আল-জামি` আল-কামিল
6181 - عن عائشة قالت: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني لأعلمُ إذا كنت عني راضية، وإذا كنت علي غَضْبي"، قالت: فقلتُ: من أين تعرف ذلك؟ فقال:"أما إذا كنت عني راضية فإنك تقولين: لا ورب محمد، وإذا كنت غضبي قلت: لا ورب إبراهيم"، قالت: قلت: أجل واللَّه يا رسول اللَّه، ما أهجر إلا اسمك.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5228)، ومسلم في فضائل الصحابة (80: 2439) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
والغضب هنا: المراد منه الغيرة التي تلحق نساء النبي صلى الله عليه وسلم، وأما الغضب بمعنى الكراهية فهي لا يتصور من عائشة في حق النبي صلى الله عليه وسلم لأنها كبيرة ومُحْبطة للأعمال، بخلاف غير النبي صلى الله عليه وسلم فممكن.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমি অবশ্যই জানতে পারি কখন তুমি আমার প্রতি সন্তুষ্ট থাকো এবং কখন তুমি আমার উপর রাগান্বিত থাকো।" তিনি (আয়েশা) বললেন: আমি বললাম, "আপনি তা কীভাবে জানতে পারেন?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তুমি আমার প্রতি সন্তুষ্ট থাকো, তখন তুমি বলো: 'না, মুহাম্মাদের রবের কসম!' আর যখন তুমি রাগান্বিত থাকো, তখন তুমি বলো: 'না, ইবরাহীমের রবের কসম!'" তিনি (আয়েশা) বললেন: আমি বললাম, "হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি শুধু আপনার নামটাই (রাগ প্রকাশকালে) পরিহার করি।"
6182 - عن جابر قال: تزوجت امرأة فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هل تزوجت؟" قلت: نعم. قال:"أبكرًا أم ثيْبًا؟" قلت: ثيّبًا. قال:"فأين أنت من العذارى ولعَابها؟".
قال شعبة: فذكرته لعمرو بن دينار. فقال: قد سمعته من جابر. وإنما قال:"فهلا جارية تلاعبُها وتلاعبُك؟".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5080)، ومسلم في الرضاع (55: 1466) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا محارب قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه يقول: فذكره واللفظ لمسلم.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এক মহিলাকে বিবাহ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কি বিবাহ করেছ?" আমি বললাম, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "কুমারী না বিধবা (তালাকপ্রাপ্তা)?" আমি বললাম, "বিধবা।" তিনি বললেন, "তুমি কুমারী মেয়ে এবং তাদের সাথে আমোদ-প্রমোদ করা থেকে কেন দূরে রইলে?" শু’বাহ (রাবী) বলেন, আমি (এই কথাটি) আমর ইবনু দীনারের কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন, আমি জাবিরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে এটি শুনেছি। তবে তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন, "তুমি কেন একজন কুমারী মেয়েকে বিবাহ করলে না, যার সাথে তুমি খেলা করবে এবং সেও তোমার সাথে খেলা করবে?"
6183 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: كنا نتقي الكلام والانبساط إلى نسائنا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم هيبة أن ينزل فينا شيء، فلما توفّي النبي صلى الله عليه وسلم تكلّمنا وانبسطنا.
صحيح: رواه البخاري في النكاح (5187) عن أبي نعيم، حدثنا سفيان، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر رضي الله عنهما. فذكره.
قوله:"فلما توفي. . الخ".
