আল-জামি` আল-কামিল
648 - عن البراء بن عازب، قال:"آخر سورة نزلت {بَرَاءَةٌ} [سورة التوبة: 1]، وآخر آية نزلت: {يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ. . .} [سورة النساء: 176]".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4605)، ومسلم في الفرائض (1618) كلاهما من حديث شعبة، عن أبي إسحاق، قال: سمعت البراء، فذكره.
وفي رواية:"آخر سورة أنزلتْ تامّة سورة التوبة". رواه مسلم من طريق زكريا، عن أبي إسحاق.
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সর্বশেষ যে সূরাটি নাযিল হয়েছিল তা হলো {বারাআত} (সূরা আত-তাওবা: ১), এবং সর্বশেষ যে আয়াতটি নাযিল হয়েছিল তা হলো: {তারা আপনার কাছে ফাতওয়া চায়; আপনি বলুন: আল্লাহ্ তোমাদেরকে কালালাহ (নিষ্পুত্র ব্যক্তির সম্পত্তি) সম্পর্কে ফাতওয়া দিচ্ছেন...} (সূরা আন-নিসা: ১৭৬)।
649 - عن أُبي بن كعب، قال:"آخر ما نزل من القرآن: {لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ أَنْفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَاعَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُمْ بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَحِيمٌ} [سورة التوبة: 128]".
صحيح: رواه الحاكم (2/ 238) عن أبي العباس محمد بن يعقوب، ثنا بكار بن قتيبة القاضي، ثنا أبو عامر عبد اللَّه بن عمرو العقديّ، ثنا شعبة، عن يونس بن عبيد، وعلي بن زيد، عن يوسف بن مهران، عن ابن عباس، عن أبي بن كعب بن مالك، فذكره.
قال الحاكم:"حديث شعبة عن يونس بن عبيد صحيح على شرط الشّيخين".
وأمّا علي بن زيد وهو ابن جدعان فأكثر أهل العلم على تضعيفه، ولعلّه لهذا السّبب صحّح الحاكم رواية شعبة، عن يونس بن عبيد. ولم يصحح رواية علي بن زيد، واللَّه أعلم.
ورواه الواحديّ في أسباب النزول (ص 13) من وجه آخر عن شعبة، عن علي بن زيد، عن يوسف بن ماهك، عن أُبي بن كعب، قال:"أحدث القرآن باللَّه عهدًا {لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ أَنْفُسِكُمْ} [سورة التوبة: 128] وأوّل يوم أنزل القرآن فيه يوم الاثنين".
ومن طريق شعبة عنه، عن يوسف بن مهران، عن ابن عباس، عن أُبي بن كعب. رواه عبد اللَّه ابن أحمد في زوائد أبيه (21113) كما رواه أيضًا من وجه آخر في مسند أبيه (21226) قال: حدثنا روح بن عبد المؤمن، حدثنا عمر بن شقيق، حدّثنا أبو جعفر الرّازيّ، حدّثنا الرّبيع بن أنس، عن أبي العالية، عن أبي بن كعب:"أنهم جمعوا القرآن في مصاحف في خلافة أبي بكر، فكان رجال يكتبون ويملي عليهم أبيُّ بن كعب، فلمّا انتهوا إلى هذه الآية من سورة براءة: {ثُمَّ انْصَرَفُوا صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ} [سورة التوبة: 127]، فظنّوا أنّ هذا آخرُ ما أُنزلَ من القرآن، فقال لهم أبيُّ بن كعب: إنّ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم أَقْرأني بعدها آيتين: {لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ أَنْفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَاعَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُمْ بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَحِيمٌ} [سورة التوبة: 128 - 129] ثم قال: هذا آخر ما أُنزل من القرآن، قال: فختم بما فتُح به بـ"اللَّه الذي لا إله إلّا هو" وهو قولُ اللَّه تبارك وتعالى: {وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ} [الأنبياء: 25]".
وأبو جعفر الرّازيّ هو عيسى بن عبد اللَّه بن ماهان، وصفه الحافظ بأنّه"صدوق سيء الحفظ خصوصا عن مغيرة". وهو لا بأس به في المتابعات.
إن صحّ هذا فإنه يحمل على أن كلًا قال بما وصل إليه من علم في آخر ما نزل من القرآن، أو أن أبي بن كعب أراد بالآية سورة البراءة كلّها كما جاء في حديث البراء بن عازب، واللَّه تعالى أعلم.
وقال تعالى: {شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ} [سورة البقرة: 185].
أي أنّه نزل في ليلة القدر من اللّوح المحفوظ إلى السماء الدّنيا، ثم أنزل على النبيّ صلى الله عليه وسلم على ما أراد اللَّه إنزاله إليه.
جاء ذلك عن ابن عباس من طرق كثيرة، ولم نجد له مخالفًا من أحد من الصحابة، ومن هذه الطّرق:
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, "কুরআন মাজীদে সর্বশেষ যা নাযিল হয়েছে, তা হলো: 'তোমাদের কাছে এসেছেন তোমাদের মধ্য থেকেই একজন রাসূল, তোমাদের দুঃখ-কষ্ট তাঁর কাছে খুবই বেদনাদায়ক। তিনি তোমাদের কল্যাণকামী, মুমিনদের প্রতি অত্যন্ত দয়ালু ও মেহেরবান।' [সূরা তাওবা: ১২৮]।"
650 - عن ابن عباس، قال:"أنزل القرآن جملة من الذّكر في ليلة أربع وعشرين من رمضان، فجُعل في بيت العزّة".
صحيح: رواه النّسائيّ في الكبرى (7991)، والطّبرانيّ في الكبير (12381)، والحاكم (2/ 223)، وابن جرير الطّبريّ في تفسيره (3/ 189) من طرق عن الأعمش، عن حسان بن أبي الأشرس، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد". ووافقه الذّهبيّ.
وفي رواية:"فجعل جبريل ينزل على النبيّ صلى الله عليه وسلم ويرتّله ترتيلًا".
وفي رواية زيادة: بجواب كلام العباد وأعمالهم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআনুল কারীমকে 'যিকর' (মূল উৎস) থেকে রমযানের চব্বিশতম রাতে একবারে নাযিল করা হয়েছিল, অতঃপর তা বাইতুল ইজ্জাতে (প্রথম আসমানে) রাখা হয়েছিল।
(অন্য এক বর্ণনায় আছে: অতঃপর জিবরীল (আঃ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রয়োজন অনুসারে ধীরে ধীরে তা নাযিল করতে শুরু করেন।)
(অন্য বর্ণনায় এই অতিরিক্ত তথ্য আছে যে, [এই অবতরণ হতো] বানলাদদের কথাবার্তা ও তাদের কর্মের জবাবে।)
651 - عن ابن عباس قال:"أنزل القرآن جملة واحدة إلى السّماء الدّنيا. في ليلة القدر، ثم نزل بعد ذلك بعشرين سنة: {وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَاكَ بِالْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا} [سورة الفرقان: 33]".
صحيح: رواه النسائيّ في السنن الكبرى (7935)، وفي فضائل القرآن (14)، والحاكم (2/ 222) -واللّفظ له- كلاهما من حديث داود بن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وفي لفظ للنسائيّ:"فكان إذا أراد اللَّه أن يُحْدِثَ شيئًا نزل، فكان من أوّله وآخره عشرين سنة".
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قوله:"عشرين سنة" فيه إلغاء الكسر، أو أنّه لم يحتسب مدّة فتور الوحي، إذ المعتمد أن مدّة نزول الوحي كانت ثلاثًا وعشرين سنة كما مضى.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআনকে লাইলাতুল কদরের রাতে একবারেই পৃথিবীর (নিকটবর্তী) আসমানে নাযিল করা হয়েছিল। এরপর বিশ বছরে তা (ধীরে ধীরে) নাযিল হয়। [আল্লাহ্র বাণী]: "তারা তোমার কাছে কোনো প্রশ্ন নিয়ে আসলে আমি তোমাকে সত্য সহকারে এবং সর্বোত্তম ব্যাখ্যা সহকারে উত্তর দিয়ে দেব।" (সূরা আল-ফুরকান: ৩৩)।
652 - عن وعن ابن عباس، قال:"نزل القرآن كلّه جملة واحدة في ليلة القدر في رمضان إلى السّماء الدّنيا، فكان اللَّه إذا أراد أن يُحدث في الأرض شيئًا أنزله منه حتى جمعه".
