزّار هو ما رواه كما في كشف الأستار (1126)، وابن حبان في صحيحه (3854)، والبيهقيّ (9/ 295 - 296) كلّهم من حديث سعيد بن عبد العزيز، عن سليمان بن موسى، عن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن جبير بن مطعم، فذكر مثله. فأدخلوا بين سليمان بن موسى وبين جبير بن مطعم"عبد الرحمن بن أبي حسين".

وعبد الرحمن بن أبي حسين أيضًا لم يلقَ جبير بن مطعم كما أنه لم يوثقه غير ابن حبان، فهو"مقبول" على اصطلاح الحافظ، ويحتاج إلى متابعة فالصّحيح أنه مرسل كما قال البيهقيّ.

وسليمان بن موسى هو الأمويّ الأشدق فقيه أهل الشام في زمانه، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وللحديث أسانيد أخرى لا يصح منها شيء.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن جابر مرفوعًا:"كلّ عرفة موقف وارتفعوا عن بطن عرنة، وكلّ
المزدلفة موقف وارتفعوا عن بطن محسَّر، وكلّ مني مَنْحر إلّا ما وراء العقبة".

رواه ابن ماجه (3012) عن هشام بن عمار، قال: حدّثنا القاسم بن عبد الله العمري، قال: حدثنا محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، قال (فذكره).

وإسناده ضعيف جدًا من أجل القاسم بن عبد الله العمري فإنه واه. قال أحمد: كان يكذب ويضع الحديث، ترك الناسُ حديثه.

وفي الباب أيضًا عن حبيب بن خماشة الخطميّ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول بعرفة:"عرفة كلّها موقف إلّا بطن عرنة، والمزدلفة كلّها موقف إلّا بطن محسر".

رواه الحارث في"مسنده" البغية (384) عن محمد بن عمر، حدثنا صالح بن خوات، عن يزيد ابن رومان، عن حبيب بن عمير، عن حبيب بن خماشة الخَطْميّ، فذكره.

ومحمد بن عمر هو الواقديّ متهم، وبه أعلّه الحافظ في"الإصابة" في ترجمة حبيب بن عمير ابن خماشة.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عمرو بن معدي كرب الزّبيديّ قال:"ولقد رأيتُنا وقوفًا ببطن محسر، نخاف أن يتخطّفنا الجنّ، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"ارتفعوا عن بطن عرنة، فإنّهم إخوانكم إذا أسلموا".

رواه الطبراني في الكبير (17/ 46 - 47)، والأوسط (2303)، والصغير (157)، والبزار (1093)، والطحاوي في"مشكله" (1200) كلهم من طريق محمد بن زياد بن زبّار الكلبيّ، قال: حدّثنا شرقي بن قطامي، عن أبي طلق العائذيّ، عن شراحيل بن القعقاع، قال: سمعت عمرو بن معدي يقول (فذكره) في حديث طويل كما تقدم في صيغة التلبية، وفيه سلسلة من الضعفاء.

وفي الباب ما رواه مالك بلاغًا في الحج (116) أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"عرفة كلّها موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة، والمزدلفة كلها موقف وارتفعوا عن بطن محسر".

قال ابن عبد البر في"التمهيد" (24/ 417):"هذا الحديث يتصل من حديث جابر بن عبد الله، ومن حديث ابن عباس، ومن حديث علي بن أبي طالب".

وقال في الاستذكار (13/ 9 - 10):"هذا الحديث يتصل من حديث جابر وابن عباس، وعلي ابن أبي طالب، وقد ذكرنا طرقه في"التمهيد"، وأكثرها ليس فيها ذكر بطن عرنة، وإسناده صحيح عند الفقهاء، وهو محفوظ من حديث أبي هريرة" انتهى.

قال ابن عبد البر:"واختلف العلماء فيمن وقف من عرفة بعرنة:

فقال مالك فيما ذكر ابن المنذر عنه: يهريق دمًا وحجّه تام. قال أبو عمر: روى هذه الرواية عن مالك خالد بن نزار.

قال أبو مصعب: إنه كمن لم يقف، وحجّه فائت، وعليه الحج من قابل إذا وقف ببطن عرفة.

ورُوي عن ابن عباس قال:"من أفاض من عرنة فلا حجّ له".
وقال القاسم وسالم:"من وقف بعرنة حتى دفع فلا حج له".

وذكر ابن المنذر هذا القول عن الشّافعي، قال: وبه أقول لأنه لا يجزئه أن يقف مكانا أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا يقف به" انتهى. (13/ 13).

