হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5901)


5901 - عن البراء قال: أخر سورة نزلت: (براءة). وآخر آية نزلت: {يَسْتَفْتُونَكَ}.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4605)، ومسلم في الفرائض (1618) كلاهما من حديث شعبة، عن أبي إسحاق، سمعت البراء فذكره.




বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সর্বশেষ যে সূরাটি নাযিল হয়েছিল তা হলো (সূরা) বারাআহ। আর সর্বশেষ যে আয়াতটি নাযিল হয়েছিল তা হলো: {يَسْتَفْتُونَكَ}।









আল-জামি` আল-কামিল (5902)


5902 - عن البراء بن عازب قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول اللَّه، يستفتونك في الكلالة فما الكلالة قال:"تجزيك آية الصيف".

حسن: رواه أبو داود (2889)، والترمذي (3042)، وأحمد (18589) كلهم من حديث أبي
بكر بن عياش، عن أبي إسحاق، عن البراء فذكره.

وأبو بكر بن عياش مختلف في سماعه من أبي إسحاق السبيعي.

ولكن تابعه حجاج بن أرطأة، عن أبي إسحاق. ومن طريقه رواه أحمد (18607)، وأبو يعلى (1656)، والطحاوي في مشكله (5226).

وحجاج بن أرطاة فيه كلام معروف، ولكن متابعته لأبي بكر يقويه.

وزاد أبو داود: فقلت لأبي إسحاق: هو من مات ولم يدع ولدا ولا والدا، قال: كذلك ظنوا أنه كذلك. وهذا يؤكد سماعه من أبي إسحاق.




বারাআ ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রসূল! লোকেরা আপনার কাছে কালালাহ্ (পিতামাতা ও সন্তানহীন মৃত ব্যক্তি) সম্পর্কে মাসআলা জিজ্ঞেস করে। কালালাহ্ কী? তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: গ্রীষ্মকালীন (সূরা নিসার শেষ) আয়াতটিই তোমার জন্য যথেষ্ট।









আল-জামি` আল-কামিল (5903)


5903 - عن جابر قال: اشتكيت وعندي سبع أخوات، فدخل علي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنفخ في وجهي، فأفقت، فقلت: يا رسول اللَّه، ألا أوصي لأخواتي بالثلث؟ قال:"أحسن". قلت: الشطر؟ قال:"أحسن". ثم خرج، وتركني. فقال:"يا جابر، لا أُراك ميتا من وجعك هذا، وإن اللَّه قد أنزل، فبين لأخواتك، فجعل لهن الثلثين". قال: فكان جابر يقول: أنزلت هذه الآية في: {يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ إِنِ امْرُؤٌ هَلَكَ لَيْسَ لَهُ وَلَدٌ وَلَهُ أُخْتٌ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ وَهُوَ يَرِثُهَا إِنْ لَمْ يَكُنْ لَهَا وَلَدٌ فَإِنْ كَانَتَا اثْنَتَيْنِ فَلَهُمَا الثُّلُثَانِ مِمَّا تَرَكَ وَإِنْ كَانُوا إِخْوَةً رِجَالًا وَنِسَاءً فَلِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ أَنْ تَضِلُّوا وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ} [سورة النساء: 176].

صحيح: رواه أبو داود (2787) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا كثير بن هشام، حدثنا هشام -يعنى الدستوائي-، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وإسناده صحيح. واختلف الصحابة في الكلالة من هو؟

فقال أكثر الصحابة: من لا ولد، ولا والد.

وروي عن عمر بن الخطاب مثله، كما روي عنه قوله: الكلالة من لا ولد له. ويقال: إن هذا آخر قوليه.

فقد روى عبد الرزاق (19287) عن ابن جريج قال: أخبرني ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس أن عمر بن الخطاب أوصى عند موته، فقال: الكلالة كما قلت. قال ابن عباس: وما قلت؟ قال: من لا ولد له. انتهى.

وهذا الذي تدل عليه الآية في قوله تعالى: {يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ إِنِ امْرُؤٌ هَلَكَ لَيْسَ لَهُ وَلَدٌ وَلَهُ أُخْتٌ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ وَهُوَ يَرِثُهَا إِنْ لَمْ يَكُنْ لَهَا وَلَدٌ فَإِنْ كَانَتَا اثْنَتَيْنِ فَلَهُمَا الثُّلُثَانِ مِمَّا تَرَكَ وَإِنْ كَانُوا إِخْوَةً رِجَالًا وَنِسَاءً فَلِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ أَنْ تَضِلُّوا وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ} [سورة النساء: 176].

وأما الذين ذهبوا إلى أن الكلالة هو من لا ولد له ولا والد فمستدلهم حديث البراء قال: سألت
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، أو سئل عن الكلالة، فقال:"ما خلا الولد والوالد".

رواه أحمد بن عمرو بن أبي عاصم النبيل بإسناد رواته ثقات، كما قاله الضياء المقدسي في السنن والأحكام (5/ 33).

وكان من مستدلهم أيضًا نزول الآية الكريمة في جابر بن عبد اللَّه الذي يوم نزول الآية لا ولد له ولا والد، لأن والده قتل يوم أحد، ونزلت الآية بعده.

فكان ذلك من باب زيادة السنة على الكتاب.

وأما ما روي عن أبي هريرة أن رجلا قال: يا رسول اللَّه، ما الكلالة؟ قال:"أما سمعت الآية التي نزلت في الصيف: {يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ} [سورة النساء: 176]. والكلالة من لم يترك ولدا، ولا والدا". فهو ضعيف.

رواه الحاكم (4/ 336) عن أبي النضر الفقيه، ثنا أحمد بن نجدة، ثنا يحيى بن عبد الحميد، ثنا يحيى ابن آدم، ثنا عمار بن زريق، عن أبي إسحاق، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم".

