আল-জামি` আল-কামিল
5281 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما بعث الله نبيًا إلا رعى الغنم" فقال أصحابه: وأنت؟ فقال:"نعم كنت أرعاها على قراريط لأهل مكة".
صحيح: رواه البخاري في الإجارة (2262) عن أحمد بن محمد المكي، عن عمرو بن يحيي ابن سعيد القرشي، عن جده، عن أبي هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ এমন কোনো নবী প্রেরণ করেননি, যিনি বকরির চারণ করেননি (মেষপালন করেননি)।” তখন তাঁর সাহাবীগণ বললেন: আপনিও? তিনি বললেন: “হ্যাঁ, আমি মক্কাবাসীর জন্য সামান্য ক্বিরাতের (মুদ্রার) বিনিময়ে মেষ চরাতাম।”
5282 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كان زكريا نجارًا".
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2379) عن هدَّاب بن خالد، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أبي رافع، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাকারিয়া (আঃ) ছিলেন একজন কাঠমিস্ত্রি।"
5283 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده لأن يأخذ أحدكم حبله فيحتطب على ظهره خيرٌ له من أن يأتي رجلًا أعطاه الله من فضله فيسأله أعطاه أو منعه".
متفق عليه: رواه مالك في الصدقة (60) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه البخاري في الزكاة (1470) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك، ورواه مسلم في الزكاة (1042)
من وجه آخر عن أبي هريرة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! তোমাদের কারো জন্য তার রশি নিয়ে পিঠে করে কাঠ সংগ্রহ করে আনা ঐ ব্যক্তির কাছে এসে কিছু চাওয়ার চেয়ে উত্তম, যাকে আল্লাহ তাঁর অনুগ্রহে সম্পদ দান করেছেন; অতঃপর লোকটি তাকে দিক বা না দিক।"
5284 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بينما أيوب يغتسل عريانًا خرَّ عليه رجل جراد من ذهب، فجعل يحثي في ثوبه، فنادى ربه: يا أيوب، ألم أكن أغنيتك عما ترى؟ قال: بلى يا رب، ولكن لا غني لي عن بركتك".
صحيح: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3391) عن عبد الله بن محمد الجحفي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن همام، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: একবার আইয়ূব (আঃ) উলঙ্গ অবস্থায় গোসল করছিলেন, তখন তাঁর ওপর সোনার পঙ্গপালের দল পড়তে লাগল। তখন তিনি সেগুলোকে তাঁর কাপড়ে ভরতে শুরু করলেন। তখন তাঁর রব তাঁকে ডেকে বললেন: হে আইয়ূব! আমি কি তোমাকে এই যা দেখছ, তা থেকে অমুখাপেক্ষী করিনি? তিনি বললেন: অবশ্যই, হে আমার রব! কিন্তু আপনার বরকতের প্রয়োজন থেকে আমি অমুখাপেক্ষী হতে পারি না।
5285 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"خير الكسب كسب يد العامل إذا نصح".
حسن: رواه الإمام أحمد (8412، 8691) من طريقين عن محمد بن عمار كشَّاكش مؤذن مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سمعت سعيدا المقبري قال: سمع أبا هريرة فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمَّار بن حفص بن عمر بن سعد القرظ المدني، المؤذن، الملقب بـ كشَّاكش -بتشديد الشين الأولى-؛ فإنه حسن الحديث. قال أحمد: ما أري به بأسا. وقال ابن المديني: لم يكن به بأسا. وقال ابن المديني: ثقة. وذكره ابن حبان في الثقات (7/ 436)، وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 61)، وقال: رجاله ثقات.
وقوله:"إذا نصح" أي إذا أخلص في عمله. ويدخل في هذا البناؤون والكتَّاب.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “সর্বোত্তম উপার্জন হলো শ্রমিকের হাতের উপার্জন, যদি সে নিষ্ঠাবান হয়।”
5286 - عن الزبير بن العوام، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لأن يأخذ أحدكم حبله فيأتي بحُزمة الحطب على ظهره فيبيعها فيكف الله بها وجهه خيرٌ له من أن يسأل الناس أعطوه أو منعوه".
صحيح: رواه البخاري في الزكاة (1471) عن موسي، حدثنا وهيب، حدثنا هشام، عن أبيه، عن الزبير بن العوام، به.
যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যদি তার রশি বা দড়ি নেয়, অতঃপর পিঠের উপর কাঠের বোঝা বহন করে আনে এবং তা বিক্রি করে, যার মাধ্যমে আল্লাহ তার মুখমণ্ডলকে (ভিক্ষার লাঞ্ছনা থেকে) রক্ষা করেন, তবে তা মানুষের কাছে চাওয়ার চেয়ে তার জন্য উত্তম – চাই তারা তাকে দিক বা না দিক।"
5287 - عن عائشة قالت: كان أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عُمَّال أنفسهم، وكان يكون لهم أرواح، فقيل لهم:"لو اغتسلتم".
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2071) ومسلم في الجمعة (6/ 847) من طريق عروة بن الزبير، عن عائشة، قالت فذكرته.
وجاء عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه أنه قال:"لقد علم قومي أن حِرفتي لم تكن تعجز عن مؤنة أهلي، وشغلت بأمر المسلمين، فسيأكل آل أبي بكر من هذا المال، ويحترف للمسلمين فيه".