وقال النووي في"المجموع" (8/ 120):"لو وقف ببطن عرنة لم يصح وقوفه عندنا، وبه قال جماهير العلماء. وحكى ابنُ المنذر وأصحابُنا عن مالك أنه يصح ويلزمه دم. وقال العبدريّ: هذا الذي حكاه أصحابنا عن مالك لم أرَه له، بل مذهبه في هذه المسألة كمذهب الفقهاء أنه لا يجزئه. قال: وقد نصَّ أصحابه أنه لا يجوز أن يقف بعرنة".

ثم قال النوويّ -بعد أن سرد أحاديث الباب-:"فتحصل الدّلالة على مالك بثلاثة أشياء: أحدها: الرّواية المرسلة فإنّ المرسل عنده حجّة. والثاني: الموقوف على ابن عباس وهو حجّة عنده. والثّالث: أن الذي قلنا به من تحديد عرفات مجمع عليه والذي يدعيه من دخول عرنة في الحدّ لا يقبل إلا بدليل وليس لهم دليل صحيح ولا ضعيف في ذلك، والله أعلم".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আরনাহ উপত্যকা থেকে উঠে যাও, তোমরা মুহাস্‌সির উপত্যকা থেকেও উঠে যাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (4981)


4981 - عن عائشة إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من يومٍ أكثر من أَنْ يُعْتق اللهُ فيه عبدًا من النّار من يوم عرفة، وإنّه ليدنو ثم يباهي بهم الملائكة فيقول ما أراد هؤلاء؟".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1348) من طريق ابن وهب، أخبرني مخرمة بن بكير، عن أبيه، قال: سمعت يونس بن يوسف يقول عن ابن المسيب، قال: قالت عائشة (فذكرته).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আরাফার দিনের চেয়ে এমন কোনো দিন নেই, যেদিন আল্লাহ এত অধিক সংখ্যক বান্দাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। আর নিশ্চয়ই তিনি (আল্লাহ) নিকটবর্তী হন। অতঃপর তিনি তাদের (হাজীদের) নিয়ে ফেরেশতাদের কাছে গর্ব (বা প্রশংসা) করেন এবং বলেন, এরা কী চেয়েছে?









আল-জামি` আল-কামিল (4982)


4982 - عن طارق بن شهاب: أنّ أُناسًا من اليهود قالوا: لو نزلت هذه الآية فينا لاتخذنا ذلك اليوم عيدًا! فقال عمر أيَّةُ آيةٍ؟ فقالوا: {الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا} [المائدة: 3]. فقال عمر: إنّي لأعلمُ أيّ مكان أُنزلتْ؛ أُنزلتْ ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم واقف بعرفة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازيّ (4407)، ومسلم في التفسير (3017) كلاهما من طريق سفيان الثوريّ، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، فذكره. واللفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم نحوه، وزاد:"قال سفيان: أشكّ كان يوم جمعة أم لا؟".

ثم رواه مسلم من طريق إدريس (هو ابن يزيد الأوديّ)، وأبي عُميس (هو عتبة بن عبد الله المسعوديّ) -فرّقهما- كلاهما عن قيس بن مسلم، به، نحوه. وفيه أنّها نزلتْ في يوم الجمعة، ولم يشكّا.




তারিক ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, কিছু ইহুদি লোক বলল: যদি এই আয়াতটি আমাদের মাঝে অবতীর্ণ হতো, তাহলে আমরা সেই দিনটিকে উৎসবের দিন হিসেবে গ্রহণ করতাম। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'কোন আয়াত?' তারা বলল: "{আজ তোমাদের জন্য তোমাদের দীনকে পূর্ণাঙ্গ করে দিলাম এবং তোমাদের উপর আমার নিয়ামত সম্পূর্ণ করলাম, আর ইসলামকে তোমাদের জন্য দীন হিসেবে মনোনীত করলাম।}" [সূরা আল-মায়েদা: ৩]। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি নিশ্চিতভাবে জানি তা কখন এবং কোথায় অবতীর্ণ হয়েছিল; তা অবতীর্ণ হয়েছিল যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফায় দাঁড়িয়ে ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4983)


4983 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من أيام أفضل عند الله من أيام عشر من ذي الحجة". قال: فقال رجل: يا رسول الله، هنّ أفضل أمْ عدّتهنّ جهادًا في سبيل الله؟ قال:"هنّ أفضل من عدّتهن جهادا في سبيل الله. وما من يوم أفضل
عند الله من يوم عرفة؛ ينزل الله إلى السّماء الدّنيا فيباهي بأهل الأرض أهل السّماء فيقول: انظروا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا ضاحين جاؤوا من كلِّ فجٍّ عميق يرجون رحمتي ولم يروا عذابي، فلمْ يُرَ يومٌ أكثرُ عتقًا من النّار من يوم عرفة".