صحيح: رواه ابن جرير الطّبريّ في تفسيره (24/ 545)، والحاكم (2/ 222)، وعنه البيهقيّ في الأسماء والصفات (498) عن ابن المثنى، قال: ثنا عبد الأعلى، قال: ثنا داود، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وابن المثنى هو محمد بن المثنى بن عبيد العنزي مات سنة (252 هـ).
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআন মাজীদ সম্পূর্ণটিই রমজান মাসে লাইলাতুল কদরের রাতে প্রথম আসমানে একবারে নাযিল করা হয়েছিল। এরপর আল্লাহ যখনই পৃথিবীতে কোনো কিছু ঘটাতে চাইতেন, তখন তিনি তা (প্রথম আসমানে সংরক্ষিত) সেই কুরআন থেকে প্রয়োজন অনুযায়ী নাযিল করতেন, এভাবে তিনি তা পরিপূর্ণরূপে একত্রিত করেন।
653 - عن ابن عباس في قوله تعالى: {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ} قال:"أُنزل القرآن جملة واحدة في ليلة القدر إلى السّماء الدّنيا، فكان بموقع النّجوم، فكان اللَّه ينزل على رسوله بعضه إثر بعض".
صحيح: رواه ابن جرير في تفسيره (24/ 543)، والنسائيّ في السنن الكبرى (11689)، وابن الضريس في"فضائل القرآن"، والحاكم (2/ 222) كلّهم من طريق جرير، عن منصور، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرطهما".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ} (নিশ্চয় আমি এটিকে কদরের রাতে অবতীর্ণ করেছি) সম্পর্কে তিনি বলেন, "কুরআনকে লায়লাতুল কদরে (শবে কদরে) একবারে দুনিয়ার নিকটতম আসমানে নাযিল করা হয়েছিল। সেটি ছিল নক্ষত্ররাজির অবস্থানে। অতঃপর আল্লাহ তাঁর রাসূলের উপর কিছু কিছু করে পর্যায়ক্রমে তা নাযিল করতেন।"
654 - عن ابن عباس قال: قال له رجل: إنّه وقع في قلبي الشّك من قوله تعالى: {شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ} [سورة البقرة: 185]، وقوله تعالى: {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُبَارَكَةٍ} [سورة الدخان: 3]، وقوله تعالى: {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ} [سورة القدر: 1]، وقد أنزل اللَّه في شوال، وذي القعدة وغيره؟ ! قال: إنّما نزل في رمضان في ليلة القدر وليلة مباركة جملة واحدة، ثم أنزل على مواقع النّجوم رتلا في الشهور والأيام".
حسن: رواه ابن جرير الطّبريّ (3/ 192)، وابن أبي حاتم في تفسيره (1/ 310)، والبيهقيّ في الأسماء والصّفات (501) كلّهم من طريق عبيد اللَّه بن موسى، عن إسرائيل، عن السُّديّ، عن محمد بن أبي المجالد، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره، واللّفظ لابن جرير.
وإسناده حسن من أجل السّدي وهو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة السُّدي -بضم السين، وتشديد الدّال- مختلف فيه، فكذّبه الجوزجاني لتشيّعه، ومشاه الآخرون، وهو حسن الحديث.
وأمّا ما رُوي عن ابن عباس قال:"نزل القرآن في ليلة من السماء العليا إلى السماء الدنيا جملة واحدة، ثم فرق في السنين، قال: وتلا ابنُ عباس هذه الآية {فَلَا أُقْسِمُ بِمَوَاقِعِ النُّجُومِ} [سورة الواقعة: 75] قال: نزل مفرّقًا". فهو ضعيف.
رواه ابن جرير (24/ 543)، والحاكم (2/ 530)، وعنه البيهقيّ في الشعب (2250) كلّهم من طريق حصين، عن حكيم بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وحكيم بن جبير الأسديّ ضعيف عند جماهير أهل العلم.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল: আমার মনে আল্লাহ তাআলার এই বাণী (সূরা বাকারাহ: ১৮৫) {শহরু রামাদানাল্লাযী উনযিলা ফীহিল কুরআন} [অর্থাৎ: রমযান মাস, যাতে কুরআন অবতীর্ণ হয়েছে], এবং আল্লাহ তাআলার এই বাণী (সূরা দুখান: ৩) {নিশ্চয় আমি এটিকে এক বরকতময় রাতে অবতীর্ণ করেছি}, আর আল্লাহ তাআলার এই বাণী (সূরা কদর: ১) {নিশ্চয় আমি এটিকে কদরের রাতে অবতীর্ণ করেছি} সম্পর্কে সন্দেহ সৃষ্টি হয়েছে। অথচ আল্লাহ তো শাওয়াল, যিলকদ এবং অন্যান্য মাসেও (কুরআনের অংশ) অবতীর্ণ করেছেন! তিনি (ইবনু আব্বাস) বললেন: এটি (কুরআন) রমযান মাসে, লাইলাতুল কদর ও বরকতময় রাতে একসাথে (প্রথম আসমানে) অবতীর্ণ হয়েছিল। এরপর তা মাস এবং দিনগুলোতে তারকারাজির অবস্থানের ক্রমানুসারে ধীরে ধীরে (খন্ড খন্ড আকারে) অবতীর্ণ হয়েছে।
655 - عن ابن عباس، قال:"بُعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لأربعين سنة، فمكث بمكة ثلاث عشرة سنة يوحى إليه، ثم أُمر بالهجرة، فهاجر عشر سنين، ومات وهو ابن ثلاث وستين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفضائل (3902) عن مطر بن فضل: حدّثنا روح: حدّثنا هشام: حدّثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه مسلم في الفضائل (2351) من وجه آخر عن ابن عباس.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চল্লিশ বছর বয়সে নবুওয়াত দিয়ে প্রেরণ করা হয়। তিনি মক্কায় তের বছর অবস্থান করেন, যখন তাঁর কাছে ওহী নাযিল হতো। এরপর তাঁকে হিজরতের নির্দেশ দেওয়া হয়। তিনি দশ বছর হিজরত অবস্থায় থাকেন এবং তেষট্টি বছর বয়সে ইন্তেকাল করেন।
656 - عن ابن عباس قال:"أُنزل القرآن جملة واحدة إلى السّماء الدّنيا في ليلة القدر، أنزل بعد ذلك عشرين سنة. {وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَاكَ بِالْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا} [سورة الفرقان: 33]، {وَقُرْآنًا فَرَقْنَاهُ لِتَقْرَأَهُ عَلَى النَّاسِ عَلَى مُكْثٍ وَنَزَّلْنَاهُ تَنْزِيلًا} [سورة الإسراء: 106]".
صحيح: رواه النسائيّ في الكبري (7935)، والحاكم (2/ 222)، كلاهما من طريق داود بن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআন লাইলাতুল কদরের রাতে দুনিয়ার আকাশে (বায়তুল ইজ্জতে) একবারে অবতীর্ণ হয়েছিল। এরপর তা বিশ বছর ধরে (খন্ডে খন্ডে) নাযিল হয়েছিল। (এ কারণেই আল্লাহ্ তাআলা বলেন:) "এবং তারা তোমার কাছে এমন কোনো প্রশ্ন বা উদাহরণ নিয়ে আসে না যার সঠিক জবাব ও সুন্দর ব্যাখ্যা আমি তোমাকে প্রদান করিনি।" (সূরা ফুরকান: ৩৩) এবং তিনি আরও বলেন: "আর কুরআন আমি একে খণ্ড খণ্ড করে অবতীর্ণ করেছি যাতে তুমি তা মানুষের কাছে ধীরে ধীরে পাঠ করতে পারো; আর আমি একে সঠিকভাবে নাযিল করেছি।" (সূরা ইসরা: ১০৬)
657 - عن عائشة، وابن عباس، قالا:"لبث النبيُّ صلى الله عليه وسلم بمكة عشر سنين يُنزل عليه القرآن، وبالمدينة عشرًا".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4978، 4979) من طريق شيبان، عن يحيى، عن أبي سلمة، قال: أخبرتني عائشة، وابن عباس، فذكراه.
