হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5861)


5861 - عن عمرو بن شعيب حدثه عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"مثل الذي يسترد ما وهب كمثل الكلب يقيء، فيأكل قيئه، فإذا استرد الواهب فلوقف، فليعرف بما استرد، ثم ليدفع إليه ما وهب".

حسن: رواه أبو داود (3540) عن سليمان بن داود المهري، أخبرنا ابن وهب، أخبرني أسامة ابن زيد، عن عمرو بن شعيب فذكره.

ورواه أحمد (6629) عن أبي بكر الحنفي، أخبرنا أسامة بن زيد فذكره. وإسناده حسن من
أجل أسامة بن زيد وشيخه عمرو بن شعيب، فإنهما حسنا الحديث.

وقوله:"فإذا استرد الواهب" أي بعد أن سمع مثل الكلب الذي يعود في قيئه، فإن الواهب أحق بهبته ما لم يثب منها، ولكنه كالكلب الذي يعود في قيئه فإن شاء ارتجع، وإن شاء ترك، ففيه ترهيب وتحذير من العودة إلى الهبة.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার দেওয়া দান ফিরিয়ে নেয়, সে ঐ কুকুরের মতো, যে বমি করে অতঃপর তা আবার খায়। সুতরাং যখন দাতা (তার দান) ফিরিয়ে নিতে চায়, তখন তাকে যেন দাঁড় করানো হয় এবং তার ফিরিয়ে নেওয়ার বিষয়টি জানানো হয়, অতঃপর যা সে দান করেছিল তা তাকে ফিরিয়ে দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5862)


5862 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرجع في هبته إلا الوالد من ولده. والعائد في هبته كالعائد في قيئه".

حسن: رواه النسائي (3689)، والدارقطني (3/ 43)، والبيهقي (6/ 179)، وأحمد (6705) كلهم من طرق عن عامر الأحول، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.

قال البيهقي:"ويحتمل أن يكون عمرو بن شعيب رواه من الوجهين، فحسين المعلم حجة، وعامر الأحول ثقة".

وقال الترمذي عقب رواية حديث حسين المعلم عن عمرو بن شعيب:"هذا حديث حسن صحيح. قال الشافعي: لا يحل لمن وهب هبة أن يرجع فيها إلا الوالد فله أن يرجع فيما أعطى ولده، واحتج بهذا الحديث".

قلت: وهو كما قال الشافعي؛ لأن الوالد ليس كغيره من الأجانب والأباعد، وقد جعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للأب حقا في مال ولده، فقال:"أنت ومالك لأبيك". فرجوعه في هبته من ولده أولى من مال ولده. وأما من لم يأخذ بهذا الحديث فتأوله بأن له الرجوع عند الحاجة إليه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পিতা তার সন্তানকে দেওয়া দান (হেবা) ব্যতীত অন্য কেউ তার দান ফিরিয়ে নিতে পারে না। আর যে ব্যক্তি তার দান ফিরিয়ে নেয়, সে তার বমি গিলে খাওয়ার মতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5863)


5863 - عن أبي حميد الساعدي قال: استعمل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجلا من الأسد يقال له: ابن اللتبية-، فلما قدم قال: هذا لكم، وهذا لي، أهدي لي. قال: فقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على المنبر، فحمد اللَّه، وأثنى عليه وقال:"ما بال عامل أبعثه، فيقول: هذا لكم، وهذا أهدي لي، أفلا قعد في بيت أبيه أو في بيت أمه حتى ينظر أيهدى إليه. أم لا! والذي نفس محمد بيده لا ينال أحد منكم منها شيئًا إلا جاء به يوم القيامة يحمله على عنقه، بعير له رغاء، أو بقرة لها خوار، أو شاة تيعر".

متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6636)، ومسلم في كتاب الإمارة (1832) كلاهما من حديث الزهري، عن عروة، عن أبي حميد الساعدي قال فذكره.




আবূ হুমাইদ সা‘ঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসাদ গোত্রের ইবনুল লুতবিয়্যাহ নামক এক ব্যক্তিকে (যাকাত আদায়ের) কর্মচারীর পদে নিয়োগ দিলেন। সে যখন (দায়িত্ব পালন শেষে) ফিরে আসল, তখন বলল, এই অংশ আপনাদের, আর এই অংশ আমার, এটা আমাকে উপহার হিসেবে দেওয়া হয়েছে। বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারের উপর দাঁড়ালেন, আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন এবং বললেন, কী হলো সেই কর্মচারীর, যাকে আমি নিযুক্ত করি, আর সে এসে বলে, এই অংশ আপনাদের, আর এই অংশ আমাকে উপহার দেওয়া হয়েছে? সে কেন তার পিতা-মাতার ঘরে বসে থাকল না, যাতে সে দেখতে পেত যে, তাকে উপহার দেওয়া হয় কি না! সেই সত্তার কসম, যার হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ! তোমাদের কেউ এর (রাষ্ট্রীয় সম্পদের) সামান্যতম অংশও আত্মসাৎ করলে, কিয়ামতের দিন সে অবশ্যই তা তার ঘাড়ে বহন করে নিয়ে আসবে— তা যদি শব্দকারী উট হয়, বা হাম্বা শব্দকারী গরু হয়, অথবা ভেড়ার আওয়াজকারী ছাগল হয় (তবুও)।









আল-জামি` আল-কামিল (5864)


5864 - عن عمر بن الخطاب قال: حملت على فرس في سبيل اللَّه، فأضاعه الذي كان عنده، فأردت أن أشتريه منه، وظننت أنه بائعه برخص، فسألت عن ذلك النبي
-صلى الله عليه وسلم فقال:"لا تشتره، وإن أعطاكهـ بدرهم واحد، فإن العائد في صدقته كالكلب يعود في قيئه".

متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (50) عن زيد بن أسلم، عن أبيه، سمعت عمر بن الخطاب فذكره.

ومن طريقه رواه البخاري في الهبة (2623)، ومسلم في الهبات (1620).




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আল্লাহর রাস্তায় একটি ঘোড়া দান করেছিলাম, কিন্তু যার কাছে সেটি ছিল সে সেটিকে নষ্ট করে ফেলল। অতঃপর আমি তার কাছ থেকে সেটি কিনে নিতে চাইলাম এবং আমি ধারণা করলাম যে সে সেটি সস্তায় বিক্রি করবে। আমি এই ব্যাপারে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "তুমি সেটি কিনো না, যদি সে তোমাকে সেটি এক দিরহামের বিনিময়েও দেয়। কেননা, যে ব্যক্তি তার দান/সদকা ফিরিয়ে নেয়, সে ঐ কুকুরের মতো, যা বমি করার পর পুনরায় তা ভক্ষণ করে।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (5865)


5865 - عن أبي أمامة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من شفع لأخيه بشفاعة، فأهدي له هدية عليها، فقبلها، فقد أتى بابا عظيما من أبواب الربا".

حسن: رواه أبو داود (3541) عن أحمد بن عمرو بن السرح، حدثنا ابن وهب، عن عمر بن مالك، عن عبيد بن أبي جعفر، عن خالد بن أبي عمران، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن أبي عمران؛ فإنه حسن الحديث.

وشيخه القاسم هو ابن عبد الرحمن الدمشقي أبو عبد الرحمن، مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث أيضًا. وأما عبيد اللَّه بن أبي جعفر فهو ثقة من رواة الصحيح، فلا حجة لمن تكلم فيه.

ورواه الإمام أحمد (22251) من طريق ابن لهيعة، حدثنا عبيد اللَّه بن أبي جعفر بإسناده مثله. وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكنه توبع. وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.

ولا مخالفة بين هذا الحديث وحديث ابن عمر:"من أتى إليكم معروفا فكافئوها". وهو حديث صحيح رواه الإمام أحمد (5365)، وأبو داود (5109)، وصحّحه ابن حبان (3408)، والحاكم (1/ 412) انظر تخريجه في كتاب الزكاة.

فإن حديث الباب يدل على الترهيب من قبول الهدية من شفع لأخيه فأهدي له هدية فقبلها.

وحديث ابن عمر يدل على مكافأة من فعل معروفا غير الشفاعة، وأبواب المعروف كثيرة، فلا معارضة بين الحديثين.

وأما الهدية التي يقدمها ليكف الظلم عنه، أو ليأخذ حقه الواجب فكانت هذه الهدية حراما على الآخذ، وجاز للمقدم أن يدفعها إليه؛ ليأخذ حقه. انظر للمزيد"مجموع فتاوى ابن تيمية" (31/ 285 - 287).

وأما ما روي عن أنس بن مالك مرفوعا:"إذا أقرض أحدكم قرضا، فأهدى له، أو حمله على الدابة، فلا يركبها، ولا يقبله إلا أن يكون جرى بينه وبينه قبل ذلك". فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (2432) عن هشام بن عمار قال: حدثنا إسماعيل بن عباس قال: حدثني عتبة ابن حميد الضبي، عن يحيى بن أبي إسحاق الهنائي، قال: سألت أنس بن مالك: الرجل منا يقرض أخاه المال فيهدي له؟ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
وفي الحديث علل: منها: ضعف إسماعيل بن عياش.

ومنها: ضعف عتبة بن حميد الضبي، قال أحمد: كان من أهل البصرة، وكتب شيئًا كثيرا، وهو ضعيف، ليس بالقوي، ولم يشتبه الناس حديثه.

ومنها: جهالة يحيى بن أبي إسحاق الهنائي، ويقال: يزيد بن أبي إسحاق. ويقال: يزيد بن أبي يحيى. ويقال: يحيى بن يزيد الهنائي.

ومنها: أن رفعه خطأ، والصواب أنه موقوف. قال البخاري في التاريخ الكبير (8/ 310) في ترجمة يحيى بن يزيد أبي يزيد الهنائي قال:"قاله لنا أدم، نا شعبة سمع يحيى بن يزيد، قلت لأنس في الرجل يكون له الدين؟ قال: لا يرتدف خلف دابته. وقال: أبو معاوية، عن أبي قلابة، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهو خطأ". انتهى.