حسن: رواه ابن حبان (3853) من طريق محمد بن مروان العقيليّ، حدّثنا هشام -هو الدّستوائيّ-، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.

ورواه أبو يعلى (2090)، والبزّار - كشف الأستار (1128) - كلاهما من هذا الوجه.

وإسناده حسن من أجل أبي الزبير -وهو المكي- هو لا بأس في تصريحه للتحديث، وإخراج ابن حبان له في صحيحه دليل على أنه صرّح به في إسناد آخر، كما نصّ على ذلك في المقدمة (1/ 162) قائلًا:"فإن صحَّ عندي خبر من رواية مدلّس أنه بيّن السّماع فيه، لا أبالي أن أذكره من غير بيان السماع في خبره بعد صحته عندي من طريق آخر".

وذكره ابن خزيمة في صحيحه (2840) من وجه آخر عن مرزوق -وهو أبو بكر-، عن أبي الزبير، عن جابر، مختصرًا. وقال: أنا أبرأ من عهدة مرزوق.

قلت: مرزوق أبو بكر هو الباهليّ البصريّ مولي طلحة بن عبد الرحمن هو ليس ممن يتبرّأ منه، فقد وثّقه أبو زرعة، وروى عنه جماعة من أئمة الحديث ثم هو لم ينفرد بهذا الحديث فقد تابعه هشام الدستوائيّ كما مضى في الإسناد الأول، ثم إذا كان ابن خزيمة يتبرأ من عهدته فهل لم يقف على الإسناد الأول فيخرجه في صحيحه؟ .




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কাছে যিলহজ্জ মাসের দশ দিনের চেয়ে উত্তম কোনো দিন নেই।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই দিনগুলো কি আল্লাহর পথে জিহাদের সমতুল্য দিনগুলোর চেয়েও উত্তম? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই দিনগুলো আল্লাহর পথে এর (দিনগুলোর) সমতুল্য সংখ্যক দিনের জিহাদের চেয়েও উত্তম। আর আরাফার দিনের চেয়ে আল্লাহর কাছে উত্তম আর কোনো দিন নেই। আল্লাহ তাআলা দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন এবং পৃথিবীবাসীকে নিয়ে আসমানবাসীদের সাথে গর্ব করেন। তিনি বলেন: 'আমার বান্দাদের দিকে দেখ, তারা উস্কোখুস্কো চুল নিয়ে, ধুলোমলিন অবস্থায়, রোদে পুড়ে দূর-দূরান্তের গভীর পথ অতিক্রম করে এসেছে। তারা আমার রহমতের আশা করে, যদিও তারা আমার শাস্তি দেখেনি।' আরাফার দিনের চেয়ে অধিক পরিমাণে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেওয়ার দিন আর দেখা যায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4984)


4984 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الله عز وجل يباهي الملائكة بأهل عرفات، يقول: انظُروا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا".

حسن: رواه الإمام أحمد (8047) عن أبي قَطن وإسماعيل بن عمر، قالا: حدّثنا يونس، عن مجاهد أبي الحجّاج، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وإسناده حسن لأجل يونس، وهو: ابن أبي إسحاق فإنّه حسن الحديث.

وأبو قَطن هو: عمرو بن الهيثم بن قَطن -بفتح القاف- ثقة من رجال مسلم.

وصحّحه ابن خزيمة (2839)، وابن حبان (3852)، والحاكم (1/ 465) كلّهم من طريق يونس ابن أبي إسحاق.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".

والصّواب أن يونس بن أبي إسحاق من رجال مسلم وحده.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা আরাফাতের ময়দানে অবস্থানকারীদের নিয়ে ফেরেশতাদের সামনে গর্ব করেন। তিনি বলেন: ‘তোমরা আমার বান্দাদের দিকে তাকাও, তারা এলোমেলো চুল ও ধূলিধূসরিত অবস্থায় এসেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4985)


4985 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يقول:"إنّ الله عز وجل يباهي ملائكته عشية عرفة بأهل عرفة، فيقول: انظروا إلى عبادي أتوني شُعْثًا غُبْرًا".
حسن: رواه أحمد (7089) عن أزهر بن القاسم، حدثنا المثني -يعني ابن سعيد-، عن قتادة، عن عبد الله بن باباه، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

ورواه أيضًا الطبرانيّ في"الصّغير" (575) من هذا الطّريق.

وإسناده حسن لأجل أزهر بن القاسم، فإنه صدوق.

