আল-জামি` আল-কামিল
5028 - عن عائشة أنها قالت: استأذنتْ سودةُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ليلة المزدلفة تدفع قبله وقبل حَطْمَة النّاسِ -وكانت امرأةً ثَبِطةً (يقول القاسم: والثَّبطةُ الثَّقيلة) قال: فأذن لها فخرجت قبل دفعه، وحَبَسَنا حتى أصبحنا فدفعنا بدفعه.
ولأَنْ أكُونَ استأذنتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم كما استأذَنْتُهُ سودةُ فأكونَ أدفعُ بإذنه أحبُّ إليَّ من مَفْرُوحٍ به.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1681)، ومسلم في الحج (1290: 293) كلاهما من طريق أفلح بن حميد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. واللفظ لمسلم.
قوله:"قبل حطمة الناس" أي قبل أن يزدحموا ويحطم بعضهم بعضًا.
قوله:"ثبطة" بفتح المثلثة وكسر الموحدة بعدها مهملة خفيفة - أي بطيئة الحركة.
قوله:"مفروح به" أي ما يفرح به من كلِّ شيء.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুযদালিফার রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট অনুমতি চাইলেন, যাতে তিনি (ফজরের) আগে এবং মানুষের ভিড়ের পূর্বে (মিনা অভিমুখে) রওনা হতে পারেন। তিনি ছিলেন একজন স্থূলাঙ্গী (বা ধীরগতিসম্পন্ন) নারী। (আল-কাসিম বলেন: থাবিতা মানে ভারী মহিলা)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে অনুমতি দিলেন। অতঃপর তিনি (সাওদা) তাঁর রওনা হওয়ার আগেই বের হয়ে গেলেন। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ধরে রাখলেন (বা অপেক্ষা করালেন) যতক্ষণ না আমরা সকালে পৌঁছালাম। অতঃপর আমরা তাঁর রওনা হওয়ার সাথে সাথে রওনা হলাম।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরো বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চেয়েছিলেন, আমিও যদি তাঁর নিকট সেভাবে অনুমতি চাইতাম এবং তাঁর অনুমতিতে (আগে) রওনা হতাম, তবে তা আমার নিকট এমন কিছু পাওয়ার চেয়েও অধিক প্রিয় হতো, যা আনন্দের কারণ হয়।
5029 - عن ابن عباس، قال: أنا ممن قدَّم النبيُّ صلى الله عليه وسلم ليلة المزدلفة في ضعفة أهله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1678)، ومسلم في الحج (1293) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، حدّثنا عبد الله بن أبي يزيد، أنه سمع ابن عباس يقول (فذكره). واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه.
ورواه البخاريّ أيضًا في جزاء الصيد (1856)، ومسلم (الموضع نفسه) كلاهما من طريق حماد ابن زيد، عن عبيد الله بن أبي يزيد، به، نحوه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম যাদেরকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযদালিফার রাতে তাঁর পরিবারের দুর্বল লোকদের সাথে (মিনা অভিমুখে) আগে পাঠিয়ে দিয়েছিলেন।
5030 - عن عطاء، عن ابن عباس، قال: بعث بي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بسحر من جمع في ثَقَل نبيِّ الله صلى الله عليه وسلم.
قلت: أبلغك أن ابن عباس قال: بعث بي بليل طويل؟ قال: لا. إلّا كذلك، بسحر. قلت له: فقال ابن عباس: رمينا الجمرة قبل الفجر؟ وأين صلَّى الفجر؟ قال: لا، إلّا كذلك.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1294) عن عبد بن حميد، أخبرنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، أخبرني عطاء (هو ابن أبي رباح)، أنّ ابن عباس قال (فذكره).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে মুযদালিফা থেকে সাহারীর সময় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের ভারবহনকারী কাফেলার সাথে পাঠিয়েছিলেন।
(বর্ণনাকারী আতা’কে) আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আপনার কাছে কি এই মর্মে বর্ণনা পৌঁছেছে যে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমাকে দীর্ঘ রাতের বেলায় পাঠিয়েছিলেন? তিনি বললেন: না, কেবল এমনই, সাহারীর সময়। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম: ইবনে আব্বাস কি বলেছিলেন, আমরা ফজরের আগে জামারায় কংকর নিক্ষেপ করেছিলাম? আর তিনি (নবী) ফজর কোথায় আদায় করেছিলেন? তিনি বললেন: না, শুধু এইটুকুই।
5031 - عن سالم بن شوَّال -مولى أمِّ حبيبة- أنه دخل على أمِّ حبيبة فأخبرتْه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث بها من جمع بليل.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1292) من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أنّ ابن شوّال أخبره، فذكره.
ثم رواه من طريق عمرو بن دينار، عن سالم بن شوال، عن أم حبيبة قالت:"كنا نفعله على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم نغلّس من جمع إلى مني".
وفي رواية عنده:"نغلّس من مزدلفة".
উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তাঁর আযাদকৃত গোলাম সালিম ইবনে শাওয়াল তাঁর নিকট প্রবেশ করলে তিনি তাকে জানান যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে রাতের বেলা ‘জাম’ (মুযদালিফা) থেকে পাঠিয়ে দিয়েছিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এমনটিই করতাম— আমরা ‘জাম’ (মুযদালিফা) থেকে মিনায় ভোরের অন্ধকারে রওনা হতাম। (তাঁরই নিকট অন্য এক বর্ণনায় ‘মুযদালিফা’ শব্দটি এসেছে)।
5032 - عن الفضل: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمر ضعفة بني هاشم أن ينفروا من جمع بليل.
