আল-জামি` আল-কামিল
6308 - عن جابر بن عبد الله وسلمة بن الأكوع قالا: كنا في جيش، فأتانا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنه قد أذن لكم أن تستمتعوا فاستمتعوا". زاد مسلم:"يعني متعة النساء".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5117: 5118) من طريق سفيان، ومسلم في النكاح (13: 1405) من طريق شعبة - كلاهما عن عمرو بن دينار، قال: سمعت الحسن بن محمد يحدّث عن جابر بن عبد الله وسلمة بن الأكوع. فذكراه، واللفظ للبخاري.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ ও সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: আমরা একটি সেনাদলে ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের কাছে আসলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদেরকে ইস্তিমতা’ (উপভোগ) করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে। অতএব তোমরা তা উপভোগ করো।" মুসলিম-এর বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে: "অর্থাৎ মহিলাদের সাথে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ)।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
6309 - عن سلمة بن الأكوع قال: رخص رسول الله صلى الله عليه وسلم عام أوْطاس في المتعة ثلاثا، ثم نهى عنها.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (18: 1405) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا يونس بن محمد، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا أبو عُميس، عن إياس بن سلمة، عن أبيه، قال: فذكره.
وعام أوطاس وعام الفتح واحد، فإن أوطاسا هي غزوة حنين التي كانت بعد الفتح بيسير، وهي تسمى أيضا غزوة هوازن لأنهم أتوا لقتال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فالتحليل والتحريم ينسب إليهما جميعا فقول من قال: استمتعنا في أوطاس يقصد به الفتح.
সালামা ইবনুল আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আওতাসের যুদ্ধের বছর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন [দিনের জন্য] মুত’আ (সাময়িক বিবাহ)-এর অনুমতি দিয়েছিলেন, অতঃপর তিনি তা নিষেধ করে দেন।
6310 - عن سلمة بن الأكوع، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أيما رجل وامرأة أيم تراضيا بعشرتهما ثلاث ليال، فإن أرادا أن يتزايدا تزايدا، وإن أرادا أن يتشاركا شاركا".
صحيح: رواه الطبراني في"المعجم الكبير" (7/ 27) من طريق محمد بن عباد المكي، ثنا حاتم
ابن إسماعيل، عن ابن أبي ذئب، عن إياس بن سلمة بن الأكوع، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح.
والحديث علقه البخاري في النكاح (5119) فقال:"وقال ابن أبي ذئب حدثني إياس بن سلمة بن الأكوع، به، ولفظه: أيما رجل وامرأة توافقا فيشرة ما بينهما ثلاث ليال، فإن أحبا أن يتزايدا أو يتشاركا تشاركا" فما أدري أَشيءٌ كان لنا خاصة، أم للناس عامة.
قال البخاري عقبه: وقد بيّنه علي عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه منسوخ.
قال الحافظ في الفتح (9/ 173):"وصله الطبراني، والإسماعيلي، وأبو نعيم من طرق عن ابن أبي ذئب".
সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে কোনো পুরুষ ও কোনো আইম (বিধবা, তালাকপ্রাপ্তা বা অবিবাহিতা) নারী যদি তিন রাতের জন্য তাদের সহাবস্থান নিয়ে সন্তুষ্ট হয়, তবে যদি তারা (সময়) বাড়াতে চায়, তারা বাড়াতে পারে, আর যদি তারা অংশীদারিত্ব করতে চায়, তবে তারা অংশীদারিত্ব করতে পারে।”
6311 - عن سبرة الجهني أنه أذن لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمتعة، فانطلقت أنا ورجل إلى امرأة من بني عامر، كأنها بكْرة عيْطاء، فعرضنا عليها أنفسنا. فقالت: ما تُعطي؟ فقلت: ردائي. وقال صاحبي: ردائي، وكان رداء صاحبي أجود من ردائي. وكنت أشبّ منه، فإذا نظرت إلى رداء صاحبي أعجبها، وإذا نظرت إلي أعجبتُها. ثم قالت: أنت ورداؤك يكفيني، فمكثت معها ثلاثًا. ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من كان عنده شيء من هذه النساء التي يتمتع، فليخلّ سبيلها".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (19: 1406) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث، عن الربيع بن سبرة الجهني، عن أبيه سبرة، فذكره.