وتعقبه الذهبي فقال:"الحماني ضعيف".

قلت: وهو كما قال؛ فإن الحماني هذا كان يكذب، كما قال الإمام أحمد. وضَعَّفَه النسائي وغيره، إلا أن يحيى بن معين كان حسن الرأي فيه، فقال:"ثقة". وقد سئل عنه، وقيل له: يقولون فيه. فقال:"يحسدونه هو واللَّه الذي لا إله إلَّا هو ثقة".

وقال ابن عدي:"ولم أر في مسنده أحاديث مناكير، وأرجو أنه لا بأس به".

إلا أن أكثر أهل العلم ذهبوا إلى تضعيفه، وهو الصواب.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অসুস্থ ছিলাম এবং আমার সাতজন বোন ছিল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন এবং আমার মুখের উপর ফুঁ দিলেন। ফলে আমি সুস্থ হয়ে উঠলাম। আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি আমার বোনদের জন্য এক-তৃতীয়াংশ (সম্পদ) ওসিয়ত করে যাব না?" তিনি বললেন, "ভালো।" আমি বললাম, "অর্ধেক (সম্পদ)?" তিনি বললেন, "ভালো।" অতঃপর তিনি (সেখান থেকে) চলে গেলেন এবং আমাকে রেখে গেলেন। এরপর তিনি বললেন, "হে জাবির! আমি মনে করি না যে তুমি এই অসুস্থতার কারণে মারা যাবে। আর আল্লাহ তাআলা (এ বিষয়ে আয়াত) নাযিল করেছেন এবং তোমার বোনদের জন্য তা স্পষ্টভাবে জানিয়ে দিয়েছেন। আল্লাহ তাদের জন্য দুই-তৃতীয়াংশ নির্ধারণ করেছেন।" জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আমার ব্যাপারেই এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল: "তারা আপনার কাছে ফতোয়া জানতে চায়, বলুন: আল্লাহ তোমাদেরকে 'কালালাহ' (পিতামাতা ও সন্তানহীন) সম্পর্কে ফতোয়া দিচ্ছেন: যদি কোনো পুরুষ মারা যায়, যার কোনো সন্তান নেই, কিন্তু তার এক বোন আছে, তবে সে যা রেখে গেল তার অর্ধেক পাবে; আর যদি তার কোনো সন্তান না থাকে, তবে সে (পুরুষ) তার (বোনের) উত্তরাধিকারী হবে। যদি দু'জন বোন থাকে, তবে তারা উভয়ে যা রেখে গেল তার দুই-তৃতীয়াংশ পাবে। আর যদি ভাই ও বোন উভয়ই থাকে, তবে পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান (উত্তরাধিকার)। আল্লাহ তোমাদের জন্য স্পষ্টভাবে বর্ণনা করছেন, যাতে তোমরা পথভ্রষ্ট না হও। আল্লাহ সবকিছু সম্পর্কে সম্যক অবগত।" [সূরা নিসা: ১৭৬]।









আল-জামি` আল-কামিল (5904)


5904 - عن عبد اللَّه بن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألحقوا الفرائض بأهلها، فما بقي فهو لأولى رجل ذكر".

متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6732)، ومسلم في الفرائض (1615) كلاهما من حديث وهيب، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عباس فذكره.

قوله:"ألحقوا الفرائض بأهلها" أي أعطوا ذوي السهام سهامهم.

وقوله:"لأولى رجل" أي لأقرب رجل. أراد قرب النسب.

واعلم أن أسباب الميراث ثلاثة: نسب، ونكاح، وولاء، فالمراد بالنسب أن القرابة يرث بعضهم بعضا، وبالنكاح أن أحد الزوجين يرث الآخر، وبالولاء أن المعتق وعصباته يرثون من المعتق.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা ফরয অংশগুলো সেগুলোর হকদারদের কাছে পৌঁছে দাও। অতঃপর যা অবশিষ্ট থাকবে, তা নিকটতম পুরুষ ওয়ারিসের জন্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (5905)


5905 - عن عبد اللَّه بن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أقسموا المال بين أهل
الفرائض على كتاب اللَّه، فما تركت الفرائضُ فلأَولى رجلٍ ذكر".

صحيح: رواه مسلم في الفرائض (1615: 4) من طرق عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর কিতাব (কুরআন) অনুসারে ফারায়েজ (নির্ধারিত অংশীদার) প্রাপ্তদের মধ্যে সম্পদ ভাগ করে দাও। এরপর ফারায়েজ (নির্ধারিত অংশীদার) দেওয়ার পর যা অবশিষ্ট থাকবে, তা নিকটতম পুরুষ আত্মীয় পাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5906)


5906 - عن أبي هريرة أنه قال: قضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في جنين امرأة من بني لحيان سقط ميتا بغرة: عبد أو أمة، ثم إن المرأة التي قضى عليها بالغرة توفيت، فقضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بأن ميراثها لبنيها وزوجها، وأن العقل على عصبتها.

متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6740)، ومسلم في القسامة (1681: 35) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن شهاب، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه مالك مختصرا موصولا ومرسلا.

أما الموصول فرواه عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة في كتاب العقول (12) ومن طريقه رواه البخاري في الطب (5759)، ومسلم في القسامة (1681).

وأما المرسل فرواه عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب أن النبي صلى الله عليه وسلم قضى في الجنين فذكره.

وروي أيضًا عن عبادة بن الصامت أن النبي صلى الله عليه وسلم قضى لحمل بن مالك الهذلي اللِّحياني بميراثه من امرأته التي قتلتها امرأته الأخرى. وإسناده ضعيف.

