আল-জামি` আল-কামিল
6201 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا ينظر الرجل إلى عورة الرجل، ولا المرأة إلى عورة المرأة، ولا يُفضي الرجل إلى الرجل في ثوب واحد، ولا تُفضي المرأة إلى المرأة في الثوب الواحد".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (338) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا زيد بن الحُباب، عن الضحاك بن عثمان قال: أخبرني زيد بن أسلم، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه فذكره.
لا خلاف بين أهل العلم في تحريم نظر الرجل إلى عورة الرجل، وتحريم نظر المرأة إلى عورة المرأة، وكذلك تحريم نظر الرجل إلى عورة المرأة، والمرأة إلى عورة الرجل، ويستثنى من ذلك الزوجان، فكل منهما يجوز له النظر إلى عورة صاحبه.
وأما نظر الرجل إلى محارمه ونظرهن إليه ففي قول: لا يحل إلا ما يظهر في حال الخدمة والتصرف كما ذكره النووي في شرح مسلم. وقال أيضًا: والصحيح أنه يباح فيما فوق السرة وتحت الركبة". اهـ.
قلت: والمرأة كلما تكون محتشمة حتى أمام المحارم تكون أفضل وأحفظ. لأن الشيطان يجري مجرى الدم، وقد كثُرَ الوقوعُ بين المحارم في عصر الانحلال الخلقي كما نسمع، نسأل اللَّه العافية والسلامة.
وقوله:"يُباح فيما فوق السرة وتحت الركبة" هذا التوسع أخذه من حديث ضعيف وهو قول غالب الفقهاء، وقد تكلّمتُ عليه في كتاب اللباس، فانظر هناك.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো পুরুষ যেন অপর পুরুষের সতর (লজ্জাস্থান) না দেখে, আর কোনো নারী যেন অপর নারীর সতর না দেখে। কোনো পুরুষ যেন অপর পুরুষের সাথে একই কাপড়ের নিচে (উলঙ্গ অবস্থায়) না শোয় এবং কোনো নারী যেন অপর নারীর সাথে একই কাপড়ের নিচে (উলঙ্গ অবস্থায়) না শোয়।
6202 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن من أشّر الناس يوم القيامة، الرجل يفضي إلى امرأته، وتفضي إليه ثم ينشر سرّها".
وفي لفظ:"إن من أعظم الأمانة عند اللَّه يوم القيامة، الرجل يفضي إلى امرأته وتفضي إليه، ثم ينشر سرّها".
حسن: رواه مسلم في النكاح (123: 1437) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا مروان بن معاوية، عن عمر بن حمزة العمري، حدثنا عبد الرحمن بن سعد، قال: سمعت أبا سعيد الخدري يقول: فذكره.
ورواه اللفظ الآخر من طريق أبي أسامة (هو حماد بن أسامة)، عن عمر بن حمزة، به.
وقد تكلم الناس في هذا الحديث من أجل عمر بن حمزة العمري فقال النسائي: ضعيف، وقال أحمد: أحاديثه مناكير، وقال ابن حبان: كان ممن يخطئ، وقال ابن معين: أضعف من عمر بن محمد بن زيد.
واستنتج ابنُ القطان من قول ابن معين بأن هذا تفضيل لعمر بن محمد بن زيد عليه، فإنه ثقة، وهو في الحقيقة تفضيل أحد ثقتين على الآخر، فالحديث به حسن. بيان الوهم والايهام (4/ 451) وهذا الحديث مما انتقاه مسلم من أحاديثه وإلا فهو ضعيف الحديث عند أئمة الحديث.
وأما الذهبي فذكر هذا الحديث في الميزان (3/ 192) فقال:"فهذا مما استنكر لعمر" وقال:"واحتج به مسلم".
ورُويَ بمعناه عن أسماء بنت يزيد أنها كانت عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، والرجال والنساء قعود عنده، فقال:"لعل رجلًا يقول: ما يفعل بأهله، ولعل امرأة تخبر بما فعلت مع زوجها" فأرمّ القوم، فقلت: إي واللَّه يا رسول اللَّه، إنهن ليقُلن، وإنهم ليفعلون قال:"فلا تفعلوا، فإنما مثل ذلك مثل الشيطان، لقي شيطانة في طريق فغشيها، والناس ينظرون".
رواه أحمد (27583) والطبراني في الكبير (24/ 162) كلاهما من طريق حفص السراج قال: سمعت شهرًا يقول: حدثتني أسماء بنت يزيد فذكرته.
وفيه شهر وهو ابن حوشب وفيه كلام معروف، وهو لا بأس به في الشواهد ولكن الراوي عنه حفص السراج وهو ابن أبي حفص السراج قال الذهبي: ليس بالقوي، وقال الدارقطني:"مجهول" وهو من رجال"التعجيل".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة في حديث طويل كما ذُكِر، وجاء فيه:"هل فيكم رجل إذا أتى أهله أغلق بابه، وأرخى ستره، ثم يخرج فيحدث فيقول:"فعلت بأهلي كذا، وفعلت بأهلي كذا" فسكتوا، فأقبل على النساء فقال:"هل منكنّ تحدّث"، فجئت فتاة كعاب على إحدى ركبنيها، وتطاولت لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليراها ويسمع كلامها، فقالت: إي واللَّه إنهم ليتحدثون، وإنهن ليُحدثن، قال:"فهل تدرون ما مثل من فعل ذلك؟""إن مثل ذلك، مثل شيطان وشيطانة لقي أحدهما صاحبه بالسكة، فقضى حاجته منها والناس ينظرون إليه".
رواه أحمد (10977) وأبو داود (2174) والترمذي (2787) والنسائي (5117، 5118) وابن السني (615) كلهم من حديث سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن الطفاوي، عن أبي هريرة فذكره.
وفي إسناده الطفاوي. قال الترمذي:"هذا حديث حسن، إلا أن الطفاوي لا نعرفه إلا في هذا الحديث، ولا نعرف اسمه" يعني"لا يُعرف" كما قال ابن حجر.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় কিয়ামতের দিন নিকৃষ্টতম ব্যক্তি হলো সেই পুরুষ, যে তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয় এবং স্ত্রী তার সাথে মিলিত হয়, অতঃপর সে তাদের গোপন কথা ফাঁস করে দেয়।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: নিশ্চয় কিয়ামতের দিন আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বড় খেয়ানত হলো সেই পুরুষের, যে তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয় এবং স্ত্রী তার সাথে মিলিত হয়, অতঃপর সে তাদের গোপন কথা প্রকাশ করে দেয়।
6203 - عن عبد اللَّه بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا تزوّج أحدكم امرأةً، أو اشترى خادمًا فليقل: اللَّهم إني أسألك خيرها، وخير ما جَبَلْتَها عليه، وأعوذُ بك من شرّها ومن شر ما جَبَلْتَها عليه، وإذا اشترى بعيرًا فليأخذْ بذروةِ سَنامه وليقلْ مثل ذلك".
