হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5261)


5261 - عن عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمره أن يردف عائشة فيُعمرها من التنعيم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1784)، ومسلم في الحج (1212) كلاهما من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن عمرو (هو ابن دينار)، سمع عمرو بن أوس، أن عبد الرحمن بن أبي بكر أخبره، فذكره.




আবদুর রহমান ইবনু আবী বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নির্দেশ দিয়েছিলেন যে, তিনি যেন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর সাথে সওয়ার (বাহনের পেছনে বসিয়ে) করে নিয়ে যান এবং তানঈম থেকে তাঁকে উমরাহ করান।









আল-জামি` আল-কামিল (5262)


5262 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عام حجّة الوداع … فلما قضينا الحجَّ أرسلني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مع عبد الرحمن بن أبي بكر إلى التنعيم، فاعتمرتُ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1556)، ومسلم في الحج (1211: 111) كلاهما من طريق مالك، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، به.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা বিদায় হজ্জের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে বের হলাম... যখন আমরা হজ্ব সম্পন্ন করলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আবদুর রহমান ইবনু আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তান‘ঈমের দিকে পাঠালেন। অতঃপর আমি উমরাহ সম্পন্ন করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5263)


5263 - عن حفصة بنت عبد الرحمن بن أبي بكر، عن أبيها أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لعبد الرحمن:"يا عبد الرحمن، أردف أختك عائشة فأعمرها من التنعيم، فإذا هبطت بها من الأكمة فلتحرم فإنها عمرة متقبّلة".

صحيح: رواه أبو داود (1995)، والإمام أحمد (1710)، والحاكم (3/ 477)، والبيهقي (4/ 357 - 358) كلّهم من حديث داود بن عبد الرحمن العبدي المكي، حدثني عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن يوسف بن ماهك، عن حفصة بنت عبد الرحمن، فذكرته. وإسناده صحيح.

وقال الذهبي:"سنده قوي".

وقوله:"فإنّها عمرة متقبلة". زيادة صحيحة زادتها حفصة بنت عبد الرحمن وهي تابعية ثقة.




আবদুর রহমান ইবনে আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে আবদুর রহমান! তুমি তোমার বোন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তোমার সাথে নিয়ে নাও এবং তানঈম থেকে তাকে উমরাহ করাও। যখন তুমি তাকে নিয়ে টিলা থেকে নিচে নামবে, তখন সে যেন ইহরাম বাঁধে। কেননা এটি একটি কবুলকৃত উমরাহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (5264)


5264 - عن جابر بن عبد الله، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أهلَّ وأصحابه بالحجّ … وأنّ عائشة حاضتْ، فنسكتْ المناسك كلَّها غير أنَّها لم تَطف بالبيت، قال: فلمّا طهُرتْ وطافتْ قالت: يا رسول الله، أتنطلقون بعمرة وحجّة، وأنطلق بالحجّ؟ فأمر عبد الرحمن بن أبي بكر أن يخرج معها إلى التنعيم، فاعتمرت بعد الحجّ في ذي الحجة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1785) من طريق حبيب المعلِّم، عن عطاء (هو ابن أبي رباح)، حدثني جابر بن عبد الله، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (1216) من أوجه أخرى -غير حبيب المعلّم-، عن عطاء، به، وليس فيه هذا اللّفظ.

لكن رواه (1213) من طريق أبي الزبير، عن جابر، بنحوه. ولفظه:" … فقالت: يا رسول الله، إني أجدُ في نفسي أني لم أطُفْ بالبيت حتى حججت. قال:"فاذهب بها يا عبد الرحمن، فأعمرها من التنعيم". وذلك ليلة الحصبة.

وكان إذن النبي صلى الله عليه وسلم لعائشة تطبيًا لخاطرها، وإلّا فيكره الخروج من مكة لعمرة تطوع؛ لأنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يفعله ولا أصحابه لا في رمضان ولا في غيره، والطّواف بالبيت أفضل من الخروج اتفاقًا، علمًا بأنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يأمر عبد الرحمن بن أبي بكر أن يعتمر مع عائشة.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ হজ্জের জন্য ইহরাম বাঁধলেন। আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর ঋতুস্রাব শুরু হলো। তিনি বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করা ছাড়া হজ্জের সকল অনুষ্ঠান সম্পন্ন করলেন। বর্ণনাকারী বলেন: যখন তিনি পবিত্র হলেন এবং তাওয়াফ করলেন, তখন তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনারা তো উমরাহ ও হজ্জ নিয়ে প্রত্যাবর্তন করছেন, আর আমি কি শুধু হজ্জ নিয়ে ফিরব? অতঃপর তিনি আব্দুল রহমান ইবন আবী বাকরকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি তাঁর (আয়িশা) সাথে তানঈম পর্যন্ত যান। অতঃপর তিনি যিলহজ্জ মাসে হজ্জের পরে উমরাহ করলেন।

অন্য বর্ণনায় আছে যে, তিনি (আয়িশা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি মনে কষ্ট পাচ্ছি যে, আমি হজ্জ শেষ করার আগে বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করতে পারিনি। তিনি বললেন, “হে আব্দুল রহমান! তাকে নিয়ে যাও, আর তানঈম থেকে তাকে উমরাহ করাও।” এটি ছিল হাসবার রাতে।









আল-জামি` আল-কামিল (5265)


5265 - عن أنس بن مالك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم اعتمر أربع عمر، كلّهنّ في ذي القعدة إلا التي مع حجّته: عمرة من الحديبية -أو زمن الحديبية- في ذي القعدة، وعمرة من العام المقبل في ذي القعدة، وعمرة من جعرانة حيث قسم غنائم حنين في ذي القعدة، وعمرة مع حجته.

متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1778)، ومسلم (1253) كلاهما من طريق همّام، حدثنا قتادة، أن أنسًا، أخبره، فذكره.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারটি উমরাহ করেছিলেন। তাঁর হজ্জের সাথে যে উমরাহটি ছিল তা ব্যতীত বাকি সবগুলোই যুল-কা'দাহ মাসে ছিল। (সেগুলো হলো:) যুল-কা'দাহ মাসে হুদায়বিয়া থেকে (অথবা হুদায়বিয়ার সময়ে) একটি উমরাহ; পরবর্তী বছর যুল-কা'দাহ মাসে একটি উমরাহ; যুল-কা'দাহ মাসে জি’র্রানাহ থেকে একটি উমরাহ, যখন তিনি হুনাইনের যুদ্ধলব্ধ সম্পদ বণ্টন করেছিলেন; এবং একটি উমরাহ তাঁর হজ্জের সাথে।









আল-জামি` আল-কামিল (5266)


5266 - عن أبي هريرة في قوله تعالي: {بَرَاءَةٌ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ} [سورة التوبة: 1] قال: لما قفل النبيّ صلى الله عليه وسلم من حنين اعتمر من الجعرانة، ثم أمّر أبا بكر على تلك الحجّة.

صحيح: رواه ابن خزيمة (3078) وعنه ابن حبان (3707) عن أحمد بن منصور الرماديّ، ثنا عبد الرزاق، أخبرني معمر، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী {আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের পক্ষ থেকে বিচ্ছেদ ঘোষণা} [সূরা আত-তাওবা: ১] প্রসঙ্গে তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইন যুদ্ধ থেকে ফিরলেন, তিনি জি'রানা থেকে উমরাহ পালন করলেন, অতঃপর তিনি আবু বকরকে সেই হজ্জের (আমীর) দায়িত্ব দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5267)


5267 - عن معاوية، قال: قصَّرتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بمشقص.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1730) عن أبي عاصم، عن ابن جريج، عن الحسن بن مسلم، عن طاوس، عن ابن عباس، عن معاوية، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (1246: 210) من وجه آخر عن يحيى بن سعيد، عن ابن جريج بإسناده، وفيه:"قصَّرتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بمشقص وهو على المروة، أو رأيته يُقصَّر عنه بمشقص وهو على المروة" هكذا بالشّك.

ورواه البيهقيّ (5/ 102) من وجه آخر عن روح، قال: أخبرني ابن جريج، بإسناده وزاد فيه:"في عمرته على المروة".

فالظّاهر من هذا أن هذا التقصير كان في عمرته صلى الله عليه وسلم من الجعرانةَ؛ لأنه ثبت بالتواتر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يحل من حجّه إلا بعد أن نحر بمنى، ومعاوية رضي الله عنه إنّما أسلم يوم الفتح مع أبيه، فلا يتصور منه التقصير لا في عمرة الحديبية ولا في عمرة القضية، فلم يبق إلا الجعرانة. هذا الذي رجّحه الحافظ ابن القيم في"زاد المعاد".

وأخطأ بعض الرواة فزادوا في حديثهم:"لحجّته".

هكذا رواه أبو داود (1803) عن الحسن بن علي، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس.

والحسن تفرّد بهذه الزيادة وإلا فقد رواه أيضًا أبو داود عن اثنين من شيوخه وهما مخلد بن خالد، ومحمد بن يحيي، كلاهما عن عبد الرزاق.

وكذا النسائي (2988) عن محمد بن يحيى بن عبد الله، فلم يذكرا هذه الزيادة.

فالوهم من الحسن بن علي وهو الحلوانيّ صاحب تصانيف، فلعله من سبق القلم منه في قوله:"لحجته" فإن أحدًا لم يتابعه على ذلك.

وأَوَّلَه المنذري فقال:"تسمى العمرة حجًّا؛ لأنّ معناها القصد. وقد قالت حفصة رضي الله عنه:"ما بال الناس حلّوا ولم تحلل أنت من عمرتك" قيل: إنما تعني من حجّتك" انتهى.

قلت: ليس الأمر كما قال المنذري، فإن سؤال حفصة رضي الله عنها كان في محله عن عمرته بعد الطواف والسعي بين الصفا والمروة لا عن حجّته.

وأما ما رواه النسائي (2989)، والإمام أحمد (16836) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء، عن معاوية، قال:"أخذت من أطراف شعر رسول الله صلى الله عليه وسلم بمشقص كان معي بعد ما طاف بالبيت وبالصفا والمروة في أيام العشر" ففيه وهم صريح.
قال قيس: والناس ينكرون هذا على معاوية.