قوله:"كأنها بكرة عطاء" البكرة: الشابة القوية.
والعيطاء: هي الطويلة العنق في اعتدال وحسن قوام.
সিবরা আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) করার অনুমতি দিয়েছিলেন। তখন আমি ও অন্য একজন লোক বনু 'আমির গোত্রের এক মহিলার নিকট গেলাম। সে ছিল যেন একটি শক্ত-সামর্থ্য, দীর্ঘ গ্রীবার উটনীর মতো। আমরা তার কাছে নিজেদেরকে পেশ করলাম। সে বললো: তোমরা কী দেবে? আমি বললাম: আমার চাদর। আমার সঙ্গী বললো: আমার চাদর। আমার সঙ্গীর চাদর আমার চাদরের চেয়ে উন্নত মানের ছিল। আর আমি তার চেয়ে তরুণ ছিলাম। যখন সে আমার সঙ্গীর চাদরের দিকে তাকাতো, তা তার পছন্দ হতো; আর যখন সে আমার দিকে তাকাতো, আমাকে তার পছন্দ হতো। অতঃপর সে বললো: তুমি এবং তোমার চাদরই আমার জন্য যথেষ্ট। এরপর আমি তিন দিন তার সাথে থাকলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি এই মহিলাদের কাউকে মুত'আ হিসেবে গ্রহণ করেছে, সে যেন তার পথ মুক্ত করে দেয়।"
6312 - عن الربيع بن سبرة، أن أباه غزا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فتح مكة. قال: فأقمنا بها خمس عشرة. (ثلاثين بين ليلة ويوم) فأذن لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في متعة النساء. فخرجت أنا ورجل من قومي، ولي عليه فضل في الجمال. وهو قريب من الدمامة. مع كل واحد منا بُرد. فبردي خَلَقٌ. وأما برد ابن عمي فبرد جديد. غضٌّ. حتى إذا كنا بأسفل مكة، أو بأعلاها فتلقتنا فتاة مثل البَكرة العَنَطْنطة. فقلنا: هل لك أن يستمتع منك أحدنا؟ قالت: وماذا تبذلان؟ فنشر كل واحد منا برده. فجعلت تنظر إلى الرجلين. ويراها صاحبي ينظر إلى عِطْفها. فقال: إن بُرد هذا خلَقٌ وبُردي جديدٌ غضٌّ. فتقول: برد هذا لا بأس به. ثلاث مرار أو مرتين. ثم استمتعت منها. فلم أخرج حتى حرمها رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (20: 1406) عن أبي كامل فضيل بن حُسين الجحدري، حدثنا بشر (يعني ابن مفضل) حدثنا عمارة بن غزية، عن الربيع بن سبرة فذكره.
وقوله:"الدمامة" - أي قبيح الصورة.
و"خلق" - أي قريب من البالي، وهو قديم.
و"العنطنطة" - طويلة القامة.
সাবরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মক্কা বিজয়ে অংশ নিয়েছিলেন। তিনি বলেন: আমরা সেখানে পনেরো দিন (রাত ও দিন মিলিয়ে ত্রিশটি) অবস্থান করেছিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের নারীদের সাথে মুত'আ (অস্থায়ী বিবাহ)-এর অনুমতি দিলেন। তখন আমি এবং আমার গোত্রের একজন লোক বেরিয়ে পড়লাম। সৌন্দর্যের দিক থেকে আমি তার চেয়ে উত্তম ছিলাম এবং সে কিছুটা কদাকার ছিল। আমাদের প্রত্যেকের কাছে একটি করে চাদর ছিল। আমার চাদরটি ছিল পুরাতন (জীর্ণ), আর আমার গোত্রীয় লোকটির চাদর ছিল নতুন ও উজ্জ্বল। আমরা মক্কার নিম্নভাগে অথবা উচ্চভাগে পৌঁছালে এক দীর্ঘাঙ্গী, টাটকা যুবতী নারীর সাথে আমাদের সাক্ষাৎ হলো। আমরা বললাম: তুমি কি আমাদের কারো সাথে মুত'আ করতে প্রস্তুত আছো? সে বলল: তোমরা কী দিতে পারো? তখন আমাদের প্রত্যেকে তার চাদরটি বিছিয়ে ধরল। সে তখন দু'জনের দিকে তাকাতে লাগল। আমার সঙ্গী দেখল যে সে তার (নিজস্ব) পছন্দের দিকে ঝুঁকছে। তখন আমার সঙ্গী বলল: এর চাদরটি পুরাতন আর আমার চাদরটি নতুন ও উজ্জ্বল। তখন সে (নারীটি) বলল: এর চাদরটি (অর্থাৎ, বর্ণনাকারীর চাদরটি) মন্দ নয়। সে এই কথা তিনবার অথবা দুইবার বলল। অতঃপর আমি তার সাথে মুত'আ করলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুত'আ হারাম ঘোষণা করার আগ পর্যন্ত আমি মক্কা ত্যাগ করিনি।
6313 - عن عبد الملك بن الربيع بن سبرة الجهني، عن أبيه، عن جده قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمتعة عام الفتح، حين دخلنا مكة، ثم لم نخرج منها حتى نهانا عنها.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (22: 1406) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا يحيى بن آدم، حدثنا إبراهيم بن سعيد، عن عبد الملك بن الربيع بن سبرة الجهني بإسناده فذكره.
সাবরাহ আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদেরকে মক্কা বিজয়ের বছর মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) করার আদেশ দিয়েছিলেন, যখন আমরা মক্কায় প্রবেশ করি, এরপর আমরা সেখান থেকে বের হইনি যতক্ষণ না তিনি আমাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন।
6314 - عن سيرة الجهني أنه كان مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أيها الناس، إني قد كنت أذنت لكم في الاستمتاع من النساء. وإن الله قد حرم ذلك إلى يوم القيامة، فمن كان عنده منهن شيء فليخلّ سبيله، ولا تأخذوا مما آتيتموهن شيئا".
وفي لفظ: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قائما بين الركن والباب، وهو يقول: فذكره.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (21: 1406) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا أبي، حدثنا عبد العزيز بن عمر، حدثني الربيع بن سبرة الجهني أن أباه حدثه، فذكره.
ولحديث سبرة الجهني أسانيد أخرى عند مسلم وغيره وخلاصته أن المتعة رُخّصت عام الفتح لأيام، ثم جاء التحريم إلى الأبد. هذا الذي يرويه جماعة من أصحاب الربيع بن سبرة الجهني.
وخالفهم عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز فجعل في حجة الوداع كما رواه ابن ماجه (1962) وأحمد (15345) وابن حبان (4147) والبيهقي (7/ 203).
وجعل البيهقي أن الوهم من عبد العزيز بن عمر لمخالفته رواية الجمهور عن الربيع بن سيرة بأن ذلك كان زمن الفتح.
قلت: وهو كما قال، فإن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز الأموي وُصف بأنه كان يخطئ، وهذا من خطئه، وتنبه إليه مسلم، فساق الحديث من طريقه (21: 1406) ولم يذكر لفظه كاملًا، كما لم يذكر الزمن الذي ورد فيه هذا الحديث، وقد ذكر قبله وبعده أنه زمن الفتح.
সাবরাহ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে লোক সকল! আমি তোমাদেরকে নারীদের সাথে মুতা'আ (সাময়িক বিবাহ) করার অনুমতি দিয়েছিলাম। কিন্তু আল্লাহ তা'আলা কিয়ামত পর্যন্ত তা হারাম করে দিয়েছেন। সুতরাং যার কাছে তাদের মধ্য থেকে কেউ থাকে, সে যেন তাকে মুক্ত করে দেয়। আর তোমরা তাদেরকে যা কিছু দিয়েছিলে, তা থেকে কিছুই ফিরিয়ে নিও না।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রুকন (কা'বার কোণ) এবং দরজার মাঝখানে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখেছি, আর তিনি এ কথা বলছিলেন।
6315 - عن عروة بن الزبير أن عبد الله بن الزبير قام بمكة فقال: إن ناسًا أعمى الله قلوبَهم كما أعمى أبصارهم يُفْتون بالمتعة - يُعرّض برجل - فناداه فقال: إنك لجِلْفُ جافٍ، فلعمري لقد كانت المتعة تفعل على عهد إمام المتقين (يريد رسول الله صلى الله عليه وسلم) فقال له ابن الزبير: فجرِّبْ بنفسك، فوالله لئن فعلتها لأرجمنك بأحجارك.
