হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5921)


5921 - عن الأسود بن يزيد قال: قضى فينا معاذ بن جبل على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم النصف للابنة، والنصف للأخت.

صحيح: رواه البخاري في الفرائض (6741) عن بشر بن خالد، حدثنا محمد بن جعفر، عن شعبة، عن سليمان، عن إبراهيم، عن الأسود فذكره.

ثم قال سليمان: قضى فينا، ولم يذكر:"على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم".

والأسود هو ابن يزيد. وسليمان هو الأعمش، أنه روى الحديث أولا بإثبات قوله:"على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". فيكون مرفوعا، ومرة بدونها، فيكون موقوفا، وسيأتي ما يدل على أنه كان في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.




মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসওয়াদ ইবনু ইয়াযীদ বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মুআয ইবনু জাবাল আমাদের মাঝে ফায়সালা করেছিলেন যে, (উত্তরাধিকারের) অর্ধেক কন্যার জন্য এবং অর্ধেক বোনের জন্য।









আল-জামি` আল-কামিল (5922)


5922 - عن الأسود بن يزيد قال أتانا معاذ بن جبل باليمن معلما وأميرا، فسألناه عن رجل توفي، وترك ابنته وأخته، فأعطى الابنة النصف، والأخت النصف.

صحيح: رواه البخاري في الفرائض (6734) عن محمود، حدثنا أبو النضر، حدثنا أبو معاوية شيبان، عن أشعث، عن الأسود فذكره.

وقوله:"معلما وأميرا" وهذا مشعر بأنه يحكي ما وقع في عهد النبي صلى الله عليه وسلم؛ لأنه هو الذي بعثه معلما وأميرا.

وأصرح من هذا ما رواه أبو داود (2893) من وجه آخر عن أبي حسان، عن الأسود بن يزيد أن معاذ بن جبل ورث أختا، وابنة، فجعل لكل واحدة منهما النصف، وهو باليمن، ونبي اللَّه صلى الله عليه وسلم يومئذ حي.

قال زيد بن ثابت: إذا ترك رجل أو امرأة بنتا فلها النصف، وإن كانتا اثنتين أو أكثر فلهن الثلثان، وإن كان معهن ذَكرٌ بدئ بمن شركهم، فيؤتي فريضته، فما بقي فللذكر مثل حظ الأنثيين.

ذكره البخاري في باب ميراث الولد من أبيه وأمه.




আল-আসওয়াদ ইবনে ইয়াযীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শিক্ষক ও শাসক হিসেবে আমাদের কাছে ইয়েমেনে এসেছিলেন। তখন আমরা তাকে এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, যে মারা গেছে এবং (উত্তরাধিকারী হিসেবে) তার কন্যা ও বোনকে রেখে গেছে। তখন তিনি কন্যাকে অর্ধেক (সম্পদ) দিলেন এবং বোনকেও অর্ধেক দিলেন।

সহীহ: এটি বুখারী ফীল-ফারায়িদ (মীরাস) গ্রন্থে (৬৭৩৪) বর্ণনা করেছেন মাহমুদ থেকে, তিনি আবু নযর থেকে, তিনি আবু মু'আভিয়া শাইবান থেকে, তিনি আশ'আস থেকে, তিনি আল-আসওয়াদ থেকে। এরপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আর তার বক্তব্য: "শিক্ষক ও শাসক হিসেবে"—এটা ইঙ্গিত করে যে তিনি এমন ঘটনা বর্ণনা করছেন যা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে ঘটেছিল; কারণ তিনিই তাকে শিক্ষক ও শাসক হিসেবে প্রেরণ করেছিলেন।

এর চেয়েও স্পষ্ট বর্ণনা হল যা আবু দাউদ (২৮৯৩) অন্য সূত্রে আবু হাসসান থেকে, তিনি আল-আসওয়াদ ইবনে ইয়াযীদ থেকে বর্ণনা করেছেন যে, মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক বোন ও এক কন্যার মাঝে মীরাস বণ্টন করলেন এবং উভয়ের প্রত্যেককে অর্ধেক করে দিলেন। এই ঘটনা যখন ঘটে তখন তিনি ইয়েমেনে ছিলেন এবং তখন আল্লাহ্‌র নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জীবিত ছিলেন।

যায়িদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: যদি কোনো পুরুষ বা মহিলা একজন কন্যা রেখে যায়, তবে সে অর্ধেক পাবে। আর যদি তারা দুইজন বা তার বেশি হয়, তবে তারা দুই-তৃতীয়াংশ পাবে। আর যদি তাদের সাথে কোনো পুরুষ থাকে, তবে তাদের মাঝে অংশীদারদের (নির্দিষ্ট অংশ পাওয়ার যোগ্যদের) দিয়ে শুরু করা হবে এবং তাদের অংশ দেওয়া হবে। এরপর যা বাকি থাকবে, তা পুরুষ পাবে দুই মহিলার অংশের সমান।

বুখারী এটি 'পিতা-মাতা থেকে সন্তানের মীরাস' অধ্যায়ে উল্লেখ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5923)


5923 - عن ابن عمر أن رجلا لاعن امرأته في زمن النبي صلى الله عليه وسلم، وانتفى من ولدها، ففرق النبي صلى الله عليه وسلم بينهما، وألحق الولد بالمرأة.

متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (40) قال: حدثني نافع، عن ابن عمر فذكره. ورواه
البخاري في الفرائض (1749)، ومسلم في اللعان (1494) كلاهما من طريق مالك.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে এক ব্যক্তি তার স্ত্রীর বিরুদ্ধে লিয়ান (অভিসম্পাত) করেছিল এবং সে তার সন্তানের পিতৃত্ব অস্বীকার করেছিল। তখন নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের উভয়কে বিচ্ছিন্ন করে দেন (তালাক দেন) এবং সন্তানকে স্ত্রীর সাথে সম্পৃক্ত করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5924)


5924 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ميراث ابن الملاعنة لأمه، ولورثتها من بعدها".

حسن: رواه أبو داود (2908) عن موسى بن عامر، حدثنا الوليد، أخبرني عيسى أبو محمد، عن العلاء بن الحارث، عن عمرو بن شعيب فذكره.

وإسناده حسن من أجل عيسى أبي محمد، وهو عيسى بن موسى القرشي أبو محمد، قال عثمان الدارمي:"ثقة". ووثّقه دحيم، وابن حبان. ولكن قال البيهقي:"فيه نظر".

وتابعه الهيثم بن محمد، عن العلاء بن الحارث بإسناده إلا أنه لم يجاوزه عن عمرو بن شعيب: أن النبي صلى الله عليه وسلم قضى بميرات ابن الملاعنة لأمه كلها؛ لما لقيت فيه من العناء. وهذا مرسل.

وتقويه رواية مكحول قال:"جعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ميراث ابن الملاعنة لأمه، ولورثتها من بعدها". رواه أيضًا أبو داود (2907).

قال فيه البيهقي:"حديث مكحول منقطع".

وأما ما روي عن واثلة بن الأسقع، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المرأة تُحرز ثلاثة مواريث: عتيقها، ولقيطها، وولدها الذي لاعنت عنه". فهو ضعيف.