رواه البخاري في البيوع (2070) عن إسماعيل بن عبد الله، حدثني علي بن وهب، عن أبي يونس، أخبرني عروة به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবীগণ নিজেরাই নিজেদের কাজ করতেন (শ্রমিক ছিলেন), আর (পরিশ্রমের কারণে) তাদের দেহে দুর্গন্ধ হতো। তাই তাদের বলা হলো: 'যদি তোমরা গোসল করে নিতে!'।
আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার গোত্রের লোকেরা অবশ্যই জানত যে আমার পেশা আমার পরিবারের খরচ যোগাতে কখনো অক্ষম ছিল না। (কিন্তু এখন) আমি মুসলিমদের কাজ নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়েছি। সুতরাং আবূ বাকরের পরিবার এই সম্পদ (রাষ্ট্রীয় কোষাগার) থেকে গ্রহণ করবে, আর আমি মুসলিমদের জন্য তাতে (কাজে) নিযুক্ত থাকব।
5288 - عن معاذ بن عبد الله بن خبيب، عن أبيه، عن عمه، قال: كنا في مجلس.
فجاء النبي صلى الله عليه وسلم وعلى رأسه أثر ماء، فقال له بعضنا: نراك اليوم طيب النفس. فقال:"أجل. والحمد لله" ثم أفاض القوم في ذكر الغني، فقال:"لا بأس بالغني لمن اتقى، والصحةُ لمن اتقى خير من الغنى، وطيب النفس من النعيم".
حسن: رواه ابن ماجه (2141) واللفظ له وأحمد (23158) والحاكم (2/ 3) كلهم من حديث عبد الله بن سليمان، حدثنا معاذ بن عبد الله فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن سليمان، وهو ابن أبي سلمة الأسلمي القبائي وثّقه ابن معين، وقال أبو حاتم: لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثقات. وفيه أيضا معاذ بن عبد الله بن خُبيب، وهو الجهني، وثّقه أبو داود، وضعَّفه الدارقطني.
وقال الحاكم:"هذا حديث مدني صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، والصحابي الذي لم يسمه سليمان بن بلال (الراوي عن عبد الله بن سليمان) هو يسار بن عبد الله الجهني". انتهي.
كذا قال! ولا يظهر لي أن يكون اسم الصحابي يسار بن عبد الله؛ فإنه لا يوجد في كتب التراجم من الصحابة من كان اسمه يسار بن عبد الله.
ووالد معاذ هو عبد الله بن خبيب وعمه صحابيان، ولكن لم أقف على اسم عمه حتى الآن.
আবদুল্লাহ ইবনু খুবাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (তাঁর চাচা হতে) বলেন: আমরা একটি মজলিসে ছিলাম। এমন সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এলেন। তাঁর মাথার ওপর পানির চিহ্ন ছিল। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ তাঁকে বলল: আজ আপনাকে খুবই প্রফুল্ল মনে হচ্ছে। তিনি বললেন: "হ্যাঁ, আলহামদুলিল্লাহ (সকল প্রশংসা আল্লাহর)।" এরপর লোকেরা ধনী হওয়া বা প্রাচুর্য নিয়ে আলোচনা শুরু করল। তখন তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহকে ভয় করে (মুত্তাকি), তার জন্য ধনী হওয়া দোষের নয়, আর যে আল্লাহকে ভয় করে (মুত্তাকি), তার জন্য সুস্থতা সম্পদ অপেক্ষা উত্তম, আর মনের প্রফুল্লতাও একটি নেয়ামত।"
5289 - عن ابن عمر قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أطيب الكسب؟ فقال:"عمل الرجل بيده، وكل بيع مبرور".
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (2161) عن أحمد (بن زهير)، عن الحسن بن عرفة قال: ثنا قدامة بن شهاب المازني، ثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن وبرة بن عبد الرحمن، عن ابن عمر فذكره.
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن إسماعيل إلا قدامة، تفرد به الحسن بن عرفة".
قلت: الحسن بن عرفة حسن الحديث، وقد وثّقه ابن معين، وقال النسائي، والدارقطني: لا بأس به. وذكره ابن حبان في ثقاته (8/ 179).
وهذا الحديث ذكره المنذري في"الترغيب والترهيب" (2725)، وقال بعد أن عزاه للطبراني في الكبير والأوسط:"رواته ثقات".
وقوله:"بيع مبرور" أي بيع لم يخالطه إثم، ولا حلف كاذب ونحوه.
وأما ما روي عن رافع بن خديج قال: قيل يا رسول الله، أي الكسب أطيب؟ فقال:"عمل الرجل بيده، وكل بيع مبرور" فوقع فيه أخطاء.
رواه أحمد (17265) عن يزيد، حدثنا المسعودي، عن وائل أبي بكر، عن عباية بن رفاعة بن رافع بن خديج، عن جده رافع بن خديج فذكره.
والمسعودي هو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة، ومن طريقه رواه الحاكم (2/ 10).
وأخطأ فيه المسعودي؛ لأنه اختلط بأخرة، فجعله موصولا. والصحيح من رواية من رواه عن وائل، عن سعيد بن عمير، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، كما قال البيهقي.
ورواه شريك، عن وائل عن جُميع بن عمير، عن خاله قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم فذكره مثله.
ورواه أحمد (15836)، والحاكم، وعنه البيهقي (5/ 263) كلهم من حديث الأسود، عن عامر قال: حدثنا شريك بإسناده، وخال جُميع بن عمير هو أبو بردة.
قال البيهقي:"هكذا رواه شريك بن عبد الله القاضي، وغلط فيه في موضعين: أحدهما في قوله: جميع بن عمير، وإنما هو سعيد بن عمير، والآخر في وصله، وإنما رواه غيره عن وائل مرسلا".
وقال في شعب الإيمان (1228) عن سعيد بن عمير مرسلا. وهذا هو المحفوظ، وأخطأ من قال: عن عمه.
قلت: وحديث سعيد بن عمير عن عمه، وهو البراء بن عازب، رواه الحاكم، وعنه البيهقي عن الأسود بن عامر، عن سفيان الثوري، عن وائل بن داود، عن سعيد بن عمير، عن عمه قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
قال الحاكم:"وهذا حديث صحيح الإسناد. ووائل بن داود وابنه بكر ثقتان، وقد ذكر يحيى ابن معين أن عم سعيد بن عمير البراء بن عازب، وإذا اختلف الثوري وشريك فالحكم للثوري". انتهى كلامه.
