আল-জামি` আল-কামিল
5928 - عن وعن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مولى القوم من أنفسهم" أو كما قال.
متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6761) عن آدم، حدثنا شعبة، حدثنا معاوية بن قرة، وقتادة، عن أنس فذكره.
ورواه مسلم في الزكاة (1059/ 133) من وجه آخر عن شعبة، عن قتادة وحده بإسناده مطولا، ولفظه:
قال: جمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الأنصار، فقال:"أفيكم أحد من غيركم؟" فقالوا: لا، إلا ابن أختٍ لنا. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن ابن أخت القوم منهم". ثم ذكر بقية الحديث في فضائل الأنصار.
وقوله:"مولى القوم" أي عتيقهم، ينسب إليهم، ويرثونه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কোনো কওমের (গোত্রের/জাতির) মাওলা (মুক্ত দাস বা মিত্র) তাদের নিজেদেরই একজন।"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদের একত্রিত করলেন এবং বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি তোমাদের বাইরের কেউ আছে?" তারা বললেন: "না, তবে আমাদের এক বোনের ছেলে আছে।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই কোনো কওমের বোনের ছেলে তাদেরই একজন।"
এরপর তিনি আনসারদের ফজিলত সংক্রান্ত বাকি হাদীস উল্লেখ করেন।
5929 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: تزوج رئاب بن حذيفة بن سعيد ابن سهم أمَ وائل بنت معمر الجمحية، فولدت له ثلاثة، فتوفيت أمهم، فورثها بنوها رِباعا وولاءَ مواليها، فخرج بهم عمرو بن العاص إلى الشام، فماتوا في طاعون عمواس، فورثهم عمرو، وكان عصبتهم. فلما رجع عمرو بن العاص جاء بنو معمر يخاصمونه في ولاء أختهم إلى عمر، فقال عمر: أقضي بينكم بما سمعت من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، سمعته يقول:"ما أحرز الولد والوالد فهو لعصبته من كان". قال: فقضى لنا به، وكتب لنا به كتابا، فيه شهادة عبد الرحمن بن عوف وزيد بن ثابت وآخر،
حتى إذا استخلف عبد الملك بن مروان توفي مولى لها، وترك ألفي دينار، فبلغني أن ذلك القضاء قد غُيِّر، فخاصموا إلى هشام بن إسماعيل، فرفعنا إلى عبد الملك، فأتيناه بكتاب عمر، فقال: إن كنت لأرى أن هذا من القضاء الذي لا يُشَك فيه، وما كنت أرى أن أمر أهل المدينة بلغ هذا أن يَشُكُّوا في هذا القضاء، فقضى لنا فيه، فلم نزل فيه بعد.
حسن: رواه أبو داود (2917)، وابن ماجه (2732) -واللفظ له- كلاهما من حديث حسين المعلم، حدثنا عمرو بن شعيب بإسناده.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (183) باختصار.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
আমর ইবনে শুআইব থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পিতা, তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেন, তিনি (তাঁর দাদা) বলেন: রিয়াব ইবনে হুযাইফা ইবনে সাঈদ ইবনে সাহম উম্মু ওয়াইল বিনতে মা‘মার আল-জুমাহিয়্যাহকে বিবাহ করেন। তিনি তার জন্য তিন সন্তানের জন্ম দেন। অতঃপর তাদের মা মারা গেলেন। তখন তার সন্তানেরা তার সম্পত্তির অংশ ও তার আযাদকৃত গোলামদের (আযাদীজনিত) উত্তরাধিকার লাভ করে। এরপর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে নিয়ে সিরিয়ায় (শামে) গেলেন। সেখানে তারা ‘আমওয়াসের প্লেগে’ (মহামারীতে) মারা গেলেন। আমর (ইবনুল আস) তখন তাদের ওয়ারিস হলেন, কারণ তিনি তাদের ‘আসাবা’ (নিকটতম পুরুষ আত্মীয়) ছিলেন।
এরপর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ফিরে আসলেন, তখন বনু মা‘মার গোত্রের লোকেরা তাদের বোনের আযাদকৃত গোলামদের উত্তরাধিকার নিয়ে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তার সাথে বিতর্কে লিপ্ত হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মাঝে সেভাবে ফায়সালা করব, যেভাবে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: “সন্তান ও পিতার রেখে যাওয়া সম্পত্তি যারই হোক না কেন, তা আসাবা (নিকটতম পুরুষ আত্মীয়)-এর জন্য।”
তিনি (তাঁর দাদা) বলেন: অতঃপর তিনি আমাদের পক্ষে ফায়সালা দিলেন এবং এ ব্যাপারে একটি লিখিত দলিল তৈরি করে দিলেন, যাতে আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যায়েদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্য আরেকজনের সাক্ষ্য ছিল।
আব্দুল মালিক ইবনে মারওয়ান যখন খলীফা হলেন, তখন তাদের এক আযাদকৃত দাস মারা গেল এবং সে দুই হাজার দীনার রেখে গেল। আমার নিকট খবর পৌঁছল যে, সেই ফায়সালা পরিবর্তিত হয়েছে। তাই তারা হিশাম ইবনে ইসমাঈলের কাছে এ নিয়ে বিতর্ক করল। এরপর আমাদেরকে আব্দুল মালিকের নিকট পেশ করা হলো। আমরা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর লিখিত দলিলটি তার কাছে নিয়ে গেলাম। তিনি বললেন: আমি মনে করতাম যে, এই ফায়সালা এমন ফায়সালা যার ব্যাপারে কোনো সন্দেহ নেই। আমি ধারণাও করিনি যে, মদীনার লোকদের মাঝে এই ফায়সালা নিয়ে সন্দেহ সৃষ্টির পর্যায়ে পৌঁছেছে। অতঃপর তিনি আমাদের পক্ষেই ফায়সালা করলেন এবং এরপর থেকে আমরা তা নিয়ে আর কোনো (সমস্যায়) পড়িনি।
5930 - عن عمر بن الخطاب قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يرث الولاء من ورث المال من والد أو ولد".
حسن: رواه أحمد (324) عن عبد اللَّه بن يزيد، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر بن الخطاب فذكره.
وابن لهيعة مختلط، ولكن روى عنه عبد اللَّه بن يزيد المقرئ قبل الاختلاط. وقيل: إنه لم يسمع من عمرو بن شعيب.
قلت: يرده تحديثه عنه في رواية عند أحمد (147). انظر تخريجه في باب القاتل لا يرث.
وأما ما روي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يرث الولاء من يرث المال" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (2114) عن قتيبة، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أن قتيبة بن سعيد روى عنه قبل الاختلاط.
وقال الترمذي:"وهذا حديث ليس إسناده بالقوي".
ولعل ذلك يعود إلى سقوط عمر بن الخطاب في الإسناد، كما في الحديث السابق.
وفي الباب ما روي أيضًا عن بنت حمزة قالت: مات مولاي، وترك ابنة، فقسم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ماله بيني وبين ابنته، فجعل لي النصف، ولها النصف.
رواه ابن ماجه (2734)، والحاكم (4/ 66) كلاهما من حديث محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن الحكم، عن عبد اللَّه بن شداد، عن بنت حمزة فذكرته.
ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى سيء الحفظ، وهذا مما وهم فيه، فقد رواه غير واحد عن عبد اللَّه بن شداد مرسلا.
منها: ما رواه البيهقي (6/ 241) من طريق سفيان، عن منصور بن حيان الأسدي، عن عبد اللَّه ابن شداد قال: مات مولى لابنة حمزة فذكر الحديث.
وابن شداد أخو بنت حمزة من الرضاعة.
وكذلك روي عن سلمة بن كهيل والشعبي، عن عبد اللَّه بن شداد.
والحديث منقطع.
وقيل: عن الشعبي، عن عبد اللَّه بن شداد، عن أبيه، وليس بمحفوظ.
وقال إبراهيم النخعي: توفي مولى لحمزة بن عبد المطلب، فأعطى النبي صلى الله عليه وسلم ابنة حمزة النصف طعمة، وقبض النصف. رواه أبو داود في المراسيل (365).
قال البيهقي:"وهذا غلط".
ورواه أحمد (27284) من طريق قتادة، عن سلمى بنت حمزة أن مولاها مات، وترك ابنة، فورث النبي صلى الله عليه وسلم ابنته النصف، وورث يعلى النصف، وكان ابن سلمي. وفيه انقطاع؛ فإن قتادة لم يسمع من سلمى بنت حمزة.
ومجموع هذه الطرق يدل على أن له أصلا، وإن كان كل طريق من طرقها لا يخلو من كلام. ولذا قال البيهقي (10/ 302) بعد أن ذكر طريق سفيان عن سلمة بن كهيل:"هذا مرسل، وقد روي من أوجه أخرى مرسلا، وبعضها يؤكد بعضا".
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, "পিতা বা সন্তানের দিক থেকে যে (মৃত ব্যক্তির) সম্পদের উত্তরাধিকারী হবে, সে-ই ওয়ালা (মুক্তিপণজনিত উত্তরাধিকার)-এর উত্তরাধিকারী হবে।"
5931 - عن ابن عمر يقول: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الولاء، وعن هبته.
