হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5108)


5108 - عن عبد الله بن عمر: أنّ العبّاس رضي الله عنه استأذن النبيَّ صلى الله عليه وسلم ليبيت بمكة ليالي منى، من أجل سقايته فأذن له.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1745)، ومسلم في الحج (1315) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، حدّثنا عبيد الله (هو ابن عمر العمريّ)، حدثني نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، قال:"لم يرخِّص النّبيُّ صلى الله عليه وسلم لأحد يبيت بمكة إلاّ للعباس من أجل السّقاية".

رواه ابن ماجه (3066) عن علي بن محمد، وهناد بن السّريّ، قالا: حدّثنا أبو معاوية، عن إسماعيل بن مسلم، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.

وفيه إسماعيل بن مسلم المكي أبو إسحاق ضعّفه ابن معين، وأبو زرعة، وأبو حاتم، والنسائي وغيرهم.

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عبد الرحمن بن فروخ يسأل ابن عمر، قال:"إنّا نتبايع بأموال النّاس فيأتي أحدنا مكة فيبيت على المال. فقال: أما رسول الله صلى الله عليه وسلم فبات بمنى وظلّ".

رواه أبو داود (1958) عن أبي بكر محمد بن خلاد الباهلي، حدّثنا يحيى، عن ابن جريج، حدثني حريز -أو أبو حريز (الشك من يحيي) - أنه سمع عبد الرحمن بن فروخ، فذكره.

وحريز -أو أبو حريز-"مجهول" كما في"التقريب".




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে মিনার রাতগুলোতে মক্কায় অবস্থান করার জন্য অনুমতি চাইলেন, তাঁর হাজীদের পানি পান করানোর (সাকায়া) কাজের কারণে। তখন তিনি তাকে অনুমতি দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5109)


5109 - عن عاصم بن عديّ: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أرخص لرِعاء الإبل في البيتوتة خارجين عن مني، يرمون يوم النّحر، ثم يرمون الغد، ومن بعد الغد ليومين، ثم يرمون يوم النّفر.

صحيح: رواه مالك في الحج (218) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، أنّ أبا البدّاح ابن عاصم بن عدي، أخبره عن أبيه، فذكره.

وإسناده صحيح، وأبو البدّاح يقال: كنيته أبو عمرو، وأبو البدّاح لقب. ويقال: اسمه: عدي، البلويّ حليف الأنصار، وهو ثقة كما في التقريب.

وهو مشهور من التابعين كما قال الحاكم، والذهبي، ووهم من ذكره في الصحابة كما قال
ابن حجر.

ورواه أبو داود (1975)، والترمذي (955)، والنسائي (3069)، وابن ماجه (3037)، وصحّحه ابن خزيمة (2975)، وابن حبان (3888)، والحاكم (1/ 478) كلّهم من طريق مالك، به، نحوه. إلّا ابن حبان فإنه رواه من حديث سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر، بإسناده، مثله.

ولفظ أبي داود مثله، ولفظ النسائي نحوه، ولفظ الترمذي وابن ماجه:" … أن يرموا يوم النّحر، ثم يجمعوا رمي يومين بعد النّحر، فيرمونه في أحدهما -قال مالك: ظننتُ أنه قال: في الأول منهما-، ثم يرمون يوم النّفر".

وقال الترمذي:"حديث حسن صحيح، وهو أصح من حديث ابن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر".

قلت: حديث ابن عيينة. رواه الترمذيّ نفسه (954)، وأبو داود (1976)، والنسائي (3068)، وابن ماجه (3036)، وصححه ابن خزيمة (2977)، وابن حبان (3888)، والحاكم (1/ 478) كلّهم عنه، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم - وزاد أبو داود: وعن محمد ابني أبي بكر، عن أبيهما، عن أبي البدَّاح بن عدي، عن أبيه: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أرخص للرعاة أن يرموا يومًا ويدعوا يومًا.

وإسناده صحيح، وأبو البداح بن عدي هو ابن عاصم بن عدي نسب في هذه الرواية إلى جده، وأبوه عاصم بن عدي كما قال البيهقيّ (5/ 151) عقب رواية الحديث من طريق أبي داود. قال:"هكذا رواه سفيان بن عيينة. وكذلك قال روح بن القاسم عن عبد الله بن أبي بكر. وكأنهما نسبا أبا البداح إلى جدّه، وأبوه عاصم بن عدي".

وعاصم بن عدي هو صاحب اللّعان الصحابي المشهور.

ونظرًا لكون حديث ابن عيينة اختصارًا مخلًا للمعني رجّح الترمذيّ رواية مالك، وقد سبقه يحيي بن معين، فقد رواه عن سفيان بن عيينة، ثم قال:"وكلام سفيان هذا خطأ إنما هو كما قال مالك بن أنس قال يحيي: فكان سفيان لا يضبطه كان إذا حدث به يقول: ذهب عليَّ من هذا الحديث شيءٌ" انظر تاريخ ابن معين برواية الدّوريّ (646).

ولكن من أهل العلم من جمعوا بين رواية ابن عيينة ورواية مالك، فقالوا: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم رخّص للرعاء في ترك رمي الجمار يومًا ويرموا يومًا (أي ليومين من أيام التّشريق)، ثم يوم النّفر. انظر كلام ابن خزيمة (4/ 320).

قال مالك عقب الحديث في"الموطأ":"تفسير الحديث الذي أرخص رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لرعاء الإبل في تأخير رمي الجمار، فيما نُري -والله أعلم- أنّهم يرمون يوم النّحر، فإذا مضى اليوم الذي يلي يوم النّحر رموا من الغد، وذلك يوم النّفر الأوّل، فيرمون لليوم الذي مضى، ثم يرمون ليومهم ذلك؛ لأنّهم لا يقضي أحدٌ شيئًا حتى يجب عليه، فإذا وجب عليه ومضى كان القضاءُ بعد ذلك،
فإنْ بدا لهم النَّفر فقد فرغوا، وإن أقاموا إلى الغد رموا مع الناس يوم النّفر الآخر ونفروا".

قال الخطّابي في"معالمه": وقال الشافعي نحوّا من قول مالك. وقال بعضهم:"هم بالخيار إن شاؤا قدموا وإن شاؤا أخّروا".




আসিম ইবনে আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটের রাখালদের জন্য মিনার বাইরে রাত্রি যাপনের অনুমতি প্রদান করেন। তারা কুরবানির দিন (১০ যিলহজ) কঙ্কর নিক্ষেপ করবে, এরপর তারা পরের দিন (১১ যিলহজ) এবং তার পরের দিন (১২ যিলহজ)-এর দুই দিনের (কঙ্কর) একসাথে নিক্ষেপ করবে, অতঃপর তারা নাফরের দিন (১৩ যিলহজ) নিক্ষেপ করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5110)


5110 - عن عبد الله بن عمر: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رخص لرِعاء الإبل أن يرموا بالليل.

حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1139) - والبيهقي (5/ 151) كلاهما من حديث عبد الأعلى ابن حماد، ثنا مسلم بن خالد، ثنا عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في مسلم بن خالد، وهو الزنجي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد حسَّنَه أيضا الحافظ في التلخيص (2/ 263).

وبمعناه روي أيضا عن ابن عباس. رواه البيهقي من طريق عطاء بن أبي رباح عنه، وفيه عمر بن قيس وهو المكي، المعروف بـ (سندل) ضعيف جدا، والصحيح فيه أنه من مرسل عطاء بن أبي رباح، كما رواه البيهقي بإسناد صحيح عنه.

وفي معناه رُوي أيضا عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رخّص للرّعاة أنّ يرموا باللّيل، وأيّ ساعة من النّهار شاؤوا". إلا أنه ضعيف أيضا.

رواه الدارقطني (2685) من طريق بكر بن بكار، حدّثنا إبراهيم بن يزيد، حدّثنا سليمان الأحول، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه.

وبكر بن بكار وشيخه إبراهيم بن يزيد وهو الخوزي ضعيفان، وإن كان شيخه أسوأ حالًا منه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উটের রাখালদেরকে রাতে কংকর নিক্ষেপ করার অনুমতি দিয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5111)


5111 - عن عبد الله بن عباس، قال: أُمر النّاس أن يكون آخر عهدهم بالبيت، إلّا أنه خُفِّف عن الحائض.

متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1755)، ومسلم في الحج (1328: 380) كلاهما من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মানুষকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে তাদের শেষ কাজটি যেন বায়তুল্লাহর সাথে হয় (অর্থাৎ বিদায়ী তাওয়াফ করা)। কিন্তু ঋতুমতী নারীর ক্ষেত্রে তা শিথিল করা হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (5112)


5112 - عن عبد الله بن عباس قال: كان الناس ينصرفون في كلِّ وجه، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"لا ينفرنَّ أحدٌ حتّى يكون آخرُ عهده بالبيت".

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1327) من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن سليمان الأحول، عن طاوس، عن ابن عباس، قال (فذكره).




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা (হজ সমাপনের পর) বিভিন্ন দিকে (যার যার গন্তব্যের উদ্দেশ্যে) ফিরে যাচ্ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "কেউ যেন (মক্কা থেকে) প্রস্থান না করে, যতক্ষণ না বায়তুল্লাহর সাথে তার শেষ সাক্ষাৎ হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5113)


5113 - عن عائشة، أنّها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنّ صفيّة بنت حُييّ قد حاضت؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلّها تحبسُنا، ألم تكن طافتْ معكنَّ؟" فقالوا:
بلي، قال:"فاخرجي".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (226) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة، به، فذكرته.

ورواه البخاريّ في الحيض (328) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله. ورواه مالك أيضًا في الحجّ (225) ومن طريقه البخاريّ في الحجّ (1757) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، نحوه.

ورواه البخاريّ في الحجّ أيضًا (1561)، ومسلم في الحج (1211: 128) من طريق جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، به، مطوّلًا. وفي آخره: قالت صفية:"ما أُراني إلّا حابستكم؟ قال:"عقرى حلقي، أو ما كنت طفتِ يوم النّحر؟" قالت: بلى. قال:"لا بأس، انفري". واللفظ لمسلم.

قوله:"عقْري حلْقي". قيل: يعني عقر الله جسدها وأصابها بوجع في حلقها.

وقيل: معناه تعقر قومها وتحلقهم بشؤمها، وقيل: العقرى الحائض. وقيل: معناه جعلها الله عاقرًا لا تلد، وحلقي مشؤومة على أهلها.

نقل هذه الأقوال النووي في شرحه على مسلم (8/ 153) ثم قال:"وعلى كل قول فهي كلمة كان أصلها ما ذكرناه، ثم اتّسعت العرب فيها فصارت تطلقها ولا تريد حقيقة ما وضعت له أولا، ونظيره: تربت يداه، وقاتله الله ما أشجعه".

وقوله صلى الله عليه وسلم:"لعلّها تحبسنا" يعني أنّها إذا ما طافتْ طواف الإفاضة فهي تحبسنا أي ننتظر حتى تطهر وتغتسل وتطوف ثم نرحل.

هذا هو الأصل في هذه المسألة بأنّ المرأة إذا حاضت قبل أن تطوف طواف الإفاضة فهي تبقى في مكة حتى تطهر وتطوف.

وأما إذا تعذّر المقام عليها بمكة فهي لا تخلو من حالين:

إما أن تكون قريبة من مكة حيث يتيسّر لها الرجوع إلى مكة بعد الطهارة، فترجع إلى بلدها وهي محرمة، ولا يحل وطؤها حتى تطهر فتعود إلى مكة للطواف.

وإما أن تكون بعيدة عن مكة يتعذّر عليها الرجوع إلى مكة مرة أخرى، فتطوف على حالها، وترجع إلى بلدها. وهذه خلاصة ما ذهب إليه شيخ الإسلام ابن تيمية في فتاواه (26/ 185) وما بعدها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: “ইয়া রাসূলাল্লাহ! সাফিয়্যা বিনতে হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঋতুবতী হয়ে গেছেন?” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সম্ভবত সে আমাদের আটকে দেবে। সে কি তোমাদের সাথে (তাওয়াফে ইফাদা) সম্পন্ন করেনি?” তারা বললেন: “হ্যাঁ।” তিনি বললেন: “তাহলে তোমরা (মক্কা থেকে) বেরিয়ে পড়ো।”









আল-জামি` আল-কামিল (5114)


5114 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في ليالي الحج وذكرت الحديث، قالت: حتى تفرنا من مني، فنزلنا المحصّب، فدعا عبد الرحمن، فقال:"اخرج بأختك الحرم، فلتُهل بعمرة، ثم افرغا من طوافكما، أنتظركما ها هنا". فأتينا في
جوف الليل، فقال:"فرغتما؟". قلت: نعم، فنادى بالرّحيل في أصحابه، فخرج فمرَّ بالبيت، فطاف به قبل صلاة الصّبح، ثم خرج إلى المدينة.

متفق عليه: رواه البخاري في الحجّ (1788)، ومسلم في الحجّ (1211: 123) كلاهما من حديث أفلح بن حميد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ:"فارتحل النّاس ومن طاف بالبيت". حاول الحافظ الإجابة عن هذه العبارة، ثم رأى أنه وقع فيها تحريف، وقال:"والصواب: فارتحل الناس، ثم طاف بالبيت" كما وقع عند أبي داود (2005)، ومسلم" انتهى.

