আল-জামি` আল-কামিল
5801 - عن وائل بن حجر، عن أبيه قال: جاء رجل من حضرموت، ورجل من كندة إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال الحضرمي: يا رسول اللَّه، إن هذا قد غلبني على أرض لي كانت لأبي. فقال الكندي: هي أرضي في يدي أزرعها ليس له فيها حق. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للحضرمي:"ألك بينة؟". قال: لا. قال:"فلك يمينه". قال: يا رسول اللَّه، إن الرجل فاجر لا يبالي على ما حلف عليه، وليس يتورع من شيء. فقال:"ليس لك منه إلا ذلك". فانطلق ليحلف، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما أدبر:"أما لئن حلف على ماله ليأكله ظلما ليلقين اللَّه وهو عنه مُعرض".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (139) من طرق عن أبي الأحوص، عن سماك، عن علقمة بن وائل، عن أبيه وائل بن حجر فذكره.
وفي رواية عن أبي عوانة، عن عبد الملك بن عمير، عن علقمة بن وائل، عن وائل بن حجر
قال: كنت عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأتاه رجلان يختصمان في أرض، فقال أحدهما: إن هذا انتزى على أرضي -يا رسول اللَّه- في الجاهلية، -وهو امرؤ القيس بن عابس الكندي، وخصمه ربيعة بن عبدان- قال:"بيتك". قال: ليس لي بينة. قال:"يمينه". قال: إذن يذهب بها. قال:"ليس لك إلا ذاك". قال: فلما قام ليحلف قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من اقتطع أرضا ظلما لقي اللَّه وهو عليه غضبان".
قوله:"انتزى" معناه غلب عليها، واستولى.
ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেন যে, হাযরামাওত গোত্রের একজন লোক এবং কিন্দাহ গোত্রের একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। হাযরামাওতী লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি আমার একটি জমি জবরদখল করে নিয়েছে, যা আমার পিতার ছিল। কিন্দী লোকটি বলল: ওটা আমার জমি, আমার দখলে আছে এবং আমি তাতে চাষ করি। এতে তার কোনো অধিকার নেই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাযরামাওতী লোকটিকে জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কি কোনো প্রমাণ (সাক্ষী) আছে?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "তাহলে সে কসম করবে।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! লোকটি ফাসেক (দুরাচার), সে কিসের উপর কসম করছে তার পরোয়া করে না এবং কোনো কিছু থেকে বিরত থাকে না (পাপকে ভয় করে না)। তিনি বললেন: "এর চেয়ে বেশি কিছু তোমার জন্য নেই।" তখন লোকটি কসম করার জন্য চলে গেল। যখন সে পিছন ফিরে চলে যাচ্ছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সাবধান! যদি সে মিথ্যা কসম করে তার সম্পদ গ্রাস করার জন্য, তবে সে আল্লাহর সঙ্গে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে আল্লাহ তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছেন (অসন্তুষ্ট)।"
অন্য এক বর্ণনায় ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তাঁর কাছে দুজন লোক একটি জমি নিয়ে বিবাদ করতে আসলো। তাদের একজন বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি জাহিলিয়াতের যুগে আমার জমি জবরদখল করে নিয়েছে। (এ ছিল কিন্দাহ গোত্রের ইমরুউল ক্বায়স ইবনু আবিস এবং তার প্রতিপক্ষ ছিল রাবী’আহ ইবনু আবদান।) তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার সাক্ষী (বা প্রমাণ) আছে কি?" সে বলল: আমার কোনো সাক্ষী নেই। তিনি বললেন: "তাহলে তার কসমই হবে।" সে বলল: তাহলে তো সে জমি নিয়েই যাবে। তিনি বললেন: "এর চেয়ে বেশি কিছু তোমার জন্য নেই।" বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি যখন কসম করার জন্য দাঁড়ালো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে কোনো জমি দখল করে নেয়, সে আল্লাহর সঙ্গে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে আল্লাহ তার উপর রাগান্বিত।"
5802 - عن أبي أمامة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من اقتطع حق امرئ مسلم بيمينه فقد أوجب اللَّه له النّار، وحرم عليه الجنّة". فقال له رجل: وإن كان شيئًا يسيرا يا رسول اللَّه. قال:"وإن قضيبًا من أراك".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (137) من طرق عن إسماعيل بن جعفر قال: أخبرنا العلاء (وهو ابن عبد الرحمن مولى الحرقة)، عن معبد بن كعب السلمي، عن أخيه عبد اللَّه بن كعب، عن أبي أمامة فذكر مثله.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি শপথের মাধ্যমে কোনো মুসলিম ব্যক্তির অধিকার ছিনিয়ে নেয়, আল্লাহ তার জন্য জাহান্নাম ওয়াজিব করে দেন এবং তার উপর জান্নাত হারাম করে দেন।” তখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: হে আল্লাহর রাসূল! যদি তা সামান্য কিছু হয় তবুও? তিনি বললেন: “যদি তা পিলু গাছের একটি ডালও হয় তবুও।”
5803 - عن عبد اللَّه بن يزيد قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم، عن النُهبى والمثلة.
صحيح: رواه البخاري في المظالم (2474)، عن آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، حدثنا عدي ابن ثابت، سمعت عبد اللَّه بن يزيد الأنصاري وهو جده أبو أمه قال فذكر الحديث.
وقوله:"وهو جده أبو أمه" أي جد عدي بن ثابت لأمه."والنهبة" هو أخذ المال قهرا.
আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লুঠতরাজ (জোরপূর্বক সম্পদ দখল করা) এবং (দেহ বা প্রাণীর) অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা (মুমথালা) থেকে নিষেধ করেছেন।
5804 - عن عمران بن حصين، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا جلب، ولا جنب، ولا شغار في الإسلام. ومن انتهب نُهبة فليس منا".