وفي لفظ:"إذا أفاد أحدُكم امرأةً، أو خادمًا، أو دابةً، فليأخذ بناصيتها"، وليقُلْ: فذكر الحديث.
حسن: رواه أبو داود (2160) وابن ماجه (1918) وابن السني (100) والحاكم (2/ 185) والبيهقي (7/ 148) كلهم من حديث محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب، بإسناده مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على ما ذكرناه من رواية الأئمة الثقات عن عمرو بن شعيب، ولم يخرجاه عن عمرو في الكتابين".
وإسناده حسن من أجل الكلام على محمد بن عجلان وعلي شيخه عمرو. غير أنهما حسنا الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ কোনো মহিলাকে বিবাহ করে, অথবা কোনো খাদেম (ভৃত্য) ক্রয় করে, তখন সে যেন বলে: “আল্ল-হুম্মা ইন্নি- আসআলুকা খাইরাহা-, ওয়া খাইরা মা- জাবালতাহা- ‘আলাইহি, ওয়া আ‘ঊযু বিকা মিন শাররিহা-, ওয়া শাররি মা- জাবালতাহা- ‘আলাইহি।” (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে তার কল্যাণ এবং তার মাঝে তুমি যে স্বভাব তৈরি করেছ, তার কল্যাণ প্রার্থনা করছি। আর তার অনিষ্ট এবং তার মাঝে তুমি যে স্বভাব তৈরি করেছ তার অনিষ্ট থেকে তোমার কাছে আশ্রয় চাচ্ছি।) আর যখন সে কোনো উট ক্রয় করে, তখন যেন তার কুঁজের অগ্রভাগ ধরে অনুরূপ দো‘আ করে।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: যখন তোমাদের কেউ কোনো মহিলা, খাদেম অথবা জন্তু লাভ করে, তখন সে যেন তার কপাল ধরে এবং ঐ দো‘আ পড়ে।
6204 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما لو أن أحدكم يقول حين يأتي أهله: بسم اللَّه، اللَّهم جنّبني الشيطان، وجنّب الشيطان ما رزقتنا. ثم قدّر بينهما في ذلك أو قضي ولد لم يضُرّه شيطان أبدًا".
وفي لفظ:"لو أن أحدهم إذا أراد أن يأتي أهله. . .".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5165)، ومسلم في النكاح (166: 1434) كلاهما من طريق منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن كُريب، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ للبخاري.
واللفظ الثاني لمسلم.
ودلّ اللفظ الثاني أن هذا القول يأتي به قبل الشروع في الجماع.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন তার স্ত্রীর নিকট গমন করে, তখন যদি সে বলে: 'বিসমিল্লাহ, হে আল্লাহ! আপনি আমাদের শয়তান থেকে দূরে রাখুন এবং শয়তানকে দূরে রাখুন যা আপনি আমাদের দান করবেন (সন্তান)।' এরপর যদি তাদের উভয়ের মাঝে (সেই মিলনে) কোনো সন্তান নির্ধারিত হয় বা প্রদান করা হয়, তবে শয়তান তাকে কখনো ক্ষতি করতে পারবে না।"
6205 - عن بهز بن الحكيم، عن أبيه، عن جده قال: قلت: يا رسول اللَّه، عوراتنا ما تأتي منها وما نذر؟ قال:"احفظْ عورتَك إلا مِنْ زوجتِك، أو ما ملكت يمينك". قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت إن كان القوم بعضهم في بعض؟ قال:"إن استطعت أن لا يرينَّها أحد، فلا يرينّها". قلت: يا رسول اللَّه، إن كان أحدنا خاليا؟ قال:"فاللَّه أحق أن يستحيا منه من الناس".
حسن: رواه أبو داود (4017) والترمذي (2769، 2749) وابن ماجه (1929) والحاكم (4/ 179 - 180) والبيهقي (1/ 199) كلهم من هذا الوجه. وإسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه حكيم بن معاوية فإنهما صدوقان.
وأما ما رُوي عن عتبة بن عبدٍ السُّلميّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أتى أحدكم أهله فليستتر، ولا يتجرد تجرد العيرين" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (1921) عن الوليد بن القاسم الهمداني، ثنا الأحوص بن حكم، عن أبيه، وراشد بن سعد وعبد الأعلى بن عدي، عن عتبة بن عبد السلمي فذكره.
وفيه الوليد بن القاسم الهمداني مختلف فيه فضعفه ابن معين، وقال ابن حبان: انفرد عن الثقات بما لا يُشبه حديث الأثبات فخرج عن الاحتجاج بأفراده. وقال ابن عدي: إذا روى عن
ثقة، وروى عنه ثقة فلا بأس به.
قلت: وهذا مما روي عن غير ثقة، وهو الأحوص بن حكيم العنسي فإن الغالب على حديثه الضعف. ضعفه النسائي والجوزجاني، وقال أبو حاتم: ليس بقوي منكر الحديث. ولكن قال غير واحد من أهل العلم يعتبر حديثه. ولم أجد له من تابعه على ذلك، وبه أعله البوصيري في زوائد ابن ماجه.
وكذلك لا يصح ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أتى أحدكم فليستتر، ولا يتجردان تجرد العَيرين".
رواه البيهقي (7/ 193) وقال: تفرد به مندل بن علي وليس بالقوي. وهو وإن لم يكن ثابتا فمحمودٌ في الأخلاق.
قال الشافعي:"وأكره أن يَطأها، والأخرى تنظر، لأنه ليس من التستر، ولا محمود الأخلاق، ولا يشبه العشرة بالمعروف. وقد أمر أن يعاشرها بالمعروف".
وأما أن ينام الرجل بين المرأتين كما جاء عن ابن عباس أنه كان ينام بين جاريتين.
فقال أبو عبيد: هذا عندي على النوم، ليس على الجماع. ذكره البيهقي.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد اللَّه بن سَرْجِس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أتى أحدُكم أهلَه فليلق على عَجُزِه وعَجُزِها شيئًا، ولا يتجردا تجرد العَيرين".
رواه النسائي في الكبرى (9029) عن محمد بن عبد اللَّه بن عبد الرحيم قال: نا عمرو بن أبي سلمة، عن صدقة بن عبد اللَّه، عن زهير بن محمد، عن عاصم الأحول، عن عبد اللَّه بن سَرْجِس، فذكره.
قال النسائي:"هذا حديث منكر، وصدقة بن عبد اللَّه ضعيف، وإنما أخرجته لئلا يُجعل عمرو، عن زهير".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة قالت: ما نظرت إلى فرج النبي صلى الله عليه وسلم قط، أو ما رأيت فَرْج النبي صلى الله عليه وسلم قط.
