আল-জামি` আল-কামিল
5821 - عن زيد بن خالد الجهني، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من آوى ضالة فهو ضال ما لم يعرفها".
صحيح: رواه مسلم في اللقطة (1725) من طرق عن عبد اللَّه بن وهب قال: أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكر بن سوادة، عن أبي سالم الجيشاني، عن زيد بن خالد الجهني فذكره.
যায়দ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো হারানো জিনিস আশ্রয় দেয় (বা নিজের কাছে রেখে দেয়), সে পথভ্রষ্ট, যতক্ষণ না সে সেটির পরিচয় তুলে ধরে (বা ঘোষণা দেয়)।"
5822 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يحلُبن أحد ماشية امرئ بغير إذنه، أيحب أحدكم أن تؤتى مشربتُه، فتكسر خزانتُه، فينتقل طعامه؟ فإنما تخزن لهم ضروعُ مواشيهم أطعمتَهم، فلا يحلُبن أحد ماشية أحد إلا بإذنه".
متفق عليه: رواه مالك في الاستئذان (17) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاري في اللقطة (2435)، ومسلم في اللقطة (1726) كلاهما من حديث مالك به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেউ যেন কারো অনুমতি ছাড়া অন্যের গবাদিপশুর দুধ দোহন না করে। তোমাদের মধ্যে কি কেউ পছন্দ করে যে, তার ভাণ্ডারে (খাদ্য মজুতের স্থানে) আসা হবে, অতঃপর তার ভাঁড়ারঘর ভেঙে দেওয়া হবে এবং তার খাবার স্থানান্তরিত করা হবে? কারণ তাদের পশুর স্তনগুলো তাদের জন্য খাদ্য সঞ্চয় করে রাখে। সুতরাং কেউ যেন কারো অনুমতি ছাড়া অন্যের গবাদিপশুর দুধ দোহন না করে।"
5823 - عن عبد اللَّه بن الشخير قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ضالة المسلم حرق النّار".
صحيح: رواه ابن ماجه (2502)، وأحمد (16314)، وابن حبان (4888)، والبيهقي (6/ 191)، والبغوي في شرحه (2209) كلهم من حديث يحيى بن سعيد، عن حميد الطويل، عن الحسن، عن مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير، عن أبيه فذكره.
وإسناده صحيح. والحسن هو البصري الإمام المعروف، وكان مدلسا، إلا أن إخراج ابن حبان في صحيحه مشعر بأنه لم يدلس فيه، وقد تابعه قتادة، عن مطرف به. رواه أبو نعيم في الحلية (9/ 33).
وقوله:"حرق النّار" أي سبب دخوله في النّار إذا تملكها، ولم يعرف بها.
আবদুল্লাহ ইবনুশ শিখখীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিমের হারানো জিনিস জাহান্নামের জ্বালানি।
5824 - عن الجارود العبدي قال: بينما نحن مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره، وفي الظهر قلة، إذ تذاكر القوم الظهر، فقلت: يا رسول اللَّه، قد علمت ما يكفينا من الظهر، فقال:"وما يكفينا؟". قلت: ذود نأتي عليهن في جرف، فنستمتع بظهورهم. قال:"لا، ضالة المسلم حرق النّار، فلا تقربَنَّها. ضالة المسلم حرق النّار، فلا تقربَنَّها. ضالة المسلم حرق النّار، فلا تقربَنَّها".
وقال في اللقطة:"الضالة تجدها فانشدنَّها، ولا تكتم، ولا تُغيب، فإن عُرفتْ فأدها، وإلا فمال اللَّه يؤتيه من يشاء".
حسن: رواه أحمد (20754) عن إسماعيل، أخبرنا سعيد الجريري، عن أبي العلاء بن الشخير، عن مطرف، قال: حديثان بلغاني عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد عرفت أن قد صدَّقتهما، لا أدري أيهما قبل صاحبه؟ حدثنا أبو مسلم الجذمي جذيمة عبد القيس، حدثنا الجارود فذكره.
ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (2/ 298)، والدارمي (2643، 2644)، وابن حبان (4887)، والبيهقي (6/ 190) كلهم من طرق عن أبي مسلم الجذمي، عن الجارود مختصرا.