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 250): رواه أحمد والطبراني في"الكبير"، و"الصغير" ورجال أحمد موثقون. وبمعناه أحاديث أخرى ولكن كلها ضعيفة. انظر: كتاب الإيمان - جموع أبواب الإيمان بالملائكة.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা আরাফার দিনের সন্ধ্যায় আরাফার অধিবাসীদের নিয়ে তাঁর ফেরেশতাদের কাছে গর্ব করেন। অতঃপর তিনি বলেন: ‘তোমরা আমার বান্দাদের দিকে তাকাও, তারা এলোমেলো চুল ও ধূলিধূসরিত অবস্থায় আমার কাছে এসেছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (4986)


4986 - عن ابن عمر، قال: ثم أقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم على الأنصاري فقال:"إنْ شئتَ أخبرتُكَ عمَّا جئْتَ تسألُ، وإنْ شئْتَ سألْتَني فأخْبرُكَ". فقال: لا يا نبي الله أخبرني عمّا جئتُ أسألُكَ. قال:"جئتَ تَسْألُني عن الحاجّ ما له حين يخرجُ من بيته؟ وما له حين يقوم بعرفات؟ وما له حين يرمي الجمار؟ وما له حين يحلق رأسه؟ وما له حين يقضي آخر طواف بالبيت". فقال: يا نبي الله! والذي بعثك بالحقّ! ما أخطأتَ مما كان في نفسي شيئًا! قال:"فإنّ له حين يخرج من بيته أن راحلته لا تخطو خطوة إلا كتب له بها حسنة أو حطّت عنه بها خطيئة، فإذا وَقفَ بعرفة فإنّ الله عز وجل ينزل إلى السّماء الدّنيا فيقول: انظُرُوا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا اشهدوا أنّي قد غفرتُ لهم ذنوبهم وإن كان عدد قطر السّماء ورمل عالج. وإذا رمي الجمار لا يدري أحدٌ ما له حتى يوفاه يوم القيامة. وإذا حلق رأسه فله بكل شعرة سقطت من رأسه نور يوم القيامة. وإذا قضى آخر طوافه بالبيت خرج من ذنوبه كيوم ولدتْه أمُّه".

حسن: رواه ابن حبان (1887)، والبيهقيّ في دلائل النبوة (6/ 294)، والبزار -كشف الأستار- (1082) كلّهم من حديث يحيي بن عبد الرحمن الأرحبي، حدثني عبيدة بن الأسود، عن القاسم ابن الوليد، عن سنان بن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر، فذكر حديثًا طويلًا، وهذا جزء منه.

وإسناده حسن من أجل يحيى بن عبد الرحمن الأرحبي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وسنان بن الحارث بن مصرف ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 424، 8/ 299) وذكر من الرواة عنه القاسم بن الوليد، ومحمد بن طلحة، وترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 254)، وزاد من الرواة عنه صالح بن حيي والد حسن بن صالح.

وقال البيهقي:"إسناده حسن".

وقال الهيثمي:"رجال البزار موثقون".
وقال البزار:"وقد رُوي هذا الحديث من وجوه، ولا نعلم له أحسن من هذا الطريق".

قلت: وهو كما قال، فقد رواه عبد الرزاق (8830) وعنه الطبرانيّ (3566) عن ابن مجاهد، عن أبيه، عن ابن عمر، قال: فذكر الحديث بطوله، ولم يسم عبد الرزاق بن مجاهد من هو؟ فإن كان هو عبد الوهاب فقال وكيع: كانوا يقولون: إن عبد الوهاب بن مجاهد لم يسمع من أبيه. أي فيه انقطاع. ثم هو ضعيف جدًا، كذبه سفيان، وقال ابن معين: ضعيف. وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث. وأما قول ابن عدي: عامة ما يرويه لا يتابع عليه، فهو ليس على إطلاقه فإنه قد توبع في الإسناد السابق إلا أنه لا يعتبر به من أجل ضعفه الشديد.

فالخلاصة كما سبق قول البزار، وقال أيضًا وقد رُوي عن إسماعيل بن رافع، عن أنس نحو حديث ابن عمر.

قلت: رواه البزار -كشف الأستار (1083) - بإسناده عن إسماعيل بن رافع، عن أنس بن مالك، نحو حديث ابن عمر. وإسماعيل بن رافع ضعيف.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس قال:"كان فلان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، قال: فجعل الفتي يلاحظ النساء وينظر إليهن. قال: وجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يصرف وجهه بيده من خلفه مرارًا. قال: وجعل الفتي يلاحظ إليهن. قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ابنَ أخي، إنّ هذا يوم مَنْ ملك فيه سمعَه وبصرَه ولسانَه غُفر له".