رواه ابن ماجه (662، 1922) والترمذي في الشمائل (352) وأحمد (24344) وابن أبي شيبة (1/ 106) كلهم من طرق عن سفيان، عن منصور، عن موسى بن عبد اللَّه بن يزيد الخطمي، عن مولى لعائشة، عن عائشة فذكرته. وفيه مولى عائشة لم يسم، وفي بعض الروايات: عن مولاة العائشة في كلا الحالين فيه جهالة.
وقد روي بإسناد آخر عن سفيان الثوري من حديث أنس بن مالك عن عائشة ولكن فيه من يضع الحديث.
মু'আবিয়াহ ইবনু হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের সতর (গোপনীয় অঙ্গ) সম্পর্কে বলুন—কোন অংশ প্রকাশ করব এবং কোন অংশ আবৃত রাখব? তিনি বললেন: "তুমি তোমার সতরকে আবৃত রাখো, তবে তোমার স্ত্রী অথবা তোমার ডান হাতের অধিকারভুক্ত দাসীদের (ক্ষেত্রে আবৃত রাখা) ছাড়া।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি লোকজনেরা একত্রিত থাকে (তখন কী করব)? তিনি বললেন: "যদি তুমি সক্ষম হও যে কেউ যেন তা দেখতে না পায়, তবে কেউ যেন তা না দেখে।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আমাদের কেউ একাকী থাকে? তিনি বললেন: "তবে মানুষের তুলনায় আল্লাহই অধিক হকদার যে তুমি তাঁকে লজ্জা করো।"
6206 - عن جابر قال: كانت اليهود تقول: إذا أتى الرجلُ امرأته من دُبُرها في قُبلها، كان الولد أحول فنزلت: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223].
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4528)، ومسلم في النكاح (117: 1435) كلاهما من طريق سفيان (هو الثوري)، عن ابن المنكدر، سمع جابرًا يقول (فذكره).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়াহুদিরা বলত: যখন কোনো পুরুষ তার স্ত্রীর সাথে তার যোনীতে (সম্মুখপথে) পেছন দিক থেকে সহবাস করে, তখন সন্তান ট্যারা হয়। ফলে এই আয়াতটি অবতীর্ণ হয়: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র। অতএব তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসতে পারো।" (সূরা আল-বাকারা: ২২৩)।
6207 - عن جابر قال: قالت اليهود: إن الرجل إذا أتى امرأته وهي مُجَبّية، جاء ولده أحول، فنزلت {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223] إن شاء مجَبّية وإن شاء غير مجَبّية إذا كان في صمام واحد.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (119: 1435) وابن حبان في صحيحه (4161) كلاهما من حديث وهب بن جرير، قال: حدثنا أبي، قال: سمعت النعمان بن راشد، يحدث عن الزهري، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره واللفظ لابن حبان. وأما مسلم فلم يذكر لفظ الحديث كاملا، وإنما أحال على السابق وقال: وزاد في حديث النعمان عن الزهري:"وإن شاء مُجبّية وإن شاء غير مجَبّية غير أن ذلك في صمام واحد".
إلا أن الحافظ ابن حجر ذهب إلى أن هذه الزيادة مدرجة فقال:"وهذه الزيادة يشبه أن تكون من تفسير الزهري، لخلوها من رواية غيره من أصحاب ابن المنكدر مع كثرتهم" الفتح (8/ 192).
قوله:"مُجبّية" أي منكبّة على وجهها تشبيهًا بهيئة السجود.
وقوله:"صمام واحد" أي ثقب واحد، والمراد به القُبُل.
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়াহুদিরা বলত: যদি কোনো ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে এমনভাবে মিলিত হয় যে, সে (স্ত্রী) উপুড় হয়ে থাকে, তবে তার সন্তান ট্যারা হবে। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো।" (সূরা বাকারা: ২২৩)। যদি সে (স্বামী) চায়, তবে উপুড় হয়ে (স্ত্রী) থাকুক, আর যদি চায়, তবে অন্যভাবে (শুয়ে) থাকুক; যদি তা একই দ্বারপথ দিয়ে (অর্থাৎ যোনিপথ দিয়ে) হয়।
6208 - عن ابن عباس قال: جاء عمر إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، هلكت. قال:"وما أهلكك؟" قال: حوّلْتُ رحلي الليلة. قال: فلم يرد عليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا، قال: فأنزلتْ على رسول اللَّه هذه الآية {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223] أقبل وأدبر، واتّقِ الدبرَ والحيضةَ.
حسن: رواه الترمذي (2980) وأحمد (2703) والبيهقي (7/ 197) وصحّحه ابن حبان (4202) كلهم من طريق يعقوب بن عبد اللَّه القمي، قال: حدثنا جعفر بن المغيرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل يعقوب بن عبد اللَّه القمي فإنه مختلف فيه ضعّفه الدارقطني، ومشّاه غيره، غير أنه حسن الحديث.
وفي الإسناد أيضًا رجال من درجة"صدوق".
وقوله: حولت رحلي: كناية عن غشيان المرأة من ظهرها في قبلها.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল, আমি ধ্বংস হয়ে গেছি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, "কী তোমাকে ধ্বংস করেছে?" তিনি বললেন, আমি আজ রাতে আমার সওয়ারি (ভার) ঘুরিয়ে দিয়েছি। বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কোনো উত্তর দিলেন না। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র, অতএব তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছে আগমন করো।} (সূরা আল-বাক্বারা: ২২৩)। (অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন,) সামনে থেকে বা পেছন দিক থেকে (যেকোনোভাবে আগমন করো), তবে পায়ুপথ (মলদ্বার) এবং হায়েয (ঋতুস্রাব)-এর সময় বর্জন করো।
6209 - عن ابن عباس قال: إن ابن عمر -واللَّه يغفر له- أوهم، إنما كان هذا الحي من
الأنصار -وهم أهل وثن- مع هذا الحي من يهود -وهم أهل الكتاب- وكانوا يرون لهم فضلا عليهم في العلم، فكانوا يقتدون بكثير من فعلهم. وكان من أمر أهل الكتاب أن لا يأتوا النساء إلا على حرف، وذلك أستر ما تكون للمرأة. فكان هذا الحي من الأنصار قد أخذوا بذلك من فعلهم، وكان هذا الحي من قريش يشرحون النساء شرحًا منكرًا، ويتلذذون منهن مقبلات ومدبرات ومستلقيات. فلما قدم المهاجرون المدينة. تزوج رجلٌ منهم امرأةً من الأنصار، فذهب يصنع بها ذلك، فأنكرته عليهم وقالت: إنما كنا نُؤتى على حرف فاصنع ذلك، وإلا فاجْتنبْني حتى شَري أمرهما. فبلغ ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأنزل اللَّه عز وجل: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223] أي مقبلات، ومدبرات، ومستلقيات، يعني بذلك موضع الولد.
حسن: رواه أبو داود (2164) عن عبد العزيز بن يحيى أبي الأصبغ حدثني محمد -يعني ابن سلمة- عن محمد بن اسحاق، عن أبان بن صالح، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.
