আল-জামি` আল-কামিল
5948 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: جاءت امرأة سعد بن الربيع بابنتي سعد إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول اللَّه، هاتان ابنتا سعد، قتل معك يوم أحد، وإن عمهما أخذ جميع ما ترك أبوهما، وإن المرأة لا تنكح إلا على مالها، فسكت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى أنزلت آية الميراث، فدعا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أخا سعد بن الربيع، فقال:"أعط ابتي سعد ثلثي ماله، وأعط امرأته الثمن، وخذ أنت ما بقي".
حسن: رواه ابن ماجه (2720) من حديث سفيان بن عيينة، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وكذلك رواه عبيد اللَّه بن عمرو الرقي، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، ومن طريقه رواه الترمذي (2092)، وأحمد (14798)، والحاكم (4/ 333 - 334).
قال الترمذي:"هذا حديث صحيح لا نعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، وقد رواه شريك أيضًا، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل".
قلت: الصواب أنه حسن من أجل الكلام في عبد اللَّه بن محمد بن عقيل إلا أنه حسن الحديث. وقد نقل المنذري عن الترمذي تحسينه، وهو أصح.
وأما ما رواه أبو داود (2891) من حديث بشر بن المفضل، حدثنا عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد اللَّه قال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى جئنا امرأة من الأنصار في الأسواق، فجاءت المرأة بابنتين لها، فقالت: يا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، هاتان بنتا ثابت بن قيس قتل معك يوم أحد، وقد استفاء عمهما مالهما وميراثهما كله، فلم يدع لهما مالا إلا أخذه، فما تري يا رسول اللَّه؟ فواللَّه لا تنكحان أبدا إلا ولهما مال.
فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يقضي اللَّه في ذلك". قال: ونزلت سورة النساء: {يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ} الآية. [سورة النساء: 11] فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ادعوا لي المرأة وصاحبها". فقال لعمهما:"أعطهما الثلثين، وأعط أمهما الثمن، وما بقي فلك". فهو خطأ، أخطأ فيه بشر كما قال أبو داود، وإنما هما ابنتا سعد بن الربيع، وثابت بن قيس قتل يوم اليمامة. وكذلك قال البيهقي والخطابي وغيرهما. والصحيح أنهما ابنتا سعد بن الربيع.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনু রাবী‘-এর স্ত্রী সা'দ-এর দুই কন্যাকে নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এলেন, এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! এ দু’জন সা'দ-এর কন্যা। সে উহুদের যুদ্ধে আপনার সাথে শহীদ হয়েছে। আর তাদের চাচা তাদের পিতা যা কিছু রেখে গেছেন, তার সবই নিয়ে নিয়েছে। অথচ সম্পদ না থাকলে মেয়েদের বিবাহ দেওয়া যায় না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নীরব রইলেন, যতক্ষণ না মীরাসের আয়াত নাযিল হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সা'দ ইবনু রাবী‘-এর ভাইকে ডাকলেন, এবং বললেন, "সা'দ-এর দুই কন্যাকে তার সম্পদের দুই-তৃতীয়াংশ দাও, তার স্ত্রীকে দাও এক-অষ্টমাংশ এবং যা অবশিষ্ট থাকে তা তুমি নাও।"
5949 - عن قبيصة بن ذؤيب أنه قال: جاءت الجدة إلى أبي بكر الصديق تسأله ميراثها، فقال: ما لك في كتاب اللَّه تعالى شيء، وما علمت لك في سنة نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا، فارجعي حتى أسأل الناس، فسأل الناس، فقال المغيرة بن شعبة: حضرت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أعطاها السدس. فقال أبو بكر: هل معك غيرك؟ فقام محمد بن مسلمة، فقال مثل ما قال المغيرة بن شعبة، فأنفذه لها أبو بكر.
ثم جاءت الجدة الأخرى إلى عمر بن الخطاب تسأله ميراثها، فقال: ما لك في كتاب اللَّه تعالى شيء، وما كان القضاء الذي قضي به إلا لغيرك، وما أنا بزائد في الفرائض، ولكن هو ذلك السدس، فإن اجتمعتما فهو بينكما، وأيكما خلت به فهو لها.
حسن: رواه مالك في الفرائض (4) عن ابن شهاب، عن عثمان بن إسحاق بن خرشة، عن قبيصة بن ذؤيب فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا أبو داود (2894)، والترمذي (2101)، وابن ماجه (2724)، والبيهقي (6/ 234).
وإسناده منقطع؛ فإن قبيصة بن ذؤيب لم يسمع من الصديق؛ لأنه ولد عام الفتح على الراجح، ولكن يجوز أن يكون سمعه بعد ذلك من محمد بن مسلمة، ولذا ذكره المزي في"التحفة" (8/ 361) في ترجمة قبيصة بن ذؤيب الخزاعي، عن محمد بن مسلمة، ونقل عن الترمذي: أنه قال:"حسن صحيح، وهو أصح -يعني حديث مالك- من حديث ابن عيينة".
وأما في بعض النسخ المطبوعة للترمذي فليس فيه قوله:"حسن صحيح".
ثم هو حسن فقط؛ لأن عثمان بن إسحاق بن خرشة ليس بمشهور في الحديث، غير أنه حسن الحديث. وقد حسنه أيضًا البغوي (8/ 346)، وصحّحه ابن حبان (6031)، وابن الملقن في"البدر المنير" (7/ 207). وقال ابن حجر في"التلخيص" (3/ 82):"إسناده صحيح لثقة رجاله إلا أن صورته مرسل؛ فإن قبيصة لا يصح له سماع من الصديق، ولا يمكن شهوده للقصة. قاله ابن عبد البر بمعناه".
قلت: وهو كما قال إلا أنه لا يعد أن يكون قد سمع بعد ذلك من محمد بن مسلمة.
ولذا صحّحه الترمذي وحسنه، وهو لا يصحح المنقطع، وإخراج مالك يشعر بصحته أيضًا، وكذا تصحيح ابن حبان له، وقد أجمع أهل العلم -كما قال ابن المنذر- على أن للجدة السدس إذا لم تكن أم، وهذا عاضد له أيضًا.
أو أن قبيصة بن ذؤيب ولد في أول الهجرة، كما قال بعض أهل العلم، فإن صح هذا فلا
إشكال في صحته.
وأما اختلافه على الزهري فليس بعلة قادحة، فإن الصحيح لا يُعل بالضعيف.
فقد رواه سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن قبيصة، ومن هذا الطريق رواه الحاكم (4/ 338)، وقال: صحيح على شرط الشيخين.
وكذلك رواه جماعات عن الزهري، عن قبيصة، ولم يذكروا أحدًا بينهما، وفيه انقطاع؛ فإن الزهري لم يسمع من قبيصة.
ولذا رجح الترمذي رواية مالك على رواية سفيان بن عيينة، وكذا الدارقطني في"علله" (1/ 248 - 249)، فإنه ذكر جماعة رووه عن الزهري، عن قبيصة بن ذؤيب، ولم يذكروا بينهما أحدا.
فقال: ويشبه أن يكون الصواب ما قاله مالك وأبو أويس، وأن الزهري لم يسمعه من قبيصة، وإنما أخذه عن عثمان بن إسحاق بن خرشة عنه.