حسن: رواه النسائيّ (3037) عن أبي داود قال: حدثنا أبو عاصم وعفان وسليمان، عن شعبة، عن مشاش، عن عطاء، عن ابن عباس، عن الفضل، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (1811)، وأبو يعلى (6734) كلاهما من طريق عفان، عن شعبة، بهذا الإسناد، مثله.
وإسناده حسن من أجل مُشاش وهو أبو ساسان أو أبو الأزهر السلميّ، وثّقه ابن معين. وقال أبو حاتم: صالح الحديث، وقال أبو زرعة: ليس به بأس. فمثله يحسّن حديثه.
إلّا أن الترمذيّ (893) علّله بأنّ شعبة روى هذا الحديث عن مشاش، عن عطاء، عن ابن عباس. وهذا خطأ؛ أخطأ فيه مُشَّاش وزاد فيه:"عن الفضل بن عباس". وروى ابن جريج وغيره هذا الحديث عن عطاء، عن ابن عباس، ولم يذكروا فيه (عن الفضل بن عباس). ومشاش بصريّ وروي عنه شعبة" انتهى.
قلت: لا يبعد عن أن يروي عطاء هذا الحديث عن وجهين، وشعبة إمام في الحديث وأعرف الناس بمشاش، وروايته عنه تقوي هذا الجانب، فلا يحتاج إلى تخطئة مشاش.
আল-ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু হাশিমের দুর্বল লোকদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলেন যে, তারা যেন রাত থাকতেই জাম' (মুযদালিফা) থেকে প্রস্থান করে।
5033 - عن عبد الله بن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أذن لضعفة الناس من المزدلفة بليل.
صحيح: رواه أحمد (4892) والنسائي في الكبرى (4037) كلاهما من حديث عبد الرزاق، قال: أخبرنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده صحيح.
আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুর্বল প্রকৃতির লোকদেরকে রাতের বেলায় মুযদালিফা থেকে (মিনা অভিমুখে) চলে যাওয়ার অনুমতি দিয়েছিলেন।
5034 - عن جابر، قال: رمي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الجمرة يوم النّحر ضُحًى، وأمّا بعد فإذا زالت الشمس.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1299: 314) من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول (فذكره).
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানীর দিন (ঈদের দিন) পূর্বাহ্ণে (চাশতের সময়) জামারায় কঙ্কর নিক্ষেপ করেছিলেন, কিন্তু এরপর (আইয়ামে তাশরীকের দিনগুলোতে), সূর্য ঢলে যাওয়ার পর (যাওয়ালের পর) করতেন।
5035 - عن أمّ الحصين، قالت: حججتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حجّة الوداع، فرأيتُ أسامة وبلالًا، وأحدهما آخذٌ بخطام ناقة النبيّ صلى الله عليه وسلم، والآخر رافع ثوبه يستره من الحرِّ حتى رمي جمرة العقبة.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1298: 312) من طريق زيد بن أبي أنيسة، عن يحيى بن الحصين، عن أمّ الحصين جدّته، قالت (فذكره).
উম্মুল হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জ আদায় করেছিলাম। তখন আমি উসামা ও বিলালকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলাম, তাদের একজন ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটের লাগাম ধরে, আর অন্যজন গরম থেকে তাঁকে রক্ষা করার জন্য তাঁর কাপড় উঁচু করে ধরে রেখেছিলেন, যতক্ষণ না তিনি জামরাতুল আকাবায় কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন।
5036 - عن عبد الله مولي أسماء، قال: قالت لي أسماء -وهي عند دار المزدلفة-: هل غاب القمر؟ قلت: لا، فصلّت ساعة، ثم قالت: يا بُنيَّ! هل غاب القمرُ؟ قلت: نعم. قالت: ارْحل بي. فارْتحلنا حتى رمت الجمرةَ، ثم صلَّتْ في منزلها. فقلتُ لها: أيْ هَنَتاهُ، لقد غلّسنا! قالت: كلا أيْ بُنيّ إنَّ النَّبي صلى الله عليه وسلم أذِن للظُعُن.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1679)، ومسلم في الحج (1291) كلاهما من طريق يحبي القطان، عن ابن جريج، قال: حدّثني عبد الله مولى أسماء. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আযাদকৃত গোলাম আব্দুল্লাহ বলেন, আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুযদালিফার ঘরের কাছে থাকাবস্থায় আমাকে বললেন: চাঁদ কি ডুবে গেছে? আমি বললাম: না। অতঃপর তিনি কিছুক্ষণ সালাত আদায় করলেন। এরপর বললেন: হে আমার বৎস! চাঁদ কি ডুবে গেছে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমাকে নিয়ে যাত্রা শুরু করো। অতঃপর আমরা যাত্রা করলাম, যতক্ষণ না তিনি জামারায় কংকর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি তার ঘরে (তাঁবুতে) সালাত আদায় করলেন। তখন আমি তাকে বললাম: হে শ্রদ্ধেয় নারী, আমরা তো খুব ভোরে (অন্ধকার থাকতেই) রওনা হয়ে গেলাম! তিনি বললেন: না, হে আমার বৎস! নিশ্চয়ই নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুর্বলদের (বা নারীদের) জন্য এর অনুমতি দিয়েছেন।
5037 - عن ابن شهاب، أنّ سالم بن عبد الله أخبره: أنّ عبد الله بن عمر كان يقدِّمُ ضَعَفَةَ أهله، فيقفون عند المشعر الحرام بالمزدلفة بالليل فيذكرون الله ما بدا لهم، ثم يدفعون قبل أن يقف الإمام، وقبل أن يدفعَ. فمنهم مَنْ يقدَمُ مِنًى لصلاة الفجر، ومنهم مَنْ يَقْدَمُ بعد ذلك، فإذا قَدِمُوا رَمَوا الجمْرةَ.