صحيح: رواه أبو داود (2581)، والترمذي (1123)، والنسائي (6/ 111)، وابن ماجه (3937)، وصحّحه ابن حبان (3267، 5170)، وأحمد (19946) كلهم من حديث حميد الطويل، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكره، واختصره البعض. قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: فيه الحسن، وهو الأمام المعروف، وهو مدلس، وقد اختلف في سماعه من عمران بن حصين، فنفاه علي بن المديني، وأثبته بهز بن أسد، ورواية ابن حبان هذا الحديث في صحيحه تشعر بأنه سمع منه؛ لأنه صرح في مقدمة كتابه بقوله:"فإذا صح عندي خبر من رواية مدلس أنه بين السماع فيه لا أبالي أن أذكره من غير بيان السماع في خبره بعد صحته عندي من طريق آخر" (1/ 162).
ولعل من هذا الطريق ما رواه الطبراني في الكبير (18/ 219) والمروزي في تعظيم قدر الصلاة (1081)
كلاهما من طريق محمد بن بشار، وقرنه المروزي بمحمد بن يحيى، قالا: حدثنا محمد ابن عبد اللَّه الأنصاري، قال: حدثنا صرد بن أبي المنازل، قال: سمعت حبيب بن أبي فضالة المالكي، قال: لما بني هذا المسجد مسجد الجامع قال: وعمران بن حصين جالس. فذكروا عنده الشفاعة، فقال رجل من القوم: يا أبا نجيد، إنكم لتحدثونا بأحاديث ما نجد لها أصلا في القرآن. فغضب عمران، وقال للرجل: قرأت القرآن؟ قال: نعم. قال: فهل وجدت فيه صلاة المغرب ثلاثا. . . وذكر أشياء منها الحديث المذكور.
وصرد بن أبي المنازل وشيخه حبيب بن أبي فضائة لا بأس بهما في المتابعات.
وقال الحافظ ابن حجر في النكت الظراف (8/ 173):"وله شاهد في المستدرك للحاكم من طريق عقبة بن خالد، عن عمران، وسياق حبيب أتم". كذا قال، والصواب: عن عقبة بن خالد، عن الحسن، عن عمران بن حصين، كما في المستدرك (1/ 109).
وبمجموع هذه الطرق صح هذا الحديث.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইসলামে 'জালব' নেই, 'জানাব' নেই এবং 'শিগার' নেই। আর যে ব্যক্তি ছিনতাই করে, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।
5805 - عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن أبغض الرجال إلى اللَّه الألد الخصم".
متفق عليه: رواه البخاري في المظالم (2457)، ومسلم في العلم (2668) كلاهما عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة فذكرته.
وقوله:"الألد" بمعنى شديد الخصومة، مأخوذ من لديدي الوادي، وهما جانباه، لأنه كلما احتج عليه بحجة أخذ في جانب آخر.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহর কাছে সবচেয়ে অপছন্দনীয় পুরুষ হলো প্রচণ্ড ঝগড়াকারী ও কলহপরায়ণ ব্যক্তি।”
5806 - عن * *
৫৮০৬ - ... থেকে বর্ণিত ...
5807 - عن سويد بن غفلة قال: لقيت أبي بن كعب، فقال: أخذت صرة مائة دينار، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"عرفها حولا". فعرفتها حولا، فلم أجد من يعرفها، ثم أتيته، فقال:"عرفها حولا". فعرفتها، فلم أجد، ثم أتيته ثلاثا، فقال:"احفظ وعاءها وعددها ووكاءها؛ فإن جاء صاحبها وإلا فاستمتع بها".
فاستمتعت، فلقيته بعد بمكة، فقال: لا أدري ثلاثة أحوال، أو حولا واحدا.
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2426)، ومسلم في اللقطة (1723) كلاهما عن محمد ابن بشار، حدثنا غندر، حدثنا شعبة، عن سلمة بن كهيل قال: سمعت سويد بن غفلة قال: خرجت أنا وزيد بن صوحان وسلمان بن ربيعة غازين، فوجدت سوطا، فأخذته، فقالا لي: دعه. فقلت: لا، ولكني أعرفه، فإن جاء صاحبه وإلا استمتعت به. قال: فأبيت عليهما، فلما رجعنا من غزاتنا قضي لي أني حججت، فأتيت المدينة، فلقيت أبي بن كعب، فأخبرته بشأن السوط وبقولهما، فقال: إني وجدت صرة فذكر الحديث، واللفظ لمسلم.
والبخاري أيضًا ذكر القصة، ولكن رواه عن سليمان بن حرب، عن شعبة (2437).
وفي صحيح مسلم: قال شعبة: فسمعته بعد عشر سنين يقول:"عَرِّفها عاما واحدا".
فكأن سلمة بن كهيل يشك أول الأمر، ثم تيقن بأنه أمر بالتعريف الحول واحد، وهو المعتمد، كما في حديث زيد بن خالد الجهني الآتي في باب ضالة الإبل والغنم.
وقد روي من آثار الصحابة ما يدل على أن التعريف يكون سنة، منها ما رواه عبد اللَّه بن بدر الجهني أنه نزل منزل قوم بطريق الشام، فوجد صرة فيها ثمانون دينارا، فذكرها لعمر بن الخطاب، فقال له عمر:"عرفها على أبواب المساجد، واذكرها لكل من يأتي من الشام سنة، فإذا مضت السنة فشأنك بها".
رواه مالك في الأقضية (49) عن أيوب بن موسى، عن معاوية بن عبد اللَّه بن بدر الجهني، عن أبيه.
ومعاوية بن عبد اللَّه ترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (8/ 377)، وذكر من روى عنه أيوب بن موسى، ومحمد بن عمرو قاله أبو حاتم.
والحديث يدل على أن الملتقط يعرفها سنة، فإن جاء مالكها دفع إليها، وإن لم يجد مالكها فله أن يتملك ويأكل، سواء كان فقيرا أو غنيا، ثم إذا ظهر صاحبها دفع إليه قيمتها، وبه قال جمهور
أهل العلم الشافعي، وأحمد، وإسحاق. وبه قال من الصحابة عمر بن الخطاب، وعائشة، وغيرهما.
