আল-জামি` আল-কামিল
628 - عن سمرة بن جندب، قال:"كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا صلَّى صلاةً أقبل علينا بوجهه فقال:"من رأى منكم اللّيلة رؤيا؟". قال: فإنْ رأى أحدٌ قصَّها فيقول:"ما شاء اللَّه". فسألنا يوما فقال:"هل رأى أحد منكم رؤيا؟". قلنا: لا، قال:"لكني رأي الليلة رجلين أتياني فأخذا بيدي، فأخرجاني إلى الأرض المقدسة". فذكر الحديث طويلًا.
وفيه:"والذي يوقد النّار مالكُ خازن النّار، وأنا جبريل، وهذا ميكائيل".
صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1386) مطوّلًا، وفي بدء الخلق (3236) مختصرًا عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا جرير بن حازم، حدّثنا أبو رجاء، عن سمرة بن جندب، فذكره.
وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال لجبريل:"ما لي لم أرَ ميكائيل ضاحكًا قطّ؟". قال: ما ضحك ميكائيل منذ خُلقتِ النّار". فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (13343) عن أبي اليمان، حدّثنا ابن عياش، عن عُمارة بن غزية الأنصاريّ، أنه سمع حميد بن عبيد مولى بني المعلّى، يقول: سمعت ثابتًا البنانيّ، يحدّث عن أنس بن مالك، فذكره.
ابن عياش هو إسماعيل الحمصيّ - في روايته عن غير بلده مخلّط، وعمارة بن غزية الأنصاريّ ليس من أهل بلده، بل هو مدنيّ.
وحميد بن عبيد مولى بني المعلى لا يُدرى من هو؟ كذا في"التعجيل" قال الحافظ: هو مدني من موالي الأنصار."التعجيل" (234). وللحديث طرق وهذا أمثلها.
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাত শেষ করতেন, তখন আমাদের দিকে মুখ ফিরিয়ে বলতেন: "আজ রাতে তোমাদের মধ্যে কেউ কি কোনো স্বপ্ন দেখেছে?" তিনি (সামুরা) বলেন: যদি কেউ দেখে থাকত, তবে সে তা বর্ণনা করত এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "আল্লাহ যা চেয়েছেন (তাই হয়েছে)।" একদিন তিনি আমাদের জিজ্ঞাসা করলেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ কি কোনো স্বপ্ন দেখেছে?" আমরা বললাম: "না।" তিনি বললেন: "তবে আমি আজ রাতে (স্বপ্ন) দেখেছি যে, দুইজন লোক আমার কাছে এসেছেন, অতঃপর তারা আমার হাত ধরলেন এবং আমাকে 'আল-আরদ আল-মুকাদ্দাসাহ' (পবিত্র ভূমি)-এর দিকে বের করে নিয়ে গেলেন।" এরপর তিনি দীর্ঘ হাদীসটি বর্ণনা করলেন। এবং এর মধ্যে রয়েছে: "আর যে আগুন জ্বালাচ্ছে, সে হল জাহান্নামের প্রহরী মালিক। আমি জিবরীল, আর ইনি হলেন মীকাইল।"
629 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، قال:"سألتُ عائشة أمَّ المؤمنين:
بأيّ شيءٍ كان نبيُّ اللَّه يفتتح صلاته إذا قام من اللّيل؟ قالت: كان إذا قام من اللّيل افتح صلاته:"اللهمّ ربّ جبريل وميكائيل وإسرافيل، فاطر السماوات والأرض، عالم الغيب والشّهادة. أنت تحكمُ بين عبادك فيما كانوا فيه يختلفون. اهْدني لما اختلف فيه من الحقّ بإذنك إنّك تهدي من تشاء إلى صراط مستقيم".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (770) من طرق عن عمر بن يونس، حدّثنا عكرمة بن عمّار، حدّثنا يحيى بن أبي كثير، حدّثني أبو سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবূ সালামা বলেন,) আমি উম্মুল মুমিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলাম: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে (তাহাজ্জুদের জন্য) দাঁড়াতেন, তখন কী দিয়ে তিনি সালাত শুরু করতেন? তিনি বললেন: তিনি যখন রাতে দাঁড়াতেন, তখন তিনি এই বলে সালাত শুরু করতেন: "হে আল্লাহ! জিবরাঈল, মিকাঈল ও ইসরাফীলের প্রতিপালক! আসমানসমূহ ও জমিনের সৃষ্টিকর্তা! অদৃশ্য ও দৃশ্যের জ্ঞানদাতা! নিশ্চয়ই আপনি আপনার বান্দাদের মধ্যে ফয়সালাকারী সেইসব বিষয়ে, যেগুলোতে তারা মতপার্থক্য করে। আপনি আপনার অনুমতিতে আমাকে সেই সত্যের দিকে পথ দেখান, যে বিষয়ে মতভেদ করা হয়েছে। নিশ্চয়ই আপনি যাকে চান, সরল পথের দিকে পরিচালিত করেন।"
630 - عن أبي هريرة، قال:"جلس جبريل إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فنظر إلى السّماء، فإذا ملك ينزل، فقال جبريل: إنّ هذا الملك ما نزل منذ يوم خلق قبل الساعة. فلما نزل قال: يا محمد أرسلني إليك ربُّك، أفملكًا نبيًّا يجعلك، أو عبدًا رسولًا؟ قال جبريل: تواضع لربِّك يا محمد. قال:"بل عبدًا رسولًا".
صحيح: رواه الإمام أحمد (7160)، والبزار -كشف الأستار (2462) -، وأبو يعلى (6105) كلّهم عن محمد بن فضيل، عن عمارة بن أبي زرعة، قال: لا أعلمه إلّا عن أبي هريرة، قال (فذكر الحديث).
وإسناده صحيح ورجاله ثقات.
وهذا الملك المبهم يقال: إنه هو إسرافيل.
ولم يرد في حديث صحيح أنّ إسرافيل مكلّف في النّفخ في الصّور، إلا أن بعض أهل العلم ادعوا الإجماع على ذلك كما في فتح الباري لابن حجر (11/ 368) نظرا لوجود شواهد كثيرة.
منها: ما رُوي عن أبي هريرة في حديث طويل قال فيه: حدّثنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو في طائفة من أصحابه- فقال:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى لما فرغ من خلق السماوات والأرض خلق الصّور، فأعطاه إسرافيل عليه السلام، فهو واضعه على فيه شاخص بصره إلى العرش، ينتظر متى يؤمر".
رواه أبو الشيخ في كتابه"العظمة" (386)، والبيهقي في"البعث والنشور" (609) كلاهما من طريق إسماعيل بن رافع، عن محمد بن يزيد، عن محمد بن كعب، عن أبي هريرة.
وأدخل البيهقي"عن رجل من الأنصار" بين محمد بن يزيد، وبين محمد بن كعب القرظي.