قلت: لا شك في وهم معاوية رضي الله عنه، ومثل هذا الوهم جائز لكلّ بشر سوي رسول الله صلى الله عليه وسلم كما قال الحافظ ابن القيم. وفي رواية حماد بن سلمة عن قيس كلام وقد سبق ذكره.

والخلاصة أن هذا التقصير من معاوية وقع في عمرة النبيّ صلى الله عليه وسلم من الجعرانة، ولم يقع ذلك في حجّه.

وأما قوله:"أو رأيته يقصر عنه بمشقص وهو على المروة". فيكون المقصر غير معاوية، ويكون معاوية هو راوي هذه القصة.

فهل نسي معاوية رضي الله عنه الأمرين: الأول كان ذلك في عمرته في الجعرانة فجلعه في حجه. والثاني: هل هو الذي قصره أو غيره؟ فاختار البخاري بأنه هو الذي قصره.

واختار مسلم أمرين: الجزم في رواية سفيان بن عيينة، عن هشام بن حجير، عن طاوس، قال: قال ابن عباس: قال لي معاوية: أعلمت أني قصرت من رأس رسول الله صلى الله عليه وسلم عند المروة بمشقص؟ فقلت له: لا أعلم هذا إلّا حجّة عليك.

والشّك في رواية يحيى بن سعيد، عن ابن جريج، كما مضى.




মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি একটি তীক্ষ্ণ যন্ত্র (মিশ্কাস) দ্বারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মাথার চুল) ছোট করে দিয়েছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5268)


5268 - عن البراء بن عازب، قال: لَمَّا اعْتَمَرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فِي ذِي الْقَعْدَةِ فَأَبَي أَهْلُ مَكَّةَ أَنْ يَدَعُوهُ يَدْخُلُ مَكَّةَ حَتَّى قَاضَاهُمْ عَلَى أَنْ يُقِيمَ بِهَا ثَلَاثَةَ أَيَّامٍ، فَلَمَّا كَتَبُوا الْكِتَابَ كَتَبُوا هَذَا مَا قَاضَي عَلَيْهِ مُحَمَّدٌ رَسُولُ الله قَالُوا: لا نُقِرُّ لَكَ بِهَذَا، لَوْ نَعْلَمُ أَنَّكَ رَسُولُ الله مَا مَنَعْنَاكَ شَيْئًا، وَلَكِنْ أَنْتَ مُحَمَّدُ بْنُ عبد الله. فَقَال:"أَنَا رَسُولُ الله، وَأَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عبد الله". ثُمَّ قَالَ لِعَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ رضي الله عنه:"امْحُ رَسُولَ اللهِ". قَالَ عَلِيٌّ: لا وَاللهِ لا أَمْحُوكَ أَبَدًا. فَأَخَذَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم الْكِتَابَ وَلَيْسَ يُحْسِنُ يَكْتُبُ فَكَتَبَ:"هَذَا مَا قَاضَي عَلَيْهِ مُحَمَّدُ بْنُ عبد الله لا يُدْخِلُ مَكَّةَ السِّلَاحَ إِلا السَّيْفَ فِي الْقِرَابِ، وَأَنْ لا يَخْرُجَ مِنْ أَهْلِهَا بِأَحَدٍ إِنْ أَرَادَ أَنْ يَتْبَعَهُ، وَأَنْ لا يَمْنَعَ مِنْ أَصْحَابِهِ أَحَدًا إِنْ أَرَادَ أَنْ يُقِيمَ بِهَا". فَلَمَّا دَخَلَهَا وَمَضَى الأَجَلُ أَتَوْا عَلِيًّا فَقَالُوا: قُلْ لِصَاحِبِكَ اخْرُجْ عَنَّا فَقَدْ مَضَى الأَجَلُ. فَخَرَجَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَتَبِعَتْهُ ابْنَةُ حَمْزَةَ تُنَادِي يَا عَمِّ يَا عَمِّ فَتَنَاوَلَهَا عَلِيٌّ فَأَخَذَ بِيَدِهَا، وَقَالَ لِفَاطِمَةَ دُونَكِ ابْنَةَ عَمِّكِ حَمَلَتْهَا فَاخْتَصَمَ فِيهَا عَلِيٌّ وَزَيْدٌ وَجَعْفَرٌ. قَالَ عَلِيٌّ: أَنَا أَخَذْتُهَا وَهِيَ بِنْتُ عَمِّي. وَقَالَ جَعْفَرٌ: ابْنَةُ عَمِّي وَخَالَتُهضا تَحْتِي. وَقَالَ زَيْدٌ: ابْنَةُ أَخِي فَقَضَى بِهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم لِخَالَتِهَا. وَقَال:"الْخَالَةُ بِمَنْزِلَةِ الأُمِّ" وَقَالَ لِعَلِيٍّ:"أَنْتَ مِنِّي وَأَنَا مِنْكَ". وَقَالَ لِجَعْفَرٍ:"أَشْبَهْتَ
خَلْقِي وَخُلُقِي". وَقَالَ لِزَيْدٍ:"أَنْتَ أَخُونَا وَمَوْلانَا". وَقَالَ عَلِيٌّ: أَلا تَتَزَوَّجُ بِنْتَ حَمْزَةَ. قَال:"إِنَّهَا ابْنَةُ أَخِي مِنَ الرَّضَاعَةِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4251) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن البراء، فذكره.