ولا يشك أحدٌ في تقديم الثوري على شريك، ولكن اختلف على الثوري نفسه، فرواه الأسود ابن عامر عنه موصولا، وأرسله غيره عنه، كما قال البيهقي.
وقد أكَّد البخاري في"التاريخ الكبير" (3/ 502) بقوله:"وأسنده بعضهم وهو خطأ" (أي أن الصحيح أنه مرسل)، وكذلك قال أيضا أبو حاتم بأن الثقات الثوري وجماعته رووا عن وائل بن داود، عن سعيد بن عمير، عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال:"والمرسل أشبه"."العلل" (2/ 443).
وانظر للمزيد"المنة الكبرى" (5/ 7، 9).
وأما عم سعيد بن عمير فهو البراء بن عازب، كما قال يحيى. وقال غيره: هو أبو بردة بن نيار، ولا يضر هذا الاختلاف؛ فإن الصحبة ثابتة للاثنين.
وجُميع بن عمير ضعيف، قال فيه البخاري: فيه نظر. وقال ابن حبان: كان رافضيا يضع الحديث. ولكن وثّقه العجلي.
وسعيد بن عمير بن نيار -بكسر النون- لم يوثّقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ:"مقبول". أي عند المتابعة، ولم أقف على متابعة له، فهو ليِّن الحديث.
الخلاصة أن هذا الحديث لا يخلو من اضطراب في إسناده، وضعف في رجاله.
وأما قول الهيثمي في"المجمع" (4/ 60):"وفيه المسعودي، وهو ثقة، لكنه اختلط، وبقية
رجال أحمد رجال الصحيح" فليس بصحيح.
وأما ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"أكذب الناس الصباغون والصواغون" فهو ضعيف جدا.
رواه ابن ماجه (2152)، وأحمد (7920)، والبيهقي (10/ 249)، وابن حبان في المجروحين (859) كلهم من طريق همام بن يحيى، عن فرقد، عن يزيد بن عبد الله بن الشخير، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل فرقد، وهو ابن يعقوب السبخي، مختلف فيه، فوثّقه الدارمي، وقال ابن معين:"ليس به بأس". وضعفه جمهور أهل العلم. وقالوا: أحاديثه مناكير.
وقال ابن حبان:"كان فيه غفلة ورداءة حفظ، وكان يهم فيما يروي، فكان يرفع المراسيل، وهو لا يعلم، ويسند الموقوف من حيث لا يفهم، فلما كثر ذلك منه، وفحش مخالفته الثقات بطل الاحتجاج به".
وله أسانيد أسوأ من هذا ذكره ابن حبان في"المجروحين" وابن عدي في" الكامل"، وابن الجوزي في"العلل المتناهية"، والذهبي في"الميزان"، وابن أبي حاتم في"العلل"، وغيرهم.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সর্বোত্তম উপার্জন সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "মানুষের স্বহস্তে উপার্জিত কাজ এবং প্রত্যেক সৎ ব্যবসা।"
5290 - عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ولد الرجل من كسبه، من أطيب كسبه، فكلوا من أموالهم".
حسن: رواه أبو داود (3529)، وأحمد (24951)، ومن طريقه الحاكم (2/ 45، 46) كلهم من حديث محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن الحكم، عن عمارة بن عمير، عن أمه، عن عائشة فذكرته.
قال أبو داود عقبه:"حماد بن أبي سليمان زاد فيه"إذا احتجتم" وهو منكر". أي بهذه الزيادة.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه. وعن سفيان الثوري فيه إسناد آخر بلفظ آخر، وليس يعلل أحد الإسنادين الآخر".
وحديث سفيان الثوري هو ما رواه أبو داود (3528) عن محمد بن كثير، عنه، عن منصور، عن إبراهيم، عن عمارة بن عمير، عن عمته أنها سألت عائشة: في حجري يتيم آكل من ماله؟ فقالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"إن من أطيب ما أكل الرجل من كسبه وولده من كسبه". ورواه أيضًا النسائي (4449)، وأحمد (24032) كلاهما من حديث سفيان إلا أنهما لم يذكرا القصة.
ورواه الأعمش، واختلف عليه:
فرواه سفيان عنه، عن إبراهيم، كما رواه منصور. ومن هذا الطريق رواه النسائي (4450)، وأحمد (24135).
ورواه يحيي بن زكريا بن أبي زائدة، عن الأعمش، عن عمارة بن عمير، عن عمته، عن عائشة فذكرت مثله.
ومن هذا الطريق رواه ابن ماجه (2290)، والترمذي (1358)، وقال: حديث حسن صحيح.
وقال: وقد روى بعضهم هذا عن عمارة بن عمير، عن أمه، عن عائشة. وأكثرهم قالوا: عن عمته، عن عائشة.
ورواه الفضل بن موسى عند النسائي (4451)، وأبو معاوية محمد بن حازم الضرير عند ابن ماجه (2137)، وابن حبان (4261)، وشريك عند ابن حبان أيضا (4260) وأحمد (25845).
وكذا يعلى بن عبيد كما أشار إليه البيهقي (7/ 480).
كل هؤلاء -أعني- الفضل بن موسى، وأبو معاوية، وشريك، ويعلى بن عبيد -عن الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، فذكرت مثله.
قال البيهقي: وهو بهذا الإسناد غير محفوظ.
ونقل البيهقي عن سفيان بن عبد الملك قال: سألت عبد الله بن المبارك عن حديث عائشة"فهم وأموالهم لكم إذا احتجتم إليها". فقال: حدثني به سفيان، عن حماد، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة. قال سفيان: وهذا وهمٌ من حماد.