قال ابن شهاب: فأخبرني خالد بن المهاجر بن سيف الله، أنه بينما هو جالس عند رجل. فاستفتاه في المتعة. فأمره بها. فقال له ابن أبي عمْرة الأنصاري: مهلًا! قال: ما هي؟ والله لقد
فُعِلتْ في عهد إمام المتقين. قال ابن أبي عمرة: إنها كانت رخصة في أول الإسلام لمن اضطرّ إليها كالميتة والدم ولحم الخنزير، ثم أحكم الله الدين ونهي عنها.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (27: 1406) عن حرملة بن يحيى، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، قال ابن شهاب: أخبرني عروة بن الزبير، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মাক্কায় দাঁড়িয়ে বললেন: কিছু লোক, যাদের অন্তরকে আল্লাহ তাআলা অন্ধ করে দিয়েছেন যেমন তাদের চোখকে অন্ধ করেছেন, তারা মুত'আর (অস্থায়ী বিবাহের) ফতোয়া দিচ্ছে – (তিনি একজন লোককে উদ্দেশ্য করে একথা বলছিলেন) – তখন সেই লোকটি তাকে ডেকে বললেন: তুমি তো রূঢ় ও শুষ্ক প্রকৃতির লোক। আমার জীবনের শপথ! মুত্তাকীদের ইমামের (তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বুঝিয়েছেন) সময়েও মুত'আ করা হতো। তখন ইবনুয যুবাইর তাকে বললেন: তুমি নিজেই চেষ্টা করে দেখো! আল্লাহর কসম, যদি তুমি তা করো, তবে আমি তোমার পাথর দিয়েই তোমাকে পাথর মেরে হত্যা করব (রজম করব)।
ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: খালিদ ইবনুল মুহাজির ইবনু সাইফুল্লাহ আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি এক ব্যক্তির কাছে বসেছিলেন। তখন তিনি (খালিদ) মুত'আ (অস্থায়ী বিবাহ) সম্পর্কে ফতোয়া চাইলেন। তখন সেই ব্যক্তি তাকে মুত'আ করার অনুমতি দিলেন। তখন ইবনু আবী আম্রাহ আল-আনসারী তাকে বললেন: থামুন! (ঐ ব্যক্তি) বললেন: কী হয়েছে? আল্লাহর কসম! মুত্তাকীদের ইমামের সময়েও তো তা করা হয়েছিল। ইবনু আবী আম্রাহ বললেন: এটি ইসলামের প্রথম দিকে কেবল তাদের জন্য অনুমতি ছিল যারা এতে বাধ্য হতো, যেমন মৃত জন্তু, রক্ত এবং শূকরের গোশত (খেতে বাধ্য হলে)। এরপর আল্লাহ দ্বীনকে সুপ্রতিষ্ঠিত করলেন এবং তা নিষিদ্ধ করলেন।
6316 - عن ابن عمر قال: لما ولى عمر بن الخطاب، خطب الناس فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم أذن في المتعة ثلاثا، ثم حرمها. والله لا أعلم أحدا يتمتع وهو محصن إلا رجمتُه بالحجارة، إلا أن يأتيني بأربعة يشهدون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أحلها بعد إذ حرمها.