وكان ابنُ عمر يقول: أرخصَ في أولئك رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1676)، ومسلم في الحج (1295) كلاهما من طريق يونس (هو ابن يزيد الأيلي)، عن ابن شهاب الزهريّ، به. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পরিবারের দুর্বল লোকদেরকে আগে পাঠিয়ে দিতেন। তারা রাতের বেলায় মুযদালিফায় মাশ‘আরুল হারামের কাছে অবস্থান করত এবং যতক্ষণ ইচ্ছা আল্লাহ্র যিকির করত। অতঃপর ইমাম (রাষ্ট্রপ্রধান বা দলনেতা) সেখানে অবস্থান করার পূর্বেই এবং তিনি (ইমাম) সেখান থেকে রওনা হওয়ার পূর্বেই তারা রওনা হয়ে যেত। তাদের মধ্যে কেউ কেউ ফজরের সালাতের জন্য মিনায় পৌঁছত, আবার কেউ কেউ এর পরে পৌঁছত। যখনই তারা পৌঁছত, তখনই তারা জামরায় (পাথর) নিক্ষেপ করত। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য এই ছাড় দিয়েছেন।
5038 - عن ابن عباس، قال: أرسلني رسول الله صلى الله عليه وسلم في ضعفة أهله، فصلينا الصّبح بمني ورمينا الجمرة.
صحيح: رواه النسائيّ (3048) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن أشهب، أنّ داود بن عبد الرحمن حدّثهم، أنّ عمرو بن دينار حدّثه، أنّ عطاء بن أبي رباح حدّثهم أنّه سمع ابن عباس يقول (فذكره).
وإسناده صحيح. وأشهب هو ابن عبد العزيز بن داود القيسيّ"ثقة فقيه".
ورواه أحمد (2460) عن حسين، عن داود - يعني العطار بإسناده، مثله.
وفي معناه ما رُويَ عن عائشة أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر إحدى نسائه أن تنفر من جمع ليلة جمع، فتأتي جمرة العقبة فترميها، وتُصبح في منزلها.
رواه النسائيّ (3066) من حديث عبد الله بن عبد الرحمن الطائفيّ، عن عطاء بن أبي رباح، قال: حدّثتني عائشة بنت طلحة، عن خالتها عائشة أمّ المؤمنين، فذكرته، وكان عطاء يفعله حتى مات.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا البخاريّ في التاريخ الصغير (1/ 296) وقال:"والمرأة هي سودة أم المؤمنين".
وفيه عبد الله بن عبد الرحمن الطائفيّ الثقفيّ. قال أبو حاتم: ليس بقوي، لين الحديث. وقال النسائيّ: ليس بذاك.
وأما ما رُوي عن عائشة أيضًا أنها قالت:"أرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم بأمّ سلمة ليلة النّحر فرمت الجمرة قبل الفجر، ثم مضتْ فأفاضتْ. وكان ذلك اليوم الذي يكون رسول الله صلى الله عليه وسلم عندها" فظاهره السّلامة! ولكن فيه علّة خفية وهي النكارة.
رواه أبو داود (1942) عن هارون بن عبد الله، حدّثنا ابن أبي فديك، عن الضحاك -يعني ابن عثمان-، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. وصحّحه الحاكم (1/ 469) على شرطهما.
ورواه البيهقيّ (5/ 133) من وجه آخر عن ابن أبي فديك، بإسناده وقال:"رواه أبو داود عن هارون بن عبد الله".
وقال في المعرفة (4/ 127):"هذا إسناد صحيح لا غبار عليه".
قلت: إسناده حسن من أجل ابن أبي فديك وهو محمد بن إسماعيل بن مسلم بن أبي فديك، وهو"صدوق".
رواه أبو داود هكذا مختصرًا، وقد عُلم من الروايات الأخرى أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أمرها أن توافي صلاة الصبح يوم النّحر بمكة.
رواه البيهقي (5/ 133) من طريق أبي معاوية الضرير، عن هشام، عن عروة، عن أبيه، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمرها، فذكرته.
قال البيهقيّ بعد أن روى عن الشّافعيّ روايتين فيهما، قال الشّافعيّ: أخبرني من أثق به:"كأن الشّافعيّ رحمه الله أخذه من أبي معاوية الضّرير، وقد رواه أبو معاوية موصولًا".
قلت: وهذا يخالف الواقع، فإن النبيّ صلى الله عليه وسلم يوم النحر في صلاة الصبح كان بالمزدلفة، ولم يكن بمكة حتى توافيه أمُّ سلمة؛ ولهذا أنكره الإمام أحمد وضعّفه، كما نقله الحافظ ابن القيم في تهذيب السنن عن ابن عبد البر فإنه لا يمكن أن توافي معه صلاة الصبح بمكة.
وبهذه الأحاديث رأى البخاريّ أنّ ما رواه الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا ترموا الجمرة حتى تطلع الشمس". أنه مضطرب لما وصفنا، ولا ندري الحكم سمع هذا من مقسم أم لا؟ . ذكره في التاريخ الصغير (1/ 295).