رواه الإمام أحمد (3041، 3350)، وأبو يعلى (2441)، والطبراني (12974)، وابن خزيمة في صحيحه (2834، 2833) كلهم من طريق سُكين بن عبد العزيز، قال: حدثني أبي، قال: سمعت ابن عباس قال (فذكره).

وفي بعض الروايات أن الفتى هو الفضل بن عباس.

وسكين بن عبد العزيز بن قيس العبدي البصريّ مختلف فيه، فقال ابن معين: ثقة. وقال أبو حاتم: لا بأس به، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال العجلي: ثقة، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به. ولكن قال النسائي: ليس بالقوي.

والخلاصة: أنه حسن الحديث؛ ولذا قال فيه الحافظ:"صدوق يروي عن الضّعفاء" فضعفه ليس منه. ولكن أبوه عبد العزيز بن قيس، قال فيه أبو حاتم:"مجهول" ومع هذا ذكره ابن حبان في"الثقات".

وقد تبرّأ منه ومن ولده ابنُ خزيمة، فقال:"أنا برئ من عهدة سُكين بن عبد العزيز وعهدة أبيه، ثم روي بإسناده من وجهين - عن سكين بن عبد العزيز، عن أبيه، بإسناده، مثله.

وذلك بعد أن ذكر قصة الفضل وأنه كان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم، وجعل ينظر إلى امرأة حسنة، والنبيّ صلى الله عليه وسلم يصرف وجهه عنها بدون ذكر الزيادات التي في حديث سكين بن عبد العزيز.

قلت: وهي قصة صحيحة مخرّجة في الصّحيح.
ومن هنا يعرف تساهل المنذريّ في قوله بعد أن أخرج حديث ابن عباس من مسند الإمام أحمد:"بإسناد صحيح".

وفي الباب ما رُوي عن طلحة بن عبد الله بن كريز، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما رؤي الشيطانُ يومًا هو فيه أصغر ولا أدحر ولا أحقر ولا أغيظ منه في يوم عرفة، وما ذاك إلا لما رأى من تنزيل الرّحمة، وتجاوز الله عن الذّنوب العظام إلّا ما أُرى يوم بدر". قيل: وما رأي يوم بدر يا رسول الله؟ قال:"أما إنّه قد رأى جبريل يزع الملائكة".

رواه مالك في الحجّ (245) وعنه عبد الرزاق (8832) عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن طلحة بن عبيد الله، فذكره. وهو مرسل.

وقوله:"أدحر" بالدال والحاء المهملة - أي أبعد وأذلّ. قال الله تعالى: {فَتُلْقَى فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَدْحُورًا (39)} [سورة الإسراء: 39] أي مبعدًا من رحمة الله.

وفي الباب عن عباس بن مرداس السلميّ قال: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دعا لأمّته عشية عرفة بالمغفرة فأجيب:"إنّي قد غفرت لهم ما خلا الظالم، فإني آخذ للمظلوم منه". قال:"أي ربِّ إنْ شئتَ أعطيتَ المظلوم من الجنة. وغفرت للظالم". فلم يجب عشيته، فلمّا أصبح بالمزدلفة أعاد الدّعاء. فأُجيب إلى ما سأل. قال: فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم -أو قال: تبسّم-. فقال له أبو بكر وعمر: بأبي أنت وأمي إنّ هذه لساعة ما كنت تضحك فيها! . فما الذي أضحكك؟ أضحك الله سنَّك. قال:"إنّ عدو الله إبليس لما علم أن الله عز وجل قد استجاب دعائي وغفر لأمتي أخذ التراب فجعل يحثوه على رأسه ويدعو بالويل والثبور. فأضحكني ما رأيت من جزعه".

رواه ابن ماجه (3013) عن أيوب بن محمد الهاشميّ، قال: حدّثنا عبد القاهر بن السريّ السّلميّ، قال: حدّثنا عبد الله بن كنانة بن عباس بن مرداس السلميّ، أنّ أباه أخبره، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دعا، فذكره.

ورواه أبو داود (5234) واقتصر على قوله:"ضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له أبو بكر أو عمر:"أضحك الله سنك" وساق الحديث. هكذا قال أبو داود.

فقوله:"ساق الحديث" إشارة إلى ذكر الحديث كاملًا.

ورواه الإمام أحمد (16207)، والبيهقي في شعب الإيمان (346) بكامله كلّهم من طريق عبد القاهر بن السري بإسناده، مثله. إلا أنهم قالوا: عن ابن كنانة بن العباس.