ক্বাবীসাহ ইবনু যু'আইব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন নানী/দাদী আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তার উত্তরাধিকারের অংশ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ তা‘আলার কিতাবে তোমার জন্য কিছুই নেই এবং আমি আল্লাহ্র নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতেও তোমার জন্য কিছু জানি না। অতএব, তুমি ফিরে যাও যতক্ষণ না আমি লোকদের জিজ্ঞেস করি। অতঃপর তিনি লোকদের জিজ্ঞেস করলেন। মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম, যখন তিনি তাকে ষষ্ঠাংশ (১/৬) দিয়েছিলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তোমার সাথে কি অন্য কেউ আছে? তখন মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছিলেন, তিনিও ঠিক তাই বললেন। এরপর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা তার জন্য কার্যকর করলেন।
এরপর আরেকজন নানী/দাদী উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তার উত্তরাধিকার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি বললেন: আল্লাহ তা‘আলার কিতাবে তোমার জন্য কিছুই নেই এবং যে ফায়সালা করা হয়েছে, তা কেবল তোমার পূর্বের জনের জন্যই (অর্থাৎ আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সময়ের ফয়সালা)। আমি ফারাইযের (উত্তরাধিকারের সুনির্দিষ্ট অংশ) ক্ষেত্রে কোনো অতিরিক্ত বিষয় যোগ করব না। তবে তা হলো সেই ষষ্ঠাংশ (১/৬)। যদি তোমরা দু’জন একত্র হও, তবে তা তোমাদের দু’জনের মাঝে ভাগ হবে, আর যদি তোমাদের মধ্যে কেউ একা থাকে, তবে তা তার একার জন্য।
5950 - عن بريدة بن الحصيب أن النبي صلى الله عليه وسلم جعل للجدة السدس إذا لم تكن دونها أم.
حسن: رواه أبو داود (2895)، والنسائي في الكبرى (6338) كلاهما من حديث عبيد اللَّه بن عبد اللَّه أبي المنيب العتكي، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.
وعبيد اللَّه بن عبد اللَّه العتكي مختلف فيه، فقال البخاري:"عنده مناكير". وقال العقيلي:"لا يتابع عليه". ولكن قال أبو حاتم:"صالح". وأنكر على البخاري إدخاله في كتاب"الضعفاء"، وقال:"يحول". ووثّقه ابن معين والنسائي، وأورده ابن عدي في الكامل، وقال:"هو عندي لا بأس به". وذكر ابن السكن هذا الحديث في"صحاحه" كما في التلخيص (3/ 83).
والخلاصة فيه أنه حسن الحديث إذا لم يكن في حديثه نكارة أو مخالفة، وقد يشهد له ما سبق.
বুরাইদা ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাদীর (বা নানীর) জন্য ছয় ভাগের এক ভাগ অংশ নির্ধারণ করে দিয়েছেন, যদি তার চেয়ে নিকটবর্তী কোনো মা না থাকেন।
5951 - عن معقل بن يسار المزني قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم أتي بفريضة فيها جد، فأعطاه ثلثا أو سدسا.
حسن: رواه ابن ماجه (2722) عن أبي بكر بن أبي شيبة قال: حدثنا شبابة قال: حدثنا يونس ابن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق، عن عمرو بن ميمون، عن معقل بن يسار المزني فذكره.
وإسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق؛ فإنه حسن الحديث، إلا أنه اختلف عليه: فرواه عنه شبابة هكذا، وهو عند ابن أبي شيبة (11/ 291).
ورواه أيضًا عن عبد الأعلى، عن يونس، عن الحسن أن عمر قال: من يعلم قضية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الجد؟ فقال معقل بن يسار المزني: فينا قضى به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: ما ذاك؟ قال: السدس. بدون شك. قال: مع من؟ قال لا أدري، قال: لا دريت، فما تغني إذا.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا أحمد (20310)، وكذا رواه أبو داود (2897) عن خالد، عن يونس.
والحسن لم يسمع من عمر بن الخطاب.
ولكن رواه ابن ماجه (2723)، والبيهقي (6/ 244) كلاهما عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن معقل بن يسار أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قضى في الجد بالسدس. هكذا عند ابن ماجه.
وعند البيهقي: أن عمر سأل الناس: من علم من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الجد شيئًا؟ فقال معقل: أعطاه السدس. قال: مع من؟ ويلك! قال: لا أدري. قال: لا دريت.
واختلف في سماع الحسن، عن معقل بن يسار فنفاه أبو حاتم.
وقال أبو زرعة: الحسن عن معقل بن يسار أشبه، والحسن عن معقل بن سنان بعيد جدا. وقال ابن معين: وقد ذكروا سماع الحسن من معقل بن يسار، وليس هو بمستفيض.
قلت: وفي صحيح البخاري (4529) قال الحسن: حدثني معقل بن يسار قال فذكره. والخلاصة أن حديث معقل بن يسار صحيح الإسناد بمجموع الطريقين.
وأما ما روي عن عمران بن حصين أن رجلا أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إن ابن ابني مات فما لي من ميراثه؟ فقال:"لك السدس". فلما أدبر دعاه، فقال:"لك سدس آخر". فلما أدبر دعاه، فقال:"إن السدس الآخر طعمة". قال قتادة:"فلا يدرون مع أي شيء ورثه".
قال قتادة:"أقل شيء وُرِّث الجد السدس". فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2891)، والترمذي (2099)، وأحمد (19848)، والدارقطني (4/ 84)، والبيهقي (6/ 244) كلهم من حديث همام بن يحيى، عن قتادة، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: بل هو ضعيف؛ لأن الحسن لم يسمع من عمران بن حصين شيئًا، كما قال علي بن المديني، ويحيى بن معين، وأحمد بن حنبل، وبهز بن أسد، وغيرهم.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ورَّث جدة سدسًا.
رواه ابن ماجه (2725) عن عبد الرحمن بن عبد الوهاب قال: حدثنا سَلْم بن قتيبة، عن شريك، عن ليث، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
وفيه شريك القاضي وشيخه ليث كلاهما سيء الحفظ، إلا أن الثاني اختلط جدا، فلم يتميز حديثه.
وكذلك لم يصح ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود في الجدة مع ابنها: إنها أول جدة أطعمها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سدسا مع ابنها، وابنها حي.
رواه الترمذي (2102) عن الحسن بن عرفة، حدثنا يزيد بن هارون، عن محمد بن سالم، عن الشعبي، عن مسروق، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره.
ومحمد بن سالم هو الهمداني الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.
ومن طريقه رواه البزار في مسنده (5/ 325)، والبيهقي (6/ 226).
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه مرفوعا إلا من هذا الوجه، وقد وَرَّث بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم الجدة مع ابنها، ولم يورثها بعضهم".
وقال البزار:"هذا الحديث لا نعلم أحدا رواه إلا محمد بن سالم، ولم يتابع عليه، ومحمد بن سالم هذا لين الحديث".
وقال البيهقي:"محمد بن سالم يتفرد به هكذا، وروي عن يونس، عن ابن سيرين قال: أنبئت وأشعث بن سوار، عن ابن سيرين، عن عبد اللَّه. وعن أشعث بن عبد الملك، عن الحسن وابن سيرين، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وحديث يونس وأشعث منقطع، ومحمد بن سالم غير محتج به، وإنما الرواية الصحيحة فيه عن عمر، وعبد اللَّه، وعمران بن حصين.
ثم أسند من كل هؤلاء الثلاثة أنهم وَرَّثوا الجدة مع ابنها". انتهى.
وقال في معرفة السنن والآثار (9/ 115):"تفرد به هكذا محمد بن سالم، وهو غير محتج به".
ورواية أشعث رواها الدارمي (2974) عن يزيد بن هارون، عنه، عن ابن سيرين، عن ابن مسعود قال: إن أول جدة أُطْعِمَت في الإسلام سهما أم أب، وابنها حي.
وأشعث هو ابن سوار الكندي ضعيف باتفاق أهل العلم. وابن سيرين لم يدرك ابن مسعود.