وأبو مسلم الجذمي ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 581)، ولم يذكر في"التهذيب" (12/ 235) توثيق أحد له، ولكنه ذكر عددا رووه عنه، فهو"مقبول" كما في"التقريب" أي عند المتابعة.
وقد توبع. أخرجه ابن قانع في معجمه (164)، والطبراني (5/ 581) كلاهما من طريق أبي كامل الجحدري، حدثنا أبو معشر البراء، حدثنا المثنى بن سعيد، عن قتادة، عن عبد اللَّه بن باباه، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: أخبرني الجارود فذكره مختصرا.
وهي متابعة قوية إلا أن الدارقطني يرى أن أبا البراء وهم فيه، وقول الجريري أشبه."العلل" (14/ 6).
ورواه عبد الرزاق (18603)، وعنه أحمد (20755)، والطبراني (2/ 296)، والبيهقي (6/ 191) عن سفيان، عن خالد الحذاء، عن يزيد بن عبد اللَّه بن الشخير، عن مطرف بن الشخير، عن الجارود العبدي يرفعه مختصرا.
قال البيهقي:"وقد قيل عنه عن مطرف، عن أبي مسلم، عن الجارود. وقد قيل: عن مطرف ابن عبد اللَّه بن الشخير، عن أبيه". انتهى.
ورواه عبد الرزاق بأسانيد أخرى أيضًا، وبالجملة فالحديث بمجموع طرقه يكون حسنا.
وقول مطرف:"الحديثان بلغاني. . ." يرى أن أحدهما ناسخا للآخر، ولكنه لم يدر أيهما قبل، والذي يظهر لي أنه ليس بينهما تناقض حتى نحتاج إلى النسخ، فقول النبي صلى الله عليه وسلم:"ضالة المسلم حرق". إذا تملكها، ولم يقم بالتعريف بها، كما جاء في الأحاديث الأخرى. فإذا عرفها ولم يجد صاحبها ومضى عليها عام كما في الأحاديث الصحيحة فهو مال اللَّه يؤتيه من يشاء.
وقيل معناه: الحيوان الممتنع أخذه كالإبل كما تقدم. واللَّه تعالى أعلم.
জারুদ আল-আবদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদা আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর কোনো এক সফরে ছিলাম। তখন বাহন পশুর (উটের) সংখ্যা ছিল কম, যখন লোকেরা বাহন পশু সম্পর্কে আলোচনা করছিল। তখন আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! বাহন পশুর মধ্যে যা আমাদের জন্য যথেষ্ট হবে, তা তো আমি জানি। তিনি বললেন: "আর কী আমাদের জন্য যথেষ্ট হবে?" আমি বললাম: এক পাল উট, যা আমরা কোনো বালুকাময় বা উঁচু জমিতে পাব এবং সেগুলোর পিঠ ব্যবহার করে আনন্দ লাভ করব (অর্থাৎ, কুড়িয়ে নেব)। তিনি বললেন: "না। মুসলিমের হারানো বস্তু হলো আগুনের সম্পদ (বা আগুনের জ্বালানি)। সুতরাং তোমরা তার (কাছেও) যেও না। মুসলিমের হারানো বস্তু হলো আগুনের সম্পদ। সুতরাং তোমরা তার (কাছেও) যেও না। মুসলিমের হারানো বস্তু হলো আগুনের সম্পদ। সুতরাং তোমরা তার (কাছেও) যেও না।"
আর হারানো বস্তু (লুকতা) সম্পর্কে তিনি বললেন: "তুমি হারানো জিনিস খুঁজে পেলে তা ঘোষণা করো, গোপন করো না এবং লুকিয়ে রেখো না। যদি সেটির মালিক পরিচিত হয়, তবে তাকে তা ফিরিয়ে দাও। আর যদি না হয়, তবে তা আল্লাহর মাল। তিনি যাকে ইচ্ছা তা দেন।"
5825 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سئل عن اللقطة، فقال:"تُعرف، ولا تُغيب، ولا تكتم، فإن جاء صاحبها، وإلا فهو مال اللَّه يؤتيه من يشاء".