رواه أبو داود (2906)، والترمذي (2116)، وابن ماجه (2742) كلهم من حديث محمد بن حرب، حدثني عمر بن رؤبة التغلبي، عن عبد الواحد بن عبد اللَّه النصري، عن واثلة بن الأسقع فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب، لا يعرف إلا من هذا الوجه من حديث محمد بن حرب".

ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقي (6/ 240)، وقال:"هذا غير ثابت. قال البخاري: عمر بن رؤبة التغلبي، عن عبد الواحد النصري فيه نظر. وقال ابن عدي: أنكروا عليه أحاديث عن عبد الواحد النصري".

وقال ابن المنذر:"لا يثبت".

وقال الذهبي في الميزان:"ليس بذاك".

وقال الخطابي:"هذا الحديث غير ثابت عند أهل النقل".

وأما الحاكم (4/ 340 - 341) فرواه من حديث سليمان بن سليم، عن عمر بن رؤبة. وقال: صحيح الإسناد.

قلت: عمر بن رؤبة التغلبي الحمصي مختلف فيه، فرأيت كلام البخاري وابن عدي فيه. وقال أبو حاتم: صالح الحديث. قال ابنه: تقوم به الحجة؟ قال: لا، ولكن صالح. ووثّقه دحيم، وابن حبان. وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق".
فالخلاصة فيه أنه صدوق في نفسه، ويضعف في روايته عن عبد الواحد بن عبد اللَّه النصري، كما قال غير واحد من أهل العلم، وهذا منه لتفرده.

ثم إن الحديث يشتمل على ثلاثة أحكام، في أحدها نكارة، وهو ميراث اللقيط، فقد رأى الجمهور أن الملتقط لا يرث اللقيط؛ لأنه حر، كما صح عن عمر بن الخطاب وغيره، إلا ما جاء عن إسحاق بن راهويه أن ميراثه للملتقط عند عدم نسبه.

كما أن المرأة ترث ولدها الذي لاعنت عليه، ولكن اختلف فيه أهل العلم، فجعل زيد بن ثابت ميراثها منه كميراثها من الولد الذي لم تلاعن عليه، وهو قول مالك، وأبي حنيفة، والشافعي، وغيرهم. يعني أنها تكون من أصحاب الفرائض، ولها السدس

وأما ميراث العتيق فهو متفق عليه بأن ميراثه لمعتقه إذا لم يكن له وارث.

انظر للمزيد كلام الخطابي في"معالم السنن"، وكلام الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن".

إن الرجل إذا لاعن امرأته، ونفي ولدها، وفرق الحاكم بينهما انتفى ولدها عنه، وانقطع تعصيبه من جهة الملاعن؛ فلم يرثه هو، ولا أحد من عصباته، وإنما ترث أمه، وإخوته لأمه. وهذا أمر لا خلاف فيه بين أهل العلم، وإنما الخلاف فيما بقي من المال:

فقال الجمهور: يكون لبيت المال، ولا يجعل عصبة أمه عصبة له.

وقال أبو حنيفة: ذوو الأرحام أولي من بيت المال، فيجعل ما فضل عن فرض أمه وإخوته ردا على أمه وعلى إخوته إلا أن تكون الأم مولاة، فيكون الفاضل لمواليها.

وهو قول علي بن أبي طالب، وعبد اللَّه بن مسعود، وابن عمر من الصحابة. وحجتهم حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. وهو الآتي.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "লি'আনের মাধ্যমে সৃষ্ট সন্তানের উত্তরাধিকার তার মায়ের জন্য, এবং তার (মায়ের) পরবর্তীতে তার উত্তরাধিকারীদের জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (5925)


5925 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"كل مستلحق استلحق بعد أبيه الذي يُدعى له، ادعاه ورثته من بعده، فقضى أن من كان من أمة يملكها يوم أصابها فقد لحق بمن استلحقه، وليس له فيما قسم قبله من الميراث شيء، وما أدرك من ميراث لم يقسم فله نصيبه، ولا يلحق إذا كان أبوه الذي يُدعى له أنكره. وإن كان من أمة لا يملكها، أو من حرة عاهر بها فإنه لا يلحق، ولا يورث. وإن كان الذي يُدعى له هو ادعاه فهو ولد زنا، لأهل أمه من كانوا، حرة أو أمة".

قال محمد بن راشد: يعني بذلك ما قسم في الجاهلية قبل الإسلام.

حسن: رواه أبو داود (2265)، وابن ماجه (2746)، وأحمد (7042)، والحاكم (4/ 342)، والبيهقي (6/ 260)، والدارمي (3154) كلهم من حديث محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل سليمان بن موسى -وهو الدمشقي الأشدق-، وشيخه عمرو بن شعيب؛ فإنهما حسنا الحديث.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “প্রত্যেক এমন দাবি করা সন্তান, যাকে তার কথিত বাবার মৃত্যুর পর দাবি করা হয়, আর তার ওয়ারিসরা তাকে নিজেদের পর দাবি করে নেয়, তাহলে এ মর্মে ফায়সালা হলো যে, যে (সন্তান) এমন দাসীর গর্ভের ছিল, যে দাসীর সাথে সঙ্গমের দিন সে (পিতা) তার মালিক ছিল, সে ঐ ব্যক্তির সাথে সম্পর্কযুক্ত হবে যে তাকে দাবি করেছে। তবে তার জন্য সে মীরাসের অংশ নেই যা তার (দাবিকৃত পিতার মৃত্যুর) পূর্বে বণ্টন করা হয়েছে। আর বণ্টনের অপেক্ষায় থাকা যে মীরাস সে পাবে, তাতে তার অংশ থাকবে। কিন্তু যদি তার কথিত বাবা তাকে অস্বীকার করে থাকে, তবে সে তার সাথে যুক্ত হবে না (বংশধর হিসেবে গণ্য হবে না)। আর যদি সে এমন দাসীর গর্ভের সন্তান হয় যার সে মালিক নয়, অথবা সে এমন স্বাধীন মহিলার গর্ভের সন্তান হয় যার সাথে সে ব্যভিচার করেছে, তবে সে যুক্ত হবে না (বংশধর হিসেবে গণ্য হবে না) এবং মীরাস পাবে না। আর যদি সেই ব্যক্তি, যার সন্তান বলে তাকে দাবি করা হচ্ছে, সে নিজেই তাকে দাবি করে, তবুও সে জারজ সন্তান হিসেবে গণ্য হবে। (এই ক্ষেত্রে) সে তার মায়ের পরিবার-পরিজনের হবে— চাই সে মা স্বাধীন নারী হোক বা দাসী।"

মুহাম্মাদ ইবনু রাশিদ বলেন: এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো যা জাহিলিয়্যাতের যুগে ইসলামের পূর্বে বন্টন করা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (5926)


5926 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أيما رجل عاهر بحرة أو أمة فالولد ولد زنا، لا يرث ولا يورث".

حسن: رواه الترمذي (2113) عن قتيبة، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

وإسناده حسن من أجل رواية قتيبة بن سعيد، عن ابن لهيعة، وقد توبع كما أشار إليه الترمذي بقوله:

"وقد روى غير ابن لهيعة هذا الحديث عن عمرو بن شعيب".

وهو كما قال، فقد رواه ابن ماجه (2745) عن أبي كريب قال: حدثنا يحيى بن اليمان، عن المثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكر مثله.