والصواب في حديث عبد اللَّه بن مسعود أنه موقوف عليه، رواه البيهقي من حديث سفيان، عن ابن أبي خالد، عن أبي عمرو، عن عبد اللَّه بن مسعود أنه ورَّث جدة مع ابنها. وإسناده صحيح.
وقد روي عنه أيضًا:"الجدات ليس لهن ميراث، إنما هي طعمة أُطْعِمْنَها، فأقربهن وأبعدهن سواء".
رواه الدارمي (2985) عن يزيد بن هارون، أنبأنا الأشعث، عن ابن سيرين، عن ابن مسعود فذكره.
ومن طريق الأشعث -وهو ابن سوار- رواه أيضًا البيهقي (6/ 226).
والأشعث ضعيف، كما أن فيه انقطاعا.
وفي الباب أيضًا ما رواه أبو يعلى (1095)، والبزار -كشف الأستار (1387) - كلاهما من حديث قبيصة بن عقبة، ثنا سفيان الثوري، عن زيد بن أسلم، عن عياض، عن أبي سعيد الخدري قال:"كنا نورثه على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". يعني الجد.
قال البزار:"لا نعلمه بهذا اللفظ إلا من هذا الوجه عن أبي سعيد، وأحسب أن قبيصة أخطأ في لفظه، وإنما كان عندي:"كنا نؤديه". يعني: زكاة الفطر. ولم يتابع قبيصة على هذا غيره".
وكذا أعله مسلم في"كتاب التمييز" (ص 189 - 190).
وأما الهيثمي فقال في المجمع (4/ 227): رواه أبو يعلى والبزار، ورجال أبي يعلى رجال الصحيح.
وفي الباب أيضًا ما روي عن عبادة بن الصامت:"إن من قضاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للجدتين من الميراث بالسدس بينهما بالسواء" في حديث طويل.
رواه عبد اللَّه في مسند أبيه (22778) قال: حدثنا أبو كامل الجحدري، حدثنا الفضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصامت، عن عبادة فذكر الحديث.
وإسحاق بن يحيى بن عبادة بن الصامت قال فيه ابن عدي:"عامة أحاديثه غير محفوظة، وله حديث طويل في قضايا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم".
وفي تهذيب الكمال:"روى عن عبادة بن الصامت، ولم يدركهـ. وروى عنه موسى بن عقبة، ولا يروي عنه غيره". وخلاصته في التقريب:"أرسل عن عبادة، وهو مجهول الحال".
وأما حديثه في قضايا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فهو ما ذكره أحمد (22778) بالإسناد المذكور.
وكان ابن عباس يرى أن الجد أب، ويتلو قوله تعالى: {وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ آبَائِي إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ} [يوسف: 38].
وعن ابن جريج قال: أخبرني عطاء أن ابن عباس كان يجعل الجد أبا.
وأما الذين ذهبوا إلى أن الجدة لا ترث مع ابنها من الصحابة فهم عثمان، وعلي، وزيد بن ثابت، رضي الله عنهم جميعا.
والحارث لا يحتج بخبره لطعن الحفاظ فيه".
قلت: وإسناد هذا الحديث وإن كان ضعيفا، فقد اتفق أهل العلم على صحة معناه، فلعل الحارث حفظ هذا الحديث من علي بن أبي طالب؛ لأنه كان عارفا بالفرائض معتنيا بها وبالحساب، كما قال ابن كثير في تفسير الآية الكريمة.
ولذا قال الترمذي:"والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم".
قلت: وذلك في الأمرين في تقديم الدين على الوصية، وتوريث أعيان بني الأم، وهم الإخوة الأب واحد وأم واحدة، دون بني العلات، وهم الذين أبوهم واحد وأمهاتهم مختلفة إذا اجتمعوا.
মা'কিল ইবন ইয়াসার আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি যে, তাঁর কাছে এমন একটি উত্তরাধিকারের (ফারায়েযের) মামলা আনা হয়েছিল যাতে দাদা উপস্থিত ছিলেন। তখন তিনি দাদাকে এক-তৃতীয়াংশ অথবা এক-ষষ্ঠাংশ প্রদান করেন।
5952 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا استهلّ المولودُ وُرِّث".
حسن: رواه أبو داود (2920) ومن طريقه البيهقي (6/ 257) عن حسين بن معاذ، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا محمد -يعني ابن إسحاق-، عن يزيد بن عبد اللَّه بن قسيط، عن أبي هريرة فذكره.
جوّد إسناده ابن عبد الهادي في التنقيح (4/ 277).
ورواه أيضًا ابن خزيمة -كما قال البيهقي- عن الفضل بن يعقوب الجزري، عن عبد الأعلى بهذا الإسناد مثله. وزاد موصولا بالحديث:"تلك طعنة الشيطان، كل بني آدم نائل منه تلك الطعنة إلا ما كان من مريم وابنها، فإنها لما وضعتها أمها قالت: {وَإِنِّي أُعِيذُهَا بِكَ وَذُرِّيَّتَهَا مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ} [سورة آل عمران: 36] فضرب دونها بحجاب، فطعن فيه - يعني في الحجاب".
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ فإنه مدلس، وقد عنعن، ولم أقف على تصريح منه، ولكن لحديث أبي هريرة طرق أخرى تقويه، وإن كانت هذه الطرق لا تصح بانفرادها.
ومما يقوي هذا الحديث أنه روي مرسلا من وجه آخر.
رواه البيهقي من طريق موسى بن داود، عن عبد العزيز بن أبي سلمة، عن الزهري، عن سعيد ابن المسيب، عن أبي هريرة قال:"من السنة أن لا يرث المنفوس، ولا يُوَرِّث حتى يستهل صارخا". قال: كذا وجدته، ورواه يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرث الصبي إذا لم يستهل، والاستهلال الصياح، أو العطاس، أو البكاء، ولا يكمل ديته".
وقال سعيد:"لا يصلى عليه".
ورواه السِلَفي في الطيوريات موصولا (242) من حديث عبد اللَّه بن شبيب، حدثني إسحاق بن محمد، حدثني علي بن أبي علي، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استهلَّ الصبي صارخًا سُمِّيَ، وصُلِّيَ عليه، وتَمَّتْ ديته ووُرِّث، وإن لم يستهلَّ صارخًا، وولد حيًا لم يُسَمَّ، ولم تتمَّ ديته، ولم يصلَّ عليه، ولم يُوَرَّث".
إلا أن فيه علي بن أبي علي ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد روى أحاديث موضوعة عن محمد ابن المنكدر، كما أن فيه عبد اللَّه بن شبيب ضعيف أيضًا كما في التلخيص (4/ 147).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন নবজাতক চিৎকার করে ওঠে (বা শব্দ করে), তখন সে উত্তরাধিকার লাভ করে।”
5953 - عن المسور بن مخرمة وجابر بن عبد اللَّه قالا: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يرث الصبي حتى يستهل صارخا، واستهلاله أن يصيح، أو يبكي، أو يعطس".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (2/ 20 - 21)، والأوسط (4596) -كما في"مجمع البحرين" (4/ 134) - عن عبدان بن أحمد، ثنا العباس بن الوليد الخلال الدمشقي، ثنا مروان بن محمد الطاطري، ثنا سلمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن المسور بن مخرمة وجابر بن عبد اللَّه فذكراه. وإسناده حسن من أجل العباس بن الوليد وشيخه مروان بن محمد الطاطري، فهما حسنا الحديث.
وأما قول الهيثمي في"المجمع" (4/ 225):"فيه عباس بن الوليد الخلال وثّقه أبو مسهر ومروان بن محمد. وقال أبو داود: لا أحدث عنه، وبقية رجاله رجال الصحيح". ففي نقله عن أبي داود، عن مروان بن محمد:"لا أحدث عنه" فيه نظر.