وقال البيهقي (5/ 350):"ورواه شعبة، ومحمد بن دينار فوقفاه".

ومنها الاضطراب في الإسناد. واللَّه تعالى أعلم بالصواب.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের জন্য কোনো সুপারিশ করল, অতঃপর তাকে এর বিনিময়ে কোনো হাদিয়া দেওয়া হলো, আর সে তা গ্রহণ করল, তবে সে সুদের দরজাগুলোর মধ্যে একটি বড় দরজায় প্রবেশ করল।









আল-জামি` আল-কামিল (5866)


5866 - عن جابر قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو جاء مال البحرين أعطيتك هكذا ثلاثا". فلم يقدم حتى توفي النبي صلى الله عليه وسلم، فأمر أبو بكر مناديا فنادى: من كان له عند النبي صلى الله عليه وسلم عدة أو دين فليأتنا. فأتيته، فقلت: إن النبي صلى الله عليه وسلم وعدني، فحثى لي ثلاثا".

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2598)، ومسلم في الفضائل (2314)، كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن محمد بن المنكدر يقول: سمعت جابرا يقول فذكره.

وفي رواية: ثم قال أبو بكر: عدها. فعددتها، فإذا هي خمسمائة. فقال: خذ مثليها.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছিলেন: "যদি বাহরাইনের ধন-সম্পদ আসে, তবে আমি তোমাকে এভাবে (তিনবার) দেব।" কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত পর্যন্ত তা আসেনি। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন ঘোষণাকারীকে আদেশ করলেন। সে ঘোষণা করল: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যার কোনো ওয়াদা বা ঋণ পাওনা আছে, সে যেন আমাদের কাছে আসে।" আমি তাঁর (আবূ বকর)-এর নিকট গেলাম এবং বললাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ওয়াদা করেছিলেন। অতঃপর তিনি (আবূ বকর) আমার জন্য তিন অঞ্জলি (মুঠো) দিলেন।

অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি গণনা করো। আমি তা গণনা করলাম, দেখা গেল তা পাঁচ শত (মুদ্রা/দিরহাম)। অতঃপর তিনি বললেন: এর দ্বিগুণ পরিমাণ নিয়ে নাও।









আল-জামি` আল-কামিল (5867)


5867 - عن المسور بن مخرمة قال: قسم رسول اللَّه أقبية، ولم يعط مخرمة منها شيئًا. فقال مخرمة: يا بني انطلق بنا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فانطلقت معه، فقال: ادخل، فادعه لي. قال: فدعوته له، فخرج إليه، وعليه قباء منها. فقال:"خبأنا هذا لك". قال: فنظر إليه، فقال:"رضي مخرمة".

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2599)، ومسلم في الزكاة (1058) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن أبي مليكة، عن المسور بن مخرمة فذكره.

وفي رواية عند البخاري:"وكان في خلقه شدة".




আল-মিসওয়ার ইবনু মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু জামা (পোশাক) বিতরণ করলেন, কিন্তু মাখরামাকে তিনি তা থেকে কিছুই দেননি। তখন মাখরামা বললেন, ‘হে বৎস! চলো, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাই।’ সুতরাং আমি তাঁর সঙ্গে গেলাম। তিনি (মাখরামা) বললেন, ‘তুমি ভিতরে যাও এবং তাঁকে আমার জন্য ডেকে আনো।’ আল-মিসওয়ার বলেন, আমি তাঁর জন্য তাঁকে (নবীকে) ডেকে আনলাম। তিনি তাঁর কাছে বেরিয়ে এলেন এবং তাঁর [নবীজীর] পরিধানে সেই জামাগুলোর মধ্যে থেকে একটি ছিল। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “এটি আমরা তোমার জন্য রেখে দিয়েছিলাম।” আল-মিসওয়ার বললেন, এরপর তিনি (মাখরামা) সেটির দিকে তাকালেন এবং বললেন, “মাখরামা সন্তুষ্ট হয়েছে।”

(বুখারীর অন্য এক বর্ণনায় আছে, “তাঁর চরিত্রে কঠোরতা ছিল।”)









আল-জামি` আল-কামিল (5868)


5868 - عن ابن عمر أنه كان في سفر مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وكان على بكرٍ صعبٍ لعمر. فكان يتقدم النبي صلى الله عليه وسلم، فيقول أبوه: يا عبد اللَّه، لا يتقدم النبي صلى الله عليه وسلم أحد. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"بعنيه"، فقال عمر: هو لك، فاشتراه، ثم قال لعبد اللَّه:"هو لك يا عبد اللَّه، فاصنع به ما شئت".