وإلى هذه الأحاديث ذهب الشافعيّ والإمام أحمد في رواية إلى جواز الرّمي قبل طلوع الشمس لمن ارتحل من الضعفة والنساء من المزدلفة بعد نصف الليل.
وأما حديث ابن عباس الذي حكم عليه البخاريّ بالاضطراب فله طرق كثيرة يعضد بعضها بعضًا كما هو الآتي.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে তাঁর পরিবারের দুর্বলদের সাথে (আগে) পাঠিয়েছিলেন। তাই আমরা মিনায় ফজরের সালাত আদায় করলাম এবং জামরায় কংকর নিক্ষেপ করলাম।
সহীহ: এটি নাসাঈ (৩০৪৮) মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল হাকাম সূত্রে, তিনি আশহাব সূত্রে, তিনি দাঊদ ইবনু আবদির রাহমান সূত্রে, তিনি আমর ইবনু দীনার সূত্রে, তিনি আতা ইবনু আবী রাবাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি ইবনু আব্বাসকে বলতে শুনেছেন (তিনি এটি বর্ণনা করেছেন)। এর সনদ সহীহ। আর আশহাব হলেন ইবনু আব্দুল আযীয ইবনু দাঊদ আল-ক্বায়সী, যিনি ‘ছিকাহ ফক্বীহ’ (নির্ভরযোগ্য ফক্বীহ)। এটি আহমাদও (২৪৬০) হুসাইন সূত্রে, দাঊদ —অর্থাৎ আল-আত্তার— থেকে একইরূপ বর্ণনা করেছেন।
এর সমর্থনে আরও বর্ণিত হয়েছে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর স্ত্রীদের একজনকে আদেশ করলেন যে তিনি যেন জাম‘ (মুযদালিফা) থেকে জাম‘আর রাতে (অর্থাৎ ঈদুল আযহার রাতে) প্রস্থান করেন, জামরাতুল আকাবায় এসে কংকর নিক্ষেপ করেন এবং সকালে তাঁর নিজ আবাসে ফিরে যান।
এটি নাসাঈ (৩০৬৬) আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান আত-তায়েফী সূত্রে, আতা ইবনু আবী রাবাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: 'আয়েশা বিনত তালহা আমার কাছে তাঁর খালা উম্মুল মু'মিনীন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন,' অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) মৃত্যু পর্যন্ত এটি করতেন। এই সূত্র ধরে বুখারীও তাঁর ‘আত-তারীখ আস-সগীর’ (১/২৯৬)-এ বর্ণনা করেছেন এবং তিনি বলেছেন: "আর সেই স্ত্রী হলেন উম্মুল মু'মিনীন সাওদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।"
এতে আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান আত-তায়েফী আস-সাকাফী রয়েছেন। আবু হাতিম বলেছেন: সে ততটা শক্তিশালী নয়, তার হাদীসে দুর্বলতা আছে। নাসাঈ বলেছেন: সে তেমন উল্লেখযোগ্য নয়।
আর যা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুরবানীর রাতে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (আগে) পাঠিয়েছিলেন। তিনি ফজরের পূর্বে জামরায় কংকর নিক্ষেপ করলেন, অতঃপর চলে গেলেন এবং তাওয়াফে ইফাদা করলেন। সেদিনটি এমন ছিল যেদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কাছে অবস্থান করতেন।" এটির বাহ্যিক দৃষ্টিতে কোনো সমস্যা নেই! কিন্তু এর মধ্যে একটি গোপন ত্রুটি রয়েছে, আর তা হলো এটি মুনকার (অস্বীকৃত)।
এটি আবূ দাউদ (১৯৪২) হারুন ইবনু আব্দুল্লাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। হাকেমও (১/৪৬৯) তাঁদের (শাইখাইন) শর্তানুসারে এটিকে সহীহ বলেছেন। বাইহাকীও (৫/১৩৩) ইবনু আবী ফুদাইক থেকে অন্য সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: "আবূ দাউদ এটিকে হারুন ইবনু আব্দুল্লাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন।" এবং 'আল-মা'রিফা' (৪/১২৭)-এ বলেছেন: "এর সনদ সহীহ, এতে কোনো দোষ নেই।" আমি (আলবানী) বলি: ইবনু আবী ফুদাইকের কারণে এর সনদ হাসান। তিনি মুহাম্মদ ইবনু ইসমাঈল ইবনু মুসলিম ইবনু আবী ফুদাইক, আর তিনি 'সাদুক' (সত্যবাদী)।
আবূ দাউদ এভাবে সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন। অন্যান্য রিওয়ায়াত দ্বারা জানা যায় যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে (উম্মু সালামাহকে) কুরবানীর দিন মক্কায় ফজরের সালাতের জন্য উপস্থিত থাকতে নির্দেশ দিয়েছিলেন। বাইহাকী (৫/১৩৩) আবূ মু'আবিয়াহ আদ্-দ্বা'রীর সূত্রে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে নির্দেশ দিলেন, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। বাইহাকী শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর থেকে দুটি রিওয়ায়াত বর্ণনা করার পর বলেন: শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যার প্রতি আমি আস্থা রাখি, তিনি আমাকে জানিয়েছেন: "মনে হয় শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) আবূ মু'আবিয়াহ আদ্-দ্বা'রীর থেকে এটি গ্রহণ করেছেন, আর আবূ মু'আবিয়াহ এটি মুয়াস্সাল (সংযুক্ত সনদসহ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।" আমি (আলবানী) বলি: এটি বাস্তবতার পরিপন্থী। কেননা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুরবানীর দিন ফজরের সালাতের সময় মুযদালিফায় ছিলেন, মক্কায় ছিলেন না যে উম্মু সালামাহ তাঁর সাথে সেখানে উপস্থিত হবেন। একারণেই ইমাম আহমাদ এই হাদীসটিকে মুনকার (অস্বীকৃত) বলেছেন ও দুর্বল ঘোষণা করেছেন, যেমনটি হাফিয ইবনু আল-কাইয়্যিম তাঁর 'তাহযীবুস-সুনান'-এ ইবনু আব্দুল বার্র থেকে উদ্ধৃত করেছেন। কারণ মক্কায় তাঁর সাথে ফজরের সালাতে উপস্থিত হওয়া সম্ভব নয়।