والمثنى بن الصباح هو اليماني الأبناوي ضعيف، إلا أنه يتقوّى بما قبله.

وقال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم أن ولد الزنى لا يرث من أبيه".

وهذا مما لا خلاف فيه، فإن ولد الزنا لا يرث من أبيه، ولا من أقاربه، ولكن تختلف الصورة إذا تزوّج الرجل الزاني بهذه الزانية، فقد قال الإمام أبو حنيفة:"لا أرى بأسا إذا زنا الرجل بالمرأة فحملت منه أن يتزوجها مع حملها، ويستر عليها، والولد له". فالولد في هذه الصورة يرثُه ويورّثه.

وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس أنه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا مُساعدة في الإسلام، من سَاعى في الجاهلية فقد لحِق بعصبته، ومن دعا ولدا من غير رِشْدةٍ فلا يرث ولا يورث".

رواه أبو داود (2264)، ومن طريقه البيهقي (6/ 259 - 260) عن يعقوب بن إبراهيم، حدثنا معتمر، عن سلم -يعني ابن أبي الذيال-، حدثني بعض أصحابنا، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

ورواه أحمد (3416) عن معتمر بإسناده مثله.

وفيه رجال مجهولون، وهم الرواة عن سعيد بن جبير.

ورواه الطبراني في الأوسط -مجمع البحرين (2218) -، والحاكم (4/ 342) كلاهما من حديث عمرو بن حصين العقيلي، ثنا معتمر بن سليمان، ثنا سالم بن أبي الذيال، عن سعيد بن جبير بإسناده مثله.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.

وتعقبه الذهبي، فقال: لعله موضوع؛ فإن الحصين تركوه.

قلت: لعله تعمد، فأسقط الواسطة المجهولة بين سلم بن أبي الذيال، وبين سعيد بن جبير.
وقوله:"المساعاة" الزنا، وكان الأصمعي يجعل المساعاة في الإماء دون الحرائر، وذلك لأنهن يسعين لمواليهن، فيكتسبن لهم بضرائب كانت عليهن، فأبطل النبي صلى الله عليه وسلم المساعاة في الإسلام، ولم يلحق النسب لها، وعفا عما كان منها في الجاهلية، وألحق النسب به.

ويقال: هذا ولد رِشدة ورَشدة لغتان. من إفادات الخطابي.

ومعنى ولد رشدة إذا كان من النكاح الصحيح.

وضده ولد زَنيةٍ بفتح الزاي وكسرها.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যে কোনো পুরুষ কোনো স্বাধীন নারী অথবা দাসীর সাথে ব্যভিচার করে, তবে সেই সন্তান হবে যেনার সন্তান। সে (কারো সম্পত্তির) উত্তরাধিকারী হবে না এবং (তার কাছ থেকেও কেউ) উত্তরাধিকারী হবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (5927)


5927 - عن عائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنما الولاء لمن أعتق".

متفق عليه: رواه البخاري في المكاتب (2561)، ومسلم في العتق (1504: 6) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن شهاب، عن عروة أن عائشة أخبرته فذكرته في حديث طويل. انظر كتاب العتق.

وقوله:"الولاء لمن أعتق" أي أن من أعتق عبدا له، فإن ميراثه له إذا لم يكن له وارث، وأنه عصبة له إذا كان ورثته لا يحيطون بجميع ماله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওয়ালা (উত্তরাধিকারের অধিকার) তো শুধু তার জন্য, যে আযাদ করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5928)


5928 - عن وعن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مولى القوم من أنفسهم" أو كما قال.

متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6761) عن آدم، حدثنا شعبة، حدثنا معاوية بن قرة، وقتادة، عن أنس فذكره.

ورواه مسلم في الزكاة (1059/ 133) من وجه آخر عن شعبة، عن قتادة وحده بإسناده مطولا، ولفظه:

قال: جمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الأنصار، فقال:"أفيكم أحد من غيركم؟" فقالوا: لا، إلا ابن أختٍ لنا. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن ابن أخت القوم منهم". ثم ذكر بقية الحديث في فضائل الأنصار.

وقوله:"مولى القوم" أي عتيقهم، ينسب إليهم، ويرثونه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কোনো কওমের (গোত্রের/জাতির) মাওলা (মুক্ত দাস বা মিত্র) তাদের নিজেদেরই একজন।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদের একত্রিত করলেন এবং বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি তোমাদের বাইরের কেউ আছে?" তারা বললেন: "না, তবে আমাদের এক বোনের ছেলে আছে।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই কোনো কওমের বোনের ছেলে তাদেরই একজন।"

এরপর তিনি আনসারদের ফজিলত সংক্রান্ত বাকি হাদীস উল্লেখ করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5929)


5929 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: تزوج رئاب بن حذيفة بن سعيد ابن سهم أمَ وائل بنت معمر الجمحية، فولدت له ثلاثة، فتوفيت أمهم، فورثها بنوها رِباعا وولاءَ مواليها، فخرج بهم عمرو بن العاص إلى الشام، فماتوا في طاعون عمواس، فورثهم عمرو، وكان عصبتهم. فلما رجع عمرو بن العاص جاء بنو معمر يخاصمونه في ولاء أختهم إلى عمر، فقال عمر: أقضي بينكم بما سمعت من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، سمعته يقول:"ما أحرز الولد والوالد فهو لعصبته من كان". قال: فقضى لنا به، وكتب لنا به كتابا، فيه شهادة عبد الرحمن بن عوف وزيد بن ثابت وآخر،
حتى إذا استخلف عبد الملك بن مروان توفي مولى لها، وترك ألفي دينار، فبلغني أن ذلك القضاء قد غُيِّر، فخاصموا إلى هشام بن إسماعيل، فرفعنا إلى عبد الملك، فأتيناه بكتاب عمر، فقال: إن كنت لأرى أن هذا من القضاء الذي لا يُشَك فيه، وما كنت أرى أن أمر أهل المدينة بلغ هذا أن يَشُكُّوا في هذا القضاء، فقضى لنا فيه، فلم نزل فيه بعد.

حسن: رواه أبو داود (2917)، وابن ماجه (2732) -واللفظ له- كلاهما من حديث حسين المعلم، حدثنا عمرو بن شعيب بإسناده.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (183) باختصار.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.