وقد رواه أيضًا عدد من المؤلفين في كتبهم ولكن مداره على إسماعيل بن رافع وهو: ابن عويمر الأنصاريّ المدنيّ، قال فيه الإمام أحمد وابن معين: ضعيف. وقال أبو حاتم: منكر الحديث. وقال الدارقطني: متروك. وقال ابن حبان: كان رجلًا صالحًا إلّا أنه كان يقلّب الأخبار حتى صار الغالب على حديثه المناكير والتي يسبق إلى القلب أنه كان المتعمّد لها.
وقال الحافظ ابن كثير في تفسيره في سورة الأنعام (آية: 73) بعد أن ذكر حديث الصّور من
طريق الحافظ أبي القاسم في كتابه"الطّوالات" من هذا الوجه:"هذا حديث غريب جدًا، ولبعضه شواهد في الأحاديث المتفرقة، وفي بعض ألفاظه نكارة، تفرّد به إسماعيل بن رافع قاص أهل المدينة، وقد اختُلف فيه، فمنهم من وثقه، ومنهم من ضعّفه. ونصّ على نكارة حديثه غير واحد من الأئمة كأحمد بن حنبل، وأبي حاتم الرّازيّ، وعمرو بن الفلاس. ومنهم من قال فيه: هو متروك. وقال ابن عدي: أحاديثه كلّها فيها نظر، إلا أنه يكتب حديثه في جملة الضّعفاء. وقال: وقد اختلف عليه في إسناد هذا الحديث على وجوه كثيرة، قد أفردتُها في جزء على حدة، وأما سياقه فغريب جدًّا، ويقال: إنه جمعه من أحاديث كثيرة، وجعله سياقًا واحدًا، فأُنكر عليه بسبب ذلك". انتهى.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس أنه قال:"بينا جبريل معه رسول اللَّه يناجيه، إذ انشقّ أفق السّماء فدخل جبريل من ذلك خوف فإذا ملك قد مثل بين يدي النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا محمد إنّ اللَّه يأمرك أن تختار عبدًا نبيًّا أو ملكًا نبيًا؟ فأشار إليّ جبريل بيده أن تواضع، فقلت:"عبدًا نبيًّا"، فارتفع ذلك الملك إلى السماء، فقلت:"يا جبريل أردت أن أسألك عن هذا، فرأيت من حالك ما شغلني عن المسألة، فمن هذا يا جبريل؟". قال: هذا إسرافيل خلقه اللَّه يوم خلقه، بين يديه صافًّا قدميه، لا يرفع طرفه، بينه وبين الرّب سبعون نورًا، ما منها نور، كاد يدنو منه إلا احترق، بين يديه لوح، فإذا أراد اللَّه في شيء من السماء، أو في الأرض، ارتفع ذلك اللوح فضرب جبينه، فينظر فيه، فإن كان من عملي أمرني به، وإن كان من عمل ميكائيل أمره به، وإن كان من عمل ملك الموت أمره به. قلت:"يا جبريل، وعلى أيش أنت؟". قال: على الرّيح والجنود. قلت: وعلي أيش ميكائيل؟ قال: على النبات والقطر، فقلت:"على أيش ملك الموت؟". قال: على قبض الأنفس. وما ظننته هبط إلا لقيام الساعة، وما الذي رأيت مني إلا خوفًا من قيام الساعة".
رواه محمد بن عثمان بن أبي شيبة في"كتاب العرش" (75) بتحقيق ابن الحمود، والطبراني في الكبير (12061) عن محمد بن عمران بن أبي ليلى، عن أبيه، حدّثنا ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
وعمران بن أبي ليلى هو: عمران بن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى الأنصاريّ لم يرو عنه إلّا ابنه محمد، كما لم يوثقه غير ابن حبان ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول". وحيث أنه لم يتابع فهو لين الحديث.
وابن أبي ليلى هو: محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (9/ 19) لسوء حفظه.
وما روي أيضًا عن ابن عمر قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لقد هبط عليَّ ملك من السماء، ما هبط على ملك من السماء، ما هبط على نبي قبلي، ولا يهبط على أحد بعدي، وهو إسرافيل وعنده جبريل، فقال: السّلام عليك يا محمد، ثم قال: أنا رسولُ ربِّك إليك أمرني أن أخبرك إن شئتَ نبيًّا عبدًا، وإن شئتَ ملكًا، فنظرتُ إلى جبريل فأومأ جبريل إليّ أن تواضع. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم عند ذلك:
"نبيًّا عبدًا". فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لو أنّي قلتُ نبيًّا ملكًا، ثم شئ لسارتِ الجبال معي ذهبًا".
رواه الطبراني في الكبير (12/ 348) عن أبي شعيب، ثنا يحيى بن عبد اللَّه البابلتي: ثنا أيوب بن نهيك، قال: سمعت محمد بن قيس المدني يقول: سمعت ابن عمر، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (9/ 19):"وفيه يحيى بن عبد اللَّه البابلتي وهو ضعيف".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي جعفر قال:"بينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالس وعنده جبريل حتى حانت من جبريل نظرة قِبَل السماء فامتقع لها لونه حتى صار كرماد، ولاذ برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنظر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حيث نظر جبريل، فإذا هو بشيء قد ملأ ما بين الخافقين، السماء والأرض، فقال:"يا محمد، إني رسول اللَّه إليك يخيّرك أن تكون ملكًا رسولًا أو عبدًا رسولًا؟ فالتفتُ إلى جبريل، فإذا هو قد رجع لونه، ثم ضرب ركبة رسول اللَّه فقال: تواضع وكن عبدًا رسولًا، أو قال رسول اللَّه: أكون عبدًا رسولًا. فرفع رجله اليمنى فوضعها في كبد السماء ثم رفع اليسرى فوضعها في كبد السماء الثانية، ثم رفع اليمني فوضعها في كبد السماء الثالثة. . . فقال رسول اللَّه لجبريل: يا جبريل، لقد رأيتَ اليوم ذُعرًا، وما رأيت شيئًا أذعرك من تغيّر لونك؟ فقال: يا نبي اللَّه، لا تلمني أن أذعر من هذا، إنّ هذا إسرافيل، وهو حاجب الرّب وما يزول من بين يديه منذ خلق اللَّه السّماوات والأرض، حتى كان اليوم، فلما رأيتُه رأيتُ أنه قد جاء بقيام السّاعة، وهو الذي رأيتَ من تغيّر لوني، فلما رأيتُ أنه إنما اختصّك اللَّه به، رجعت إليَّ نفسي، وهذا الذي ترى من أقرب خلق اللَّه إلى اللَّه، اللّوح بين عينيه من ياقوتة حمراء، وهو ملك لا يرفع طرفه".
رواه محمد بن عثمان بن أبي شيبة في كتاب"العرش" (78 - تحقيق ابن الحمود) عن عباد بن يعقوب، نا نصر بن مزاحم، عن عمرو بن شمر، عن عمارة بن غزية، عن أبي جعفر، فذكره.
وفيه نصر بن مزاحم وهو: المنقري قال فيه أبو حاتم: واهي الحديث متروك. وضعّفه الدارقطني، وقال أبو خيثمة: كان كذّابًا.