وذهب جماعة من أهل العلم أنه بعد ما عرفها سنة يتصدق بها، وليس له أن ينتفع بها، وهو رأي الثوري، وأصحاب الرأي.
والمذهب الأول يوافق حديث الباب.
وأما التعريف بها ثلاث سنوات فلم يقل به أحد من العلماء المعروفين للشك الذي وقع من سلمة بن كهيل، ثم تثبت، واستذكر، واستمر على عام واحد، إلا ما جاء عن عمر أن اللقطة تعرف ثلاثة أعوام، وله في ذلك أربعة أقوال، أصحها عام واحد، ومنها ثلاثة أشهر، ومنها ثلاثة أيام، ولعله يحمل ذلك على عظم اللقطة وحقارتها.
وأما ما روي عن يعلى بن مرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من التقط لقطة يسيرة درهما، أو حبلا، أو شبه ذلك فليعرفه ثلاثة أيام، فإن كان فوق ذلك فليعرفه ستة أيام". فهو ضعيف.
رواه أحمد (17566) عن يزيد بن هارون، أخبرنا إسرائيل بن يونس، حدثني عمر بن عبد اللَّه ابن يعلى، عن جدته حكيمة، عن أبيها يعلى فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل عمر، وجدتُه حكيمة لا تعرف حالها.
قال الهيثمي في المجمع (3/ 169):"رواه أحمد من طريق عمرو بن عبد اللَّه بن يعلى، فإن كان عمرو فلا أعرفه، وإن كان عمر فهو ضعيف".
قلت: وهو كما قال؛ فإن عمر بن عبد اللَّه ضعيف، ضعَّفه يحيى بن معين، ورماه جرير بن عبد اللَّه وغيره بشرب الخمر، ذكره البيهقي (6/ 195) عقب تخريج الحديث من هذا الوجه.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একশ’ দীনারের একটি থলে (পুঁটলি) পেলাম। এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলাম। তিনি বললেন: “এক বছর ধরে এর পরিচিতি দাও।” অতএব আমি এক বছর ধরে এর পরিচিতি দিলাম, কিন্তু এর মালিককে পেলাম না। এরপর আমি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) কাছে এলাম। তিনি বললেন: “এক বছর ধরে এর পরিচিতি দাও।” আমি পরিচিতি দিলাম, কিন্তু (মালিককে) পেলাম না। এরপর আমি তাঁর কাছে তিনবার এলাম। তিনি বললেন: “এর থলে, সংখ্যা এবং মুখ বাঁধার রশিটি (বাঁধন) মনে রাখো; যদি এর মালিক আসে, (তবে তাকে তা দিয়ে দেবে) অন্যথায় তুমি এটি ব্যবহার করতে পারো।”
অতঃপর আমি তা ব্যবহার করলাম। এরপরে মক্কায় উবাই ইবনু কা'বের সাথে আমার (বর্ণনাকারী সুওয়াইদের) সাক্ষাৎ হলে তিনি বললেন: আমি নিশ্চিত নই—তিনি কি তিন বছর বলেছিলেন, নাকি এক বছর বলেছিলেন।
5808 - عن سهل بن سعد أخبره أن علي بن أبي طالب دخل على فاطمة، وحسن وحين يبكيان، فقال: ما يبكيهما؟ قالت: الجوع. فخرج علي، فوجد دينارا بالسوق، فجاء إلى فاطمة، فأخبرها، فقالت: اذهب إلى فلان اليهودي، فخذ لنا دقيقا، فجاء اليهودي، فاشترى به دقيقا، فقال اليهودي: أنت ختن هذا الذي يزعم أنه رسول اللَّه؟ قال: نعم. قال: فخذ دينارك، ولك الدقيق. فخرج علي حتى جاء به فاطمة، فأخبرها، فقالت: اذهب إلى فلان الجزار، فخذ بدرهم لحما، فذهب، فرهن الدينار بدرهم لحم، فجاء به، فعجنت، ونصبت، وخبزت، وأرسلت إلى أبيها، فجاءهم، فقالت: يا رسول اللَّه، أذكر لك، فإن رأيته لنا حلالا أكلناه وأكلت، من شأنه كذا وكذا. فقال:"كلوا باسم اللَّه". فأكلوا منه، فبينما هم مكانهم إذا غلام ينشد اللَّه والإسلام الدينار، فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فدعي له، فسأله،
فقال: سقط مني في السوق. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا علي، اذهب إلى الجزار، فقل له: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول لك: أرسل إلي بالدينار، ودرهمك علي". فأرسل به، فدفعه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إليه.
حسن: رواه أبو داود (1716) عن جعفر بن مسافر التنيسي، حدثنا ابن أبي فديك، حدثنا موسى بن يعقوب الزمعي، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد أخبره فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في موسى بن يعقوب، فضعفه ابن المديني والنسائي، ووثّقه ابن معين، وقال أبو داود:"صالح الحديث". وقال ابن عدي:"لا بأس به عندي". فمثله يحسن حديثه إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وقد رويت هذه القصة من أوجه كثيرة، بعضها لا تصح. انظر مجمع الزوائد (3/ 169 - 170)، ولكن مجموعها تدل على أن له أصلا، أورد بعضها عبد الرزاق (10/ 140 - 142).
وقد اعترض على هذا الحديث بأنه أنفقه قبل التعريف.
فأجيب لعل ذلك لوقوع الاضطرار إليه، كما تدل عليه القصة، على أن صاحبه إن جاء يرد إليه، وهذا الذي حصل.
وقيل: إنه لم يشترط مضي سنة في قليل اللقطة.
وروي في هذه القصة عن عطاء بن يسار، عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن يعرفه، فلم يعرف. وهو بعيد.