وابن كنانة هو عبد الله كما جاء مصرحًا به عند ابن ماجه.

وأخرجه البخاريّ في تاريخه (7/ 2 - 3) وقال: لم يصح حديثه.

قلت: وهو كما قال، فإنّ فيه عبد الله بن كنانة بن العباس، لم يرو عنه غير عبد القاهر، ولذا قال فيه الحافظ:"مجهول".
وأيضًا فيه أبوه كنانة بن العباس بن مرداس، لم يرو عنه سوى ابنه عبد الله، ولذا قال فيه أيضًا الحافظ:"مجهول".

وقال ابن حبان في ترجمة كنانة بن العباس بن مرداس السلمي في المجروحين (2/ 234):"يروي عن أبيه، روى عنه ابنه، منكر الحديث جدًا. فلا أدري التخليط في حديثه منه أو من ابنه، ومن أيهما كان فهو ساقط الاحتجاج بما روى، لعظم ما أتي من المناكير عن المشاهير".

ثم أعاد ذكره في"الثقات" (/ 339) من التابعين فتناقض.

وقال البيهقيّ:"هذا الحديث له شواهد كثيرة، وقد ذكرناها في كتاب"البعث" فإن صحّ بشواهده فقيه الحجة، وإن لم يصح فقد قال الله عز وجل: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [سورة النساء: 48]، وظلم بعضهم بعضًا دون الشرك" انتهى.

وفيه إشارة إلى ضعف الحديث حتى بشواهده.

وبالغ ابن الجوزيّ فأدخل هذا الحديث في كتابه"الموضوعات" (2/ 214) بناء على كلام ابن حبان في كنانة بن العباس، ولعله لم يقف على كلام ابن حبان في"الثقات".

والخلاصة أنه ضعيف لا موضوع؛ ولذا تعقبه الحافظ ابن حجر في"القول المسدّد" (الحديث السابع)، وذكر له شواهد، ولكن كلها ضعيفة لا يسلم منها شيء، ثم إن هذا الحديث مع ضعفه يدل على عموم غفران الذنوب لمن شهد الموقف منها حقوق العباد.

وقد جاء في الصحيح في قوله تعالى: {وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَى سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ} [سورة الحجر: 47] قال:"يخلص المؤمنون من النار، فيحبسون على قنطرة بين الجنة والنار، فيقتص بعضهم من بعض مظالم كانت بينهم في الدّنيا، حتى إذا هُذِّبوا ونقوا أذن لهم في دخول الجنة، فوالذي نفس محمد بيده لأحدهم أهدي بمنزله في الجنة منه بمنزله كان في الدنيا".

رواه البخاريّ في الرقاق (6535) عن الصلت بن محمد، حدثنا يزيد بن زريع، فقرأ الآية الكريمة، قال: حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أبي المتوكل الناجي، أن أبا سعيد الخدريّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم (فذكر الحديث).

وقد روي بخلاف حديث العباس بن مرداس:

عن أنس بن مالك قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة يوم عرفة، وكادت الشّمس أن تغرب فقال:"يا بلال، أنصت لي الناس". فقام بلال: فقال: يا معشر الناس أنصتوا. فقال:"أتاني جبريل عليه السلام آنفًا، فأقرأني من ربّي السلام، وقال: إنّ الله قد غفر لأهل عرفات ما خلا التّبعات. أفيضوا باسم الله".

رواه العقيليّ في ترجمة (شبويّه المروزيّ) عن ابن المبارك وقال:"حديثه منكر غير محفوظ".

وقال: وقد روي في هذا المعنى بخلاف هذا اللفظ حديث العباس بن مرداس، وحديث ابن عمر وغيره. وأسانيدها لينة، وفيه عن عائشة وجابر بإسنادين صالحين" انتهى. انظر:"الضعفاء" (2/ 196 - 197).
وقال الذهبي في"الميزان" (2/ 262):"شبّويه عن ابن المبارك" فذكر حديثًا منكرًا، ذكره العقيليّ.

إذا عرفنا لفظ هذا الحديث بأنه يخالف ما رواه العباس بن مرداس عرفنا وهم المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1821) فجعل حديث ابن المبارك موافقًا لحديث العباس بن مرداس ولفظه:"إنّ الله عز وجل غفر لأهل عرفات وأهل المشعر، وضمن عنهم التبعات".

وزاد:"فقام عمر بن الخطاب فقال: يا رسول الله، هذا لنا خاصة؟ قال:"هذا لكم، ولمن أتي من بعدكم إلى يوم القيامة" فقال عمر: كثر خير الله وطاب" انتهي.