متفق عليه: رواه مالك في العتق (20) عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر فذكره. ورواه البخاري في العتق (2535)، وفي الفرائض (6756)، ومسلم في العتق (1506) كلاهما من أوجه أخرى عن عبد اللَّه بن دينار.
قال مسلم:"الناس كلهم عيال على عبد اللَّه بن دينار في هذا الحديث".
ثم ذكر جماعة من الرواة الذين رووه عن عبد اللَّه بن دينار، ولم يذكر منهم مالك، وهو أولى.
قلت: ومن هؤلاء الذين رووه عن عبد اللَّه بن دينار مع مالك: سفيان بن عيينة، وشعبة، وسفيان ابن سعيد الثوري، وسليمان بن بلال، وإسماعيل بن جعفر، والضحاك.
وأما ما رواه ابن ماجه (2748) عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب قال: حدثنا يحيى بن سُليم الطائفي، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر قال:"نهى رسول اللَّه عن بيع الولاء، وعن هبته" فهو خطأ، نبه عليه أبو زرعة في علل ابن أبي حاتم (2/ 52)، والترمذي (1236).
قال الترمذي: وقد روي يحيى بن سُليم هذا الحديث عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن
عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وهو وهم، وهم فيه يحيى بن سُليم".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'ওয়ালা' (মুক্তির সম্পর্কজনিত অভিভাবকত্বের অধিকার) বিক্রি করতে এবং তা হেবা (দান) করতে নিষেধ করেছেন।
[মুত্তাফাকুন আলাইহি] ইমাম মালিক এটি 'কিতাবুল ইতক'-এর (২০) অধ্যায়ে আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী এটি 'কিতাবুল ইতক'-এর (২৫৩৫) এবং 'কিতাবুল ফারায়িদ'-এর (৬৭৫৬) অধ্যায়ে এবং ইমাম মুসলিম এটি 'কিতাবুল ইতক'-এর (১৫০৬) অধ্যায়ে ভিন্ন ভিন্ন সূত্রে আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে বর্ণনা করেছেন।
ইমাম মুসলিম বলেন: "এই হাদীসের ক্ষেত্রে সকল মানুষই আব্দুল্লাহ ইবনু দীনারের উপর নির্ভরশীল।"
অতঃপর তিনি একদল রাবীর কথা উল্লেখ করেন যারা আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তাঁদের মধ্যে ইমাম মালিকের কথা উল্লেখ করেননি, যদিও তিনি অগ্রগণ্য।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: এই রাবীদের মধ্যে যারা মালিকের সাথে আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, তাঁরা হলেন: সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ, শু'বা, সুফিয়ান ইবনু সাঈদ আস-সাওরী, সুলাইমান ইবনু বিলাল, ইসমাঈল ইবনু জা'ফর এবং আদ-দাহ্হাক।
আর ইবনু মাজাহ (২৭৪৮)-এ মুহাম্মদ ইবনু আব্দুল মালিক ইবনি আবী আশ-শাওয়ারিব সূত্রে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম আত-ত্বাইফী সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমর সূত্রে, তিনি নাফি' সূত্রে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'ওয়ালা' বিক্রি করতে এবং তা হেবা করতে নিষেধ করেছেন—এটি ভুল। আবু যুর'আ তাঁর 'ইলাল ইবনু আবী হাতিম' (২/৫২) গ্রন্থে এবং তিরমিযী (১২৩৬) এ বিষয়ে সতর্ক করেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেন: ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম এই হাদীসটি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমর, তিনি নাফি', তিনি ইবনু উমর সূত্রে নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন। এটি ভ্রম (ওয়াহম), আর ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম এতে ভ্রম করেছেন।
5932 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الولاء لحمة كلحمة النسب، لا يباع، ولا يوهب".
صحيح: رواه ابن حبان (4950) عن أبي يعلى قال: قرئ على بشر بن الوليد، عن يعقوب بن إبراهيم، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر فذكر الحديث.
وإسناده صحيح. ويعقوب بن إبراهيم هو أبو يوسف الإمام المجتهد صاحب الإمام أبي حنيفة.
ولكن رواه الشافعي، ومن طريقه الحاكم (4/ 341)، والبيهقي (10/ 292) عن محمد بن الحسن، عن أبي يوسف، عن عبد اللَّه بن دينار بإسناده. وليس في إسناده عبد اللَّه بن عمر.
قال البيهقي في المعرفة (14/ 409):"كذا رواه الشافعي، عن محمد بن الحسن الفقيه، عن أبي يوسف القاضي. وكأنه رواه محمد بن الحسن للشافعي من حفظه، فنزل عن ذكر عبيد اللَّه بن عمر في إسناده، وقد رواه محمد بن الحسن في كتاب الولاء عن أبي يوسف، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم باللفظ الذي رواه الشافعي عنه".
ففي هذا متابعة بن الحسن لبشر بن الوليد.
وأما ما نقل البيهقي من أبي بكر بن زياد النيسابوري عقيب هذا الحديث:"هذا خطأ؛ لأن الثقات لم يرووه هكذا، وإنما رواه الحسن مرسلا". ثم أخرج المرسل، فقال:
حدثنا أبو عبد اللَّه الحافظ وأبو سعيد بن أبي عمرو قالا: حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أنبأنا يزيد بن هارون، أنبأنا هشام بن حسان، عن الحسن قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مثله. قال البيهقي: وقد روي من أوجه أخر كلها ضعيفة".
قلت: فهذا المرسل لا يُعل المرفوع لاختلاف مخارجها، بل يقويه، كما هو معروف في علم مصطلح الحديث.
وكان لعبد اللَّه بن دينار عن ابن عمر حديثان: أحدهما يرويه عبيد اللَّه بن عمر عنه، كما هنا. والآخر رواه مالك وسفيان وغيرهما عنه، فلا يُعلُّ أحدهما الآخر.
قال الترمذي عقب الحديث:"والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم".
وقال البغوي:"اتفق أهل العلم على هذا أن الولاء لا يُباع، ولا يُوهب، ولا يُورث، إنما هو سببٌ يُورث به، كالنسب يُورث به، ولا يُوَرَّث. وكانت العرب في الجاهلية تبيع ولاء مواليها، فنهاهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". شرح السنة (8/ 354).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "ওয়ালা' (মুক্তিদানের সম্পর্ক) হলো রক্তের সম্পর্কের মতো একটি বন্ধন। একে বিক্রি করা যায় না এবং দানও করা যায় না।"
5933 - عن عائشة أن مولى للنبي صلى الله عليه وسلم وقع من نخلة، فمات، وترك مالا، ولم يترك
ولدا ولا حميما. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أعطوا ميراثه رجلا من أهل قريته".
حسن: رواه أبو داود (2902)، والترمذي (2105)، وابن ماجه (2733) كلهم من حديث عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن مجاهد بن وردان، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا أحمد (25054)، والبيهقي (6/ 243).
قال الترمذي:"هذا حديث حسن".
وهو كذلك؛ فإن فيه مجاهد بن وردان، صدوق، كما في التقريب.
قال البيهقي:"وهذا يحتمل أنه كان مولى له بغير العتاق، فلم يأخذ ميراثه، وجعله في أهل قريته على طريق المصلحة".
قال البغوي في شرح السنة (8/ 361 - 362):"وليس هذا عند أهل العلم على سبيل توريث أهل القرية والقبيلة، بل مال من لا وارث له لعامة المسلمين، يضعه الإمام حيث يراه على وجه المصلحة".
قلت: ولكن الظاهر من سياق الحديث أن النبي صلى الله عليه وسلم كان وارثا له، إلا أنه ترفع عن أخذ هذا الإرث، وجعله في رجل من أهل القرية، وفيه تنازل عن الحق بطبيب النفس.
وأما ما روي عن بريدة قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم رجل، فقال: إن عندي ميراث رجل من الأزد، ولست أجد أزديا أدفعه إليه. قال:"فاذهب، فالتمس أزدية حولا". قال: فأتاه بعد الحول، فقال: يا رسول اللَّه، لم أجد أزديا أدفعه إليه. قال:"فانطلق، فانظر أول خزاعي تلقاه فادفعه إليه". فلما ولي قال:"علي الرجل". فلما جاء قال:"انظر كُبْرَ خزاعة فادفعه إليه". فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2903) عن عبد اللَّه بن سعيد الكندي، حدثنا المحاربي، عن جبريل بن أحمر، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن أبيه فذكره.
ورواه أيضًا أبو داود (2409)، وأحمد (22944)، والنسائي في الكبرى (6394)، والطيالسي (850)، ومن طريقه البيهقي (6/ 243) كلهم من طريق شريك، عن أبي بكر بن أحمر بإسناده نحوه. ومنهم من زاد:"التمسوا له وارثا أو ذا رحم".