رواه ابن ماجه (2643)، وفيه إسحاق بن يحيى بن الوليد (وهو ابن عبادة بن الصامت)، أرسل عن عبادة، وهو مجهول الحال، كما في"التقريب".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু লাহ্ইয়ান গোত্রের এক মহিলার মৃত পতিত ভ্রূণের ব্যাপারে ‘গুররা’ (দিয়াত) হিসেবে একটি দাস বা দাসী দেওয়ার ফায়সালা করলেন। এরপর যে মহিলার উপর এই ‘গুররা’ (দিয়াত) দেওয়ার ফায়সালা হয়েছিল, সে মারা গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করলেন যে, তার পরিত্যক্ত সম্পত্তি তার সন্তান ও স্বামীর জন্য এবং দিয়াতের (ক্ষতিপূরণের) ভার তার আসাবাহ (পিতৃকুলীয় নিকটাত্মীয়) এর উপর বর্তাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5907)


5907 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يؤتى بالرجل الميت عليه الدين، فيسأل:"هل ترك لدينه من قضاء؟". فإن حدث أنه ترك وفاء صلي عليه، وإلا قال:"صلوا على صاحبكم. فلما فتح اللَّه عليه الفتوح قال:"أنا أولى بالمؤمنين من أنفسهم، فمن توفي وعليه دين فعلي قضاؤه، ومن ترك مالا فهو لورثته".

متفق عليه: رواه البخاري في الكفالة (2298)، ومسلم في الفرائض (1619) كلاهما من حديث الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এমন মৃত ব্যক্তিকে আনা হতো যার উপর ঋণ থাকতো। তখন তিনি জিজ্ঞাসা করতেন: “সে কি তার ঋণ পরিশোধের জন্য (পর্যাপ্ত সম্পদ) রেখে গেছে?” যদি বলা হতো যে, সে ঋণ পরিশোধের জন্য সম্পদ রেখে গেছে, তবে তিনি তার (জানাযার) সালাত আদায় করতেন। অন্যথায় তিনি বলতেন: “তোমরা তোমাদের সাথীর সালাত আদায় করো।” অতঃপর যখন আল্লাহ তাঁর (রাসূলের) জন্য বহু বিজয় দান করলেন, তখন তিনি বললেন: “আমি মু’মিনদের নিকট তাদের নিজেদের চেয়েও বেশি হকদার (বা অভিভাবক)। সুতরাং যে ব্যক্তি মারা যাবে এবং তার উপর ঋণ থাকবে, তা পরিশোধ করার দায়িত্ব আমার। আর যে ব্যক্তি সম্পদ রেখে যাবে, তা তার উত্তরাধিকারীদের জন্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (5908)


5908 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من ترك مالا فلورثته، ومن ترك كلا فإلينا". وفي رواية:"ومن ترك كلا وليتُه".

متفق عليه: رواه البخاري في الاستقراض (2398)، ومسلم في الفرائض (1619: 17)
كلاهما من شعبة، عن عدي، أنه سمع أبا حازم، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি সম্পদ (মাল) রেখে যায়, তা তার উত্তরাধিকারীদের জন্য। আর যে ব্যক্তি ঋণ বা দুর্বল পরিবার নামক দায়-ভার রেখে যায়, তা আমাদের (বায়তুল মালের/রাষ্ট্রের) ওপর।’
অন্য বর্ণনায় আছে: ‘যে ব্যক্তি দায়-ভার রেখে যায়, আমি তার অভিভাবক।’









আল-জামি` আল-কামিল (5909)


5909 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من مؤمن إلا وأنا أولى به في الدنيا والآخرة، اقرؤوا إن شئتم: {النَّبِيُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ} [سورة الأحزاب: 6] فأيما مؤمن مات وترك مالا فلْيرثه عصبتُه من كانوا، ومن ترك دينا أو ضياعا فليأتني فأنا مولاه".

صحيح: رواه البخاري في الاستقراض (2399) عن عبد اللَّه بن محمد، حدثنا أبو عامر، حدثنا فُليح، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.

قوله:"فلْيرثه عصبته" أي الورثة، لا من يرث بالتعصيب، لأن العاصب في الاصطلاح: من له سهم مقدر من المجمع على توريثهم، ويرث كل المال إذا انفرد، ويرث ما فضل بعد الفروض بالتعصيب.

والمراد بالعصبة قرابة الرجل، وهم من يلتقي مع الميت في أب ولو علا، سموا بذلك؛ لأنهم يحيطون به، يقال: عصب الرجل بفلان، أحاط به. انظر"الفتح" (12/ 10).




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো মুমিন নেই, যার জন্য আমি দুনিয়া ও আখিরাতে তার নিজের চেয়েও বেশি অধিকার রাখি না। তোমরা চাইলে এই আয়াতটি পড়তে পারো: {নবী মুমিনদের কাছে তাদের নিজেদের অপেক্ষা অধিক প্রিয় (বা অগ্রাধিকারী)} [সূরা আল-আহযাব: ৬]। সুতরাং যে মুমিনই মারা যায় এবং ধন-সম্পদ রেখে যায়, তার নিকটাত্মীয়রা (আস্বা) যারা রয়েছে, তারা যেন তা উত্তরাধিকার সূত্রে পায়। আর যে ব্যক্তি ঋণ অথবা দুর্বল পরিবার (দায়িত্বহীন) রেখে যায়, সে যেন আমার কাছে আসে, কেননা আমিই তার অভিভাবক।









আল-জামি` আল-কামিল (5910)


5910 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أولى بالمؤمنين من أنفسهم، فمن مات وترك مالا فماله لموالي العصبة، ومن ترك كلا أو ضياعا فأنا وليه فلأُدعى له".