আমর ইবনে শুআইব থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পিতা, তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেন, তিনি (তাঁর দাদা) বলেন: রিয়াব ইবনে হুযাইফা ইবনে সাঈদ ইবনে সাহম উম্মু ওয়াইল বিনতে মা‘মার আল-জুমাহিয়্যাহকে বিবাহ করেন। তিনি তার জন্য তিন সন্তানের জন্ম দেন। অতঃপর তাদের মা মারা গেলেন। তখন তার সন্তানেরা তার সম্পত্তির অংশ ও তার আযাদকৃত গোলামদের (আযাদীজনিত) উত্তরাধিকার লাভ করে। এরপর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে নিয়ে সিরিয়ায় (শামে) গেলেন। সেখানে তারা ‘আমওয়াসের প্লেগে’ (মহামারীতে) মারা গেলেন। আমর (ইবনুল আস) তখন তাদের ওয়ারিস হলেন, কারণ তিনি তাদের ‘আসাবা’ (নিকটতম পুরুষ আত্মীয়) ছিলেন।

এরপর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ফিরে আসলেন, তখন বনু মা‘মার গোত্রের লোকেরা তাদের বোনের আযাদকৃত গোলামদের উত্তরাধিকার নিয়ে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তার সাথে বিতর্কে লিপ্ত হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মাঝে সেভাবে ফায়সালা করব, যেভাবে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: “সন্তান ও পিতার রেখে যাওয়া সম্পত্তি যারই হোক না কেন, তা আসাবা (নিকটতম পুরুষ আত্মীয়)-এর জন্য।”

তিনি (তাঁর দাদা) বলেন: অতঃপর তিনি আমাদের পক্ষে ফায়সালা দিলেন এবং এ ব্যাপারে একটি লিখিত দলিল তৈরি করে দিলেন, যাতে আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যায়েদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্য আরেকজনের সাক্ষ্য ছিল।

আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ান যখন খলীফা হলেন, তখন তাদের এক আযাদকৃত দাস মারা গেল এবং সে দুই হাজার দীনার রেখে গেল। আমার নিকট খবর পৌঁছল যে, সেই ফায়সালা পরিবর্তিত হয়েছে। তাই তারা হিশাম ইবনে ইসমাঈলের কাছে এ নিয়ে বিতর্ক করল। এরপর আমাদেরকে আব্দুল মালিকের নিকট পেশ করা হলো। আমরা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর লিখিত দলিলটি তার কাছে নিয়ে গেলাম। তিনি বললেন: আমি মনে করতাম যে, এই ফায়সালা এমন ফায়সালা যার ব্যাপারে কোনো সন্দেহ নেই। আমি ধারণাও করিনি যে, মদীনার লোকদের মাঝে এই ফায়সালা নিয়ে সন্দেহ সৃষ্টির পর্যায়ে পৌঁছেছে। অতঃপর তিনি আমাদের পক্ষেই ফায়সালা করলেন এবং এরপর থেকে আমরা তা নিয়ে আর কোনো (সমস্যায়) পড়িনি।









আল-জামি` আল-কামিল (5930)


5930 - عن عمر بن الخطاب قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يرث الولاء من ورث المال من والد أو ولد".

حسن: رواه أحمد (324) عن عبد اللَّه بن يزيد، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر بن الخطاب فذكره.

وابن لهيعة مختلط، ولكن روى عنه عبد اللَّه بن يزيد المقرئ قبل الاختلاط. وقيل: إنه لم يسمع من عمرو بن شعيب.

قلت: يرده تحديثه عنه في رواية عند أحمد (147). انظر تخريجه في باب القاتل لا يرث.

وأما ما روي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يرث الولاء من يرث المال" فهو ضعيف.

رواه الترمذي (2114) عن قتيبة، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أن قتيبة بن سعيد روى عنه قبل الاختلاط.

وقال الترمذي:"وهذا حديث ليس إسناده بالقوي".

ولعل ذلك يعود إلى سقوط عمر بن الخطاب في الإسناد، كما في الحديث السابق.

وفي الباب ما روي أيضًا عن بنت حمزة قالت: مات مولاي، وترك ابنة، فقسم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ماله بيني وبين ابنته، فجعل لي النصف، ولها النصف.

رواه ابن ماجه (2734)، والحاكم (4/ 66) كلاهما من حديث محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن الحكم، عن عبد اللَّه بن شداد، عن بنت حمزة فذكرته.

ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى سيء الحفظ، وهذا مما وهم فيه، فقد رواه غير واحد عن عبد اللَّه بن شداد مرسلا.
منها: ما رواه البيهقي (6/ 241) من طريق سفيان، عن منصور بن حيان الأسدي، عن عبد اللَّه ابن شداد قال: مات مولى لابنة حمزة فذكر الحديث.

وابن شداد أخو بنت حمزة من الرضاعة.

وكذلك روي عن سلمة بن كهيل والشعبي، عن عبد اللَّه بن شداد.

والحديث منقطع.

وقيل: عن الشعبي، عن عبد اللَّه بن شداد، عن أبيه، وليس بمحفوظ.

وقال إبراهيم النخعي: توفي مولى لحمزة بن عبد المطلب، فأعطى النبي صلى الله عليه وسلم ابنة حمزة النصف طعمة، وقبض النصف. رواه أبو داود في المراسيل (365).

قال البيهقي:"وهذا غلط".

ورواه أحمد (27284) من طريق قتادة، عن سلمى بنت حمزة أن مولاها مات، وترك ابنة، فورث النبي صلى الله عليه وسلم ابنته النصف، وورث يعلى النصف، وكان ابن سلمي. وفيه انقطاع؛ فإن قتادة لم يسمع من سلمى بنت حمزة.

ومجموع هذه الطرق يدل على أن له أصلا، وإن كان كل طريق من طرقها لا يخلو من كلام. ولذا قال البيهقي (10/ 302) بعد أن ذكر طريق سفيان عن سلمة بن كهيل:"هذا مرسل، وقد روي من أوجه أخرى مرسلا، وبعضها يؤكد بعضا".




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, "পিতা বা সন্তানের দিক থেকে যে (মৃত ব্যক্তির) সম্পদের উত্তরাধিকারী হবে, সে-ই ওয়ালা (মুক্তিপণজনিত উত্তরাধিকার)-এর উত্তরাধিকারী হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5931)


5931 - عن ابن عمر يقول: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الولاء، وعن هبته.

متفق عليه: رواه مالك في العتق (20) عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر فذكره. ورواه البخاري في العتق (2535)، وفي الفرائض (6756)، ومسلم في العتق (1506) كلاهما من أوجه أخرى عن عبد اللَّه بن دينار.

قال مسلم:"الناس كلهم عيال على عبد اللَّه بن دينار في هذا الحديث".

ثم ذكر جماعة من الرواة الذين رووه عن عبد اللَّه بن دينار، ولم يذكر منهم مالك، وهو أولى.

قلت: ومن هؤلاء الذين رووه عن عبد اللَّه بن دينار مع مالك: سفيان بن عيينة، وشعبة، وسفيان ابن سعيد الثوري، وسليمان بن بلال، وإسماعيل بن جعفر، والضحاك.

وأما ما رواه ابن ماجه (2748) عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب قال: حدثنا يحيى بن سُليم الطائفي، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر قال:"نهى رسول اللَّه عن بيع الولاء، وعن هبته" فهو خطأ، نبه عليه أبو زرعة في علل ابن أبي حاتم (2/ 52)، والترمذي (1236).