এই হাদীসগুলোর কারণে বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) মনে করেন যে, হাকাম মিকসাম থেকে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে যা বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত তোমরা জামরায় কংকর নিক্ষেপ করো না," সেটি (উপরোক্ত বর্ণনাগুলোর কারণে) মুযতারাব (অস্থির/দুর্বল)। আর আমরা জানি না হাকাম মিকসামের থেকে সরাসরি শুনেছেন কি না। তিনি এটি 'আত-তারীখ আস-সগীর' (১/২৯৫)-এ উল্লেখ করেছেন।
এই হাদীসগুলোর ভিত্তিতেই শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) এবং ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) একটি বর্ণনা অনুসারে দুর্বল ও মহিলাদের জন্য অর্ধরাতের পরে মুযদালিফা থেকে চলে গিয়ে সূর্যোদয়ের পূর্বে কংকর নিক্ষেপ করা জায়েয মনে করতেন।
আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যে হাদীসটিকে বুখারী মুযতারাব হিসেবে রায় দিয়েছেন, তার অনেকগুলো সূত্র রয়েছে যা একে অপরের পরিপূরক, যা পরবর্তীতে আসবে।
5039 - عن ابن عباس، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قدم ضعفة أهله قال:"لا ترموا الجمرة حتى تطلع الشمس".
حسن: رواه الترمذيّ (893) من حديث وكيع، عن المسعوديّ، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
قلت: فيه المسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة مختلط، وإنّ سماع وكيع منه كان بالكوفة قديم كما قال الإمام أحمد، وقال:"إنه كان قد اختلط بغداد، وإن سماع من سمع هناك ليس بشيء. قال: ومن سمع منه بالكوفة فسماعه جيد".
وتابعه الأعمش، عن الحكم بإسناده.
ومن طريقه الإمام أحمد (2507) مطولًا، و (3513) مختصرًا.
ولكن نقل الترمذي (880) عن شعبة قال: لم يسمع الحكم من مقسم إلا خمسة أحاديث" وهذا الحديث ليس منها؛ لأنّ يحيي القطّان عدّها. انظر: تحفة التحصيل: (80 - 81).
قلت: ولكن له طرق أخرى.
منها: ما رواه أبو داود (1941)، والنسائيّ (3065) كلاهما من حديث حبيب، عن عطاء، عن ابن عباس، قال:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقدّم ضعفاء أهله، ويأمرهم - يعني لا يرمون الجمرة حتى تطلع الشمس".
وحبيب هو ابن أبي ثابت مدلّس وقد عنعن، وفي حديثه عن عطاء وهم.
نقل العقيلي عن القطان قال: في حديثه عن عطاء ليس بمحفوظ.
ومنها: ما رواه فضيل بن سليمان، عن موسى بن عقبة، قال: أخبرني كريب، عن ابن عباس:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يأمر نساءه وثَقله من صبيحة جمع أن يفيضوا مع أوّل الفجر بسواد، وأن لا يرموا
الجمرة إلّا مصبحين".
رواه البيهقيّ (5/ 132) عن محمد بن أبي بكر عنه.
وفيه: فُضيل بن سليمان وهو النميري، مختلف فيه، ولكن الغالب على حديثه الضعف، وخاصة في روايته عن موسى بن عقبة الإمام في المغازي.
قال صالح بن محمد جزرة: منكر الحديث، روى عن موسى بن عقبة مناكير.
وقال ابن معين:"ليس بثقة"، وقال:"ليس هو بشيء، ولا يكتب حديثه".
ومنها: ما رواه أبو داود (1940)، والنسائي (3064)، وابن ماجه (3025)، والإمام أحمد (2082) كلهم من حديث سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن الحسن العرني، عن ابن عباس.
وصحّحه ابن حبان (3869)، فرواه من هذا الوجه.
وفيه انقطاع فإنّ العرني لم يسمع من ابن عباس، بل لم يدركه وهو يرسل عنه كما قال الإمام أحمد وابن معين وأبو حاتم وغيرهم.
ومنها: ما رواه الإمام أحمد (2459) من طريق شريك، عن ليث، عن طاوس، عن ابن عباس، قال:"عجلنا النبيّ صلى الله عليه وسلم أو عجّل أمّ سلمة، وأنا معهم من المزدلفة إلى جمرة العقبة، فأمرنا أن لا نرميها حتى تطلع الشمس".
وفيه شريك وليث، وفيهما كلام معروف. وله طرق أخرى يقوي بعضها بعضًا، كما قال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (3/ 617).