صحيح: رواه البخاري في الفرائض (6745) عن محمود، أخبرنا عبيد اللَّه، عن إسرائيل، عن أبي حصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

وقوله:"ضياعا" أي ضائعا، ليس له شيء، فأنا أعوله، وأنفق عليه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি মুমিনদের জন্য তাদের নিজেদের চেয়েও বেশি আপন। সুতরাং যে ব্যক্তি মারা গেল এবং সম্পদ রেখে গেল, তার সম্পদ তার ‘আসবাহ’ (পুরুষ আত্মীয়) ওয়ারিসগণ পাবে। আর যে ব্যক্তি কোনো দুর্বল বা নিঃস্ব (নির্ভরশীল) রেখে গেল, আমিই তার অভিভাবক; অতএব, তার (দায়িত্বের) জন্য যেন আমাকেই ডাকা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5911)


5911 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: والذي نفس محمد بيده، إن على الأرض من مؤمن إلا أنا أولى الناس به، فأيكم ما ترك دينا، أو ضياعا فأنا مولاه، وأيكم ترك مالا فإلى العصبة من كان".

صحيح: رواه مسلم في الفرائض (1619: 15) عن محمد بن رافع، حدثنا شبابة قال: حدثني ورقاء، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

وقوله:"إن على الأرض من مؤمن" أي ما على الأرض مؤمن، فـ (إن) نافية، و (من) زائدة لتوكيد العموم.

وقوله:"فأيكم ما ترك دينا، أو ضياعا" (ما) هذه الزائدة، والضياع وكذا الضيعة أي أولادا أو عيالا ذوي ضياع، يعني لا شيء لهم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! যমিনের উপর এমন কোনো মুমিন নেই যার কাছে আমি অন্য সকলের চেয়ে বেশি অধিকার রাখি। অতএব, তোমাদের মধ্যে কেউ যদি ঋণ অথবা অসহায় উত্তরাধিকারী রেখে যায়, তবে আমিই তাদের অভিভাবক। আর তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সম্পদ রেখে যাবে, তা তার আসাবার (নিকটাত্মীয় পুরুষ স্বজনদের) জন্য।









আল-জামি` আল-কামিল (5912)


5912 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أولى الناس بالمؤمنين في كتاب اللَّه عز وجل، فأيكم ما ترك دينا أو ضيعة فادعوني، فأنا وليُّه، وأيكم ما ترك مالا فليؤثر بماله عصبته من كان".
صحيح: رواه مسلم في الفرائض (1619: 16) عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن همام بن منبه قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر أحاديث، منها هذا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জালের কিতাব অনুযায়ী মু’মিনদের ব্যাপারে আমিই তাদের তুলনায় অধিক হকদার। সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে কেউ ঋণ অথবা অসহায় পরিজন (যারা সম্পদের অভাবে কষ্টে আছে) রেখে যায়, সে যেন আমাকে ডাকে। কারণ আমিই তার অভিভাবক (ওয়ালী)। আর তোমাদের মধ্যে যে কেউ সম্পদ রেখে যায়, তবে তার সম্পদ যেন তার নিকটাত্মীয়রা (আসাবা) ভোগ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5913)


5913 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أولى بكل مؤمن من نفسه، من ترك مالا فلأهله، ومن ترك دينا أو ضياعا فإلَيَّ وعلَيَّ".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (867/ 43) عن محمد بن المثنى، حدثنا عبد الوهاب بن عبد المجيد، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره في آخر حديث طويل.

أحاديث الباب تدل على أنه يجوز للحاكم أن يتحمل الحقوق الخاصة من المدينين، ويؤديها من خزانة الدولة إن استطاع إلى ذلك سبيلا، ويُعفي عنهم الحقوق العامة، وهي حقوق الدولة وكل ذلك جائز للحاكم حسب المصلحة التي يراها.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি প্রত্যেক মুমিনের নিকট তার নিজের প্রাণের চেয়েও বেশি অগ্রাধিকারপ্রাপ্ত। যে ব্যক্তি সম্পদ রেখে যায়, তা তার পরিবারের জন্য। আর যে ব্যক্তি ঋণ অথবা অসহায় (নির্ভরশীল) পরিবার/সন্তান রেখে যায়, তবে তার ভার (বা দায়িত্ব) আমার উপর।”









আল-জামি` আল-কামিল (5914)