وفي صحيح ابن خزيمة (2998) من طريق أفلح بن حميد: فارتحل الناسُ، فمرَّ بالبيت قبل صلاة الصّبح، فطاف به، ثم خرج فركب، ثم انصرف متوجهًا إلى المدينة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে হজ্জের রাতে বের হলাম... তিনি (পুরো ঘটনাটি) বর্ণনা করলেন। তিনি বলেন: অবশেষে আমরা মিনা থেকে ফিরে এলাম এবং আল-মুহাস্সাব নামক স্থানে অবতরণ করলাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুর রহমানকে ডাকলেন এবং বললেন: "তোমার বোনকে সাথে নিয়ে হারাম (মক্কার হারামের সীমানা) থেকে বের হও। সে যেন উমরার ইহরাম বাঁধে। অতঃপর তোমরা দু'জন তোমাদের তাওয়াফ শেষ করো। আমি তোমাদের জন্য এখানে অপেক্ষা করব।" আমরা রাতের মাঝামাঝি সময়ে ফিরে এলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা কি অবসর হয়েছ?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীদের মাঝে সফরের (যাত্রা শুরুর) ঘোষণা দিলেন। তিনি বের হলেন এবং বায়তুল্লাহর পাশ দিয়ে গেলেন। ফজরের সালাতের পূর্বে তিনি তা তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি মদীনার উদ্দেশে রওনা হলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5115)


5115 - عن عائشة، أنّها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنّ صفيّة بنت حُييّ قد حاضت، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلّها تحبسُنا، ألم تكن طافتْ معكنَّ؟" فقالوا: بلي، قال:"فاخرجي".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (226) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة، به، فذكرته. ورواه البخاريّ في الحيض (328) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله.

ورواه البخاريّ في الحجّ أيضًا (1561)، ومسلم في الحج (1211: 128) من طريق جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، به، مطوّلًا. وقد مضى قريبًا.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াইয়্য (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মাসিক শুরু হয়ে গিয়েছে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সম্ভবত সে আমাদের আটকে দেবে। সে কি তোমাদের সাথে (বিদায়ী) তাওয়াফ করেনি?" তারা বলল: হ্যাঁ, করেছে। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা রওনা হও।"









আল-জামি` আল-কামিল (5116)


5116 - عن عكرمة: أنّ أهل المدينة سألوا ابن عباس رضي الله عنهما، عن امرأة طافت، ثم حاضتْ؟ قال لهم: تنفرُ. قالوا: لا نأخذُ بقولك وندع قول زيد. قال: إذا قدمتم المدينة فسلُوا، فقدموا المدينة فسألوا، فكان فيمن سألوا أمَّ سُليم (فذكرتْ حديث صفيّة).

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1758: 1759) من طريق أيوب، عن عكرمة، به، فذكره.

ورواه مسلم في الحجّ (1328: 381) من طريق الحسن بن مسلم، عن طاوس، قال:"كنتُ مع ابن عباس، إذ قال زيد بن ثابت: تُفتي أنّ تصدُر الحائض قبل أن يكون آخر عهدها بالبيت؟ فقال له ابن عباس: إمّا لا! فسلْ فلانة الأنصاريّة، هل أمرها بذلك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: فرجع زيد ابن ثابت إلى ابن عباس يضحك، وهو يقول: ما أراك إلّا قد صدقت".

والأنصاريّة الظاهر أنّها أمُّ سُليم المذكورة في رواية عكرمة عند البخاريّ. بل وجزم الحافظ في
الفتح (3/ 588) بذلك.

وأمُّ سليم هي ابنة ملحان، وهي أمُّ أنس بن مالك رضي الله عنهما.

وقول ابن عباس:"إمّا لا" قال ابن الأثير:"أصل هذه الكلمة"إنْ" و"ما" فأُدغمت النون في الميم، وما زائدة في اللفظ لا حكم لها، وقد أمالت العرب"لا" إمالة خفيفة، ومعناه: إن لم تفعل هذا، فليكن هذا".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইকরিমা বলেছেন: মদীনার লোকেরা তাঁকে সেই মহিলা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল, যে তাওয়াফ করার পর ঋতুমতী হয়েছে। তিনি তাদের বললেন: সে চলে যাবে (বিদায়ী তাওয়াফ না করেই)। তারা বলল: আমরা আপনার কথা গ্রহণ করব না এবং যায়িদের কথা ছেড়ে দেব? (অর্থাৎ যায়িদ ইবনু সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফতোয়া ছেড়ে দেব?) তিনি বললেন: যখন তোমরা মদীনায় ফিরে যাবে, তখন জিজ্ঞাসা করো। তারা মদীনায় ফিরে গেল এবং জিজ্ঞাসা করল। যাদের তারা জিজ্ঞাসা করেছিল, তাদের মধ্যে ছিলেন উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। (তিনি তখন সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি উল্লেখ করেন)।

মুত্তাফাকুন আলাইহি: এটি বুখারী (হাজ্জ, ১৭৫৮ ও ১৭৫৯) আইয়ুবের সূত্রে ইকরিমা থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি এটি উল্লেখ করেছেন।

আর এটি মুসলিম (হাজ্জ, ১৩২৮/৩৮১) আল-হাসান ইবনু মুসলিমের সূত্রে তাঊস থেকে বর্ণনা করেছেন। তাঊস বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম, তখন যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি এই ফাতওয়া দিচ্ছেন যে, ঋতুমতী মহিলা বাইতুল্লাহর সাথে শেষ সাক্ষাৎ না করেই চলে যাবে? ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: যদি (আপনার কাছে ভিন্ন প্রমাণ) না থাকে, তবে অমুক আনসারী মহিলাকে জিজ্ঞাসা করুন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি তাকে এরূপ করার নির্দেশ দিয়েছিলেন? তাঊস বলেন: তখন যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসতে হাসতে ইবনু আব্বাসের কাছে ফিরে এলেন এবং বললেন: আমি তো দেখছি আপনিই সত্য বলেছেন।

আর সেই আনসারী মহিলা স্পষ্টতই উম্মে সুলাইম, যিনি বুখারীর বর্ণনায় ইকরিমা কর্তৃক উল্লিখিত হয়েছেন। বরং হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ) আল-ফাতহ গ্রন্থে (৩/৫৮৮) এটি নিশ্চিত করেছেন।

উম্মে সুলাইম হলেন বিনতে মিলহান এবং তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: "ইম্মা লা" সম্পর্কে ইবনুুল আসীর বলেছেন: এই শব্দটির মূল হলো "ইন" (যদি) এবং "মা" (না), অতঃপর নূনকে মিমের মধ্যে বিলীন করা হয়েছে। আর "মা" হলো শব্দে অতিরিক্ত, এর কোনো (ব্যাকরণগত) হুকুম নেই। আর আরবরা "লা" শব্দটিতে সামান্য ইমালাহ (শব্দের ঝোঁক পরিবর্তন) করত। এর অর্থ হলো: যদি তুমি এটা না করো, তবে এটা হোক।









আল-জামি` আল-কামিল (5117)


5117 - عن طاوس بن كيسان، قال: سمعتُ ابن عمر يقول: إنّها لا تنفر. ثم سمعته يقول بعدُ: إنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم رخَّص لهنَّ.