قال ابن حجر: يشعر بأن الذي كانوا يتركونه كان من المباح تحت البراءة الأصلية، فكانوا يخافون أن ينزل في ذلك منع أو تحريم، وبعد وفاة النبي صلى الله عليه وسلم أمِنوا ففعلوا تمسكًا بالبراءة الأصلية.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমাদের স্ত্রীদের সাথে কথা বলা ও স্বাভাবিকভাবে মেলামেশা করা থেকে বিরত থাকতাম, এই ভয়ে যে হয়তো আমাদের ব্যাপারে (কোনো কঠোর নির্দেশ) অবতীর্ণ হবে। অতঃপর যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করলেন, তখন আমরা (স্বাচ্ছন্দ্যে) কথা বললাম এবং মেলামেশা শুরু করলাম।
6184 - عن عائشة أن امرأة من الأنصار زوّجت ابنتها، فتمعَّط شعرُ رأسِها، فجاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له، فقالتْ: إنّ زوجها أمرني أن أصل في شعَرها. فقال:"لا، إنه قد لُعِن الموصِلات".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5205)، ومسلم في اللباس والزينة (188: 2123) كلاهما من طريق إبراهيم بن نافع، أخبرني الحسن بن مسلم بن ينّاق، عن صفية بنت شيبة، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসারী মহিলা তার মেয়ের বিয়ে দিলেন। অতঃপর (বিয়ের পর) তার মাথার চুল ঝরে গেল (বা খুব পাতলা হয়ে গেল)। তখন সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে এ ব্যাপারে বলল। অতঃপর সে বলল: তার স্বামী আমাকে আদেশ করেছেন যে আমি যেন তার চুলে চুল সংযোজন করি (পরচুল লাগাই)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। নিশ্চয়ই যারা চুল সংযোজন করে (অর্থাৎ যারা অন্যের চুলে পরচুল লাগিয়ে দেয়), তারা অভিশপ্ত।"
6185 - عن أنس بن مالك قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم لا يطرق أهله. كان لا يدخل إلا غُدوةً
أو عشيةً.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1800)، ومسلم في الإمارة (1928 - 180) كلاهما من حديث همام بن يحيى، حدثنا إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের বেলা হঠাৎ করে তাঁর পরিবারের কাছে যেতেন না। তিনি কেবল সকালের প্রথমভাগে অথবা সন্ধ্যায় প্রবেশ করতেন।
6186 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في غزاة، فلما قدمنا المدينة ذهبنا لندخل، فقال:"أمهلوا حتى ندخل ليلًا (أي عشاءً) كي تمتشط الشَّعِثةُ، وتستجِدّ المُغيبَةُ".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5079)، ومسلم في الإمارة (1928: 181) كلاهما من طريق هُشيم، حدثنا سيّار، عن الشعبي، عن جابر، فذكره، واللفظ لمسلم.
وفي رواية عند البخاري (5344):"إذا طال أحدكم الغيبة فلا يطرق أهله ليلًا".
وفي رواية عند أبي داود (2777) من وجه آخر عن مغيرة عن الشعبي:"إن أحسن ما دخل الرجل على أهله إذا قدم من سفر أول الليل".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক যুদ্ধে ছিলাম। যখন আমরা মদিনায় পৌঁছলাম এবং (ঘরে) প্রবেশ করতে গেলাম, তখন তিনি বললেন: "তোমরা অপেক্ষা করো, আমরা রাতে (অর্থাৎ সন্ধ্যায়) প্রবেশ করব, যাতে এলোমেলো চুলের মহিলারা চুল আঁচড়ে নিতে পারে এবং যার স্বামী দূরে ছিল সে নিজেকে প্রস্তুত করে নিতে পারে।"
বুখারীর এক বর্ণনায় এসেছে: "যখন তোমাদের কেউ দীর্ঘ সময় অনুপস্থিত থাকে, তখন সে যেন রাতে হঠাৎ করে তার পরিবারের কাছে না আসে।"
আবু দাউদের অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "কোনো লোক সফর থেকে ফিরে এসে তার পরিবারের কাছে প্রবেশ করার উত্তম সময় হলো রাতের প্রথম ভাগ।"
6187 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يكره أن يأتي الرجل أهله طروقًا. وزاد في رواية: يتخوّنهم أو يلتمِسُ عثراتهم.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5243)، ومسلم في الإمارة (185: 1928) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا محارب بن دثار، قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه، فذكره. واللفظ للبخاري.
والزيادة لمسلم من رواية وكيع، عن سفيان (هو الثوري) عن محارب، به.
ورواه أيضًا من طريق عبد الرحمن -هو ابن مهدي- عن سفيان، به.
وقال: قال سفيان:"لا أدري هذا في الحديث أم لا؟" يعني"أن يتخونهم أو يلتمس عثراتهم".
قلت: ووقعت هذه الزيادة أيضًا من رواية أبي نعيم -هو الفضل بن دكين- عن سفيان، به، من غير شك. أخرجه النسائي في الكبرى (9096) وهو الصحيح، فإن الشك يزول باليقين.
وقولهم:"يتخونهم. . ." قال الخطابي في معالم السنن (2/ 92):"معناه كيلا يطلع منهم على خيانة أو رية".
وفي الباب ما رُوي عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نزل العقيق، فنهي عن طروق النساء الليلة التي يأتي فيها فعصاه فتيان، فكلاهما رأى ما يكره.
رواه أحمد (5814) والبزار -كشف الأستار- (1485) كلاهما من حديث خالد بن الحارث، عن محمد بن عجلان، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورجاله ثقات غير محمد بن عجلان فإنه ثقة إلا أنه اضطرب في حديث نافع كما قال يحيى بن معين:"كان ابن عجلان مضطرب الحديث في حديث نافع، ولم يكن له تلك القيمة عنده".
وذكره العقيلي في"الضعفاء" (4/ 118).
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد اللَّه بن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"لا تطرقوا النساء ليلًا".