وشيخه عمرو بن شمر أشدّ منه ضعفًا، قال فيه الجوزجاني: زائغ كذّاب. وقال النسائي: متروك الحديث. وقال ابن حبان: كان رافضيًّا، يشتم أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وكان ممن يروي الموضوعات عن الثقات في فضائل أهل البيت وغيرها، لا يحلّ كتابة حديثه إلّا على جهة التعجّب.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس بن مالك موقوفًا قال اللَّه تعالى:"ما من خلقي أحدٌ أقرب إليَّ من جبريل وميكائيل وإسرافيل، وإنّ بيني وبينهم مسيرة ألف عام".
رواه محمد بن عثمان بن أبي شيبة (67) عن نُعيم بن يعقوب، نا فضيل بن عياض، عن أبان، عن أنس، فذكره.
وأبان هو ابن أبي عياش فيروز البصريّ أبو إسماعيل العبديّ، قال فيه الإمام أحمد والنسائي والدارقطني وابن سعد: متروك الحديث.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরীল (আঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলেন। তিনি আকাশের দিকে তাকালেন, তখন দেখলেন একজন ফেরেশতা অবতরণ করছেন। তখন জিবরীল (আঃ) বললেন, এই ফেরেশতা সৃষ্টি হওয়ার পর কিয়ামত পর্যন্ত আর কখনো নামেননি। যখন তিনি অবতরণ করলেন, তখন বললেন, হে মুহাম্মাদ! আপনার রব আমাকে আপনার কাছে পাঠিয়েছেন। তিনি কি আপনাকে নবী-বাদশাহ বানাবেন, নাকি বান্দা-রাসূল বানাবেন? জিবরীল (আঃ) বললেন, হে মুহাম্মাদ! আপনার রবের জন্য বিনয় অবলম্বন করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, বরং আমি বান্দা-রাসূল হব।
631 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا قُبر الميتُ أتاه ملكان أسودان أزرقان يقال لأحدهما: المنكر، والآخر: النّكير، فيقولان: ما كنتَ تقول في هذا الرّجل؟". فذكر الحديث بطوله، وسيأتي في موضعه كاملًا.
حسن: رواه الترمذيّ (1071) عن أبي سلمة يحيى بن خلف، حدّثنا بشر بن المفضّل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال الترمذيّ:"حسن غريب".
قلت: وهو كما قال، فإنّ في إسناده عبد الرحمن بن إسحاق العامريّ مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات.
وأخرجه أيضًا ابن حبان في صحيحه (3117) من هذا الطريق.
وبقية أحاديث ذكر منكر ونكير سيأتي في كتاب الجنائز.
وأما ذكر هاروت وماروت، وهما في السماء عزرا وعزيرا. فلم يثبت إنما جاء في حديث ابن عباس موقوفًا، وفيه عبد اللَّه بن كيسان يروي عن عكرمة، عن ابن عباس.
وروايته عن عكرمة غير محفوظة، ذكره ابن عدي. وانظر:"مجمع البحرين" (1318).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন মৃত ব্যক্তিকে কবরে দাফন করা হয়, তখন তার নিকট কালো, নীলচে বর্ণের দু’জন ফেরেশতা আসেন। তাদের একজনকে মুনকার এবং অন্যজনকে নাকীর বলা হয়। তারা দু’জন জিজ্ঞাসা করেন: এই ব্যক্তি সম্পর্কে তুমি কী বলতে?”
632 - عن عائشة، قالت: عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مثل الذي يقرأ القرآن وهو حافظ له مع السّفرة الكرام، ومثل الذي يقرأ وهو يتعاهده وهو عليه شديد فله أجران، الماهرُ بالقرآن مع السّفرة الكرام البررة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4937)، ومسلم في صلاة المسافرين (798) كلاهما من حديث قتادة، قال: سمعتُ زرارة بن أوفى يحدِّثُ عن سعد بن هشام، عن عائشة، فذكرت الحديث، واللّفظ للبخاريّ، وفي لفظ مسلم:"والذي يقرأ القرآن ويتعتع فيه، وهو عليه شاق له أجران".
والسّفرة: هم الملائكة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি কুরআন তিলাওয়াত করে এবং তা মুখস্থ রাখে, তার উদাহরণ সম্মানিত লিপিকার (বা দূত) ফেরেশতাদের সাথে। আর যে ব্যক্তি তা তিলাওয়াত করে, বারবার তা দেখে (বা চর্চা করে), অথচ তা তার জন্য কঠিন, সে দুটি সওয়াব পাবে। কুরআনে দক্ষ ব্যক্তি সম্মানিত ও নেককার লিপিকার ফেরেশতাদের সাথে থাকবে।”
633 - عن أبي هريرة، قال: سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من أنفقَ زوجين في سبيل اللَّه دعتْه خزنةُ الجنّة: أيْ فُل هلمَّ". فقال أبو بكر: ذاك الذي لا توى عليه؟ فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"أرجو أن تكون منهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3216)، ومسلم في كتاب الزّكاة (1027: 86) كلاهما من حديث شيبان بن عبد الرحمن، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أنه سمع أبا هريرة، فذكر الحديث.
وسيأتي بالتفصيل في كتاب الزّكاة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (কোনো কিছুর) দুটি যুগল খরচ করে, তাকে জান্নাতের প্রহরীরা ডাকেন: হে অমুক! এদিকে এসো।" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এমন ব্যক্তি কি যার কোনো ক্ষতি (বা ভয়) নেই? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি আশা করি, আপনিও তাদের অন্তর্ভুক্ত হবেন।"
634 - عن أنس بن مالك، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"آتي باب الجنة يوم القيامة، فأستفتح، فيقول الخازن: مَنْ أنت؟ فأقول: محمد. فيقول: بكَ أُمرتُ لا أفتح لأحدٍ قبلك".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (197) من طرق عن هاشم بن القاسم، حدّثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، فذكر الحديث.