صحيح: رواه البخاريّ في الحجّ (1760، 1761) عن مسلم (هو ابن إبراهيم الفراهيديّ)، حدّثنا وُهيب (هو ابن خالد)، حدّثنا ابن طاوس (هو عبد الله)، عن أبيه، عن ابن عباس رضي الله عنهما: قال: رُخَّص للحائض أن تنفر إذا أفاضتْ. قال: وسمعتُ ابن عمر يقول (فذكره).




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাউস ইবনু কাইসান বলেন, আমি তাঁকে (ইবনু উমরকে) বলতে শুনেছি: (হায়েযগ্রস্ত মহিলা) মক্কা থেকে বিদায় নিতে পারবে না। অতঃপর পরবর্তীতে আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: নিশ্চয়ই নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য (বিদায় নেওয়ার) অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5118)


5118 - عن ابن عمر، قال: من حجّ البيت فليكن آخر عهده بالبيت إلّا الحيَض، ورخَّص لهنّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه الترمذيّ (944)، وصحّحه ابن خزيمة (3000)، وابن حبان (3899)، والحاكم (1/ 467 - 468) كلّهم من حديث عيسى بن يونس، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح، والعمل على هذا عند أهل العلم".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين". وقال الذهبي:"خرَّجا أصله" وهو كما قال، وقد سبق.

هذا قول عامة فقهاء الأمصار بأنه لا وداع على حائض، ولا أعرف له مخالفًا إلّا ما روي عن عمر وابنه عبد الله، وزيد بن ثابت إلا أن الأخيرين قد رجعا لما بلغتهما السنة.

وأمّا ما رُوي عن الحارث بن عبد الله بن أوس، قال:"أتيتُ عمر بن الخطّاب فسألته عن المرأة تطوف بالبيت يوم النّحر، ثم تحيض. قال: ليكن آخر عهدها بالبيت. قال الحارث: كذلك أفناني رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال: فقال عمر: أربت عن يديك سألتني عن شيء سألت عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم لكيما أخالف؟ !". فهو غلط.

رواه أبو داود (2004) عن عمرو بن عون، أخبرنا أبو عوانة، عن يعلى بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن الحارث بن عبد الله بن أوس، وقد حسّنه المنذريّ في مختصره.

قلت: وهو كما قال، فإنّ إسناده في ظاهره السّلامة، ولكن غلط فيه الحارث بن عبد الله بن أوس لما عزا فتواه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإنه صلى الله عليه وسلم قال: وعمل بخلافه، ولكن فهم الحارث بن عبد الله أنّ قوله صلى الله عليه وسلم:"ليكن آخر عهدها بالبيت" وهو عام.
لأنه رواه الترمذيّ (946) من وجه آخر عنه، قال: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من حجّ هذا البيت او اعتمر فليكن آخر عهده بالبيت". وليس فيه ذكر للحيض. إلّا أنه ضعيف فيه الحجاج بن أرطأة ضعيف.

قال الترمذيّ:"حديث الحارث بن عبد الله بن أوس، حديث غريب. وهكذا روى غير واحد عن الحجاج بن أرطاة مثل هذا، وقد خولف الحجاج في بعض هذا الإسناد" انتهى.

وفيه أيضًا عبد الرحمن بن البيلمانيّ مولى عمر ضعيف.

وهذا العام مخصّص بحديث عائشة وابن عباس وغيرهما.

وأمّا عمر بن الخطاب فلعلّه لم تبلغه هذه السنة كما لم تبلغ ابنه عبد الله أيضًا، ثم بلغته فرجع عنها ورخّص للحيّض إذا طفن الإفاضة أن ينفرن.

وأمّا دعوى الطّحاويّ وغيره النّسخ فهو بعيد؛ لأنّ النّسخ لا يثبت إلا بثبوت المنسوخ، ولم يثبت أبدًا أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمر الحيّض بطواف الوداع، فبطل قوله بالنّسخ.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি বাইতুল্লাহর হজ্জ করবে, তার শেষ কাজটি যেন বাইতুল্লাহর সাথে হয়, তবে ঋতুবতী মহিলারা ছাড়া। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য ছাড় দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5119)


5119 - عن أبي هريرة، قال: بعثني أبو بكر رضي الله عنه فيمن يؤذّن يوم النّحر بمنى:"لا يحجّ العام مشرك، ولا يطوف بالبيت عريان". ويوم الحجّ الأكبر يوم النّحر، وإنما قيل الأكبر من أجل قول الناس: الحج الأصغر، فنبذ أبو بكر إلى النّاس في ذلك العام، فلم يحجّ عام حجّة الوداع الذي حجّ فيه النبيّ صلى الله عليه وسلم مشرك.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجزية (3177) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهريّ، أخبرنا حُميد بن عبد الرحمن، أنّ أبا هريرة قال (فذكره).

ورواه الشيخان -البخاري في التفسير (4657)، ومسلم في الحج (1347) - من وجهين آخرين عن ابن شهاب الزهري. وفيه التصريح من حُميد بن عبد الرحمن: يوم النحر يوم الحج الأكبر من أجل حديث أبي هريرة.

وهذا يشعر بأنّ قوله:"يوم النّحر يوم الحجّ الأكبر" مدرج من قول حُميد بن عبد الرحمن. ولكن رواه أبو داود (1946) من طريق شعيب بإسناده، فزاد في آخره: ويوم الحجّ الأكبر يوم النّحر، والأكبر الحج" مشعر بأنه مرفوع.

والصّحيح أنه مدرج كما في الصحيحين من التصريح من حميد بن عبد الرحمن، وهو الذي رجّحه أيضًا الحافظ ابن حجر في"فتحه" (8/ 321) فقال:"وقوله:"ويوم الحج الأكبر يوم النّحر" هو قول حميد بن عبد الرحمن استنبطه من قوله تعالى: {وَأَذَانٌ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ إِلَى النَّاسِ يَوْمَ
الْحَجِّ الْأَكْبَرِ}. ومن مناداة أبي هريرة بذلك بأمر أبي بكر يوم النّحر، فدلّ على أنّ المراد بيوم الحجّ الأكبر يوم النّحر" انتهى.