وقوله:"عشر سنين". والمعتمد أنه صلى الله عليه وسلم عاش ثلاثًا وستين سنة، وما يخالف ذلك إما أن يحمل على إلغاء الكسر في السنين، وإما على جبر الكسر في الشهور.
وأما في هذا الحديث وما قبله فيمكن الجمع أنه صلى الله عليه وسلم بعث على رأس الأربعين، فكان مدّة وحي المنام ستة أشهر إلى أن نزل عليه الملك في شهر رمضان من غير فترة، ثم فتر الوحي، ثم تواتر وتتابع فكانت مدّة تواتره وتتابعه بمكة عشر سنين من غير فترة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বলেছেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় দশ বছর অবস্থান করেছেন, যখন তাঁর উপর কুরআন নাযিল হচ্ছিল, এবং মদীনায়ও দশ বছর (অবস্থান করেছেন)।
658 - عن عبد اللَّه بن عمر، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّما مثل صاحب القرآن كمثل صاحب الإبل المعقَّلة إن عاهد عليها أمسكها، وإن أطلقها ذهبتْ".
متفق عليه: رواه مالك في القرآن (6) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في فضائل القرآن (5031)، ومسلم في صلاة المسافرين (789)، كلاهما من حديث مالك، بإسناده، مثله.
وقال تعالى: {وَكَذَلِكَ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لِتُنْذِرَ أُمَّ الْقُرَى وَمَنْ حَوْلَهَا} [سورة الشورى: 7].
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিঃসন্দেহে কুরআনের ধারকের উদাহরণ হলো রশি দিয়ে বেঁধে রাখা উটের মালিকের মতো। যদি সে সেটির যত্ন নেওয়ার অঙ্গীকার বজায় রাখে, তবে সে সেটিকে ধরে রাখতে পারে। আর যদি সে সেটিকে ছেড়ে দেয়, তবে তা চলে যায়।
659 - عن أنس بن مالك، قال:"أمر عثمانُ زيد بنَ ثابت، وسعيد بن العاص، وعبد اللَّه بن الزبير، وعبد الرحمن بن الحارث بن هشام أن ينسخوها في المصاحف. وقال لهم: إذا اختلفتُم أنتم وزيد بن ثابت في عربية من عربية القرآن، فاكتبوها بلسان قريش، فإنّ القرآن أُنزل بلسانِهم ففعلوا".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4984) عن أبي اليمان، حدّثنا شعيب، عن الزّهريّ. وأخبرني أنس بن مالك، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়িদ ইবনু সাবিত, সাঈদ ইবনু আস, আব্দুল্লাহ ইবনু যুবাইর এবং আব্দুর রহমান ইবনু হারিস ইবনু হিশামকে নির্দেশ দিলেন যে, তারা যেন তা মুসহাফসমূহে প্রতিলিপি তৈরি করেন। তিনি তাঁদের বললেন: তোমরা এবং যায়িদ ইবনু সাবিত যদি কুরআনের কোনো আরবি উচ্চারণের বিষয়ে মতভেদ করো, তবে তোমরা তা কুরাইশদের ভাষায় লিপিবদ্ধ করো। কেননা কুরআন তাদের ভাষাতেই অবতীর্ণ হয়েছে। তারা নির্দেশ অনুযায়ী কাজ করলেন।
660 - عن أنس بن مالك، قال:"إنّ حذيفة بن اليمان قدم على عثمان وكان يغازي أهل الشام في فتح إِرْمِينِيَة وأَذْرِبِيجَان مع أهل العراق، فأفزعَ حذيفةَ اختلافُهم في القراءة، فقال حذيفةُ لعثمان يا أمير المؤمنين: أَدْركْ هذه الأُمّة قَبْل أَنْ يَختلفوا في الكتاب اختلافَ اليهود والنصاري، فأرسل عثمان إلى حفصةَ: أَنْ أرسلي إلينا بالصُّحُف ننسخها في المصاحف، ثم نَردّها إليك، فأرسلت بها حفصة إلى عثمان فأمر زيد بن ثابت، وعبد اللَّه بن الزبير، وسعيد بن العاص، وعبد الرحمن بن الحارث ابن هشام فنسخوها في المصاحف. وقال عثمان: للرهط القُرشِييِّن الثّلاثة: إذا اختلفتُم أنتم وزيد بن ثابت في شيءٍ من القرآن، فاكتبوه بلسان قريش، فإنما نزل بلسانِهم ففعلوا، حتى إذا نَسخُوا الصُّحف في المصاحف ردَّ عثمان الصُّحف إلى حفصة، وأرسل إلى كلِّ أُفُقٍ بمصحف مما نسخوا، وأمر بما سواه من القرآن في كل صحيفة أو مصحف أن يُحْرق".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4987) عن موسى، حدّثنا إبراهيم، حدّثنا ابنُ شهاب، أنّ أنس بن مالك، قال (فذكره).
ورواه الترمذيّ (3104) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدّثنا إبراهيم بن سعد، بإسناده وزاد فيه:"قال الزّهريّ: فاختلفوا يومئذ في التابوت والتابوه، فقال القرشيّون: التابوت. وقال زيد: التابوه. فرفع اختلافهم إلى عثمان، فقال: اكتبوه: التابوت، فإنّه نزل بلسان قريش"، وصحّحه ابن حبان (4506) ورواه من طريق أبي الوليد، قال: حدّثنا إبراهيم بن سعد، بإسناده، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলেন। তখন তিনি ইরাকবাসীদের সাথে আরমেনিয়া ও আযারবাইজান বিজয়ের জন্য শাম (সিরিয়া) বাসীদের সাথে যুদ্ধে লিপ্ত ছিলেন। তাদের কিরাআত (কুরআন পাঠ)-এর মধ্যে মতপার্থক্য হুযাইফাকে আতঙ্কিত করে তুলেছিল। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি এই উম্মতকে রক্ষা করুন, যাতে তারা কিতাবের (কুরআন) ব্যাপারে ইহুদী ও খ্রিস্টানদের মতো মতপার্থক্য সৃষ্টি না করে। অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এই মর্মে লোক পাঠালেন যে, আপনি সহীফাসমূহ (কুরআনের মূল কপি) আমাদের কাছে পাঠান, যাতে আমরা সেগুলোকে মুসহাফে (কুরআনের কিতাব) প্রতিলিপি করতে পারি, এরপর তা আপনার কাছে ফেরত দেব। তখন হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেগুলো উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়িদ ইবনু সাবিত, আবদুল্লাহ ইবনু যুবাইর, সাঈদ ইবনুল আ’স এবং আবদুর রহমান ইবনুল হারিস ইবনু হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেগুলোর প্রতিলিপি মুসহাফে তৈরি করার নির্দেশ দিলেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুরাইশী তিন ব্যক্তিকে বললেন: কুরআনের কোনো বিষয়ে যদি তোমরা এবং যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মতপার্থক্য করো, তবে তা কুরাইশের ভাষা অনুযায়ী লিখবে। কেননা তা (কুরআন) তাদের (কুরাইশের) ভাষাতেই নাযিল হয়েছে। অতঃপর তারা তাই করলেন। যখন তারা সহীফাসমূহ থেকে মুসহাফে প্রতিলিপি তৈরি করা শেষ করলেন, তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সহীফাসমূহ হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফেরত দিলেন। আর তিনি প্রতিলিপি করা মুসহাফগুলোর একটি করে কপি প্রতিটি অঞ্চলে পাঠিয়ে দিলেন এবং আদেশ দিলেন যে, এর বাইরে অন্য যে কোনো সহীফা বা মুসহাফে কুরআনের যা কিছু আছে, তা যেন পুড়িয়ে ফেলা হয়।
661 - عن مسروق قال: ذكرُوا ابنَ مسعود عند عبد اللَّه بن عمرو فقال: ذاك رجلٌ لا أزال أحبُّه بعدما سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"استقرؤوا القرآن من أربعة: من ابن مسعود، وسالم مولي حذيفة، وأُبي بن كعب، ومعاذ بن جبل".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4999)، ومسلم في فضائل الصحابة (2464) كلاهما من حديث شعبة، عن عمرو بن مرّة، عن إبراهيم، عن مسروق، فذكره، واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন (আমার সামনে) ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা করা হয়, তখন আমি তাকে সর্বদা ভালোবাসব, কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা চার ব্যক্তির নিকট থেকে কুরআন শিক্ষা করো: ইবনে মাসঊদ, হুযাইফার আযাদকৃত গোলাম সালেম, উবাই ইবনে কা'ব এবং মু'আয ইবনে জাবাল।"
662 - عن قتادة، قال: سألت أنس بن مالك: من جمع القرآن على عهد النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: أربعة كلّهم من الأنصار: أُبي بن كعب، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5003) عن حفص بن عمر، حدّثنا همام: حدّثنا قتادة، قال: سألتُ أنسًا، فذكره.