ذكر بعض هذه الوجوه البيهقي في السنن الكبرى (6/ 194)، ثم قال:"والأحاديث التي وردت في اشتراط التعريف سنة في جواز الأكل أصح وأكثر، فهي أولى".
সহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাঁদছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তারা কেন কাঁদছে? তিনি (ফাতিমা) বললেন: ক্ষুধার কারণে। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন এবং বাজারে একটি দীনার পেলেন। তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাকে জানালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অমুক ইহুদির কাছে যান এবং আমাদের জন্য আটা নিয়ে আসুন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইহুদির কাছে গেলেন এবং দীনারটি দিয়ে আটা কিনলেন। তখন ইহুদি বলল: আপনি কি সেই ব্যক্তির জামাতা, যে নিজেকে আল্লাহর রাসূল বলে দাবি করে? তিনি বললেন: হ্যাঁ। ইহুদি বলল: আপনি আপনার দীনার ফেরত নিন এবং আটা আপনারই থাক। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আটা নিয়ে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এবং তাকে জানালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অমুক কসাইয়ের কাছে যান এবং এক দিরহামের বিনিময়ে গোশত নিয়ে আসুন। তিনি গেলেন এবং এক দিরহামের গোশতের বিনিময়ে দীনারটি বন্ধক রাখলেন। তিনি গোশত নিয়ে আসলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খামির তৈরি করলেন, হাঁড়িতে চাপালেন এবং রুটি তৈরি করলেন। তারপর তিনি তাঁর পিতার কাছে লোক পাঠালেন। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাকে বিষয়টি জানাব। যদি আপনি এটি আমাদের জন্য হালাল মনে করেন, তবে আমরা খাব এবং আপনিও খাবেন। বিষয়টি এই এই হয়েছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আল্লাহর নামে খাও।” অতঃপর তারা তা থেকে খেলেন। তারা যখন সেখানে ছিলেন, তখন একজন বালক আল্লাহর এবং ইসলামের নামে দীনারটি খুঁজতে খুঁজতে এলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নির্দেশ দিলেন। তাকে ডেকে আনা হলো এবং তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সে বলল: এটা বাজারেই আমার কাছ থেকে পড়ে গিয়েছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে আলী! কসাইয়ের কাছে যাও এবং তাকে বলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনাকে বলছেন, দীনারটি আমার কাছে পাঠিয়ে দিন, আর আপনার দিরহাম আমার ওপর (দায়িত্ব রইল)।” সে (কসাই) দীনারটি পাঠিয়ে দিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দীনারটি সেই বালককে দিয়ে দিলেন।
5809 - عن زيد بن خالد الجهني أنه قال: جاء رجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسأله عن اللقطة، فقال:"اعرف عقاصها ووكاءها، ثم عرفها سنة، فإن جاء صاحبها، وإلا فشأنك بها". قال: فضالة الغنم يا رسول اللَّه؟ قال: هي لك، أو لأخيك، أو للذئب". قال: فضالة الإبل؟ قال: ما لك، ولها؟ معها سقاؤُها وحذاؤُها، ترد الماء، وتأكل الشجر حتى يلقاها ربها".
متفق عليه: رواه مالك في الأقضية (48) عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن يزيد مولى المنبعث، عن زيد بن خالد الجهني فذكره.
ورواه البخاري في المساقاة (2372)، ومسلم في اللقطة (1722) كلاهما من طريق مالك.
ورواه مسلم من وجه آخر عن سفيان الثوري، ومالك بن أنس، وعمرو بن الحارث، وغيرهم
أن ربيعة بن أبي عبد الرحمن حدثهم بهذا الإسناد مثل حديث مالك غير أنه زاد: قال أتى رجل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأنا معه، فسأله عن اللقطة. قال: وقال عمرو في الحديث:"فإذا لم يأت لها طالب فاستنفقها".
"والعِفاص" الوعاء الذي تكون فيه النفقة من جلد أو خرقة أو غير ذلك، ولهذا يسمى الجلد الذي تلبسه رأس القارورة العِفاص.
"والوكاء" الخيط الذي يشد به العِفاص.
وقوله:"معها سقاؤها وحذاؤها" أراد بالسقاء أنها إذا وردت الماء شربت منه ما يكون فيه ريها لظمئها، وهي أطول البهائم ظمأ لكثرة ما تحمل من الماء.
وأراد بالحذاء أخفافها، وأنها تقوى بها على السير، وقطع البلاد الشاسعة، وورود المياه النائية. انظر شرح السنة (8/ 210).
যায়েদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে হারানো জিনিস (লুকতা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: "তুমি তার মুখবন্ধনী ও রশি (বাঁধনের চিহ্ন) চিনে রাখো, অতঃপর এক বছর পর্যন্ত তার ঘোষণা দিতে থাকো। যদি তার মালিক আসে, তবে (তাকে দিয়ে দাও)। অন্যথায়, এটি তোমার।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! হারানো বকরীর কী হবে? তিনি বললেন: "সেটা তোমার, অথবা তোমার (মুসলিম) ভাইয়ের, অথবা নেকড়ের জন্য।" সে বলল: হারানো উটের কী হবে? তিনি বললেন: "এর সাথে তোমার কী সম্পর্ক? তার কাছে রয়েছে তার পানির আধার এবং তার জুতো (শক্ত ক্ষুর)। সে নিজে পানি খুঁজে নেবে এবং গাছপালা খাবে, যতক্ষণ না তার মালিক তাকে পেয়ে যায়।"
5810 - عن زيد بن خالد الجهني صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن اللقطة الذهب أو الورق، فقال:"أعرف وكاءها وعفاصها، ثم عرفها سنة، فإن لم تعرف فاستنفقها، ولتكن وديعة عندك، فإن جاء طالبها يوما من الدهر فأدها إليه". وسأله عن ضالة الإبل، فقال:"ما لك ولها؟ دعها؛ فإن معها حذاءها وسقاءها، ترد الماء، وتأكل الشجر حتى يجدها ربها". وسأله عن الشاة، فقال:"خذها؛ فإنما هي لك، أو لأخيك، أو للذئب".
