হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4988)


4988 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل ما قلتُ أنا والنّبيون قبلي عشية عرفة: لا إله إلّا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كلّ شيء قدير".

حسن: رواه الطبراني في الدعاء (874) من طريق قيس بن الربيع، عن الأغر بن الصباح، عن
خليفة بن حصين، عن علي رضي الله عنه، فذكره.

وفي الإسناد قيس بن الربيع الأسدي أبو محمد الكوفيّ، مختلف فيه. فقال عفّان بن مسلم: كان قيس ثقة يوثقه الثوري وشعبة. وقال أبو داود الطّيالسيّ: قال لنا شعبة: أدركوا قيسًا قبل أن يموت.

وعن الوليد الطيالسيّ قال: كان قيس بن الربيع ثقة، حسن الحديث، حدّث عنه معاذ بن معاذ، ولكن ليّنه الإمام أحمد وضعّفه ابن معين، وكان عبد الرحمن بن مهدي يحدث عنه ثم تركهـ.

والسبب في ذلك كما قال جعفر بن أبان: سألت ابن نمير عن قيس بن الربيع؟ فقال: كان له ابن هو آفته، نظر أصحاب الحديث في كتبه، فأنكروا حديثه وظنوا أن ابنه قد غيّرها.

وكذلك قال أبو داود: إنما أتي قيس بن الربيع من قبل ابنه، كان ابنه يأخذ حديث الناس فيدخلها في فرج كتاب قيس، ولا يعرف الشيخ ذلك.

والخلاصة فيه ما قاله ابن عدي:"وعامة رواياته مستقيمة، والقول فيه ما قال شعبة، وإنه لا بأس به".

فإذا تبين أنه لم يتعمّد ولم يُتّهم فقد وجدنا لحديثه شاهدًا مرسلًا قويًّا، وهو ما رواه مالك (1/ 422) عن زياد بن أبي زياد مولي عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة، عن طلحة بن عبيد الله بن كريز، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل الدّعاء دعاء يوم عرفة، وأفضل ما قلت أنا والنّبيون من قبلي: لا إله إلّا الله وحده لا شريك له".

وطلحة بن عبيد الله بن كَرِيزْ -بفتح الكاف وإسكان الزاي- تابعيّ خزاعيّ، قال عبد الله بن أحمد: سألت أبي عنه، فقال: ثقة. وعمل السّلف يقويه أيضًا.

عن أبي شعبة أنه قال: رمقت ابن عمر وهو بعرفة لأسمع ما يدعو، قال: فما زاد على أن قال:"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير".

أورده البيهقي (5/ 117) هكذا معلقا.

ورواه الطبراني في"الدعاء" (878) بإسناده عن عبد الله بن الحارث، أن ابن عمر كان عشية عرفة يرفع صوته، فذكره وزاد بعده:"اللَّهم اهدنا بالهدى، وزينا بالتقوى، واغفر لنا في الآخرة والأولى" ثم يخفض صوته، ثم يقول:"اللَّهم إني أسألك من فضلك وعطائك رزقًا طيبًا مباركًا، اللَّهم إنك أمرت بالدّعاء، وقضيت على نفسك بالاستجابة، وأنت لا تخلف وعدك، ولا تكذب وعدك، اللَّهم ما أحببت من خير فحبّبه إلينا، ويسره لنا، وما كرهت من شيء فكرهه إلينا، وجنبنا ولا تنزع عنا الإسلام بعد إذ أعطيتنا" انتهى ورجاله ثقات.

وفي معناه ما رُوي أيضا عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"خير الدّعاء دعاء يوم عرفة، وخير ما قلت أنا والنبيون من قبلي: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير".
رواه الترمذي (3585) عن أبي عمرو مسلم بن عمرو، حدثني عبد الله بن نافع، عن حماد بن أبي حميد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وحماد بن أبي حُميد هو محمد بن أبي حميد، وهو أبو إبراهيم الأنصاري المدني، ليس بالقوي عند أهل الحديث".