قال عبد الله: سألت أصحاب سفيان عن هذا الحديث، فلم يحفظوا. قال عبد الله: وهذا من حديثه عن عمارة بن عمير، وليس فيه الأسود، وليس فيه:"إذا احتجتم". انتهى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মানুষের সন্তান তার উপার্জনের অংশ, বরং তার উত্তম উপার্জনের অংশ। অতএব তোমরা তাদের সম্পদ থেকে ভক্ষণ করো।”
5291 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: أتى أعرابي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إن أبي يريد أن يجتاح مالي. قال:"أنت ومالك لأبيك، إن أطيب ما أكلتم من كسبكم، وإن أموال أولادكم من كسبكم فكلوه هنيئًا".
حسن: رواه أحمد (6678)، وابن الجارود في"المنتقى" (995)، والبيهقي (7/ 480) كلهم من حديث يحيي بن سعيد، حدثنا عبيد الله بن الأخنس، حدثني عمرو بن شعيب فذكره.
ورواه أبو داود (3530) من حديث حبيب المعلم، وابن ماجه (2292) من حديث حجاج بن أرطاة كلاهما عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
والحجاج بن أرطاة فيه كلام معروف إلا أنه توبع.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন (আরব) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এসে বলল: আমার পিতা আমার সম্পদ সম্পূর্ণভাবে নিয়ে নিতে চান। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এবং তোমার সম্পদ তোমার পিতার জন্য। নিশ্চয় তোমরা যা খাও, তার মধ্যে তোমাদের উপার্জনই হলো সবচেয়ে উত্তম, আর তোমাদের সন্তানের সম্পদ তোমাদের উপার্জন থেকেই। সুতরাং তোমরা তা সানন্দে ভোগ করো।"
5292 - عن جابر بن عبد الله، أن رجلا قال: يا رسول الله، إن لي مالا وولدًا، وإن أبي يريد أن يجتاح مالي، فقال"أنت ومالك لأبيك".
حسن: رواه ابن ماجه (2291) عن هشام بن عمار قال: حدثنا عيسي بن يونس قال: حدثنا
يوسف بن إسحاق، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره. وإسناده حسن من أجل شيخ ابن ماجه؛ فإنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات.
وقوله:"أنت ومالك لأبيك" أي أنه إذا احتاج إلى مالك يأخذ منك قدر حاجته. لا أن له أن يجتاح جميع ماله على الوجه الصحيح أو غير الصحيح، فهذا لم يقل به أحد من الفقهاء.
وقال البيهقي (7/ 481):"من زعم أن مال الولد لأبيه، احتج بظاهر هذا الحديث. ومن زعم أن له من ماله ما يكفيه إذا احتاج إليه، فإذا استغني عنه لم يكن للأب من ماله شيء، احتج بالأخبار التي وردت في تحريم مال الغير، وأنه لو مات وله ابن، لم يكن للأب من ماله إلا السدس، ولو كان أبوه يملك مال ابنه لحازه كله".
জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার সম্পদ ও সন্তানাদি আছে, আর আমার পিতা আমার সম্পদ সম্পূর্ণরূপে নিয়ে নিতে চান।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এবং তোমার সম্পদ তোমার পিতার জন্য।"
5293 - عن جابر بن عبد الله، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"رحم الله رجلا سمحا إذا باع، وإذا اشترى، وإذا اقتضى".
صحيح: رواه البخاري في البيوع (2076) عن علي بن عيَّاش، حدثنا أبو غسان محمد بن مطرِّف، حدثني محمد بن المنكدر، عن جابر به.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ সেই ব্যক্তির প্রতি দয়া করুন, যে উদার (সহজ, সহনশীল) যখন সে বিক্রি করে, যখন সে ক্রয় করে এবং যখন সে (পাওনা) দাবি করে।"
5294 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"غفر الله لرجل كان قبلكم كان سهلًا إذا باع، وسهلا إذا اشترى، وسهلًا إذا اقتضى".
حسن: رواه الترمذي (1320) عن عباس الدوري، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا إسرائيل، عن زيد بن عطاء بن السائب، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره.
قال الترمذي:"حديث صحيح حسن غريب من هذا الوجه".
قلت: فيه زيد بن عطاء بن السائب، وهو الثقفي الكوفي، روى عنه عدد إلا أنه لم يوثّقه غير ابن حبان، لأنه لم يكن معروفًا كما قال أبو حاتم. ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي عند المتابعة، وقد توبع في الأصل في الحديث السابق. أشار إليه البيهقي في الصغرى بعد أن أخرج الحديث من طريق عبد الوهاب بن عطاء، فقال: ورواه أيضا أبو غسان، عن محمد بن المنكدر.
وأخرجه أيضا من هذا الوجه في"الكبري" (5/ 357 - 358)، ولكنه لم يشر إلى هذه المتابعة. انظر"المنة الكبرى" (5/ 206).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা তোমাদের পূর্বের এক ব্যক্তিকে ক্ষমা করে দিয়েছেন, যে সহজ ছিল যখন সে বিক্রি করত, সহজ ছিল যখন সে ক্রয় করত এবং সহজ ছিল যখন সে (ঋণ) পাওনা দাবি করত।"
5295 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دخل رجل الجنة بسماحته قاضيا ومقتضيا".
حسن: رواه أحمد (6963) عن عبد الصمد، حدثني أبي، حدثنا حبيب -يعني المعلم-، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو فذكره. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛
فإنه حسن الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক ব্যক্তি তার উদারতা ও সহজ ব্যবহারের কারণে জান্নাতে প্রবেশ করেছে—যখন সে দাতা ছিল এবং যখন সে গ্রহীতা ছিল।"
5296 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اسمح يُسمح لك".
صحيح: رواه أحمد (2233)، والطبراني في"الصغير" (1169)، والقضاعي في مسند الشهاب (648)، والبيهقي في شعب الإيمان (11258) كلهم من حديث الوليد بن مسلم، حدثنا ابن جريج، حدثنا عطاء، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.