صحيح: رواه البزار -كشف الأستار (1367) - عن محمد بن معمر، ثنا الحجاج، ثنا حماد (يعني ابن سلمة)، عن سعيد الجريري، عن أبي العلاء، عن مطرف، عن أبي هريرة فذكره.
قال البزار:"لا نعلم أسند مطرف عن أبي هريرة إلا هذا".
وأبو العلاء هو يزيد بن عبد اللَّه بن الشخير، ومطرف ثقة من رجال الجماعة.
قال الهيثمي في المجمع (4/ 167):"رجاله رجال الصحيح".
وفي الباب ما روي عن المنذر بن جرير قال: كنت مع جرير (ابن عبد اللَّه) بالبوازيج، فجاءه الراعي بالبقرة، وفيها بقرة ليست منها، فقال له جرير: ما هذه؟ قال: لحقت بالبقر لا ندري لمن هي؟ . فقال جرير: أخرجوها؛ فقد سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يأوي الضالة إلا ضال".
رواه أبو داود (1720) عن عمرو بن عون، أخبرنا خالد بن عبد اللَّه، عن أبي حيان التيمي، عن المنذر ابن جرير فذكره.
واختلف على أبي حيان، وهو يحيى بن سعيد بن حيان التيمي، ثقة من رجال الجماعة. فرواه خالد بن عبد اللَّه الواسطي عنه هكذا.
ورواه يحيى بن سعيد عنه قال: حدثنا الضحاك خال المنذر بن جرير، عن المنذر بن جرير. ومن طريقه رواه ابن ماجه (2503).
وكذلك رواه يعلى بن عبيد الطنافسي عنه، عن الضحاك بن المنذر. وهو عند الطحاوي في مشكله (4719)، والإمام أحمد (19184) عن يحيى بن زكريا (وهو أبي زائدة)، عن أبي حيان، عن الضحاك بن المنذر مختصرا.
والضحاك بن المنذر، ويقال: الضحاك بن جرير بن عبد اللَّه، لم يرو عنه غير أبي حيان. قال ابن المديني:"الضحاك لا يعرفونه".
ولكن تابعه أبو زرعة عمرو بن جرير، عن المنذر بن جرير. رواه النسائي في الكبرى (5799) من حديث إبراهيم بن عيينة، عن أبي حيان، عن أبي زرعة عمرو بن جرير.
ورواه شعبة، عن أبي حيان، عن رجل، عن المنذر بن جرير، عن جرير. وهو في السنن الكبرى للنسائي.
ورواه روح بن القاسم، عن أبي حيان، عن الضحاك بن المنذر، عن رجل، عن جرير. رواه الطبراني في الأوسط (1403).
ذكره المزي في"تهذيب الكمال" في ترجمة الضحاك بن المنذر بعض هذه الوجوه، وقال:"الاضطراب فيه من أبي حيان التيمي". انتهى
"والبوازيج" بلد قريب من دجلة.
وقوله:"لا يأوي" أي لا يخلطها بماله.
نعم. فقال عمر بن الخطاب:"اذهب فهو حر، ولك ولاؤه، وعلينا نفقته".
رواه مالك في الأقضية (21) عن ابن شهاب، عن سنين أبي جميلة فذكره.
ومن طريقه رواه البيهقي في السنن الكبرى (6/ 201 - 202)، والصغرى (2234) بتحقيقي.
وإسناده صحيح إلا أنه موقوف على عمر، وذكره البخاري (5/ 274) تعليقا بالجزم، فقال:"وقال أبو جميلة: وجدت منبوذا، فلما رآني عمر قال:"عسى الغوير أبؤسا". كأنه يتهمني. قال عَريفي: إنه رجل صالح. قال: كذلك، اذهب وعلينا نفقته". انتهى
وقوله:"عسى الغوير أبؤسا". الغوير تصغير غار، وأبؤسا جمع بؤس، وهو الشدة. وهو مثل قديم يقال عند التهمة، ومعناه ربما جاء الشر من معدن الخير، أراد عمر بقوله هذا: لعلك زنيت بأمه، وادعيته لقيطا.