وقال الحافظ في"التقريب":"هو الأنصاريّ الزرقي، لقبه حماد، ضعيف".

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (6961).

وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 252):"رجاله موثقون" فهو ليس كما قال؛ فإنّ حماد بن أبي حميد ضعيف باتفاق أهل العلم، ولم يذكره ابن حبان في الثّقات.

وحديث عبد الله بن عمرو هذا مع ضعف فيه إذا ضمّ إلى مرسل طلحة بن عبيد الله قوي؛ لأنّ ابن عدي قال في حماد بن أبي حميد:"وهو مع ضعفه يكتب حديثه".

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن علي رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أكثر دعائي ودعاء الأنبياء قبلي بعرفة: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كلّ شيء قدير، اللَّهم! اجعل في قلبي نورًا، وفي سمعي نورًا، وفي بصري نورًا، اللهم! اشرح لي صدري ويسِّر لي أمري، أعوذ بك من وسواس الصدر، وفتنة القبر، وشتات الأمر، وأعوذ بك من شر ما يأتي في الليل والنهار، وما تهبُّ به الرياح".

رواه ابن عبد البر في"التمهيد" (6/ 39)، والبيهقي (5/ 117) كلاهما من طريق موسي بن عبيدة، عن أخيه عبد الله بن عبيدة، عن علي رضي الله عنه.

قال البيهقي: تفرد به موسي بن عبيدة وهو ضعيف، ولم يدرك أخوه عليًّا رضي الله عنه.

قلت: وهو كما قال، موسي بن عبيدة هذا هو الربذي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه.

وفي الباب أحاديث أخرى عن عمر، وابن عباس، وابن مسعود وغيرهم. ولا يسلم منها شيء من ضعيف أو مجهول أو من لا يحتج به. والصحيح في هذا الباب هو ما ذكرته.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আরাফার সন্ধ্যায় (বিকেলে) আমি এবং আমার পূর্ববর্তী নবীগণ যা বলেছি তার মধ্যে সর্বোত্তম হলো: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাই’ইন ক্বাদীর’।” (অর্থাৎ, আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ্ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং সমস্ত প্রশংসা তাঁরই। আর তিনি সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান।)









আল-জামি` আল-কামিল (4989)


4989 - عن أم الفضل بنت الحارث: أنّ ناسًا تماروا عندها يوم عرفة في صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال بعضُهم: هو صائم. وقال بعضهم: ليس بصائم، فأرسلتُ إليه بقَدَحِ لبنٍ -وهو واقف على بعيره- فشرب.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (132) عن أبي النّضر مولى عمر بن عبيد الله، عن عُمير مولي عبد الله بن عباس، عن أم الفضل، فذكرته.

ورواه البخاري في الحج (1661)، ومسلم في الصيام (1132: 110) كلاهما من طريق
مالك، به، مثله.

وأمّ الفضل اسمها لبابة بنت الحارث الهلالية أخت ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، وزوج العباس، قديمة الإسلام.




উম্মুল ফাদ্বল বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন আরাফার দিনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের রোযা রাখা নিয়ে কিছু লোক তাঁর কাছে বিতর্ক করছিল। তাদের কেউ বলছিল: তিনি রোযাদার। আবার কেউ বলছিল: তিনি রোযাদার নন। (বিতর্ক শুনে) আমি তখন তাঁর কাছে এক পেয়ালা দুধ পাঠালাম—এ সময় তিনি তাঁর উটের উপর দাঁড়ানো ছিলেন—অতঃপর তিনি তা পান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4990)


4990 - عن ميمونة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: إنّ الناس شكُّوا في صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، فأرسلتُ إليه بحلاب وهو واقف في الموقف، فشرب منه والناس ينظرون.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1989)، ومسلم في الصيام (1124) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو (هو ابن الحارث)، عن بكير (هو ابن عبد الله بن الأشج)، عن كريب مولي ابن عباس، عن ميمونة، فذكرته.




মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা আরাফার দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রোযা রাখা নিয়ে সন্দেহ করছিল, তাই আমি তাঁর কাছে একটি দুধের পাত্র (বা পেয়ালা) পাঠালাম, যখন তিনি (আরাফাতের) মাঠে (মওকিফে) দাঁড়িয়েছিলেন, তখন তিনি তা থেকে পান করলেন এবং লোকেরা তা দেখছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4991)


4991 - عن جابر بن عبد الله قال: ثم ركب رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أتى الموقف، فجعل بطن ناقته القصواء إلى الصّخرات، وجعل حَبْل المشاة بين يديه، واستقبل القبلة … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره بطوله في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সওয়ারীতে আরোহণ করলেন এবং মাওকিফ (দাঁড়ানোর স্থান)-এ আসলেন। তিনি তাঁর উটনী কাসওয়ার পেট পাথরের দিকে রাখলেন, পথচারীদের চলার পথকে তাঁর সামনে রাখলেন এবং কিবলামুখী হলেন... (বাকি হাদিসটুকু)।









আল-জামি` আল-কামিল (4992)


4992 - عن أسامة بن زيد قال: كنتُ رديف النبيّ صلى الله عليه وسلم بعرفات، فرفع يديه يدعو، فمالت به ناقته فسقط خطامُها، فتناول الخطام بإحدى يديه، وهو رافع يده الأخرى.

حسن: رواه النسائيّ (3011) عن يعقوب بن إبراهيم، عن هُشيم، قال: حدثنا عبد الملك، عن عطاء، قال: قال أسامة، فذكره.

ورواه أحمد (21821) وصحّحه ابن خزيمة (2824) كلاهما من حديث هشيم، به، مثله. وعطاء هو ابن أبي رباح اختلف في سماعه من أسامة بن زيد، فنفاه أبو حاتم كما في"تحفة التحصيل" (ص 229)، وأثبته ابن خزيمة كما في"صحيحه" (3006) قال فيه: حدّثني أسامة بن زيد.

والأصل في هذا الحديث أنه عن عطاء، عن ابن عباس، عن أسامة بن زيد إلا أنّ عبد الملك ابن أبي سليمان أخطأ فحذف الواسطة لأنه وصف بأنّ له أوهامًا، فروى عددًا من الأحاديث عن عطاء، عن أسامة بن زيد.

انظر مسند أحمد (21822، 21823). ولذا أخرج أصحاب الصحاح هذا الحديث وغيره من هذا الطريق، منهم: ضياء الدين المقدسيّ في"المختارة" (1335) من طريق هُشيم.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আরাফাতের ময়দানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে (একই বাহনে) আরোহণ করে ছিলাম। তিনি দু'হাত তুলে দু'আ করছিলেন। তখন তাঁর উটনিটি একদিকে ঝুঁকে গেল এবং তার লাগাম (নাকের দড়ি) নিচে পড়ে গেল। তিনি তাঁর এক হাত দ্বারা লাগামটি তুলে নিলেন, অথচ তাঁর অপর হাতটি তখনও (দু’আর জন্য) উত্তোলিত ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4993)


4993 - عن أم الفضل بنت الحارث: أنّ ناسًا تماروا عندها يوم عرفة في صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال بعضُهم: هو صائم. وقال بعضهم: ليس بصائم، فأرسلتُ إليه بقَدَحِ لبنٍ -وهو واقف على بعيره- فشرب.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (132) عن أبي النّضر مولي عمر بن عبيد الله، عن عُمير مولي عبد الله بن عباس، عن أم الفضل، فذكرته.