صحيح: أخرجه البخاري في الهبة (2610) عن عبد اللَّه بن محمد، حدثنا ابن عيينة، عن عمرو، عن ابن عمر فذكره.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলেন এবং তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি কঠিন প্রকৃতির উটের বাচ্চার (বকর) উপর আরোহণ করেছিলেন। ফলে সেটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (বাহনের) চেয়ে এগিয়ে যাচ্ছিল। তখন তার পিতা (উমর) বললেন: হে আব্দুল্লাহ, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাহনের চেয়ে যেন কেউ এগিয়ে না যায়। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "এটি আমার কাছে বিক্রি করে দাও।" তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি আপনারই জন্য। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটি কিনে নিলেন, তারপর তিনি আব্দুল্লাহকে বললেন: "হে আব্দুল্লাহ, এটি তোমার। তুমি এর সাথে যা ইচ্ছে তাই করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5869)


5869 - عن علي قال: أهدى إلي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حلة سيراء، فلبستها، فرأيت الغضب في وجهه، فشققتها بين نسائي.

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2614)، ومسلم في اللباس (2071: 19) كلاهما من حديث شعبة قال: أخبرني عبد الملك بن ميسرة قال: سمعت زيد بن وهب، عن علي فذكره.

وفي رواية قال:"إني لم أبعث بها إليك لتلبسها، إنما بعثت بها إليك لتشققها خمرا بين النساء".




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি রেশমী পোশাক (হুল্লাহ সিয়ারা) উপহার দিয়েছিলেন। আমি সেটি পরিধান করলাম। তারপর আমি তাঁর চেহারায় ক্রোধ দেখতে পেলাম। তখন আমি সেটি ছিঁড়ে আমার স্ত্রীদের মধ্যে ভাগ করে দিলাম।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'আমি এটি তোমার কাছে পরিধান করার জন্য পাঠাইনি। বরং এটি তোমার কাছে পাঠিয়েছি যেন তুমি তা ছিঁড়ে স্ত্রীদের মধ্যে ওড়না (খুমুর) হিসেবে ভাগ করে দাও।' (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (5870)


5870 - عن ابن عمر قال: رأي عمر عطاردا التميمي يقيم بالسوق حلة سيراء -وكان رجلا يغشى الملوك ويصيب منهم- فقال عمر: يا رسول اللَّه، إني رأيت عطاردا يقيم في السوق حلة سيراء، فلو اشتريتها، فلبستها لوفود العرب إذا قدموا عليك. وأظنه قال: ولبستها يوم الجمعة. فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنما يلبس الحرير في الدنيا من لا خلاق له في الآخرة". فلما كان بعد ذلك أتي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بحلل سيراء، فبعث إلى عمر بحلة، وبعث إلى أسامة بن زيد بحلة، وأعطى علي بن أبي طالب حلة، وقال:"شققها خمرا بين نسائك". قال: فجاء عمر بحلته يحملها، فقال: يا رسول اللَّه، بعثت إلي بهذه، وقد قلت بالأمس في حلة عطارد ما قلت. فقال:"إني لم أبعث بها إليك لتلبسها، ولكني بعثت بها إليك لتصيب بها". وأما أسامة فراح في حلته فنظر إليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نظرا عرف أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد أنكر ما صنع، فقال: يا رسول اللَّه، ما تنظر إليَّ؟ فأنت بعثت إلي بها. فقال:"إني لم أبعث بها إليك لتلبسها، ولكني بعثت بها إليك لتشققها خمرا بين نسائك".

صحيح: رواه مسلم في اللباس (2068: 7) عن شيبان بن فروخ، حدثنا جرير بن حازم، حدثنا نافع، عن ابن عمر فذكره.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আত্তারিদ আত-তামীমী-কে বাজারে একটি সীরা (রেশমী) পোশাক বিক্রি করতে দেখলেন—আর আত্তারিদ এমন ব্যক্তি ছিলেন যিনি বাদশাহদের কাছে যাতায়াত করতেন এবং তাদের কাছ থেকে কিছু অর্জন করতেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি আত্তারিদকে বাজারে একটি রেশমী পোশাক বিক্রি করতে দেখলাম। আপনি যদি এটি কিনে নিতেন এবং আপনার কাছে আগমনকারী আরব প্রতিনিধিদের জন্য পরিধান করতেন!" আমার ধারণা, তিনি (ইবন উমর) বলেছেন: "এবং আপনি জুমু'আর দিনেও পরিধান করতেন।"

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "দুনিয়ায় সেই ব্যক্তিই কেবল রেশম পরিধান করে, আখিরাতে যার কোনো অংশ নেই।"

এর কিছুদিন পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে কিছু সীরা (রেশমের) পোশাক আসল। তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি পোশাক পাঠালেন, উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি পোশাক পাঠালেন এবং আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি পোশাক দিলেন আর বললেন: "তুমি এটি তোমার স্ত্রীদের মধ্যে ওড়না (খুমুর) হিসেবে ভাগ করে দাও।"

ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তার পোশাকটি বহন করে নিয়ে আসলেন এবং বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি এটি আমার কাছে পাঠিয়েছেন, অথচ গতকালই আপনি আত্তারিদের পোশাক সম্পর্কে যা বলার তা বলেছিলেন!" তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে এটি পরিধান করার জন্য পাঠাইনি। বরং এটি তোমাকে পাঠালাম যেন তুমি এর দ্বারা লাভবান হতে পারো (বিক্রি করে বা অন্য কোনো কাজে লাগিয়ে)।"