حسن: رواه ابن ماجه (1963) عن محمد بن خلف العسقلاني، قال: حدثنا الفريابي، عن أبان بن أبي حازم، عن أبي بكر بن حفص، عن ابن عمر فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في أبان وهو ابن عبد الله بن أبي حازم الأحمسي الكوفي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، إذا لم يخالف، أو لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وأبو بكر بن حفص هو عبد الله بن حفص بن عمر بن سعد بن أبي وقاص الزهري، أبو بكر المدني، مشهور بكنيته من رجال الجماعة.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি (ইবনু উমর) বলেন, যখন উমার ইবনু খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খিলাফতের দায়িত্ব নিলেন, তখন তিনি জনগণের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: নিশ্চয় আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনবার মুত‘আ (সাময়িক বিবাহ)-এর অনুমতি দিয়েছিলেন, অতঃপর তিনি তা হারাম (নিষিদ্ধ) করে দেন। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো ব্যক্তিকে জানি না যে মুহসান (বিবাহিত) হওয়া সত্ত্বেও মুত‘আ করে, আর আমি তাকে পাথর নিক্ষেপ করে রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড) করব না— তবে যদি সে আমার কাছে চারজন সাক্ষী নিয়ে আসে যারা সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা হারাম করার পরে আবার হালাল করেছেন (তবে ভিন্ন কথা)।
6317 - عن سالم بن عبد الله، أن رجلا سأل عبد الله بن عمر عن المتعة، فقال: حرام، قال: فإن فلانا يقول فيها. فقال: والله لقد عُلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّمها يوم خيبر، وما كنا مسافحين.
صحيح: رواه البيهقي (7/ 202) من طرق عن أبي العباس محمد بن يعقوب، أنبأ محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، أنبأ ابن وهب، أخبرني عمر بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب، عن ابن شهاب قال: أخبرني سالم بن عبد الله فذكره. وإسناده صحيح.
وقوله: إن فلانا يقول فيها كذا: هو ابن عباس.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক তাঁকে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: তা হারাম। লোকটি বলল: অমুক ব্যক্তি তো এ ব্যাপারে অন্য কথা বলেন। তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! এটি অবশ্যই জানা আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম খায়বার যুদ্ধের দিন তা নিষিদ্ধ করেছেন এবং আমরা ব্যভিচারী ছিলাম না।
6318 - عن سالم بن عبد الله قال: أتي عبد الله بن عمر فقيل له، إن ابن عباس يأمر بنكاح المتعة، فقال ابن عمر: سبحان الله. ما أظن ابن عباس يفعل هذا. قالوا: بلي إنه يأمر به، فقال: وهل كان ابن عباس إلا غلامًا صغيرا إذ كان رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ثم قال ابن عمر: نهانا عنها رسول الله صلى الله عليه وسلم وما كنا مسافحين.
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (9291) عن هاشم بن مرثد قال: حدثنا المعاني بن سليمان، قال حدثنا موسى بن أعين، عن إسحاق بن راشد، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله فذكره.
وإسناده حسن من أجل المعافي بن سليمان وهو الجزري فإنه حسن الحديث، سئل أبو زرعة عنه فذكره بجميل، وفي"التقريب":"صدوق".
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 265):"رجاله رجال الصحيح خلا المعافي بن سليمان وهو ثقة".
وأما ما روي عن عبد الرحمن بن نُعيم، أو نعيم الأعرجي - قال: سأل رجل ابن عمر عن المتعة - وأنا عنده - متعة النساء، فقال: والله ما كنا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم زانين ولا مسافحين". فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (5694) وأبو يعلى (5706) كلاهما من حديث عبد الله بن إياد بن لقيط، حدثنا إياد، عن عبد الرحمن بن نعيم، أو نعيم الأعرجي - شك أبو الوليد - شيخ أحمد - قال: سأل رجل فذكره.
وعبد الرحمن بن نُعيم ويقال: نُعيم الأزدي الأعرجي من رجال التعجيل (650) قال: فيه جهالة. قاله الحسيني.
وفي الباب ما رُوي أيضا عن أبي سعيد الخدري قال: كنا نستمتع على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم بالثوب".
رواه الإمام أحمد (11165) والبزار - كشف الأستار - (1441) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن زيد أبي الحواري قال: سمعت أبا الصديق، يحدث عن أبي سعيد الخدري فذكره.
قال البزار:"إنما كان الإذن في المتعة ساعة، أذن فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم نهى عنها، وحرّمها إلى يوم القيامة".
إسناده ضعيف من أجل زيد أبي الحواري العمي البصري، يقال: اسم أبيه مرة، وهو ضعيف باتفاق أهل العلم، إلا أن البزار والدارقطني كانا يحسنان الظن به، فقالا: صالح.