فلعلّه وهم في سوق اللفظ لأنه كان يملي من حفظه كما يظهر من مقدمته.

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن أنس قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الله تطوَّل على أهل عرفات يباهي بهم الملائكة يقول: يا ملائكتي انظروا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا، أقبلُوا يضربونَ إليَّ من كلِّ فجٍّ عميق، فأشهدكم أني قد أجبت دعاءهم، وشفعت رغبتهم، ووهبت مسيئهم لمحسنهم، وأعطيت محسنيهم جميع ما سألوني غير التبعات التي بينهم، فإذا أفاض القوم إلى جمع ووقفوا وعادوا في الرغبة والطلب إلى الله يقول: يا ملائكتي عبادي وقفوا، فعادوا في الرغبة والطّلب، فأشهدكم أني قد أجبت دعاءهم، وشفعت رغبتهم، ووهبت مسيئهم لمحسنهم، وأُعطيت محسنيهم ما سألني، وكفلت عنهم التّبعات التي بينهم".

رواه أبو يعلي (1351) عن إبراهيم بن الحجاج النيليّ، حدثنا صالح المريّ، عن يزيد الرّقاشي، عن أنس، فذكره.

ذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 257) وضعّفه من أجل صالح المريّ.

قلت: صالح المريّ هو: ابن بشير بن وادع المري -بضم الميم وتشديد الراء- ضعّفه ابن معين، وقال البخاريّ: منكر الحديث. وفي التقريب:"ضعيف".

وأما ابن حبان فذكره في الثقات (4/ 374) فالظّاهر أنه لم يقف على كلام الأئمة فيه. وفات الهيثميّ يزيد الرقاشيّ وهو ابن يزيد بن أبان فلم يضعفه وهو ممن ضُعِّف.

وأمّا ما رُوي"أفضلُ الأيام يوم عرفة وافق يوم الجمعة، وهو أفضل من سبعين حجّة في غير يوم الجمعة" فهو لا أصل له، أورده ابن الأثير في"جامع الأصول" (6867) -تحقيق: أيمن صالح- وعزاه إلى رزين.

ورَزين هو ابن معاوية بن عمار الأندلسيّ السرقسطيّ المتوفي سنة خمس وثلاثين وخمسمائة بمكة، وصفه الذهبي في"سير أعلام النبلاء" (20/ 204) بأنه الإمام المحدّث الشهير صاحب كتاب"تجريد الصحاح"، وكان إمام المالكيين بالحرم.

وقال ابن الأثير في مقدمة"جامع الأصول" (1/ 48 - 50):"جمع بين كتب البخاريّ،
ومسلم، والموطأ لمالك، وجامع الترمذي، وسنن أبي داود، وسنن أبي عبد الرحمن النسائي رحمة الله عليهم".

وهو الذي بني عليه الحافظ ابن الأثير كتابه"جامع الأصول"، ولكن كما يقول الحافظ الذهبي:"أدخل في كتابه زيادات واهية، لو تنزّه عنها لأجاد".

قلت: وهذا الحديث من هذا القبيل.

وقد حاول أئمّة الحديث الوقوف على إسناد هذا الحديث فلم يقفوا عليه، قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 65) بعد أن بيّن مزية وقفة الجمعة من عشرة وجوه بقوله:"وأما ما استفاض على ألسنة العوام بأنها تعدل ثنتين وسبعين حجة فباطل لا أصل له عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا عن أحد من الصحابة والتابعين".

وقال الحافظ في"الفتح" (8/ 271) بعد أن عزاه لرزين في"جامعه":"لا أعرف حاله؛ لأنه لم يذكر صحابيه ولا من أخرجه".