ورواه مسلم في الجهاد (1783: 92) من طريق زكريا، عن أبي إسحاق، عن البراء، قال:"لما أُحصر النبيّ صلى الله عليه وسلم عند البيت، صالحه أهل مكة على أن يدخلها فيقيم بها ثلاثًا …" الحديث بنحوه مختصرًا إلى ذكر خروج النبي من مكة.




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুল-কা'দাহ মাসে উমরাহ করার ইচ্ছা করলেন, তখন মক্কার লোকেরা তাঁকে মক্কায় প্রবেশ করতে দিতে অস্বীকার করল। এরপর তিনি তাদের সাথে এই শর্তে সন্ধি করলেন যে, তিনি সেখানে তিন দিন অবস্থান করবেন।

যখন তারা চুক্তিপত্রটি লিখল, তখন তারা লিখল: ‘এটি সেই চুক্তি যার উপর মুহাম্মাদ, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সন্ধি করলেন।’ তারা (মক্কার কাফিররা) বলল: আমরা আপনাকে এই (রাসূল উপাধি) স্বীকার করি না। যদি আমরা জানতাম যে আপনি আল্লাহর রাসূল, তবে আমরা আপনাকে কোনো কিছুতেই বাধা দিতাম না। বরং আপনি হলেন মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি আল্লাহর রাসূল এবং আমি মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ। অতঃপর তিনি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি ‘আল্লাহর রাসূল’ শব্দটি মুছে দাও। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি আপনাকে (আপনার উপাধি) কখনো মুছব না।

তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই চুক্তিপত্রটি নিলেন, অথচ তিনি ভালো করে লিখতে জানতেন না। এরপর তিনি লিখলেন: এটি সেই চুক্তি যার উপর মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ সন্ধি করলেন যে, তিনি মক্কায় কোনো অস্ত্র প্রবেশ করাবেন না, তবে কোষবদ্ধ তলোয়ারের কথা আলাদা। আর মক্কার লোকদের মধ্যে কেউ যদি তাঁর অনুসরণ করতে চায় তবে তিনি কাউকে নিয়ে বের হবেন না। আর যদি তাঁর সাহাবীদের মধ্য থেকে কেউ সেখানে থাকতে চায়, তবে তাকেও বাধা দেওয়া হবে না।

যখন তিনি (মক্কায়) প্রবেশ করলেন এবং মেয়াদ শেষ হয়ে গেল, তখন তারা আলীর কাছে এসে বলল: আপনার সাথীকে বলুন, তিনি যেন আমাদের কাছ থেকে চলে যান, কেননা মেয়াদ শেষ হয়ে গেছে। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে বের হলেন। তখন হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা তাঁকে অনুসরণ করতে লাগল এবং ডাকতে লাগল: ‘হে চাচা! হে চাচা!’ আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ধরে নিলেন এবং তার হাত ধরলেন এবং ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: এই নাও তোমার চাচাতো বোন। অতঃপর তিনি তাকে কোলে তুলে নিলেন।

অতঃপর আলী, যায়দ ও জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নিয়ে বিবাদ করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাকে নিয়েছি আর সে আমার চাচাতো বোন। জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার চাচাতো বোন, আর তার খালা আমার বিবাহে আছে। যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার ভাইয়ের মেয়ে।

এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার খালার অনুকূলে ফায়সালা দিলেন এবং বললেন: খালা মাতার সমতুল্য। আর তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি আমার আর আমি তোমার। জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি আমার আকৃতি ও চরিত্রে আমার সদৃশ হয়েছ। আর যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি আমাদের ভাই ও আমাদের মুক্তদাস (মাওলা)। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যাকে বিয়ে করবেন না? তিনি বললেন: সে তো আমার দুধভাইয়ের মেয়ে।









আল-জামি` আল-কামিল (5269)


5269 - عن عبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج معتمرًا، فحال كفّار قريش بينه وبين البيت، فنحر هديه وحلق رأسه بالحديبية، وقاضاهم على أن يعتمر العام المقبل، ولا يحمل سلاحًا عليهم إلّا سيوفًا، ولا يقيم بها إلا ما أحبُّوا، فاعتمر من العام المقبل، فدخلها كما كان صالحهم، فلمّا أن أقام بها ثلاثًا، أمروه أن يخرج فخرج.

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4252) من طريق فليح بن سليمان، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরা পালনের উদ্দেশ্যে বের হয়েছিলেন, কিন্তু কুরাইশ কাফিররা তাঁর ও কা'বা ঘরের মাঝে বাধা সৃষ্টি করে। অতঃপর তিনি হুদাইবিয়াতে তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করেন এবং মাথা মুণ্ডন করেন। আর তিনি তাদের সাথে এই মর্মে সন্ধি করেন যে, তিনি পরবর্তী বছর উমরা করবেন, এবং তাদের বিরুদ্ধে তলোয়ার ছাড়া অন্য কোনো অস্ত্র বহন করবেন না, এবং সেখানে (মক্কায়) ততটুকুই অবস্থান করবেন যতটুকু তারা (কুরাইশরা) পছন্দ করবে। পরবর্তী বছর তিনি উমরা পালনের উদ্দেশ্যে আগমন করেন, এবং তাদের সাথে সম্পাদিত চুক্তি অনুযায়ী মক্কায় প্রবেশ করেন। যখন তিনি সেখানে তিন দিন অবস্থান করলেন, তখন তারা তাঁকে (মক্কা থেকে) বের হয়ে যেতে আদেশ করল, আর তিনি বেরিয়ে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5270)