رواه البزار - كشف الأستار (1487) عن محمد بن المثنى، ثنا أبو عامر، ثنا زمعة، عن سلمة ابن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وفيه زمعة بن صالح ضعيف. وبه أعله الهيثمي في المجمع (4/ 330) بعد أن عزاه للطبراني والبزار باختصار - وقال:"صالح بن معاوية ضعيف وقد وُثِّق. وسلمة بن وهرام روى عنه زمعة أحاديث مناكير".
ومن طريقه رواه الدارمي (458) وجاء فيه: وأقبل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قافلًا، فانسل رجلان إلى أهليهما، وكلاهما وجد مع امرأته رجلًا.
وفي الباب ما روي عن سعيد بن المسيب مرسلًا. رواه الدارمي (459).
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপছন্দ করতেন যে কোনো ব্যক্তি হঠাৎ করে (বিনা নোটিশে) রাতে তার পরিবারের কাছে আগমন করুক। অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: (তিনি এমন করতেন) যাতে সে তাদের উপর কোনো সন্দেহ না করে অথবা তাদের কোনো দোষত্রুটি খুঁজে না বেড়ায়।
6188 - عن عبد اللَّه بن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني رأيت الجنة فتناولت منها عنقودًا، ولو أخذته لأكلتم منه ما بقيت الدنيا، ورأيت النار فلم أر كاليوم منظرًا قط أفظع ورأيت أكثرها النساء" قالوا: لم يا رسول اللَّه؟ قال:"لكفرهنه قيل: أيكفرن باللَّه؟ قال:"ويكفرن العشير، ويكفرْنَ الإحسان، لو أحسنتَ إليها الدهر كله، ثم رأت منك شيئًا، قالت: ما رأيتُ منك خيرًا قط".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الكسوف (2) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره بتمامه في صلاة الكسوف.
ورواه البخاري في النكاح (5197)، ومسلم في صلاة الكسوف (907) كلاهما من طريق مالك، به، مثله، إلا أن مسلمًا لم يسق لفظه وإنما أحال على حديث حفص بن ميسرة عن زيد بن أسلم.
وقوله:"العشير" هو الزوج.
وقوله:"يكفرن" أي أنكرنَ، وفيه جواز إطلاق الكفر على كفران الحقوق ولا يكون الإنسان بهذا كافرا باللَّه تعالى. انظر تفصيل ذلك في كتاب الإيمان.
وقوله:"العنقود" من العنب ونحوه، ما تعقد وتراكم من ثمرة في أصل واحد. ويقال له أيضًا"القطف".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি জান্নাত দেখেছি এবং সেখান থেকে এক থোকা (ফল) ধরে নিয়েছিলাম। আমি যদি তা গ্রহণ করতাম, তবে পৃথিবী বিদ্যমান থাকা পর্যন্ত তোমরা তা থেকে খেতে পারতে। আর আমি জাহান্নাম দেখেছি। আজকের দিনের মতো এত ভয়াবহ দৃশ্য আর কখনও দেখিনি। আমি দেখেছি যে জাহান্নামীদের অধিকাংশই হলো নারী।" তাঁরা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কেন?" তিনি বললেন: "তাদের অকৃতজ্ঞতার কারণে।" জিজ্ঞেস করা হলো: "তারা কি আল্লাহ্র প্রতি কুফুরী করে?" তিনি বললেন: "তারা স্বামীর (বা সহচারীর) প্রতি অকৃতজ্ঞতা দেখায় এবং ইহসানের (উপকারের) অস্বীকার করে। যদি তুমি তাদের কারো প্রতি সারা জীবন অনুগ্রহ করতে থাকো, এরপর তোমার পক্ষ থেকে সামান্য কিছু দেখলেই সে বলে ওঠে: 'আমি তোমার কাছ থেকে কখনও কোনো কল্যাণ পাইনি'।"
6189 - عن أبي سعيد الخدري، قال خرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في أضحى أو فطر إلى المصلى، فمر على النساء، فقال:"يا معشر النساء، تصدقن، فإني رأيتكن أكثر أهل النار"، فقلن: وبمَ يا رسول اللَّه؟ قال: تكثرن اللعْن، وتكفرن العشير. . . الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (304)، ومسلم في الإيمان (80) من طريق سعيد بن أبي
مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد بن أسلم، عن عياض بن عبد اللَّه، عن أبي سعيد الخدري، فذكره. والنفظ للبخاري. ولم يذكر مسلم لفظه وإنما حال فيه على حديث ابن عمر رضي الله عنهما، وهو الآتي:
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল আযহা অথবা ঈদুল ফিতরের দিন ঈদগাহের দিকে বের হলেন। অতঃপর তিনি মহিলাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং বললেন: "হে নারী সমাজ, তোমরা সাদকা করো। কেননা আমি দেখেছি যে তোমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী।" তারা বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! কী কারণে? তিনি বললেন: তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করো। . . . (বাকি অংশ)
6190 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: شهدت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الصلاة يوم العيد، فبدأ بالصلاة قبل الخطبة بغير أذان ولا إقامة، ثم قام متوكئًا على بلال، فأمر بتقوى اللَّه وحث على طاعته، ووعظ الناس وذكرهم، ثم مضى حتى أتى النساء، فوعظهنّ وذكرهنّ، فقال:"تصدقن فإن أكثركن حطب جهنم" فقامت امرأة من سِطة النساء سعفاء الخدين، فقالت: لم يا رسول اللَّه؟ قال:"لأنكنّ تكثرْن الشكاة وتكفرن العشير" قال: فجعلنَ يتصدقنَ من حليّهنَّ يلقينَ في ثوب بلالٍ من أقرِطَتِهنّ وخواتمهن.