ورواه البخاري في الحج (1661)، ومسلم في الصيام (1123: 110) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই কিছু লোক তাঁর (উম্মুল ফাদলের) কাছে আরাফার দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রোজা রাখা নিয়ে বিতর্ক করছিল। তাদের কেউ কেউ বলছিল: তিনি রোযা রেখেছেন। আর কেউ কেউ বলছিল: তিনি রোযা রাখেননি। অতঃপর তিনি (উম্মুল ফাদল) তাঁর কাছে এক পাত্র দুধ পাঠালেন—যখন তিনি তাঁর উটের ওপর দাঁড়িয়ে ছিলেন—তখন তিনি তা পান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4994)


4994 - عن جابر بن عبد الله قال: فلم يزل (يعني النبيَّ صلى الله عليه وسلم" واقفًا حتّى غربت الشّمس، وذهبت الصُّفرة قليلا حتى غاب القرْص … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره بطوله في حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

الوقوف المجزئ أن يكون بعد الزوال إلى الغروب كما ثبت ذلك من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তিনি (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে থাকলেন, যতক্ষণ না সূর্য অস্তমিত হলো এবং (আলোর) হলদে ভাব কিছুটা দূর হলো, যতক্ষণ না সূর্যের চাকতি (সম্পূর্ণরূপে) অদৃশ্য হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (4995)


4995 - عن علي بن أبي طالب قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة ثم أفاض حين غابت الشمس، وأردف أسامة بن زيد.

حسن: رواه أبو داود (1922، 1935)، والترمذي (885)، وابن ماجه (3010)، وصححه ابن خزيمة (2837) -واللّفظ له- كلّهم من حديث سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي، فذكره في حديث طويل كما ذكره الترمذيّ -ومضى قريبًا- وغيره رواه مختصرًا، واللفظ هنا لابن خزيمة الذي اختصره في هذا الجزء الخاص بالإفاضة من عرفة.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث بن عياش غير أنه حسن الحديث.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফাতে অবস্থান করলেন। অতঃপর যখন সূর্য ডুবে গেল, তিনি (সেখান থেকে) রওয়ানা হলেন এবং উসামাহ ইবনু যায়িদকে তাঁর পিছনে সওয়ারী করে নিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4996)


4996 - عن أسامة، قال: كنتُ رِدْف النبيّ صلى الله عليه وسلم فلما وقعت الشمس دفع رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (1924) عن أحمد بن حنبل، حدثنا يعقوب، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني إبراهيم بن عقبة، عن كريب مولي عبد الله بن عباس، عن أسامة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرّح بالتحديث.




উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পিছনে সওয়ার ছিলাম। অতঃপর যখন সূর্য অস্তমিত হলো, তখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যাত্রা শুরু করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4997)


4997 - عن عروة بن مضرس الطائي قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بالموقف -يعني بجمع
- قلت: جئت يا رسول الله من جبل طي أكلَلْتُ مطيتي وأتعبت نفسي، والله ما تركت من حبل إلا وقفتُ عليه! فهل لي من حج؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك معنا هذه الصّلاة، وأتي عرفات قبل ذلك ليلًا أو نهارًا فقد تم حجُّه وقضي تفثه".

صحيح: رواه أبو داود (1950)، والترمذي (891)، والنسائي (3039)، وابن ماجه (3016) كلّهم من طريق إسماعيل بن أبي خالد، حدّثنا عامر الشعبيّ، عن عروة بن مضرّس، فذكر الحديث.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح". والحديث تقدم في باب وجوب الوقوف بعرفة.

وقد استدل الإمامُ أحمد وغيره بحديث عروة بن مضرس على أن وقت الوقوف من حين طلوع الفجر من يوم عرفة إلى طلوع الفجر من ليلة النحر، وسوّي بين أجزاء النهار وأجزاء الليل.

وقد نقل شيخ الإسلام ابن تيمية عن أكثر الحنابلة مثل أبي بكر، وابن أبي موسى، وابن حامد، والقاضي وأصحابه قالوا: لو وقف بعرفة يوم عرفة قبل الزوال ونفر منها قبل الزوال أساء وحجّه تام، وعليه الدّم.

وأما قول مالك:"أن من دفع قبل الغروب فلا حج له".