فإن هذا القول لم يذكره المزي في" تهذيب الكمال" ولا ابن حجر في"تهذيب التهذيب"، بل فيه: قال أبو حاتم وصالح بن محمد:"ثقة".
وقال أبو زرعة الدمشقي:"قال لي أحمد: عندكم ثلاثة أصحاب حديث: مروان بن محمد الطاطري، والوليد بن مسلم، وأبو مسهر".
وقال الدوري عن ابن معين:"لا بأس به، وكان مرجئا". وقال الدارقطني:"ثقة".
فمع توثيق هؤلاء الأئمة بعد أن يكون أبو داود قال فيه: لا أحدث عنه، فلعله التبس الأمر على الهيثمي، ولو فرضنا أن أبا داود قال فيه ما قال فقول الأئمة يقدم على قوله، فأقل أحواله حسن الحديث.
ثم وجدت هذا الحديث في سنن ابن ماجه (2751) بتحقيق محمد فؤاد عبد الباقي عن العباس ابن الوليد الدمشقي قال: حدثنا مروان بن محمد قال: حدثنا سليمان بن بلال قال: حدثنا يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن جابر بن عبد اللَّه والمسور بن مخرمة فذكرا الحديث مثله.
وأنا أستبعد أن يكون ابن ماجه روى هذا الحديث، وإن كان وجد في بعض النسخ الخطية، إلا أني لم أتمكن من تقييم هذه المخطوطة، والدليل على ذلك أن المزي لم يذكر هذا الحديث في"تحفة الأشراف"، ولا استدركهـ ابن حجر في"النكت الظراف"، ولا الحافظ أبو زرعة العراقي في"الإطراف بأوهام الأطراف"، كما لم يذكره البوصيري في زوائد ابن ماجه، ولا الدكتور محمد مصطفى الأعظمي في تحقيقه لسنن ابن ماجه، فمن المستبعد أن يفوت هؤلاء جميعا هذا الحديث من نسخهم التي اعتمدوا عليها، وأبعد من هذا أن يكون هذا الحديث من زيادات أبي الحسن بن القطان؛ لأنه ولد عام 254 هـ، وتوفي العباس بن الوليد الدمشقي عام 248 هـ أي قبل ولادته بست
سنوات تقريبا، وهو من شيوخ ابن ماجه. فكل هذه الأمور تدعو إلى التأمل في نسبة هذا الحديث إلى ابن ماجه، أو إلى زيادات أبي الحسن القطان، وقد أفرد الدكتور مسفر زيادات أبي الحسن في جزء، ولم يذكر فيه هذا الحديث. واللَّه تعالى أعلم بالصواب.
ولجابر حديث آخر، وهو معلول ذكر في كتاب الجنائز.
والحديث يدل على أن المولود لا يرث حتى يستهل صارخا.
وإليه ذهب مالك وأحمد، وبه قال محمد بن سيرين، والشعبي، والزهري، وقتادة، وغيرهم.
وقال أبو حنيفة، والشافعي: إذا تنفس وتحرك يُوَرَّث ولو لم يكون فيه الاستهلال، وهو رفع الصوت؛ لأن وجود الحركة أو التنفس أمارة الحياة.
মিসওয়ার ইবন মাখরামাহ ও জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়েই বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শিশু চিৎকার করে আওয়াজ না করা পর্যন্ত উত্তরাধিকার লাভ করবে না। আর তার আওয়াজ করা হল এই যে, সে চিৎকার করবে, অথবা কাঁদবে, অথবা হাঁচি দেবে।"
5954 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"كل قَسْم قُسِم في الجاهلية فهو على ما قُسم، وكل قَسم أدركه الإسلام فهو على قَسْم الإسلام".
حسن: رواه أبو داود (2914)، وابن ماجه (2485) كلاهما من حديث موسى بن داود قال: حدثنا محمد بن مسلم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن مسلم الطائفي؛ فإنه حسن الحديث، وهو من رجال مسلم.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الطحاوي في مشكله (3221)، والبيهقي (9/ 122).
ورواه مالك في الأقضية (37) بلاغا عن ثور بن زيد الديلي أنه قال: بلغني أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أيما دار أو أرض قُسمت في الجاهلية، فهي على قَسم الجاهلية، وأيما دار أو أرض أدركها الإسلام ولم تقسم فهي على قسم الإسلام".
ووصله البيهقي (9/ 122) بذكر عكرمة، عن ابن عباس، فقال: أخبرنا أبو عبد اللَّه، حدثني محمد ابن المظفر الحافظ، ثنا أبو بكر بن أبي داود، ثنا أحمد بن حفص، حدثني أبي، ثنا إبراهيم بن طهمان، عن مالك، عن ثور بن زيد، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
وأما ما روي عن عبد اللَّه بن عمر مرفوعا مثله فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (2749) عن محمد ابن رمح قال: أنبأنا عبد اللَّه بن لهيعة، عن عقيل أنه سمع نافعا يخبر عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.
وعبد اللَّه بن لهيعة فيه كلام معروف، وعقيل هو ابن خالد الأيلي، وهو من رجال الجماعة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহিলিয়্যাতের যুগে যে বন্টন করা হয়েছিল, তা সেভাবেই বলবৎ থাকবে। আর যে বন্টন ইসলাম এসে পেয়েছে, তা ইসলামের বন্টন অনুযায়ী হবে।"
5955 - عن عبد اللَّه قال: إن أهل الإسلام لا يُسيّبون، وإن أهل الجاهلية كانوا يُسِيبون.
رواه البخاري في الفرائض (6753) عن قبيصة بن عقبة، حدثنا سفيان، عن أبي قيس، عن هزيل، عن عبد اللَّه فذكره موقوفا.
وقوله:"السائبة" هو: أن يقول السيد لعبده: لا ولاء لأحد عليك، أو أنت سائبة. يريد بذلك عنقه، وأن لا ولاء لأحد عليه. وقد يقول له: أعتقتك سائبة، أو أنت حر سائبة.
وحديث عبد اللَّه بن مسعود هو طرف من حديث أخرجه الإسماعيلي بتمامه من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان بسنده إلى هزيل قال: جاء رجل إلى عبد اللَّه، فقال: إني أعتقت عبدا لي سائبة، فمات، فترك مالا، ولم يدع وارثا. فقال عبد اللَّه: فذكر حديث الباب، وزاد: وأنت ولي نعمته، فلك ميراثه، فإن تأثمت، أو تحرجت في شيء فنحن نقبله، ونجعله في بيت المال. انتهى كما في الفتح (12/ 41).
وكذلك رواه أيضًا عبد الرزاق (16223) عن الثوري بإسناده نحوه، وأخرج عبد الرزاق (16222) عن معمر، عن قتادة أن ابن مسعود أتاه رجل فقال: مولى لي توفي أعتقته سائبة، وترك مالا، قال: أنت أحق بماله، قال: إنما أعتقته للَّه، قال: أنت أحق بماله، فإن تدعه فأرِنه هاهنا ورثة كثير - يعني بيت المال.
وأخرج أيضًا عبد الرزاق (16232) عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين أن سالما مولى أبي حذيفة أعتقته امرأة من الأنصار، فلما قتل يوم اليمامة دفع ميراثه إلى الأنصارية التي أعتقته أو إلى ابنها.
عن ابن إسحاق قال: حدثني عبد اللَّه بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن عبد اللَّه بن وديعة بن خِدام بن خالد أخي بني عمرو بن عوف قال: كان سالم مولى أبي حذيفة مولى لامرأة منا يقال لها سلمى بنت يعار أعتقته سائبة في الجاهلية، فلما أصيب باليمامة أتى عمر بن الخطاب بميراثه، فدعا وديعة بن خدام، فقال: هذا ميراث مولاكم، وأنتم أحق به. فقال: يا أمير المؤمنين، قد أغنانا اللَّه عنه، قد أعتقته صاحبتنا سائبة، فلا نريد أن نندا من أمره شيئًا، أو قال: نرزأ. فجعله عمر في بيت المال.