صحيح: رواه مسلم في اللقطة (1722: 5) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدثنا سليمان (يعني ابن بلال)، عن يحيى بن سعيد، عن يزيد مولى المنبعث، أنه سمع زيد بن خالد الجهني فذكره.
ورواه مسلم من حديث حماد بن سلمة، حدثني يحيى بن سعيد وربيعة الرأي بن أبي عبد الرحمن، عن يزيد مولى المنبعث، عن زيد بن خالد أن رجلا سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن ضالة الإبل. زاد ربيعة: فغضب حتى احمرت وجنتاه. واقتنص الحديث نحو حديثهم، وزاد:"فإن جاء صاحبها، فعرف عقاصها وعددها ووكاءها فأعطها إياه وإلا فهي لك".
যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সোনা বা রূপার (পাওয়া) বস্তু ('লুকতা' বা কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তুমি তার বাঁধন (উকায়) এবং তার পাত্র/আবরণ (ইফাস) চিনে রাখো, এরপর এক বছর ধরে তার ঘোষণা দাও। যদি (মালিক) পরিচিত না হয়, তবে তুমি তা খরচ করো। আর তা তোমার কাছে আমানত হিসেবে থাকবে। যদি কোনো একদিন তার মালিক এসে যায়, তবে তুমি তা তাকে ফিরিয়ে দাও।" আর তাঁকে হারানো উট সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "এর সাথে তোমার কী সম্পর্ক? এটিকে ছেড়ে দাও। কেননা এর সাথে আছে এর পায়ের জুতো (শক্ত পায়ের তল) এবং এর মশক (পানি সংরক্ষণের ক্ষমতা)। এটি (নিজে নিজেই) পানি পান করবে এবং গাছ খাবে, যতক্ষণ না এর মালিক একে খুঁজে পায়।" আর তাঁকে (হারানো) ছাগল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তুমি এটিকে ধরে নাও। কেননা এটি হয় তোমার জন্য, নয়তো তোমার ভাইয়ের (অন্য মুসলিমের) জন্য, নয়তো নেকড়ের জন্য।"
5811 - عن زيد بن خالد الجهني أن رجلا سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن اللقطة، فقال:"عرفها سنة، ثم اعرف وكاءها وعناصها، ثم استنفق بها، فإن جاء ربها فأدها إليه". فقال: يا رسول اللَّه، فضالة الغنم؟ فقال:"خذها؛ فإنما هي لك، أو لأخيك، أو للذئب". قال: يا رسول اللَّه، فضالة الإبل؟ فغضب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى احمرت وجنتاه -أو احمر وجهه- وقال:"ما لك ولها؟ معها حذاؤها وسقاؤها حتى يأتيها ربها".
صحيح: رواه أبو داود (1704)، والترمذي (1373) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا إسماعيل بن جعفر، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن يزيد مولى المنبعث، عن زيد بن خالد الجهني فذكره.
قال أبو داود: حدثنا موسى بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن يحيى بن سعيد وربيعة بإسناد قتيبة ومعناه، وزاد فيه:"فإن جاء باغيها فعرف عقاصها وعددها فادفعها إليه". وقال حماد أيضًا: عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله.
قال أبو داود: وهذه الزيادة التي زاد حماد بن سلمة في حديث سلمة بن كهيل ويحيى بن سعيد وعبيد اللَّه وربيعة:"إن جاء صاحبها فعرف عفاصها وراءها فدفعها إليه". ليست بمحفوظة:"فعرف عفاصها ووكاءها".
كذا قال أبو داود رحمه الله وهذه الزيادة ذكرها مسلم في صحيحه، كما مضى، وإن حماد ابن سلمة لم ينفرد بها، ولذا تعقبه المنذري، فقال:
"وهذه الزيادة قد أخرجها مسلم في صحيحه من حديث حماد بن سلمة، وقد أخرجه الترمذي والنسائي من حديث سفيان الثوري عن سلمة بن كهيل بهذه الزيادة، كما قدمنا، وذكر مسلم في صحيحه أن سفيان الثوري وزيد بن أبي أنيسة وحماد بن سلمة ذكروا هذه الزيادة، فقد تبين أن حماد ابن سلمة لم ينفرد بهذه الزيادة، فقد تابعه عليها. من ذكرناه". انتهى كلام المنذري.
وفي قوله من رواية حماد:"فإن جاء صاحبها فعرف عددها ووكاءها فادفعها إليه". دليل على أن صاحب اللقطة إذا جاء وعرف عناصها وعددها ندفع إليه اللقطة، ولا يطلب منه البينة على ذلك، وبه قال مالك، وأحمد. وقال ابن عبد البر:"والحديث حجة لهم".
وقال الشافعي:"إذا عرف الرجل العفاص والوكاء والعدد والوزن، ووقع في نفسه أنه صادق، فله أن يعطيه، ولا أجيزه إلا ببينة تقوم عليها، كما تقوم على الحقوق". انظر تفصيله في الأم (4/ 46).
قال الخطابي:"ظاهر الحديث يوجب دفعها إليه إذا أصاب الصفة، وهي فائدة قوله:"عفاصها ووكاءها". فإن صحت هذه اللفظة في رواية حماد، وهي قوله: فعرف عددها فادفعها إليه، كان ذلك أمرا لا يجوز خلافه، وإن لم يصح فالاحتياط مع من لم ير الرد إلا ببينة لقوله:"البينة على المدعي".
قلت: حديث حماد بن سلمة صحيح ثابت، كما تقدم، وأنه لم ينفرد بهذه الزيادة؛ فالأخذ بها واجب.