وفي الباب ما روي عن عثمان أنه اشترى من رجلٍ أرضًا فأبطأ عليه، فلقيه، فقال له: ما منعك من قبض مالك؟ قال: إنك غبنتني، فما ألقي من الناس أحدا إلا وهو يلومني. قال: أو ذلك يمنعك؟ قال: نعم. قال: فاختر بين أرضك ومالك، ثم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أدخل الله عز وجل الجنة رجلا كان سهلا مشتريا، وبائعا، وقاضيا، ومقتضيا".
رواه ابن ماجه (2202)، والنسائي (4696)، وأحمد (410) كلهم من حديث إسماعيل بن عليَّه، عن يونس بن عبيد، عن عطاء بن فرُّوخ قال: قال عثمان فذكره.
وعطاء بن فرُّوخ لم يوثّقه غير ابن حبان (5/ 204) ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد من تابعه.
وفيه علة أخرى، وهي الانقطاع؛ فإن عطاء بن فرُّوخ لم يلق عثمان، كما قال ابن المديني في كتابه"العلل" وبه أعله البوصيري في"مصباح الزجاجة".
وفي الباب أيضا عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن الله يحب سمح البيع، سمح الشراء، سمح القضاء".
رواه الترمذي (1319) عن أبي كريب، ثنا إسحاق بن سليمان الرازي، عن مغيرة بن مسلم، عن يونس، عن الحسن، عن أبي هريرة فذكره.
وأكد الأئمة النقاد أن الحسن لم يسمع من أبي هريرة شيئا، وهو مدلس، وقد عنعن.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب". أي ضعيف.
وقال:"وقد روى بعضهم هذا الحديث عن يونس، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة". اهـ. وخطَّأه البخاري، كما في"العلل الكبير" (1/
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নম্র হও, তবে তোমার প্রতিও নম্রতা দেখানো হবে।"
আর এই বিষয়ে (অন্যান্য) বর্ণনা এসেছে যে, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক ব্যক্তির কাছ থেকে একটি জমি কিনেছিলেন। কিন্তু সে ব্যক্তি মূল্য গ্রহণ করতে বিলম্ব করল। অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং তাকে বললেন: তোমার সম্পদ গ্রহণ করতে তোমাকে কিসে বাধা দিচ্ছে? লোকটি বলল: আপনি আমাকে ঠকিয়েছেন, আমি এমন কারো সাথে সাক্ষাৎ করি না যে আমাকে দোষারোপ করে না। তিনি (উসমান) বললেন: এটি কি তোমাকে বাধা দিচ্ছে? সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাহলে তোমার জমি অথবা তোমার সম্পদের মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নাও। অতঃপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা সেই ব্যক্তিকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন, যে ক্রেতা হিসেবে, বিক্রেতা হিসেবে, বিচারক হিসেবে এবং ঋণগ্রহীতা হিসেবে সহজ ও নম্র ছিল।"
এই বিষয়ে আরো আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা সেই ব্যক্তিকে ভালোবাসেন, যে বিক্রিতে নম্র, কেনাকাটায় নম্র এবং ঋণ পরিশোধে নম্র।"
5297 - عن حكيم بن حزام قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"البيعان بالخيار ما لم يتفرقا، فإن صدقا وبينا بورك لهما في بيعهما، وإن كتما وكذبا مُحقت بركة بيعهما".
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2079)، ومسلم في البيوع (1532) من طريق شعبة، عن قتادة، عن صالح أبي الخليل، عن عبد الله بن الحارث، عن حكيم بن حزام فذكره.
وقال العقيلي في"الضعفاء الكبير" في ترجمة محمد بن عبد الرحمن بن أبي بكر الجدعاني:"ويُروى من غير طريقه بإسناد جيد".
كذا قال! ولم أقف على إسناد يقال: إنه جيد، اللَّهم إلا ما ذكره ابن عدي عن محمد بن خالد بن يزيد، نا إبراهيم بن سلم ابن أخي العلاء، نا يحيى بن سعيد القطان، نا عبيد الله بن عمر بإسناده.
وفيه متابعة للجدعاني، ولكن آفته إبراهيم بن سلم، فقد قال ابن عدي:"منكر الحديث ليس بالمعروف". ومن طريق ابن عدي أخرجه ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (1/ 315).
وله طريق ثالث، وفيه محمد بن الفضل، قال أحمد:"ليس بشيء، حديثه حديث أهل الكذب". ذكره ابن الجوزي.
3 - حديث أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم بارك لأمتي في بكورها يوم الخميس".
رواه ابن ماجه (2237) عن أبي مروان محمد بن عثمان العثماني قال: حدثنا محمد بن ميمون المدني، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.
ومحمد بن ميمون المدني لعله الزعفراني أبو النضر ضعيف عند أكثر أهل العلم.
وشيخه عبد الرحمن بن أبي الزناد مختلف فيه، فضعفه ابن معين، وأحمد، والنسائي، وغيرهم، ومشاه البعض، وهو حسن الحديث في الشواهد والمتابعات.
4 - حديث علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم بارك لأمتي في بكورها".
رواه أبو يعلي (425)، وعبد الله بن أحمد في زوائد المسند (1320)، والبزار -كشف الأستار (1248) -، والعقيلي في الضعفاء (2/ 323) كلهم من حديث عبد الواحد بن زياد، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن النعمان بن سعد، عن علي بن أبي طالب فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن علي مرفوعا إلا بهذا الإسناد، والنعمان بن سعد لا نعلم أسند عنه إلا عبد الرحمن بن إسحاق. وهو عبد الرحمن بن إسحاق أبو شيبة الواسطي حدث عنه عبد الواحد ابن زياد، ومحمد بن فضيل، وأبو معاوية، والقاسم بن مالك المزني. ومروان بن معاوية صالح الحديث". انتهي.