আর উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার সেই পোশাকটি পরিধান করে বের হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে এমনভাবে তাকালেন যে, বোঝা গেল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার এই কাজটিকে অপছন্দ করেছেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি আমার দিকে কী দেখছেন? আপনিই তো এটি আমার কাছে পাঠিয়েছেন।" তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে এটি পরিধান করার জন্য পাঠাইনি। বরং এটি তোমাকে পাঠিয়েছি, যেন তুমি এটি তোমার স্ত্রীদের মধ্যে ওড়না (খুমুর) হিসেবে ভাগ করে দিতে পারো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5871)


5871 - عن عياض بن حمار قال: أهديت لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ناقة -أو قال: هدية-، فقال"أسلمتَ؟" قلت: لا. قال:"إني نهيت عن زبد المشركين".

حسن: رواه أبو داود (3057) والترمذي (1577) والبيهقي (9/ 216) كلهم من طريق أبي داود الطيالسي، وهو في مسنده (1179) - قال: حدثنا عمران، عن قتادة، عن يزيد بن عبد اللَّه، عن عياض بن حمار، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل عمران، وهو ابن داور القطان، فإنه حسن الحديث. وقال ابن حجر:"أخرجه أبو داود وغيره بإسناد صحيح". المطالب العالية (10/ 30).

ورواه أبو داود الطيالسي (1178) ومن طريقه البيهقي (9/ 216) قال: حدثنا حماد بن زيد، حدثنا أبو التياح، قال: حدثنا الحسن، عن عياض بن حمار، قال: أهديت إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم هدية، فذكر نحوه.

والحسن وُصِفَ بالتدليس، ولم أر له تصريحا بالسماع من عياض بن حمار، لكنه أدرك زمن عياض قرابة ثلاثين سنة، وعياض سكن البصرة، وقد توبع عليه في الإسناد الأول.

وقوله:"زيد المشركين" الزبْد -بسكون الباء- الرفد والعطاء، والعرب تسمي الهدية الزبد. انظر: (شرح المشكل 6/ 401، والنهاية).




আয়াদ ইবনে হিমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি উটনী উপহার দিলাম —অথবা তিনি (উপ-বর্ণনাকারী) বললেন: একটি হাদিয়া (উপহার) দিলাম—। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তুমি কি ইসলাম গ্রহণ করেছ?’ আমি বললাম: ‘না’। তিনি বললেন: ‘আমাকে মুশরিকদের উপঢৌকন গ্রহণ করতে নিষেধ করা হয়েছে।’









আল-জামি` আল-কামিল (5872)


5872 - عن عبيد اللَّه بن المغيرة، عن عراك بن مالك، أن حكيم بن حزام قال: كان محمد صلى الله عليه وسلم أحب رجل في الناس إليَّ في الجاهلية، فلما تنبأ وخرج إلى المدينة، شهد حكيم بن حزام الموسم وهو كافر، فوجد حلة لذي يزن تباع، فاشتراها بخمسين دينارا ليهديها لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقدم بها عليه المدينة، فأراده على قبضها هدية، فأبى. قال عبيد اللَّه: حسبت أنه قال:"إنا لا نقبل شيئًا من المشركين، ولكن إن شئت أخذناها بالثمن" فأعطيته حين أبى علي الهدية.

حسن: رواه أحمد (15323) عن عتاب بن زياد، حدثنا عبد اللَّه (يعني: ابن المبارك)، أخبرنا ليث بن سعد، حدثني عبيد اللَّه بن المغيرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبيد اللَّه بن المغيرة وهو ابن مُعيقيب حسن الحديث، وعراك بن مالك هو الغفاري، وسماعه من حكيم بن حزام ممكن، وقد ذكر ابن الأثير في ترجمة حكيم من"أسد الغابة" عراك بن مالك من الرواة عن حكيم.

وأخرجه الطبراني في الكبير (3/ 226) والحاكم (3/ 484 - 485) من طريق عبد اللَّه بن صالح،
عن الليث، به. وفيها زيادة: فلبسها، فرأيتها عليه على المنبر، فلم أر شيئًا أحسن منه يومئذ، ثم أعطاها أسامة بن زيد، فرآها حكيم على أسامة، فقال: يا أسامة، أنت تلبس حلة ذي يزن؟ فقال: نعم، واللَّه لأنا خير من ذي يزن، ولأبي خير من أبيه. قال حكيم: فانطلقت إلى أهل مكة أُعَجِّبُهم بقول أسامة.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

قلت: فيه عبد اللَّه بن صالح سيء الحفظ، وقد توبع على أصل الحديث.