যায়েদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাস্তায় কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস (লুকাতাহ) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, “এক বছর পর্যন্ত এর পরিচিতি দাও (প্রচার করো)। এরপর এর বাঁধন ও পাত্রের মুখ চিনে নাও। অতঃপর তা ভোগ করো। যদি এর মালিক আসে, তবে তা তাকে দিয়ে দাও।”
সে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আর ছাগলের পাল যদি হারিয়ে যায়? তিনি বললেন, “তা নিয়ে নাও। কেননা তা তোমার, অথবা তোমার ভাইয়ের (অন্য মুসলিমের), অথবা নেকড়ের।”
সে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আর উট যদি হারিয়ে যায়? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এতই রাগান্বিত হলেন যে, তাঁর গাল দুটি লাল হয়ে গেল —অথবা তাঁর চেহারা লাল হয়ে গেল— এবং তিনি বললেন, “এতে তোমার কী আসে যায়? সেটির সঙ্গে তার জুতা (খুর) ও তার পানি রয়েছে। যতক্ষণ না তার মালিক আসে (ততক্ষণ সে চলতে পারবে)।”
5812 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه سئل عن الثمر المعلق، فقال:"من أصاب بفيه من ذي حاجة غير متخذ بنة فلا شيء عليه، ومن خرج بشيء منه فعليه غرامة مثليه والعقوبة، ومن سرق منه شيئًا بعد أن يؤويه الجرين، فبلغ ثمن المجن فعليه القطع". وذكر في ضالة الإبل والغنم كما ذكره غيره.
قال: وسئل عن اللقطة، فقال:"ما كان منها في طريق الميناء أو القرية الجامعة فعرفها سنة، فإن جاء طالبها فادفعها إليه، وإن لم يأت فهي لك، وما كان في الخراب يعني ففيها وفي الركاز الخمس".
حسن: رواه أبو داود (1710)، والترمذي (1288)، والنسائي (4958)، وابن ماجه (2596) كلهم عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد اللَّه بن عمرو بن العاص فذكر الحديث، إلا ابن ماجه فرواه من وجه آخر عن الوليد بن كثير، عن عمرو بن شعيب، واللفظ لأبي داود، وعند الآخرين مختصرا.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঝুলন্ত (গাছে থাকা) ফল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি অভাবগ্রস্ত হয়ে মুখ দিয়ে (খেয়ে নেয়) এবং তার আঁচলে ভরে নিয়ে যাওয়ার উদ্দেশ্য না থাকে, তার ওপর কোনো কিছু (দণ্ড) নেই। কিন্তু যে ব্যক্তি তা থেকে কিছু বের করে নিয়ে যায়, তার ওপর এর দ্বিগুণ জরিমানা ও শাস্তি রয়েছে। আর যে ব্যক্তি ফল মাড়াই করার স্থানে (শুকানোর জায়গায়) আশ্রয় নেওয়ার পর তা থেকে কিছু চুরি করে, আর তার মূল্য ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ হয়, তবে তার হাত কাটা যাবে।" তিনি উট ও ছাগলের হারানো বস্তু সম্পর্কেও উল্লেখ করেছেন, যেমনটি অন্যরা উল্লেখ করেছেন। তিনি বললেন: তাঁকে লুক্তাহ (কুড়িয়ে পাওয়া বস্তু) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "যা বন্দরগামী পথে বা বড় জনপদের পথে পাওয়া যায়, তা এক বছর ধরে ঘোষণা করতে থাকবে। যদি তার দাবিদার আসে, তবে তা তাকে দিয়ে দাও। আর যদি না আসে, তবে তা তোমার। আর যা জনশূন্য স্থানে অর্থাৎ পরিত্যক্ত বা ধ্বংসপ্রাপ্ত স্থানে পাওয়া যায়, তাতে এবং রিকাজে (গুপ্তধনে) এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রযোজ্য হবে।"
5813 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: سمعت رجلا من مزينة يسأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: يا رسول اللَّه، جئت أسألك عن الضالة من الإبل. قال:"معها حذاؤها وسقاؤها، تأكل الشجر، وترد الماء، فدعها حتى يأتيها باغيها". قال: الضالة من الغنم؟ قال:"لك، أو لأخيك، أو للذئب، تجمعها حتى يأتيها باغيها". قال: الحريسة التي توجد في مراتعها؟ قال:"فيها ثمنها مرتين وضَرْبُ نكالٍ، وما أُخِذ من عطنه ففيه القطعُ إذا بلغ ما يؤخذ من ذلك ثمنَ المِجَنِّ". قال: يا رسول اللَّه، فالثمار، وما أخذ منها في أكمامها؟ قال:"من أخذ بفمه ولم يتخذ خَبْنة فليس عليه شيء، ومن احتمل فعليه ثمنه مرتين وضربا ونكالا، وما أخذ من أجرانه ففيه القطع إذا بلغ ما يؤخذ من ذلك ثمنَ المجنِّ". قال: يا رسول اللَّه، واللقطة نجدها في سبيل العامرة؟ قال:"عرِّفها حولا، فإن وجد باغيها فأدها إليه، وإلا فهي لك". قال: ما يوجد في الحرب العادي؟ قال:"فيه وفي الركاز الخمس".
حسن: رواه الإمام أحمد (6683) عن يعلى، حدثنا محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد توبع، كما سبق.
ومن طريقه رواه أيضًا البغوي في شرح السنة (2211).
وقوله:"الحريسة توجد في مراتعها"، وفي شرح السنة:"حريسة الجبل".
قال البغوي:"أراد بحريسة الجبل: البقر أو الشاة أو الإبل المأخوذة من المرعى، يقال: احترس الرجل إذا أخذ الشاة من المرعى. وإيجاب الثمن مرتين يشبه أن يكون على سبيل الوعيد والزجر، وإلا فالشيء المتلف لا يضمن أكثر من ثمن مثله، وكان عمر بن الخطاب يحكم به، وإليه ذهب أحمد بن حنبل، وقد قيل: كان في صدر الإسلام يقع بعض العقوبات في الأموال، ثم نسخ، واللَّه أعلم". انتهى.