ورواه البيهقي (7/ 195) من هذا الوجه كما رواه أيضًا عن عبد الرحمن بن محمد المحاربي، عن محمد بن إسحاق، سمع أبان بن صالح فذكر معناه وقال:"بعد أن يكون في الفرج".
وفيه تصريح ابن إسحاق بالسماع.
وقوله:"شري أمرهما" أي عظُمَ أمرهما وتفاقمَ.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—আল্লাহ তাকে ক্ষমা করুন—ভুল করেছেন। আসলে বিষয়টি হলো, আনসারদের এই গোত্রটি—যারা ছিল মূর্তিপূজক—তারা থাকত ইহুদিদের এই গোত্রের সাথে—যারা ছিল কিতাবি। তারা (আনসাররা) ইলম (জ্ঞান) এর ক্ষেত্রে তাদের (ইহুদিদের) জন্য নিজেদের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দেখত এবং তাদের অনেক কাজ অনুকরণ করত।
আর কিতাবিদের রীতি ছিল যে, তারা নারীদের কাছে কেবল এক পাশ দিয়ে (কাত হয়ে) আসত (যৌন মিলন করত)। আর এটাই হলো নারীর জন্য সবচেয়ে বেশি আবরণকারী (শালীন) পদ্ধতি। ফলে আনসারদের এই গোত্রটি তাদের এই কাজটি গ্রহণ করে নিয়েছিল।
কিন্তু কুরাইশের এই গোত্রটি নারীদেরকে চরমভাবে উন্মুক্ত করত, আর তারা তাদের থেকে আনন্দ লাভ করত সম্মুখ দিক থেকে, পেছন দিক থেকে এবং চিৎ হয়ে শায়িত অবস্থায়ও।
যখন মুহাজিরগণ মদিনায় আগমন করলেন, তখন তাদের মধ্য থেকে একজন লোক আনসারদের এক মহিলাকে বিবাহ করল। সে তার সাথে ঐভাবে (কুরাইশী পদ্ধতিতে) সহবাস করতে গেল। মহিলাটি তাদের এই কাজকে অস্বীকার করল এবং বলল: আমাদের সাথে তো কেবল এক পাশ দিয়ে আসা হতো, তুমি সেটাই করো, অন্যথায় আমাকে ছেড়ে দাও। শেষ পর্যন্ত তাদের দুজনের বিষয়টি কঠিন হয়ে গেল।
এই বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে পৌঁছল। তখন আল্লাহ তা‘আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {তোমাদের স্ত্রীরা হলো তোমাদের শস্যক্ষেত্র। অতএব, তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসতে পারো।} [সূরা বাক্বারাহ: ২২৩]। অর্থাৎ সম্মুখ দিক থেকে, পেছন দিক থেকে, এবং চিৎ হয়ে শায়িত অবস্থায় (মিলন করতে পারো)। এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো সন্তানের উৎপত্তিস্থল (যোনি)।
6210 - عن خزيمة بن ثابت قال: إن سائلا سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن إتيان النساء في أدبارهن. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حلال" ثم دعاه، أو أمر به، فدُعي فقال:"كيف قلت في أي الخربتين، أو في أي الخرزتين، أو في الخصفتين؟ أمن دبرها في قبلها فنعم، أم من دبرها في دبرها فلا، إن اللَّه لا يستحيي من الحق، لا تأتوا النساء في أدبارهن".
صحيح: رواه الشافعي في الأم (5/ 94) قال: أخبرنا عمي محمد بن علي بن شافع، عن عبد اللَّه بن علي بن السائب، عن عمرو بن أحيحة أو ابن فلان ابن أحيحة بن فلان الأنصار. قال: قال محمد بن علي وكان ثقة - عن خزيمة بن ثابت فذكره.
ورواه النسائي في الكبرى (8943) من طريق الحسن بن محمد بن أعين، قال: نا محمد بن علي الشافعي بإسناده وسماه عمرو بن أحيحة بن الْجُلاح ولم يشك فيه.
قال البيهقي (7/ 196) بعد أن أخرج الحديث من طريق الشافعي قال الشافعي:"عمي ثقة، وعبد اللَّه بن علي ثقة، وقد أخبرنا محمد عن الأنصاري المحدث بها أنه أثنى عليه خيرًا. وخزيمة ممن لا يشك عالم في ثقته، فلست أرخص فيه، بل أنهى عنه".
قلتُ: هذا إسناده صحيح. وله أسانيد أخرى.
منها: ما رواه ابن ماجه (1924) وأحمد (21854) والبيهقي كلهم من طريق حجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن عبد اللَّه بن هرمي، عن خزيمة بن ثابت ولفظه:"إن اللَّه لا يستحيي من الحق، لا تأتوا النساء في أعجازهن" وعند البعض:"أدبارهن" وحجاج بن أرطاة مدلس وقد عنعن.
وعبد اللَّه بن هرمي هو: هرمي بن عبد اللَّه، لعله انقلب على حجاج بن أرطاة لأنه مع التدليس وصف بكثير الخطأ. به على ذلك البخاري في تاريخه (8/ 257) وأشار إليه البيهقي أيضًا ثم رواه من طريق المثنى بن صباح، عن عمرو بن شعيب، عن هرمي بن عبد اللَّه.
وكذلك رواه أيضًا عبد اللَّه بن علي (وهو ابن السائب) عن هرمي بن عمرو الخطمي. ومن طريقه رواه أحمد (21865) والنسائي في الكبرى (8940) فسماه هرمي بن عمرو، لأنه اختلف في اسم أبيه وجده. فقيل هكذا وقيل غير ذلك.
وكذلك رواه أيضًا عبد اللَّه بن عمرو بن قيس الخطْمي، عن هرمي بن عبد اللَّه فذكر الحديث.
رواه البيهقي من طريق الوليد بن كثير، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن الحصين الخطمي عن عبد الملك بن عمرو، ثم رواه أيضًا من طريق أبن أسامة بن الهاد، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن الحصين، عن هرمي بن عبد اللَّه وقال: قصر به ابن الهاد، فلم يذكر فيه عبد الملك بن عمرو. ورواه ابن عيينة عن ابن الهاد فأخطأ في إسناده.
ثم رواه من طريق الحميدي، ثنا سفيان بن عيينة، عن يزيد بن الهاد، عن عمارة بن خزيمة بن ثابت، عن أبيه فذكر الحديث.
ونقل عن الشافعي أنه قال: غلط سفيان في حديث ابن الهاد.
قال البيهقي: مدار هذا الحديث على هرمي بن عبد اللَّه، وليس العمارة بن خزيمة فيه أصل، إلا من حديث ابن عيينة، وأهل العلم بالحديث يرونه خطأ. انتهى.