وفي رواية:"أنا أكثر الأنبياء تبعًا يوم القيامة، وأنا أوّلُ من يقرع باب الجنة". رواه مسلم من وجه آخر عن أنس بن مالك.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কিয়ামতের দিন জান্নাতের দরজায় এসে তা খোলার অনুমতি চাইব। তখন (জান্নাতের) তত্ত্বাবধায়ক (ফেরেশতা) বলবেন: আপনি কে? আমি বলব: মুহাম্মাদ। তখন তিনি বলবেন: আপনার জন্যই আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে; আপনার পূর্বে আর কারো জন্য আমি তা খুলব না।"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "কিয়ামতের দিন আমিই হব নবীদের মধ্যে সর্বাধিক অনুসারী এবং আমিই প্রথম জান্নাতের দরজায় আঘাতকারী।"
635 - عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"رأيتُ ليلة أُسري بي موسى رجلًا آدمَ طُوالًا جعدًا كأنه من رجال شَنوءة، ورأيتُ عيسى رجلًا مربوعًا مربوع الخلق إلى الحمرة والبياض، سبط الرّأس، ورأيتُ مالكًا خازن النّار، والدّجّال في آيات أراهن اللَّه إياه، فلا تكن في مِرْية من لقائه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3239)، ومسلم في الإيمان (165) كلاهما من حديث شعبة، عن قتادة، عن أبي العالية يقول: حدثني ابنُ عمّ نبيّكم -يعني ابن عباس- فذكر
الحديث. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم مختصر. ولكن رواه من طريق شيبان بن عبد الرحمن، عن قتادة، مثل شعبة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মি‘রাজের রাতে আমি মূসা (আঃ)-কে দেখেছি, তিনি ছিলেন একজন শ্যামলা বর্ণের, দীর্ঘাকায়, কোঁকড়ানো চুলবিশিষ্ট পুরুষ, মনে হচ্ছিল যেন তিনি শানূআ গোত্রের একজন লোক। আর আমি ঈসা (আঃ)-কে দেখেছি, তিনি ছিলেন মাঝারি গড়নের, মাঝারি সৃষ্টির, যার গায়ের রঙ ছিল লালচে সাদার দিকে ঝোঁক, আর তার চুল ছিল সোজা ও মসৃণ। আমি আরও দেখেছি জাহান্নামের রক্ষক মালিককে এবং দাজ্জালকে— সেই নিদর্শনাবলীর মধ্যে যা আল্লাহ তাঁকে দেখিয়েছেন। অতএব, তাঁর (মূসা (আঃ)-এর) সাথে সাক্ষাৎ করা নিয়ে তোমার কোনো সন্দেহ যেন না থাকে।"
636 - عن سمرة، قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"رأيتُ اللّيلة رجلين أتياني فقالا: الذي يوقد النّار خازنُ النّار، وأنا جبريل، وهذا ميكائيل".
صحيح: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3236) عن موسى، حدّثنا جرير، حدّثنا أبو رجاء، عن سمرة، فذكر الحديث.
موسى هو: ابن إسماعيل، وجرير هو: ابن حازم كما جاء مصرحًا في الجنائز (1386) في حديث طويل سيأتي في موضعه وفيه:"والذي يوقد النار مالك خازن النار. . . وأنا جبريل، وهذا ميكائيل، فارفع رأسك، فرفعتُ رأسي. . .".
সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি আজ রাতে দু'জন লোককে দেখলাম, যারা আমার কাছে এলেন এবং বললেন: 'যে আগুন জ্বালাচ্ছে, সে হলো জাহান্নামের দারোগা। আর আমি হলাম জিবরীল, এবং ইনি হলেন মিকাইল'।"
637 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"جاء ملك الموت إلى موسى عليه السلام، فقال: له أجبْ ربَّك. قال: فلطم موسى عليه السلام عين ملك الموت، ففقأها. قال: فرجع الملك إلى اللَّه تعالى فقال: إنّك أرسلتني إلى عبد لك لا يريد الموت، وقد فقأ عيني. قال: فردَّ اللَّهُ إليه عينه وقال: ارجع إلى عبدي فقلْ: الحياة تريد؟ فإن كنت تريد الحياة فضع يدك على متن ثور، فما توارت بدك من شعرة فإنّك تعيش بها سنة. قال: ثم مهْ؟ قال: ثم تموت. قال: فالآن من قريب ربِّ أمِتْني من الأرض المقدسة رميةً بحجر. قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"واللَّه لو أني عنده لأريتكم قبره إلى جانب الطريق عند الكثيب الأحمر".
صحيح: رواه مسلم في كتاب الفضائل (2373: 158) عن محمد بن رافع، حدّثنا عبد الرزّاق، حدّثنا معمر، عن همّام بن منبّه، قال: هذا ما حدّثنا أبو هريرة عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
رواه البخاريّ (1339، 3407) من طريق عبد الرّزاق، عن معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن أبي هريرة، ولم يرفع إلّا الجزء الأخير وهو قوله:"واللَّه لو أني عنده لأريتكم. . .". ولكنه أشار إلى رواية معمر، عن همّام، حدّثنا أبو هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، نحوه.
تنبيه: قد جاء في بعض الآثار أن اسم ملك الموت"عزرائيل"، ذكره ابن كثير في تفسير سورة السجدة عن طاوس، ولم يرد هذا الاسم في كتاب اللَّه، ولا في سنة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الصّحيحة،
فلعله من الإسرائيليات.
قال الحافظ السّيوطي في تعليقه على سنن النّسائيّ حديث (2088):"لم يرد تسميته في حديث مرفوع، وورد عن وهب بن منبه أنّ اسمه عزرائيل، رواه أبو الشّيخ في"العظمة". انظر"كتاب العظمة" (439).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মৃত্যুর ফেরেশতা মূসা (আঃ)-এর নিকট এসে বললেন: আপনার রবের ডাকে সাড়া দিন। তিনি (মূসা আঃ) তখন মালাকুল মাউতের চোখে আঘাত করলেন এবং তা উপড়ে ফেললেন।
তখন ফেরেশতা আল্লাহ তাআলার কাছে ফিরে গিয়ে বললেন: আপনি আমাকে আপনার এমন এক বান্দার কাছে পাঠিয়েছেন, যিনি মরতে চান না। আর তিনি আমার চোখ উপড়ে ফেলেছেন।
আল্লাহ তাআলা তাঁর চোখ ফিরিয়ে দিলেন এবং বললেন: তুমি আমার বান্দার কাছে ফিরে যাও এবং তাকে বলো: তুমি কি জীবন চাও? যদি তুমি জীবন চাও, তবে একটি গরুর পিঠের উপর হাত রাখো। তোমার হাতের নিচে যতগুলো পশম আবৃত হবে, তার প্রতিটি পশমের বিনিময়ে তুমি এক বছর করে বাঁচবে।
তিনি (মূসা আঃ) বললেন: এরপর কী হবে? আল্লাহ বললেন: এরপর তোমাকে মরতে হবে।
তিনি (মূসা আঃ) বললেন: তাহলে এখন (জীবন আর বাড়িয়ে লাভ নেই)। হে আমার রব, আমাকে পবিত্র ভূমি থেকে একটি পাথর নিক্ষেপের দূরত্বের কাছাকাছি মৃত্যু দিন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহর কসম! যদি আমি তাঁর (মূসা আঃ-এর) কাছে থাকতাম, তবে পথের পাশে লাল বালির স্তূপের কাছে আমি তোমাদেরকে তাঁর কবর দেখাতাম।
638 - عن * *
৬৩৮ - থেকে বর্ণিত...
639 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"احتجّ آدم وموسى، فقال له موسى: يا آدم أنت أبونا خيّبْتنا وأخرجْتنا من الجنّة. قال له آدم: يا موسى اصطفاك اللَّه بكلامه، وخطّ لك بيده، أتلومني على أمر قدَّره اللَّه عليّ قبل أن يخلقني بأربعين سنة، فحجّ آدمُ موسى، فحجَّ آدمُ موسى".
وفي حديث ابن أبي عمر، وابن عبدة، قال أحدهما:"خط". وقال الآخر:"كتب لك التّوراة بيده".
متفق عليه: رواه مسلم في القدر (2652)، عن محمد بن حاتم، وإبراهيم بن دينار، وابن أبي عمر المكي، وأحمد بن عبدة الضّبّي، جميعًا عن ابن عيينة (واللّفظ لابن حاتم، وابن دينار) قالا: حدّثنا سفيان بن عيينة، عن عمرو، عن طاوس، قال: سمعتُ أبا هريرة، يقول: فذكر الحديث.