هذا الحديث مما ذكره الطّحاويّ في مشكل الآثار كما قال الحافظ في الفتح (8/ 318) وقال: قال الطّحاويّ:"هذا مشكل؛ لأنّ الأخبار في هذه القصّة تدلّ على أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث أبا بكر بذلك، ثم أتبعه عليًّا فأمره أن يؤذّن، فكيف يبعث أبو بكر أبا هريرة ومن معه بالتأذين مع صرف الأمر عنه في ذلك إلى علي؟" ثم أجاب بما حاصله: إنّ أبا بكر كان الأمير على الناس في تلك الحجّة بلا خلاف، وكان علي هو المأمور بالتّأذين بذلك. وكأنّ عليًّا لم يطق التّأذين بذلك وحده، واحتاج إلى من يعينه على ذلك، فأرسل معه أبو بكر أبا هريرة وغيره ليساعدوه على ذلك.

ثم ساق من طريق المحرز بن أبي هريرة، عن أبيه، قال:"كنت مع علي حين بعثه النبيّ صلى الله عليه وسلم ببراءة إلى أهل مكة. فكنتُ أنادي معه بذلك حتى يصحل صوتي، وكان ينادي قبلي حتى يعيى" أخرجه أحمد (2/ 299)، وابن حبان (3820)، وغيرهما. انظر: شرح مشكل الآثار (9/ 225 - 227).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে তাদের মধ্যে পাঠিয়েছিলেন যারা কুরবানীর দিন মিনায় এই ঘোষণা দিবে: "এই বছর কোনো মুশরিক যেন হজ্জ না করে এবং কোনো উলঙ্গ ব্যক্তি যেন কা'বার তাওয়াফ না করে।" আর কুরবানীর দিন হলো হাজ্জে আকবর (বৃহত্তম হজ্জ)। আর একে আকবর (বৃহত্তম) বলার কারণ হলো লোকে এটিকে হাজ্জে আসগর (ক্ষুদ্র হজ্জ) বলে থাকে। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই বছর লোকদের কাছে এই ঘোষণা পৌঁছে দিলেন। ফলে, বিদায় হজ্জের বছর—যে বছর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করেছিলেন—কোনো মুশরিক হজ্জ করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (5120)


5120 - عن ابن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم وقف يوم النّحر بين الجمرات في الحجّة التي حجّ، فقال:"أيّ يوم هذا؟". قالوا: يوم النّحر. قال:"هذا يوم الحجّ الأكبر".

صحيح: رواه أبو داود (1945)، وابن ماجه (3058)، وصححّه الحاكم (2/ 331)، والبيهقيّ (5/ 139) من حديث هشام بن الغاز، قال: سمعت نافعًا يحدّث عن ابن عمر، فذكره. واللّفظ لأبي داود.

ولفظ ابن ماجه والحاكم أطول منه، فإنهما ذكرا خطبة النبيّ صلى الله عليه وسلم كاملة. وعلّقه البخاريّ (1742) عن هشام بن الغاز.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السّياقة، وأكثر هذا المتن مخرّج في الصحيحين إلا قوله:"إنّ يوم الحجّ الأكبر يوم النّحر". فإنّ الأقاويل فيه عن الصّحابة والتابعين رضي الله عنهم على خلاف بينهم فيه. فمنهم من قال: يوم عرفة، ومنهم من قال: يوم النحر".

وهشام بن الغاز هو الجرشي الشامي وهو ثقة، وثقه ابن معين، وقال أحمد: صالح الحديث.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সেই হজ্জে (যেটি তিনি করেছিলেন) কুরবানীর দিন জামরাসমূহের মাঝখানে দাঁড়িয়েছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আজ কোন দিন?" তারা বলল: "কুরবানীর দিন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা হলো হজ্জে আকবরের (মহত্তম হজ্জের) দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5121)


5121 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: خطبنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم النّحر على ناقة له حمراء مخضرمة، فقال:"هذا يوم النّحر، وهذا يوم الحجّ الأكبر".

صحيح: رواه الإمام أحمد (1588) عن وكيع، قال: حدّثنا شعبة، عن عمرو بن مرة، عن مرة الطيب، قال: حدثني رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم في غرفتي هذه، حسبتُ قال (فذكره).

وإسناده صحيح. عمرو بن مرة هو ابن عبد الله بن طارق الجملي المرادي من رجال الجماعة.

ومرة الطيب هو ابن شراحيل الهمداني أبو إسماعيل الكوفيّ، يقال له: مرة الطيب من رجال الجماعة.
وفي الباب ما رُوي عن عمرو بن الأحوص، أنّه شهد حجّة الوداع مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فحمد الله وأثنى عليه، وذكّر ووعظ، ثم قال:"أي يوم أحْرم؟ أيّ يوم أحرم؟ أيّ يوم أحرم؟" قال: فقال الناسُ: يوم الحجّ الأكبر يا رسول الله، قال (فذكر بقية الحديث).

رواه الترمذيّ (3087) عن الحسن بن علي الخلال، حدّثنا حسين بن علي الجعفيّ، عن زائدة، عن شبيب بن غرقدة، عن سليمان بن عمرو بن الأحوص، عن أبيه، فذكره.

وسليمان بن عمرو"مقبول" كما في التقريب. وقال ابن القطان:"مجهول". والحديث رواه أبو داود، وابن ماجه أيضًا في خطب النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع. انظر فيه مزيدًا من التخريج.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن علي بن أبي طالب، قال: سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن يوم الحجّ الأكبر؟ فقال:"يوم النّحر".

رواه الترمذيّ (3088) عن عبد الوارث بن عبد الصّمد بن عبد الوارث، حدّثنا أبي، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

ورواه أيضًا من حديث سفيان، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي، قال:"يوم الحجّ الأكبر يوم النّحر".

قال الترمذيّ:"هذا الحديث أصحّ من حديث محمد بن إسحاق؛ لأنّه رُوي من غير وجه هذا الحديث عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي موقوفًا. ولا نعلم أحدًا رفعه إلّا ما رُوي عن محمد بن إسحاق. وقد روى شعبة هذا الحديث عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن مرة، عن الحارث، عن علي، موقوفًا".

قلت: مع وقفه على علي بن أبي طالب رضي الله عنه، ففيه أبو إسحاق مختلط ومدلّس، وشيخه الحارث وهو ابن عبد الله الأعور الهمدانيّ فيه كلام معروف، وقد رُمي بالكذب.