قلت: وهرمي بن عبد اللَّه هذا اختلف فيه أهل العلم فقيل: كان له صحبة، وقيل هو غيره، وهما اثنان، فالراوي عن خزيمة بن ثابت ولد في عهد النبي صلى الله عليه وسلم وأدرك أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منهم خزيمة بن ثابت، فقالوا: إنه مجهول، ولكنه توبع في الإسناد الأول الذي صحّحه الشافعي.
وأما الذي له الصحبة فهو غير هذا، فإنه حضر بعض المشاهد مع النبي صلى الله عليه وسلم مثل تبوك وغيرها.
والخلاصة في حديث خزيمة بن ثابت أنه حديث صحيح، صحّحه الشافعي وأحمد وابن حبان وغيرهم.
وقال المنذري في الترغيب والترهيب (3698):"رواه ابن ماجه واللفظ له، والنسائي في عشرة النساء بأسانيد، أحدها جيد".
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عمر بن الخطاب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه لا يستحيي من الحق، لا تأتوا النساء في أدبارهن".
رواه البزار -كشف الأستار- (1456) عن محمد بن سعيد بن يزيد بن إبراهيم التستري، ثنا علاء بن اليمان، ثنا زمعة، عن سلمة بن وهرام، عن طاوس، عن ابن الهاد، عن عمر فذكره.
ورواه النسائي في الكبرى (8959) من وجه آخر عن عثمان بن اليمان وفيه انقطاع فإن ابن الهاد لم يدرك عمر بن الخطاب وأما المنذري فقال في الترغيب والترهيب (3697)"رواه أبو يعلى وإسناده جيد" فليس بجيد، فإنه رواه من هذا الطريق كما هو الظاهر من صنيع الحافظ الهيثمي في"المجمع" (4/ 289) فإنه قال:"رواه أبو يعلى، والطبراني في الكبير، والبزار، ورجال أبي يعلى رجال الصحيح خلا عثمان بن اليمان وهو ثقة" وأكد البزار بأنه لا يُروى عن عمر إلا من هذا الوجه.
وأما قول الهيثمي في عثمان بن اليمان بأنه ثقة فهو اعتمادًا على توثيق ابن حبان مع أنه قال:"يخطئ" وذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا فهو في عداد المجاهيل حتى يُنص على توثيقه.
وفي الباب ما رُوي عن علي بن طلق قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا فسا أحدكم فليتوضأ، ولا تأتوا النساء في أعجازهن".
رواه أبو داود (205) والترمذي (1166) وأحمد (655) وابن حبان (2237) والبيهقي (2/ 255) كلهم من طريق عيسى بن حِطّان، عن مسلم بن سلّام، عن طلق بن علي فذكره.
وعيسى بن حطّان ومسلم بن سلّام مجهولان قاله غير واحد من أهل العلم، وإن كان ابن حبان ذكرهما في"الثقات" على قاعدته، وأخطأ من رواه عن عبد الملك بن مسلم بن سلام، عن أبيه (مسلم بن سلام) انظر تاريخ بغداد (10/ 398، 399) وعلي هو ابن طلْق، ولكن ظنَّ الإمام أحمد أنه علي بن أبي طالب، فأدخل حديثه هذا في مسند علي بن أبي طالب.
ورواه الترمذي (1164) في سياق أطول قال: أتي أعرابي النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، الرجل يكون منا في الفلاة، فتكون فيه الرويحةُ، ويكون في الماء قلة؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا فسا أحدكم فليتوضأ، ولا تأتوا النساء في أعجازهن فإن اللَّه لا يستحيي من الحق".
قال الترمذي:"حديث علي بن طلق حديث حسن، وسمعت محمدا يقول: لا أعرف لعلي بن طلق، عن النبي صلى الله عليه وسلم غير هذا الحديث الواحد، ولا أعرف هذا الحديث من حديث طلق بن علي السحيمي".
قال الترمذي:"وكأنه رأي أن هذا رجل آخر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم".
قلت: وكيف يكون إسناده حسنا وفيه رجلان لم يُوثَّقا، بل قال غير واحد من أهل العلم إنهما مجهولان كما سبق.
وفي الباب أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا ينظر اللَّه إلى رجل أتى رجلًا، أو امرأةٌ في الدبر".
رواه الترمذي (1165) وأبو بكر بن أبي شيبة (4/ 251 - 252) وصحّحه ابن حبان (4203، 4204، 4418)
وابن الجارود (729) كلهم من حديث أبي خالد الأحمر، عن الضحاك ابن عثمان، عن مخرمة بن سليمان، عن كُريب، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب"، ولكن قال البزار: لا نعلمه يُروي عن ابن عباس بإسناد أحسن من هذا، تفرد به ابو خالد الأحمر، عن الضحاك بن عثمان فذكره بإسناده وكذا قال أيضًا ابن عدي. ورواه النسائي في الكبرى (8953) عن هناد، عن وكيع عن الضحاك موقوفا وهو أصح عندهم من المرفوع. كذا في"التلخيص" (3/ 181).
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد اللَّه بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"تلك اللوطية الصغرى" يعني إتيان المرأة في دبرها.
رواه أبو داود الطيالسي في مسنده (2380) عن همام، عن قتادة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكره. ومن طريقه رواه البيهقي (7/ 198).
ورواه أيضًا الإمام أحمد (6706) والبزار (1455) والنسائي في الكبرى (8948) والطحاوي في شرح معاني الآثار (3/ 44) كلهم من طريق همام به.
ولكن رواه ابن أبي شيبة (4/ 252) والنسائي في الكبرى (8950) والطحاوي، كلهم من وجه آخر عن عبد اللَّه بن عمرو من قوله.
وقال البخاري في التاريخ الصغير (1/ 239): والمرفوع لا يصح وقال في التاريخ الكبير:"قال لي محمد بن بشار، نا ابن أبي عدي وعبد الأعلى عن سعيد، عن قتادة، عن أبي أيوب، عن عبد اللَّه بن عمرو قوله" وهذا الذي رجحه أيضًا ابن كثير في تفسيره، وابن حجر في"التلخيص" (3/ 181) وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"لا ينظر اللَّه إلى رجل جامع امرأته في دبرها".
رواه أبو داود (2162) وابن ماجه (1923) وأحمد (7684) وعبد الرزاق (20952) والبيهقي (7/ 198) كلهم من حديث سهيل بن أبي صالح، عن الحارث بن مُخلّد، عن أبي هريرة فذكره.
والحارث بن المخلد لم يوثقه أحد غير ابن حبان وقال البزار: ليس بمشهور، فإذا هو"مجهول" كما قال الحافظ في"التقريب" وللحديث أسانيد أخرى أضعف من هذا.