5270 - عن عبد الله بن أبي أوفي، قال: اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم واعتمرنا معه، فلما دخل مكة طاف وطفنا معه، وأتى الصفا والمروة، وأتيناها معه، وكنا نستره من أهل مكة أن يرميه أحد. فقال له صاحب لي: أكان دخل الكعبة؟ قال: لا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1791) عن إسحاق بن إبراهيم، عن جرير، عن إسماعيل ابن أبي خالد، عن عبد الله بن أبي أوفي، فذكره.

ورواه أيضًا في مواضع أخرى منها (1600) عن خالد بن عبد الله، ومنها (4188) عن يعلى بن عبيد الطنافسي، ومنها (4255) عن سفيان كلّهم عن إسماعيل بن أبي خالد.

ورواه مسلم في الحج (1332) من حديث هشيم، قال: أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد - وذكر فيه فقط ما يتعلق بالسؤال عن دخول الكعبة.

رواه أبو داود من وجهين (1902، 1903) من حديث خالد بن عبد الله، وشريك - كلاهما عن إسماعيل بن أبي خالد، إلا أن شريكًا زاد فيه:"ثم حلق رأسه". وهذه الزيادة لم أقف في الروايات التي ساقها صاحبا الصحيح. وشريك هو ابن عبد الله القاضي، وكان سيء الحفظ.

وهذه العمرة هي عمرة القضاء، ولم يدخل النبي صلى الله عليه وسلم الكعبة في هذه العمرة وإنما دخلها يوم الفتح لتطهير بيت الله الحرام من طواغيت الجاهلية وأوثانها، وأما في حجة الوداع فالصحيح أنه لم
يدخلها أيضًا بخلاف ما ذكره المنذري بأنه دخل البيت في حجته.



أو يشير إليه إنْ لم يتمكن من مسحه، وإنْ كانت هذه الأحاديث لا يسلم منها من مقال، ولكن مجموعها يدل على أن له أصلا، وهو قول جمهور أهل العلم كما سبق النقل عن الترمذي.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাহ করেছিলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে উমরাহ করেছিলাম। যখন তিনি মক্কায় প্রবেশ করলেন, তখন তিনি তাওয়াফ করলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে তাওয়াফ করলাম। তিনি সাফা ও মারওয়ায় এলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে এলাম। আমরা তাঁকে মক্কাবাসীদের থেকে আড়াল করে রেখেছিলাম, যেন কেউ তাঁকে আঘাত করতে না পারে। তখন আমার একজন সাথী তাঁকে জিজ্ঞেস করল: তিনি কি কা'বার ভেতরে প্রবেশ করেছিলেন? তিনি বললেন: না।









আল-জামি` আল-কামিল (5271)


5271 - عن البراء، قال: فأقام بها ثلاثة أيام، فلما أن كان يوم الثالث، قالوا لعلي: هذا آخر يوم من شرط صاحبك فَأْمُرْه فليخرج، فأخبره بذلك فقال:"نعم" فخرج.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4251)، ومسلم في الجهاد (1783: 92) كلاهما من حديث أبي إسحاق، عن البراء. في حديث طويل.




আল-বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সেখানে তিন দিন অবস্থান করলেন। যখন তৃতীয় দিন এলো, তখন তারা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলল: “এটি তোমার সঙ্গীর শর্তের শেষ দিন। সুতরাং তাকে আদেশ করুন যেন সে বের হয়ে যায়।” তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সে সম্পর্কে অবহিত করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: “হ্যাঁ।” অতঃপর তিনি বেরিয়ে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5272)


5272 - عن ابن عمر، قال: فاعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم من العام المقبل، فدخلها كما كان صالحهم، فلما أقام بها ثلاثًا أمروه أن يخرج فخرج.

صحيح: رواه البخاريّ في الصلح (2701) عن محمد بن رافع، حدثنا سريج بن النعمان، حدّثنا فليح، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره في حديث طويل.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, পরবর্তী বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাহ পালন করলেন এবং তিনি সেখানে (মক্কায়) প্রবেশ করলেন যেমনটি তাদের (কুরাইশদের) সাথে চুক্তি হয়েছিল। অতঃপর যখন তিনি সেখানে তিন দিন অবস্থান করলেন, তখন তারা তাঁকে বের হয়ে যেতে আদেশ করল, ফলে তিনি বের হয়ে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5273)


5273 - عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أقام في عمرة القضاء ثلاثًا.