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 60):"عبد الرحمن بن إسحاق ضعيف".
قلت: عبد الرحمن بن إسحاق بن الحارث الواسطي أبو شيبة ضعفه جمهور أهل العلم، منهم أحمد، وابن معين، وأبو حاتم، وابن حبان، والعجلي، وغيرهم. وذكر العقيلي هذا الحديث من مناكيره.
ونقل الترمذي في"العلل الكبير" (1/ 478) عن البخاري أنه قال:"يضعف عبد الرحمن، ونظرت في حديثه فإذا حديثه مقارب".
وانفرد البزار بقوله:"صالح الحديث".
5 - حديث عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اللَّهم بارك لأمتي في بكورها".
رواه أبو يعلى (5406، 5409) من طريقين عن علي بن عابس النخعي أبي الحسن، حدثنا العلاء بن المسيب، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
وفيه علي بن عابس النخعي الأسدي الكوفي ضعيف، ضعفه ابن معين. وقال الجوزجاني (57):"ضعيف واهي الحديث". وضعفه النسائي، والأزدي. وقال ابن حبان:"فحش خطؤه فاستحق الترك". وفي التقريب:"ضعيف".
وبه أعله أيضا الهيثمي في"المجمع" (3/ 60) بعد أن عزاه لأبي يعلى، والطبراني في الكبير.
وفيه ثمة علة أخرى، وهي أن المسيب وهو ابن رافع الأسدي الكوفي لم يسمع من عبد الله بن مسعود شيئا، كما قال الإمام أحمد. انظر"جامع التحصيل" (768).
6 - وحديث عبد الله بن سلام: رواه أبو يعلى، والطبراني في الكبير.
وفيه هشام بن زياد، وهو ضعيف جدا.
7 - وحديث أنس: رواه البزار (كشف الأستار 1249).
وقال البزار:"عنبسة لين الحديث".
كذا قال! وتعقبه ابن القطان في"الوهم والإيهام" (3/ 486):"وليس كذلك، بل هو عندهم في عداد من يضع الحديث قاله أبو حاتم. وقال الترمذي عن البخاري:"هو ذاهب الحديث". انتهى. وقال الهيثمي:"متروك".
8 - وحديث ابن عباس: رواه البزار (كشف الأستار 1250).
وفيه عمرو بن مساور ضعيف. وقال البزار:"ولم يكن بالقوي".
9 - وحديث عائشة: رواه البزار (كشف الأستار (1247)، وفيه إسماعيل بن قيس بن سعد بن زيد بن ثابت، وهو ضعيف.
10 - وحديث نبيط بن شريط: رواه الطبراني في الصغير.
قال الهيثمي:"وفيه جماعة لم أعرفهم".
11 - وحديث أبي بكرة: رواه الطبراني في الصغير والأوسط، وفيه الخليل بن زكريا، وهو كذاب.
12 - وحديث جابر: رواه الطبراني في الأوسط. قال الهيثمي:"ورجاله ثقات إلا شيخ الطبراني أحمد بن مسعود المقدسي. لم أجد من ترجمه".
13 - وحديث كعب بن مالك: رواه الطبراني في الكبير، وفيه عمار بن هارون، وهو متروك.
14 - وحديث النواس بن سمعان الكلابي: رواه الطبراني في الكبير، وفيه عمار بن هارون، وهو متروك.
15 - وحديث عمران بن حصين: رواه الطبراني في الأوسط والصغير، وفيه المعلى بن نزلة،
وهو متروك. انظر"مجمع الزوائد" (4/ 60 - 61).
16 - وحديث أبي ذر: قال ابن الجوزي:"تفرد به علي بن هشام، عن عفان، وعلي كالمجهول، وهو أنه وُجد في كتابه فلا يعول عليه". انتهي.
17 - وحديث بريدة: رواه ابن السكن قال: حدثنا يحيى بن محمد بن صاعد، حدثنا الحسين ابن الحسن المروزي، حدثنا أوس بن عبد الله المروزي، حدثنا الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكر الحديث. ساقه ابن القطان في"الوهم والإيهام" (3/ 488).
وفيه أوس بن عبد الله بن بريدة المروزي قال البخاري:"فيه نظر". وقال الدارقطني:"متروك". كذا في الميزان. وكلام الدارقطني نقله أيضا ابن الجوزي في"العلل المتناهية". وقال ابن القطان:"أوس بن عبد الله المذكور منكر الحديث".
18 - وحديث واثلة: له طريقان، ففي الطريق الأول: عمر بن هارون، قال يحيى:"كذاب خبيث". وفي الطريق الثاني: حكيم بن خذام، قال الرازي:"متروك الحديث". وفيه محمد بن الوليد. قال ابن عدي:"كان يضع الحديث، ويوصله، ويسرق". قاله ابن الجوزي.
19 - وحديث العرس بن عميرة: يرويه يحيى بن زهدم قال ابن حبان:"يروي عن أبيه نسخة موضوعة، لا يحل كتبها إلا على التعجب". ذكره ابن الجوزي.
20 - وحديث أبي رافع: رواه العقيلي في"الضعفاء" (1/ 236) من طريق الحسن بن عمرو بن سيف العبدي قال: حدثنا علي بن سويد بن منجوف، عن عبيد الله بن أبي رافع فذكره.
نقل العقيلي عن البخاري قال:"حدثنا الحسن بن عمرو، وهو كذاب".
ونقل ابن الجوزي عن الدارقطني أنه قال:"تفرد به علي بن سويد عن عبيد الله بن أبي رافع، وتفرد به الحسن بن عمرو بن سيف. قال علي بن المديني، والبخاري: الحسن كذاب". انتهى.
وقد ورد في بعض الأحاديث تخصيص البكور يوم الخميس والسبت، وكلها لا يصح.