ورواه البخاريّ في القدر (6614) عن علي بن عبد اللَّه: حدّثنا سفيان، قال: حفظناه من عمرو، بإسناده، مثله، وليس فيه لفظ حديث ابن أبي عمر المكّيّ.
ورواه أبو داود (4701) عن مسدّد وأحمد بن صالح كلاهما عن سفيان بن عيينة، بإسناده وفيه، قال آدم:"أنت موسى اصطفاك اللَّه بكلامه، وخطّ لك التّوراة بيده".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আদম ও মূসা তর্ক-বিতর্ক করলেন। মূসা (আঃ) তাঁকে বললেন: হে আদম! আপনি আমাদের পিতা, আপনিই আমাদের বঞ্চিত করেছেন এবং জান্নাত থেকে বের করে দিয়েছেন। আদম (আঃ) তাঁকে বললেন: হে মূসা! আল্লাহ আপনাকে তাঁর কালাম (কথোপকথন) দ্বারা মনোনীত করেছেন এবং তিনি নিজ হাতে আপনার জন্য (তাওরাত) লিখেছেন। আপনি কি এমন একটি কাজের জন্য আমাকে তিরস্কার করছেন, যা আল্লাহ আমাকে সৃষ্টি করার চল্লিশ বছর আগেই আমার উপর নির্ধারণ করে রেখেছিলেন? অতঃপর আদম মূসার ওপর যুক্তি-তর্কে বিজয়ী হলেন, অতঃপর আদম মূসার ওপর যুক্তি-তর্কে বিজয়ী হলেন।”
640 - عن ابن عباس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس الخبر كالمعاينة، إنّ اللَّه عز وجل أخبر موسى بما صنع قومه في العجل، فلم يلقِ الألواح، فلمّا عاين ما صنعوا، ألقى الألواحَ فانكسرتْ".
صحيح: رواه أحمد (2447)، والطبراني في الأوسط (25)، وفي الكبير (1183، 1184)، والبزّار -كما في كشف الأستار (200) -، كلّهم من طريق أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر نحوه. وإسناده صحيح.
وصحّحه ابن حبان (6213)، (6214)، والحاكم (2/ 321)، و (2/ 380) فأخرجاه من هذا الوجه.
وقال الحاكم:"على شرط الشّيخين".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সংবাদ চাক্ষুষ দেখার মতো নয়। নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা মূসা (আঃ)-কে তাঁর কওমের বাছুর পূজার (বাছুরকে উপাস্য বানানোর) ঘটনা সম্পর্কে অবহিত করেছিলেন, তবুও তিনি ফলকগুলো (তওরাতের ফলক) ফেলে দেননি। কিন্তু যখন তিনি তাদের কৃতকর্ম চাক্ষুষ দেখলেন, তখন তিনি ফলকগুলো নিক্ষেপ করলেন, ফলে সেগুলো ভেঙ্গে গেল।"
641 - عن ابن عباس، قال: أخبرني أبو سفيان بن حرب، أنّ هرقل دعا بكتاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الذي بعث به دحية إلى عظيم بُصري، فدفعه إلى هرقل، فقرأه فإذا فيه:"بسم اللَّه الرحمن الرحيم، من محمد بن عبد اللَّه ورسوله إلى هرقل عظيم الرُّوم، سلام على من اتّبع الهدى. أمّا بعد: فإنّي أدعوك بدعاية الإسلام أسلم تُسلم، يؤتك اللَّه أجرك مرتين، فإن تولّيتَ فإنّ عليك إثم الأريسيين وَ {يَاأَهْلَ الْكِتَابِ
تَعَالَوْا إِلَى كَلِمَةٍ سَوَاءٍ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَلَّا نَعْبُدَ إِلَّا اللَّهَ وَلَا نُشْرِكَ بِهِ شَيْئًا وَلَا يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضًا أَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللَّهِ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَقُولُوا اشْهَدُوا بِأَنَّا مُسْلِمُونَ} [سورة آل عمران: 64]".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الوحي (7)، ومسلم في كتاب الجهاد والسير (1773)، كلاهما من حديث الزّهريّ، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة، عن ابن عباس، قال: فذكر الحديث بطوله، وسيأتي في مواضعه كاملًا.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে আবু সুফিয়ান ইবন হারব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অবহিত করেছেন যে, হিরাক্লিয়াস রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই পত্রটি তলব করলেন যা তিনি দিহইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দিয়ে বুসরার মহান শাসকের কাছে পাঠিয়েছিলেন। সেই শাসক তা হিরাক্লিয়াসের নিকট হস্তান্তর করলেন। হিরাক্লিয়াস তা পাঠ করলেন। তাতে লেখা ছিল: "দয়াময়, পরম দয়ালু আল্লাহর নামে। আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে রোমের মহান শাসক হিরাক্লিয়াসের প্রতি। যারা হেদায়েতের অনুসরণ করে, তাদের ওপর শান্তি বর্ষিত হোক। অতঃপর (জানাচ্ছি), আমি আপনাকে ইসলামের দাওয়াতের মাধ্যমে আহ্বান জানাচ্ছি। আপনি ইসলাম গ্রহণ করুন, শান্তিতে থাকবেন। আল্লাহ আপনাকে দ্বিগুণ পুরস্কার দেবেন। আর যদি আপনি মুখ ফিরিয়ে নেন, তাহলে আপনার ওপর আরীসীয়দের (প্রজাবর্গের) পাপ বর্তাবে এবং (আল্লাহ্ তা’আলা বলেন): 'হে কিতাবধারীগণ! তোমরা এমন একটি বিষয়ের দিকে আসো, যা আমাদের ও তোমাদের মধ্যে সমান – তা হলো: আমরা যেন আল্লাহ ব্যতীত অন্য কারো ইবাদত না করি, তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করি এবং আমাদের কেউ যেন আল্লাহকে বাদ দিয়ে অন্য কাউকে প্রভু হিসেবে গ্রহণ না করে। যদি তারা মুখ ফিরিয়ে নেয়, তবে তোমরা বলে দাও: তোমরা সাক্ষী থেকো যে, আমরা তো মুসলিম (আল্লাহর কাছে আত্মসমর্পণকারী)।' (সূরা আলে ইমরান: ৬৪)"
642 - عن ابن عمر، أنّه قال:"جاءت اليهود إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكروا له أنّ رجلًا منهم وامرأة زنيا، فقال لهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما تجدون في التوراة في شأن الرّجم؟". فقالوا: نفضحهم ويجلدون. فقال عبد اللَّه بن سلام: كذبتُم، إنّ فيها الرّجم. فأتَوا بالتّوراة فنشروها، فوضع أحدهم يدَه على آية الرّجم، ثم قرأ ما قبلها وما بعدها. فقال له عبد اللَّه بن سلام: ارفعْ يدَك. فرفع يده، فإذا فيها آية الرّجم. فقالوا: صدق يا محمد فيها آية الرّجم. فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فرُجما.