هذا وقد اختلف أهل العلم في قوله تعالى: {يَوْمَ الْحَجِّ الْأَكْبَرِ}. فقيل: هو يوم عرفة، وقيل: يوم النّحر، وقيل: أيام الحجّ كلّها. ونسب هذه الأقوال ابنُ جرير في تفسيره إلى أصحابها، ثم قال:"وأولى الأقوال في ذلك بالصّحة عندنا قولُ من قال: {يَوْمَ الْحَجِّ الْأَكْبَرِ} يوم النحر؛ لتظاهر الأخبار عن جماعة من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أنّ عليًّا نادى بما أرسله به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من الرّسالة إلى المشركين وتلا عليهم"براءة" يوم النّحر ....". تفسير الطبري




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরবানীর দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর একটি লাল (রঙের) কাটা কানওয়ালা উষ্ট্রীর উপর আরোহণ করে আমাদের মাঝে খুতবা (ভাষণ) দিলেন এবং বললেন: "এটি হলো কুরবানীর দিন, আর এটি হলো সর্বশ্রেষ্ঠ হজের দিন (ইয়াওমুল হাজ্জিল আকবার)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5122)


5122 - عن جابر بن عبد الله، قال: فأجاز رسول الله صلى الله عليه وسلم حتّى أتي عرفة، فوجد القبّة قد ضُربتْ له بنمرة فنزل بها، حتّى إذا زاغت الشمسُ أمر بالقصواء فرحلت له، فأتى بطن الوادي، فخطب الناس وقال:"إنّ دماءكم وأموالكم حرام عليكم كحرمة
يومكم هذا في شهركم هذا في بلدكم هذا، ألا كلّ شيء من أمر الجاهليّة تحت قدمي موضوع، ودماء الجاهليّة موضوعة. وإنْ أوّل دم أضع من دمائنا دم ابن ربيعة ابن الحارث -كان مسترضعًا في بني سعد فقتلته هذيل- وربا الجاهلية موضوع وأوّل ربا أضعُ ربانا ربا عباس بن عبد المطلب فإنه موضوع كلّه، فاتقوا الله في النّساء فإنّكم أخذتموهن بأمان الله، واستحللتم فروجهن بكلمة الله ولكم عليهن أن لا يوطئن فرشكم أحدًا تكرهونه، فإن فعلن ذلك فاضربوهن ضربًا غير مبرح، ولهنّ عليكم رزقهن وكسوتهن بالمعروف. وقد تركت فيكم ما لن تضلوا بعده إن اعتصمتم به كتاب الله، وأنتم تُسألون عنّي فما أنتم قائلون؟" قالوا: نشهدُ أنّك قد بلّغتَ وأدّيتَ ونصحتَ. فقال: بإصبعه السّبابة يرفعها إلى السماء وينكتها إلى النّاس"اللهم اشهدْ، اللَّهم اشهد" ثلاث مرات، ثم أذّن، ثم أقام فصلّى الظّهر، ثم أقام فصلّى العصر، ولم يصل بينهما شيئا.

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره في حديث حجّة النّبيّ صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলতে থাকলেন, অবশেষে তিনি আরাফায় পৌঁছলেন। তিনি দেখতে পেলেন যে তাঁর জন্য নামিরায় একটি তাঁবু স্থাপন করা হয়েছে। তিনি সেখানে অবতরণ করলেন। যখন সূর্য হেলে পড়ল, তখন তিনি 'কাসওয়া' নামক উষ্ট্রীকে প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন। উষ্ট্রীকে তাঁর জন্য প্রস্তুত করা হলো। তিনি উপত্যকার মাঝখানে আসলেন এবং মানুষের উদ্দেশে খুতবা (ভাষণ) দিলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের রক্ত ও তোমাদের সম্পদ তোমাদের জন্য হারাম, যেমন হারাম এই দিনে, তোমাদের এই মাসে এবং তোমাদের এই শহরে (মক্কা)। জেনে রেখো! জাহিলিয়্যাতের সমস্ত কিছু আমার দুই পায়ের নিচে রাখা হলো (বাতিল করা হলো)। আর জাহিলিয়্যাতের সমস্ত রক্তপাতের দাবিও বাতিল করা হলো। আর আমাদের রক্তের মধ্যে সর্বপ্রথম আমি যে রক্তপাতের দাবি বাতিল করছি, তা হলো ইবনু রাবী'আ ইবনুল হারিসের রক্ত—সে বানী সা'দ গোত্রে দুধপানরত অবস্থায় ছিল, আর হুযাইল গোত্র তাকে হত্যা করেছিল। জাহিলিয়্যাতের সুদ (এর দাবি) বাতিল করা হলো। আর আমি সর্বপ্রথম যে সুদ বাতিল করছি, তা হলো আমাদের সুদ, আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিবের সুদ। এই সবই বাতিল করা হলো। তোমরা নারীদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো। কেননা, তোমরা তাদেরকে আল্লাহর আমানত হিসেবে গ্রহণ করেছ এবং আল্লাহর কালেমার মাধ্যমে তাদের লজ্জাস্থানকে হালাল করেছ। তাদের ওপর তোমাদের অধিকার হলো—তারা যেন তোমাদের অপছন্দনীয় কাউকে তোমাদের বিছানায় (ঘরে) প্রবেশ করতে না দেয়। যদি তারা তা করে, তবে তোমরা তাদেরকে হালকাভাবে প্রহার করতে পারো, যা কোনো আঘাতের সৃষ্টি করবে না। আর তোমাদের ওপর তাদের অধিকার হলো—নিয়মানুযায়ী তাদের খাবার ও পোশাকের ব্যবস্থা করা। আমি তোমাদের মধ্যে এমন জিনিস রেখে গেলাম, তোমরা তা দৃঢ়ভাবে ধারণ করলে এরপর কখনো পথভ্রষ্ট হবে না—তা হলো আল্লাহর কিতাব। তোমাদেরকে আমার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হবে। তখন তোমরা কী বলবে?" তারা বললো: "আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছেন, দায়িত্ব পালন করেছেন এবং উপদেশ দিয়েছেন।" অতঃপর তিনি তাঁর শাহাদাত আঙুল আকাশের দিকে তুলে ধরলেন এবং তা মানুষের দিকে নামিয়ে ইশারা করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো, হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো,"—এই কথাটি তিনবার বললেন। এরপর আযান দিলেন, তারপর ইকামত দিলেন এবং যোহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর আবার ইকামত দিলেন এবং আসরের সালাত আদায় করলেন। এই দুই সালাতের মাঝে তিনি আর কোনো সালাত আদায় করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (5123)