متفق عليه: رواه مسلم في صلاة العيدين (4: 885) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، حدثنا أبي، حدّثنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن جابر، فذكره.
ورواه البخاري في العيدين (978) من طريق عبد الرزاق، حدثنا ابن جريج، قال أخبرني عطاء، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكر بنحوه وليس فيه قوله:"تصدقن" إلى قوله"وتكفرن العشير".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ঈদের দিন সালাতে উপস্থিত ছিলাম। তিনি আযান ও ইকামত ছাড়াই খুতবার আগে সালাত শুরু করলেন। অতঃপর তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ভর করে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহকে ভয় করার আদেশ দিলেন এবং তাঁর আনুগত্যের জন্য উৎসাহিত করলেন, আর লোকদের নসিহত করলেন ও তাদের উপদেশ দিলেন। এরপর তিনি নারীদের কাছে গেলেন, তাদের নসিহত করলেন ও উপদেশ দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা সাদাকা করো। কারণ তোমাদের অধিকাংশই জাহান্নামের ইন্ধন হবে।" তখন মহিলাদের মধ্য থেকে গালের দিক থেকে শ্যামলা এক নারী দাঁড়িয়ে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কেন?" তিনি বললেন: "কারণ তোমরা বেশি অভিযোগ করো এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞ হও।" রাবী বলেন: এরপর তারা তাদের অলঙ্কার থেকে সাদাকা দিতে লাগল। তারা তাদের কানের দুল ও আংটি বিলালের কাপড়ের মধ্যে নিক্ষেপ করতে লাগল।
6191 - عن عبد اللَّه بن عمر، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"يا معشر النساء، تصدَّقْنَ وأكثِرْنَ الاستغفارَ، فإني رأيتكنّ أكثرَ أهل النار"، فقالت امرأة منهنّ، جزْلة: ومالنا يا رسول اللَّه، أكثر أهل النار؟ قال:"تُكثرن اللعن، وتكفُرْنَ العشيرَ" الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (79) عن محمد بن رُمح بن المهاجر المصريّ، أخبرنا الليث (هو ابن سعد)، عن ابن الهاد، عن عبد اللَّه بن دينار، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে নারী সমাজ, তোমরা সাদকা করো এবং বেশি বেশি ইস্তিগফার (আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা) করো। কারণ আমি তোমাদেরকে জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হিসেবে দেখেছি।" তখন তাদের মধ্য থেকে এক বুদ্ধিমতী নারী বলল: হে আল্লাহর রাসূল, কী কারণে আমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী? তিনি বললেন: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ (লা'নত) দাও এবং স্বামীর (কৃত উপকার অস্বীকার করে) নাশুকরি করো।"
6192 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم بمثل معنى حديث ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم كما قال مسلم.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (80) من طريق إسماعيل (هو ابن جعفر) عن عمرو بن أبي عمرو، عن المقبري، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم ولم يذكر مسلم لفظه وإنما أحال فيه على حديث ابن عمر السابق.
ورواه أحمد (8862) عن سليمان بن داود الهاشمي، أخبرنا إسماعيل بإسناده مطولا، وفيه قصة زينب زوج ابن مسعود، وليس فيه:"تكثرن اللعن، وتكفرن العشير"، فكأنه أحال إليه لمعناه المتقارب.