قال عبد اللَّه بن عمر: فرأيتُ الرّجلَ يحني على المرأة يقيها الحجارة".
متفق عليه: رواه مالك في الحدود (1) عن نافع، عن ابن عمر، فذكر مثله.
ورواه البخاريّ في المناقب (3635) عن عبد اللَّه بن يوسف.
ومسلم في كتاب الحدود (1699: 27) من طريق عبد اللَّه بن وهب، كلاهما عن مالك بإسناده مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইহুদিরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল এবং তাঁকে জানাল যে তাদের মধ্যকার একজন পুরুষ ও একজন নারী যেনা (ব্যভিচার) করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বললেন: "তোমরা তাওরাতে রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড) সংক্রান্ত কী বিধান পাও?" তারা বলল: আমরা তাদের অপদস্থ করব এবং চাবুক মারব। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'তোমরা মিথ্যা বলছো, নিশ্চয় এর মধ্যে রজমের বিধান আছে।' অতঃপর তারা তাওরাত নিয়ে এলো এবং তা খুলে ধরল। তখন তাদের মধ্যে একজন তার হাত রজমের আয়াতের উপর রাখল এবং তারপরের ও পূর্বের অংশ পড়ল। আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: 'তোমার হাত সরাও।' সে তার হাত সরাল। দেখা গেল সেখানে রজমের আয়াত রয়েছে। তখন তারা বলল: 'হে মুহাম্মাদ! সে সত্য বলেছে। এর মধ্যে রজমের আয়াত আছে।' অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আদেশ করলেন এবং তাদের উভয়কে রজম করা হলো।
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি লোকটিকে দেখলাম, সে নারীর উপর ঝুঁকে আছে, যেন তাকে পাথরগুলো থেকে রক্ষা করতে পারে।
643 - عن أبي هريرة، قال: كان أهلُ الكتاب يقرأون التّوراة بالعبرانية، ويفسّرونها بالعربية لأهل الإسلام، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تصدّقوا أهل الكتاب ولا تكذّبوهم وقولوا: {قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَمَا أُوتِيَ مُوسَى وَعِيسَى وَمَا أُوتِيَ النَّبِيُّونَ مِنْ رَبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ} [سورة البقرة: 136]".
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4485)، وفي الاعتصام (7362)، وفي التوحيد (7542) في جميع المواضع عن محمد بن بشار، حدّثنا عثمان بن عمر، أخبرنا علي بن المبارك، عن يحيى ابن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره، واللّفظ سواء في الجميع.
مسألة ترجمة معاني القرآن:
يقول البيهقيّ:"إنّ أهل الكتاب إن صدقوا فيما فسّروا من كتابهم بالعربيّة كان ذلك ممّا أُنزل إليهم على طريق التعبير عما أُنزل، وكلام اللَّه واحد لا يختلف باختلاف اللّغات، فبأيّ لسان قرئ فهو كلام اللَّه، ثم أسند عن مجاهد في قوله تعالى [سورة الأنعام: 19] يعني ومن أسلم من العجم
وغيرهم. قال البيهقي: وقد يكون لا يعرف العربية، فإذا بلغه معناه بلسانه فهو له نذير". انظر:"الفتح" (13/ 517).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিতাবধারীরা তাওরাত হিব্রু ভাষায় পাঠ করত এবং ইসলামের অনুসারীদের জন্য তা আরবিতে ব্যাখ্যা করত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কিতাবধারীদেরকে বিশ্বাসও করবে না এবং মিথ্যাও বলবে না। বরং তোমরা বলবে: {তোমরা বলো, আমরা ঈমান এনেছি আল্লাহর উপর এবং যা আমাদের প্রতি নাযিল করা হয়েছে, আর যা নাযিল করা হয়েছে ইব্রাহীম, ইসমাঈল, ইসহাক, ইয়াকুব ও তাদের বংশধরদের প্রতি এবং যা মূসা ও ঈসাকে দেওয়া হয়েছে, আর যা তাদের রবের পক্ষ থেকে নবীদেরকে দেওয়া হয়েছে। আমরা তাদের কারো মধ্যে তারতম্য করি না এবং আমরা তাঁরই কাছে আত্মসমর্পণকারী (মুসলিম)।”} [সূরা বাকারা: ১৩৬]।
644 - عن عائشة أم المؤمنين أنها قالت:"أول ما بدئ به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من الوحي الرؤيا الصالحة في النوم، فكان لا يرى رؤيا إلا جاءت مثل فلق الصبح ثم حبب إليه الخلاء وكان يخلو بغار حراء فيتحنث فيه -وهو التعبد- اللّيالي ذوات العدد قبل أن ينزع إلى أهله، ويتزّود لذلك، ثم يرجع إلى خديجة فيتزوّد لمثلها، حتى جاءه الحق وهو في غار حراء فجاءه الملك فقال:"اقرأ" قال:"ما أنا بقارئ" قال:"فأخذني فغطني حتى بلغ مني الجهد ثم أرسلني"، فقال:"اقرأ" قلت:"ما أنا بقارئ فأخذني فغطني الثانية حتى بلغ مني الجهد ثم أرسلني" فقال:"اقرأ" فقلت:"ما أنا بقارئ فأخذني فغطني الثالثة ثم أرسلني" فقال: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ (1) خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ (2) اقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ} [سورة العلق: 1 - 5]". الحديث بطوله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (3)، ومسلم في الإيمان (160) كلاهما من حديث الليث ابن سعد، عن عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة يقول: سمعت عائشة، فذكر الحديث. واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.
رجلًا منهم يسألكم عن الذي أنزل عليكم".
أخرجه البخاري في الشّهادات (2685)، وفي الاعتصام (7363)، وفي التوحيد (7523).
وكذلك جاء عن كعب الأحبار منسوبًا إلى اللَّه سبحانه وتعالى:"عليكم بالقرآن فإنّه أحدث الكتب عهدًا بالرّحمن".
وفي رواية أخرى عنه:"إن اللَّه قال في التوراة: يا موسى، إنّي أنزل عليك توراة حديثة، أفتح بها أعينًا عميًا، وآذانا صُمًّا، وقلوبًا غلفًا".
رواه ابن أبي حاتم بسند حسن، كما قال الحافظ في"الفتح" (13/ 499).