رواه يعقوب بن سفيان في"المعرفة"، ومن طريقه البيهقي (10/ 300): ثنا محمد بن منصور، ثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، أنبأ أبي، عن ابن إسحاق فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ فإنه مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث.
وفي الباب آثار أخرى ذكرها عبد الرزاق والبيهقي وغيرهما.
وأما أقوال العلماء في السائبة: فمنها قول الشافعي: العتق ماض، وولاءه لمعتقه، وإن تحرج من الأخذ به فيجعل في بيت المال.
ومنها: أن ميراث السائبة للمسلمين يرثونه، ويعقلون عنه. وبه قال مالك.
ومنها: أنه لا بأس بيع ولاء السائبة وهبته. وبه قال الكوفيون، وبه قال إبراهيم والشعبي.
وما ذهب إليه الشافعي هو الظاهر من النصوص، ومن قول النبي صلى الله عليه وسلم:"الولاء لمن أعتق". وهو الذي يذهب إليه البخاري؛ فإنه بعد أثر ابن مسعود، أورد حديث عائشة، وقال لها:"أعتقيها فإن
الولاء لمن أعتق".
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় ইসলামের অনুসারীরা (দাসকে) 'সাইবা' বানায় না, তবে জাহিলিয়াতের যুগের লোকেরা 'সাইবা' বানাত।
5956 - عن عمر بن الخطاب أنه كان يقول: الدية للعاقلة، ولا ترث المرأة من دية زوجها شيئًا، حتى قال له الضحاك بن سفيان: كتب إلي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن أورّث امرأة أشيم الضِّبابي من دية زوجها.
صحيح: رواه أبو داود (2927)، والترمذي (2110)، وابن ماجه (2642)، وأحمد (15745) كلهم من حديث الزهري، عن سعيد بن المسيب أن عمر بن الخطاب قال فذكره.
وأهل العلم مختلفون في سماع سعيد بن المسيب من عمر، والصحيح أنه سمع منه.
و"أشيم" بفتح الهمزة وسكون الشين. والضِّبابي - بكسر الضاد منسوب إلى محلة بالكوفة يقال لها: قلعة الضباب.
والضحاك بن سفيان هو الكلابي أبو سعيد صحب النبي صلى الله عليه وسلم، وعقد له لواء، وكان على صدقات قومه.
وقال ابن سعد: كان ينزل نجدا في موالي ضرية، وكان واليا على من أسلم هناك من قومه. وقد جاء في بعض الروايات أنه الضحاك بن قيس الفهري. هكذا وقع في رواية الطبراني في المعجم الكبير (1/ 282) عن المغيرة بن شعبة أن أسعد بن زرارة قال لعمر بن الخطاب: إن النبي صلى الله عليه وسلم كتب إلى الضحاك بن قيس أن يُوَرث امرأة أشْيم الضبابي من دية زوجها.
قال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (4/ 230):"ورجاله ثقات".
قلت: فيه أمران مخالفان للواقع.
الأول: قوله: الضحاك بن قيس، وهو ليس بصحيح، فإن أكثر ما قيل فيه أن سنه عند وفاة النبي صلى الله عليه وسلم كان ثماني سنوات. قال الطبري:"مات النبي صلى الله عليه وسلم، وهو غلام يافع".
ويبدو أن الحافظ الهيثمي تنبه له، فقال في"المجمع":"الضحاك بن سفيان".
والأمر الثاني: قوله: أسعد بن زرارة. فيه خطأ جسيم، فإن أسعد بن زرارة مات في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، وهو يبني المسجد.
قال البغوي:"بلغني أنه أول من مات من الصحابة بعد الهجرة، وأول ميت صلى عليه النبي صلى الله عليه وسلم. فلعله تصحف كما قال الحافظ في ترجمته في الإصابة (1/ 35) من"سعد بن زرارة" إلى"أسعد بن زرارة"، أو أنه أسعد بن زرارة آخر". انتهى.
قال زيد: هي من سبعة وعشرين، وهي الأكدرية يعني أم الفروج.
رواه الدارمي (2973) عن سعيد بن عامر، عن همام، عن قتادة، أن زيد بن ثابت قال فذكره.
ورواه عبد الرزاق (19074) عن الثوري، عن الأعمش، عن إبراهيم أن عبد اللَّه قال في أم وأخت وزوج وجد: هي من ثمانية: للأخت النصف ثلاثة، وللزوج النصف ثلاثة، وللأم سهم، وللجد سهم. وقال زيد: هي من سبعة وعشرين ثم ذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: দিয়াত (রক্তপণ) হলো ‘আক্বিলা’র (গোত্রীয় পুরুষদের) উপর, এবং স্ত্রী তার স্বামীর রক্তপণ থেকে কিছুই মীরাস পাবে না। এমনকি (একবার) আদ-দাহ্হাক ইবনু সুফ্ইয়ান তাঁকে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট লিখে পাঠিয়েছিলেন যে, আমি যেন আশইয়াম আদ-দ্বিবাবী’র স্ত্রীকে তার স্বামীর রক্তপণ থেকে উত্তরাধিকারী বানাই।
5957 - عن زينب أنها كانت تَفْلي رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وعنده امرأة عثمان بن مظعون، ونساء من المهاجرات يشكون منازلهن، وأنهن يخرجن منه، ويضيق عليهن فيه، فتكلمت زينب، وتركت رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنك لست تكلمين بعينيك، تكلمي واعملي عملك".
فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومئذ أن يُوَرَّث من المهاجرين النساءُ. فمات عبد اللَّه فورثته امرأته دارا بالمدينة.
حسن: رواه أبو داود (3080)، والبيهقي (6/ 156) من طريقه، وأحمد (27050) -واللفظ له- كلهم من حديث عبد الواحد بن زياد، حدثنا الأعمش، عن جامع بن شداد، عن كلثوم، عن زينب فذكرته.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (27049) من وجه آخر عن شريك، عن الأعمش، بإسناده مختصرا: أن النبي صلى الله عليه وسلم ورَّث النساءَ خِططهن.
وشريك هو ابن عبد اللَّه النخعي سيئ الحفظ، ولكنه توبع في الإسناد الأول.
وإسناده حسن من أجل كلثوم، وهو ابن علقمة، ذكره ابن حبان في ثقات التابعين، وقال ابن حجر في التقريب:"ثقة" والصحيح أنه"صدوق" فإنه لم يذكر هو ولا المزي من وثّقه غير ابن حبان، إلا أنه روى عنه جمع، كما ذكره المزي، ويقال: كان له صحبة.
وزينب التي كانت تَفْلي رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنها تكون بنت جحش أم المؤمنين، ومن المستبعد أن تكون هي زينب بنت معاوية زوج ابن مسعود، وكونها ورثت دارا بالمدينة بعد موت عبد اللَّه (ابن مسعود) فهو لبيان الواقع الذي وقع.
وقوله:"خططهن" الخطط -بكسر الخاء وفتح الطاء- هي وضع علامة على الأرض إشارة إلى امتلاكها، مثل خطط المدن للتمليك، سواء كان ذلك للدولة أو لأفراد الشعب.
ومعنى الحديث أن النبي صلى الله عليه وسلم وضع خِططًا للنساء المهاجرات شبه القطائع، فكن امتلكن هذه القطائع، فيها بيوت أزواجهن، فإنه جرت العادة أن المرأة إذا مات عنها زوجها كانت تطرد من
بيت زوجها، فورَّث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نساءَ المهاجرين بيوت أزواجهن بعد موتهم مثل تمليك الخطط إلا أن هذا الحكم كان مخصوصا بالمهاجرين، وبعد انقضائهم انقضى.
যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মাথা দেখছিলেন (উকুন ইত্যাদি পরিষ্কার করছিলেন)। এ সময় তাঁর কাছে উসমান ইবনে মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী এবং অন্যান্য মুহাজির নারীগণ উপস্থিত ছিলেন। তারা তাদের বাসস্থান নিয়ে অভিযোগ করছিলেন যে, তাদের সেখান থেকে বের করে দেওয়া হচ্ছে এবং সেখানে তাদের জন্য সংকীর্ণতা সৃষ্টি করা হচ্ছে। তখন যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বলতে শুরু করলেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মাথা দেখা বন্ধ করে দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি তো তোমার চোখ দিয়ে কথা বলছো না (অর্থাৎ, মাথা দেখা বন্ধ করার দরকার নেই)। তুমি কথা বলতে থাকো এবং তোমার কাজও করতে থাকো।"
অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন আদেশ করলেন যে, মুহাজিরদের মধ্য থেকে যেন নারীদেরও উত্তরাধিকার দেওয়া হয়। এরপর যখন আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) ইন্তেকাল করলেন, তখন তাঁর স্ত্রী মদিনায় একটি বাড়ির উত্তরাধিকার লাভ করেছিলেন।
5958 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: توفي أبي وعليه دين، فعرضت على غرمائه أن يأخذوا التمر بما عليه، فأبوا، ولم يروا أن فيه وفاء، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت ذلك له، فقال: إذا جددته فوضعته في المربد آذنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فجاء ومعه أبو بكر وعمر، فجلس عليه، ودعا بالبركة، ثم قال:"ادع غرماءك، فأوفهم". فما تركت أحدا له على أبي دين إلا قضيته، وفضل ثلاثة عشر وسقا، سبعة عجوة وستة لون، أو ستة عجوة وسبعة لون، فوافيت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم المغرب، فذكرت ذلك له، فضحك، فقال:"ائت أبا بكر وعمر فأخبرهما". فقالا: لقد علمنا إذ صنع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما صنع أن سيكون ذلك.
صحيح: رواه البخاري في الصلح (2709) عن محمد بن بشار، حدثنا عبد الوهاب، حدثنا عبيد اللَّه، عن وهب بن كيسان، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমার পিতা মারা গেলেন এবং তাঁর উপর ঋণ ছিল। আমি তাঁর পাওনাদারদের কাছে প্রস্তাব করলাম যে, তারা যেন তাদের প্রাপ্য অনুযায়ী খেজুর নিয়ে নেয়। কিন্তু তারা অস্বীকার করল, কারণ তারা দেখল যে, তাতে ঋণ পরিশোধের মতো পর্যাপ্ত হবে না। অতঃপর আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে এ বিষয়ে জানালাম। তিনি বললেন: যখন তুমি তা পেড়ে গোলায় রাখবে, তখন তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দিও। তিনি আসলেন এবং তাঁর সাথে আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তিনি তার (খাবারের স্তূপের) উপর বসলেন এবং বরকতের জন্য দু‘আ করলেন। অতঃপর বললেন: "তোমার পাওনাদারদের ডাকো এবং তাদের পাওনা পরিশোধ করো।" যারাই আমার পিতার কাছে পাওনাদার ছিল, আমি তাদের প্রত্যেকের ঋণ পরিশোধ করলাম। এরপরও তের ওয়াসক খেজুর উদ্বৃত্ত রইল। সাত ওয়াসক ছিল ‘আজওয়া এবং ছয় ওয়াসক ছিল ‘লউন’ (অন্য প্রকারের খেজুর), অথবা ছয় ওয়াসক ছিল ‘আজওয়া এবং সাত ওয়াসক ছিল ‘লউন’। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাগরিবের সালাতে মিলিত হলাম এবং তাঁকে এ সম্পর্কে বললাম। তিনি হাসলেন এবং বললেন: "আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট যাও এবং তাদের এ সংবাদ দাও।" তখন তারা (আবূ বাকর ও উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন যা করার তা করলেন, তখনই আমরা জানতাম যে, এমনটিই ঘটবে।
5959 - عن * *
৫৯৫৯ - ...হতে বর্ণিত।
5960 - عن ابن عباس في قوله عز وجل: {يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ} [النساء: 11] قال: كان الميراث للولد، وكانت الوصية للوالدين والأقربين، فنسخ اللَّه من ذلك ما أحب، فجعل للولد الذكر مثل حظ الأنثيين، وجعل للوالدين لكل واحد منهما السدس، وجعل للمرأة الثمن والربع، وللزوج الشطر والربع.
صحيح: رواه البخاري في الوصايا (2747) عن محمد بن يوسف، عن ورقاء، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
وفي رواية (4578): وجعل للأبوين لكل واحد منهما السدس والثلث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে বলেন: “{আল্লাহ তোমাদেরকে তোমাদের সন্তানদের ব্যাপারে নির্দেশ দিচ্ছেন: পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান} [সূরা নিসা: ১১]।” তিনি বলেন: (ইসলামের শুরুতে) মিরাছ (উত্তরাধিকার) ছিল শুধু সন্তানের জন্য, আর পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়দের জন্য ছিল অসিয়ত (মৃত্যুকালীন নির্দেশ)। অতঃপর আল্লাহ তাআলা এর মধ্য থেকে যা ইচ্ছা করলেন তা রহিত করে দিলেন। সুতরাং তিনি সন্তানের মধ্যে পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান নির্ধারণ করলেন, পিতা-মাতার প্রত্যেকের জন্য (মিরাছের) এক ষষ্ঠাংশ নির্ধারণ করলেন, স্ত্রীর জন্য (ক্ষেত্রেভেদে) এক অষ্টমাংশ ও এক চতুর্থাংশ নির্ধারণ করলেন এবং স্বামীর জন্য (ক্ষেত্রেভেদে) অর্ধেক ও এক চতুর্থাংশ নির্ধারণ করলেন।
5961 - عن ابن عباس قال: {إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ} فكانت الوصية كذلك حتى نسختها آية الميراث.
حسن: رواه أبو داود (2869)، ومن طريقه البيهقي (6/ 265) عن أحمد بن محمد بن ثابت المروزي، حدثني علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. وإسناده حسن من أجل علي بن الحسين بن واقد وأبيه؛ فإنهما حسنا الحديث.
كانت الوصية قبل نزول آية الميراث واجبة، ثم نُسخت للوارثين، فبقيت في غير الوارثين مستحبة، وهو رأي جمهور أهل العلم، إلا أن يكون عليه دين، أو عنده أمانة، أو وديعة؛ فيجب عليه أن يوصي بذلك للحفاظ على حقوق الآخرين.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "{যদি সে কিছু সম্পদ রেখে যায়, তবে পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়দের জন্য ওসিয়ত করবে।}" সুতরাং ওসিয়ত এভাবেই প্রচলিত ছিল, যতক্ষণ না মীরাসের (উত্তরাধিকারের) আয়াত তা রহিত করে দেয়।
5962 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ما حق امرئ مسلم له شيء يريد أن يوصي فيه يبيت ليلتين إلا ووصيته مكتوبة عنده".
متفق عليه: رواه مالك في الوصية (1) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في الوصايا (2738) من طريق مالك.
ورواه مسلم في الوصية (1627) من أوجه أخرى عن نافع به مثله. وذلك في غير الوارثين.