إلا أن ابن خزيمة في صحيحه (4/ 280) أبدى الشك في صحة أخبار ابن عباس، فقال:"ولست أحفظ في تلك الأخبار إسنادًا ثابتًا من جهة النّقل، فإن ثبت إسناد واحد منها فمعناه أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم زجر المذكور ممن قدمهم تلك الليلة عن رمي الجمار قبل طلوع الشمس، لا السّامع المذكور؛ لأنّ خبر ابن عمر -الآتي- يدل على أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قد أذن لضعفة النساء في رمي الجمار قبل طلوع الشمس، فلا يكون خبر ابن عمر خلاف خبر ابن عباس إن ثبت خبر ابن عباس من جهة النقل، على أنّ رمي الجمار لضعفة النساء بالليل قبل طلوع الفجر أيضًا عندي جائز للخبر الذي أذكره" انتهى.
وبهذا قال مالك وأبو حنيفة بأنه لا يجوز الرمي قبل طلوع الشمس ولو ارتحل بعد نصف الليل، ولكن هذا يخالف الغاية التي من أجلها أذن النبيّ صلى الله عليه وسلم للضعفة من الارتحال من المزدلفة إلى منى، فيحمل هذا الحديث إن صحَّ على كراهية الرّمي قبل طلوع الشمس، فإن الوقت المختار الذي لا خلاف فيه هو وقت الضّحي.
وأمّا ما روي عن شعبة مولي ابن عباس، عن ابن عباس، قال:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث به مع أهله إلى منى يوم النحر فرموا الجمرة مع الفجر" ففيه ضعف. رواه الإمام أحمد من وجهين (2935،
2936) عن ابن أبي ذئب، عن شعبة، عن ابن عباس.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا أبو داود الطيالسيّ في مسنده (2852).
وإسناده ضعيف من أجل شعبة مولي ابن عباس، وهو ابن دينار الهاشميّ، قال فيه النسائي:"ليس بالقوي" كما في"الميزان".
ولكن قال ابن معين:"ليس به بأس". وفي التقريب:"صدوق سيء الحفظ". فمثله لا يقبل إذا خالف الثقات، كما في الرّوايات السّابقة.
فقوله:"رموا مع الفجر" فيه نكارة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারের দুর্বলদের (আগে) পাঠিয়েছিলেন। তিনি বললেন: "সূর্য ওঠা পর্যন্ত জামরায় কংকর নিক্ষেপ করো না।"
5040 - عن ابن عباس، قال: سئل النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: رميتُ بعد ما أمسيتُ؟ فقال:"لا حرج".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1723) عن محمد بن المثنى، حدّثنا عبد الأعلى، حدّثنا خالد، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
فيه نقل وقت الرمي المختار إلى وقت الجواز. والظاهر من السؤال أنه كان في يوم النحر؛ لأنّ الوقت المختار هو قبل الزوال، فرفع النبيّ صلى الله عليه وسلم الحرج عمن رماه مساء، ويقاس عليه من رماه ليلًا لاشتراك جزء من المساء في الليل.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলো, (একজন জিজ্ঞেস করল,) আমি সন্ধ্যা হয়ে যাওয়ার পর (কঙ্কর) নিক্ষেপ করেছি? তিনি বললেন, "কোনো অসুবিধা নেই।"
5041 - عن الفضل بن عباس -وكان رديفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم- أنه قال في عشية عرفة وغداة جمع للناس حين دفعوا:"عليكم بالسّكينة" وهو كافٌّ ناقته حتى دخل محسرًا -وهو من مني- قال:"عليكم بحصى الخذف الذي يُرمي به الجمرة" وقال: لم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يُلبّي حتى رمي الجمرةَ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1282) من طرق، عن الليث بن سعد، عن أبي الزبير عن أبي معبد مولي ابن عباس، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، به.
আল-ফাদল ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত— যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সাওয়ারীর উপর আরোহিত ছিলেন— তিনি বলেন, আরাফার সন্ধ্যা এবং মুযদালিফার ('জম'-এর) সকাল বেলায় যখন লোকজন যাত্রা শুরু করছিল, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কর্তব্য হলো ধীরস্থিরতা অবলম্বন করা।" আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাঁর উটনীর লাগাম টেনে ধরেছিলেন, যতক্ষণ না তিনি মুহাসসার নামক স্থানে প্রবেশ করলেন— যা মিনার অন্তর্ভুক্ত। তিনি (আল-ফাদল) বললেন, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "তোমাদের কর্তব্য হলো ছোট কঙ্কর ব্যবহার করা, যা দিয়ে জামরাহতে (শয়তানকে) নিক্ষেপ করা হয়।" তিনি (আল-ফাদল) আরও বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরাহতে কঙ্কর নিক্ষেপ করা পর্যন্ত লাগাতার তালবিয়াহ পাঠ করছিলেন।
5042 - عن عبد الله بن عباس قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم غداة العقبة وهو على راحلته:"هات الْقُطْ لي". فلقطتُ له حصيات هن حصى الخذْف. فلمّا وضعتهن في يده قال:"بأمثال هؤلاء، وإيّاكم والغلو في الدِّين! فإنما أهلك من كان قبلكم الغلو في الدِّين".