قلت: لا خلاف بين أهل العلم بأن اللقيط يكون حرا. ونقل ابن المنذر الإجماع على ذلك."الإجماع" (570).
وأما قول عمر"ولاؤه لك" فلم يقل أحد -فيما أعلم- بظاهر".
قال مالك عقب رواية الأثر: الأمر عندنا في المنبوذ أنه حر، وأن ولاءه للمسلمين، هم يرثونه، ويعقلون عنه.
وقال البيهقي في"الصغرى":"ويحتمل أن يكون المراد بقوله:"ولاؤه لك" ولاء الإسلام، لا ولاء العتاق".
وقال ابن عبد البر:"ذهب مالك والشافعي وجماعة من أهل الحجاز أن اللقيط حر، لا ولاء لأحد عليه".
وقال:"وتأولوا قول عمر:"لك ولاؤه" أي لك أن تليه، وتقبض عطاءه، وتكون أولى الناس بأمره حتى يبلغ رشده، ويحسن النظر لنفسه، فإن مات كان ميراثه لجماعة المسلمين، وعقله عليهم". انتهى. الاستذكار (22/ 157 - 158).
واللقيط في الغالب يستعمل في الطفل المفقود المطروح على الأرض فرارا من تهمة الزنا، أو لسبب غير معلوم. والملتقط له الحق في إمساك اللقيط إلا إن خاف على نفسه من تهمة السرقة، فيرفع أمره إلى الحاكم، ويستأذن منه للإمساك إن شاء، أو يرده إلى دار التربية.
وأما نسب اللقيط فيكون مجهولا إلا إذا ادعى أحد فتقبل دعوته بدون بينة؛ لما فيه من الشرف والكرم يعود على اللقيط، إلا أن يكون المدعي أكثر من واحد، فيطلب من كل واحد بينة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লুকতা (পাওয়া বস্তু) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তিনি বললেন: "তা পরিচিত করা হবে, লুকিয়ে রাখা হবে না এবং গোপন করা হবে না। এরপর যদি তার মালিক আসে (তবে তাকে দিয়ে দেওয়া হবে), অন্যথায় তা আল্লাহর মাল, তিনি যাকে ইচ্ছা তাকে তা দান করেন।"
[অন্য এক বর্ণনায়] মুনযির ইবনু জারীর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জারীর ইবনু আবদুল্লাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে আল-বাওয়াযীজে ছিলাম। তখন রাখাল তার কাছে একটি গরু নিয়ে এলো, যার মধ্যে এমন একটি গরু ছিল যা তাদের পালের ছিল না। জারীর তাকে জিজ্ঞেস করলেন: এটা কী? রাখাল বলল: এটা গরুর পালের সাথে মিশে গেছে, আমরা জানি না এটি কার? তখন জারীর বললেন: এটিকে বের করে দাও; কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "পথভ্রষ্ট ব্যক্তি ছাড়া অন্য কেউ হারানো বস্তুকে (নিজের মালের সাথে) আশ্রয় দেয় না।"
[অন্য প্রসঙ্গে] উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) [প্রাপ্ত নবজাতক সম্পর্কে] বললেন: "যাও, সে স্বাধীন। তার অভিভাবকত্ব তোমার জন্য, আর তার খরচ বহন করা আমাদের দায়িত্ব।"
5826 - عن * *
৫৮২৬ - থেকে বর্ণিত * *
5827 - عن عائشة قالت لعروة: يا ابن أختي، إن كنا لننظر إلى الهلال، ثم الهلال، ثلاثة أهلة في شهرين، وما أُوقِدت في أبيات رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نار. فقلت: يا خالة، ما كان يُعيشكم؟ قالت: الأسودان: التمر والماء، إلا أنه قد كان لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جيران من الأنصار كانت لهم منائح، وكانوا يمنحون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من ألبانهم فيسقينا.
متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2567)، ومسلم في الزهد (2972) كلاهما من حديث عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উরওয়াকে বললেন, "হে আমার বোনের ছেলে, আমরা চাঁদ দেখতাম, তারপর আবার চাঁদ দেখতাম—দুই মাসে তিনটি চাঁদ (উদিত হতে) দেখতাম, অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরসমূহে আগুন জ্বালানো হতো না।" (উরওয়া বলেন) আমি বললাম, 'খালা, কীসে আপনাদের জীবন ধারণ হতো?' তিনি বললেন, 'দুই কালো জিনিস: খেজুর ও পানি। তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আনসারদের মধ্য থেকে এমন প্রতিবেশীরা ছিলেন, যাদের দুগ্ধবতী পশু ছিল; আর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাদের দুধ থেকে কিছু দান করতেন, ফলে তিনি আমাদের তা পান করাতেন।"
5828 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا نساء المسلمات، لا تحقرن جارة لجارتها، ولو فِرْسَنَ شاةٍ".
متفق عليه: رواه البخاري في كتاب الأدب (6017)، ومسلم في الزكاة (1030) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "হে মুসলিম নারীরা, কোনো প্রতিবেশিনী যেন তার প্রতিবেশীর জন্য সামান্য উপহারকেও তুচ্ছ না মনে করে, যদিও তা একটি ছাগলের ক্ষুর হয়।"
5829 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تهادوا تحابوا".
حسن: رواه البخاري في الأدب المفرد (594)، والدولابي في الكنى (1/ 150)، والبيهقي (6/ 169) كلهم من طريق ضِمام بن إسماعيل، عن موسى بن وردان، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل ضِمام بن إسماعيل المرادي؛ فإنه حسن الحديث. قال أبو حاتم:"كان صدوقا". وقال النسائي:"ليس به بأس".
وموسى بن وردان مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "তোমরা পরস্পরের মধ্যে উপহার বিনিময় করো, তাহলে তোমাদের মধ্যে ভালোবাসা বৃদ্ধি পাবে।"
5830 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لو دعيت إلى ذراع أو كراع لأجبت، ولو أهدي إلي ذراع أو كراع لقبلت".
صحيح: رواه البخاري في الهبة (2568) عن محمد بن بشار، حدثنا ابن أبي عدي، عن شعبة، عن سليمان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.
وقوله:"كراع" هو من الإنسان ما دون الركبة إلى الكعب، ومن البقر والغنم المستدق الساق
العاري من اللحم وهو المعروف اليوم بالمقادم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যদি আমাকে (খাওয়ার জন্য) একটি বাহু ('যিরা') অথবা একটি 'কুর’আ' (পশুর পায়ের নিম্ন অংশ) পর্যন্তও দাওয়াত দেওয়া হয়, তবুও আমি তা গ্রহণ করব। আর যদি আমাকে একটি বাহু অথবা একটি কুর’আ উপহার হিসেবেও দেওয়া হয়, তবুও আমি তা সানন্দে গ্রহণ করব।"
5831 - عن أنس بن مالك قال: أنفجنا أرنبا بمر الظهران، فسعى القوم، فلغبوا، فأدركتها، فأخذتها، فأتيت بها أبا طلحة، فذبحها، وبعث بها إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بوركها أو فخذيها. -قال: فخذيها، لا شك فيه- فقبله. قلت: وأكل منه؟ قال: وأكل منه، ثم قال بعدُ: قَبِله. (أي لم يأكل منه).
متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2572)، ومسلم في كتاب الصيد (1953) كلاهما من حديث شعبة، عن هشام بن زيد بن أنس بن مالك، عن أنس فذكره. واللفظ للبخاري.
ولفظ مسلم:"فقبله" فقط، ولم يقل فيه:"أكل منه".
والصحيح أنه قبله، ولم يأكل منه؛ لأنه شك في أول الأمر، ثم جزم بأنه قبله.