ورواه النسائي في الكبرى (6397) من وجه آخر عن جبريل مرسلا.
وجبريل بن أحمر أبو بكر الجملي الكوفي، ويقال: البصري، مختلف فيه، فوثّقه ابن معينه، وقال أبو زرعة:"شيخ". وذكره ابن حبان في الثقات، وضعفه النسائي، فقال:"ليس بالقوي، والخبر منكر". وقال ابن حزم:"لا تقوم به حجة".
كما أنه اختلف في وصله وإرساله، فرواه النسائي من وجهين.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس: أن رجلا مات على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ولم يترك وارثا إلا عبدا هو أعتقه، فأعطاه النبي صلى الله عليه وسلم ميراثه.
رواه أبو داود (2905)، والترمذي (2106)، وابن ماجه (2741) كلهم من طريق عمرو بن دينار، عن عوسجة مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا أحمد (3369)، والحاكم (4/ 347)، والبيهقي (6/ 242)، والطحاوي في مشكله (3879).
وفي إسناده عوسجة المكي مولى ابن عباس، قال أبو حاتم، والنسائي:"ليس بالمشهور".
وقال البخاري في"التاريخ الكبير" (7/ 76):"روى عنه عمرو بن دينار، ولم يصح".
وقال البيهقي:"لا يتابع عليه".
وقد رواه أيضًا الحاكم (4/ 346) من طريق ابن جريج قال: أخبرني عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وقال: هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يخرجاه، إلا أن حماد بن سلمة وسفيان ابن عيينة روياه عن عمرو بن دينار، عن عوسجة مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكره.
فقوله في حديث عكرمة: عن ابن عباس غلط، نبَّه عليه البيهقي، فقال:"ورواه بعض الرواة عن عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس وهو غلط لا شك فيه".
وأَعلَّ أيضًا رواية عمرو عن عوسجة، فإنه رواه مرسلا، ورجَّحه. وقال الذهبي:"هو نكرة".
قلت: لأنه مع ضعف إسناده فمتنه منكر؛ لأنه يخالف الحديث الصحيح المتفق عليه:"إنما الولاء لمن أعتق".
وقد اتفق أهل العلم على أن لا يكون المولى الأسفل وارثا من المولى الأعلى. ولذا سأل النبي صلى الله عليه وسلم، كما في بعض الروايات:"ابتغوا له وارثا" فلم يجدوا وارثا، فدل ذلك أن المولى الأسفل لم يكن وارثا له، فدفع النبي صلى الله عليه وسلم إياه تركته لم يكن لكونه وارثا له، وإنما صنع في هذا المال الذي لا مستحق له ما رآه مناسبا.
ولذا قال الترمذي:"والعمل عند أهل العلم في هذا الباب إذا مات الرجل، ولم يترك عصبة أن ميراثه يجعل في بيت مال المسلمين".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের একজন মুক্ত গোলাম একটি খেজুর গাছ থেকে পড়ে মারা গেল। সে সম্পদ রেখে গিয়েছিল, কিন্তু কোনো সন্তান বা নিকটাত্মীয় রেখে যায়নি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার মীরাস (উত্তরাধিকারের সম্পদ) তার গ্রামের একজন লোককে দিয়ে দাও।"
5934 - عن ابن عباس: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} قال: ورثة {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} كان المهاجرون لما قدموا المدينة يرث المهاجر الأنصاري دون ذوي رحمه للأخوة التي آخى النبي صلى الله عليه وسلم بينهم، فلما نزلت: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} نسخت. ثم قال: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} من النصر، والرفادة، والنصيحة، وقد ذهب الميراث، ويوصي له.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4580) عن الصلت بن محمد، حدثنا أبو أسامة، عن
إدريس، عن طلحة بن مصرف، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
قال البخاري:"سمع أبو أسامة إدريس، وسمع إدريس طلحة".
قلت: هكذا رواه أيضًا في الفرائض (6747) عن إسحاق بن إبراهيم قال: قلت لأبي أسامة: حدثكم إدريس، حدثنا طلحة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس قال: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} [سورة النساء: 33] قال: كان المهاجرون حين قدموا المدينة يرث الأنصاري المهاجري دون ذوي رحمه للأُخوة التي أخى النبي صلى الله عليه وسلم بينهم، فلما نزلت: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} قال: نسختها {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ}.
فقوله: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} أي والذين تحالفتموهم بالأيمان المؤكدة -أنتم، وهم- فآتوهم نصيبهم من الميراث، كما وعدتموهم في الأيمان المغلظة. وقد كان هذا في ابتداء الإسلام، ثم نسخ بعد ذلك.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী: "আর আমরা প্রত্যেকের জন্যই উত্তরাধিকারী নির্ধারণ করেছি" (সূরা আন-নিসা: ৩৩) এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন, এর অর্থ হলো: ওয়ারিসগণ। আর আল্লাহর বাণী: "আর যাদের সাথে তোমরা অঙ্গীকারবদ্ধ হয়েছ" (সূরা আন-নিসা: ৩৩) (এর বিধান ছিল এমন যে) মুহাজিরগণ যখন মদিনায় এসেছিলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে যে ভ্রাতৃত্বের বন্ধন স্থাপন করেছিলেন, তার কারণে একজন মুহাজির তার আনসার ভাইয়ের আত্মীয়-স্বজন থাকা সত্ত্বেও তার ওয়ারিস হতো। অতঃপর যখন এই আয়াত নাযিল হলো: "আর আমরা প্রত্যেকের জন্যই উত্তরাধিকারী নির্ধারণ করেছি", তখন (পূর্বের) সেই বিধান রহিত হয়ে গেল। এরপর তিনি বললেন: "(আয়াত) 'আর যাদের সাথে তোমরা অঙ্গীকারবদ্ধ হয়েছ' এর অর্থ হলো) সাহায্য, সমর্থন ও উপদেশ প্রদান করা। এখন মীরাসের (উত্তরাধিকারের) বিধান চলে গেছে, তবে তার জন্য অসিয়ত করা যাবে।
5935 - عن ابن عباس قال: {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ فَآتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ} [سورة النساء: 33] كان الرجل يحالف الرجل ليس بينهما نسب، فيرث أحدهما الآخر، فنسخ ذلك الأنفال. قال تعالى: {وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ} [الأنفال: 75].
حسن: رواه أبو داود (2921) عن أحمد بن محمد بن ثابت، حدثني علي بن حسين، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في علي بن حسين بن واقد المروزي؛ فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت ما ينكر عليه.
فالنسخ هو التوارث بالحلف، وأما التحالف على طاعة اللَّه ونصر المظلوم والمؤاخاة في اللَّه فهو أمر مرغوب، وقد جاء الأمر به في الأحاديث الكثيرة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ্র বাণী: “আর যাদের সাথে তোমাদের অঙ্গীকার সম্পাদিত হয়েছে, তাদেরকে তাদের অংশ দাও।” [সূরা নিসা: ৩৩] এর দ্বারা উদ্দেশ্য ছিল যে, কোনো ব্যক্তি এমন অন্য ব্যক্তির সাথে চুক্তিবদ্ধ হতো যার সাথে তার কোনো আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিল না, অতঃপর তাদের একজন অন্যজনের উত্তরাধিকারী হতো। এরপর সূরা আনফালের মাধ্যমে তা রহিত করা হয়। আল্লাহ তাআলা বলেন: “এবং আত্মীয়-স্বজনেরা একে অপরের অপেক্ষা ঘনিষ্ঠ।” [সূরা আনফাল: ৭৫]
(হাদীসটি হাসান। এটি আবূ দাউদ (২৯২১) আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু সাবিত থেকে, তিনি আলী ইবনু হুসাইন থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি ইয়াযীদ নাহবী থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এর সনদ হাসান কারণ আলী ইবনু হুসাইন ইবনু ওয়াকিদ মারওয়াযী সম্পর্কে কিছু কথা রয়েছে; যদিও তিনি মুুখতালাফ ফীহ (মতভেদপূর্ণ), তবে তার বিরুদ্ধে আপত্তিকর কিছু না থাকলে তার হাদীস হাসান হিসেবে গণ্য হয়। এই রহিতকরণটি হলো মৈত্রীচুক্তির মাধ্যমে উত্তরাধিকার লাভ করা। পক্ষান্তরে আল্লাহর আনুগত্য, মজলুমকে সাহায্য করা এবং আল্লাহ্র জন্য ভ্রাতৃত্বের অঙ্গীকার করা এমন বিষয়, যা পছন্দনীয় এবং অসংখ্য হাদীসে এর নির্দেশ এসেছে।)
5936 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ابن أخت القوم منهم، أو من أنفسهم".
متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6762) عن أبي الولد، حدثنا شعبة، عن قتادة، عن أنس فذكره.
ورواه مسلم في الزكاة (1059) من طريق آخر عن شعبة بإسناده قال: جمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الأنصار، فقال:"أفيكم أحد من غيركم؟". فقالوا: لا، إلا ابن أخت لنا. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن ابن أخت القوم منهم". ثم ذكر فضائل الأنصار، وهو مذكور في موضعه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো কওমের ভাগিনা তাদের অন্তর্ভুক্ত, অথবা তাদের নিজেদের মধ্যেরই একজন।"
5937 - عن وعن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ابن أخت القوم منهم".