أما ما روي عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"المحروم من حرم وصيته" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (2700) عن نصر بن علي الجهضمي قال: حدثنا دُرست بن زياد قال: حدثنا يزيد الرقاشي، عن أنس بن مالك فذكره. ودرست بن زياد وشيخه يزيد -وهو ابن أبان الرقاشي- ضعيفان. وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه تصدق عليكم عند وفاتكم بثلث أموالكم زيادة لكم في أعمالكم".
رواه ابن ماجه (2709) عن علي بن محمد قال: حدثنا وكيع، عن طلحة بن عمرو، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف جدا؛ فإن طلحة بن عمرو الحضرمي المكي ضعيف جدا، بل قال الإمام أحمد:"لا شيء، متروك". ومن طريقه رواه أيضًا البيهقي (6/ 269).
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي الدرداء، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه تصدق عليكم بثلث أموالكم عند وفاتكم".
رواه أحمد (27482)، والبزار -كشف الأستار (1382) - كلاهما من حديث أبي اليمان، ثنا أبو بكر بن أبي مريم، عن ضمرة بن حبيب، عن أبي الدرداء فذكره.
قال البزار:"وهذا قد روي من غير وجه، وأعلى من روى في ذلك أبو الدرداء، ولا نعلم له طريقا غير هذا، وضمرة وابن أبي مريم معروفان بالنقل للعلم، واحتمل عنهما الحديث".
كذا قال رحمه الله! وأبو بكر بن أبي مريم هو أبو بكر بن عبد اللَّه بن أبي مريم الغساني الشامي، قد ينسب إلى جده، ضعيف باتفاق أهل العلم، وكان قد سرق بيته فاختلط.
وأما شيخه ضمرة بن حبيب -وهو الزبيدي- فهو كما قال البزار: كان معروفا بالعلم. وثّقه ابن سعد، وقال أبو حاتم:"لا بأس به". وقال العجلي:"شامي ثقة".
وفي الباب أيضًا عن أبي بكر الصديق، ومعاذ بن جبل، وغيرهما، وكلها ضعيفة، وإن كان يقوي بعضها بعضا. وإلى هذا ذهب جمهور أهل العلم، فقالوا: إن الوصية بالثلث لغير الوارثين مستحبة لمن وجد سعة، ولم يرد إضرار الورثة. وذهب الشافعي في القديم، وداود الظاهري إلى وجوب الوصية لغير الوارثين.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি যার কাছে এমন কিছু রয়েছে যা সম্পর্কে সে অসিয়ত করতে চায়, তার জন্য এটা উচিত নয় যে সে দু’টি রাতও অতিবাহিত করবে অথচ তার অসিয়ত তার কাছে লিখিত থাকবে না।
5963 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الرجل ليعمل بعمل أهل الخير سبعين سنة، فإذا أوصى حاف في وصيته، فيختم له بشر عمله، فيدخل النّار. وإن الرجل ليعمل بعمل أهل الشر سبعين سنة، فيعدل في وصيته، فيختم له بخير عمله، فيدخل الجنّة".
قال أبو هريرة: اقرؤوا إن شئتم {تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ} إلى قوله {وَلَهُ عَذَابٌ مُهِينٌ} [سورة النساء: 12 - 14].
حسن: رواه أبو داود (2867)، وابن ماجه (2704)، والترمذي (2117)، وأحمد (7743) واللفظ لأحمد، كلهم من حديث أشعث بن عبد اللَّه، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: وهو كما قال؛ فإن شهر بن حوشب عندي حسن الحديث، وثّقه أحمد، وابن معين، وغيرهما. وأما ما روي عن ابن عباس مرفوعا:"الإضرار في الوصية من الكبائر". فالصحيح أنه موقوف. رواه الدارقطني (4/ 151)، والعقيلي (3/ 189) من طريق عمر بن مغيرة، نا داود بن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره مرفوعا.
قال العقيلي:"لا نعرف أحدا رفعه غير عمر بن المغيرة المصيصي".
ورواه سعيد بن منصور (342 - 344)، ومن طريقه البيهقي (6/ 271) موقوفا على ابن عباس، وقال:"هذا هو الصحيح موقوف، وروي من وجه آخر مرفوعا، ورفعه ضعيف".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি সত্তর বছর ধরে নেককারদের মতো আমল করে। কিন্তু যখন সে অসিয়ত করে, তখন সে তার অসিয়তে (শরীয়তের সীমা লঙ্ঘন করে) জুলুম করে বসে। ফলে তার জীবনের পরিসমাপ্তি ঘটে মন্দ আমলের মাধ্যমে এবং সে জাহান্নামে প্রবেশ করে। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি সত্তর বছর ধরে মন্দ লোকদের মতো আমল করে। কিন্তু যখন সে অসিয়ত করে, তখন সে তার অসিয়তে ন্যায়বিচার প্রতিষ্ঠা করে। ফলে তার জীবনের পরিসমাপ্তি ঘটে উত্তম আমলের মাধ্যমে এবং সে জান্নাতে প্রবেশ করে।
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তোমরা যদি চাও, তবে পাঠ করো: {তিলকা হুদূদুল্লাহি} থেকে {ওয়া লাহূ আযাবুন মুহীন} পর্যন্ত (সূরা আন-নিসা: ১২-১৪)।
5964 - عن أبي أمامة قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول في خطبته عام حجة الوداع:"إن اللَّه قد أعطى كل ذي حق حقه، فلا وصية لوارث".
صحيح: رواه أبو داود (2870)، والترمذي (2120)، وابن ماجه (2713)، وأحمد (22294)، والبيهقي (6/ 72، 264) من طريق إسماعيل بن عياش، ثنا شرحبيل بن مسلم الخولاني قال: سمعت أبا أمامة الباهلي يقول فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل بن عياش، إلا أن روايته عن الشاميين لا بأس به، وهذا منها.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وفي نسخة:"حسن غريب".
وقال:"وقد روي عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير هذا الوجه، ورواية إسماعيل بن عياش عن أهل العراق وأهل الحجاز ليس بذاك فيما تفرد به؛ لأنه روى عنهم مناكير، وروايته عن أهل
الشام أصح، هكذا قال محمد بن إسماعيل".
وكذلك نقل البيهقي عن الإمام أحمد أنه قال:"إسماعيل بن عياش ما روي عن الشاميين صحيح، وما روي عن أهل الحجاز فليس بصحيح".
ونقل عن الشافعي بعد أن روى عنه عن ابن عيينة، عن سليمان الأحول، عن مجاهد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا وصية لوارث" قال: وروى بعض الشاميين حديثا ليس مما يثبته أهل الحديث بأن بعض رجاله مجهولون، فروينا عن النبي صلى الله عليه وسلم منقطعا، واعتمدنا على حديث أهل المغازي عامة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال عام الفتح:"لا وصية لوارث"، وإجماع الأمة على القول به".
فالظاهر أنه يقصد به حديث أبي أمامة الذي يرويه إسماعيل بن عياش الشامي، عن شرحبيل بن مسلم، عن أبي أمامة.
وللحديث طريق آخر: وهو ما رواه ابن الجارود في المنتقى (949) عن أبي أيوب سليمان بن عبد المجيد البهراني قال: ثنا يزيد بن عبد ربه قال: ثنا الوليد بن مسلم قال: ثنا ابن جابر، وحدثني سُليم بن عامر وغيره، عن أبي أمامة، وغيره ممن شهد خطبة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومئذ، فكان فيما تكلم به:"ألا إن اللَّه قد أعطى كل ذي حق حقه، ألا لا وصية لوارث".
ورواه أبو داود (1955) من وجه آخر عن الوليد بن مسلم مختصرا.
وهذا إسناد صحيح، والوليد بن مسلم مدلس، ولكنه صرح بالتحديث في جميع طبقات الإسناد.