ورواه البخاريّ (3810)، ومسلم في فضائل الصحابة (2465) كلاهما من حديث شعبة، عن قتادة، قال: سمعت أنسًا يقول (فذكره).
قال قتادة:"قلت لأنس بن مالك: من أبو زيد؟ قال: أحد عمومتي".
وهؤلاء أربعة من الأنصار، وسبق قبله اثنان من المهاجرين واثنان من الأنصار، وفيه دليل على أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال ذلك في أوقات مختلفة، فلا تعارض بين هذه الأحاديث.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (কাতাদা বলেন): আমি আনাস ইবনে মালিককে জিজ্ঞেস করেছিলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে কারা কুরআন সংকলন করেছিলেন? তিনি বললেন: চারজন, তাদের সকলেই ছিলেন আনসারী: উবাই ইবনে কা'ব, মু'আয ইবনে জাবাল, যায়দ ইবনে সাবেত এবং আবূ যায়দ।
কাতাদা বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিককে জিজ্ঞেস করলাম, আবূ যায়দ কে? তিনি বললেন: তিনি আমার চাচা/জ্ঞাতিদের মধ্যে একজন।
663 - عن أنس بن مالك قال:"مات النبيُّ صلى الله عليه وسلم ولم يجمع القرآن غير أربعة: أبو الدرداء، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد. قال: ونحن ورثناه".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5004) عن معلى بن أسد: حدّثنا عبد اللَّه بن المثنى، قال: حدّثني ثابت البنانيّ وثمامة، عن أنس بن مالك، فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যখন ওফাত হলো, তখন চারজন ব্যতীত কেউ সম্পূর্ণ কুরআন একত্রে (বুকস্থ বা লিখিতভাবে) জমা করেননি: আবুদ দারদা, মু'আয ইবনে জাবাল, যায়েদ ইবনে ছাবিত এবং আবূ যায়েদ। আবূ যায়েদ বললেন: আমরা তার (কুরআনের) উত্তরাধিকারী হয়েছি।
664 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قام أحدكم من اللّيل، فاستعجم القرآن على لسانه فلم يدر ما يقول فليضطجع".
صحيح: رواه مسلم في المسافرين (787) عن محمد بن رافع، حدّثنا عبد الرزاق، حدّثنا معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ রাতে (সালাতের জন্য) দাঁড়ায়, আর তার জিহ্বায় কুরআন পাঠ অস্পষ্ট হয়ে যায় এবং সে বুঝতে পারে না যে সে কী বলছে, তখন সে যেন শুয়ে পড়ে।"
665 - عن ابن عمر، قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يسافر بالقرآن إلى أرض العدو".
قال مالك: وإنّما ذلك مخافة أن يناله العدو.
متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (6) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في الجهاد والسير (2990)، ومسلم في الإمارة (1896) كلاهما من حديث مالك بإسناده، مثله.
وقول مالك:"وإنّما ذلك مخافة أن يناله العدو". هذا التعليل جعله أكثر الرّواة عن مالك عنه، ولم يرفعوه، وتفرّد ابن وهب برفعه كما قال الحافظ ابن حجر، وقد صحَّ رفعه من غير مالك.
رفعه اللّيث بن سعد، عن نافع، ولفظه:"كان النبيّ صلى الله عليه وسلم ينهى أن يسافر بالقرآن إلى أرض العدو مخافة أن يناله العدو". رواه مسلم عن قتيبة، حدّثنا اللّيث.
ورفعه أيوب عن نافع، ولفظه:"لا تسافروا بالقرآن، فإني لا آمن أن يناله العدو". رواه مسلم من طرق عن حماد، عن أيوب.
ولعلّ مالكًا شكّ في رفعه فجعله من نفسه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কুরআন নিয়ে শত্রুদের ভূমিতে সফর করতে নিষেধ করেছেন। ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এ নিষেধাজ্ঞা কেবল এই আশঙ্কায় যে, শত্রুরা তা হস্তগত করে ফেলতে পারে।
666 - عن * *
أصحاب بدر".
رواه تمّام في"فوائده" (1431) عن أبي الحسن خيثمة بن سليمان: نا أبو عبد اللَّه محمد بن عيسى بن حيان بالمدائن: نا محمد بن الفضل بن عطية، عن زيد العمّي، عن معاوية بن قرّة، عن أنس بن مالك، فذكره.
وفيه محمد بن الفضل بن عطية العبديّ مولاهم الكوفيّ، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، بل أكثر أهل العلم كذّبوه.
وشيخه زيد العمي هو: ابن الحواري البصريّ، اسم أبيه: مرّة، وهو ضعيف أيضًا.
ورُوي عنه أيضًا مرفوعًا:"بعث اللَّه ثمانية آلاف نبي: أربعة آلاف إلى بني إسرائيل، وأربعة آلاف إلى سائر النّاس".
رواه أبو يعلى (1377) عن أحمد بن إسحاق أبي عبد اللَّه الجوهريّ البصريّ، حدّثنا مكّي بن إبراهيم: حدّثنا موسى بن عبيدة الرّبذيّ، عن يزيد الرَّقاشيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.
ومن طريقه أورده الحافظ ابنُ كثير في"تفسيره" وقال:"وهذا أيضًا إسناد ضعيف، فيه الرّبذيّ ضعيف، وشيخه الرّقاشي أضعف منه أيضًا" انتهى.
والهيثمي أورده في"المجمع" (8/ 210) وأعلّه بموسى بن عبيدة الرّبذيّ فقط، وهو تقصير منه، فإنّ شيخه أضعف منه كما قال الحافظ ابن كثير.
وذكر عنه حديثًا آخر، وعزاه إلى الطبرانيّ في"الأوسط"، وفيه إبراهيم بن مهاجر بن مسمار وهو ضعيف.
ورُوي عنه أيضًا مرفوعًا:"كان فيمن خلا من إخواني من الأنبياء ثمانية آلاف نبي، ثم كان عيسى ابن مريم، ثم كنتُ أنا".
رواه أبو يعلى (1337) عن أبي الرّبيع الزّهرانيّ، حدّثنا محمد بن ثابت العبديّ، حدّثنا معبد بن خالد الأنصاريّ، عن يزيد الرّقاشيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (8/ 211) وأعلّه بمحمد بن ثابت العبديّ وقال:"وهو ضعيف".