قال الترمذي: وقد روي يحيى بن سُليم هذا الحديث عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن
عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وهو وهم، وهم فيه يحيى بن سُليم".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'ওয়ালা' (মুক্তির সম্পর্কজনিত অভিভাবকত্বের অধিকার) বিক্রি করতে এবং তা হেবা (দান) করতে নিষেধ করেছেন।

[মুত্তাফাকুন আলাইহি] ইমাম মালিক এটি 'কিতাবুল ইতক'-এর (২০) অধ্যায়ে আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী এটি 'কিতাবুল ইতক'-এর (২৫৩৫) এবং 'কিতাবুল ফারায়িদ'-এর (৬৭৫৬) অধ্যায়ে এবং ইমাম মুসলিম এটি 'কিতাবুল ইতক'-এর (১৫০৬) অধ্যায়ে ভিন্ন ভিন্ন সূত্রে আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম মুসলিম বলেন: "এই হাদীসের ক্ষেত্রে সকল মানুষই আব্দুল্লাহ ইবনু দীনারের উপর নির্ভরশীল।"

অতঃপর তিনি একদল রাবীর কথা উল্লেখ করেন যারা আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তাঁদের মধ্যে ইমাম মালিকের কথা উল্লেখ করেননি, যদিও তিনি অগ্রগণ্য।

আমি (গ্রন্থকার) বলি: এই রাবীদের মধ্যে যারা মালিকের সাথে আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, তাঁরা হলেন: সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ, শু'বা, সুফিয়ান ইবনু সাঈদ আস-সাওরী, সুলাইমান ইবনু বিলাল, ইসমাঈল ইবনু জা'ফর এবং আদ-দাহ্হাক।

আর ইবনু মাজাহ (২৭৪৮)-এ মুহাম্মদ ইবনু আব্দুল মালিক ইবনি আবী আশ-শাওয়ারিব সূত্রে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম আত-ত্বাইফী সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমর সূত্রে, তিনি নাফি' সূত্রে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'ওয়ালা' বিক্রি করতে এবং তা হেবা করতে নিষেধ করেছেন—এটি ভুল। আবু যুর'আ তাঁর 'ইলাল ইবনু আবী হাতিম' (২/৫২) গ্রন্থে এবং তিরমিযী (১২৩৬) এ বিষয়ে সতর্ক করেছেন।

ইমাম তিরমিযী বলেন: ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম এই হাদীসটি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমর, তিনি নাফি', তিনি ইবনু উমর সূত্রে নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন। এটি ভ্রম (ওয়াহম), আর ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম এতে ভ্রম করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5932)


5932 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الولاء لحمة كلحمة النسب، لا يباع، ولا يوهب".

صحيح: رواه ابن حبان (4950) عن أبي يعلى قال: قرئ على بشر بن الوليد، عن يعقوب بن إبراهيم، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر فذكر الحديث.

وإسناده صحيح. ويعقوب بن إبراهيم هو أبو يوسف الإمام المجتهد صاحب الإمام أبي حنيفة.

ولكن رواه الشافعي، ومن طريقه الحاكم (4/ 341)، والبيهقي (10/ 292) عن محمد بن الحسن، عن أبي يوسف، عن عبد اللَّه بن دينار بإسناده. وليس في إسناده عبد اللَّه بن عمر.

قال البيهقي في المعرفة (14/ 409):"كذا رواه الشافعي، عن محمد بن الحسن الفقيه، عن أبي يوسف القاضي. وكأنه رواه محمد بن الحسن للشافعي من حفظه، فنزل عن ذكر عبيد اللَّه بن عمر في إسناده، وقد رواه محمد بن الحسن في كتاب الولاء عن أبي يوسف، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم باللفظ الذي رواه الشافعي عنه".

ففي هذا متابعة بن الحسن لبشر بن الوليد.

وأما ما نقل البيهقي من أبي بكر بن زياد النيسابوري عقيب هذا الحديث:"هذا خطأ؛ لأن الثقات لم يرووه هكذا، وإنما رواه الحسن مرسلا". ثم أخرج المرسل، فقال:

حدثنا أبو عبد اللَّه الحافظ وأبو سعيد بن أبي عمرو قالا: حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أنبأنا يزيد بن هارون، أنبأنا هشام بن حسان، عن الحسن قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مثله. قال البيهقي: وقد روي من أوجه أخر كلها ضعيفة".

قلت: فهذا المرسل لا يُعل المرفوع لاختلاف مخارجها، بل يقويه، كما هو معروف في علم مصطلح الحديث.

وكان لعبد اللَّه بن دينار عن ابن عمر حديثان: أحدهما يرويه عبيد اللَّه بن عمر عنه، كما هنا. والآخر رواه مالك وسفيان وغيرهما عنه، فلا يُعلُّ أحدهما الآخر.

قال الترمذي عقب الحديث:"والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم".

وقال البغوي:"اتفق أهل العلم على هذا أن الولاء لا يُباع، ولا يُوهب، ولا يُورث، إنما هو سببٌ يُورث به، كالنسب يُورث به، ولا يُوَرَّث. وكانت العرب في الجاهلية تبيع ولاء مواليها، فنهاهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". شرح السنة (8/ 354).




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "ওয়ালা' (মুক্তিদানের সম্পর্ক) হলো রক্তের সম্পর্কের মতো একটি বন্ধন। একে বিক্রি করা যায় না এবং দানও করা যায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5933)


5933 - عن عائشة أن مولى للنبي صلى الله عليه وسلم وقع من نخلة، فمات، وترك مالا، ولم يترك
ولدا ولا حميما. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أعطوا ميراثه رجلا من أهل قريته".

حسن: رواه أبو داود (2902)، والترمذي (2105)، وابن ماجه (2733) كلهم من حديث عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن مجاهد بن وردان، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا أحمد (25054)، والبيهقي (6/ 243).

قال الترمذي:"هذا حديث حسن".

وهو كذلك؛ فإن فيه مجاهد بن وردان، صدوق، كما في التقريب.

قال البيهقي:"وهذا يحتمل أنه كان مولى له بغير العتاق، فلم يأخذ ميراثه، وجعله في أهل قريته على طريق المصلحة".

قال البغوي في شرح السنة (8/ 361 - 362):"وليس هذا عند أهل العلم على سبيل توريث أهل القرية والقبيلة، بل مال من لا وارث له لعامة المسلمين، يضعه الإمام حيث يراه على وجه المصلحة".

قلت: ولكن الظاهر من سياق الحديث أن النبي صلى الله عليه وسلم كان وارثا له، إلا أنه ترفع عن أخذ هذا الإرث، وجعله في رجل من أهل القرية، وفيه تنازل عن الحق بطبيب النفس.

وأما ما روي عن بريدة قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم رجل، فقال: إن عندي ميراث رجل من الأزد، ولست أجد أزديا أدفعه إليه. قال:"فاذهب، فالتمس أزدية حولا". قال: فأتاه بعد الحول، فقال: يا رسول اللَّه، لم أجد أزديا أدفعه إليه. قال:"فانطلق، فانظر أول خزاعي تلقاه فادفعه إليه". فلما ولي قال:"علي الرجل". فلما جاء قال:"انظر كُبْرَ خزاعة فادفعه إليه". فهو ضعيف.

رواه أبو داود (2903) عن عبد اللَّه بن سعيد الكندي، حدثنا المحاربي، عن جبريل بن أحمر، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن أبيه فذكره.

ورواه أيضًا أبو داود (2409)، وأحمد (22944)، والنسائي في الكبرى (6394)، والطيالسي (850)، ومن طريقه البيهقي (6/ 243) كلهم من طريق شريك، عن أبي بكر بن أحمر بإسناده نحوه. ومنهم من زاد:"التمسوا له وارثا أو ذا رحم".

ورواه النسائي في الكبرى (6397) من وجه آخر عن جبريل مرسلا.