حسن: رواه أبو داود (5122) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا أبو أسامة، عن عوف، عن زياد بن مخراق، عن أبي كنانة، عن أبي موسى فذكره.
ورواه أحمد (1954) من طريق عوف، وجاء فيه: قام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على باب بيت فيه نفر من قريش، فقال -وأخذ بعضادتي الباب-:"هل في البيت إلا قرشي؟" قال: فقيل: يا رسول اللَّه، غير فلان ابن أختنا. فقال:"ابن أخت القوم منهم".
قال: ثم قال:"إن هذا الأمر في قريش ما داموا إذا استرحموا رحموا، وإذا حكموا عدلوا، وإذا قسموا أقسطوا، فمن لم يفعل ذلك منهم فعليه لعنة اللَّه والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل".
وإسناده حسن من أجل أبي كنانة، فقد روى عنه اثنان كما في التهذيب، ولم يُنقل فيه جرحٌ، ولحديثه أصل ثابت.
وذكره الهيثمي في المجمع (5/ 193) وقال:"رواه أحمد والبزار والطبراني، ورجال أحمد ثقات".
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "গোত্রের ভাগ্নে তাদেরই একজন।"
(বর্ণনার অপর সূত্রে এসেছে যে) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি ঘরের দরজার সামনে দাঁড়ালেন যেখানে কুরাইশের কয়েকজন লোক ছিল। তিনি দরজার দুই পার্শ্ব ধরে বললেন: "এই ঘরে কি কুরাইশী ছাড়া অন্য কেউ আছে?" বর্ণনাকারী বলেন: তখন বলা হলো: ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমাদের ভাগ্নে অমুক ব্যক্তি ছাড়া (আর কেউ নেই)। তখন তিনি বললেন: "গোত্রের ভাগ্নে তাদেরই একজন।"
এরপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই কর্তৃত্ব কুরাইশদের মাঝেই থাকবে, যতক্ষণ পর্যন্ত তারা এই অবস্থায় থাকে যে, যখন তাদের কাছে দয়া চাওয়া হয়, তারা দয়া করে; যখন তারা বিচার করে, তখন ন্যায়পরায়ণতা অবলম্বন করে; এবং যখন তারা বন্টন করে, তখন সমতার সাথে বন্টন করে। তাদের মধ্যে যে ব্যক্তি এরূপ করবে না, তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতা এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ বর্ষিত হবে। তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কবুল করা হবে না।"
5938 - عن جبير بن مطعم قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: ابن الأخت منهم.
حسن: رواه الطبراني (2/ 142) عن محمد بن مندة الأصبهاني، ثنا أبو كريب، ثنا زكريا بن عدي، عن حاتم بن إسماعيل، عن الجُعيد بن عبد الرحمن، عن يزيد بن خصيفة، عن نافع بن جبير، عن أبيه فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (1/ 196):"رجاله رجال الصحيح".
وإسناده حسن من أجل حاتم بن إسماعيل فإنه صدوق صحيح الكتاب.
والجعيد بن عبد الرحمن هو الجعد بن عبد الرحمن بن أوس، وقد يُصغّر من رجال الشيخين.
وفي معناه ما روي عن رفاعة بن رافع الزرقي، رواه أحمد (18992، 18993، 18994)، والبخاري في الأدب المفرد (75)، والطبراني في الكبير (4547)، والحاكم (2/ 328، 4/ 73).
وفي طريقهم إسماعيل بن عبيد بن رفاعة"مجهول"، لم يرو عنه إلا ابن خُثيم، ولم يوثّقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات كعادته في ذكر المجاهيل فيه.
أحاديث الباب تدل على أن التوارث بالحلف والعقد ونحوهما نسخ بآية المواريث، فالذين جاء ذكرهم فيها هم الذين يرثون، ومن لم يكن له وارث منهم يرثه أولوا الأرحام، وهم الأقربون إلى الميت الذين لم يأت ذكرهم ولا ذكر أنصبائهم في آيات المواريث، وقد حدد العلماء بعض هؤلاء، وهم: أولاد البنات، والجد أبو الأم، وأولاد الأخت، وبنات الأخ، وبنات العم، والعم للأم، والعمة، والخال، والخالة، وذلك عند عدم وجود الورثة، ويدل على هذا أيضًا عموم قوله تعالى: {وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ} [الأنفال: 75]. وقوله تعالى: {لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ} [سورة النساء: 7]. والأقربون هم ذوو الأرحام.
وبهذا قال كثير من أهل العلم، منهم: عمر بن الخطاب، وعلي، وابن مسعود، وأبو الدرداء،
من الصحابة، وأحمد وأبو حنيفة من الفقهاء، والشعبي، ومسروق، والنخعي، والثوري، والقاسم ابن سلام، وإسحاق، والحسن بن زياد، وغيرهم من علماء الإسلام.
وذهب أبو بكر، وزيد بن ثابت، وابن عمر إلى أنه لا ميراث لهم، بل يجعل مال الميت الذي لم يخلف وارثًا إلى بيت المال، وبه قال مالك والشافعي. وحجتهم أن الذي لا يعقل لا يَرِث. وأما أحاديث الباب فإما أنها غير ثابتة، كما قال الشافعي، أو أنها مؤولة.
জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: বোনের পুত্র তাদের অন্তর্ভুক্ত।
5939 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: كتب عمر بن الخطاب إلى أبي عبيدة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اللَّه ورسوله مولى من لا مولى له، والخال وارث من لا وارث له".
حسن: رواه الترمذي (2103)، وابن ماجه (2737) كلاهما من حديث سفيان الثوري، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن حكيم بن حكيم بن عباد بن حنيف، عن أبي أمامة فذكره. ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (189)، والدارقطني (4/ 84 - 85)، والبيهقي (6/ 214)، وابن الجارود (964)، وصحّحه ابن حبان (6037).
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: بل هو حسن فقط؛ فإن عبد الرحمن بن الحارث مختلف فيه، فقال أبو حاتم: شيخ. وقال ابن معين: لا بأس به، ووثّقه العجلي، وابن حبان، وأخرج حديثه في صحيحه، وتكلم فيه علي بن المديني والنسائي، غير أنه حسن الحديث.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবূ উবাইদাহকে লিখে পাঠালেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল হলেন সেই ব্যক্তির অভিভাবক (মাওলা) যার কোনো অভিভাবক নেই। আর মামা হলেন সেই ব্যক্তির উত্তরাধিকারী যার কোনো উত্তরাধিকারী নেই।"
5940 - عن المقدام الكندي قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا أولى بكل مؤمن من نفسه، فمن ترك دينا أو ضيعة فإليَّ، ومن ترك مالا فلورثته، وأنا مولى من لا مولى له، أرث ماله، وأفك عانه. والخال مولى من لا مولى له، يرث ماله، ويفك عانه".
حسن: رواه أبو داود (2900)، وابن ماجه (2634) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن بديل بن ميسرة، عن علي بن أبي طلحة، عن راشد بن سعد، عن أبي عامر الهوزني، عن المقدام الشامي فذكره. واللفظ لأبي داود، واختصره ابن ماجه.
ومن هذا الطريق رواه الدارقطني (4/ 85 - 86)، وصحّحه الحاكم (4/ 344) على شرط الشيخين، والبيهقي (6/ 214). وتعقبه الذهبي، فقال:"علي بن أبي طلحة لم يخرج له البخاري، وقال أحمد: له أشياء منكرات".
قلت: هو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
ورواه شعبة عن بديل، وفيه:"الخال وارث من لا وارث له". رواه أبو داود (2899)، وابن ماجه (2738)، وصحّحه ابن حبان (6035)، وقد سمع ابن أبي حاتم أبا زرعة، وذكر حديث
المقدام بن معدي كرب، فقال:"حديث حسن"."العلل" (2/ 50).
إلا أن البيهقي أعله بالاضطراب، ونقل عن يحيى بن معين أنه يبطل حديث:"الخال وارث من لا وارث له". يعني حديث المقدام. وقال: ليس فيه حديث قوي. انتهى.
وقد عرفت من صحَّح هذا الحديث من الأئمة، أو حسَّنه، وهو المعتمد؛ فإن علي بن أبي طلحة مولى بني العباس حسن الحديث. قال أبو داود:"هو إن شاء اللَّه مستقيم الحديث، ولكن له رأي سوء". وقال النسائي:"ليس به بأس". وذكره ابن حبان في الثقات.
قال أبو داود:"رواه الزبيدي، عن راشد بن سعد، عن ابن عائذ، عن المقدام. ورواه معاوية ابن صالح، عن راشد قال: سمعت المقدام".