حسن: رواه أبو داود (1997) عن داود بن رُشيد، حدّثنا يحيى بن زكريا، حدّثنا محمد بن إسحاق، عن أبان بن صالح، وعن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

ومحمد بن إسحاق مدلّس، ولكن نقل ابن هشام (2/ 372) التصريح بالتحديث بهذا الإسناد في قصة زواج النبي صلى الله عليه وسلم بميمونة. فلعل التصرف الذي حصل في سنن أبي داود بالعنعنة هو من بعض الرواة عنه اختصروا صيغة الأداء، ولذا إعلال الحديث بعنعنة المدلس لا ينبغي إطراده بل لا بد أن يحقّق وينظر إلى أمور أخرى.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাতুল কাযা-এর সময় তিন দিন অবস্থান করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5274)


5274 - عن عائشة، قالت: نزل رسول الله صلى الله عليه وسلم المحصّب، فدعا عبد الرحمن بن أبي بكر، فقال:"اخرج بأختك من الحرم فلتهل بعمرة، ثم لتطف بالبيت، فإني أنتظركما ههنا" قالت: فخرجنا فأهللت، ثم طفت بالبيت وبين الصفا والمروة، فجئنا رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في منزله من جوف الليل، فقال:"هل فرغت؟" قلت: نعم، فأذن في أصحابه بالرّحيل، فخرج فمرَّ بالبيت فطاف به قبل صلاة الصبح، ثم خرج إلى المدينة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1788)، ومسلم في الحج (1211: 123) كلاهما من حديث أفلح بن حميد، عن القاسم، عن عائشة، فذكرته في حديث طويل.
وبوّب عليه البخاري بقوله: إذا طاف طواف العمرة، ثم خرج هل يجزئه من طواف الوداع؟ .

والظّاهر من تبويب البخاريّ أنه يرى استحباب طواف الوداع للمعتمر إن مكث بمكة ولم يخرج بعد العمرة، فإنه لو كان واجبًا لما اندرج في غيره.

ومن أهل العلم من ذهب إلى عدم وجوب طواف الوداع على المعتمر منهم الشيخ عبد العزيز بن باز. انظر: فتاوي هيئة كبار العلماء (1/ 510).

وأمّا ما رواه الترمذي (946) عن نصر بن عبد الرحمن الكوفيّ، حدثنا المحاربي، عن الحجاج ابن أرطاة، عن عبد الملك بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن السلماني، عن عمرو بن أوس، عن الحارث بن عبد الله بن أوس، قال: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من حجّ هذا البيت أو اعتمر فليكن آخر عهده بالبيت" فذكر العمرة فيه نكارة.

قال الترمذي:"حديث غريب، وهكذا روى غير واحد عن الحجاج بن أرطاة مثل هذا، وقد خولف الحجاج في بعض الإسناد".

قلت: الحجاج وعبد الرحمن بن السلماني ضعيفان.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাস্সাবে (উপত্যকায়) অবতরণ করলেন। অতঃপর তিনি আবদুর রহমান ইবনে আবী বকরকে ডাকলেন এবং বললেন: "তুমি তোমার বোনকে হারাম এলাকার বাইরে নিয়ে যাও, যেন সে উমরাহর জন্য ইহরাম বাঁধতে পারে। অতঃপর সে যেন বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করে। আমি তোমাদের দুজনের জন্য এখানেই অপেক্ষা করব।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমরা বেরিয়ে গেলাম। আমি ইহরাম বাঁধলাম, অতঃপর বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করলাম এবং সাফা-মারওয়ার মাঝে সা'ঈ করলাম। অতঃপর আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, তখন তিনি রাতের মধ্যভাগে তাঁর অবস্থানে ছিলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি অবসর হয়েছ?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীগণের মধ্যে (মক্কা থেকে) প্রস্থানের ঘোষণা দিলেন। তিনি বের হলেন এবং বায়তুল্লাহর পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় ফজরের সালাতের পূর্বে তাওয়াফ করলেন। অতঃপর তিনি মাদীনার দিকে রওয়ানা হলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5275)


5275 - عن أبي هريرة قال: إنكم تقولون: إن أبا هريرة يكثر الحديث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتقولون: ما بال المهاجرين والأنصار لا يحدِّثون عن رسول الله صلى الله عليه وسلم بمثل حديث أبي هريرة؟ ! وإن إخوتي من المهاجرين كان يشغلهم صفقٌ بالأسواق، وكنتُ ألزم رسول الله صلى الله عليه وسلم على ملءِ بطني، فأشهدُ إذا غابوا، وأحفظُ إذا نسوا، وكان يُشغل إخوتي من الأنصار عملُ أموالهم، وكنتُ امرأً مسكينًا من مساكينِ الصُّفَّة، أعي حينَ ينسَوْن، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في حديثٍ يُحدِّثه:"إنَّه لنْ يَبسُط أحدٌ ثوبهُ حتى أقضيَ مقالتي هذه، ثم يجمع إليه ثوبه، إلّا وعَى ما أقُول" فبسطتُ نَمرةً عليّ، حتى إذا قضى رَسول الله صلى الله عليه وسلم مقالته جَمعتُها إلى صدري، فمَا نَسيتُ مِن مقالةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم تِلكَ مِن شيء.

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2047) ومسلم في فضائل الصحابة (2492 / … ) كلاهما من حديث أبي اليمان، حدثنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني سعيد بن المسيب، وأبو سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة قال فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم مختصر.