كذا قال بالنسخ، ولم يبين الناسخ، مع أن عمر بن الخطاب، وبعده أحمد وإسحاق بن راهويه ذهبوا إلى مضاعفة العقوبة لمن أخذ الضوال، ولم يعرف بها، كما جاء في حديث أبي هريرة في الباب الآتي.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুজায়না গোত্রের এক ব্যক্তিকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছি। লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার কাছে উটের ‘হারিয়ে যাওয়া বস্তু’ (হারাণো উট) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে এসেছি।
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “উটের সাথে তার খুর ও তার মশক (খাবার ও পানীয়ের ব্যবস্থা) আছে। সে গাছপালা খায় এবং জলাধারে যায়। সুতরাং তুমি তাকে ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না তার মালিক তাকে খুঁজে পায়।”
লোকটি বলল: ছাগলের ‘হারিয়ে যাওয়া বস্তু’ (হারাণো ছাগল)?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সেটি তোমার জন্য, অথবা তোমার ভাইয়ের জন্য, অথবা নেকড়ের জন্য। তুমি সেগুলোকে একত্র করে রাখবে (সংরক্ষণ করবে) যতক্ষণ না তার মালিক আসে।”
লোকটি বলল: সেই চুরির বিধান কী যা চারণভূমিতে (পশুর বিশ্রামাগার থেকে) পাওয়া যায়?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাতে তার মূল্যের দ্বিগুণ জরিমানা এবং কঠোর শাস্তি রয়েছে। আর যা তার আস্তাবল থেকে নেওয়া হয়, তাতে হাত কাটার বিধান রয়েছে, যদি তা চুরি হওয়া বস্তুর মূল্য ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ হয়।”
লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ফলমূলের হুকুম কী, আর যা তার মোচার ভেতর থেকে (কাঁচা অবস্থায়) নেওয়া হয়?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি মুখ দিয়ে খেল, আর তা আঁচল বা কাপড়ের ভাঁজে ভরে নিল না, তার ওপর কোনো কিছু (জরিমানা) নেই। আর যে ব্যক্তি তা উঠিয়ে নিল (চুরি করল), তার ওপর তার মূল্যের দ্বিগুণ জরিমানা এবং কঠোর শাস্তি রয়েছে। আর যা তার খামার থেকে নেওয়া হয়, তাতে হাত কাটার বিধান রয়েছে, যদি তা চুরি হওয়া বস্তুর মূল্য ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ হয়।”
লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সাধারণ (জনাকীর্ণ) পথে পাওয়া ‘লুকতা’ (কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস) এর হুকুম কী?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি এক বছর তার ঘোষণা দেবে। যদি তার মালিককে পাওয়া যায়, তাহলে তা তাকে দিয়ে দেবে, অন্যথায় তা তোমার।”
লোকটি বলল: প্রাচীন যুদ্ধে (ঐতিহ্যগত যুদ্ধে) যা পাওয়া যায় (এর হুকুম কী)?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাতে এবং রিকাযে (গুপ্তধনে) এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) আদায় করতে হবে।”
5814 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وسئل عن ضالة الغنم، فقال:"هي لك، أو لأخيك، أو للذئب". وسئل عن ضالة الإبل، فقال:"ما لك ولها؟ ومعها سقاؤها، أو سقاؤه وحذاؤه، دعه حتى يجد ربه".
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1364) - عن محمد بن مسكين، ثنا سعيد بن أبي مريم، ثنا يحيى بن أيوب، عن ابن عجلان، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن القعقاع، عن أبي صالح إلا من حديث يحيى".
وقال الهيثمي في المجمع (4/ 167):"رواه البزار والطبراني في الأوسط، ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال إلا أن يحيى بن أيوب -وهو الغافقي- وإن كان من رجال الصحيح إلا أنه لا يرتقي إلى درجة ثقة، ولكنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হারানো ছাগল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: “তা তোমার জন্য, অথবা তোমার ভাইয়ের জন্য, অথবা নেকড়ের জন্য।” আর যখন তাঁকে হারানো উট সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো, তিনি বললেন: “তোমার সাথে তার কী সম্পর্ক? তার সাথে রয়েছে তার পানপাত্র (জল ধারণের ক্ষমতা) এবং তার জুতা (শক্ত খুর)। এটিকে ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না তার মালিক তাকে খুঁজে পায়।”
5815 - عن وعن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ضالة الإبل المكتومة غرامتها، ومثلها معها".
حسن: رواه أبو داود (1718) عن مخلد بن خالد، حدثنا عبد الرزاق -وهو في مصنفه (18599) - أخبرنا معمر، عن عمرو بن مسلم، عن عكرمة، أحسبه عن أبي هريرة فذكره.
وأعله المنذري فقال:"لم يحزم عكرمة بسماعه من أبي هريرة فهو مرسل".
قلت: ولكن قوله: (أحسبه) يحمل على الظن الغالب أنه عن أبي هريرة، ومعنى الحديث يدل على ذلك أيضًا؛ لأن الصحابي لا يحق له أن يحكم على الغرامة مثلها.
ولكن آفته عمرو بن مسلم الجَندي -بفتح الجيم والنون-؛ فإنه مختلف فيه، فضعفه أحمد والنسائي، واختلف فيه قول ابن معين: فمرة قال:"لا بأس به". وأخرى:"ليس بالقوي".
وذكره ابن حبان في الثقات، وقال ابن عدي:"ليس له حديث منكر جدا". وقال الساجي:"صدوق يهم". فمثله يحسن حديثه.
قال الخطابي:"سبيل هذا الحديث سبيل ما تقدم ذكره من الوعيد الذي يراد به وقوع الفعل، وإنما هو زجر وردع، وكان عمر بن الخطاب يحكم به، وإليه ذهب أحمد بن حنبل. وأما عامة الفقهاء فعلى خلافه". انتهى.