وحديث الزبيدي أخرجه ابن حبان (6036) من طريق عبد اللَّه بن سالم عنه قال: حدثنا راشد ابن سعد بإسناده، ولفظه:"من ترك دينا أو ضيعة فإلي، ومن ترك مالا فلورثته، وأنا مولى من لا مولى له، أفك عنه، وأرث ماله. والخال مولى من لا مولى له، يفك عنه، ويرث ماله".
والزبيدي هو محمد بن الوليد ثقة.
قال ابن حبان:"سمع هذا الخبر راشد بن سعد عن أبي عامر الهوزني، عن المقدام، وسمعه عن عبد الرحمن بن عائذ الأزدي عن المقدام بن معدي كرب، فالطريقان جميعا محفوظان، ومتناهما متباينان".
وأما حديث معاوية بن صالح -وهو ابن حدير الحمصي- فأخرجه أحمد (17199) عن حماد ابن خالد قال: حدثنا معاوية بن صالح بإسناده، ولفظه:"من ترك مالا فلورثته، ومن ترك دينا أو ضيعة فإلي، وأنا ولي من لا ولي له، أفك عنه، وأرث ماله. والخال ولي من لا ولي له، يفك عنه، ويرث ماله".
ورواه أيضًا (17200) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية بن صالح قال: سمعت راشد بن سعد يحدث عن المقدام بن معدي كرب قال فذكر مثله.
ورواه الطحاوي في مشكله (2750) من حديث أسد بن موسى، حدثنا معاوية بن صالح حدثني راشد بن سعد، أنه سمع المقدام بن معد يكرب فذكره.
وفيه التصريح بسماع راشد بن سعد من المقدام.
فلا سبيل إلى الجمع إلا أن نقول: لعله سمع أولا بالواسطة، ثم سمع بدونها؛ لأنه سمع ممن كان في أيامه من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قد سمع معاوية بن أبي سفيان وثوبان وغيرهما، وهذه ليست بعلة قادحة.
وقوله:"يفك عانه". وفي رواية:"يفك عنه". ومعناه أنه عاقلة يفك عنه أسره في الجنايات.
وأما ما روي عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الخال وارث من لا وارث له" فالصحيح
أنه موقوف.
رواه الترمذي (2104) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا أبو عاصم، عن ابن جريج، عن عمرو ابن مسلم، عن طاوس، عن عائشة فذكرته.
قال الترمذي:"حسن غريب. وقد أرسله بعضهم، ولم يذكر فيه عن عائشة".
قلت: وهو كما قال؛ فقد رواه الدارقطني (4/ 85)، والبيهقي (6/ 215) من طريق أبي عاصم، وشك أبو عاصم في رفعه.
وعمرو بن مسلم ليس بالقوي، كما قال أحمد، وابن معين.
قال البيهقي: وقد روي عن ابن طاوس مرسلا، ورجح الدارقطني وقفه.
ثم قال الترمذي:"واختلف فيه أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فورث بعضهم الخال والخالة والعمة. وإلى هذا الحديث ذهب أكثر أهل العلم في توريث ذوي الأرحام. وأما زيد بن ثابت فلم يورثهم، وجعل الميراث في بيت المال".
মিকদাম আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি প্রত্যেক মুমিনের কাছে তার নিজের থেকেও অধিক নিকটবর্তী। অতএব, যে ব্যক্তি কোনো ঋণ অথবা পরিবার-পরিজন (দায়িত্ব/দুর্বলতা) রেখে যায়, তবে তার দায় আমার উপর। আর যে ব্যক্তি সম্পদ রেখে যায়, তা তার উত্তরাধিকারীদের জন্য। আমি তার অভিভাবক যার কোনো অভিভাবক নেই; আমি তার সম্পদের উত্তরাধিকারী হই এবং তার দায়ভার মুক্ত করি। আর মামা (মাতুল) তার অভিভাবক যার কোনো অভিভাবক নেই; সে তার সম্পদের উত্তরাধিকারী হয় এবং তার দায়ভার মুক্ত করে।"
5941 - عن أسامة بن زيد أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرث المسلم الكافر، ولا الكافر المسلم".
متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6764) من طريق ابن جريج، ومسلم في الفرائض (1614) من حديث ابن عيينة، كلاهما عن ابن شهاب، عن علي بن حسين، عن عمرو بن عثمان، عن أسامة بن زيد فذكره.
وعمرو بن عثمان هو ابن الخليفة عثمان بن عفان ورواه مالك في الفرائض (10) عن ابن شهاب، عن علي بن حسين بن علي، عن عمر بن عثمان بن عفان، عن أسامة بن زيد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرث المسلم الكافر".
قلت: اقتصر مالك على قوله:"لا يرث المسلم الكافر" فيرى ابن عبد البر أن مالكا اقتصر على موضع الفقه الذي فيه التنازع، وعزف عن غيره، فلم يقل:"ولا الكافر المسلم"؛ لأن الكافر لا يرث المسلم بإجماع المسلمين، فلم يحتج إلى هذه اللفظة مالك. الاستذكار (15/ 490).
قلت: لعل هذا التصرف من يحيى الراوي عن مالك، وإلا فقد رواه الشافعي في الأم (4/ 72) عنه، فذكر الجزأين من الحديث. فالظاهر أن الاقتصار ليس من مالك.
وكذلك قال فيه: عن عمرو بن عثمان بن عفان.
في نسخة يحيى: عمر بن عثمان بن عفان. فقال ابن عبد البر:"ممن قال في هذا الحديث:"عمرو ابن عثمان" معمر وابن عيينة وابن جريج وعقل وشعيب والأوزاعي، وهؤلاء الجماعة أئمة حفاظ، وهم أولي أن يُسَلَّم لهم ويُصَوَّب قولهم، ومالك حافظ الدنيا، ولكن الغلط لا يسلم منه أحد".
ولكن الظاهر من روايات أخرى عن مالك أنه"عمرو بن عثمان". هكذا ذكره الشافعي، وأبو مصعب، وابن وهب، ومعن، وابن القاسم، ويحيى بن يحيى الأندلسي، كما في مسند الموطأ للجوهري (ص 200).
فيبدو أن مالكا كان يرى أولا أنه عمر بن عثمان، فقد قال يونس: قيل لمالك: عمرو. فقال:"هو عمر، ونحن أعلم به، وهذا منزله". ذكره الجوهري في مسند الموطأ، ولكن لما نبه إلى أنه عمرو بن عثمان، رجع إلى ذلك، فهؤلاء الذين سبق ذكرهم قالوا في روايته عنه:"عمرو بن عثمان". وهو الصحيح.
উসামা ইবনে যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘মুসলিম কাফেরের উত্তরাধিকারী হবে না, আর কাফেরও মুসলিমের উত্তরাধিকারী হবে না।’
5942 - عن أسامة بن زيد أنه قال: يا رسول اللَّه، أين تنزل في دارك بمكة؟ فقال:"هل ترك عقيل من رباع أو دور؟". وكان عقيل ورث أبا طالب هو وطالب، ولم برئه جعفر ولا علي شيئًا؛ لأنهما كانا مسلمين، وكان عقيل وطالب كافرين.
فكان عمر بن الخطاب يقول:"لا يرث المؤمن الكافر".
قال ابن شهاب: وكانوا يتأولون قول اللَّه تعالى: {إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آوَوْا وَنَصَرُوا أُولَئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ} [سورة الأنفال: 72].
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1588)، ومسلم في الحج (1351) كلاهما من حديث ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، عن علي بن حسين، عن عمرو بن عثمان، عن أسامة بن زيد فذكره.
أبو طالب بن عبد المطلب وُلِد له أربعة أولاد، وهم علي بن أبي طالب، وجعفر بن أبي طالب، وعقيل بن أبي طالب، وطالب بن أبي طالب، فآمن منهم ثلاثة، وهم علي، وجعفر، وعقيل، ولم يؤمن طالب، وقد استكرهه قريش على الخروج إلى غزوة بدر، يقال: إنه مات، ولا عقب له، ولا يعرف عنه شيء أكثر من هذا. انظر تاريخ دمشق (41/ 8).
والعمل عند عامة أهل العلم من الصحابة والتابعين فمن بعدهم أن الكافر لا يرث المسلم، والمسلم لا يرث الكافر لقطع الولاية بينهما، إلا ما روي عن معاذ بإسناد ضعيف، وهو الآتي.
حدثنا عبد اللَّه بن بريدة. وفي قوله:"أن رجلا حدثه أن معاذا حدثه" فيه رجل لم يسم.
ورواه أيضًا (2913) عن مسدد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن عمرو بن أبي حكيم، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن يحيى بن يعمر، عن أبي الأسود الديلي أن معاذا أتى بميراث يهودي وارثه مسلم بمعناه عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وفيه انقطاع؛ فإن أبا الأسود لم يسمع من معاذ.
উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি মক্কায় আপনার বাড়িতে কোথায় অবস্থান করবেন? তিনি বললেন: আকীল কি কোনো জমি বা বাড়ি অবশিষ্ট রেখেছে?