فالصحيح أن هذا الحديث لا يصح عن أبي هريرة. وقد رواه النسائي في الكبرى - عشرة النساء (8961) عن عثمان بن عبد اللَّه، عن سليمان بن عبد الرحمن من كتابه عن عبد الملك بن محمد الصنعاني، عن سعيد بن عبد العزيز، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"استحيوا من اللَّه حق الحياء، ولا تأتوا النساء في أدبارهن" قال المزي في تحفة الأشراف (11/ 25): قال حمزة بن محمد الكناني الحافظ:"هذا حديث منكر باطل، من حديث الزهري، ومن حديث أبي سلمة، ومن حديث سعيد. فإن كان عبد الملك سمعه من سعيد فإنما سمعه بعد
الاختلاط. وقد رواه الزهري، عن أبي سلمة أنه كان ينهى عن ذلك. فأما عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم فلا".
وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد اللَّه وعقبة بن عامر وغيرهما وهي كلها معلولة.
ولكن خلاصة القول في هذا الباب أنه ثبتت صحة بعض الأحاديث دون البعض، وهذه الأحاديث الضعيفة يقوي بعضها بعضا ولذا قال ابن حجر في"الفتح" (8/ 191 - 192): طرقها كثيرة، مجموعها صالح للاحتجاج به، ويؤيد القول بالتحريم".
ثم ذكر من الأحاديث الصالحة للاحتجاج حديث خزيمة بن ثابت، وحديث أبي هريرة، وحديث ابن عباس.
وإن كان نقل القول من البخاري، والذهلي، والبزار، والنسائي، وأبي علي النيسابوري، بأنه لا يثبت فيه شيء.
وقد ضرب عمر رجلًا أتى امرأة في دبرها، وسئل أبو الدرداء عن ذلك فقال: وهل يفعل ذلك إلا كافر، وذكر لابن عمر فقال: هل يفعله أحد من المسلمين. انظر للمزيد:"شرح السنة" (9/ 107).
খুযাইমা ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় একজন প্রশ্নকারী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মহিলাদের পশ্চাৎদ্বার দিয়ে সহবাস করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হালাল।" অতঃপর তিনি তাকে ডাকলেন, অথবা (অন্য কাউকে) তাকে ডাকার নির্দেশ দিলেন, অতঃপর যখন তাকে ডাকা হলো, তখন তিনি বললেন: "তুমি কীভাবে (কোথায় সহবাসের কথা) বলেছিলে—দুটি গর্তের, অথবা দুটি ছিদ্রের, অথবা দুটি স্থানের কোনটির মধ্যে? যদি তার পিছন দিক দিয়ে যোনিতে প্রবেশ করো, তবে হ্যাঁ; কিন্তু যদি তার পিছন দিক দিয়ে পশ্চাৎদ্বারেই প্রবেশ করো, তবে না। নিশ্চয়ই আল্লাহ সত্য প্রকাশ করতে লজ্জাবোধ করেন না। তোমরা মহিলাদের পশ্চাৎদ্বার দিয়ে সহবাস করো না।"
6211 - عن عائشة قالت: كانت إحدانا إذا كانت حائضا، فأراد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يباشرها أمرها أن تتَّزر في فور حيضتها، ثم يباشرها. قالت: وأيكم بملك إربه كما كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يملك إربه.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (302) ومسلم في الحيض (293) كلاهما من طريق علي بن مسهر قال: أخبرنا أبو إسحاق الشيباني، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কেউ যখন ঋতুমতী হতো, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যদি তার সাথে ঘনিষ্ঠতা করতে চাইতেন, তবে তিনি তাকে ঋতুর (শুরুর) সময়েই ইযার (কোমরবন্ধনী) বেঁধে নিতে আদেশ করতেন, অতঃপর তার সাথে ঘনিষ্ঠতা করতেন। তিনি (আয়েশা) বললেন: তোমাদের মধ্যে এমন কে আছে, যে তার প্রবৃত্তিকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মতো নিয়ন্ত্রণ করতে পারে?
6212 - عن ميمونة قالت: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يباشر امرأة من نسائه أمرها فاتزرت، وهي حائض.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (303) ومسلم في الحيض (294) كلاهما من طريق الشيباني، عن عبد اللَّه بن شداد، قال: سمعت ميمونة، قالت: فذكرته.
মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর কোনো স্ত্রীর সাথে সহবাস (শারীরিক ঘনিষ্ঠতা) করতে চাইতেন, আর সে ঋতুমতী থাকত, তখন তিনি তাকে ইযার (শরীরের নিচের অংশে জড়ানোর বস্ত্র) পরিধান করার নির্দেশ দিতেন।
6213 - عن أنس أن اليهودَ كانوا إذا حاضت المرأةُ فيهم لم يؤاكِلُوها ولم يُجامِعوهنّ في البيوت، فسأل أصحابُ النبي صلى الله عليه وسلم النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأنزل اللَّه تعالى: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ} إلى آخر الآية [البقرة: 222] فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اصنَعُوا كلَّ شيءٌ إلّا النكاح".
فبلغ ذلك اليهودَ فقالوا: ما يريد هذا الرجل أن يَدَعَ من أمرنا شيئًا إلَّا خالَفَنا فيه. فجاء أسَيْدُ بن
حُضَيْر وعبّادُ بن بِشْر فقالا: يا رسول اللَّه، إن اليهود تقول: كذا وكذا، أفلا نُجامِعُهُنَّ؟ فَتغيَّر وجهُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى ظننّا أن قد وَجَدَ عليهما، فَخَرَجا فاستقبلهما هديَّةٌ من لَبَنٍ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأرسل في آثارهما فقاهما، فَعَرفا أن لم يَجِد عليهما.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (302) عن زهير بن حرب، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن أنسٍ، فذكره.
وفي الباب أحاديث أخرى، انظر: كتاب الحيض.
في قتادة وقد رأيت حاله، وكل من خالفه شاذ أو منكر.
فالصواب فيه أنه موقوف على ابن عباس رواه ابن أبي شيبة (12519) والدارمي (1153) كلاهما من حديث ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن ابن عباس موقوفا بلفظ"يتصدق بدينار".
وابن أبي ليلي سيئ الحفظ، وله أسانيد أخرى، وقد روي بلفظ آخر:"إذا أتاها في دم فدينار، وإذا أتاها وقد انقطع الدم فنصف دينار".
رواه الدارمي (1148) وفيه رجل مجهول.