فقد قال ابن عبد البر في"التمهيد" (10/ 21):"ولا نعلم أحدًا من فقهاء الأمصار قال بقول مالك، وهو قد وقف بعد الزوال وبعد الصلاة، ولا روينا عن أحد من السلف؛ فإنّ سائر العلماء قالوا: كلّ من وقف بعرفة بعد الزوال أو في ليلة النحر فقد أدرك الحج، فإن دفع قبل غروب الشمس من عرفة فعليه دم عندهم، وحجّه تام".




উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস আত-ত্বাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অবস্থানস্থলে—অর্থাৎ মুযদালিফায়—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি ত্বাই পাহাড় থেকে এসেছি। আমার উটকে আমি ক্লান্ত করে ফেলেছি এবং নিজেকে পরিশ্রান্ত করেছি। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো পর্বতমালা/পাহাড়ের পথ বাকি রাখিনি যেখানে আমি দাঁড়াইনি! আমার কি তবে হজ্জ হবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাত (ফজরের সালাত) আদায় করল, আর এর পূর্বে দিনে বা রাতে আরাফাতে উপস্থিত হলো, তার হজ্জ পূর্ণ হয়ে গেল এবং সে তার অপরিহার্য কাজ (ইহরামের কারণে সৃষ্ট ময়লা দূরীকরণ) শেষ করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (4998)


4998 - عن عروة بن الزبير، أنه قال: سُئل أسامة بن زيد وأنا جالسٌ معه: كيف كان يسير رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع حين دفع؟ قال: كان يسير العَنَق، فإذا وجد فجوةً نصَّ.

قال مالك: قال هشام: والنَّصُّ فوق العَنَق.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (176) عن هشام بن عروة، عن أبيه، فذكره. ورواه البخاريّ في الحج (1666) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله.

ورواه مسلم في الحجّ (1286: 283، 284) من طرق، عن هشام بن عروة، به، بلفظ:"كيف كان يسير رسول الله صلى الله عليه وسلم حين أفاض من عرفة؟" فذكره.

قوله:"العنَق" بفتح المهملة والنون هو السير الذي بين الإبطاء والإسراع.

وقوله:"نصَّ" أي أسرع، وأصل النّص غاية المشي، ومنه نصصت الشيء رفعته، ثم استعمل في ضرب سريع من السير. انظر الفتح (3/ 518).




উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসা ছিলাম। তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রওয়ানা হচ্ছিলেন, তখন তিনি কীভাবে চলছিলেন? তিনি বললেন: তিনি আল-আনাক (স্বচ্ছন্দ, অর্থাৎ ধীর ও দ্রুতের মাঝামাঝি) গতিতে চলতেন। অতঃপর যখন তিনি খালি জায়গা পেতেন, তখন দ্রুতবেগে চলতেন (নাস্ করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (4999)


4999 - عن ابن عباس، أنه دفع مع النبيّ صلى الله عليه وسلم يوم عرفة فسمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم وراءه زَجْرًا شديدًا، وضرْبًا وصوْتًا للإبل، فأشار بسوطه إليهم وقال:"أيُّها الناسُ، عليكم بالسّكينة، فإنّ البرَّ ليس بالإيضاع".

صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1671) عن سعيد بن أبي مريم، حدّثنا إبراهيم بن سويد، حدثني عمرو بن أبي عمرو مولى المطّلب، أخبرني سعيد بن جبير مولى والبة الكوفي، حدثني ابن عباس، فذكره.

قوله:"فإنّ البرّ ليس بالإيضاع" أي ليس بالسّير السريع، فبيّن صلى الله عليه وسلم أن تكلّف الإسراع في السير ليس من البر أي مما يتقرّب به. انظر: الفتح (3/ 522).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আরাফার দিনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (আরাফাত থেকে) অগ্রসর হচ্ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পিছনে কঠোর ধমক, প্রহার এবং উটগুলোর উচ্চ শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি চাবুক দিয়ে তাদের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন, "হে লোক সকল! তোমরা ধীর-স্থিরতা অবলম্বন করো, কেননা দ্রুত গতিতে চলার মধ্যে কোনো পুণ্য নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5000)