5123 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّته:"أيّ يوم أعظم حرمة؟" قالوا: يومنا هذا. قال: فأيّ شهر أعظم حرمة؟ قالوا: شهرنا هذا. قال:"فأيّ بلد أعظم حرمة؟". قالوا: بلدنا هذا. قال:"فإنّ دماءكم وأموالكم عليكم حرام كحرمة يومكم هذا، في شهركم هذا، في بلدكم هذا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (14365) عن أبي معاوية، حدّثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن جابر، فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أيضًا (14990) عن محمد بن عبيد، حدّثنا الأعمش، بإسناده، وفيه جمع جميع الفقرات في سياق واحد، وهو قوله:"فإنّ دماءكم، وأموالكم، عليكم حرام كحرمة يومكم هذا، في بلدكم هذا، في شهركم هذا. هل بلغت؟" قالوا: نعم. قال:"اللَّهمّ، اشْهد" وذلك بعد السّؤال منهم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হজ্জের সময় (উপস্থিত লোকদের লক্ষ্য করে) জিজ্ঞেস করলেন, "কোন দিনটি সবচেয়ে বেশি মর্যাদাপূর্ণ (পবিত্র)?" তারা বলল: আমাদের এই দিনটি। তিনি বললেন: "কোন মাসটি সবচেয়ে বেশি মর্যাদাপূর্ণ?" তারা বলল: আমাদের এই মাসটি। তিনি বললেন: "কোন শহরটি সবচেয়ে বেশি মর্যাদাপূর্ণ?" তারা বলল: আমাদের এই শহরটি। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের রক্ত এবং তোমাদের সম্পদ তোমাদের উপর পবিত্র ও অলঙ্ঘনীয়, যেমন পবিত্র তোমাদের এই দিনে, তোমাদের এই মাসে, তোমাদের এই শহরে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5124)


5124 - عن أبي بكرة، قال: خطبنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم يوم النّحر، قال:"أتدرون أيُّ يوم هذا؟" قلنا: الله ورسولُه أعلم، فسكت حتّى ظننا أنّه سيسمِّيه بغير اسْمه. قال:"أليس يوم النّحر؟" قلنا: بلى. قال:"أيُّ شهر هذا؟" قلنا: الله ورسوله أعلم، فسكت حتّى ظننا أنه سيُسمِّيه بغير اسمه. فقال:"أليس ذو الحجّة؟". قلنا: بلى، قال:"أيُّ بلد هذا؟". قلنا: الله ورسوله أعلم، فسكتَ حتّى ظننا أنه سيسمّيه بغير اسمه، قال:
"أليست بالبلدة الحرام؟" قلنا: بلى، قال:"فإنّ دماءكم، وأموالكم، عليكم حرام كحرمة يومكم هذا، في شهركم هذا، في بلدكم هذا، إلى يوم تلقون ربَّكم، ألا هلْ بلغتُ؟". قالوا: نعم. قال:"اللَّهمّ، اشْهد، فليبلِّغ الشّاهدُ الغائب، فربَّ مبلَّغ أوعى من سامع، فلا ترجعوا بعدي كفّارًا، يضربُ بعضُكم رقاب بعض".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1741)، ومسلم في القسامة (1679: 31) كلاهما من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمرو، حدّثنا قرة بن خالد، حدّثنا محمد بن سيرين، أخبرني عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة رضي الله عنه، فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

ورواه البخاريّ في المغازي (4406)، ومسلم في القسامة (1679: 29) كلاهما من طريق عبد الوهاب الثقفيّ، حدّثنا أيوب، عن محمد بن سيرين، به، أنه قال:"إنّ الزّمان قد استدار كهيئة يوم خلق الله السماوات والأرض، السنة اثنا عشر شهرًا، منها أربعةٌ حُرم، ثلاثة متواليات: ذو القَعدة، وذو الحِجّة، والمحرم، ورجب شهر مضر الذي بين جمادى وشعبان". ثم قال:"أيّ شهر هذا؟" ثم ذكره بنحوه. وزاد بعد قوله:"فإنّ دماءكم وأموالكم" قال محمد -يعني ابن سيرين-: وأحسبه قال:"وأعراضكم".

ورواه البخاريّ في العلم (67)، ومسلم في القسامة (1679: 30) كلاهما من طريق عبد الله بن عون، عن محمد بن سيرين، به، قال:"لما كان ذلك اليوم، قعد على بعيره، وأخذ إنسان بخطامه، فقال:"أتدرون أيّ يوم هذا" فذكره بنحوه، وفيه قوله:"وأعراضكم" بالجزم.

وزاد مسلمُ في آخره: قال:"ثم انكفأ إلى كبشين أملحين فذبحهما، وإلى جزيعة من الغنم فقسمها بيننا".

وهي زيادة مدرجة ليست من حديث أبي بكرة، وإنّما هي من رواية محمد بن سيرين، عن أنس ابن مالك في خطبة عيد الأضحى، كما في الصحيحين، وغيرهما.

قال القاضي عياض:"والأشبه أنّ هذه الزّيادة إنما هي في حديث آخر في خطبة عيد الأضحى، فوهم فيها الرّاوي، فذكرها مضمومة إلى خطبة الحجة، أو هما حديثان ضمّ أحدهما إلى الآخر، وقد ذكر مسلم هذا بعد هذا في كتاب الضّحايا من حديث أيوب وهشام عن ابن سيرين، عن أنس:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم صلّى، ثم خطب، فأمر من كان ذبح قبل الصلاة أن يعيد" ثم قال في آخر الحديث:"فانكفأ رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى كبشين أملحين فذبحهما، فقام الناسُ إلى غنيمة فتوزّعوها" فهذا هو الصّحيح، وهو دافع للاشكال" اهـ. نقلًا عن شرح صحيح مسلم للنووي (11/ 170 - 171).

ويراجع أيضًا العلل الدارقطني سؤال (1265)، (1268) فقد أعلّه بنحو ذلك، ووهّم راويه عبد الله بن عون.

قلت: وحديث أنس المشار إليه سيأتي تخريجه في كتاب الأضاحي.




আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরবানীর দিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের মাঝে ভাষণ দিলেন। তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো, এটি কোন দিন?" আমরা বললাম: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি নীরব রইলেন, এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে তিনি হয়তো এর অন্য কোনো নাম বলবেন। তিনি বললেন: "এটা কি কুরবানীর দিন নয়?" আমরা বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই। তিনি বললেন: "এটি কোন মাস?" আমরা বললাম: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি নীরব রইলেন, এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে তিনি হয়তো এর অন্য কোনো নাম বলবেন। অতঃপর তিনি বললেন: "এটা কি যুল-হাজ্জাহ মাস নয়?" আমরা বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই। তিনি বললেন: "এটি কোন শহর?" আমরা বললাম: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি নীরব রইলেন, এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে তিনি হয়তো এর অন্য কোনো নাম বলবেন। তিনি বললেন: "এটা কি হারাম (সম্মানিত) শহর নয়?" আমরা বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই। তিনি বললেন: "সুতরাং, তোমাদের রক্ত (জীবন) এবং তোমাদের সম্পদ তোমাদের জন্য হারাম, যেমন হারাম হলো তোমাদের এই দিন, তোমাদের এই মাস এবং তোমাদের এই শহর। (এই নিষেধাজ্ঞা জারি থাকবে) সেই দিন পর্যন্ত, যেদিন তোমরা তোমাদের রবের সঙ্গে সাক্ষাৎ করবে। সাবধান! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি?" তারা বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থেকো। উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তির কাছে পৌঁছে দেয়। কেননা, যার কাছে বার্তা পৌঁছানো হয়, সে কখনও কখনও শ্রোতার চেয়ে অধিক স্মৃতিমান হয়। তোমরা আমার পরে কাফিরে পরিণত হয়ো না যে, তোমরা একে অপরের গর্দান মারবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5125)