صحيح: رواه النسائيّ (3057)، وابن ماجه (3029)، وصحّحه ابن خزيمة (2867)، وابن حبان (3871)، والحاكم (1/ 466) كلّهم من حديث عوف بن أبي جميلة، عن زياد بن الحصين،
عن أبي العالية، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
وإسناده صحيح. وأبو العالية هو رفيع بن مهران الرّياحيّ.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আক্বাবার দিনের সকালে তাঁর উটের পিঠে থাকা অবস্থায় আমাকে বললেন: "এগুলো নাও, আমার জন্য (কঙ্কর) কুড়িয়ে আনো।" তখন আমি তাঁর জন্য নুড়িপাথর কুড়িয়ে আনলাম, যা ছিল কঙ্কর নিক্ষেপের নুড়িপাথর। যখন আমি সেগুলো তাঁর হাতে রাখলাম, তখন তিনি বললেন: "তোমরা এগুলোর মতোই (ছোট পাথর) ব্যবহার করো। আর তোমরা দীনের ব্যাপারে বাড়াবাড়ি করা থেকে সাবধান হও! কারণ তোমাদের পূর্ববর্তীদেরকে একমাত্র দীনের ব্যাপারে বাড়াবাড়িই ধ্বংস করেছে।"
5043 - عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس -وكان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم- أنه قال في عشية عرفة وغداة جمع للناس حين دفعوا:"عليكم بالسكينة"، وهو كاف ناقته حتى دخل محسِّرًا -وهو من مني- قال:"عليكم بحصى الخذف الذي يرمي به الجمرة". وقال: لم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يلبي حتى رمي الجمرة.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1282) من طريق الليث، عن أبي الزبير، عن أبي معبد مولي ابن عباس، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، فذكره.
ورواه من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير بهذا الإسناد، غير أنه لم يذكر في الحديث:"ولم يزلْ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يلبِّي حتى رمي الجمرة".
وزاد في حديثه:"والنبيّ صلى الله عليه وسلم يشير بيده كما يخذف الإنسان".
قوله:"بحصى الخذف" وهي نحو حبّة البقلاء، والخذف أن يجعل الحصاة بين الإبهام والسبابة ثم يقذفها بالإبهام.
ফাদল ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—আর তিনি (ফাদল) ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটের সওয়ারির পিছনে বসা (সহ-আরোহী)—তিনি আরাফার সন্ধ্যায় এবং মুযদালিফার সকালে যখন লোকেরা রওয়ানা হচ্ছিল, তখন বলেছিলেন: "তোমরা শান্ত ও ধীরস্থির থাকো।" আর তিনি তাঁর উটনীর লাগাম টেনে ধরেছিলেন, যখন তিনি মুহাসসির (যা মিনার অংশ)-এ প্রবেশ করলেন। তিনি (নবী) বললেন: "তোমরা ছোট কঙ্কর ব্যবহার করো, যা দিয়ে জামরাহতে নিক্ষেপ করা হয়।" তিনি (ফাদল) আরো বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরায় কঙ্কর নিক্ষেপ না করা পর্যন্ত তালবিয়াহ পাঠ করা বন্ধ করেননি।
5044 - عن جابر قال: رأيتُ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم رمي الجمرة بمثل حصى الخذْف.
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1299) من طريق ابن جريج، أخبرنا أبو الزبير، أنه سمع جابر ابن عبد الله، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে দেখলাম যে তিনি জামরায় এমন কঙ্কর নিক্ষেপ করছেন যা 'খাযফ'-এর নুড়ির মতো ছিল।
5045 - عن أمِّ جندب الأزديّة، أنّها سمعت النبيَّ صلى الله عليه وسلم حيث أفاض قال:"يا أيُّها الناس، عليكم بالسكينة والوقار، وعليكم بمثل حصى الخذف".
صحيح: رواه الإمام أحمد (23219) عن هشيم، أخبرنا ليث، عن عبد الله بن شداد، عن أمّ جندب، فذكرته.
وإسناده صحيح. وهشيم هو ابن بشير وليث هو ابن سعد، وأمّ جندب هي أمّ سليمان بن عمرو ابن الأحوص كما أكّد به الترمذيّ في قوله:"وفي الباب عن سليمان بن عمرو بن الأحوص، عن أمه" وهي أم جندب الأزدية، وذلك إثر حديث جابر (897).
وحديث سليمان بن عمرو بن الأحوص، رواه أبو داود (1966، 1967، 1968)، وابن ماجه (3028، 3031)، والإمام أحمد (16087، 23218)، والبيهقيّ (5/ 128) كلّهم من طرق، عن يزيد بن أبي زياد، عن سليمان بن عمرو بن الأحوص، عن أمه قالت:
"رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يرمي الجمرة من بطن الوادي، وهو راكب يكبّر مع كلّ حصاة، ورجل من
خلفه يستره، فسألت عن الرجل؟ فقالوا: الفضل بن العباس، وازدحم الناس فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"يا أيّها النّاس! لا يقتل بعضكم بعضًا، وإذا رأيتم الجمرة فارموا بمثل حصى الخذف". واللفظ لأبي داود. والباقون ذكروه بنحوه.
قال المنذريّ في مختصر أبي داود:"في إسناده يزيد بن أبي زياد وهو ضعيف".
قلت: وهو كما قال، وشيخه سليمان بن عمرو بن الأحوص لم يوثقه غير ابن حبان؛ ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي إذا توبع.
وهو كذلك لأنه توبع كما في الإسناد الأول إلا أنه ذكره مختصرًا، ولكن المشهور أن هذا الحديث حديث يزيد بن أبي زياد عن سليمان بن عمرو، عن أمه. قال الترمذي: سألت البخاري عن هذا الحديث؟ فقال:"أمه اسمها أمّ جندب. قلت: فحديث الحجاج قال: أرى أنّ الحجاج أخذه عن يزيد بن أبي زياد، وأظنه هو حديث سليمان بن عمرو عن أمه" ذكره البيهقي (5/ 128).