وأما قول الهيثمي في"المجمع" (4/ 264):"رواه أحمد والبزار، ورجال أحمد رجال الصحيح". فيشعر أن البزار رواه من غير طريق أحمد، والصحيح أنهما روياه من طريق واحد، ثم زيد العمي هذا ليس من رجال الصحيح، وإنما روي له أصحاب السنن فقط.
وفي الباب ما رُوي أيضا عن أبي هريرة قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، فنزلنا ثنية الوداع، فرأى رسول الله صلى الله عليه وسلم مصابيح، ورأى نساء يبكين، فقال:"ما هذا؟" فقيل: نساء تمتع بهن أزواجهن، ثم فارقوهن، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حرَّم أو هَدم المتعةَ النكاحُ، والطلاقُ، والعدةُ، والميراثُ".
رواه أبو يعلى (6625) وابن حبان في صحيحه (4149) والبيهقي (7/ 207) كلهم من طرق عن مُؤمل بن إسماعيل، حدثنا عكرمة بن عمار، قال: أخبرني سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
وفيه مؤمل بن إسماعيل البصري مختلف فيه فوثّقه ابن معين والدارمي وابن حبان وقال ابن سعد:"ثقة كثير الغلط"، وقال الدارقطني:"ثقة كثير الخطأ" وقال البخاري:"منكر الحديث".
هذا مما لم يتابعه عليه أحدٌ، وهو إلى الضعف أقرب إذا انفرد.
وقد رُوي نحوه موقوفا على ابن مسعود، وفي إسناده الحجاج بن أرطاة. رواه البيهقي وغيره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালিম বিন আব্দুল্লাহ বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলা হলো যে, ইবনে আব্বাস মুত‘আ বিবাহের (সাময়িক বিবাহ) নির্দেশ দেন। তখন ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সুবহানাল্লাহ! আমি মনে করি না যে ইবনে আব্বাস এমনটি করতে পারেন। লোকেরা বলল: হ্যাঁ, তিনি অবশ্যই এর নির্দেশ দেন। তখন তিনি (ইবনে উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ইবনে আব্বাস তো একজন ছোট বালক ছাড়া আর কিছু ছিলেন না। এরপর ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এটি (মুত‘আ) থেকে নিষেধ করেছেন, আর আমরা ব্যভিচারীও ছিলাম না।
6319 - عن أبي الزبير قال: سمعت جابر بن عبد الله يقول: كنا نستمتع بالقبضة من التمر والدقيق الأيام على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر، حتى نهي عنه عمر في شأن عمرو بن حريث.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (16: 1405) عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير فذكره.
وقصة عمرو بن حريث هي ما أخرجه عبد الرزاق (14029) عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: قدم عمرو بن حريث من الكوفة، فاستمتع بمولاة، فأتي بها عمر، وهي حبلى، فسألها، فقالت: استمتع بي عمرو بن حريث، فسأله، فأخبره بذلك أمرا ظاهرا. قال: فهلَّا غيرها، فذلك حين نهي عنها.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে কয়েকদিনের জন্য এক মুষ্টি খেজুর ও আটা দিয়ে মুতআ (সাময়িক বিবাহ) করতাম। অবশেষে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমর ইবনে হুরাইসের ঘটনার প্রেক্ষিতে তা নিষিদ্ধ করেন।
আর আমর ইবনে হুরাইসের ঘটনা হলো, আবূ যুবাইর জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শুনেছেন যে, আমর ইবনে হুরাইস কুফা থেকে আগমন করল এবং একজন ক্রীতদাসী নারীর সাথে মুতআ করল। তাকে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আনা হলো, যখন সে গর্ভবতী ছিল। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সে বলল: আমর ইবনে হুরাইস আমার সাথে মুতআ করেছে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সেও খোলাখুলিভাবে বিষয়টি স্বীকার করল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘তুমি কেন তাকে স্থায়ীভাবে বিবাহ করলে না?’ আর এটাই হলো যখন মুতআ নিষিদ্ধ করা হলো।
6320 - عن عاصم بن أبي نضْرة قال: كنت عند جابر بن عبد الله فأتاه آت فقال: ابن عباس وابن الزبير اختلفا في المستمتعين. فقال جابر: فعلناهما مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم نهانا عنهما عمر، فلم نَعُد لهما.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (17: 1405) عن حامد بن عمر البكراوي، حدثنا عبد الواحد (يعني ابن زياد) عن عاصم، عن أبي نضرة، فذكره.