قلت: وبه قال أيضًا الزهري وإسحاق بن راهويه، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية بأن من كتم الإبل الضالة تضعف عليه غرامتها.
ويظهر من أحاديث سبق ذكرها أن أحكام اللقطة تختلف عن أحكام الضوال، فأباح الشارع في بعض صورة أخذ اللقطة، ومنع من أخذ الضوال، انظر للمزيد"المنة الكبرى"
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: গোপন করা পথভ্রষ্ট উটের জরিমানা হলো তার মূল্য এবং তার সাথে অনুরূপ আরও একটি মূল্য।
5816 - عن أبي هريرة قال: لما فتح اللَّه على رسوله مكة، فقام في الناس، فحمد اللَّه، وأثنى عليه، ثم قال:"ولا تحل ساقطتها إلا لمنشد".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2434)، ومسلم في الحج (1355)، كلاهما من حديث الوليد بن مسلم، حدثنا الأوزاعيّ قال: حدثني يحيى بن أبي كثير قال: حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن قال: حدثني أبو هريرة فذكره في حديث طويل.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন আল্লাহ তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য মক্কা বিজয় করলেন, তখন তিনি লোকদের মাঝে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, এরপর বললেন: "আর তার (মক্কার) পড়ে থাকা জিনিস (হারানো বস্তু) তুলে নেওয়া হালাল হবে না, তবে কেবল সেই ব্যক্তির জন্য যে তা ঘোষণা করবে।"
5817 - عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة:"إن هذا البلد حرمه اللَّه، لا يعضد شوكهـ، ولا ينفر صيده، ولا يلتقط لقطته إلا من عرفها".
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1587) ومسلم في الحج (1353) كلاهما من حديث جرير بن عبد الحميد، عن منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره. واللفظ للبخاري، وسياق مسلم أطول.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন বলেছেন: "নিশ্চয় এই শহরকে আল্লাহ সম্মানিত (হারাম) করেছেন। এর কাঁটা উপড়ানো হবে না, এর শিকারকে তাড়িয়ে দেওয়া হবে না, আর এর পড়ে থাকা বস্তু (লুকতা) তুলে নেওয়া হবে না, কেবল সেই ব্যক্তি ব্যতীত যে এর ঘোষণা করবে।"
5818 - عن عبد الرحمن بن عثمان التيمي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن لقطة الحاج.
صحيح: رواه مسلم في اللقطة (1724) من طرق عن عبد اللَّه بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكير بن عبد اللَّه بن الأشج، عن يحيى بن عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عبد الرحمن بن عثمان فذكره.
قال ابن وهب: ولقطة الحاج يتركها حتى يجدها صاحبها. ذكره أبو داود (1719)، وابن حبان (4896).
ولكن لا مانع من التقاطها للحفظ بها في مكان مأمون معروف مثل مستودع الحكومة، ليرجع إليها الحاج فيجدها؛ وإنما النهي يقصد به التملك.
قال المنذري:"والصحيح: أنه إذا وجد لقطة في الحرم لم يجز له أن يأخذها إلا للحفاظ على صاحبها، وليعرفها أبدا بخلاف لقطة سائر البلاد، فإنه يجوز التقاطها للتملك. ومنهم من قال: إن حكم لقطة مكة حكم لقطة سائر البلاد". انتهى.
আবদুর রহমান ইবনে উসমান আত-তাইমী থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজীর হারানো বস্তু গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন।
5819 - عن أنس قال: مر النبي صلى الله عليه وسلم بتمرة في الطريق، قال:"لولا أني أخاف أن تكون من الصدقة لأكلتها".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2431)، ومسلم في الزكاة (1071) كلاهما من حديث سفيان، عن منصور، عن طلحة بن مصرف، عن أنس بن مالك فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাস্তার মধ্যে একটি খেজুর দেখতে পেলেন। তিনি বললেন: "যদি আমি ভয় না করতাম যে এটা সাদকার (দানের) মাল হতে পারে, তাহলে আমি অবশ্যই এটা খেয়ে নিতাম।"
5820 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إني لأنقلب إلى أهلي، فأجد التمرة ساقطة على فراشي، فأرفعها لآكلها، ثم أخشى أن تكون من صدقة، فألقيها".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2432)، ومسلم في الزكاة (1070: 163) كلاهما من حديث معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة فذكره.
وأما ما روي عن جابر بن عبد اللَّه قال: رخص لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في العصا، والسوط، والحبل، وأشباهه، يلتقطه الرجل ينتفع به. فهو ضعيف.
رواه أبو داود (1717) عن سلمان بن عبد الرحمن الدمشقي، حدثنا محمد بن شعيب، عن المغيرة بن زياد، عن أبي الزبير المكي أنه حدثه عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
قال أبو داود:"رواه النعمان بن عبد السلام، عن المغيرة أبي سلمة بإسناده. ورواه شبابة عن مغيرة بن مسلم، عن أبي الزبير، عن جابر قال: كانوا. . . لم يذكر النبي صلى الله عليه وسلم". انتهى.
قال المنذري:"وفي إسناده المغيرة بن زياد، قد تكلم فيه غير واحد".
قلت: وهو كما قال؛ فإن المغيرة بن زياد البجلي أبو هشام ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد خالفه المغيرة بن مسلم أبو سلمة القسملي، فرواه عن أبي الزبير موقوفا، وهو أحسن حالا منه.
قال البيهقي (6/ 195):"في رفع هذا الحديث شك، وفي إسناده ضعف".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘আমি আমার পরিবারের নিকট প্রত্যাবর্তন করে আমার বিছানার উপর একটি খেজুর পড়ে থাকতে দেখি। আমি সেটা তুলে খাওয়ার জন্য নিই, অতঃপর আমার আশঙ্কা হয় যে, তা সাদাকার (দানকৃত মালের) হতে পারে। তাই আমি সেটা ফেলে দিই।’