ورواه البخاري في العلم (118) من طريق مالك، عن ابن شهاب، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال:"إن النّاس يقولون: أكثَر أبو هريرة، ولولا آيتان في كتاب الله ما حدثت حديثًا، ثم يتلو: {إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالْهُدَى مِنْ بَعْدِ مَا بَيَّنَّاهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتَابِ أُولَئِكَ يَلْعَنُهُمُ اللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ اللَّاعِنُونَ (159) إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا وَأَصْلَحُوا وَبَيَّنُوا فَأُولَئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ وَأَنَا التَّوَّابُ الرَّحِيمُ} [سورة البقرة:
159، 160]، إن إخواننا من المهاجرين كان يشغلهم الصّفق بالأسواق، وإن إخواننا من الأنصار كان يشغلهم العملُ في أموالهم، وإن أبا هريرة كان يلزم رسول الله صلى الله عليه وسلم بِشَبعِ بطنه، ويحضُرُ ما لا يَحضُرون، ويحفَظُ ما لا يحفظُون".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই তোমরা বল যে, আবূ হুরায়রা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে বেশি হাদীস বর্ণনা করে। আর তোমরা বল যে, কেন মুহাজির ও আনসারগণ আবূ হুরায়রার মতো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করেন না?! (আসলে কারণ হলো,) আমার মুহাজির ভাইদেরকে বাজারের ব্যবসায়িক লেনদেন ব্যস্ত রাখত। আর আমি কেবল আমার পেট পূর্ণ করার বিনিময়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য অবলম্বন করে থাকতাম। তারা যখন অনুপস্থিত থাকতেন, আমি তখন উপস্থিত থাকতাম; আর তারা যখন ভুলে যেতেন, আমি তখন মুখস্থ রাখতাম। আর আমার আনসার ভাইদেরকে তাদের সম্পদ দেখাশোনার কাজ ব্যস্ত রাখত। আর আমি ছিলাম সুফ্ফার মিসকিনদের মাঝে একজন মিসকিন। তারা যখন ভুলে যেত, আমি তখন মনে রাখতাম।

তিনি আরও বলেন: লোকেরা বলে, আবূ হুরায়রা বেশি হাদীস বর্ণনা করে। আল্লাহর কিতাবে দুটি আয়াত না থাকলে আমি একটি হাদীসও বর্ণনা করতাম না। এরপর তিনি এই আয়াতদ্বয় তিলাওয়াত করেন: {নিশ্চয় যারা গোপন করে, আমি কিতাবে মানুষের জন্য স্পষ্টভাবে বর্ণনা করার পরেও যে সকল সুস্পষ্ট প্রমাণাদি ও পথনির্দেশ আমি নাযিল করেছি, তাদের প্রতি আল্লাহ লা’নত করেন এবং লা’নতকারীগণও লা’নত করে। তবে যারা তাওবা করেছে, নিজেদেরকে সংশোধন করে নিয়েছে এবং (যা গোপন করেছিল) প্রকাশ করেছে, আমি তাদের তাওবা কবুল করি। আর আমি তাওবা কবুলকারী, পরম দয়ালু।} (সূরা আল-বাক্বারাহ: ১৫৯, ১৬০)।

(রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সঙ্গ লাভের কারণ প্রসঙ্গে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন:) আমার মুহাজির ভাইদেরকে বাজারের ব্যবসায়িক লেনদেন ব্যস্ত রাখত। আর আমাদের আনসার ভাইদেরকে তাদের সম্পদ দেখাশোনার কাজ ব্যস্ত রাখত। আর আবূ হুরায়রা কেবল পেট ভরানোর বিনিময়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গেই থাকত। যা তারা উপস্থিত থাকতেন না, তা সে উপস্থিত থাকত; আর যা তারা মুখস্থ রাখতেন না, তা সে মুখস্থ রাখত।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি হাদীস বর্ণনা করার সময় বলেছিলেন: “আমার এই কথাগুলো শেষ না হওয়া পর্যন্ত যদি কেউ তার চাদর বিছিয়ে রাখে, আর কথা শেষে তা নিজের দিকে গুটিয়ে নেয়, তবে আমি যা বলব তা সে ভুলে যাবে না।” তখন আমি আমার গায়ে থাকা নামিরা (ডোরাকাটা চাদর) বিছিয়ে দিলাম। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কথা শেষ করলেন, আমি সেটি আমার বুকের দিকে গুটিয়ে নিলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই কথাগুলোর কিছুই আমি ভুলিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (5276)


5276 - عن أنس بن مالك قال: قدم عبد الرحمن بن عوف المدينة، فآخى النبي صلى الله عليه وسلم بينه وبين سعد بن الربيع الأنصاري، وكان سعدٌ ذا غنّى، فقال لعبد الرحمن: أقاسمك مالي نصفين وأزوجك، قال: بارك الله لك في أهلك ومالك، دلّوني على السوق …" الحديث.

صحيح: رواه البخاري في البيوع (2049) عن أحمد بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا حميد، عن أنس قال فذكره.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুর রহমান ইবনু আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনায় আগমন করলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (আব্দুর রহমান) ও সা'দ ইবনু রাবী' আল-আনসারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মধ্যে ভ্রাতৃত্ব বন্ধন স্থাপন করে দিলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন অত্যন্ত সম্পদশালী। তিনি আব্দুর রহমানকে বললেন: আমি আমার সম্পদ অর্ধেক করে আপনাকে ভাগ করে দেব এবং আপনার বিবাহের ব্যবস্থা করব। তিনি (আব্দুর রহমান) বললেন: আল্লাহ আপনার পরিবার ও সম্পদে বরকত দান করুন। আমাকে বাজারের পথ দেখিয়ে দিন...।









আল-জামি` আল-কামিল (5277)


5277 - عن ابن عباس قال:"كانت عُكاظ، ومجَنّةُ، وذو المجاز أسواقًا في الجاهلية، فلما كان الإسلام فكأنهم تأثموا فيه، فنزلت: {لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ} [سورة البقرة: 198] في مواسم الحج، قرأها ابن عباس".