উম্মে জুনদুব আল-আযদিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শুনেছেন যখন তিনি (মুযদালিফা থেকে মিনার দিকে) রওনা হলেন, তিনি বললেন: "হে লোক সকল! তোমাদের উপর আবশ্যক হলো প্রশান্তি ও গাম্ভীর্যপূর্ণ থাকা, এবং তোমাদের উপর আবশ্যক হলো গুলতির মতো ছোট আকারের পাথর।"
5046 - عن الهرماس بن زياد، قال: رأيت النبيَّ صلى الله عليه وسلم وأنا رديف أبي، وهو على ناقته العضباء يوم الأضحى والناس حوله. فقلت لأبي: ما يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: يقول:"ارموا الجمار بمثل حصى الخذف".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (22/ 203) من طريق أبي الوليد الطيالسيّ، عن عكرمة بن عمار، حدثني الهرماس بن زياد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عكرمة بن عمار العجليّ غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت بما ينكر عليه، وهو من رجال مسلم.
قال الهيثميّ في المجمع (3/ 258):"رجاله رجال الصحيح".
আল-হিরমাস ইবন যিয়াদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যখন আমি আমার পিতার পিছনে সওয়ার ছিলাম, আর তিনি কুরবানীর দিন তাঁর ‘আল-আদ্ববা’ নামক উষ্ট্রীর উপর ছিলেন এবং লোকজন তাঁকে ঘিরে রেখেছিল। আমি আমার পিতাকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলছেন? তিনি বললেন: তিনি বলছেন: “তোমরা (জামারায়) ছোট গুলির আকারের কাঁকর দ্বারা পাথর নিক্ষেপ করো।”
5047 - عن عبد الرحمن بن عثمان التيميّ، قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نرمي الجمار بمثل حصى الخذف في حجّة الوداع.
حسن: رواه الدارمي (1939) وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (675) وابن قانع في معجم الصحابة (636) كلهم من حديث عثمان بن عمر، نا عثمان بن مرة، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عبد الرحمن بن عثمان التيمي، فذكره.
وعبد الرحمن هذا هو ابن أخي طلحة بن عبيد الله، إذا هو عبد الرحمن بن عثمان بن عبيد الله الصحابي، معروف، كان من مسلمة الفتح، وأول مشاهده عمرة القضاء.
إسناده حسن من أجل عثمان بن مرة، فإنه حسن الحديث، وقد وقع في نسخة الدارمي المطبوعة القديمة زيادة"عن أبيه" وهو خطأ؛ فإن الحديث من مسند عبد الرحمن بن عثمان، وكذلك ذكره أيضا ابن حجر في إتحاف المهرة (10/ 621) من مسند عبد الرحمن بن عثمان، ونقلًا عن
الدارمي، ولم يشر إلى هذه الزيادة، فالظاهر أنه خطأ مطبعي أو وجد في بعض النسخ، والصواب كما عرفنا بدون ذكر"أبيه".
وفي معناه ما رُوي عن حرملة بن عمرو (وهو أبو عبد الرحمن) قال:"حججت حجّة الوداع مُرْدفي عمِّي سنان بن سنة، قال: فلما وقفنا بعرفات رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم واضعًا إحدى إصبعيه على الأخرى. فقلت لعمّي: ماذا يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: يقول:"ارموا الجمرة بمثل حصى الخذف".
رواه الإمام أحمد (19016) عن عفّان، حدّثنا وُهيب، حدّثنا عبد الرحمن بن حرملة، عن يحيي ابن هند، أنه سمع حرملة بن عمرو يقول (فذكره).
ورواه البزّار -كشف الأستار (1131) -، والطبراني في الكبير (4/ 5)، وابن خزيمة (2874) كلّهم من طريق بشير بن المفضل، ثنا عبد الرحمن بن حرملة، عن يحيى بن هند، عن والدي حرملة ابن عمرو، فذكر بإسناده مثله.
إلا بشر بن المفضل لم يسم عمّ حرملة بن عمرو، وسمّاه وهيب كما في رواية أحمد، وقد أشار إلى ذلك ابن خزيمة بأن وهيبًا سمّى حرملة بن عمرو بأنه سنان بن سنة.
ويحيي بن هند هو أبن أسماء بن جارية، ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 252) ولم يذكر من الرّواة عنه غير عبد الرحمن بن حرملة، وقال:"هكذا قاله وهيب عن ابن حرملة عن يحيى بن هند، عن أبيه (وذلك في حديث صوم عاشوراء).
وقال عبد الله بن بكر، عن حبيب بن هند، عن أبيه" انتهى.
ووقع تخليط شديد في"التعجيل" فقال: يحيي بن هند بن أسماء بن جارية، عن أبيه وجده، وعنه سنان بن سنة وعبد الرحمن بن حرملة. وثقه ابن حبان، وتعقبه الحافظ ثم بيّن ما في ثقات ابن حبان.
وقال: وقول الحسيني: روى عن سنان بن سنة لم أره في شيء من طرق الحديث في"المسند".
والخلاصة أن يحيي بن هند بن أسماء بن جارية"مجهول".
وقال الهيثمي في المجمع (3/ 258):"رواه أحمد والبزار والطبراني في الكبير، ورجاله ثقات" فإنه يقصد بالثقات، ذكر ابن حبان لهم في الثقات لا غير.
আবদুর রহমান ইবনু উসমান আত-তাইমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ করেছিলেন যেন আমরা জামারাসমূহে নিক্ষেপের জন্য হাসা আল-খাযফ (ছোলা বা মটরের দানার আকারের) কংকর ব্যবহার করি।