وقوله:"لغبوا" معناه: تعبوا.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মাররুয যাহরান নামক স্থানে একটি খরগোশ তাড়া করলাম। লোকেরা দৌঁড়াল, কিন্তু তারা ক্লান্ত হয়ে পড়ল। তখন আমি সেটিকে ধরতে পারলাম এবং ধরলাম। আমি তা আবূ তালহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে নিয়ে আসলাম, অতঃপর তিনি সেটিকে যবেহ করলেন এবং এর রান অথবা উরুদেশ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠালেন। (বর্ণনাকারী) বললেন: "এর উরুদেশ", এতে কোনো সন্দেহ নেই। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা গ্রহণ করলেন। আমি (আনাসকে) জিজ্ঞাসা করলাম: তিনি কি তা থেকে খেলেন? তিনি বললেন: তিনি খেললেন। কিন্তু পরে তিনি (বর্ণনাকারী) আবার বললেন: তিনি শুধু তা গ্রহণ করলেন (অর্থাৎ তিনি খেলেননি)।
5832 - عن الصعب بن جثامة، أنه أهدى لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حمارا وحشيا، وهو بالأبواء أو بودان، فرد عليه، فلما رأى ما في وجهه قال:"أما إنا لم نرده عليك إلا أنا حرم".
متفق عليه: رواه مالك في الموطأ عن ابن شهاب، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة بن مسعود، عن عبد اللَّه بن عباس، عن الصعب بن جثامة فذكره.
ومن طريقه رواه البخاري في الهبة (2573)، ومسلم في الحج (1192).
সা'ব ইবনু জাচ্ছামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি বন্য গাধা হাদিয়া পাঠিয়েছিলেন, যখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবওয়া অথবা ওয়াদ্দান নামক স্থানে ছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটি ফেরত দিলেন। যখন তিনি (সা'ব) তাঁর (নবীর) চেহারায় (মনোকষ্টের) ছাপ দেখতে পেলেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা তো তোমাকে এটা কেবল এ কারণেই ফেরত দিয়েছি যে আমরা ইহরাম অবস্থায় আছি।"
5833 - عن المغيرة بن شعبة قال: أهدى دحية الكلبي لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خفين فلبسهما.
صحيح: رواه الترمذي في السنن (1769) وفي الشمائل (70) وأبو الشيخ في أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم (ص: 116) كلاهما من طريق الحسن بن عياش، عن أبي إسحاق وهو الشيباني، عن عامر الشعبي، عن المغيرة بن شعبة: فذكره.
وإسناده صحيح، والحسن بن عياش اختلف فيه، والجمهور على توثيقه إلا أن الحافظ قال في التقريب:"صدوق".
মুগীরা ইবনু শু'বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দিহয়া আল-কালবী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক জোড়া চামড়ার মোজা (খুফফাইন) উপহার দিলেন, অতঃপর তিনি তা পরিধান করলেন।
5834 - عن المغيرة بن شعبة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم توضأ ومسح على خفيه، قال: فقال رجل عند المغيرة بن شعبة: يا مغيرة، ومن أين كان للنبي صلى الله عليه وسلم خفان؟ قال: فقال المغيرة: أهداهما إليه النجاشي.
صحيح: رواه البيهقي (1/ 283) عن أبي عبد اللَّه الحاكم، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، عن العباس بن محمد الدوري، عن عمر بن حفص بن غياث، عن أبي إسحاق الشيباني، عن
الشعبي، عن المغيرة بن شعبة، فذكره. وهذا إسناد ظاهره الصحة.
وقال البيهقي:"والشعبي إنما روى حديث المسح عن عروة بن المغيرة، عن أبيه".
قلت: حديث المغيرة في المسح دون ذكر الإهداء صحيح مشهور، سبق في المسح على الخفين، ورواية الشعبي عن المغيرة ثابتة، فيحتمل أنه سمعه بالواسطة، ثم تيسر له السماع من المغيرة مباشرة.
মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করলেন এবং তাঁর মোজার উপর মাসাহ করলেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে থাকা এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল: হে মুগীরাহ! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য মোজা কোথা থেকে এসেছিল? মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নাজ্জাশী তা তাঁকে উপহার হিসেবে দিয়েছিলেন।
5835 - عن بريدة بن الحصيب، أن النجاشي أهدى للنبي صلى الله عليه وسلم خفين أسودين ساذجين، فلبسهما، ثم توضأ ومسح عليهما.