৬১৯২ - আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীসের অর্থের অনুরূপ একটি বর্ণনা এসেছে, যেমনটি ইমাম মুসলিম বলেছেন।
সহীহ: এটি ইমাম মুসলিম ঈমান (৮০) গ্রন্থে ইসমাঈল (তিনি ইবনু জা‘ফার), তিনি ‘আমর ইবনু আবূ ‘আমর, তিনি মাকবুরী, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে রিওয়ায়াত করেছেন। মুসলিম এই হাদীসের শব্দগুলো উল্লেখ করেননি, বরং তিনি পূর্বের ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের দিকেই ইঙ্গিত করেছেন।
এবং এটি আহমাদ (৮৮৬২)-এ সুলায়মান ইবনু দাঊদ আল-হাশিমী থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি ইসমাঈল থেকে তাঁর সূত্রে বিস্তারিতভাবে রিওয়ায়াত করেছেন। তাতে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনাও রয়েছে। কিন্তু তাতে এই শব্দগুলো নেই: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর প্রতি অকৃতজ্ঞ হও।" তাই ধারণা করা হয়, তিনি অর্থের সাদৃশ্যতার কারণে এই হাদীসের দিকে ইঙ্গিত করেছেন।
6193 - عن أسماء بنت يزيد -إحدى نساء بني عبد الأشهل- تقول: مَرَّ بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونحن في نسوة، فسلَّم علينا، وقال:"إياكن وكفر الْمُنْعِمين"، فقلنا: يا رسول اللَّه، وما كفر الْمُنعِمين؟ قال:"لعل إحداكن أن تطول أيمتها بين أبويها، وتعنس، فيرزقها
اللَّه عز وجل زوجا، ويرزقها منه مالا وولدا، فتغضب الغضبة، فتقول: ما رأيت منه يوما خيرا قط".
حسن: رواه أحمد (27561) والطبراني في الكبير (24/ 164) كلاهما من حديث شهر يقول: سمعت أسماء تقول: فذكرته.
وذكر بعض أصحاب السنن مقتصرا على ذكر السلام على النساء.
وإسناده حسن، وفي شهر كلام معروف غير أنه توبع. فقد رواه البخاري في الأدب المفرد (1048) عن مخلد، قال: حدثنا مبشر بن إسماعيل، عن ابن أبي غنية، عن محمد بن مهاجر، عن أبيه، عن أسماء، فذكرته نحوه.
ورواه الطبراني في الكبير (24/ 184) من وجه آخر عن ابن أبي غنية بإسناده مثله. ومحمد بن مهاجر وأبوه ذكر هما ابن حبان في"الثقات".
আসমা বিনত ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা কয়েকজন মহিলা ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তিনি আমাদেরকে সালাম দিলেন এবং বললেন: "তোমরা নেয়ামতদাতাদের (উপকারকারীদের) অকৃতজ্ঞতা থেকে বেঁচে থাকো।" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, নেয়ামতদাতাদের অকৃতজ্ঞতা কী? তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে হয়তো কোনো একজনের তার বাবা-মায়ের কাছে দীর্ঘ সময় অবিবাহিত অবস্থায় কেটে যায়, এবং সে বার্ধক্যে পৌঁছায়, অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাকে স্বামী দান করেন, এবং তার পক্ষ থেকে ধন-সম্পদ ও সন্তান দান করেন। এরপর সে যখন রাগান্বিত হয়, তখন সে বলে: 'আমি তার পক্ষ থেকে কোনো দিনও সামান্য ভালো কিছু দেখিনি।'"
6194 - عن معاذ بن جبل قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تؤذي امرأة زوجها إلا قالت زوجتُه من الحور العين: لا تؤذيه قاتلكِ اللَّه، فإنما هو عندك دخيل، أوشك أن يفارقكِ إلينا".
حسن: رواه الترمذي (1174) وابن ماجه (2014) وأحمد (22101) كلهم من حديث إسماعيل ابن عياش، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن معاذ بن جبل فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش فإنه مختلف فيه إلا أن روايته عن الشامين حسن وهذا منها.
وقد قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه، ورواية إسماعيل بن عياش عن الشاميين أصلح، وله عن أهل الحجاز وأهل العراق مناكير".
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখনই কোনো নারী তার স্বামীকে কষ্ট দেয়, তখনই তার (স্বামীর) জান্নাতের হুর (আইন) স্ত্রীরা বলতে থাকে: ‘তাকে কষ্ট দিও না, আল্লাহ তোমাকে অভিশাপ দিন। কেননা সে (স্বামী) তো তোমার কাছে কেবল একজন মেহমান মাত্র; শীঘ্রই সে তোমাকে ছেড়ে আমাদের কাছে চলে আসবে।’”
6195 - عن عبد اللَّه بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استأذنت امرأة أحدكم المسجد فلا يمنعها".
وزاد في رواية: فقال بلال بن عبد اللَّه: واللَّه لنمنعهنّ، قال: فأقبل عليه عبد اللَّه فسبّه سبًّا سيئًا، ما سمعته سبّه مثله قط، وقال: أخبرُك عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وتقول: واللَّه لنمنعهنّ.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5238)، ومسلم في الصلاة (134: 442) كلاهما من طريق ابن عيينة، حدثنا الزهري، سمع سالمًا يحدّث عن أبيه، فذكره.