وقال إبراهيم: يستغفر اللَّه. رواه عبد الرزاق (1268) من طريق معمر، عن أيوب، عن منصور والأعمش، عن إبراهيم. وإسناده صحيح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইহুদিদের মধ্যে কোনো নারী যখন ঋতুমতী হতো, তখন তারা তার সাথে একত্রে পানাহার করত না এবং একই ঘরে একত্রে বসবাসও করত না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তারা তোমাকে জিজ্ঞেস করে হায়েয সম্পর্কে। বলে দাও, তা কষ্টদায়ক। সুতরাং তোমরা হায়েয চলাকালে স্ত্রীগণ থেকে দূরে থাকো..." (সূরা বাকারা: ২২২ আয়াতের শেষ পর্যন্ত)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা যৌন মিলন ছাড়া (স্ত্রীদের সাথে) সবকিছুই করো।"
এই খবর ইহুদিদের কাছে পৌঁছালে তারা বলল: এই লোকটি আমাদের কোনো কিছুই ছাড়তে চায় না, যার বিরোধিতা সে না করে। তখন উসায়দ ইবনু হুযায়র এবং আব্বাদ ইবনু বিশর এলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, ইহুদিরা তো এমন এমন কথা বলছে। আমরা কি তাদের (স্ত্রীদের) সাথে সহবাস করে ফেলব? এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা পরিবর্তিত হয়ে গেল। এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে, তিনি হয়তো তাদের দুজনের প্রতি অসন্তুষ্ট হয়েছেন। অতঃপর তারা বেরিয়ে গেলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য দুধের একটি হাদিয়া (উপহার) এলো। তিনি তাদের দুজনের সন্ধানে লোক পাঠালেন এবং তাদের ডেকে আনালেন। তখন তারা বুঝতে পারলেন যে, তিনি তাদের প্রতি অসন্তুষ্ট হননি।
6214 - عن ابن محيريز، أنه قال: دخلت المسجد، فرأيت أبا سعيد الخدري، فجلست إليه، فسألته عن العزل؟ فقال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في غزوة بني المصطلق، فأصبنا سبيا من سبي العرب، فاشتهينا النساء، واشتد علينا العُزْبة، وأحينا الفداء، فأردنا أن نعزل، فقلنا: نعزل ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بين أظهرنا قبل أن نسأله، فسألناه عن ذلك، فقال: ما عليكم أن لا تفعلوا، ما من نسمة كائنة إلى يوم القيامة إلا وهي كائنة".
متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (95)، عن ربيعة بن عبد الرحمن، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن ابن محيريز، فذكره. ورواه البخاري في العتق (2542) عن عبد اللَّه بن يوسف، عن مالك بإسناده.
ورواه أيضًا البخاري في المغازي (4138)، ومسلم في النكاح (125: 1438) كلاهما عن إسماعيل بن جعفر، أخبرني ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن ابن محيريز، به، بنحوه.
وفيه عند مسلم: كان مع ابن محيريز أبو صِرمة وهو الذي سأل أبا سعيد.
وفي رواية له (130) من طريق أيوب، عن محمد، عن عبد الرحمن بن بشر بن مسعود، عن أبي سعيد بلفظ:"لا عليكم أن لا تفعلوا ذاكم فإنما هو القدر".
قال محمد (هو ابن سيرين):"لا عليكم" أقرب إلى النهي.
وفي رواية عنده قال الحسن (هو البصري):"واللَّه لكأن هذا زجر".
وقال المبرّد: معنى قوله"لا عليكم أن لا تفعلوا" أي لا بأس عليكم أن تفعلوا، ومعنى"لا" الثانية طرحُها. ذكره البغوي في شرح السنة (9/ 103).
وقال:"ورخص فيه غير واحد من الصحابة والتابعين. منهم زيد بن ثابت، وروي عن أبي
أيوب وسعد بن أبي وقاص وابن عباس أنهم كانوا يعزلون".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু মুহাইরিয (রহ.) বলেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম এবং আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম। আমি তাঁর কাছে বসলাম এবং তাঁকে আযল (সহবাসের পর বীর্যপাত দেহের বাইরে ফেলা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (আবূ সাঈদ) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বানু মুসতালিকের যুদ্ধে বের হলাম। আমরা আরবের কিছু বন্দিনী (দাসীরূপে) পেলাম। তখন আমরা মহিলাদের প্রতি আকৃষ্ট হলাম, আর অবিবাহিত থাকা আমাদের জন্য কঠিন ছিল। আমরা বন্দিনীদের মুক্তিপণ পাওয়ারও আকাঙ্ক্ষা করতাম। তাই আমরা আযল করতে চাইলাম। আমরা বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে উপস্থিত থাকতে তাঁকে জিজ্ঞাসা না করেই কি আমরা আযল করব? অতঃপর আমরা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: তোমরা এমনটি (আযল) না করলে তোমাদের কোনো ক্ষতি নেই, কারণ কিয়ামত পর্যন্ত যত প্রাণ সৃষ্টি হওয়ার আছে, তার সবগুলোই সৃষ্টি হবে।
6215 - عن أبي سعيد الخدري قال: أصبنا سبايا، فكنا نعزل، فسألنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"أو إنكم لتفعلون؟ -قالها ثلاثا- ما من نسمة كائنة إلى يوم القيامة إلا هي كائنة".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5210)، ومسلم في النكاح (127: 1438) كلاهما عن عبد اللَّه بن محمد، حدثنا جويرية، عن مالك، عن الزهري، عن ابن مُحيريز، عن أبي سعيد الخدري، قال: فذكره.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা কিছু যুদ্ধবন্দী নারী পেলাম, অতঃপর আমরা আযল (সহবাসে বীর্যপাত বাইরে করা) করতাম। এরপর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "তোমরা কি সত্যিই এটা করছো?" (কথাটি তিনি তিনবার বললেন)। "ক্বিয়ামাত দিবস পর্যন্ত যত আত্মার সৃষ্টি হওয়ার কথা, তা অবশ্যই সৃষ্টি হবে।"
6216 - عن أبي سعيد الخدري أن رجلا قال: يا رسول اللَّه، إن لي جارية، وأنا أعزل عنها، وأنا أكره أن تحمل، وأنا أريد ما يريد الرجال، وإن اليهود تحدث أن العزل موءودة صغرى. فقال:"كذبت يهود، ولو أراد اللَّه أن يخلقه ما استطعت أن تصرفه".
حسن: روي عن أبي سعيد الخدري من طرق:
منها: ما رواه يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي مطيع بن رفاعة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
رواه أبو داود (2171) ومن طريقه البيهقي (7/ 230) وأحمد (11477، 11288) والطحاوي في مشكله (1917) والنسائي في الكبرى (9079) كلهم من طرق عن هذا الوجه، وفيه أبو مطيع بن رفاعة، ويقال: أبو مطيع بن عوف، أحد بني رفاعة بن الحارث، وقيل: اسمه رفاعة، وقيل: فلان ابن رفاعة، ويقال: أبو رفاعة، لم يرو عنه سوى محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، وذكره البخاري وابن أبي حاتم، ولم يذكرا فيه جرحا ولا تعديلًا. كما لم يذكره أيضًا ابن حبان في"الثقات" فهو"مجهول" وفي التقريب"مقبول" أي عند المتابعة وهو كذلك.
وخالفه معمر فرواه عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر قال: فذكره نحوه.
رواه الترمذي (1136) عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا معمر فذكره، ورواه النسائي في الكبرى (9078) من وجه آخر عن معمر، وسكت عليه الترمذي، ولم أقف من تابع معمرًا على هذا وظاهر إسناده صحيح.