আকীল এবং তালিব আবূ তালিবের উত্তরাধিকারী হয়েছিল। কিন্তু জা‘ফর ও আলী তাঁর (সম্পত্তির) অংশ পাননি, কেননা তারা দু’জন ছিলেন মুসলিম, আর আকীল ও তালিব ছিল কাফির।
এই কারণে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: মুসলিম ব্যক্তি কাফিরের উত্তরাধিকারী হতে পারে না।
ইবনু শিহাব বলেন, তাঁরা আল্লাহর এই বাণী দ্বারা এই বিধানের ব্যাখ্যা করতেন: “নিশ্চয় যারা ঈমান এনেছে, হিজরত করেছে এবং নিজেদের সম্পদ ও জীবন দ্বারা আল্লাহর পথে জিহাদ করেছে এবং যারা আশ্রয় দিয়েছে ও সাহায্য করেছে, তারা পরস্পর পরস্পরের অভিভাবক।” [সূরা আল-আনফাল: ৭২]
সাহাবী, তাবিঈন এবং পরবর্তী যুগের সাধারণ আলিমদের আমল হলো—কাফির মুসলিমের উত্তরাধিকারী হবে না এবং মুসলিমও কাফিরের উত্তরাধিকারী হবে না; কেননা তাদের মধ্যে অভিভাবকত্ব ছিন্ন হয়ে যায়।
[এরপর বর্ণনাকারী মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কিত একটি দুর্বল সূত্র উল্লেখ করেছেন, যেখানে তিনি একজন ইহুদীর উত্তরাধিকারী হওয়া মুসলিম ব্যক্তির প্রসঙ্গে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে একটি অনুরূপ বর্ণনা এনেছেন।]
5943 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد اللَّه بن عمرو قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يتوارث أهل ملتين شتى".
حسن: رواه أبو داود (2911) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب بإسناده.
ورواه الإمام أحمد (6664)، والبيهقي (6/ 218) كلاهما من حديث سفيان، عن يعقوب بن عطاء وغيره، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله.
ويعقوب بن عطاء هو ابن أبي رباح المكي، ضعَّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي. وقال أحمد:"منكر الحديث". إلا أنه لم ينفرد به، فقد تابعه غيره، كما قال أحمد في الإسناد المذكور، وهو كما قال؛ فقد رواه أبو داود عن حبيب المعلم، عن عمرو. ورواه ابن ماجه (2731) عن محمد بن رمح قال: أنبأنا ابن لهيعة، عن خالد بن زيد، أن المثنى بن الصباح أخبره عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله. وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أنه توبع هنا.
والخلاصة أن إسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وأما ما روي عن عمرو بن شعيب قال: أخبرني أبي، عن جدي عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قام يوم فتح مكة، فقال:"لا يتوارث أهل ملتين، والمرأة ترث من دية زوجها وماله، وهو يرث من ديتها ومالها ما لم يقتل أحدهما صاحبه عمدا، فإن قتل أحدهما صاحبه عمدا لم ترث من ديته وماله شيئًا، وإن قتل صاحبه خطأ ورث من ماله، ولم ترث من ديته" فهو ضعيف.
رواه الدارقطني (4/ 72 - 73) عن محمد بن جعفر المطيري، نا إسماعيل بن عبد اللَّه بن ميمون، نا عبيد اللَّه بن موسى، نا حسن بن صالح، عن محمد بن سعيد، عن عمرو بن شعيب، أخبرني أبي، عن جدي عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قام فذكره.
وقال: محمد بن سعيد الطائفي ثقة.
ولكن رواه ابن ماجه (2736) عن علي بن محمد، ومحمد بن يحيى قالا: حدثنا عبيد اللَّه بن موسى، عن الحسن بن صالح، عن محمد بن سعيد. وقال محمد بن يحيى: عن عمر بن سعيد،
عن عمرو بن شعيب بإسناده.
ورواه أيضًا ابن الجارود (967) عن محمد بن يحيى قال: حدثنا عبيد اللَّه بن موسى قال: أنا الحسن بن صالح، عن عمر بن سعيد، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله. وكذا رواه أيضًا الدارقطني عقب الرواية الأولى، ولكنه حذف الإسناد بعد الحسن بن صالح، فقال: بإسناده مثله. أي عن محمد بن سعيد، عن عمرو بن شعيب.
وقال:"ومحمد بن سعيد الطائفي ثقة".
فهل محمد بن سعيد هو عمر بن سعيد نفسه، أو هما رجلان؟
فمن ذهب إلى أنهما واحد ضعفوا هذا الإسناد، وقالوا: محمد بن سعيد هو ابن حسان بن قيس الأسدي الشامي المصلوب كذبوه؛ فإن من رواته الحسن بن صالح بن حيي.
ومن ذهب إلى أنهما اثنان فقالوا: محمد بن سعيد هو الطائفي، وثّقه الدارقطني، وقال غيره: حسن الحديث. ولكن لم يذكر المزي من الرواة عنه الحسن بن صالح، ولا في شيوخه عمرو بن شعيب.
والذي يغلب على الظن أنه المصلوب.
ولذا قال الذهبي:"هذا خبر منكر". انظر"التنقيح" له (7/ 69).
وكذا ضعَّفه أبو محمد بن حزم في كتاب الفرائض له، كما قال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 259).
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না।"
5944 - عن عائشة قالت: وجدت في قائم سيف رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كتابا:"إن أشد الناس عتوا من ضرب غير ضاربه، ورجل قتل غير قاتله، ورجل تولى غير أهل نعمته، فمن فعل ذلك فقد كفر باللَّه ورسوله، لا يقبل اللَّه منه صرفا ولا عدلا، وفي الأجر المؤمنون تكافأ دماؤهم، ويسعى بذمتهم أدناهم. لا يقتل مسلم بكافر، ولا ذو عهد في عهده، ولا يتوارث أهل ملتين، ولا تنكح المرأة على عمتها ولا على خالتها، ولا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا تسافر امرأة ثلاث ليال مع غير ذي محرم".
حسن: رواه أبو يعلى (4757) عن أبي خيثمة، حدثنا عبيد اللَّه بن عبد المجيد، حدثنا عبد اللَّه ابن عبد الرحمن بن موهب، قال: سمعت مالك بن محمد بن عبد الرحمن، قال: سمعت عمرة بنت عبد الرحمن، تحدث عن عائشة، فذكرته.
ورواه أيضًا الدارقطني (3/ 131)، والبيهقي (8/ 29 - 30) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن عبد المجيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل مالك بن محمد أبي رجال، سئل الدارقطني عنه، فقال: صالح."سؤالات البرقاني" (498)، وهو أخو حارثة بن أبي الرجال، وعبد الرحمن بن أبي الرجال
وإخوانه اشتهروا بكنية أبيهم.
قال أبو حاتم: مالك أحسن حالا من إخوته.
وذكره ابن حبان في الثقات (9/ 164)، وهو من رجال"التعجيل".
وعبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن موهب مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وفي الباب عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يتوارث أهل ملتين".
رواه الترمذي (2108) عن حميد بن مسعدة، حدثنا حصين بن نمير، عن ابن أبي ليلى، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب، لا نعرفه من حديث جابر إلا من حديث ابن أبي ليلى".
قلت: ليس كما قال الترمذي، بل رواه أيضًا ابن جريج عن أبي الزبير، وبإسناده رواه الدارقطني (4/ 74)، والحاكم (4/ 345) من حديث محمد بن عمرو عنه، ولفظه:"لا يرث المسلم النصراني إلا أن يكون عبده وأمته".
قال الحاكم:"محمد بن عمرو هذا هو اليافعي من أهل مصر، صدوق، والحديث صحيح؛ فإن الأصل فيه حديث عمرو بن شعيب".
ولكن محمد بن عمرو اليافعي وصف بأنه صدوق له أوهام، وقد خالف عبد الرزاق الذي رواه عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير، عن جابر فذكره موقوفا عليه. رواه الدارقطني من طريقه، وقال:"هو المحفوظ".
وفي الباب أيضًا عن ابن عمر مرفوعا:"لا يتوارث أهل ملتين". رواه ابن حبان في سياق طويل (5996)، وفيه سنان بن الحارث بن مصرف، ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 254)، ولم يقل فيه شيئًا. وذكره ابن حبان في الثقات (6/ 424).