والزيادة في رواية مسلم (442: 135) من طريق يونس، عن ابن شهاب الزهري، به.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো স্ত্রী মসজিদে যাওয়ার অনুমতি চায়, তখন সে যেন তাকে বাধা না দেয়।"
অন্য এক বর্ণনায় যোগ করা হয়েছে যে, তখন (তাঁর পুত্র) বিলাল ইবনে আব্দুল্লাহ বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই তাদেরকে বারণ করব। বর্ণনাকারী বলেন: তখন আব্দুল্লাহ (ইবনে উমার) তাঁর দিকে মুখ ফিরিয়ে এমন কঠোর গালি দিলেন, যা আমি তাঁকে ইতিপূর্বে আর কখনও দিতে শুনিনি। এবং তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে উমার) বললেন: আমি তোমাকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা বলছি, আর তুমি বলছো: ‘আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই তাদেরকে বারণ করব’?!
6196 - عن عائشة قالت: خرجت سودة بنت زمعة ليلًا، فرآها عمر فعرفها، فقال: إنّك واللَّه يا سودة، ما تخفَيْنَ علينا، فرجعتْ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فذكرتْ ذلك له، وهو في حجرتي يتعشّى، وإنّ في يده لعَرْقًا فأُنزل عليه، فرُفع عنه، وهو يقول:"قد أذِنَ لكُنّ أن تخرُجْن لحوائجكنّ".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5237) من طريق علي بن مُسهر -ومسلم في السلام (17: 2170) من طريق أبي أسامة- كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته، واللفظ للبخاري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা বিনত যাম‘আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাতে বের হলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখে চিনতে পারলেন এবং বললেন, 'আল্লাহর কসম হে সাওদা, তুমি আমাদের কাছ থেকে গোপন থাকতে পারো না।' অতঃপর তিনি (সাওদা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ফিরে এসে তাঁকে তা জানালেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার (আয়িশার) ঘরে রাতের খাবার খাচ্ছিলেন এবং তাঁর হাতে গোশতসহ একটি হাড় ছিল। এমতাবস্থায় তাঁর উপর ওহী নাযিল হলো। যখন ওহী শেষ হলো, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের প্রয়োজনে তোমাদেরকে বাইরে যাওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।"
6197 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تُباشر المرأةُ المرأةَ، فتنعتها لزوجها كأنه ينظر إليها".
صحيح: رواه البخاري في النكاح (5240) عن محمد بن يوسف، حدثنا سفيان، عن منصور، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره ورواه أيضًا (5241) من وجه آخر عن أبي وائل مثله.
وزاد النسائي من طريق مسروق، عن ابن مسعود:"ولا الرجلُ الرجلَ".
وفي حديث سعيد ذكر القيد وهو"الثوب الواحد" كما سيأتي وفي الحديث تحريم ملاقاة بشرتي المرأتين وكذلك الرجلين بغير حائل في ثوب واحد، لأن ذلك قد يُفضي إلى لمس عورة بعضهم من بعض، أو إثارة الشهوة بينهما. وفي النهاية يؤدي إلى التقاء ختان بعضهم من بعض.
وقوله:"تنعتها لزوجها" وذلك خشية أن يعجب الزوج الوصف المذكور، فيطلِّق زوجته، أو يفتن بالموصوفة.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “এক নারী যেন অন্য নারীর সাথে (এক কাপড়ের নিচে) সরাসরি চামড়ার স্পর্শ না ঘটায়, এরপর সে যেন তার স্বামীকে ওই নারীর বর্ণনা না দেয়, যাতে মনে হয় যেন সে (স্বামী) তাকে দেখছে।”
6198 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تباشر المرأةُ المرأةَ، ولا الرجلُ الرجلَ".
حسن: رواه أحمد (8318) والطبراني في الصغير (653) والطحاوي في مشكله (3285) كلهم من حديث أبي بكر، عن هشام، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي بكر وهو ابن عياش الأسدي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وقد جاء استثناء الولد والوالد في حديث الطفاوي، عن أبي هريرة رواه أحمد (9775) وابن حبان (5583) كلاهما من حديث سفيان، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن الطفاوي، عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يُباشر الرجلُ الرجلَ، ولا تباشر المرأةُ المرأة إلا الولد والوالد" وسقط الطفاوي في إسناد ابن حبان.
وهذه زيادة منكرة، والطفاوي شيخ لأبي نضرة، لم يسم، ولا يعرف.