وفيه معبد بن خالد الأنصاريّ مجهول، ويزيد الرّقاشي أضعف من الجميع.
وذكره الحافظ ابن كثير عنه من وجه آخر ولفظه:"بُعْثْتُ على إثر من ثمانية آلاف نبي من بني إسرائيل". وقال:"وهذا غريب من هذا الوجه، وإسناده لا بأس به، ورجاله كلّهم معروفون إلّا أحمد بن طارق هذا، فإني لا أعرفه بعدالة ولا جرح". انتهى.
وفي الباب أيضًا عن أبي ذرّ في حديث طويل، وفيه أنّه سأل النّبيّ صلى الله عليه وسلم عن أشياء منها قوله:"قلت: يا رسول اللَّه، كم الأنبياء؟ قال:"مائة ألف وعشرون ألفًا". قلت: يا رسول اللَّه: كم الرّسل من ذلك؟ قال:"ثلاثمائة وثلاثة عشر جمًّا غفيرًا".
وإليكم الحديث بطوله، ولبعض فِقْراته شواهد صحيحة.
عن أبي ذر، قال:"دخلتُ المسجدَ، فإذا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالس وحده. قال:"يا أبا ذرّ إنّ للمسجد تحيَّةً، وإنّ تحيتَه ركعتان فقُمْ فاركعْهُمَا". قال: فقُمتُ فركعتهما، ثم عُدْتُ فجلستُ إليه، فقلت: يا رسول اللَّه إنّك أمرتني بالصّلاة فما الصّلاة؟ قال:"خير موضوع، استَكْثِرْ أو اسْتَقِلَّ". قال: قلت: يا رسول اللَّه، أيُّ العمل أفضل؟ قال:"إيمان باللَّه، وجهاد في سبيل اللَّه". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ المؤمنين أكمل إيمانًا؟ قال:"أحسنهم خُلْقًا". فقلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ المؤمنين أَسْلم؟ قال:"مَنْ سَلِم النَّاسُ من لسانه ويده". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الصّلاة أفضل؟ قال:"طُول القنوت". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الهجرة أفضل؟ قال:"مَنْ هجر السِّيئات". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فما الصّيام؟ قال:"فَرْضٌ مُجْزِئٌ، وعند اللَّه أضعافٌ كثيرةٌ". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الجهاد أفضل؟ قال:"مَنْ عُقِرَ جَوادُه، وأُهْريقَ دَمُه". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الصدقة أفضل؟ قال:"جَهْدُ المُقِل يُسَرُّ إلى فَقِيرٍ". قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ ما أَنْزلَ اللَّهُ عليك أَعْظَمُ؟ قال:"آيةُ الكُرْسِي". ثم قال: يا أبا ذر، ما السّماواتُ السّبعُ مع الكرسي إلّا كَحَلْقَةِ مُلْقَاةٍ بأرض فَلاة، وفَضْلُ العرش على الكرسي كفضل الفَلاة على الحَلْقة". قال: قلت: يا رسول اللَّه، كم الأنبياء؟ قال:"مائةُ ألْفٍ وعشرون ألفًا". قلت: يا رسول اللَّه كم الرّسل من ذلك؟ قال:"ثلاثُمائة وثلاثةَ عَشَرَ جَمًّا غَفِيرًا". قال: قلت: يا رسول اللَّه، من كان أوّلُهم؟ قال:"آدم". قلت: يا رسول اللَّه، أَنَبيٌّ مُرسل؟ قال:"نعم، خلقه اللَّه بيده ونفخ فيه من روحه وكلَّمَه قِبَلًا". ثم قال: يا أبا ذر، أربعةٌ سُرْيانِيون: آدمُ، وشِيثُ، وأُخْنُوخُ -وهو إدريس، وهو أول من خط بالقلم- ونُوحٌ. وأربعةٌ من العرب: هودٌ، وشُعيبٌ، وصَالِحٌ، ونَبيُّك محمّد صلى الله عليه وسلم". قلت: يا رسول اللَّه كم كتابًا أنزله اللَّه؟ قال:"مائةُ كتابٍ وأربعةُ كُتُب، أُنزلَ على شِيث خمسون صَحيفةً، وأُنْزِلَ على أُخْنوخَ ثلاثون صَحيفةً، وأُنزلَ على إبراهيم عَشْرُ صَحائف، وأُنزل على موسى قَبْل التّوراة عَشْرُ صحائفَ، وأُنْزل التَّوراة والإنجيلُ، والزّبور، والقرآن". قال: قلت: يا رسول اللَّه، ما كانتْ صحيفةُ إبراهيم؟ قال:"كانت أمثالًا كلُّها: أَيُّها الملك المسَلَّطُ المبتلى المغرورُ، إنّي لم أَبْعَثْك لتجمع الدّنيا بعضها على بعض، ولكني بعَثْتُك لترد عنْي دعوةَ المظلوم، فإني لا أَرُدُّها ولو كانت من كافر، وعلى العَاقِل ما لم يكن مغلوبًا على عقله أن تكونَ له ساعاتٌ: ساعةٌ يناجي فيها ربَّه، وساعة يحاسب فيها نفسَه، وساعةٌ يَتَفَكَّرُ فيها في صُنع اللَّه، وساعةٌ يخلو فيها لحاجته من المطعم والمشرب. وعلى العاقل أن لا يكونَ ظَاعِنًا إلّا لثلاثٍ: تَزَوُّد لِمَعَادٍ، أو مَرَمَّةٍ لِمَعاش، أو لَذَّةٍ في غير مُحَرَّم. وعلى العاقل أن يكون بصيرًا بزمانه، مُقبلًا على شَأنِه، حافظا للسانه، ومَنْ حَسَبَ كَلامَهُ مِنْ عَمَلِه قَلَّ كَلامُه إلَّا فيما يَعْنِيه".
قلتُ: يا رسول اللَّه، فما كانت صُحُف موسى؟ قال:"كانتْ عِبَرًا كُلُّها: عَجِبْتُ لمن أيقن بالموت ثم هو يفرح، وعجبت لمن أيقن بالنار ثم هو يضحك، وعجبت لمن أيقن بالقدر ثم هو
يَنْصِبُ، عجبت لمن رأى الدّنيا وتقلبها بأهلها ثم اطمأن إليها، وعجبت لمن أيقن بالحساب غدًا ثم لا يعمل". قلت: يا رسول اللَّه، أَوْصِني. قال:"أوصيك بتقوى اللَّه؛ فإنّه رأس الأمر كلِّه". قلت: يا رسول اللَّه، زِدْني. قال:"عليك بتلاوة القرآن، وذكر اللَّه فإنّه نُورٌ لك في الأرض، وذُخْرٌ لك في السّماء". قلت: يا رسول اللَّه، زِدْني. قال:"إيَّاك وكثرَة الضَّحِك، فإنه يُميتُ القلب، ويَذْهبُ بنور الوجه". قلت: يا رسول اللَّه زِدْني. قال:"عليك بالصَّمت إلّا من خير؛ فإنّه مطردةٌ للشّيطان عنك، وعونٌ لك على أمر دينك". قلت: يا رسول اللَّه زدْني. قال:"عليك بالجهاد فإنّه رَهْبانيةُ أُمَّتِي". قلت: يا رسول اللَّه، زدني. قال:"أَحِبَّ المساكين وجَالِسْهم". قلت: يا رسول اللَّه زدني. قال:"انظر إلى من تحتك ولا تنظر إلى من فوقك؛ فإنّه أجدر أن لا تُزْدَرَى نِعْمهُ اللَّه عندك". قلت: يا رسول اللَّه، زِدْني. قال:"قلِ الحقَّ وإِنْ كان مُرًّا". قلت: يا رسول اللَّه، زدني. قال:"لِيرُدَّكَ عن النّاس ما تَعرفُ مِنْ نفسك، ولا تجد عليهم فيما تأتي، وكفى بك عَيْبًا أن تعرف من الناس ما تجهل من نفسك، أو تجدَ عليهم فيما تأتي". ثم ضرب بيده على صدري فقال:"يا أبا ذر، لا عَقْل كالتَّدْبِير، وَلا وَرَعَ كالكَفِّ، ولا حَبَبَ كحُسْن الخُلُقِ".