وجبريل بن أحمر أبو بكر الجملي الكوفي، ويقال: البصري، مختلف فيه، فوثّقه ابن معينه، وقال أبو زرعة:"شيخ". وذكره ابن حبان في الثقات، وضعفه النسائي، فقال:"ليس بالقوي، والخبر منكر". وقال ابن حزم:"لا تقوم به حجة".

كما أنه اختلف في وصله وإرساله، فرواه النسائي من وجهين.

وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس: أن رجلا مات على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ولم يترك وارثا إلا عبدا هو أعتقه، فأعطاه النبي صلى الله عليه وسلم ميراثه.
رواه أبو داود (2905)، والترمذي (2106)، وابن ماجه (2741) كلهم من طريق عمرو بن دينار، عن عوسجة مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكره.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا أحمد (3369)، والحاكم (4/ 347)، والبيهقي (6/ 242)، والطحاوي في مشكله (3879).

وفي إسناده عوسجة المكي مولى ابن عباس، قال أبو حاتم، والنسائي:"ليس بالمشهور".

وقال البخاري في"التاريخ الكبير" (7/ 76):"روى عنه عمرو بن دينار، ولم يصح".

وقال البيهقي:"لا يتابع عليه".

وقد رواه أيضًا الحاكم (4/ 346) من طريق ابن جريج قال: أخبرني عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وقال: هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يخرجاه، إلا أن حماد بن سلمة وسفيان ابن عيينة روياه عن عمرو بن دينار، عن عوسجة مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكره.

فقوله في حديث عكرمة: عن ابن عباس غلط، نبَّه عليه البيهقي، فقال:"ورواه بعض الرواة عن عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس وهو غلط لا شك فيه".

وأَعلَّ أيضًا رواية عمرو عن عوسجة، فإنه رواه مرسلا، ورجَّحه. وقال الذهبي:"هو نكرة".

قلت: لأنه مع ضعف إسناده فمتنه منكر؛ لأنه يخالف الحديث الصحيح المتفق عليه:"إنما الولاء لمن أعتق".

وقد اتفق أهل العلم على أن لا يكون المولى الأسفل وارثا من المولى الأعلى. ولذا سأل النبي صلى الله عليه وسلم، كما في بعض الروايات:"ابتغوا له وارثا" فلم يجدوا وارثا، فدل ذلك أن المولى الأسفل لم يكن وارثا له، فدفع النبي صلى الله عليه وسلم إياه تركته لم يكن لكونه وارثا له، وإنما صنع في هذا المال الذي لا مستحق له ما رآه مناسبا.

ولذا قال الترمذي:"والعمل عند أهل العلم في هذا الباب إذا مات الرجل، ولم يترك عصبة أن ميراثه يجعل في بيت مال المسلمين".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের একজন মুক্ত গোলাম একটি খেজুর গাছ থেকে পড়ে মারা গেল। সে সম্পদ রেখে গিয়েছিল, কিন্তু কোনো সন্তান বা নিকটাত্মীয় রেখে যায়নি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার মীরাস (উত্তরাধিকারের সম্পদ) তার গ্রামের একজন লোককে দিয়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (5934)


5934 - عن ابن عباس: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} قال: ورثة {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} كان المهاجرون لما قدموا المدينة يرث المهاجر الأنصاري دون ذوي رحمه للأخوة التي آخى النبي صلى الله عليه وسلم بينهم، فلما نزلت: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} نسخت. ثم قال: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} من النصر، والرفادة، والنصيحة، وقد ذهب الميراث، ويوصي له.

صحيح: رواه البخاري في التفسير (4580) عن الصلت بن محمد، حدثنا أبو أسامة، عن
إدريس، عن طلحة بن مصرف، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

قال البخاري:"سمع أبو أسامة إدريس، وسمع إدريس طلحة".

قلت: هكذا رواه أيضًا في الفرائض (6747) عن إسحاق بن إبراهيم قال: قلت لأبي أسامة: حدثكم إدريس، حدثنا طلحة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس قال: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} [سورة النساء: 33] قال: كان المهاجرون حين قدموا المدينة يرث الأنصاري المهاجري دون ذوي رحمه للأُخوة التي أخى النبي صلى الله عليه وسلم بينهم، فلما نزلت: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} قال: نسختها {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ}.

فقوله: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} أي والذين تحالفتموهم بالأيمان المؤكدة -أنتم، وهم- فآتوهم نصيبهم من الميراث، كما وعدتموهم في الأيمان المغلظة. وقد كان هذا في ابتداء الإسلام، ثم نسخ بعد ذلك.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী: "আর আমরা প্রত্যেকের জন্যই উত্তরাধিকারী নির্ধারণ করেছি" (সূরা আন-নিসা: ৩৩) এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন, এর অর্থ হলো: ওয়ারিসগণ। আর আল্লাহর বাণী: "আর যাদের সাথে তোমরা অঙ্গীকারবদ্ধ হয়েছ" (সূরা আন-নিসা: ৩৩) (এর বিধান ছিল এমন যে) মুহাজিরগণ যখন মদিনায় এসেছিলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে যে ভ্রাতৃত্বের বন্ধন স্থাপন করেছিলেন, তার কারণে একজন মুহাজির তার আনসার ভাইয়ের আত্মীয়-স্বজন থাকা সত্ত্বেও তার ওয়ারিস হতো। অতঃপর যখন এই আয়াত নাযিল হলো: "আর আমরা প্রত্যেকের জন্যই উত্তরাধিকারী নির্ধারণ করেছি", তখন (পূর্বের) সেই বিধান রহিত হয়ে গেল। এরপর তিনি বললেন: "(আয়াত) 'আর যাদের সাথে তোমরা অঙ্গীকারবদ্ধ হয়েছ' এর অর্থ হলো) সাহায্য, সমর্থন ও উপদেশ প্রদান করা। এখন মীরাসের (উত্তরাধিকারের) বিধান চলে গেছে, তবে তার জন্য অসিয়ত করা যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5935)


5935 - عن ابن عباس قال: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ فَآتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ} [سورة النساء: 33] كان الرجل يحالف الرجل ليس بينهما نسب، فيرث أحدهما الآخر، فنسخ ذلك الأنفال. قال تعالى: {وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ} [الأنفال: 75].

حسن: رواه أبو داود (2921) عن أحمد بن محمد بن ثابت، حدثني علي بن حسين، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في علي بن حسين بن واقد المروزي؛ فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت ما ينكر عليه.