ومنها: ما رواه محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن وأبي أمامة بن سهل عنهما جميعا عن أبي سعيد الخدري قال: لما أصبنا سَبْي بني المصطلق، استمتعنا من النساء، وعزلنا عنهن، قال: ثم إني وقفت على جارية في سوق بني قينقاع قال: فمر بي رجل من يهود فقال: ما هذه الجارية يا أبا سعيد؟ قلت: جارية لي أبيعها. قال: هل كنت تصيبُها؟ قال: قلت: نعم، قال: فلعلك تبيعها وفي بطنها منك سخلة؟ قال: قلت: أعزل عنها. قال: تلك الموءودة الصغرى. قال: فجئت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له فقال:"كذبت يهود،
كذبت يهود".
رواه ابن أبي شيبة (16870) والطحاوي في مشكله (1919) هما من حديث ابن إسحاق وهو مدلس وقد عنعن.
ومنها ما رواه عياش بن عقبة الحضرمي، عن موسى بن وَرْدان، عن أبي سعيد الخدري قال: بلغ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن اليهود يقولون: إن العزل هو الموءودة الصغرى، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كذبت يهود" وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو أفضيت لم يكن إلا بقدر" رواه البزار -كشف الأستار- (1453) والطحاوي في مشكله (1918) واللفظ له، كلاهما من حديث عياش بن عقبة الحضرمي بإسناده.
قال البزار:"لا نعلم روى موسى عن أبي سعيد الا هذا، وهو صالح الحديث".
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 297):"وفيه موسى بن وردان، وهو ثقة وقد ضُعّف، وبقية رجاله ثقات".
ولحديث أبي سعيد أسانيد أخرى، وبها صار الحديث حسنًا، فإنه يُقوِّي بعضها بعضًا.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার একটি দাসী আছে, আমি তার সাথে আযল করি। আমি অপছন্দ করি যে সে গর্ভবতী হোক, আর আমি পুরুষরা যা চায়, তা চাই। আর ইয়াহুদীরা বলে যে, আযল হলো ছোট ওয়াদ (জীবন্ত কবরস্থ করা)। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইয়াহুদীরা মিথ্যা বলেছে। আল্লাহ যদি তাকে সৃষ্টি করতে চান, তবে তুমি তাকে ফিরিয়ে দিতে পারবে না।"
6217 - عن جابر بن عبد اللَّه، أن رجلًا أتى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"إن لي جارية هي خادمنا وسانيتُنا، وأنا أطوف عليها، وأنا أكره أن تحمل؟ فقال:"اعزل عنها إن شئت، فإنه سيأتيها ما قدّر لها" فلبث الرجل ثم أتاه فقال: إن الجارية قد حبلت؟ فقال:"قد أخبرتك أنه سيأتيها ما قدّر لها".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1439) عن أحمد بن عبد اللَّه بن يونس، حدثنا زهير، أخبرنا أبو الزبير، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وفي رواية"إن ذلك لن يمنع شيئًا أراده اللَّه" قال: فجاء الرجل فقال: يا رسول اللَّه، إن الجارية التي كنت ذكرتها لك حملت. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا عبد اللَّه ورسوله".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার একজন দাসী আছে, যে আমাদের সেবিকা এবং পানি সেচকারিণী (বা পানি বহনকারিণী)। আমি তার সঙ্গে সহবাস করি, কিন্তু আমি চাই না যে সে গর্ভবতী হোক? তিনি বললেন: তুমি যদি চাও, তাহলে তার থেকে 'আযল' (বীর্য বাইরে ফেলা) করতে পারো। তবে তার ভাগ্যে যা লেখা আছে, তা তার নিকট অবশ্যই আসবে। এরপর লোকটি কিছু সময় থাকল। অতঃপর সে রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: ঐ দাসীটি গর্ভবতী হয়ে গেছে। তিনি বললেন: আমি তোমাকে আগেই জানিয়েছিলাম যে, তার ভাগ্যে যা লেখা আছে, তা তার নিকট অবশ্যই আসবে।
অন্য বর্ণনায় এসেছে: নিশ্চয়ই তা আল্লাহ যা চান, তা প্রতিরোধ করতে পারে না। বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমি আপনাকে যে দাসীটির কথা বলেছিলাম, সে গর্ভবতী হয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি আল্লাহর বান্দা এবং তাঁর রাসূল।
6218 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كنا نعزل والقرآن ينزل، لو كان شيئًا يُنهى عنه لنهانا عنه القرآن. وفي لفظ: كنا نعزل على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5208)، ومسلم في النكاح (1440) كلاهما من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن عمرو (هو ابن دينار) أخبرني عطاء، أنه سمع جابرًا، فذكره.
واللفظ الآخر عند البخاري (5207) من طريق ابن جريج، ومسلم من طريق معقل - كلاهما عن عطاء، عن جابر.
وفيه جواز الاستدلال بالتقرير من اللَّه ورسوله على حكم من الأحكام. لأن لو كان ذلك الشيء حراما لم يقروا عليه، فإذا أضاف الصحابي الحكم إلى زمن النبي صلى الله عليه وسلم فالأصل أنه اطلع عليه لتوفر دواعيه على سؤالهم إياه إلا إن ثبت بأنه صلى الله عليه وسلم لم يطلع عليه، فليس له حكم الرفع.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আযল (সহবাসের সময় বাইরে বীর্যপাত করা) করতাম, অথচ কুরআন নাযিল হচ্ছিল। যদি এটি এমন কোনো বিষয় হত যা নিষেধ করা হয়েছে, তবে কুরআন অবশ্যই আমাদেরকে তা থেকে নিষেধ করত।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে আযল করতাম।
6219 - عن جابر قال: كنا نعزل على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فبلغ ذلك نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم فلم ينْهنا.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (138: 1439) عن أبي غسّان المِسْمعي، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আযল (সহবাসের সময় বীর্য বাইরে ফেলা) করতাম। বিষয়টি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছল, কিন্তু তিনি আমাদের নিষেধ করলেন না।
6220 - عن عامر بن سعد، أن أسامة بن زيد أخبر والده سعد بن أبي وقاص، أن رجلًا جاء إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: إني أعزل عن امرأتي. فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لِمَ تفعل ذلك؟ فقال الرجل: أُشفق على ولدها أو على أولادها. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو كان ذلك ضارًّا لضر فارس والروم".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (143: 1443) من طريق عبد اللَّه بن يزيد المقبري، حدثنا حيوة، حدثني عياش بن عباس، أن أبا النضر حدثه عن عامر بن سعد، به، فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট এসে বললেন: আমি আমার স্ত্রীর সাথে 'আযল' করি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: তুমি কেন এমন করো? লোকটি বলল: আমি তার সন্তানের উপর অথবা তার সন্তানদের উপর স্নেহ করি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: যদি তা ক্ষতিকর হতো, তবে তা পারস্য ও রোমীয়দের ক্ষতি করত।