وذهب جماعة إلى هذه الأحاديث، فقالوا: إن اختلاف المال في الكفر يمنع التوارث، فلا يرث اليهودي النصراني، ولا النصراني المجوسي. يروى ذلك عن عمر، وهو قول الزهري، والأوزاعي، وابن أبي ليلى، وأحمد، وإسحاق. واحتجوا بحديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، وغيره كما مضى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তলোয়ারের হাতলে একটি লেখা পেলাম: "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সীমালঙ্ঘনকারী (হতভাগ্য) হলো সেই ব্যক্তি, যে তার আঘাতকারীর পরিবর্তে অন্য কাউকে আঘাত করে; আর সেই ব্যক্তি, যে তার হত্যাকারীর পরিবর্তে অন্য কাউকে হত্যা করে; আর সেই ব্যক্তি, যে তার অনুগ্রহের পাত্র নয়, তাকে আপন করে নেয়। যে ব্যক্তি এসব কাজ করে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি কুফরী করে। আল্লাহ তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কবুল করবেন না। আর (ইহকালের) প্রতিদান হলো, মুমিনদের রক্ত একই সমমানের, এবং তাদের মধ্যে নিম্নপদস্থ ব্যক্তিও তাদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা প্রদান করতে পারে। কোনো মুসলমানকে কোনো কাফেরের (বদলে) হত্যা করা হবে না এবং চুক্তিবদ্ধ অবস্থায় চুক্তিতে আবদ্ধ কাউকে হত্যা করা হবে না। আর দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না। আর কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর বা তার খালার উপর (একই সাথে) বিবাহ করা যাবে না। আর সূর্য ডোবা পর্যন্ত আসরের পর কোনো সালাত (নামাজ) নেই। আর কোনো নারী মাহরাম ছাড়া তিন রাতের দূরত্বে সফর করবে না।"
5945 - عن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس للقاتل شيء".
حسن: رواه مالك (2/ 867) عن يحيى بن سعيد، عن عمرو بن شعيب أن رجلا من بني مُدْلج، يقال له: قتادة، حذف ابنه بسيف، فأصاب ساقه، فتزي في جرحه، فمات، فقدم سراقة بن جعشم على عمر بن الخطاب، فذكر ذلك له، فقال عمر بن الخطاب: اعْدُد لي على ماء قديد عشرين ومائة بعير
حتى أقدم عليك، فلما قدم عليه عمر أخذ من تلك الإبل ثلاثين حقة، وثلاثين جذعة، وأربعين خلفة، ثم قال: أين أخو المقتول؟ فقال: ها أنا ذا. فقال: خذها؛ فإن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال فذكر الحديث.
وعمرو بن شعيب لم يدرك عمر بن الخطاب فقيه انقطاع، ولكن جاء موصولا من طريق محمد ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: نحلت لرجل من بني مدلج جارية، فأصاب منها ابنا، فكان يستخدمها، فلما شب الغلام دعاها يوما، فقال: اصنعي كذا وكذا. فقال: لا تأتيك حتى متى تستأمي أمي؟ قال: فغضب، فحذفه بسيفه، فأصاب رجله، فنزف الغلام، فمات، فانطلق في رهط من قومه إلى عمر، فقال: يا عدو نفسه، أنت الذي قتلت ابنك لولا أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقاد الأب من ابنه" لقتلتك. هلم ديته، قال: فأتاه بعشرين أو ثلاثين ومائة بعير، قال: فخير منها مائة، فدفعها إلى ورثته، وترك أباه.
رواه ابن الجارود (788)، والدارقطني (3/ 140)، والبيهقي (8/ 38) كلهم من حديث محمد ابن واره -يعني محمد بن مسلم-، نا محمد بن سعيد، نا عمرو بن أبي قيس، عن منصور، عن محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده. واللفظ لابن الجارود، والبيهقي.
وأما الدارقطني فاختصره على قوله:"لا يقاد الأب من ابنه".
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وقال البيهقي في"المعرفة" (12/ 40): وإسناده صحيح.
قلت: محمد بن عجلان صدوق، وتابعه الحجاج بن أرطاة في قوله:"لا يقتل والد بولده". رواه الترمذي (1400)، وابن ماجه (2662)، وأحمد (346)، والبيهقي وغيرهم كلهم من طريق الحجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قتل رجل ابنه عمدا، فرفع إلى عمر بن الخطاب، فجعل عليه مائة من الإبل إلى أن قال: ولولا أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقتل والد بولده" لقتلتك. والحجاج بن أرطاة مدلس، وقد عنعن، وتابعه أيضًا ابن لهيعة فقال: حدثنا عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقاد والد من ولد". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يرث المال من يرث الولاء".
رواه الإمام أحمد (147) عن أبي سعيد، حدثنا عبد اللَّه بن لهيعة بإسناده.
وبمجموع هذه الأسانيد يكون الحديث حسنا.
وأما ما رواه الدارقطني (4/ 96) من طريق إسماعيل بن عياش، عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس للقاتل من الميراث شيء". فهو خطأ. أخطأ فيه إسماعيل بن عياش، فإنه يخطئ في روايته عن غير الشامين، وهذا منها، والصواب فيه ما رواه مالك، عن يحيى بن سعيد، عن عمرو بن شعيب، عن عمر فذكر الحديث. كما قال النسائي. وكذلك لا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ليس
لقاتل ميراث" فإنه ضعيف.
رواه الدارقطني (4/ 95) من طريق محمد بن سليمان بن أبي داود، نا عبد اللَّه بن جعفر، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن عمر بن الخطاب فذكره. ومحمد بن سليمان بن أبي داود قال فيه أبو حاتم الرازي:"منكر الحديث". الجرح والتعديل (7/ 267).
وقال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 257):"هذا إسناد لا يثبت، وهو غير مخرج في شيء من السنن، والصواب ما تقدم من رواية مالك، عن يحيى بن سعيد".
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"القاتل لا يرث". رواه الترمذي (2109)، وابن ماجه (2645، 2735)، والدارقطني (4/ 96) كلهم من طريق إسحاق بن عبد اللَّه ابن أبي فروة، عن الزهري، عن حميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث لا يصح، لا يعرف إلا من هذا الوجه، وإسحاق بن عبد اللَّه بن أبي فروة، قد تركه بعض أهل العلم، منهم أحمد بن حنبل". انتهى.
قلت: وكذلك تركه أيضًا: البخاري، وابن معين، وأبو زرعة، وأبو حاتم، والنسائي، والدارقطني، وغيرهم. فقول الترمذي:"تركه بعض أهل العلم" لا معنى له، بل تركهـ جمهور أهل العلم.
ثم قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم أن القاتل لا يرث، كان القتلُ عمدًا أو خطأ. وقال بعضهم: إذا كان القتل خطأ، فإنه يرثه، وهو قول مالك".
قلت: قول عامة أهل العلم أن من قتل مورثه لا يرث، عمدًا كان القتل أو خطأً.
وخالفهم مالك فقال: قتل الخطأ لا يمنع من الميراث؛ لأنه غير منهم فيه، إلا أنه لا يرث من ديته شيئًا. لعل من عمدته حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد اللَّه بن عمرو، وفيه:"إن قتل أحدهما صاحبه عمدًا لم يرث من دينه وماله شيئًا، وإن قتل صاحبه خطأ ورث من ماله، ولم ترث من ديته". رواه الدارقطني (4/ 72 - 73): وفيه سعيد الشامي المصلوب ضعيف جدا، وقال الذهبي:"هذا خبر منكر".
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হত্যাকারীর জন্য কিছুই নেই।"
5946 - عن ابن عباس قال: كان المال للولد، وكانت الوصية للوالدين، فنسخ اللَّه من ذلك ما أحب، فجعل للذكر مثل حظ الأنثيين، وجعل للأبوين لكل واحد منهما السدس، وجعل للمرأة الثمن والربع، وللزوج الشطر والربع.
صحيح: أخرجه البخاري في الفرائض (6739) عن محمد بن يوسف، عن ورقاء، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সম্পদ সন্তানের জন্য ছিল এবং অসিয়ত ছিল পিতামাতার জন্য। অতঃপর আল্লাহ তাআলা এর থেকে যা ইচ্ছা তা রহিত করে দিলেন। সুতরাং তিনি পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান অংশ নির্ধারণ করলেন, আর তিনি পিতা-মাতা উভয়ের প্রত্যেকের জন্য এক-ষষ্ঠাংশ (১/৬) নির্ধারণ করলেন, আর নারীর (স্ত্রীর) জন্য অষ্টম অংশ (১/৮) ও চতুর্থ অংশ (১/৪) নির্ধারণ করলেন, এবং স্বামীর জন্য অর্ধেক (১/২) ও চতুর্থ অংশ (১/৪) নির্ধারণ করলেন।
5947 - عن تميم الداري قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الرجل يسلم على يدي الرجل. فقال:"هو أولى الناس بمحياه ومماته".
صحيح: رواه الطحاوي في مشكله (2852)، والدارمي (3076)، والبيهقي (10/ 296) كلهم من حديث أبي نعيم، حدثنا عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد اللَّه بن موهب قال: سمعت تميما الداري فذكره.
ورواه ابن ماجه (2752) عن أبي بكر بن أبي شيبة -وهو في مصنفه (11/ 408) - قال: حدثنا وكيع، عن عبد العزيز بن عمر بإسناده مثله.