وأخرج نحوه أبو داود (2174) مطولا فقال: حدثنا مسدد، حدثنا بشر، حدثنا الجريري، ح وحدثنا مؤمل، حدثنا إسماعيل، ح وحدثنا موسى، حدثنا حماد كلهم عن الجريري، عن أبي نضْرة، حدثني شيخ من طفاة قال: تثوَّيتُ أبا هريرة بالمدينة، فلم أر رجلًا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أشد تشميرًا، ولا أقوم على ضيف منه، فبينما أنا عنده يومًا وهو على سرير له، معه كيس فيه حصى، أو نوى، وأسفل منه جارية له سوداء، وهو يسبح بها، حتى إذا نفد ما في الكيس ألقاه إليها فجمعته فأعادته في الكيس، فرفعته إليها، فقال: ألا أحدّثك عني وعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قال: قلت: بلى، قال: بينا أنا أوعك في المسجد، إذ جاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى دخل المسجد، فأقبل يمشي حتى انتهى إليّ، فوضع يده عليّ، فقال لي معروفا، فنهضتُ، فانطلق يمشي حتى أتى مقامه الذي يصلي فيه، فأقبل عليهم ومعه صفان من رجال، وصف من نساء، أو: صفان من نساء وصف من رجال، فقال:"إن أنساني الشيطانُ شيئًا من صلاتي فليسبّح القوم وليصفق النساء" قال: فصلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولم ينس شيئًا، فقال:"مجالسكم مجالسكم" زاد موسى:"هاهنا": ثم حمد اللَّه وأثنى عليه، ثم قال:"أما بعد:" ثم اتفقوا: ثم أقبل على الرجال، قال:"هل منكم الرجل إذا أتى أهله فأغلق عليه بابه وألقى عليه ستره. واستر بستر اللَّه؟ !" قالوا: نعم، قال:"ثم يجلس بعد ذلك فيقول: فعلت كذا، فعلت كذا؟ قال: فسكتوا. قال: فأقبل على النساء فقال:"هل منكنّ مَنْ تحدّث؟" فسكتنَ، فجئَتْ فتاةٌ -قال مؤمل في حديثه: فتاة كعاب- على إحدى ركبتيها، وتطاولت الرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليراها ويسمع كلامها، فقالت: يا رسول اللَّه، إنهم ليتحدثون، وإنهن ليتحدثنه، فقال:"هل تدرون ما مثل ذلك؟" فقال:"إنما مثل ذلك شيطانة لقيت شيطانًا في السكة، فقضى منها حاجته والناس ينظرون إليه، ألا إن طيب الرجال ما ظهر ريحه ولم يظهر لونه، ألا إن طيب النساء ما ظهر لونه ولم يظهر ريحه".
قال أبو داود: ومن هاهنا حفظته عن مؤمل وموسى:"ألا لا يفضين رجل إلى رجل، ولا امرأة إلى امرأة، إلا إلى ولد أو والده وذكر ثالثة فأنسيتها، وهو في حديث مسدد، ولكني لم أتقنه كما أحب، وقال موسى: حدثنا حماد، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن الطفاوي.
وروى الإمام أحمد (10977) عن إسماعيل بن إبراهيم، عن سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن رجل من الطفاة قال: نزلت على أبي هريرة فذكر مطولا نحوه.
وروى الترمذي (2787) والنسائي (5117، 5118) بعضه من طريق سفيان، عن الجُريري، عن أبي نضرة، عن رجل، عن أبي هريرة، وفي إحدى الروايتين في النسائي"عن الطفاوي عن أبي هريرة" مختصرا.
قال الترمذي: هذا حديث حسن إلا أن الطفاوي لا نعرفه إلا في هذا الحديث، ولا تعرف اسمه، وحديث إسماعيل بن إبراهيم أتم وأطول".
قلت: لعله حسّنه لوجود شواهد صحيحة لبعض فقراته، وإلا ففيه الطفاوي لا يعرفه، ولا غيره
إلا في هذا الحديث.
والجريري هو سعيد بن إياس مختلط فيه، ولكن سمع منه سفيان قبل الاختلاط.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যেন কোনো নারী অন্য নারীকে স্পর্শ না করে, এবং যেন কোনো পুরুষ অন্য পুরুষকে স্পর্শ না করে।”
6199 - عن وعن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يباشر الرجلُ الرجلَ، ولا المرأةُ المرأةَ".
صحيح: رواه الإمام أحمد (2773) والطبراني في الكبير (11728) والبزار -كشف الأستار- (2074) وابن حبان (5582) كلهم من حديث إسرائيل، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وسماك بن حرب اضطرب في حديث عكرمة، ولكنه ثبت أنه لم يضطرب في هذا الحديث لأنه تابعه أبو إسحاق الشيباني، فرواه عن عكرمة، عن عبد اللَّه بن عباس مثله.
ومن طريقه رواه الطبراني في الكبير (11794) والصغير (1094) والحاكم (4/ 288) وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري، فقد أجمعا على صحة هذا الحديث".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পুরুষ যেন পুরুষের সাথে (দেহ) স্পর্শ না করে এবং নারী যেন নারীর সাথে (দেহ) স্পর্শ না করে।"
6200 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى أن يباشر الرجلُ الرجلَ، في ثوب واحد، والمرأةُ المرأةَ في ثوب واحد.