5914 - عن عائشة أن فاطمة عليها السلام بنت النبي صلى الله عليه وسلم أرسلت إلى أبي بكر تسأله ميراثها من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مما أفاء اللَّه عليه بالمدينة وفَدَك وما بقي من خمس خيبر، فقال أبو بكر: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا نورث ما تركنا صدقة، إنما يأكل آل محمد صلى الله عليه وسلم في هذا المال". وإني واللَّه لا أغير شيئًا من صدقة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن حالها التي كانت عليها في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ولأعملنَّ فيها بما عمل به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأبى أبو بكر أن يدفع إلى فاطمة منها شيئًا، فوجدت فاطمة على أبي بكر في ذلك، فهجرته، فلم تكلمه حتى توفيت، وعاشت بعد النبي صلى الله عليه وسلم ستة أشهر، فلما توفيت دفنها زوجها علي ليلا، ولم يؤذن بها أبا بكر، وصلى عليها، وكان لعلي من الناس وجهٌ حياة فاطمة، فلما توفيت استنكر عليٌ وجوهَ الناس، فالتمس مصالحة أبي بكر ومبايعته، ولم يكن يبايع تلك الأشهر، فأرسل إلى أبي بكر أن ائتنا، ولا يأتنا أحد معك كراهية لمحضر عمر، فقال عمر: لا واللَّه لا تدخل عليهم وحدك، فقال أبو بكر: وما عسيتُهم أن يفعلوا بي، واللَّه لآتينهم. فدخل عليهم أبو بكر، فتشهد علي، فقال: إنا قد عرفنا فضلك وما أعطاك اللَّه، ولم نفس عليك خيرا ساقه اللَّه إليك، ولكنك استبددت علينا بالأمر، وكنا نرى لقرابتنا من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نصيبًا، حتى فاضت عينا أبي بكر، فلما تكلم أبو بكر قال: والذي نفسي بيده، لقرابة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أحب إلي أن أصل من قرابتي، وأما الذي شجر بيني وبينكم من هذه الأموال فلم آل فيها عن الخير، ولم أترك أمرا رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يصنعه
فيها إلا صنعته. فقال علي لأبي بكر: موعدك العشية للبيعة. فلما صلى أبو بكر الظهر رقي على المنبر، فتشهد، وذكر شأن علي، وتخلفه عن البيعة، وعذره بالذي اعتذر إليه، ثم استغفر، وتشهد علي، فعظم حق أبي بكر، وحدث أنه لم يحمله على الذي صنع نفاسة على أبي بكر ولا إنكارا للذي فضله اللَّه به، ولكنا نرى لنا في هذا الأمر نصيبا، فاستبد علينا فوجدنا في أنفسنا. فسر بذلك المسلمون، وقالوا: أصبت، وكان المسلمون إلى علي قريبا حين راجع الأمر بالمعروف.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4240، 4241) عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة فذكرته.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (আলাইহাস সালাম) আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে তাঁর উত্তরাধিকার চেয়ে। যা আল্লাহ তাঁকে মদিনা, ফাদাক এবং খায়বারের খুমস (পঞ্চমাংশ)-এর অবশিষ্ট অংশ থেকে দান করেছিলেন। তখন আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা কোনো উত্তরাধিকার রাখি না; আমরা যা রেখে যাই, তা সাদাকা (দান)। তবে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গ এই সম্পদ থেকে আহার করতে পারবে।" আল্লাহর কসম! আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাদাকার কোনো কিছু তার অবস্থা থেকে পরিবর্তন করব না, যেরূপ তা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ছিল। এবং আমি এর মধ্যে ঠিক তাই করব, যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করতেন। তাই আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর থেকে কোনো কিছুই দিতে অস্বীকার করলেন। এতে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি অসন্তুষ্ট হলেন এবং তাঁর সাথে কথা বলা বন্ধ করে দিলেন। তাঁর ইন্তিকাল হওয়া পর্যন্ত তিনি তাঁর সাথে কথা বলেননি। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে তিনি ছয় মাস জীবিত ছিলেন। যখন তাঁর ইন্তিকাল হলো, তখন তাঁর স্বামী আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে রাতে দাফন করলেন এবং আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খবর দিলেন না। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজেই তাঁর জানাযার সালাত পড়ালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জীবদ্দশায় লোকজনের মাঝে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এক প্রকার কদর ছিল। যখন তাঁর ইন্তিকাল হলো, তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের চেহারাগুলো অচেনা মনে করলেন। অতঃপর তিনি আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সন্ধি করতে এবং তাঁর হাতে বায়আত (আনুগত্যের শপথ) করতে চাইলেন। তিনি (ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর) এই ক'মাস বায়আত করেননি। তিনি আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক মারফত বার্তা পাঠালেন, "আপনি আমাদের কাছে আসুন, আপনার সাথে অন্য কেউ যেন না আসে।" এই কথা বলার কারণ ছিল, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপস্থিতি তিনি অপছন্দ করছিলেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "না, আল্লাহর কসম! আপনি একা তাদের কাছে যাবেন না।" আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "তারা আমার কী-ই বা করতে পারে? আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তাদের কাছে যাব।" অতঃপর আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের কাছে প্রবেশ করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাত পাঠ করলেন (তাশাহহুদ পড়লেন), তারপর বললেন: "আমরা আপনার মর্যাদা ও আল্লাহ আপনাকে যা দান করেছেন, তা অবশ্যই স্বীকার করি। আল্লাহ আপনার জন্য যে কল্যাণ বরাদ্দ করেছেন, সে ব্যাপারে আমরা আপনার প্রতি হিংসা করি না। তবে আপনি আমাদের ওপর (খিলাফতের) বিষয়টিতে একচ্ছত্র ক্ষমতা গ্রহণ করেছেন। অথচ আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটাত্মীয় হওয়ার কারণে এতে আমাদের কিছুটা হক বা অংশ আছে বলে মনে করতাম।" এ কথা শুনে আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দু'চোখ বেয়ে পানি গড়িয়ে পড়ল। অতঃপর আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বললেন এবং বললেন: "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমার আত্মীয়-স্বজনের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখার চেয়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটাত্মীয়দের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখা আমার কাছে অধিক প্রিয়। আর এই সম্পদগুলো নিয়ে আমার ও আপনাদের মাঝে যে বিবাদ সৃষ্টি হয়েছে, এর মধ্যে আমি কল্যাণের পথ থেকে চুল পরিমাণও সরিনি। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই সম্পদগুলোর ব্যাপারে যা করতে দেখেছি, আমি তা-ই করেছি; তা ছাড়া অন্য কিছু করিনি।" তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "আজ সন্ধ্যার সময় আপনার বায়আতের ওয়াদা থাকল।" অতঃপর আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যোহরের সালাত আদায় করলেন এবং মিম্বরে আরোহণ করলেন। তিনি শাহাদাত পাঠ করলেন, অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয়টি, বায়আত থেকে তাঁর বিরত থাকা এবং তিনি (আলী) যে ওজর পেশ করেছেন তা উল্লেখ করলেন। অতঃপর ইস্তিগফার করলেন। এরপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাত পাঠ করলেন এবং আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হকের সম্মান করলেন। তিনি বললেন যে, তিনি যা করেছেন, তা আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি হিংসাবশত বা আল্লাহ তাঁকে যে মর্যাদা দিয়েছেন, তা অস্বীকার করে করেননি, বরং আমরা মনে করেছিলাম যে, এই ব্যাপারে আমাদের অংশ আছে; কিন্তু তিনি আমাদের ওপর একচ্ছত্র ক্ষমতা গ্রহণ করেন, তাই আমরা মনে কষ্ট পেলাম। এতে মুসলিমগণ অত্যন্ত আনন্দিত হলেন এবং বললেন: "আপনি সঠিক কাজটি করেছেন।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন কল্যাণের দিকে ফিরে এলেন, তখন মুসলিমগণ তাঁর কাছাকাছি ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5915)


5915 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقسم ورثتي دنانير، ما تركت بعدَ نفقةِ نسائي ومؤونةِ عاملي، فهو صدقة".