وله طريق آخر ضعيف عند الطبراني في الكبير (3/ 2




হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহিলিয়্যাতের যুগে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছিলেন আমার কাছে মানুষের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তি। যখন তিনি নবুওয়াত লাভ করলেন এবং মদীনায় হিজরত করলেন, তখন হাকীম ইবনে হিযাম কুফরী অবস্থায় (অবিশ্বাসী হিসেবে) মওসুমে (বাণিজ্য মেলায়) উপস্থিত হলেন। তিনি যি-ইয়াযান নামক ব্যক্তির একটি মূল্যবান পোশাক (হুল্লাহ) বিক্রি হতে দেখলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উপহার দেওয়ার জন্য তিনি সেটি পঞ্চাশ দীনারের বিনিময়ে ক্রয় করলেন। এরপর তিনি তা নিয়ে মদীনায় তাঁর নিকট উপস্থিত হলেন এবং তাঁকে উপহার হিসেবে তা গ্রহণ করার অনুরোধ করলেন, কিন্তু তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যাখ্যান করলেন। (বর্ণনাকারী) উবাইদুল্লাহ বলেন: আমার ধারণা, তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "আমরা মুশরিকদের কাছ থেকে কোনো কিছু গ্রহণ করি না। তবে, যদি তুমি চাও, আমরা তা মূল্যের বিনিময়ে নিয়ে নিতে পারি।" যখন তিনি আমার উপহার প্রত্যাখ্যান করলেন, তখন আমি তা মূল্যের বিনিময়ে তাঁকে দিয়ে দিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5873)


5873 - عن أنس بن مالك قال: أُهدي لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جبة سندس، وكان ينهى عن الحرير، فعجب الناس منها، فقال:"والذي نفس محمد بيده إن مناديل سعد بن معاذ في الجنّة أحسن من هذا".

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2615)، ومسلم في فضائل الصحابة (2469) كلاهما من حديث يونس بن محمد، حدثنا شيبان، عن قتادة، حدثنا أنس بن مالك فذكره.

وقال مسلم: حدثناه محمد بن بشار، حدثنا سالم بن نوح، حدثنا عمر بن عامر، عن قتادة، عن أنس أن أكيدر دومة الجندل أهدى لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حلة فذكر نحوه. ولم يذكر فيه:"وكان ينهى عن الحرير". وذكره البخاري معلقا عن سعيد، عن قتادة.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রেশমের (সুনদুস) তৈরি একটি জুব্বা উপহার দেওয়া হয়েছিল। অথচ তিনি (পুরুষদের জন্য) রেশম ব্যবহার করতে নিষেধ করতেন। ফলে লোকেরা সেটি দেখে বিস্মিত হলো। তখন তিনি বললেন: "যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তাঁর শপথ! নিশ্চয়ই জান্নাতে সা'দ ইবনু মু'আযের রুমালগুলো এর (এই জুব্বার) চেয়েও উত্তম হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5874)


5874 - عن أنس أن يهودية أتت النبي صلى الله عليه وسلم بشاة مسمومة، فأكل منها، فجيء بها، فقيل: ألا نقتلها؟ قال"لا". فما زلت أعرفها في لهوات رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2617)، ومسلم في السلام (2190) كلاهما من حديث خالد بن الحارث، حدثنا شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس فذكره.

وقوله:"لهوات" جمع لهاة، وهي سقف الفم، أو اللحمة المشرفة على الحلق. وقيل: هي أقصى الحلق. وقيل: ما يبدو من الفم عند التبسم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ইহুদি মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বিষ মিশ্রিত বকরির গোশত নিয়ে এলো। তিনি তা থেকে কিছুটা খেলেন। এরপর তাকে (মহিলাটিকে) আনা হলো এবং (সাহাবীরা) জিজ্ঞাসা করলেন: আমরা কি তাকে হত্যা করব না? তিনি বললেন: "না।" এরপরও আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর গলার ভেতরে (বা তালুতে) সেই (বিষের) প্রভাব সবসময় দেখতে পেতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5875)


5875 - عن أبي حميد الساعدي، قال: أهدى ملك أيلة للنبي صلى الله عليه وسلم بغلة بيضاء، وكساه بردا، وكتب له ببحرهم.

متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1481)، ومسلم في الفضائل (1392/ 11) كلاهما من حديث عمرو بن يحيى، عن عباس بن سهل بن سعد الساعدي، عن أبي حميد الساعدي، فذكره في حديث طويل، واللفظ للبخاري.




আবূ হুমাইদ আস-সা‘ঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আইলার রাজা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি সাদা খচ্চর হাদিয়া দিলেন, আর তাঁকে একটি চাদর (বুরদ) পরিধান করালেন এবং তাদের জলপথ (বা উপকূলীয় এলাকা) সম্পর্কে তাঁকে লিখে পাঠালেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5876)


5876 - عن بريدة بن الحصيب قال: أهدى أمير القبط لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جاريتين أختين
قبطيتين، وبغلة، فأما البغلة فكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يركبها، وأما إحدى الجاريتين فتسراها، فولدت له إبراهيم، وأما الأخرى فأعطاها حسان بن ثابت الأنصاري.

حسن: رواه الحارث بن أبي أسامة في مسنده (452 - بغية الباحث)، والطحاوي في شرح المشكل (2569)، والطبراني في الأوسط (2059/ مجمع البحرين) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن بشير بن المهاجر، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن أبيه، فذكره. والسياق للطحاوي.