ورواه الترمذي (2112) من طريق أبي أسامة وابن نمير ووكيع، كلهم عن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد اللَّه بن موهب. وقال بعضهم: عن عبد اللَّه بن موهب، عن تميم الداري قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه أبو داود (2918) عن يزيد بن خالد بن موهبة الرملي وهشام بن عمار قالا: حدثنا يحيى -قال أبو داود: وهو ابن حمزة-، عن عبد العزيز بن عمر قال: سمعت عبد اللَّه بن موهب يحدث عمر بن عبد العزيز، عن قبيصة بن ذؤيب - قال هشام: عن تميم الداري أنه قال: يا رسول اللَّه. وقال يزيد: أن تميما قال يا رسول اللَّه، ما السنة في رجل يسلم على يدي الرجل من المسلمين؟ قال:"هو أولى الناس بمحياه ومماته".
ومن طريق هشام بن عمار رواه أيضًا الطحاوي في مشكله (2854).
وهشام بن عمار ضعيف إلا أنه توبع، تابعه يزيد بن خالد.
ورواه الطحاوي أيضًا (2853)، والحاكم (2/ 219) من طريق عبد الأعلى بن مسهر الغساني، حدثنا يحيى بن حمزة الحضرمي قال: حدثني عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد اللَّه بن موهب، عن قبيصة بن ذؤيب، عن تميم الداري قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله.
قال الحاكم بعد أن رواه من حديث عبد اللَّه بن وهب، عن تميم:"هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يخرجاه، وعبد اللَّه بن وهب بن زمعة مشهور، وشاهده عن تميم الداري حديث قبيصة بن ذؤيب". ثم رواه من طريقه.
ولكن قال الشافعي:"هذا الحديث ليس بثابت، إنما يرويه عبد العزيز بن عمر، عن ابن موهب، عن تميم الداري، وابن موهب ليس بمعروف عندنا، ولا نعلمه لقي تميما، ومثل هذا لا
يثبت عندنا ولا عندك من قبل أنه مجهول، ولا أعلمه متصلا".
قال يعقوب بن سفيان: هذا خطأ، ابن موهب لم يسمع من تميم، ولا لحقه. ذكره البيهقي.
وقال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن موهب. ويقال: ابن وهب، عن تميم الداري، وقد أدخل بعضهم بين عبد اللَّه بن وهب وبين تميم الداري"قبيصة بن ذؤيب"، ولا يصح، رواه يحيى بن حمزة، عن عبد العزيز بن عمر، وزاد فيه:"قبيصة بن ذؤيب".
والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم، وهو عندي ليس بمتصل. وقال بعضهم: يجعل ميراثه في بيت المال، وهو قول الشافعي: واحتج بحديث النبي صلى الله عليه وسلم:"إنما الولاء لمن أعتق". انتهى قول الترمذي.
وذكر البخاري في كتاب الفرائض:"باب إذا أسلم على يديه الرجل، كان الحسن لا يرى له ولاية.
ويذكر عن تميم الداري رفعه قال:"هو أولى الناس بمحياه ومماته".
واختلفوا في صحة هذا الخبر". انتهى كلام البخاري.
هذا هو الصحيح بأن الناس اختلفوا في صحة هذا الخبر إلا أن البخاري جزم في"التاريخ" (5/ 199) بأنه لا يصح لمعارضته حديث"إنما الولاء لمن أعتق".
قال ابن حجر في"الفتح" (12/ 47):"ويؤخذ منه أنه لو صح سنده لما قاوم هذا الحديث، وعلى التنزل فتردد في الجمع هل يخص عموم الحديث المتفق على صحته بهذا، فيستثنى منه من أسلم، أو تؤول الأولوية في قوله:"أولى الناس" بمعنى النصرة والمعاونة وما أشبه ذلك لا بالميراث، ويبقى الحديث المتفق على صحته على عمومه. جنح الجمهور إلى الثاني، ورجحانه ظاهر". انتهى.
أي بعد صحة الخبر، وعدم معارضته لحديث"إنما الولاء لمن أعتق". وقد صحح هذا الخبر أبو زرعة الدمشقي، ويعقوب بن سفيان، والحاكم، وغيرهم.
وقال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (4/ 186):"وحديث تميم -وإن لم يكن في رتبة الصحيح- فلا ينحط عن أدنى درجات الحسن، وقد عضده المرسل (وهو يقصد به مرسل سعيد بن المسيب)، وقضاء عمر بن الخطاب وعمر بن عبد العزيز برواية الفرائض، وإنما يقتضي تقديم الأقارب عليه، ولا يدل على عدم توريثه إذا لم يكن له نسب".
وقال:"وبهذا الحديث قال إسحاق بن راهويه، وأحمد بن حنبل في إحدى الروايتين عنه، وطاوس، وربيعة، والليث بن سعد، وهو قول عمر بن الخطاب، وعمر بن عبد العزيز". انتهى قوله.
وفي مصنف ابن أبي شيبة عن عبد السلام بن حرب، عن خصيف، عن مجاهد أن رجلا أتى عمر، فقال: إن رجلا أسلم على يدي، وترك ألف درهم، فتحرجت منها، فقال: أرأيت لو جنى جناية على من تكون؟ قال: علي. قال: فميراثه لك.
قلت: وبه قال شريح.
وبه قال الحنفية إلا أنهم اشترطوا المحالفة.
وقال الطحاوي:"وقال بهذا الحديث عمر بن عبد العزيز، فإنه قضى بذلك في رجل أسلم على يدي رجل مسلم، فمات، وترك مالا وابنة. فأعطى البنت النصف، والذي أسلم على يديه البقية، ومنهم ربيعة بن أبي عبد الرحمن، وسعيد بن المسيب.
وذهب آخرون -وهم أكثر العلماء سواهم- إلى أن إسلام الرجل على يدي الرجل لا يوجب له ولاءه حتى يواليه بعد ذلك، فيكون بذلك مولاه، كما يكون مولاه لو والاه، ولم يكن أسلم على يديه قبل هذا، وهذا مذهب الكوفيين، وقد روي هذا القول عن ابن شهاب الزهري أنه سئل عن رجل أسلم، فوالى رجلا هل بذلك بأس؟ فقال: لا بأس به. قد أجاز ذلك عمر بن الخطاب". الطحاوي في مشكله (7/ 282 - 283).
وقال ابن التركماني في الجوهر النقي (10/ 297 - 298):"وفي التهذيب لابن جرير الطبري: وروى خصيف، عن مجاهد قال: جاء رجل إلى عمر، فقال: إن رجلا أسلم على يدي، ومات، وترك ألف درهم، فلمن ميراثه؟ قال: أرأيت لو جنى جناية من كان يعقل عنه؟ قال: أنا. قال: فميراثه لك. ورواه مسروق، عن ابن مسعود. وقاله إبراهيم، وابن المسيب، والحسن، ومكحول، وعمر بن عبد العزيز. وفي الاستذكار: هو قول أبي حنيفة وصاحبيه وربيعة. وقال يحيى بن سعيد في الكافر الحربي: إذا أسلم على يد مسلم. وروي عن عمر، وعثمان، وعلي، وابن مسعود أنهم أجازوا الموالاة، وورثوا بها. وقال الليث. وعن عطاء والزهري ومكحول نحوه. وعن ابن المسيب: أيما رجل أسلم على يديه رجل فعقل عنه ورثه، وإن لم يعقل عنه لم يرثه. وقال به طائفة.
وعند أبي حنيفة وأصحابه: إذا أسلم على يديه ولم يعقل عنه ولم يواله لم يرثه ولم يعقل عنه، وإن والاه على أن يعقل عنه ويرثه ورِثه وعقل عنه. وهو قول الحكم، وحماد، وإبراهيم. وهذا كله إذا لم تكن له عصبة". انتهى قول ابن التركماني
ويظهر من هذا الكلام أن الحديث كان معمولا به في القرنين الأول والثاني، ولم يختلف فيه أحد، وإنما وقع الخلاف في أوائل القرن الثالث، ولعل الشافعي هو أول من تكلم فيه، ورده سندا ومتنا.
وأما ما روي عن عمرو بن العاص أنه أتى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال: إن رجلا أسلم على يدي، وله مال وقد مات. قال:"فلك ميراثه". ففيه رجل مجهول لم يتنبه إليه الحافظ الهيثمي.
رواه إسحاق بن راهويه في مسنده: حدثنا بقية بن الوليد، حدثني كثير بن مرة النهراني، ثنا شيخ من باهلة، عن عمرو بن العاص فذكره. ومن طريق إسحاق رواه الطبراني في معجمه، كما في نصب الراية (4/ 158).
قلت: وفي الإسناد رجل مجهول، وهو شيخ من باهلة.
وأما قول الهيثمي في المجمع (4/ 232):"من رواية بقية قال: حدثني كثير بن مرة، فإن كان سمع منه فالحديث صحيح". فليس بصحيح لوجود رجل مجهول في الإسناد.
তামীম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম সেই ব্যক্তি সম্পর্কে যে অন্য কোনো ব্যক্তির হাতে ইসলাম গ্রহণ করে। তিনি বললেন: "সে (যার হাতে ইসলাম গ্রহণ করেছে) তার (ইসলাম গ্রহণকারী) জীবিতাবস্থায় এবং মৃতাবস্থায় সকল মানুষের চেয়ে বেশি হকদার।"