ذكر أحاديث هؤلاء الهيثمي في"المجمع" (3/ 61 - 62)، وبين عللها، وابن الجوزي في"العلل المتناهية" (1/ 314 - 327)، وقال:"هذه الأحاديث كلها لا تثبت". ثم بين عللها، وكذا قال أيضا ابن القطان في"الوهم والإيهام" (3/ 488):"وليس هو عندي بصحيح". وقد سبق مثل هذا القول من أبي حاتم بأنه قال:"لا أعلم فيه حديثا صحيحا".
قلت: وهو كما قال، ولكن تشهد كثرة شواهده، واختلاف مخارجه بأن له أصلا، وإن لم يثبت أحد بعينه. فلا وجه لكلام المنذري في"الترغيب والترهيب" بعد أن ذكر عدد الصحابة، فقال:"وفي كثير من أسانيدها مقال، وبعضها حسن". وكذلك ما نقله السخاوي في"المقاصد الحسنة" (ص 99) عن شيخه (وهو الحافظ ابن حجر)، فقال:"قال شيخنا: ومنها ما يصح، ومنها ما لا يصح، وفيها الحسن والضعيف".
والحق أنه ليس فيه صحيح أو حسن، ولكن مجموعه يفيد بأن له أصلا. ولذا اكتفى المناوي في"فيض القدير" (2/ 104) بعد نقل كلام ابن الجوزي والمنذري بقول أبي حاتم:"لا أعلم فيه حديثا صحيحا". وبالله التوفيق.
হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ক্রেতা ও বিক্রেতা উভয়েই ততক্ষণ পর্যন্ত ইখতিয়ার (পছন্দের অধিকার) রাখবে যতক্ষণ না তারা পরস্পর বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়। যদি তারা উভয়ে সত্য কথা বলে এবং স্পষ্টভাবে (পণ্যের দোষগুণ) বর্ণনা করে, তবে তাদের বেচাকেনায় বরকত দেওয়া হয়। আর যদি তারা গোপন করে এবং মিথ্যা বলে, তবে তাদের বেচাকেনার বরকত মুছে ফেলা হয়।"
5298 - عن عبد الله بن عمر أن رجلا ذكر لرسول الله صلى الله عليه وسلم أنه يُخدع في البيوع، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا بايعت فقل: لا خلابة" قال: فكان الرجل إذا بايع يقول: لا خلابة.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (98) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر فذكره.
ورواه البخاري في البيوع (2117) من طريق مالك به.
ورواه مسلم في البيوع (1533) من وجه آخر عن عبد الله بن دينار به.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উল্লেখ করল যে তাকে ক্রয়-বিক্রয়ে ধোঁকা দেওয়া হয়। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যখন তুমি বেচাকেনা করবে, তখন বলো: 'লা খালাবাহ' (কোনো ধোঁকা নেই)।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর থেকে লোকটি যখনই বেচাকেনা করত, তখনই বলত: 'লা খালাবাহ' (কোনো ধোঁকা নেই)।
5299 - عن أنس بن مالك أن رجلا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يبتاع، وفي عقدته ضعف، فأتي أهله نبي الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا: يا نبي الله، احجر على فلان؛ فإنه يبتاع، وفي عقدته ضعف، فدعاه النبي صلى الله عليه وسلم، فنهاه عن البيع، فقال: يا نبي الله، إني لا أصبر عن البيع، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن كنت غير تارك البيع فقل: هاء وهاء، ولا خلابة".
حسن: رواه أبو داود (3501)، وابن الجارود في"المنتقي" (568)، وابن حبان (5049)، والحاكم (4/ 101)، والبيهقي (6/ 62)، وأحمد (13276) كلهم من حديث عبد الوهاب بن عطاء الخفاف، أخبرنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الوهاب الخفاف؛ فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد توبع، ولكن شيخه سعيد بن أبي عروبة اختلط في آخره إلا أن عبد الوهاب الخفاف ممن سمع منه قبل الاختلاط.
ورواه الترمذي (1250)، وابن ماجه (2354)، والنسائي (4485) كلهم من طريق عبد الأعلى ابن عبد الأعلى، عن سعيد بن أبي عروبة به.
وعبد الأعلى ممن سمع من سعيد بعد الاختلاط، ولكن متابعة عبد الوهاب الذي سمع منه قبل الاختلاط تدل على أن سعيدا لم يختلط في هذا الحديث.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি ক্রয়-বিক্রয় করত, কিন্তু তার চুক্তিতে দুর্বলতা ছিল (অর্থাৎ সে সহজে প্রতারিত হতো)। তখন তার পরিবারের লোকেরা আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর নবী! আপনি অমুক ব্যক্তির উপর (সম্পত্তি ব্যবহারে) নিষেধাজ্ঞা আরোপ করুন; কারণ সে বেচাকেনা করে, অথচ তার চুক্তিতে দুর্বলতা রয়েছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডাকলেন এবং তাকে বেচাকেনা করতে নিষেধ করলেন। লোকটি বলল: হে আল্লাহর নবী! আমি বেচাকেনা ছাড়া ধৈর্য ধারণ করতে পারি না (অর্থাৎ বেচাকেনা বন্ধ করতে পারি না)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি বেচাকেনা না ছেড়ে থাকো, তবে (লেনদেনের সময়) বলো: 'এই নাও আর এই নাও' (অর্থাৎ সহজে ও স্পষ্ট করে লেনদেন করো), এবং (মনে রাখবে) কোনো প্রতারণা করবে না।"
5300 - عن محمد بن يحيى بن حبان قال: هو جدي منقذ بن عمرو -وكان رجلا قد أصابه أَمَّةٌ في رأسه فكسرت لسانه- وكان لا يدع على ذلك التجارة، وكان لا يزال يُغْبَنُ، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فقال له:"إذا أنت بايعت فقل: لا خلابة، ثم
أنت في كل سلعة ابتعتها بالخيار ثلاث ليال، فإن رضيت فأمسك، وإن سخطت فارددها على صاحبها".