متفق عليه: رواه مالك في الكلام والغيبة والتقى (28) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الفرائض (6729)، ومسلم في الجهاد والسير (1760) كلاهما من هذا الوجه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আমার ওয়ারিসগণ (উত্তরাধিকারীরা) কোনো দীনার (স্বর্ণমুদ্রা) ভাগ-বাটোয়ারা করবে না। আমার স্ত্রীদের ভরণপোষণ এবং আমার কর্মচারীর ব্যয় নির্বাহের পর আমি যা কিছু রেখে যাই, তা হলো সাদাকাহ (জনকল্যাণমূলক সম্পদ)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5916)


5916 - عن أبي هريرة قال: جاءت فاطمة إلى أبي بكر، فقالت: من يرثك؟ قال: أهلي وولدي. قالت: فما لي لا أرث أبي؟ فقال أبو بكر: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا نورث" ولكني أعول من كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يعوله، وأنفق على من كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينفق عليه.

حسن: رواه الترمذي (1608) عن محمد بن المثنى قال: حدثنا أبو الوليد قال: حدثنا حماد ابن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو، وهو حسن الحديث.

قال الترمذي: حديث أبي هريرة حديث حسن غريب من هذا الوجه، إنما أسنده حماد بن سلمة وعبد الوهاب بن عطاء، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. وسألت محمدا عن هذا الحديث، فقال: لا أعلم أحدا رواه عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة إلا حماد بن سلمة. وقد رواه عبد الوهاب بن عطاء، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة نحو رواية حماد بن سلمة.

ثم رواه هو (1609)، وأحمد (79) كلاهما من حديث عبد الوهاب بن عطاء بإسناده، وفيه: أن فاطمة جاءت إلى أبي بكر وعمر تسأل ميراثها من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالا: سمعنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إني لا أُورث". قالت: واللَّه لا أكلمكما أبدا. فماتت ولا تكلمهما. هذا لفظ الترمذي.
ولم يذكر أحمد قولها:"واللَّه لا أكلمكما أبدا. . .".

قال الترمذي:"قال علي بن عيسى (وهو شيخه): معنى (لا أكلمكما): تعني في هذا الميراث أبدا. أنتما صادقان".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন, "কে আপনার উত্তরাধিকারী হবে?" তিনি (আবু বকর) বললেন, "আমার পরিবার ও আমার সন্তানরা।" তিনি (ফাতেমা) বললেন, "তাহলে কী কারণে আমি আমার পিতার (সম্পত্তির) উত্তরাধিকারী হব না?" তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'আমাদের (নবীদের সম্পত্তিতে) উত্তরাধিকার থাকে না।' কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যার ভরণপোষণ করতেন, আমি তার ভরণপোষণ করব এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যার উপর খরচ করতেন, আমি তার উপর খরচ করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (5917)


5917 - عن مالك بن أوس بن الحدثان النصري قال: إن عمر بن الخطاب دعاه، فانطلقت حتى دخلت عليه، فأتاه حاجبه يرفأ، فقال: هل لك في عثمان وعبد الرحمن والزبير وسعد؟ قال: نعم. فأذن لهم، ثم قال: هل لك في علي وعباس؟ قال: نعم. قال عباس: يا أمير المؤمنين، اقض بيني وبين هذا، قال: أنشدكم باللَّه الذي بإذنه تقوم السماء والأرض هل تعلمون أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا نورث ما تركنا صدقة؟" يريد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نفسه. فقال الرهط: قد قال ذلك. فأقبل على عَليٍّ وعباس، فقال: هل تعلمان أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال ذلك؟ قالا: قد قال ذلك. قال عمر: فإني أحدثكم عن هذا الأمر، إن اللَّه قد كان خص رسوله صلى الله عليه وسلم في هذا الفيء بشيء لم يعطه أحدا غيره، فقال عز وجل: {وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ} إلى قوله {قَدِيرٌ} [سورة الحشر: 6] فكانت خالصة لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، واللَّه ما احتازها دونكم، ولا أستأثر بها عليكم، لقد أعطاكموها وبثها فيكم، حتى بقي منها هذا المال، فكان النبي صلى الله عليه وسلم ينفق على أهله من هذا المال نفقة سنته، ثم يأخذ ما بقي، فيجعله مجعل مال اللَّه، فعمل بذاك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حياته، أنشدكم باللَّه هل تعلمون ذلك؟ قالوا: نعم، ثم قال لعلي وعباس: أنشدكما باللَّه هل تعلمان ذلك؟ قالا: نعم. فتوفى اللَّه نبيه صلى الله عليه وسلم، فقال أبو بكر: أنا ولي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقبضها، فعمل بما عمل به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ثم توفى اللَّه أبا بكر، فقلت: أنا ولي ولي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقبضتها سنتين أعمل فيها ما عمل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأبو بكر، ثم جئتماني، وكَلِمَتُكما واحدة، وأمركما جميع، جئتني تسألني نصيبك من ابن أخيك، وأتاني هذا يسألني نصيب امرأته من أبيها، فقلت: إن شئتما دفعتها إليكما بذلك، فتَلْتَمِسان مني قضاء غير ذلك، فواللَّه الذي بإذنه تقوم السماء والأرض لا أقضي فيها قضاء غير ذلك حتى تقوم الساعة، فإن عجزتما فادفعاها إلي، فأنا أكفيكماها".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4033)، وفي الفرائض (6728)، ومسلم في الجهاد والسير (1757: 49) كلاهما من حديث الزهري قال: أخبرني مالك بن أوس بن الحدثان فذكره.