5125 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بينا هو واقف يخطب يوم النّحر، فقام إليه رجل، فقال: ما كنتُ أحسب يا رسول الله أن كذا وكذا قبل كذا وكذا. ثم جاء آخر فقال: يا رسول الله! كنت أحسب أن كذا قبل كذا وكذا لهؤلاء الثلاث، قال:"افعلْ ولا حرج".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1737)، ومسلم في الحجّ (1206) كلاهما من حديث الزهري، عن عيسى بن طلحة، عن عبد الله بن عمرو، فذكره، ولفظهما سواء.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর (নাহরের) দিন দাঁড়িয়ে খুতবা দিচ্ছিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে দাঁড়ালো এবং বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো মনে করিনি যে এই কাজটি এই কাজের পূর্বে করা উচিত। অতঃপর আরেকজন আসলো এবং বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আমি মনে করেছিলাম যে এই কাজটি এই কাজের পূর্বে করা উচিত। এই তিনজনের (যারা হজের কাজের ক্রম নিয়ে প্রশ্ন করেছিল) জন্য তিনি বললেন, "তুমি তা করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5126)


5126 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، قال: كانتِ العرب يجعلون عامًا شهرًا، وعامين شهرين، فلا يصيبون الحجّ في أيام الحجّ إلّا في خمس وعشرين سنة مرة، وهو النسيء الذي ذكره الله في كتابه. فلما حجّ أبو بكر بالنّاس وافق العام الحجّ، فسماه الله الحجّ الأكبر، وحجّ رسول الله صلى الله عليه وسلم من العام المقبل، فاستقبل الناسُ الأهلّة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الزّمان قد استدار كهيئة يوم خلق الله السّماوات والأرض".

حسن: رواه الطّحاويّ في شرح مشكل الآثار (1457) عن جعفر بن محمد بن الحسن الفريابيّ، قال: حدّثنا الصّلت بن مسعود الجحدريّ، قال: حدّثنا محمد بن عبد الرحمن الطُّفاويّ، قال: حدّثنا داود بن أبي هند، عن عمرو بن شعيب، عن جدّه، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، ومحمد بن عبد الرحمن الطّفاوي فإنّهما حسنا الحديث إذا لم يخالفا.

قال بعض أهل العلم: إنّما أخّر النبيّ صلى الله عليه وسلم الحجّ ليوافق أهل الحساب، فلمّا استدار الزّمان كهيئته حجّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم ليوافق حجّ النّاس بعده إلى يوم القيامة.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আরবরা এক বছরকে এক মাস এবং দুই বছরকে দুই মাস ধরে নিত। ফলে পঁচিশ বছরে একবারই কেবল তারা হজের দিনগুলোতে হজ করতে পারত। এটিই হলো 'আন-নাসি' (মাস পিছিয়ে দেওয়া), যার উল্লেখ আল্লাহ তাঁর কিতাবে করেছেন। এরপর যখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের নিয়ে হজ করলেন, তখন সেই বছরটি হজের (যথার্থ) মাসেই এসেছিল। তাই আল্লাহ এটিকে 'আল-হাজ্জুল আকবার' (বৃহত্তর হজ) নাম দিলেন। আর যখন এর পরের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ করলেন, তখন মানুষ (সঠিকভাবে) নতুন চাঁদ দেখল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই সময় চক্রাকারে তার সেই অবস্থানে ফিরে এসেছে, যে রূপে আল্লাহ আসমান ও যমীন সৃষ্টি করেছিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5127)


5127 - عن ابن عباس: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب النّاس يوم النّحر فقال:"يا أيُّها النّاسُ، أيُّ يوم هذا؟"، قالوا: يومٌ حرام. قال:"فأيُّ بلد هذا؟"، قالوا: بلدٌ حرام. قال:"فأيُّ شهرٍ هذا؟"، قالوا: شهرٌ حرامٌ. قال:"فإنّ دماءكم، وأموالَكم، وأعراضَكم عليكم حرام، كحُرمة يومكم هذا، في بلدكم هذا، في شهركم هذا". فأعادها مرارًا، ثم رفع رأسه فقال:"اللَّهمّ! هل بلّغت، اللَّهمّ؟ هل بلّغت، اللهمّ! هل بلّغت؟". قال ابن عباس رضي الله عنهما: فوالذي نفسي بيده، إنّها لوصيتُه إلى أمّته:"فليبلِّغ الشّاهدُ الغائب، لا ترجعوا بعدي كفّارًا يضربُ بعضكم رقاب بعض".

صحيح: رواه البخاريّ (1739) عن علي بن عبد الله (هو ابن المديني)، حدثني يحيى بن سعيد
(هو القطّان)، حدّثنا فضيل بن غزوان، حدّثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন লোকদের সামনে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "হে লোকসকল! এটা কোন দিন?" তারা বললেন: সম্মানিত (হারাম) দিন। তিনি বললেন: "এটা কোন শহর?" তারা বললেন: সম্মানিত (হারাম) শহর। তিনি বললেন: "এটা কোন মাস?" তারা বললেন: সম্মানিত (হারাম) মাস। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের রক্ত, তোমাদের সম্পদ এবং তোমাদের মান-সম্মান তোমাদের জন্য হারাম, যেমন হারাম তোমাদের এই দিনের পবিত্রতা, তোমাদের এই শহরের পবিত্রতা এবং তোমাদের এই মাসের পবিত্রতা।" তিনি তা বহুবার পুনরাবৃত্তি করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর মাথা উপরে তুলে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছাতে পেরেছি? হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছাতে পেরেছি? হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছাতে পেরেছি?" ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার জীবন, এটা তাঁর উম্মতের প্রতি তাঁরই উপদেশ: "উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তির কাছে পৌঁছে দেয়। তোমরা আমার পরে কুফরি করে যেও না, যেখানে তোমরা একে অপরের ঘাড় কাটবে।