وقال الحافظ ابن ناصر الدين الدمشقي في جزء"فضل عشر ذي الحجة ويوم عرفة" (ص 46):"حديث وقفة الجمعة يوم عرفة أنها تعدل اثنتين وسبعين حجة حديث باطل لا يصح، وكذلك لا يثبت ما رُوي عن زرّ بن حبيش أنه أفضل من سبعين حجة في غير يوم جمعة".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারী লোকটির দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: "তুমি চাইলে, তুমি যে বিষয়ে প্রশ্ন করতে এসেছ, আমি সে বিষয়ে তোমাকে বলে দেব। আর যদি চাও, তুমি আমাকে প্রশ্ন করবে এবং আমি তোমাকে উত্তর দেব।" লোকটি বলল: "না, হে আল্লাহর নবী! আপনিই বলুন, আমি আপনাকে কী প্রশ্ন করতে এসেছি।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আমাকে প্রশ্ন করতে এসেছ যে, হাজি যখন তার বাড়ি থেকে বের হয়, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে আরাফাতের ময়দানে অবস্থান করে, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে জামারাহসমূহে পাথর নিক্ষেপ করে, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে মাথা মুণ্ডন করে, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে বাইতুল্লাহর শেষ তাওয়াফ সম্পন্ন করে, তখন সে কী লাভ করে?" লোকটি বলল: "হে আল্লাহর নবী! সেই সত্তার কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে প্রেরণ করেছেন! আপনি আমার মনে যা ছিল, তার কিছুই ভুল করেননি (অর্থাৎ হুবহু সব বলে দিয়েছেন)।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যখন তার বাড়ি থেকে বের হয়, তখন তার উট বা বাহন যতবার পা ফেলে, ততবার তার জন্য একটি করে নেকি লেখা হয় অথবা তার একটি করে গুনাহ মোচন করা হয়। আর যখন সে আরাফাতে অবস্থান করে, তখন আল্লাহ তাআলা দুনিয়ার নিকটবর্তী আকাশে অবতরণ করেন এবং বলেন: ‘আমার বান্দাদের দিকে তাকাও—তারা আলুথালু ও ধুলায় আবৃত অবস্থায় এসেছে। তোমরা সাক্ষী থাকো যে, আমি তাদের গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছি, যদিও তা আকাশের ফোঁটা এবং বালুকাময় মরুভূমির বালুকণার সমসংখ্যক হয়। আর যখন সে জামারাহসমূহে পাথর নিক্ষেপ করে, তখন সে কী লাভ করে, তা ক্বিয়ামতের দিন তার প্রতিফল না পাওয়া পর্যন্ত কেউ জানে না। আর যখন সে তার মাথা মুণ্ডন করে, তখন তার মাথা থেকে ঝরে পড়া প্রতিটি চুলের বিনিময়ে ক্বিয়ামতের দিন তার জন্য একটি করে আলো (নূর) থাকবে। আর যখন সে বাইতুল্লাহর শেষ তাওয়াফ সম্পন্ন করে, তখন সে তার গুনাহ থেকে এমনভাবে বেরিয়ে আসে, যেমন তার মা তাকে জন্ম দিয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (4987)


4987 - عن أبي أيوب، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قال: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كلّ شيء قدير، عشر مرات كان كمن أعتق أربعة أنفس من ولد إسماعيل".

متفق عليه: رواه البخاريّ (6404)، ومسلم (2693) كلاهما من حديث عمر بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق، عن عمرو بن ميمون، قال:"من قال: لا إله إلا الله … إلخ".

قال عمر (ابن أبي زائدة) حدّثنا عبد الله بن أبي السفر، عن الشعبي، عن ربيع بن خثيم، بمثل ذلك. فقلت للربيع: ممن سمعتَه؟ قال: من عمرو بن ميمون. قال: فأتيت عمرو بن ميمون، فقلت: ممن سمعته؟ قال: من ابن أبي ليلى. قال: فأتيت ابن أبي ليلى، فقلت: ممن سمعته؟ قال: من أبي أيوب الأنصاري يحدثه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.




আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং প্রশংসা তাঁরই। তিনি সর্ববিষয়ে ক্ষমতাবান।) এই বাক্যটি দশবার বলবে, সে এমন ব্যক্তির মতো হবে যে ইসমাঈলের (আঃ) বংশধর থেকে চারজন দাস মুক্ত করল।”

এ বিষয়ে ঐকমত্য রয়েছে। ইমাম বুখারী (৬৪০৪) ও মুসলিম (২৬৯৩) উভয়েই উমর ইবনু আবী যায়েদাহ্‌ থেকে, তিনি আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আমর ইবনু মাইমূন থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। আমর ইবনু মাইমূন বলেন: "যে ব্যক্তি বলবে: লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ... ইত্যাদি।"

উমর (ইবনু আবী যায়েদাহ্‌) বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু আবী সাফারের মাধ্যমে আমাদের কাছে বর্ণনা করা হয়েছে, তিনি শা'বী থেকে, তিনি রবী ইবনু খুসাইম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আমি রবী-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কার কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: আমর ইবনু মাইমূনের কাছে। তিনি বলেন: অতঃপর আমি আমর ইবনু মাইমূনের কাছে গেলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কার কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: ইবনু আবী লায়লার কাছে। তিনি বলেন: অতঃপর আমি ইবনু আবী লায়লার কাছে গেলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কার কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এটি বর্ণনা করেছেন।