إسناده ضعيف جدًّا. رواه ابن حبان في"صحيحه" (361)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 166)، والطبراني في الكبير (2/ 167)، والآجري -كما ذكره ابن كثير في تفسيره (2/ 472) - كلّهم من طرق عن إبراهيم بن هشام بن يحيى بن يحيى الغسّانيّ، قال: حدّثني أبي، عن جدّي، عن أبي إدريس الخولانيّ، عن أبي ذرّ، فذكر الحديث بطوله، واللّفظ لابن حبان.
ذكره ابن كثير في"تفسيره" في سورة النساء (آية: 164) عن ابن مردويه بهذا الإسناد أيضًا وزاد فيه بعد قوله:"ونبيك محمد صلى الله عليه وسلم"."وأوّل نبي من أنبياء بني إسرائيل: موسى، وآخرهم عيسى. وأوَل النّبيين آدم، وآخرهم نبيّك".
وقال:"روى هذا الحديث بطوله أبو حاتم بن حبان البُستيّ في كتابه، وقد وَسَمه بالصِّحة، وخالفه أبو الفرج بن الجوزيّ، فذكر هذا الحديث في كتابه"الموضوعات"، واتّهم به إبراهيم بن هشام، ولا شك أنه قد تَكلّم فيه غير واحد من أئمة الجرح والتعديل من أجل هذا الحديث". انتهى
وإبراهيم بن هشام بن يحيى بن يحيى الغسّانيّ، قال فيه أبو حاتم:"قلت لأبي زرعة: لا تحدّث عن إبراهيم بن هشام بن يحيى، فإنّي ذهبتُ إلى قريته فذكر حكاية وقال: وأظنّه لم يطلب العلم وهو كذّاب.
قال عبد الرحمن بن أبي حاتم: ذكرتُ لعلي بن الحسين بن الجنيد بعض هذا الكلام عن أبي، فقال: صدق أبو حاتم، ينبغي أن لا يُحَّدث عنه". انتهى"الجرح والتعديل" (2/ 143).
قال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 216):"فيه إبراهيم بن هشام بن يحيى الغسّانيّ، وثّقه ابنُ حبان، وضعّفه أبو حاتم وأبو زرعة".
وقال الذّهبي في"الميزان" (1/ 72 - 73):"هو صاحب حديث أبي ذرّ الطّويل، انفرد به عن
أبيه، عن جدّه".
ونقل قول أبي حاتم بأنّه كذّاب، كما نقل أيضًا عن ابن الجوزيّ أنه قال: قال أبو زرعة: كذّاب.
كما نقل عن الطبرانيّ قوله:"لم يرو هذا عن يحيى إلّا ولده وهم ثقات". وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 79)، وأخرج حديثه في الأنواع.
وقال في موضع آخر من"الميزان" (4/ 378):"إبراهيم بن هشام أحد المتروكين الذين مشّاهم ابنُ حبان فلم يُصبْ".
قلت: وفي قوله هذا دليلٌ واضح على تساهل ابن حبان، وإدخاله الضعفاء والمجاهيل في كتابه"الثقات" وإخراج أحاديثهم في"صحيحه" فتنبّه إلى ذلك! .
والحافظ ابن حجر هو الآخر أيضًا من تساهل، فنقل تصحيح ابن حبان ولم يتعقبه عليه، بل عضّده بقول مجاهد، أخرجه سعيد بن منصور في"تفسيره" بسند صحيح عنه. انظر:"الفتح" (13/ 411).
ورواه الإمام أحمد (21546) عن وكيع، حدّثنا المسعوديّ، أنبأني أبو عمر الدّمشقيّ، عن عبيد بن الخشخاش، عن أبي ذرّ، قال (فذكر قطعًا من الحديث).
والمسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد اللَّه. ومن طريقه أخرجه النسائيّ (8/ 275) ما يتعلّق بتعوّذ من شرّ شياطين الجنّ والإنس فقط.
وإسناده ضعيف أيضًا، عبيد بن الخشخاش قال فيه البخاريّ:"لم يذكر سماعًا من أبي ذرّ". وضعّفه الدّارقطني، وفي التقريب:"ليّن".
وأبو عمر، ويقال: أبو عمرو الدّمشقيّ، قال الدّارقطنيّ:"متروك". كما في"اللّسان" (7/ 87).
والمسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن عتبة وهو إن كان صدوقًا إلّا أنه اختلط قبل موته.
وكذلك لا يصح ما رواه الحاكم (2/ 597) من طريق يحيى بن سعيد السّعديّ البصريّ، ثنا عبد الملك بن جريج، عن عطاء، عن عبيد بن عمير اللّيثيّ، عن أبي ذرّ، فذكر فيه بعض الجمل من الحديث. ومن طريقه رواه البيهقيّ في"السنن" (9/ 4) وقال:"تفرّد به يحيى بن سعيد السّعديّ".
وقال الذهبيّ في"تلخيص المستدرك":"السّعديّ ليس بثقة".
وللحديث أسانيد أخرى ولم يسلم منها شيء.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي أمامة قال:"كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في المسجد جالسًا وكانوا يظنون أنّه ينزل عليه فانصروا عنه، حتى جاء أبو ذرّ فاقتحم فأتى فجلس إليه فأقبل عليه النّبيُّ صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أبا ذر، هلْ صليتَ اليوم؟". قال: لا قال:"قُمْ فَصلُ". فلمّا صلّى أربع ركعات الضُّحى أقبل عليه، فقال:"يا أبا ذر، تعوَّذْ منْ شَرِّ شياطين الجنّ والأنس". قال: يا نبي اللَّه، وهل للإنس شياطين؟ قال:"نعم شياطين الإنس والجن يوحي بعضُهم إلى بعض زخرف القول غرورًا". ثم
قال:"يا أبا ذر، ألا أُعلّمُكَ كلمة من كنز الجنّة؟". قال: بلى جعلني اللَّه فداءك. قال:"قُلْ لا حول ولا قوَّة إلّا باللَّه". قال: فقلت: لا حول ولا قوّة إلا باللَّه. قال: ثم سكت عنّى فاستبطأتُ كلامَه، قال: قلتُ: يا نبي اللَّه، إنّا كنّا أهل جاهليّة وعبادة أوثان فبعثك اللَّه رحمة للعالمين، أرأيت الصلاة ماذا هي؟ قال:"خيرٌ موضوعٌ من شاء استقَلَّ ومن شاء اسْتَكْثَر". قال: قلت: يا نبي اللَّه، أرأيتَ الصِّيام ماذا هو؟ قال:"فَرْضٌ مُجْزئٌ". قال: قلت: يا نبي اللَّه، أرأيتَ الصَّدقة ماذا؟ قال:"أضعاف مضاعفة، وعند اللَّه المزيد". قال: قلت: يا نبي اللَّه، فأيُّ الصّدقة أفضل؟ قال:"سِرٌّ إلى فقير، وجُهْدٌ مِنْ مُقِلٍّ"، قال: قلت: يا نبي اللَّه، أيُّما أُنزل عليك أعظم؟ قال: [آية الكرسي]. قال: قلتُ: يا نبي اللَّه أيُّ الشهداء أفضل؟ قال: من سُفك دَمُه وعُقِر جَوادُه. قال: قلت: يا نبي اللَّه، فأيُّ الرِّقاب أفضل؟ قال:"أغلاها ثمنًا، وأنفسها عند أهلها". قال: قلت: يا نبي اللَّه، فأيُّ الأنبياء كان أَولَّ؟ قال:"آدم عليه السلام". قال: قلتُ: يا نبي اللَّه أو نبيٌّ كان آدم؟ قال:"نعم نبيٌّ مُكلَّم، خلقه اللَّه بيده، ثم نفخ فيه رُوحَه، ثم قال له: يا آدمُ، -قُبلًا-". قال: قلتُ: يا رسول اللَّه كم وَفَي عِدَّةُ الأنبياء؟ قال:"مائةُ ألف وأربعةٌ وعشرون ألفًا، الرّسلُ من ذلك ثلاثُمائة وخمسةَ عَشَر جمًّا غفيرًا".