5000 - عن جابر بن عبد الله قال: ودفع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد شنق للقصواء الزّمام، حتى إنَّ رأسَها ليصيبُ موركَ رحله ويقول بيده اليمني:"أيها الناس، السّكينةَ السّكينة" الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر بطوله في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রওনা হলেন, এমতাবস্থায় তিনি তাঁর (উটনী) কাসওয়া'র লাগাম শক্তভাবে ধরে রেখেছিলেন, এমনকি তার মাথা তাঁর হাওদার পশ্চাদ্ভাগের সাথে আঘাত করছিল। আর তিনি তাঁর ডান হাত দিয়ে বলছিলেন: "হে লোকসকল, শান্তভাবে, শান্তভাবে (চলো)।" (এ হলো দীর্ঘ হাদীসের অংশ)।









আল-জামি` আল-কামিল (5001)


5001 - عن الفضل بن عباس -وكان رديفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم- أنه قال في عشية عرفة وغداة جمع للناس حين دفعوا:"عليكم بالسّكينة" وهو كافٌّ ناقته.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1283) من طريق أبي الزبير عن أبي معبد مولى ابن عباس، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، به.




ফযল ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সওয়ার (আরোহী) ছিলেন—তিনি আরাফার সন্ধ্যায় এবং জামা'র (মুযদালিফার) সকালে, যখন লোকেরা রওয়ানা হচ্ছিল, তাদের উদ্দেশ্যে বললেন: "তোমরা অবশ্যই শান্ত ও ধীরস্থির থাকবে।" এই সময় তিনি তাঁর উটনীকে টেনে ধরে রাখছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5002)


5002 - عن ابن عباس، أنّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أفاض من عرفة، وأسامة ردفُه. قال أسامة: فما زال يسيرُ على هيئته حتى أتى جمعًا.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1286: 282) من طريق يزيد بن هارون، أخبرنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.

قوله:"على هيئته" أي على عادته في السكون والرفق.

وفي هذه الأحاديث بيان لكيفية سيره صلى الله عليه وسلم عند الدّفع من عرفة إلى مزدلفة وأنه في رفق وسكينة لا سيما في حال الزّحام، لكن إذا وجد فرجة واتساعًا في الطريق أسرع.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাহ থেকে (মুযদালিফার দিকে) যাত্রা শুরু করলেন, আর উসামা তাঁর পিছনে আরোহণকারী ছিলেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি তাঁর স্বাভাবিক ধীরস্থির গতিতে চলতে থাকলেন, অবশেষে মুযদালিফায় পৌঁছলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5003)


5003 - عن أسامة أنّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أفاض من عرفة، ورديفه أسامة. فجعل يكبح راحلته حتى إن ذفراها لتكاد أن تمس -وربما قال حماد: أن تصيب- قادمة الرحل. وهو يقول:"يا أيها الناس عليكم بالسكينة والوقار، فإن البر ليس في إيضاع الإبل".

صحيح: رواه النسائي (3018) وأحمد (21756) والبيهقي (5/ 119) كلهم من طرق عن حماد بن
سلمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء، عن ابن عباس، عن أسامة بن زيد، قال: فذكره. وإسناده صحيح.




উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করছিলেন, আর উসামা ছিলেন তাঁর পেছনে আরোহী। অতঃপর তিনি তাঁর বাহনটিকে নিয়ন্ত্রণ করছিলেন এমনভাবে যে, বাহনটির গলা বা ঘাড়ের নরম অংশ সামনের হাওদার কাঠকে প্রায় ছুঁয়ে দিচ্ছিল—আর (বর্ণনাকারী) হাম্মাদ কখনও বলেছেন: প্রায় স্পর্শ করছিল। আর তিনি বলছিলেন: “হে মানবসকল! তোমাদের উচিত শান্ত ও ধীরস্থির থাকা। কারণ, দ্রুত উট চালানোতে কোনো পুণ্য নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (5004)


5004 - عن علي بن أبي طالب، قال: ثم أردف أسامة، فجعل يعنق على ناقته، والناس يضربون الإبل يمينًا وشمالًا لا يلتفت إليهم ويقول:"السكينة أيها الناس"، ودفع حين غابت الشمس.