واللفظ للبخاري. ولفظ مسلم نحوه.




মালিক ইবনে আওস ইবনুল হাদসান আন-নাসরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমীরুল মু'মিনীন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে ডাকলেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং প্রবেশ করলাম। এ সময় তাঁর প্রহরী ইয়ারফা এসে বলল: আপনি কি উসমান, আবদুর রহমান, যুবাইর এবং সা'দকে (ঘরে আসার) অনুমতি দেবেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি তাদের অনুমতি দিলেন। এরপর প্রহরী আবার বলল: আপনি কি আলী ও আব্বাসকে (ঘরে আসার) অনুমতি দেবেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।

(তাঁরা আসার পর) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! আমার ও এই ব্যক্তির (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) মাঝে ফায়সালা করে দিন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদেরকে সেই আল্লাহর কসম দিচ্ছি, যার আদেশে আকাশ ও পৃথিবী প্রতিষ্ঠিত আছে, তোমরা কি জানো যে আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “আমাদের (নবীদের) মীরাস (উত্তরাধিকার) হয় না; আমরা যা রেখে যাই, তা সাদাকা?” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ কথা বলে নিজেকেই উদ্দেশ্য করেছিলেন। উপস্থিত দলটি বলল: হ্যাঁ, তিনি অবশ্যই এ কথা বলেছেন। অতঃপর তিনি আলী ও আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে মুখ করে বললেন: তোমরা কি জানো, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ কথা বলেছিলেন? তাঁরা দু’জন বললেন: হ্যাঁ, তিনি অবশ্যই এ কথা বলেছিলেন।

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে আমি তোমাদেরকে এই বিষয় সম্পর্কে বলছি। আল্লাহ্ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই ফায় (যুদ্ধলব্ধ সম্পত্তি যা লড়াই ছাড়া পাওয়া যায়)-এর ক্ষেত্রে এমন কিছু বৈশিষ্ট্য দান করেছিলেন, যা তিনি আর কাউকে দেননি। তিনি বলেন: “আল্লাহ্ তাঁর রাসূলকে যা দিয়েছেন...” [সূরা হাশর: ৬] তাঁর এই বাণী: "...তিনি সর্বশক্তিমান" পর্যন্ত। সুতরাং এই সম্পদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য নির্দিষ্ট ও একান্ত ছিল। আল্লাহর কসম! তিনি তোমাদের ছাড়া এটা ভোগ করেননি, আর তোমাদের ওপর প্রাধান্য দেননি। তিনি তোমাদেরকে এটি দিয়েছেন এবং তোমাদের মাঝে বিতরণ করেছেন, অবশেষে এই সম্পদটুকু অবশিষ্ট ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই সম্পদ থেকে তাঁর পরিবার-পরিজনের জন্য এক বছরের খরচ দিতেন। এরপর যা অবশিষ্ট থাকত, তা আল্লাহর সম্পদে জমা করে দিতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জীবদ্দশায় এভাবেই কাজ করেছেন। আমি তোমাদেরকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি এটা জানো? তাঁরা বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি আলী ও আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আমি তোমাদের উভয়কে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমরা কি এটা জানো? তাঁরা দু’জন বললেন: হ্যাঁ।

এরপর আল্লাহ্ তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ওফাত দান করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওলী (প্রতিনিধি)। অতঃপর তিনি তা গ্রহণ করলেন এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা করতেন, তিনি তাই করতেন। এরপর আল্লাহ্ আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও ওফাত দান করলেন। আমি বললাম: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওলীর ওলী। অতঃপর আমি তা দুই বছর ধরে আমার দায়িত্বে রাখি এবং তাতে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা করতেন, আমি তাই করি। এরপর তোমরা দুজন আমার কাছে এলে— তোমাদের দুজনের বক্তব্য অভিন্ন এবং তোমাদের উদ্দেশ্যও এক। তুমি (আলী) আমার কাছে এসেছো তোমার ভাতিজার (রাসূলের) সম্পত্তির অংশ চাইতে, আর এই ব্যক্তি (আব্বাস) আমার কাছে এসেছে তার স্ত্রীর (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা) পিতার সম্পত্তির অংশ চাইতে। আমি বললাম: যদি তোমরা চাও, তবে আমি এই শর্তে তোমাদের হাতে তা অর্পণ করতে পারি। কিন্তু তোমরা আমার কাছে এর ব্যতিক্রম ফায়সালা কামনা করছো। সেই আল্লাহর কসম, যার আদেশে আকাশ ও পৃথিবী প্রতিষ্ঠিত আছে! আমি কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত এর অন্য কোনো ফায়সালা দেব না। যদি তোমরা দুজন এতে অপারগ হও (অর্থাৎ যদি তোমরা এটির দায়িত্ব সঠিকভাবে পালন করতে না পারো), তবে এটি আমার কাছে ফিরিয়ে দাও। আমিই তোমাদের পক্ষ থেকে এর দায়িত্ব নেব।









আল-জামি` আল-কামিল (5918)


5918 - عن عائشة أن أزواج النبي صلى الله عليه وسلم في حين توفي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أردن أن يبعثن عثمان ابن عفان إلى أبي بكر الصديق، فيسألنه ميراثهن من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقالت لهن عائشة: أليس قد قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا نورث ما تركنا، فهو صدقة؟".