وإسناده حسن من أجل بشير بن المهاجر؛ فإنه حسن الحديث إذا لم يأت بما ينكر عليه.

وقال البوصيري في الإتحاف (3/ 43):"هذا إسناد صحيح".

ورواه البزار (4423) عن محمد بن زياد، عن ابن عيينة، عن بشير بن المهاجر، به نحوه.

وقال:"ومحمد بن زياد وهم في هذا الحديث، فرواه عن ابن عيينة، وابن عيينة ليس عنده عن بشير بن المهاجر، ولكن روى هذا الحديث عن بشير بن المهاجر حاتم بن إسماعيل ودلهم بن دهثم". أهـ.




বুরায়দা ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ক্বিবতীদের শাসক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দুই ক্বিবতী দাসী, যারা ছিল আপন বোন, এবং একটি খচ্চর উপহার দিলেন। খচ্চরটির ওপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহণ করতেন। আর দুই দাসীর মধ্যে একজনকে তিনি নিজের জন্য গ্রহণ করলেন (স্ত্রী হিসেবে), এবং সে তাঁর জন্য ইবরাহীমকে জন্ম দেন। আর অন্য দাসীটিকে তিনি হাসসান ইবনু ছাবিত আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5877)


5877 - عن عبد الرحمن بن عبد القاري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعث حاطب بن أبي بلتعة إلى المقوقس صاحب الإسكندرية، يعني بكتابه معه إليه، فقَبَّلَ كتابَه، وأكرم حاطبا، وأحسن نزله، ثم سرحه إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأهدى له مع حاطب كسوة وبغلة شهباء بسرجها وجاريتين، إحداهما إم إبراهيم، وأما الأخرى فوهبها لجهم بن قيس العبدري، وهي أم زكريا بن جهم الذي كان خليفة عمرو بن العاص على مصر.

صحيح: رواه الطحاوي في شرح المشكل (2570)، (4349) عن يونس بن عبد الأعلى، حدثنا عبد اللَّه بن وهب، أخبرني يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، قال: حدثني عبد الرحمن بن عبد القاري، فذكره.

وإسناده صحيح إلى عبد الرحمن بن عبد القاري، وهو مختلف في صحبته، وقد ذكر ابن حجر في الإصابة أنه أتي به إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهو صغير فمسح على رأسه.

وقال الطحاوي عقب الحديث:"وإنما أدخلنا هذا الحديث في هذا الباب؛ لأن عبد الرحمن ابن عبد القاري ممن ولد في زمن النبي صلى الله عليه وسلم، ويقال: إنه قد رآه، فدخل بذلك في صحابته صلى الله عليه وسلم" أهـ.

ومثله إذا نقل مثل هذه القصة فينقلها -غالبا- عن الصحابي.

وقوله:"وأما الأخرى فوهبها لجهم بن قيس العبدري" فهو مخالف لما جاء في حديث بريدة:"وأما الأخرى فأعطاها حسان بن ثابت" وما في حديث بريدة أصح، ولعل ما يخالفه وقع فيه وهم من بعض الرواة، وعلى كل اتفقت الروايات على أن النبي صلى الله عليه وسلم أرسل حاطب بن أبي بلتعة إلى المقوقس صاحب الإسكندرية، فأكرم رسوله، وأرسل معه هدايا إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقبلها، وإن وقع
اختلاف يسير في تفصيل القصة.

وأما ما روي عن علي قال: أهدى كسرى لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقبل منه، وأهدى له قيصر فقبل منه، وأهدت له الملوك فقبل منها. فإسناده ضعيف.

رواه الترمذي (1576)، وأحمد (747) من طريق إسرائيل، عن ثوير بن أبي فاختة، عن أبيه، عن علي، فذكره. والسياق لأحمد.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب".

قلت: إسناده ضعيف لضعف ثوير بن أبي فاختة.

وفي معناه ما روي عن أنس بن مالك، أن ملك ذي يزن أهدى إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حلة أخذها بثلاثة وثلاثين بعيرا، أو ثلاث وثلاثين ناقة، فقبلها. رواه أبو داود (4034)، وأحمد (13315)، والحاكم (4/ 187) من طرق عن عمارة بن زاذان، عن ثابت، عن أنس، فذكره. والسياق لأبي داود.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد"، ووافقه الذهبي.

قلت: إسناده ضعيف، فقد تفرد به عمارة بن زاذان، عن ثابت، عن أنس، وعمارة يروي عن ثابت، عن أنس أحاديث مناكير، كما قال الإمام أحمد.