حسن: رواه أبو داود (155) والترمذي (2820) وفي الشمائل (69) وابن ماجه (549)، (3620) وأحمد (22981) كلهم من طريق وكيع، حدثنا دلهم بن صالح الكندي، عن حجير بن عبد اللَّه الكندي، عن عبد اللَّه بن بريدة بن الحصيب، عن أبيه، فذكره.
ودلهم بن صالح ضعيف، وحجير بن عبد اللَّه الكندي مجهول، فإنه لم يرو عنه إلا دلهم بن صالح، ولم يوثقه غير ابن حبان، على قاعدته في توثيق المجاهيل، لكنهما توبعا؛ فقد رواه أبو الشيخ في أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم (ص: 117) عن أبي بكر البزار، حدثنا محمد بن مرداس الأنصاري، ثنا يحيى بن كثير، ثنا الجريري، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن أبيه، مثله.
وسقط من مطبوع مسند البزار (4392)"ثنا يحيى بن كثير" ويحيى بن كثير هو أبو النضر، صاحب البصري، ضعيف.
والجريري اسمه سعيد بن إياس أبو مسعود البصري، ثقة إلا أنه اختلط قبل موته بثلاث سنين، ولكنه لا بأس به في المتابعة. وبمجموع الطريقين يصل الحديث إلى درجة الحسن، وقد حَسَّنَه أيضًا الترمذي، فقال:"هذا حديث حسن".
وقوله:"أسودين ساذجين"، السَّاذَج: بفتح الذال وكسرها، هو الخالص غير المشوب وغير المنقوش.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাজাশী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দুটি কালো, সাদাসিধা চামড়ার মোজা (খুফ্ফাইন) উপহার দিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি সেগুলো পরিধান করলেন, এরপর উযু করলেন এবং সেগুলোর উপর মাসাহ করলেন।
5836 - عن أسامة بن زيد، قال: كساني رسول اللَّه قُبْطِيَّة كثيفة مما أهداها له دحية الكلبي، فكسوتها امرأتي، فقال:"ما لك لم تلبس القبطية؟" قلت: كسوتها امرأتي، فقال:"مرها فلتجعل تحتها غلالة، فإني أخاف أن تصف عظامها".
حسن: رواه أحمد (21786)، (21788) والبيهقي (2/ 234) والضياء في المختارة (1365 - 1366) من طريق عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن محمد بن أسامة بن زيد، عن أبيه، فذكره.
وهذا إسناد حسن من أجل عبد اللَّه بن محمد بن عقيل؛ فإنه حسن الحديث إذا لم يخالف، ولم يأت بما ينكر عليه.
قوله:"القبطية" هي ثياب من كتان رقيق كانت تعمل بمصر، نسبة إلى القبط على غير القياس، فرقا بينها وبين الإنسان، قاله الفيومي في المصباح المنير.
وقوله:"غلالة" ثوب رقيق يلبس تحت الدثار.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি মোটা ক্বিবতিয়্যা (কাপড়) পরিয়েছিলেন, যা দিহইয়াতুল কালবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে উপহার দিয়েছিলেন। এরপর আমি তা আমার স্ত্রীকে পরিয়ে দিলাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, "কী ব্যাপার, তুমি ক্বিবতিয়্যাটি পরিধান করলে না কেন?" আমি বললাম, আমি এটা আমার স্ত্রীকে পরিয়ে দিয়েছি। তিনি বললেন, "তুমি তাকে আদেশ করো, সে যেন এর নিচে একটি গিলালাহ (অন্তর্বাস) পরিধান করে। কেননা আমি ভয় পাচ্ছি যে এটা তার শরীরের হাড়গুলো ফুটিয়ে তুলবে (অর্থাৎ শরীরের গড়ন প্রকাশ করে দেবে)।"
5837 - عن العباس بن عبد المطلب قال: شهدت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوم حنين، فلزمت أنا وأبو سفيان بن الحارث بن عبد المطلب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فلم نفارقه، ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على بغلة له بيضاء أهداها له فروة بن نفاثة الجذامي. . . فذكر الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1775/ 76) عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن سرح، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، قال: حدثني كثير بن عباس بن عبد المطلب، قال: قال عباس: فذكره.