حسن: رواه الحاكم (4/ 287) من حديث عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد فإنه حسن الحديث في الشواهد. ورواه أيضًا بإسناد آخر عن أحمد بن يونس، ثنا أبو شهاب، عن ابن أبي ليلى، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر مثله.
قال: وقال ابن أبي ليلى: وأنا أرى فيه التعزير، ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى من أجل بيت الصحابة من الأنصار، ومفت وفقيه بالكوفة، إذ رأى فيه التعزير، ففيه قدوة". انتهى.
وفي الباب ما روي عن أبي الحُصين الهيثم بن شَفيّ أنه سمعه يقول:
خرجت أنا وصاحب لي يسمى أبا عامر -رجل من المعافر- لنصلي بيلياء، وكان قاصُّهم رجلًا من الأزد، يقال له: أبو ريحانة من الصحابة. قال أبو الحصين: فسبقني صاحبي إلى المسجد، ثم أدركته، فجلست إلى جنبه، فسألني هل أدركت قصص أبي ريحانة؟ فقلت: لا. فقال: سمعته يقول: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن عشرة: عن الوشر، والوشم، والنتف، وعن مكامعة الرجل بغير شعار، ومكامعة المرأة المرأةَ بغير شعار، وأن يجعل الرجل في أسفل ثيابه حريرًا مثل الأعلام، وأن يجعل على منكبيه مثل الأعاجم، وعن التهبي، وركوب النّمور، ولبوس الخاتم إلا الذي سلطان.
رواه أبو داود (4049) والنسائي (5091) وأحمد (17209) والطحاوي في مشكله (3255) كلهم من حديث المفضل بن فضالة، حدثني عياش بن عباس، عن أبي الحصين فذكره، ورواه الطحاوي في مشكله (3253) من طريق آخر عن عبد اللَّه بن لهيعة، عن عياش بن عباس به.
أبو عامر الحَجْري المصري"مقبول" كما في التقريب أي عند المتابعة، وإلا فلين الحديث، وهو كذلك لأنه لم نجد له متابعة، وإن كان لبعض فقراته شواهد صحيحة، وقد رُوي من وجه آخر عن أبي الحصين، عن أبي ريحانة. رواه أحمد (17208) والنسائي (5111) مختصرا وفيه انقطاع فإن أبا الحصين لم يسمع من أبي ريحانة، وإنما سمعه من صاحبه أبي عامر، عنه، كما في الرواية الأولى.
وفي بعض فقراته شذوذ مثل قوله: وأن يجعل على منكبيه مثل الأعاجم، ومثل قوله: ولبوس الخاتم إلا لذي سلطان.
وقوله:"بغير شعار" أي بغير ثوب، لأن ذلك يثير الشهوة، فيقع الإنسان في المحظورات مثل الشذوذ الجنسي وغيره.
وأبو ريحانة: هو شمعون بن زيد بن خنافة الأزدي، وقيل الأنصاري، وقيل القرشي، وقيل: كان قرظيًا. وله حلف في الأنصار.
قال ابن السكن: سكن الشام، حديثه في المصريين.
وقال ابن يونس: شمعون الأزدي يكنى أبا ريحانة، وذكر فيمن قدم مصر من الصحابة، وما عرفنا وقت قدومه، روى عنه من أهل مصر كريب بن أبرهة، وعمرو بن مالك، وأبو عامر الحجْري.
وقال البخاري: نزل الشام، له صحبة.
وقال ابن البرقي: له خمسة أحاديث.
قوله:"مكامعة الرجلِ الرجلَ" فسر أبو عبيد: هي أن يضاجع الرجل الرجلَ في ثوب واحد، أخذ من الكميع، وهو الضجيع.
قال أبو عبيد: وقد روي هذا الحديث من حديث الليث، عن عياش بن عباس رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن المكاعمة.
وقال: والمكاعمة: أن يلثم الرجل صاحبه. أخذ من كعام البعير، وهو أن يُشَدّ فمُه إذا هاج. يقال: كعمتُه أكمعه كعما، فهو مكعوم. وكذلك كل مشدود الفم فهو مكعوم. انظر للمزيد:"غريب الحديث" (1/ 171 - 172).
وقوله: عن الوَشْر -بفتح الواو وسكون الشين-، وهو معالجة الأسنان بما يُحددها ويُرَقِّقُ أطرافها، تفعلها المرأة المُسنَة وتتشبّه بذلك بالفتيات.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিষেধ করতে শুনেছি যে, কোনো পুরুষ যেন একই কাপড়ের ভেতর অন্য কোনো পুরুষের সাথে সংলগ্ন (মিলেমিশে) না হয় এবং কোনো নারী যেন একই কাপড়ের ভেতর অন্য কোনো নারীর সাথে সংলগ্ন (মিলেমিশে) না হয়।