فالنسخ هو التوارث بالحلف، وأما التحالف على طاعة اللَّه ونصر المظلوم والمؤاخاة في اللَّه فهو أمر مرغوب، وقد جاء الأمر به في الأحاديث الكثيرة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ্‌র বাণী: “আর যাদের সাথে তোমাদের অঙ্গীকার সম্পাদিত হয়েছে, তাদেরকে তাদের অংশ দাও।” [সূরা নিসা: ৩৩] এর দ্বারা উদ্দেশ্য ছিল যে, কোনো ব্যক্তি এমন অন্য ব্যক্তির সাথে চুক্তিবদ্ধ হতো যার সাথে তার কোনো আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিল না, অতঃপর তাদের একজন অন্যজনের উত্তরাধিকারী হতো। এরপর সূরা আনফালের মাধ্যমে তা রহিত করা হয়। আল্লাহ তাআলা বলেন: “এবং আত্মীয়-স্বজনেরা একে অপরের অপেক্ষা ঘনিষ্ঠ।” [সূরা আনফাল: ৭৫]

(হাদীসটি হাসান। এটি আবূ দাউদ (২৯২১) আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু সাবিত থেকে, তিনি আলী ইবনু হুসাইন থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি ইয়াযীদ নাহবী থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এর সনদ হাসান কারণ আলী ইবনু হুসাইন ইবনু ওয়াকিদ মারওয়াযী সম্পর্কে কিছু কথা রয়েছে; যদিও তিনি মুুখতালাফ ফীহ (মতভেদপূর্ণ), তবে তার বিরুদ্ধে আপত্তিকর কিছু না থাকলে তার হাদীস হাসান হিসেবে গণ্য হয়। এই রহিতকরণটি হলো মৈত্রীচুক্তির মাধ্যমে উত্তরাধিকার লাভ করা। পক্ষান্তরে আল্লাহর আনুগত্য, মজলুমকে সাহায্য করা এবং আল্লাহ্‌র জন্য ভ্রাতৃত্বের অঙ্গীকার করা এমন বিষয়, যা পছন্দনীয় এবং অসংখ্য হাদীসে এর নির্দেশ এসেছে।)









আল-জামি` আল-কামিল (5936)


5936 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ابن أخت القوم منهم، أو من أنفسهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6762) عن أبي الولد، حدثنا شعبة، عن قتادة، عن أنس فذكره.

ورواه مسلم في الزكاة (1059) من طريق آخر عن شعبة بإسناده قال: جمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الأنصار، فقال:"أفيكم أحد من غيركم؟". فقالوا: لا، إلا ابن أخت لنا. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن ابن أخت القوم منهم". ثم ذكر فضائل الأنصار، وهو مذكور في موضعه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো কওমের ভাগিনা তাদের অন্তর্ভুক্ত, অথবা তাদের নিজেদের মধ্যেরই একজন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5937)


5937 - عن وعن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ابن أخت القوم منهم".

حسن: رواه أبو داود (5122) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا أبو أسامة، عن عوف، عن زياد بن مخراق، عن أبي كنانة، عن أبي موسى فذكره.
ورواه أحمد (1954) من طريق عوف، وجاء فيه: قام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على باب بيت فيه نفر من قريش، فقال -وأخذ بعضادتي الباب-:"هل في البيت إلا قرشي؟" قال: فقيل: يا رسول اللَّه، غير فلان ابن أختنا. فقال:"ابن أخت القوم منهم".

قال: ثم قال:"إن هذا الأمر في قريش ما داموا إذا استرحموا رحموا، وإذا حكموا عدلوا، وإذا قسموا أقسطوا، فمن لم يفعل ذلك منهم فعليه لعنة اللَّه والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل".

وإسناده حسن من أجل أبي كنانة، فقد روى عنه اثنان كما في التهذيب، ولم يُنقل فيه جرحٌ، ولحديثه أصل ثابت.

وذكره الهيثمي في المجمع (5/ 193) وقال:"رواه أحمد والبزار والطبراني، ورجال أحمد ثقات".




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "গোত্রের ভাগ্নে তাদেরই একজন।"

(বর্ণনার অপর সূত্রে এসেছে যে) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি ঘরের দরজার সামনে দাঁড়ালেন যেখানে কুরাইশের কয়েকজন লোক ছিল। তিনি দরজার দুই পার্শ্ব ধরে বললেন: "এই ঘরে কি কুরাইশী ছাড়া অন্য কেউ আছে?" বর্ণনাকারী বলেন: তখন বলা হলো: ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমাদের ভাগ্নে অমুক ব্যক্তি ছাড়া (আর কেউ নেই)। তখন তিনি বললেন: "গোত্রের ভাগ্নে তাদেরই একজন।"

এরপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই কর্তৃত্ব কুরাইশদের মাঝেই থাকবে, যতক্ষণ পর্যন্ত তারা এই অবস্থায় থাকে যে, যখন তাদের কাছে দয়া চাওয়া হয়, তারা দয়া করে; যখন তারা বিচার করে, তখন ন্যায়পরায়ণতা অবলম্বন করে; এবং যখন তারা বন্টন করে, তখন সমতার সাথে বন্টন করে। তাদের মধ্যে যে ব্যক্তি এরূপ করবে না, তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতা এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ বর্ষিত হবে। তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কবুল করা হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5938)


5938 - عن جبير بن مطعم قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: ابن الأخت منهم.

حسن: رواه الطبراني (2/ 142) عن محمد بن مندة الأصبهاني، ثنا أبو كريب، ثنا زكريا بن عدي، عن حاتم بن إسماعيل، عن الجُعيد بن عبد الرحمن، عن يزيد بن خصيفة، عن نافع بن جبير، عن أبيه فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (1/ 196):"رجاله رجال الصحيح".

وإسناده حسن من أجل حاتم بن إسماعيل فإنه صدوق صحيح الكتاب.

والجعيد بن عبد الرحمن هو الجعد بن عبد الرحمن بن أوس، وقد يُصغّر من رجال الشيخين.

وفي معناه ما روي عن رفاعة بن رافع الزرقي، رواه أحمد (18992، 18993، 18994)، والبخاري في الأدب المفرد (75)، والطبراني في الكبير (4547)، والحاكم (2/ 328، 4/ 73).

وفي طريقهم إسماعيل بن عبيد بن رفاعة"مجهول"، لم يرو عنه إلا ابن خُثيم، ولم يوثّقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات كعادته في ذكر المجاهيل فيه.

أحاديث الباب تدل على أن التوارث بالحلف والعقد ونحوهما نسخ بآية المواريث، فالذين جاء ذكرهم فيها هم الذين يرثون، ومن لم يكن له وارث منهم يرثه أولوا الأرحام، وهم الأقربون إلى الميت الذين لم يأت ذكرهم ولا ذكر أنصبائهم في آيات المواريث، وقد حدد العلماء بعض هؤلاء، وهم: أولاد البنات، والجد أبو الأم، وأولاد الأخت، وبنات الأخ، وبنات العم، والعم للأم، والعمة، والخال، والخالة، وذلك عند عدم وجود الورثة، ويدل على هذا أيضًا عموم قوله تعالى: {وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ} [الأنفال: 75]. وقوله تعالى: {لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ} [سورة النساء: 7]. والأقربون هم ذوو الأرحام.

وبهذا قال كثير من أهل العلم، منهم: عمر بن الخطاب، وعلي، وابن مسعود، وأبو الدرداء،
من الصحابة، وأحمد وأبو حنيفة من الفقهاء، والشعبي، ومسروق، والنخعي، والثوري، والقاسم ابن سلام، وإسحاق، والحسن بن زياد، وغيرهم من علماء الإسلام.

وذهب أبو بكر، وزيد بن ثابت، وابن عمر إلى أنه لا ميراث لهم، بل يجعل مال الميت الذي لم يخلف وارثًا إلى بيت المال، وبه قال مالك والشافعي. وحجتهم أن الذي لا يعقل لا يَرِث. وأما أحاديث الباب فإما أنها غير ثابتة، كما قال الشافعي، أو أنها مؤولة.




জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: বোনের পুত্র তাদের অন্তর্ভুক্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (5939)


5939 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: كتب عمر بن الخطاب إلى أبي عبيدة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اللَّه ورسوله مولى من لا مولى له، والخال وارث من لا وارث له".