صحيح: رواه البخاري في البيوع (2050) عن عبد الله بن محمد، حدثنا سفيان، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن ابن عباس قال فذكره.

وقوله:"عُكاظ" -بضم أوله، وآخره ظاء معجمة-، اسم سوق من أسواق العرب في الجاهلية، وكانت قبائل العرب تجتمع فيها في كل سنة، ويفاخرون فيها، ويحضرها شعراؤهم وأُدبائهم، وهو من قولهم:"عكظ الرجل صاحبه" إذا فاخره، وغلبه بالمفاخرة.

وقوله:"مَجنّة": -بميم مفتوحة، وجيم معجمة، ونون مشددة مفتوحة-، وهي من أسواق العرب في الجاهلية، وكانت مجنّة بمر الظهران، قرب جبل يُقال له: الأصفر، وهو بأسفل مكة على قدر بريد منها، قاله الأصمعي.

ويُقال: مجنّة عند عرفة.

وقوله:"ذو المجاز" هو أيضًا سوق من أسواق العرب، قريب من عرفات.

قال ابن الأثير:"كان عُكاظ، وذو المجاز، ومجنة أسواقا تجتمع بها العرب كل عام، إذا حضر الموسم، فيأمن بعضهم بعضًا، حتى تنقضي أيامها، وكانت مجنّة بالظهران، وكانت عكاظ بين نخلة والطائف، وكان المجاز بالجانب الأيسر إذا وقفتَ على الموقف".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উক্বায, মাজান্নাহ ও যুল-মাজায জাহেলিয়াতের যুগে বাজার ছিল। যখন ইসলাম এলো, তখন তারা (হজ্বের সময় ব্যবসা করাকে) যেন পাপ মনে করল। অতঃপর (আল্লাহ্‌র এই বাণী) নাযিল হলো: {তোমাদের প্রতিপালকের অনুগ্রহ সন্ধান করায় তোমাদের কোনো পাপ নেই} [সূরা আল-বাক্বারাহ: ১৯৮] - এটি ছিল হজ্বের মৌসুম সম্পর্কে। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5278)


5278 - عن المقدام، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما أكل أحدٌ طعامًا قطّ خيرًا من أن يأكل من عمل يده، وإنّ نبيّ الله داود عليه السلام كان يأكل من عمل يده".
صحيح: رواه البخاري في البيوع (2072) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا عيسي بن يونس، عن ثور، عن خالد بن معدان، عن المقدام به.




মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেউ কখনও তার নিজ হাতের উপার্জন থেকে খাওয়া খাবারের চেয়ে উত্তম কোনো খাবার খায়নি। আর আল্লাহর নবী দাউদ (আঃ) নিজ হাতের উপার্জন থেকে খেতেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5279)


5279 - عن المقدام بن معد يكرب الزبيدي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما كسب الرجل كسْبًا أطيب من عمل يده. وما أنفق الرجل على نفسه، وأهله، وولده، وخادمه فهو صدقة".

حسن: رواه ابن ماجه (2138) عن هشام بن عمار قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، عن بحير ابن سعد، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معد يكرب فذكره.

ورواه أحمد (17190) من وجه آخر عن إسماعيل بن عياش، عن بحير بن سعد بإسناده بلفظ"ما أكل أحد منكم طعامًا في الدنيا خيرًا له من أن يأكل من عمل يده".

وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل بن عياش، فإنه صدوق في روايته عن أهل بلده الشاميين وهذه منها. فإن بحير بن سعد حمصي.

وتابعه بقية بن الوليد فقال: حدثنا بحير بن سعد، حدثنا خالد بن معدان، عن المقدام بن معد يكرب فذكره ولفظه"ما أكل أحد منكم طعامًا أحب إلى الله عز وجل من عمل يده".

رواه أحمد (17181) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدثنا بقية بإسناده.

وبقية مدلس إلا أنه صرح كما أنه توبع.




মিকদাম ইবনু মা'দীকারিব আল-যুবাইদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ব্যক্তির নিজ হাতের কাজের চেয়ে উত্তম উপার্জন আর নেই। আর কোনো ব্যক্তি তার নিজের জন্য, তার পরিবারের জন্য, তার সন্তানের জন্য এবং তার খাদিমের (সেবকের) জন্য যা খরচ করে, তা সাদাকাহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (5280)


5280 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم"أن داود عليه السلام كان لا يأكل إلا من عمل يده".

صحيح: رواه البخاري في البيوع (2073) عن يحيى بن موسي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن همام بن منبه، حدثنا أبو هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন যে, দাউদ (আঃ) নিজ হাতের উপার্জন ছাড়া অন্য কিছু খেতেন না।