حسن: رواه ابن ماجه (2355) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا عبد الأعلى، عن محمد ابن إسحاق، عن محمد بن يحيى بن حبان، قال: هو جدي منقذ بن عمرو -وكان رجلا قد أصابته أَمَّةٌ في رأسه، فذكره.
ومحمد بن إسحاق مدلس، ولكن جاء التصريح منه في سماع هذه القصة من محمد بن يحيى بن حبان في مواضع، كما أن محمد بن يحيى بن حبان تابعي، لم يدرك قصة جده، ولكن روي من أوجه تشير إلى أنه سمعها من غيره، عن جده، وتفصيل ذلك ما رواه أحمد (6134) والدارقطني (3011) كلاهما من حديث محمد بن إسحاق، حدثنا نافع أن عبد الله بن عمر حدثه أن رجلا من الأنصار كان بلسانه لوثة، وكان لا يزال يغبن في البيوع، فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر ذلك له، فقال:"إذا بعت فقل: لا خلابة" مرتين، واللفظ للدارقطني.
وهذا الرجل المبهم من الأنصار هو منقذ بن عمرو كما في الرواية التي ساقها الدارقطني، عطفا على الرواية السابقة، فقال: قال محمد (يعني: ابن إسحاق)، وحدثني محمد بن يحيى بن حبان، قال: هو جدي منقذ بن عمرو، وكان رجلا قد أصابته أَمَّة في رأسه، فكسرت لسانه ونزعت عقله، وكان لا يدع التجارة، ولا يزال يغبن، فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر ذلك فقال:"إذا بايعت، فقل: لا خلابة، ثم أنت في كل سلعة تبتاعها بالخيار ثلاث ليال، فإن رضيت فأمسك، وإن سخطت فارددها على صاحبها"، وقد كان عُمِّرَ عمرا طويلا، عاش ثلاثين ومائة سنة، وكان في زمن عثمان ابن عفان رضي الله عنه حين فشا الناس وكثروا، يبتاع البيع في السوق، ويرجع به إلى أهله وقد غُبِنَ غبنا قبيحا، فيلومونه، ويقولون: لِمَ تبتاعُ؟ فيقول: فأنا بالخيار إن رضيت أخذت، وإن سخطت رددت، وقد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم جعلني بالخيار ثلاثا، فيرد السلعة على صاحبها من الغد وبعد الغد، فيقول: والله لا أقبلها، قد أخذت سلعتي، وأعطيتني دراهم، قال: يقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد جعلني بالخيار ثلاثا، فكان يمر الرجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فيقول للتاجر: ويحك إنه قد صدق، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان جعله بالخيار ثلاثا.
وفيه تصريح لمحمد بن إسحاق كما أن محمد بن يحيى بن حبان سمع الزبير، فيكون الإسناد متصلا. ورواه ابن أبي شيبة (37481) عن عباد بن العوام، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن يحيى بن حبان، قال: إنما جعل ابن الزبير عهدة الرقيق ثلاثة لقول رسول الله صلى الله عليه وسلم لمنقذ بن عمرو:"قل: لا خلابة، إذا بعت بيعا، فأنت بالخيار ثلاثا".
فكان محمد بن إسحاق يروي مرة مختصرا، وأخرى مطولا، كما أن ابن عمر يروي مرة بالقصة وأخرى بدونها.
وبهذه الطرق وغيرها التي تجاوزت عنها حسن هذا الحديث، ولا اضطراب فيه، إلا أن الخيار لثلاثة أيام كان خاصة له دون غيره.
وقوله:"لا خلابة" أي لا خديعة، يقال: خلبت الرجل إذا خدعته خلبا وخلابة بكسر الخاء. قال الشاعر: شر الرجال الخالب المخلوب.
وفي الحديث دليل على أن المحجور كالصبي لا ينفذ بيعه؛ فإن قول النبي صلى الله عليه وسلم له:"لا خلابة" بمقام المحجور إذا غبن، وأراد أهله الرجوع عن البيع والشراء.
وقول النبي صلى الله عليه وسلم له:"قل: لا خلابة" وإن كان خاصا به، ولكن يقاس عليه كل متخلف عقلا.
إلا أن أكثر الفقهاء ذهبوا إلى أن المتبايعين إذا صدرا عن رضا، وكانا عاقلين غير محجورين، فغبن أحدهما فلا يرجع فيه، ذكر قول الفقهاء هذا الخطابي في"المعالم".
মুহাম্মদ ইবন ইয়াহইয়া ইবন হাব্বান থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, ইনি আমার দাদা মুনকিয ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি এমন একজন লোক ছিলেন যার মাথায় আঘাত লেগেছিল, ফলে তার কথা বলার শক্তি ভেঙে গিয়েছিল (অস্পষ্ট হয়ে গিয়েছিল)। এতদসত্ত্বেও তিনি ব্যবসা ত্যাগ করেননি এবং তিনি ক্রমাগত লোকসানের শিকার হতেন (প্রতারিত হতেন)। অতঃপর তিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন এবং বিষয়টি তাঁকে জানালেন। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "যখন তুমি বেচাকেনা করবে, তখন বলবে: 'কোনো ধোঁকাবাজি নেই (লা খালাবাহ)।' এরপর তুমি যে কোনো পণ্য ক্রয় করো না কেন, তুমি তিন রাত পর্যন্ত তার (গ্রহণ বা প্রত্যাখ্যানের) ব্যাপারে ইখতিয়ার (ঐচ্ছিকতা) পাবে। যদি তুমি সন্তুষ্ট হও, তাহলে তা রেখে দাও; আর যদি তুমি অসন্তুষ্ট হও, তবে তা তার মালিকের কাছে ফিরিয়ে দাও।"