رواه الإمام أحمد (22288)، والطّبراني في الكبير (7871) كلاهما من حديث أبي المغيرة، حدّثنا مُعان بن رفاعة، حدّثني علي بن يزيد، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة، مثله.
وفيه سلسلة من الضّعفاء: فمعان بن رفاعة السلاميّ وشيخه: علي بن يزيد -وهو ابن أبي زياد الألهاني- وشيخه القاسم أبو عبد الرحمن كلّهم متكلّم فيهم، ويهم أعلّه الحافظ ابن كثير في تفسيره في سورة النساء (آية: 164).
وأمّا الهيثميّ فأورده في"المجمع" (1/ 159) وأعلَّه بعلي بن يزيد وحده فقال:"مداره عليه" وهو تقصير منه.
والقاسم هو: ابن عبد الرحمن الدّمشقيّ أبو عبد الرحمن صاحب أبي أمامة.
قال ابن حبان:"يروي عن الصّحابة المعضلات، ولكن وثّقه ابن معين، والعجليّ، وقال أبو حاتم: حديث الثقات عنه مستقيم لا بأس به".
قلت: هنا يروي عنه علي بن زيد وهو مالك، وقد سبق أنّ أبا ذرّ، روى هذا الحديث، أو بعضه بنفسه.
وفي الباب أيضًا عن أبي الودّاك قال: قال لي أبو سعيد:"هل يُقِرُّ الخوارج بالدّجّال؟ فقلتُ: لا، فقال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّي خاتمُ ألْف نبيٍّ أو أكْثر، ما بُعث نبيٌّ يتبع إلا قد حذَّر أمَّته الدّجال، وإنّي قد بيَّن لي من أمره ما لم يُبيّن لأحد، وإنّه أعور، وإنّ ربَّكم ليس بأعور، وعينُه اليُمنى عوراءُ جاحظةٌ ولا تخفى، كأنّها نُخامةٌ في حائط فجُصّص، وعينُه اليُسرى كأنّها نُخامة في
حائطٍ فجصَّص، وعينُه البشرى كأنّها كوكب دُرّي معه من كلّ لسانٍ، ومعه صورةُ الجنّة خضراءُ، يجري فيها الماء، وصور النار سوداءُ تدخنُ".
رواه عبد اللَّه بن الإمام أحمد في مسند أبيه (11752) قال:"وحدث هذا الحديث في كتاب أبي بخط يده: حدثنا عبد المتعال بن عبد الوهّاب، حدثنا يحيى بن سعيد الأمويّ، حدثنا مجالد، عن أبي الوداك". فذكر مثله.
وأخرجه الحاكم (2/ 597) من طريق مجالد، وسكت عليه.
ولكن قال الذّهبيّ: مجالد ضعيف.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 347) وقال:"رواه أحمد وفيه مجالد بن سعيد وثّقه النسائيّ في رواية، وقال في أخرى ليس بالقوي، وضعّفه جماعة".
قلت: مجالد هو ابن سعيد بن عمر الهمْداني ضعّفه أكثر أهل العلم، وقال فيه البخاريّ: صدوق.
وقد رُوي من حديث جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّي لخاتم ألف نبيّ أو أكثر، وإنّه ليس منهم نبيٌّ إِلَّا وقد أنذر قومه الدَّجال، وإنّه قد تبيّن لي ما لم يتبيّن لأحد منهم، وإنه أعور، وإنّ ربَّكم ليس بأعور".
رواه البزّار -كشف الأستار (3380) - عن عمرو بن علي، ثنا يحيى بن سعيد، ثنا مجالد، عن الشّعبيّ، عن جابر، فذكر مثله.
قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 347):"رواه البزّار، وفيه مجالد بن سعيد، وقد ضعّفه الجمهور، وفيه توثيق".
قلت: مجالد هذا تغيّر في آخر عمره، ولعلّه لم يضبط اسم الصّحابيّ فمرّة رواه عن أبي سعيد، وأخرى عن جابر بن عبد اللَّه مع ضعف فيه.
والخلاصة: ليس في عدد الأنبياء والرّسل حديث صحيح، فال سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله بعد أن ذكر عدة أحاديث منها: حديث أبي ذر وغيره:"والمقصود أنه ليس في عدد الأنبياء والرسل خبر يُعتمد عليه".
انظر: مجموع فتاواه
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। দেখলাম রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একা বসে আছেন। তিনি বললেন: "হে আবু যর, মসজিদের একটি তাহিয়্যা (অভিবাদন) আছে, আর এর তাহিয়্যা হলো দু'রাকাত সালাত, সুতরাং ওঠো এবং তা আদায় করো।" তিনি (আবু যর) বলেন: আমি দাঁড়ালাম এবং দু'রাকাত সালাত আদায় করলাম। এরপর আমি ফিরে এসে তাঁর কাছে বসলাম।
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনি আমাকে সালাত আদায় করার নির্দেশ দিলেন, সালাত কী? তিনি বললেন: "এটি সর্বোত্তম কাজ, তুমি চাইলে অল্প করো অথবা বেশি করো।"
তিনি (আবু যর) বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন আমল সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "আল্লাহর প্রতি ঈমান এবং আল্লাহর পথে জিহাদ।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, মুমিনদের মধ্যে কার ঈমান সবচেয়ে পরিপূর্ণ? তিনি বললেন: "যার চরিত্র সবচেয়ে উত্তম।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, মুমিনদের মধ্যে কে সবচেয়ে নিরাপদ? তিনি বললেন: "যার মুখ ও হাত থেকে মানুষ নিরাপদ থাকে।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন সালাত সবচেয়ে উত্তম? তিনি বললেন: "দীর্ঘ কুনুত (দাঁড়িয়ে থাকা)।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন হিজরত সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "যে মন্দ কাজ ত্যাগ করে।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, সিয়াম কী? তিনি বললেন: "একটি সন্তোষজনক ফরয এবং আল্লাহর কাছে রয়েছে বহু গুণ বেশি প্রতিদান।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন জিহাদ সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "যার ঘোড়া ক্ষতবিক্ষত হয়েছে এবং যার রক্ত ঝরেছে।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন সদকা সবচেয়ে উত্তম? তিনি বললেন: "অভাবীর পক্ষ থেকে দেওয়া সেই কষ্টসাধ্য বস্তু, যা কোনো দরিদ্রের নিকট আনন্দের সাথে পৌঁছানো হয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনার প্রতি যা নাযিল করা হয়েছে তার মধ্যে সবচেয়ে মহান কোনটি? তিনি বললেন: "আয়াতুল কুরসি।"
অতঃপর তিনি বললেন: হে আবু যর, সাত আসমান কুরসির তুলনায় এমন, যেমন কোনো বিস্তীর্ণ প্রান্তরে ফেলে রাখা একটি আংটি। আর আরশের শ্রেষ্ঠত্ব কুরসির উপর এমন, যেমন সেই প্রান্তরের শ্রেষ্ঠত্ব ওই আংটির উপর।
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, নবীদের সংখ্যা কত? তিনি বললেন: "এক লক্ষ চব্বিশ হাজার।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, তাদের মধ্যে রাসূলের সংখ্যা কত? তিনি বললেন: "তিনশো তের জন, যা এক বিশাল দল।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, তাদের মধ্যে প্রথম কে ছিলেন? তিনি বললেন: "আদম।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, তিনি কি প্রেরিত নবী (রাসূল) ছিলেন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, আল্লাহ তাঁকে নিজ হাতে সৃষ্টি করেছেন, তাতে তাঁর রূহ ফুঁকে দিয়েছেন এবং সামনাসামনি তাঁর সাথে কথা বলেছেন।"