وفروة بن نفاثة الجذامي بعث إلى النبي صلى الله عليه وسلم رسولا بإسلامه، وأهدى له بغلة بيضاء، وكان عاملا للروم على من يليهم من العرب، فلما بلغهم إسلامه حبسوه، ثم قتلوه.
আব্বাস ইবন আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের দিনে উপস্থিত ছিলাম। তখন আমি এবং আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবন আব্দুল মুত্তালিব রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আঁকড়ে ধরলাম (তাঁকে ছাড়িনি), আর আমরা তাঁকে ছেড়ে যাইনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর একটি সাদা খচ্চরের উপর সওয়ার ছিলেন, যা তাঁকে ফারওয়া ইবনু নুফাছা আল-জুযামী উপহার দিয়েছিলেন।... অতঃপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করেন।
5838 - عن ابن عمر قال: كساني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حلة من حلل السيراء، أهداها له فيروز، فلبست الإزار، فأغرقني طولا وعرضا، فسحبته، ولبست الرداء، فتقنعت به، فأخذ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعاتقي، فقال:"يا عبد اللَّه، ارفع الإزار؛ فإن ما مست الأرض من الإزار إلى ما أسفل من الكعين في النّار". قال عبد اللَّه بن محمد: فلم أر إنسانا قط أشد تشميرا من عبد اللَّه بن عمر.
حسن: رواه أحمد (5713) وأبو يعلى (5714) من طريقين، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه ابن محمد بن عقيل، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن محمد بن عقيل؛ فإنه حسن الحديث.
وقصة رفع الإزار فقط في صحيح مسلم (2086) من حديث عبد اللَّه بن واقد، عن ابن عمر.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ‘সায়রা’ (রেশম মিশ্রিত এক ধরনের) কাপড়ের একটি জোড়া পোশাক পরিয়েছিলেন, যা ফিরোজ তাঁকে উপহার দিয়েছিলেন। আমি ইযার (লুঙ্গি) পরলাম। সেটি আমার জন্য লম্বায় ও প্রস্থে খুব বেশি হয়ে যাওয়ায় আমি তা টেনে টেনে যাচ্ছিলাম। এরপর আমি রিদা (চাদর) পরলাম এবং তা দিয়ে মুখ ঢাকলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাঁধ ধরলেন এবং বললেন: "হে আব্দুল্লাহ! তোমার ইযার উপরে উঠাও। কেননা ইযার-এর যে অংশ টাখনুর নিচে গিয়ে মাটিকে স্পর্শ করে, তা জাহান্নামের আগুনের মধ্যে থাকবে।" আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ বলেন, আমি আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে লুঙ্গি গুটিয়ে (বা কাপড় উপরে উঠিয়ে) পরিধান করতে কাউকে দেখিনি।
5839 - عن عبد اللَّه بن بسر قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقبل الهدية، ولا يقبل الصدقة.
حسن: رواه أحمد (17688) عن هشام بن سعيد، حدثني الحسن بن أيوب الحضرمي، حدثني عبد اللَّه بن بسر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسن بن أيوب الحضرمي، أبي عبد اللَّه الشامي، من رجال"التعجيل" (404). قال أحمد:"ما أرى به بأسا"، وذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 126).
আবদুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাদিয়া (উপঢৌকন) গ্রহণ করতেন, কিন্তু সাদকা (দান) গ্রহণ করতেন না।
5840 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أجيبوا الداعي، ولا تردوا الهدية، ولا تضربوا المسلمين".
صحيح: رواه أحمد (3838) والبخاري في الأدب المفرد (157) والبزار -كشف الأستار (1243) - والطبراني في الكبير (10/ 242) وصحّحه ابن حبان (5603) كلهم من طرق عن الأعمش، عن شقيق، عن عبد اللَّه، فذكره. وإسناده صحيح.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আহ্বানকারীর ডাকে সাড়া দাও, তোমরা হাদিয়া প্রত্যাখ্যান করো না, এবং তোমরা মুসলিমদেরকে প্রহার করো না।"