আব্দুল রহমান ইবনে আব্দুল কারী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাতেব ইবনে আবী বালতা'আকে আলেকজান্দ্রিয়ার শাসক মুকাউকিস-এর নিকট প্রেরণ করলেন—অর্থাৎ তাঁর সাথে তাঁর (নবীর) পত্র দিয়ে। সে (মুকাউকিস) তাঁর পত্র গ্রহণ করল, হাতেবকে সম্মান দেখাল এবং ভালোভাবে আতিথেয়তা করল। অতঃপর তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ফেরত পাঠাল। আর হাতেবের সাথে তিনি (মুকাউকিস) তাঁর জন্য কিছু পোশাক, তার জিন সহ ধূসর বর্ণের একটি খচ্চর এবং দুইজন দাসী উপহার পাঠালেন। তাদের একজনের নাম ছিল উম্মু ইবরাহীম (মারিয়া কিবতিয়্যা)। আর অন্য দাসীটিকে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাহম ইবনে কায়স আল-আবদারী-কে দান করে দেন। সেই দাসী ছিলেন জাহমের পুত্র যাকারিয়ার মা, যিনি মিশরে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খলীফা (প্রতিনিধি) ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5878)


5878 - عن ابن عمر أن عمر بن الخطاب رأى حلة سيراء عند باب المسجد، فقال: يا رسول اللَّه، لو اشتريت هذه، فلبستها يوم الجمعة، وللوفد إذا قدموا عليك. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنما يلبس هذه من لا خلاق له في الآخرة". ثم جاءت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منها حلل، فأعطى عمر بن الخطاب منها حلة، فقال عمر: يا رسول اللَّه، كسوتنيها. وقد قلت في حلة عطارد ما قلت. قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني لم أكسكها لتلبسها". فكساها عمر بن الخطاب أخا له بمكة مشركا.

متفق عليه: رواه مالك عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.

ومن طريقه رواه البخاري في الجمعة (886)، ومسلم في اللباس (2068).




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের দরজার কাছে একটি রেশমী পোশাক দেখতে পেলেন। অতঃপর তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি যদি এটি কিনে নিতেন এবং তা জুম্মার দিনে পরিধান করতেন, আর যখন প্রতিনিধিদল আপনার কাছে আসত (তখনও পরিধান করতেন)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই এটি (ঐ ব্যক্তিই) পরিধান করে, যার জন্য আখিরাতে কোনো অংশ নেই।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এ ধরনের কিছু পোশাক আসল। অতঃপর তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এর মধ্যে থেকে একটি পোশাক দিলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তো আমাকে এটি পরিধান করালেন। অথচ আপনি তো (এর আগে অন্য) রেশমী পোশাকের ক্ষেত্রে যা বলার তা বলেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে এটি এজন্য পরিধান করাইনি যে তুমি তা পরিধান করবে।" অতঃপর উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কায় অবস্থানকারী তাঁর একজন মুশরিক ভাইকে তা পরিধান করিয়ে দিলেন (বা উপহার দিলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (5879)


5879 - عن أسماء بنت أبي بكر قالت: قدمت علي أمي، وهي مشركة في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: فاستفتيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قلت: وهي راغبة، أفأصل أمي؟ قال:"نعم صِلي أمك".
متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2620)، ومسلم في الزكاة (1003) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن أسماء بنت أبي بكر فذكرته.




আসমা বিনতে আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমার মা আমার কাছে এলেন, অথচ তিনি ছিলেন মুশরিক। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফতোয়া চাইলাম এবং বললাম: তিনি (সহায়তা পেতে) আগ্রহী। আমি কি আমার মায়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখব (তাকে সহযোগিতা করব)? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তুমি তোমার মায়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখ।"









আল-জামি` আল-কামিল (5880)


5880 - عن أيمن الحبشي المكي قال: دخلت على عائشة وعليها درع قطر، ثمن خمسة دراهم. فقالت: ارفع بصرك إلى جاريتي، انظر إليها فإنها تزهي أن تلبسه في البيت، وقد كان لي منهن درع على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فما كانت امرأة تُقيَّنُ بالمدينة إلا أرسلت إلي تستعيره.

صحيح: رواه البخاري في الهبة (2628) عن أبي نعيم، حدثنا عبد الواحد بن أيمن، حدثني أبي قال: دخلت على عائشة فذكره.

"والبناء": هو الزفاف، وقيل له:"بناء"؛ لأنهم يبنون لمن يتزوج قبة يخلو بها مع المرأة. وقوله:"تزهى": إذا دخله الكبر.

وقوله:"تقين" أي تزين، من قان الشيء إذا أصلحه. وفيه أن عارية الثياب للعروس أمر معمول به، مرغب فيه، وأنه لا يعد من الشنع.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আইমান আল-হাবাশী আল-মাক্কী] বলেন: আমি তাঁর কাছে গেলাম। তখন তাঁর পরনে ছিল পাঁচ দিরহাম মূল্যের কাত্তানের (বা মোটা সুতোর) একটি জামা। তিনি বললেন: তোমার দৃষ্টি আমার দাসীর দিকে তোলো, তাকে দেখো। সেও এই ধরনের জামা ঘরে পরতে অহংকার বোধ করে। অথচ রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমার কাছেও এমন একটি জামা ছিল। মদিনার কোনো নারীকে বিয়ের জন্য সাজানো হলে সে তা ধার চাওয়ার জন্য অবশ্যই আমার কাছে লোক পাঠাতো।