حسن: رواه أبو داود (1922)، والترمذيّ (885) كلاهما من حديث سفيان، عن عبد الرحمن ابن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

واللفظ لأبي داود. وأما الترمذي فذكره في سياق طويل.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث إلا أنه حسن الحديث.

وقوله:"لا يلتفت إليهم" هكذا في سنن أبي داود عن الإمام أحمد وهو في مسنده (1348) عن يحيي بن آدم، حدثنا سفيان بإسناده.

ولكن رواه هو نفسه (562)، والترمذي من حديث أبي أحمد محمد بن عبد الله بن الزبير، عن سفيان، فقال فيه:"يلتفت إليهم ويقول: السّكينة …" وهذا هو الصحيح بدون"لا" النافية؛ لأن المعنى لا يستقيم بإثباتها، فالظاهر أن يحيي بن آدم أخطأ فيه، فذكر فيه"لا يلتفت".

والبيهقيّ (5/ 122) أيضًا ممن وهم في إثبات"لا" النافية في رواية محمد بن عبد الله الزبيري الأسدي، والصواب بدونها.

قال محبّ الدّين الطّبريّ في"القرى" (ص 414) قال بعضهم: رواية من روي"يلتفت إليهم" بإسقاط"لا" أصح، فإنه كان ينظر إليهم، وهم يضربون الإبل، يشير إليهم يمينًا وشمالًا:"السّكينة السّكينة".




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর (নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সওয়ারীতে নিজের পিছনে বসালেন। তিনি নিজের উটনীর লাগাম ধরে দ্রুত চলছিলেন। লোকেরা ডানে-বামে তাদের উটগুলোকে মারছিল। তিনি তাদের দিকে ফিরে না তাকিয়ে বলছিলেন: "হে লোক সকল! শান্ত হও।" আর তিনি সূর্য ডুবে যাওয়ার পর (আরাফাহ থেকে) প্রস্থান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5005)


5005 - عن عبد الله بن عمر: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلّي المغرب والعشاء بالمزدلفة جميعًا.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (196) عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (703: 286) من طريقه مالك، ورواه البخاري في الحج (1673) من وجه آخر عن سالم نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযদালিফায় মাগরিব ও এশার সালাত একত্রে আদায় করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5006)


5006 - عن أبي أيوب الأنصاريّ، أنّه صلّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع المغرب والعشاء بالمزدلفة جميعًا.

متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (198) عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، عن عدي بن ثابت الأنصاريّ، أنّ عبد الله بن يزيد الخطمي أخبره، أنّ أبا أيوب الأنصاريّ أخبره، فذكره.

ورواه البخاريّ في المغازي (4414) عن القعنبيّ، عن مالك، به، مثله.
ورواه أيضًا في الحج (1674) هو ومسلم في الحجّ (1287) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، حدثنا يحيى بن سعيد، به، نحوه.




আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জের সময় মুযদালিফায় মাগরিব ও ইশার সালাত একত্রে আদায় করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5007)


5007 - عن أسامة بن زيد، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما أفاض من عرفة عدل إلى الشعب، فقضى حاجته. قال أسامة بن زيد: فجعلت أصب عليه ويتوضأ. فقلت: يا رسول الله، أتصلي؟ فقال:"المصلي أمامك".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (181) ومسلم في الحج (1280) كلاهما من حديث كريب مولى ابن عباس، عن أسامة بن زيد، فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم أطول.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফা থেকে (মুযদালিফার দিকে) রওনা হলেন, তখন তিনি একটি গিরিপথের দিকে গেলেন এবং প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারলেন। উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁর উপর পানি ঢালতে থাকলাম এবং তিনি ওযু করছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি কি সালাত পড়বেন? তিনি বললেন: "সালাতের স্থান তোমার সামনেই।"