حسن: رواه الترمذي (2103)، وابن ماجه (2737) كلاهما من حديث سفيان الثوري، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن حكيم بن حكيم بن عباد بن حنيف، عن أبي أمامة فذكره. ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (189)، والدارقطني (4/ 84 - 85)، والبيهقي (6/ 214)، وابن الجارود (964)، وصحّحه ابن حبان (6037).

قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: بل هو حسن فقط؛ فإن عبد الرحمن بن الحارث مختلف فيه، فقال أبو حاتم: شيخ. وقال ابن معين: لا بأس به، ووثّقه العجلي، وابن حبان، وأخرج حديثه في صحيحه، وتكلم فيه علي بن المديني والنسائي، غير أنه حسن الحديث.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবূ উবাইদাহকে লিখে পাঠালেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল হলেন সেই ব্যক্তির অভিভাবক (মাওলা) যার কোনো অভিভাবক নেই। আর মামা হলেন সেই ব্যক্তির উত্তরাধিকারী যার কোনো উত্তরাধিকারী নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5940)


5940 - عن المقدام الكندي قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أولى بكل مؤمن من نفسه، فمن ترك دينا أو ضيعة فإليَّ، ومن ترك مالا فلورثته، وأنا مولى من لا مولى له، أرث ماله، وأفك عانه. والخال مولى من لا مولى له، يرث ماله، ويفك عانه".

حسن: رواه أبو داود (2900)، وابن ماجه (2634) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن بديل بن ميسرة، عن علي بن أبي طلحة، عن راشد بن سعد، عن أبي عامر الهوزني، عن المقدام الشامي فذكره. واللفظ لأبي داود، واختصره ابن ماجه.

ومن هذا الطريق رواه الدارقطني (4/ 85 - 86)، وصحّحه الحاكم (4/ 344) على شرط الشيخين، والبيهقي (6/ 214). وتعقبه الذهبي، فقال:"علي بن أبي طلحة لم يخرج له البخاري، وقال أحمد: له أشياء منكرات".

قلت: هو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ورواه شعبة عن بديل، وفيه:"الخال وارث من لا وارث له". رواه أبو داود (2899)، وابن ماجه (2738)، وصحّحه ابن حبان (6035)، وقد سمع ابن أبي حاتم أبا زرعة، وذكر حديث
المقدام بن معدي كرب، فقال:"حديث حسن"."العلل" (2/ 50).

إلا أن البيهقي أعله بالاضطراب، ونقل عن يحيى بن معين أنه يبطل حديث:"الخال وارث من لا وارث له". يعني حديث المقدام. وقال: ليس فيه حديث قوي. انتهى.

وقد عرفت من صحَّح هذا الحديث من الأئمة، أو حسَّنه، وهو المعتمد؛ فإن علي بن أبي طلحة مولى بني العباس حسن الحديث. قال أبو داود:"هو إن شاء اللَّه مستقيم الحديث، ولكن له رأي سوء". وقال النسائي:"ليس به بأس". وذكره ابن حبان في الثقات.

قال أبو داود:"رواه الزبيدي، عن راشد بن سعد، عن ابن عائذ، عن المقدام. ورواه معاوية ابن صالح، عن راشد قال: سمعت المقدام".

وحديث الزبيدي أخرجه ابن حبان (6036) من طريق عبد اللَّه بن سالم عنه قال: حدثنا راشد ابن سعد بإسناده، ولفظه:"من ترك دينا أو ضيعة فإلي، ومن ترك مالا فلورثته، وأنا مولى من لا مولى له، أفك عنه، وأرث ماله. والخال مولى من لا مولى له، يفك عنه، ويرث ماله".

والزبيدي هو محمد بن الوليد ثقة.

قال ابن حبان:"سمع هذا الخبر راشد بن سعد عن أبي عامر الهوزني، عن المقدام، وسمعه عن عبد الرحمن بن عائذ الأزدي عن المقدام بن معدي كرب، فالطريقان جميعا محفوظان، ومتناهما متباينان".

وأما حديث معاوية بن صالح -وهو ابن حدير الحمصي- فأخرجه أحمد (17199) عن حماد ابن خالد قال: حدثنا معاوية بن صالح بإسناده، ولفظه:"من ترك مالا فلورثته، ومن ترك دينا أو ضيعة فإلي، وأنا ولي من لا ولي له، أفك عنه، وأرث ماله. والخال ولي من لا ولي له، يفك عنه، ويرث ماله".

ورواه أيضًا (17200) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية بن صالح قال: سمعت راشد بن سعد يحدث عن المقدام بن معدي كرب قال فذكر مثله.

ورواه الطحاوي في مشكله (2750) من حديث أسد بن موسى، حدثنا معاوية بن صالح حدثني راشد بن سعد، أنه سمع المقدام بن معد يكرب فذكره.

وفيه التصريح بسماع راشد بن سعد من المقدام.

فلا سبيل إلى الجمع إلا أن نقول: لعله سمع أولا بالواسطة، ثم سمع بدونها؛ لأنه سمع ممن كان في أيامه من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قد سمع معاوية بن أبي سفيان وثوبان وغيرهما، وهذه ليست بعلة قادحة.

وقوله:"يفك عانه". وفي رواية:"يفك عنه". ومعناه أنه عاقلة يفك عنه أسره في الجنايات.

وأما ما روي عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الخال وارث من لا وارث له" فالصحيح
أنه موقوف.

رواه الترمذي (2104) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا أبو عاصم، عن ابن جريج، عن عمرو ابن مسلم، عن طاوس، عن عائشة فذكرته.

قال الترمذي:"حسن غريب. وقد أرسله بعضهم، ولم يذكر فيه عن عائشة".

قلت: وهو كما قال؛ فقد رواه الدارقطني (4/ 85)، والبيهقي (6/ 215) من طريق أبي عاصم، وشك أبو عاصم في رفعه.

وعمرو بن مسلم ليس بالقوي، كما قال أحمد، وابن معين.

قال البيهقي: وقد روي عن ابن طاوس مرسلا، ورجح الدارقطني وقفه.

ثم قال الترمذي:"واختلف فيه أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فورث بعضهم الخال والخالة والعمة. وإلى هذا الحديث ذهب أكثر أهل العلم في توريث ذوي الأرحام. وأما زيد بن ثابت فلم يورثهم، وجعل الميراث في بيت المال".




মিকদাম আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি প্রত্যেক মুমিনের কাছে তার নিজের থেকেও অধিক নিকটবর্তী। অতএব, যে ব্যক্তি কোনো ঋণ অথবা পরিবার-পরিজন (দায়িত্ব/দুর্বলতা) রেখে যায়, তবে তার দায় আমার উপর। আর যে ব্যক্তি সম্পদ রেখে যায়, তা তার উত্তরাধিকারীদের জন্য। আমি তার অভিভাবক যার কোনো অভিভাবক নেই; আমি তার সম্পদের উত্তরাধিকারী হই এবং তার দায়ভার মুক্ত করি। আর মামা (মাতুল) তার অভিভাবক যার কোনো অভিভাবক নেই; সে তার সম্পদের উত্তরাধিকারী হয় এবং তার দায়ভার মুক্ত করে।"