অতঃপর তিনি বললেন: হে আবু যর, চারজন নবী সিরিয়ানী: আদম, শীস, উখনুখ—যিনি ইদরীস এবং তিনিই প্রথম ব্যক্তি যিনি কলম দ্বারা লিখেছিলেন—ও নূহ। আর চারজন নবী আরবী: হুদ, শুআইব, সালিহ এবং আপনার নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আল্লাহ কতটি কিতাব নাযিল করেছেন? তিনি বললেন: "একশো চারটি কিতাব। শীসের উপর পঞ্চাশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল, উখনুখের উপর ত্রিশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল, ইব্রাহীমের উপর দশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল এবং তাওরাত নাযিলের পূর্বে মূসার উপর দশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল। আর নাযিল হয়েছিল তাওরাত, ইনজীল, যাবূর এবং কুরআন।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, ইব্রাহীমের সহীফাসমূহে কী ছিল? তিনি বললেন: "তা পুরোটাই ছিল দৃষ্টান্তমূলক উপদেশ: 'হে ক্ষমতাবান, পরীক্ষিত, প্রবঞ্চিত রাজা! আমি তোমাকে দুনিয়ার কিছু অংশ একত্রিত করার জন্য প্রেরণ করিনি। বরং আমি তোমাকে প্রেরণ করেছি যেন তুমি আমার নিকট থেকে মজলুমের ফরিয়াদ ফিরিয়ে দাও। কেননা, আমি তা ফিরিয়ে দেই না, যদিও তা কাফেরের পক্ষ থেকে হয়। বুদ্ধিমান ব্যক্তির জন্য উচিত, যতক্ষণ না সে তার বুদ্ধি হারানোর মতো পরিস্থিতিতে পড়ে, ততক্ষণ তার কিছু সময় যেন থাকে: একটি সময় তার রবের সাথে নিভৃতে কথা বলার জন্য, একটি সময় তার নিজের হিসাব নেওয়ার জন্য, একটি সময় আল্লাহর সৃষ্টি নিয়ে চিন্তা করার জন্য এবং একটি সময় পানাহার জনিত নিজের প্রয়োজন পূরণের জন্য। আর বুদ্ধিমান ব্যক্তির উচিত নয় যে, সে তিনটি উদ্দেশ্য ছাড়া ভ্রমণ করবে: আখেরাতের জন্য পাথেয় সংগ্রহ, জীবনধারণের জন্য ব্যবস্থা করা, অথবা হারামমুক্ত আনন্দ উপভোগ করা। আর বুদ্ধিমান ব্যক্তির উচিত হলো সে যেন তার সময় সম্পর্কে সজাগ থাকে, নিজের বিষয়ে মনোযোগী হয়, তার জিহবাকে নিয়ন্ত্রণ করে। যে তার কথাকে আমলের অংশ হিসেবে গণ্য করে, তার কথাবার্তা অপ্রয়োজনীয় বিষয় ছাড়া কমে যায়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, মূসার সহীফাসমূহে কী ছিল? তিনি বললেন: "তা পুরোটাই ছিল উপদেশমূলক: আমি অবাক হই তার জন্য, যে মৃত্যুকে নিশ্চিত জেনেও আনন্দ করে! আমি অবাক হই তার জন্য, যে জাহান্নামকে নিশ্চিত জেনেও হাসে! আমি অবাক হই তার জন্য, যে ভাগ্যকে নিশ্চিত জেনেও কষ্ট করে (অতিরিক্ত)। আমি অবাক হই তার জন্য, যে দুনিয়া এবং এর অধিবাসীদের পরিবর্তন দেখেও এর প্রতি নিশ্চিন্ত হয়! এবং আমি অবাক হই তার জন্য, যে আগামীকাল হিসাব-নিকাশ হবে জেনেও কাজ করে না!"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আমাকে উপদেশ দিন। তিনি বললেন: "আমি তোমাকে আল্লাহর তাকওয়া অবলম্বন করার উপদেশ দিচ্ছি, কারণ এটি সবকিছুর মূল।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তোমার উপর কুরআন তিলাওয়াত করা ও আল্লাহকে স্মরণ করা অপরিহার্য; কারণ এটি তোমার জন্য পৃথিবীতে নূর এবং আসমানে সঞ্চিত সম্পদ।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তুমি অতিরিক্ত হাসি থেকে দূরে থেকো, কারণ তা অন্তরকে মেরে ফেলে এবং চেহারার নূর দূর করে দেয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "নেক কথা ছাড়া তুমি নীরবতা অবলম্বন করো; কারণ তা তোমার থেকে শয়তানকে তাড়িয়ে দেয় এবং তোমার দ্বীনের বিষয়ে তোমাকে সাহায্য করে।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তোমার উপর জিহাদ অপরিহার্য, কারণ এটি আমার উম্মতের বৈরাগ্য।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "দরিদ্রদের ভালোবাসো এবং তাদের সাথে বসো।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তোমার নিচের লোকের দিকে তাকাও, তোমার উপরের লোকের দিকে তাকিয়ো না; কারণ এটিই বেশি উপযোগী যে, আল্লাহ তোমাকে যে নেয়ামত দিয়েছেন, তা যেন তোমার কাছে তুচ্ছ না মনে হয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "সত্য বলো, যদিও তা তেতো হয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "মানুষের কাছ থেকে তোমাকে যেন বিরত রাখে সেই বিষয় যা তুমি নিজের সম্পর্কে জানো, আর যে কাজ তুমি করো তার জন্য তাদের প্রতি যেন দোষারোপ না করো। তোমার জন্য এতটুকুই ত্রুটি হিসেবে যথেষ্ট যে, তুমি মানুষের মধ্যে এমন কিছু দেখ যা তুমি নিজের মধ্যে জানো না, অথবা যে কাজ তুমি করো তার জন্য তাদের প্রতি অভিযোগ করো।"
এরপর তিনি তাঁর হাত আমার বুকে মারলেন এবং বললেন: "হে আবু যর, সুচিন্তিত পরিকল্পনার (তাদবীর) চেয়ে উত্তম কোনো বুদ্ধি নেই, পাপ থেকে বিরত থাকার (কাফ্ফ) চেয়ে উত্তম কোনো পরহেযগারী নেই, আর উত্তম চরিত্রের চেয়ে শ্রেষ্ঠ কোনো ভালোবাসা নেই।"
667 - عن أبي هريرة، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ما من الأنبياء نبيٌّ إِلَّا أعطي ما مثلُه آمن عليه البشر، وإنَّما الذي أوتيت وحْيًا، أوحاه اللَّه إليَّ، فأرجو أن أكون أكثرهم تابعًا يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4981)، ومسلم في الإيمان (152) كلاهما من
حديث اللّيث، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره. واللّفظ للبخاريّ.
وفي لفظ مسلم:"ما من الأنبياء من نبي إِلَّا قد أُعطي من الآيات ما مثله آمن عليه البشر". ثم ذكر مثله.
أي كلّ نبي أُعطي من المعجزات ما كان مثله لمن كان قبله من الأنبياء، فآمن به البشر، وأمّا معجزني العظيمة الظّاهرة فهي القرآن الذي لم يُعط أحد قبله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীগণের মধ্যে এমন কোনো নবী নেই, যাঁকে এমন কিছু দেওয়া হয়নি যার অনুরূপ বিষয় দেখে মানুষ ঈমান এনেছে। আর আমাকে যা দেওয়া হয়েছে, তা হলো ওহী (প্রত্যাদেশ), যা আল্লাহ তাআলা আমার কাছে অবতীর্ণ করেছেন। তাই আমি আশা করি যে, কিয়ামতের দিন তাঁদের (নবীগণের) মধ্যে আমারই অনুসারী সবচেয়ে বেশি হবে।"