আয়িশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর প্রতি সর্বপ্রথম যে ওহী নাযিল হয়েছিল, তা ছিল ঘুমের মধ্যে সৎ স্বপ্ন। তিনি যখনই কোনো স্বপ্ন দেখতেন, তা প্রভাতের আলোর মতোই পরিষ্কারভাবে সত্যে পরিণত হতো। এরপর তাঁর নিকট নির্জনতা প্রিয় হয়ে ওঠে। তিনি হেরা গুহায় নির্জনে অবস্থান করতেন এবং সেখানে কয়েক রাত্রি পর্যন্ত (তাহান্নুত) ইবাদত করতেন—স্ত্রী-সন্তানের কাছে ফিরে আসার আগে। তিনি এর জন্য খাদ্যসামগ্রী নিয়ে যেতেন। এরপর তিনি খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফিরে আসতেন এবং একই উদ্দেশ্যে (আরো কয়েক দিনের) খাবার সংগ্রহ করতেন। এভাবে চলতে থাকল, অবশেষে হেরা গুহায় অবস্থানকালে তাঁর কাছে সত্য (ওহী) এল।
ফিরিশতা তাঁর কাছে এসে বললেন, ‘পড়ুন!’ তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘আমি তো পড়তে জানি না!’ তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘তখন তিনি আমাকে এমন জোরে জড়িয়ে ধরলেন যে, আমি কষ্ট অনুভব করলাম। এরপর আমাকে ছেড়ে দিলেন। তিনি আবার বললেন, ‘পড়ুন!’ আমি বললাম, ‘আমি তো পড়তে জানি না!’ তিনি আবার আমাকে জড়িয়ে ধরলেন, ফলে আমি কষ্ট অনুভব করলাম। এরপর তিনি আমাকে ছেড়ে দিলেন। তিনি আবার বললেন, ‘পড়ুন!’ আমি বললাম, ‘আমি তো পড়তে জানি না!’ তিনি তৃতীয়বার আমাকে জড়িয়ে ধরলেন, এরপর আমাকে ছেড়ে দিলেন এবং বললেন: “পড়ুন আপনার রবের নামে, যিনি সৃষ্টি করেছেন। সৃষ্টি করেছেন মানুষকে ‘আলাক’ (রক্তপিণ্ড) থেকে। পড়ুন, আর আপনার রব মহামহিম।” (সূরা আলাক: ১-৫)।... (এরপর পুরো হাদীসটি বর্ণনা করা হয়েছে)।
645 - عن عائشة أم المؤمنين أنها قالت:"أول ما بدئ به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من الوحي الرؤيا الصالحة في النوم، فكان لا يرى رؤيا إلا جاءت مثل فلق الصبح ثم حبب إليه الخلاء وكان يخلو بغار حراء فيتحنث فيه -وهو التعبد- الليالي ذوات العدد قبل أن ينزع إلى أهله، ويتزوّد لذلك، ثم يرجع إلى خديجة فيتزوّد لمثلها، حتى جاءه الحق وهو في غار حراء فجاءه الملك فقال:"اقرأ" قال:"ما أنا بقارئ" قال:"فأخذني فغطني حتى بلغ مني الجهد ثم أرسلني"، فقال:"اقرأ" قلت:"ما أنا بقارئ فأخذني فغطني الثانية حتى بلغ مني الجهد ثم أرسلني" فقال:"اقرأ" فقلت:"ما أنا بقارئ فأخذني فغطني الثالثة ثم أرسلني" فقال: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ (1) خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ (2) اقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ. . .} [سورة العلق: 1 - 5]. فرجع بها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يرجف فؤادُه، فدخل على خديجة بنت خويلد رضي الله عنها فقال:"زمِّلوني زمِّلوني"، فزمَّلوه حتى ذهب عنه الرَّوعُ، فقال لخديجة وأخبرها الخبر:"لقد خشيت على نفسي" فقالت خديجة: كلا واللَّهِ ما يخزيك اللَّه أبدا، إنّك لتصل الرّحم، وتحملُ الكلّ، وتكسب المعدوم، وتقري الضيف، وتعين على نوائب الحقّ.
فانطلقت به خديجة حتى أتت به ورقة بن نوفل بن أسد بن عبد العزّى ابن عم خديجة، وكان امرءًا تنصَّر في الجاهليّة وكان يكتب الكتاب العبرانيَّ فيكتب من الإنجيل بالعبرانية ما شاء اللَّه أن يكتب وكان شيخا كبيرًا قد عمي فقالت له خديجة: يا ابنَ عمِّ اسمع من ابن أخيك فقال له ورقة: يا ابن أخي ماذا ترى، فأخبره رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خبر ما رأى، فقال له ورقة: هذا النّاموس الذي نزل اللَّه على موسى، با ليتني فيها جَذَعٌ ليتني أكونُ حيًّا إذْ يُخرجك قومُك، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أو
مخرجيَّ هُمْ؟ !" قال: نعم، لم يأتِ رجلٌ قطُّ بمثل ما جئتَ به إلّا عودي، وإنْ يدركني يومُك أنصرك نصرًا مؤزّرًا. ثم لم ينشبْ ورقةُ أن توفي وَفَتَرَ الوحيُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (3)، ومسلم في الإيمان (160) كلاهما من حديث الليث ابن سعد، عن عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة يقول: سمعت عائشة، فذكرت الحديث.
আয়েশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সর্বপ্রথম যে ওহী আসা শুরু হয়, তা ছিল ঘুমের মধ্যে সত্য স্বপ্ন। তিনি এমন কোনো স্বপ্ন দেখতেন না যা ভোরের আলোর মতো প্রকাশিত হয়নি। এরপর তাঁর কাছে নির্জনতা প্রিয় হয়ে ওঠে। তিনি হেরা গুহায় নির্জনবাস করতেন এবং সেখানে একটানা বহু রাত ইবাদতে মগ্ন থাকতেন (تحنث অর্থ ইবাদত করা)। এরপর তিনি তাঁর পরিবারের কাছে ফিরে আসার আগে এজন্য প্রয়োজনীয় খাবার সামগ্রী নিয়ে যেতেন এবং (খাবার ফুরিয়ে গেলে) খাদীজার কাছে ফিরে এসে অনুরূপ সময়ের জন্য পুনরায় খাদ্য সামগ্রী নিয়ে যেতেন।
অবশেষে হেরা গুহায় অবস্থানকালে তাঁর কাছে হক (সত্য/ওহী) আগমন করল। তখন ফেরেশতা এসে বললেন: "পড়ুন!" তিনি বললেন: "আমি তো পড়তে জানি না।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর ফেরেশতা আমাকে ধরলেন এবং এমন জোরে আলিঙ্গন করলেন যে আমার কষ্ট হলো, এরপর আমাকে ছেড়ে দিলেন। এরপর বললেন: "পড়ুন!" আমি বললাম: "আমি তো পড়তে জানি না।" তিনি দ্বিতীয়বার আমাকে ধরলেন এবং এমন জোরে আলিঙ্গন করলেন যে আমার কষ্ট হলো, এরপর আমাকে ছেড়ে দিলেন। এরপর বললেন: "পড়ুন!" আমি বললাম: "আমি তো পড়তে জানি না।" তিনি তৃতীয়বার আমাকে ধরলেন এবং জোরে আলিঙ্গন করলেন, এরপর আমাকে ছেড়ে দিলেন। এরপর তিনি বললেন:
**"পড়ুন আপনার রবের নামে যিনি সৃষ্টি করেছেন। সৃষ্টি করেছেন মানুষকে ‘আলাক (রক্তপিণ্ড) থেকে। পড়ুন, আর আপনার রব অতিশয় সম্মানিত..."** [সূরা আলাক: ১-৫ পর্যন্ত]।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওহীর এই অংশ নিয়ে কম্পিত হৃদয়ে ফিরে এলেন এবং খাদীজা বিনত খুওয়াইলিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করে বললেন: "আমাকে কম্বল দিয়ে ঢেকে দাও, আমাকে কম্বল দিয়ে ঢেকে দাও।" এরপর তাঁকে কম্বল দিয়ে ঢেকে দেওয়া হলো, যতক্ষণ না তাঁর ভয় দূর হলো। এরপর তিনি খাদীজাকে ঘটনাটি বললেন এবং বললেন: "আমি নিজের জীবনের উপর আশঙ্কা করছি।"
খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কখনই না। আল্লাহর কসম! আল্লাহ আপনাকে কখনও লাঞ্ছিত করবেন না। কারণ, আপনি আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখেন, দুস্থ ও অসহায়ের ভার বহন করেন, নিঃস্বকে সম্পদ দান করেন, মেহমানদারী করেন এবং সত্য পথের দুর্যোগে সহযোগিতা করেন।
এরপর খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে নিয়ে তাঁর চাচাতো ভাই ওয়ারাকা ইবনু নাওফাল ইবনু আসাদ ইবনু আব্দুল ‘উয্যার কাছে গেলেন। ওয়ারাকা জাহিলিয়াতের যুগে নাসারা (খ্রিস্টান) ধর্ম গ্রহণ করেছিলেন। তিনি ইব্রীয় (হিব্রু) ভাষায় কিতাব লিখতেন এবং আল্লাহ যতটুকু চাইতেন, ততটুকু ইঞ্জিল থেকে ইব্রীয় ভাষায় লিখতেন। তিনি ছিলেন অতি বৃদ্ধ এবং অন্ধ হয়ে গিয়েছিলেন। খাদীজা তাঁকে বললেন: "হে আমার চাচাতো ভাই! আপনার ভাতিজার কথা শুনুন।" তখন ওয়ারাকা বললেন: "হে ভাতিজা! তুমি কী দেখ?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দেখা সব ঘটনা তাঁকে খুলে বললেন।
ওয়ারাকা বললেন: "এ তো সেই নামূস (দূত/ফেরেশতা) যিনি মূসা (আঃ)-এর কাছে এসেছিলেন। হায়! যদি আমি সেই সময় যুবক থাকতাম! হায়! যদি আমি জীবিত থাকি, যখন আপনার কওম আপনাকে বের করে দেবে!" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা কি আমাকে বের করে দেবে?" ওয়ারাকা বললেন: "হ্যাঁ। আপনি যা নিয়ে এসেছেন, তা নিয়ে কেউ কখনও আসেনি, কিন্তু তার সঙ্গে শত্রুতা করা হয়েছে। যদি আমি আপনার সেই দিন পাই, তবে আমি আপনাকে পূর্ণ সমর্থন দিয়ে সাহায্য করব।"
এরপর ওয়ারাকা শীগগিরই ইন্তেকাল করলেন এবং ওহী আসা সাময়িকভাবে বন্ধ থাকল।
646 - عن عائشة، قالت:"أوّل سورة نزلتْ: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ}".
حسن: رواه الحاكم (2/ 220) عن أبي بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أنبأنا بشر بن موسى، ثنا الحميدي، ثنا سفيان، عن محمد بن اسحاق، عن الزهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرت الحديث.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم". ووافقه الذهبيّ.
محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، وهو شاهد لما سبق.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, "প্রথম যে সূরাটি নাযিল হয়েছিল, তা হলো: {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ}।"
647 - عن يحيى بن أبي كثير، قال: سألتُ أبا سلمة بن عبد الرحمن عن أوّل ما نزل من القرآن قال: {يَاأَيُّهَا الْمُدَّثِّرُ}. قلت: يقولون {اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ}؟ فقال أبو سلمة: سألتُ جابر بن عبد اللَّه عن ذلك، وقلتُ له مثل الذي قلتَ. فقال جابر: لا أحدِّثُك إلّا ما حدّثنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"جاورتُ بحراء، فلما قضيتُ جواري هبطت فنوديتُ، فنظرتُ عن يميني فلم أرَ شيئًا، ونظرتُ عن شمالي فلم أرَ شيئًا، ونظرتُ أمامي فلم أرَ شيئًا، ونظرتُ خلفي فلم أرَ شيئًا، فرفعتُ رأسي فرأيتُ شيئًا، فأتيتُ خديجة فقلتُ: دثِّروني، وصبوا عليَّ ماءًا باردًا. قال: فدثّروني وصبّوا عليَّ ماءًا باردًا. قال: فنزلت: {يَاأَيُّهَا الْمُدَّثِّرُ (1) قُمْ فَأَنْذِرْ (2) وَرَبَّكَ فَكَبِّرْ} [سورة المدثر: 1 - 3]".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4922)، ومسلم في الإيمان (161) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، بإسناده، فذكره.
قال الواحدي:"وليس هذا بمخالف لما ذكرناه أولًا؛ وذلك أنّ جابرًا سمع من النبيّ صلى الله عليه وسلم هذه القصة الأخيرة، ولم يسمع أوّلها، فتوهّم أنّ المدثر أوّلُ ما نزل، وليس كذلك، ولكنها أول ما نزل عليه بعد سورة {اقْرَأْ}".
জাবির বিন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর (রহ.) বলেন, আমি আবূ সালামা ইবনু আব্দুর রহমানকে জিজ্ঞাসা করলাম, কুরআনের সর্বপ্রথম কী নাযিল হয়েছিল? তিনি বললেন: (সূরা) 'ইয়া আইয়ুহাল মুদ্দাচ্ছির'। আমি বললাম: লোকেরা তো বলে, (সূরা) 'ইকরা বিসমি রব্বিকাল্লাযী খালাক্ব'? তখন আবূ সালামা বললেন: আমি জাবির বিন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেছিলাম এবং তোমার মতো করেই তাঁকে বলেছিলাম। তখন জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদেরকে কেবল সেটাই বর্ণনা করব যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি হেরা গুহায় ইতিকাফে ছিলাম। যখন আমার ইতিকাফ পূর্ণ হলো, আমি (গুহা থেকে) নিচে নামলাম। তখন আমাকে আহ্বান করা হলো। আমি ডান দিকে তাকালাম, কিছুই দেখলাম না। বাম দিকে তাকালাম, কিছুই দেখলাম না। সামনে তাকালাম, কিছুই দেখলাম না। পেছনে তাকালাম, কিছুই দেখলাম না। এরপর আমি মাথা ওপরের দিকে তুললাম এবং একটি জিনিস দেখতে পেলাম। তখন আমি খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললাম: আমাকে কম্বল দিয়ে ঢেকে দাও এবং আমার ওপর ঠাণ্ডা পানি ঢেলে দাও।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তারা তাঁকে ঢেকে দিলেন এবং তাঁর ওপর ঠাণ্ডা পানি ঢেলে দিলেন। তিনি বলেন, এরপর নাযিল হলো: "হে বস্ত্রাবৃত! (১) উঠুন এবং সতর্ক করুন। (২) এবং আপনার রবের শ্রেষ্ঠত্ব ঘোষণা করুন। (৩)" [সূরা মুদ্দাচ্ছির: ১-৩]।