متفق عليه: رواه مالك في الكلام والغيبة والتقى (27) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته. ورواه البخاري في الفرائض (6730)، ومسلم في الجهاد والسير (1758) كلاهما من هذا الوجه.

ورواه أبو داود (2977) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن أسامة بن زيد، عن ابن شهاب، بإسناده نحوه. قالت: ألا تتقين اللَّه؟ ألم تسمعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا نورث ما تركنا فهو صدقة، وإنما هذا المال لآل محمد لنائبتهم ولضيفهم، فإذا مت فهو إلى ولي الأمر من بعدي".

وإسناده حسن من أجل أسامة بن زيد، وهو الليثي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তিকালের সময় তাঁর স্ত্রীগণ আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাঁদের মিরাছ (উত্তরাধিকার) চাওয়ার জন্য উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠাতে চেয়েছিলেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এই কথা বলেননি: "আমাদের কোনো উত্তরাধিকারী হয় না; আমরা যা কিছু রেখে যাই, তা সবই সদকা (দান)?"









আল-জামি` আল-কামিল (5919)


5919 - عن ابن عباس قال: لما قبض رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، واستخلف أبو بكر خاصم العباسُ عليًّا في أشياء تركها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال أبو بكر: شيء تركهـ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فلم يحركه فلا أحركهـ. فلما استخلف عمر اختصما إليه، فقال: شيء لم يحركه أبو بكر فلست أحركهـ. قال: فلما استخلف عثمان اختصما إليه، قال: فأَسْكَت عثمان ونكس رأسه، قال ابن عباس: فخشيت أن يأخذه، فضربت بيدي بين كتفي العباس، فقلت: يا أبت، أقسمت عليك إلا سلمته لعلي، قال: فسلمه له.

صحيح: رواه أحمد (77) عن يحيى بن حماد، حدثنا أبو عوانة، عن الأعمش، عن إسماعيل ابن رجاء، عن عمر مولى العباس، عن ابن عباس فذكره. ورواه أبو يعلى (26) عن أبي خيثمة، حدثنا يحيى بن حماد بإسناده مختصرا.

وإسناده صحيح، عمير مولى العباس هو ابن عبد اللَّه الهلالي من رجال الصحيح.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কর্তৃক রেখে যাওয়া কিছু জিনিসপত্র নিয়ে আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে তর্ক করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা রেখে গেছেন এবং তাতে কোনো পরিবর্তন করেননি, আমিও তাতে কোনো পরিবর্তন করব না। এরপর যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, তারা তাঁর কাছেও একই বিষয়ে তর্ক করলেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা পরিবর্তন করেননি, আমিও তা পরিবর্তন করব না। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: এরপর যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, তারা তাঁর কাছেও তর্ক করলেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নীরব রইলেন এবং মাথা নিচু করলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি আশঙ্কা করলাম যে তিনি (উসমান) হয়তো সেটা গ্রহণ করে ফেলবেন, তাই আমি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দুই কাঁধের মাঝখানে হাত দিয়ে আঘাত করে বললাম, "হে আমার আব্বা! আমি আপনাকে কসম দিয়ে বলছি, আপনি যেন অবশ্যই তা আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে সঁপে দেন।" তিনি বলেন: অতঃপর তিনি তা আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে সঁপে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5920)


5920 - عن هزيل بن شرحبيل قال: سئل أبو موسى عن ابنة، وابنة ابن، وأخت. فقال: للابنة النصف، وللأخت النصف، وأت ابن مسعود، فسيتابعني، فسئل ابن مسعود، وأخبر بقول أبي موسى، فقال: لقد ضللت إذا، وما أنا من المهتدين، أقضي فيها بما قضى النبي صلى الله عليه وسلم للابنة النصف، ولابنة الابن السدس تكملة الثلثين، وما بقي فللأخت، فأتينا أبا موسى، فأخبرناه بقول ابن مسعود، فقال: لا تسألوني ما دام هذا الحبر فيكم.
صحيح: رواه البخاري في الفرائض (6736) عن آدم، حدثنا شعبة، حدثنا أبو قيس، سمعت هزيل بن شرحبيل قال فذكره.

ووهم الحاكم، فاستدركهـ (4/ 334) من طرق أبي قيس، إلا أنه ذكر مع أبي موسى: سليمان ابن ربيعة، وقال:"صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه".




হুযাইল ইবনু শুরাহবীল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এক কন্যা, এক পুত্রের কন্যা (নাতনি) এবং এক বোনের (সম্পত্তির উত্তরাধিকার) বিষয়ে জিজ্ঞেস করা হলো। তিনি (আবূ মূসা) বললেন: কন্যার জন্য অর্ধেক (সম্পত্তি) এবং বোনের জন্য অর্ধেক। তোমরা ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যাও, সে আমার সাথে একমত হবে। এরপর ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো এবং আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য সম্পর্কে তাঁকে অবহিত করা হলো। তিনি বললেন: তাহলে তো আমি পথভ্রষ্ট হয়ে গেলাম এবং আমি হেদায়াতপ্রাপ্তদের অন্তর্ভুক্ত নই। আমি এতে সেই ফায়সালা দেব যা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিয়েছেন: কন্যার জন্য অর্ধেক, আর পুত্রের কন্যার জন্য দুই-তৃতীয়াংশ পূর্ণ করার জন্য এক-ষষ্ঠাংশ, আর যা অবশিষ্ট থাকে তা বোনের জন্য। এরপর আমরা আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য সম্পর্কে তাঁকে অবহিত করলাম। তখন তিনি বললেন: যতক্ষণ তোমাদের মধ্যে এই মহাজ্ঞানী ব্যক্তি (ইবনু মাসঊদ) আছেন, ততক্ষণ তোমরা আমার কাছে জিজ্ঞেস করো না।