وابن جابر هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر الأزدي أبو عتبة الشامي الدارمي، وثّقه ابن معين، وابن سعد، وأبو حاتم، وغيرهم.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হজ্জের বছর তাঁর খুতবার মধ্যে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা প্রত্যেক হকদারকে তার প্রাপ্য হক দিয়ে দিয়েছেন। সুতরাং কোনো উত্তরাধিকারীর (ওয়ারিসের) জন্য কোনো ওসিয়ত (উইল) নেই।"
5965 - عن عمرو بن خارجة، أن النبي صلى الله عليه وسلم خطبهم وهو على راحلته، وإن راحلته لتقصع بجرتها، وإن لُعَابها ليسيل بين كتفي قال:"إن اللَّه قسم لكل وارث نصيبه من الميراث، فلا يجوز لوارث وصية".
حسن: رواه الترمذي (2121)، والنسائي (6/ 247)، وابن ماجه (2712)، وأحمد (17669) لهم من طرق عن قتادة، عن شهر بن حوشب، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن عمرو بن خارجة، فذكره في حديث طويل تم تخريجه في العيدين.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب، غير أنه حسن الحديث، إذا لم يخالف، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وأما عمرو بن خارجة فقيل هكذا، وقيل: خارجة بن عمرو. والأول أصح.
আমর ইবনে খারিজাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মাঝে খুতবা দিচ্ছিলেন, তখন তিনি তাঁর সাওয়ারীর উপর আরোহণরত ছিলেন। আর তাঁর সাওয়ারীটি জাবর কাটছিল এবং তার লালা তাঁর (নবীজীর) দুই কাঁধের মাঝখান দিয়ে গড়িয়ে পড়ছিল। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ প্রত্যেক উত্তরাধিকারীর জন্য মীরাসের মধ্যে তার প্রাপ্য অংশ বন্টন করে দিয়েছেন। সুতরাং কোনো উত্তরাধিকারীর জন্য (অতিরিক্ত) ওসিয়ত করা বৈধ নয়।"
5966 - عن أنس بن مالك قال: إني لتحت ناقة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يسيل علي لعابها، فسمعته
يقول:"إن اللَّه جعل لكل ذي حق حقه، ألا لا وصية لوارث. . . .".
صحيح: رواه ابن ماجه (2714) عن هشام بن عمار قال: حدثنا محمد بن شعيب بن شابور قال: حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن سعيد بن أبي سعيد، أنه حدثه عن أنس بن مالك فذكره.
وإسناده صحيح، ومحمد بن شعيب وإن كان فيه كلام يسير فلا يضر، وقد توبع في أصل خطبة النبي صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع.
وأما سعيد بن أبي سعيد فهو المقبري حسب الظاهر، وقد قيل: إنه رجل آخر من ساحل بيروت، ذكرت ذلك في خطب النبي صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، فراجعه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উষ্ট্রীর নিচে ছিলাম, আর তার লালা আমার ওপর পড়ছিল। তখন আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: “নিশ্চয় আল্লাহ প্রত্যেক হকদারের জন্য তার প্রাপ্য হক নির্ধারণ করে দিয়েছেন। সাবধান! ওয়ারিশের (উত্তরাধিকারীর) জন্য কোনো অসিয়ত (উইল) নেই।”
5967 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تجوز وصية الوارث، والولد للفراش، وللعاهر حجر".
حسن: رواه ابن عدي في"الكامل" (2/ 817) عن ابن ذُرَيح، ثنا عبد الأعلى بن حماد، ثنا حماد بن سلمة، عن حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
وحبيب المعلم هو ابن أبي قريبة أبو محمد المعلم، بصري من رجال الجماعة، ذكره ابن عدي في الكامل؛ لأن عبد الرحمن ما كان يحدث به، وقال في نهاية الحديث:"ولحبيب أحاديث صالحة، وأرجو أنه مستقيم الرواية".
ولا يُعِلُّ هذا ما رواه الدارقطني (4/ 98) من طريق سهل بن عمار، نا الحسين بن الوليد، ثنا حماد بن سلمة، عن حبيب بن الشهيد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في خطبة يوم النحر:"لا وصية للوارث إلا أن يُجيز الورثة".
وذلك لأن سهل بن عمار هذا كذبه الحاكم، كما أنه زاد في المتن:"إلا أن يُجيز الورثة"، وهي زيادة منكرة، وأنه أخطأ في جعل الحديث من حبيب بن الشهيد، والصواب أنه حبيب المعلم، كما مضى.
وفي الباب ما روي عن جابر مرفوعا:"لا وصية لوارث".
رواه الدارقطني (4/ 97) عن أحمد بن محمد بن إسماعيل الأدمي، نا فضل بن سهل، حدثني إسحاق ابن إبراهيم الهروي، نا سفيان، عن عمرو، عن جابر فذكره. قال الدارقطني: الصواب مرسل.
ولعل مستنده ما ذكر عبد اللَّه بن علي بن المديني قال: سمعت أبي يقول:"أبو موسى الهروي روى عن سفيان، عن عمرو، عن جابر:"لا وصية لوارث" حدثنا به سفيان، عن عمرو مرسلا، وغمزه".
ذكره الذهبي في الميزان في ترجمة إسحاق بن إبراهيم الهروي.
وأخرجه ابن عدي عن أحمد بن محمد بن صاعد، عن أبي موسى الهروي، عن ابن عيينة. وأعله بأحمد هذا، وقال: هو أخو يحيى بن محمد بن صاعد، وأكبر منه، وأقدم موتا، وهو ضعيف".
وفي الباب ما روي أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تجوز الوصية لوارث إلا أن يشاء الورثة".
رواه أبو داود في المراسيل (341)، والدارقطني (4/ 97)، ومن طريقه البيهقي (6/ 263) من حديث ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
وفيه علتان:
الأولى: تدليس ابن جريج.
والثانية: الانقطاع؛ فإن عطاء -وهو الخراساني- لم يدرك ابن عباس، ولم يره. قاله أبو داود. وقال البيهقي:"وقد روي من وجه آخر عنه، عن عكرمة، عن ابن عباس".
قلت: وهو ما رواه الدارقطني (4/ 98)، والبيهقي من حديث يونس بن راشد، عن عطاء الخراساني، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر الحديث مثله.
قال البيهقي:"عطاء الخراساني غير قوي".
قال الحافظ في التلخيص (3/ 92):"وصله يونس بن راشد، فقال: عن عكرمة، عن ابن عباس. أخرجه الدارقطني، والمعروف المرسل".
ولكن قال الحافظ:"ورواه الدارقطني من طريق ابن عباس بسند حسن".
قلت: وهو يقصد ما رواه الدارقطني (4/ 98) عن يوسف بن سعيد، نا عبد اللَّه بن ربيعة، نا محمد ابن مسلم، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا وصية لوارث".
وفيه عبد اللَّه بن ربيعة لا يعرف من هو؟ ولم يشتهر هذا الحديث عن ابن عباس، ولذا لم يذكره الزيلعي في"نصب الراية" (4/ 404) مع أنه ذكر الرواية المرسلة، والمتصلة بذكر يونس بن راشد.
وفي الباب أحاديث أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
ومن العلماء من جعل حديث"لا وصية لوارث" من الأحاديث المتواترة؛ لأنه ليس من شرط المتواتر أن تكون كلها صحيحة، فإن كثرة المخارج للحديث تدل على استحالة الكذب فيه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওয়ারিশের জন্য কোনো অসিয়ত করা জায়েজ নয়। আর সন্তান হলো বিছানার (স্বত্বাধিকারীর), এবং ব্যভিচারীর জন্য রয়েছে পাথর (হতাশা/ব্যর্থতা)।"