وفي الحديث دليل على أن جابر بن عبد الله لم يبلغه النسخ، وكذا ابن عباس، إلا أن الأخير ثبت رجوعه عنه، وإن لم يثبت رجوعه فهو للضرورة كما جاء في صحيح البخاري (5116) عن أبي جمْرة قال: سمعت ابن عباس: سئل عن متعة النساء فرخّص، فقال له مولى له: إنما ذلك في الحال الشديد، وفي النساء قلة، أو نحوه، فقال ابن عباس: نعم.
أو لعل ابن عباس فهم من تحريم النبي صلى الله عليه وسلم عند الاستغناء عنها، وإباحتها عند الحاجة، فكان يفتي بها ويقول، هي كالميتة والدم ولحم الخنزير، تباح عند الضرروة، وخشية العنت، ففهم الناس أنه أباحها إباحة مطلقة، وشبّبوا في ذلك بالأشعار، فلما رأى ذلك ابن عباس رجع إلى القول بالتحريم كما قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (3/ 345).
قلت: لأنه روى الطبراني في الكبير (10/ 315) عن سعيد بن جبير قال: قلت لابن عباس: هل تدري ما صنعت؟ وبما أفتيت، سارت بفتيك الركبان، وقالت فيه الشعراء.
قال: وما قالوا؟ قلت: قالوا:
قد قال لي الشيخ لما طال مجلسه … يا صاح هل لك في فتيان ابن عباس
هل لك في رخصة الأطراف … آنسة يكون مثواك حتى يصدر الناس
قال:"إنا لله وإنا إليه راجعون، لا والله ما بهذا أفتيتُ، ولا هذا أردتُ، ولا أحللت منها إلا ما أحل الله من الميتة ولحم الخنزير".
ولكن في الإسناد حجاج وهو ابن أرطاة، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 265) فقال: هو ثقة، ولكنه مدلس، وبقية رجاله الصحيح.
ثم اعلم أن متعة النساء كانت معروفة في الجاهلية فرخص فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض الغزوات كما سبق في حديث عبد الله بن مسعود، ثم منع عنها يوم خيبر، ثم رخص فيها عام الفتح وأوطاس كما سبق لفترة قصيرة، ثم نهى عنها نهيا عاما يوم الفتح قبل الخروج من مكة فهي حرام إلى قيام الساعة.
وقد أشار الشافعي إلى الأدوار التاريخية لمتعة النساء بقوله:
"لا أعلم شيئا أحله الله، ثم حرّمه، ثم أحله، ثم حرّمه إلا المتعة".
ثم استقر تحريمها إلى يوم القيامة، ولذا توعد عمر بن الخطاب أمير المؤمنين ربيعة بن أمية حين أخبرته خولةُ بنت حكيم أنه استمتع بامرأة، فحملت منه، فخرج عمر فزعًا يجر رداءه فقال: هذه المتعة، ولو كنت تقدمت فيها لرجمت.
رواه مالك في نكاح المتعة (44) عن عروة بن الزبير، أن خولة بنت حكيم دخلت على عمر بن الخطاب فأخبرته به.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আছিম ইবনে আবী নাদরাহ বলেন: আমি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট ছিলাম। তখন একজন লোক তাঁর নিকট এসে বলল: ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) নিয়ে মতবিরোধ করেছেন। তখন জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তা (মুত'আ) করেছি। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের তা থেকে নিষেধ করলেন। এরপর আমরা তা আর করিনি।
6321 - عن عبد الله بن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الشغار. والشغار أن يُزوّج الرجل ابنته على أن يُزوّجه الآخر ابنته. ليس بينهما صداق.
متفق عليه: رواه مالك في النكاح (24) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (5112)، ومسلم في النكاح (57: 1415) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه البخاري في الحيل (1960)، ومسلم في النكاح (58) من طريق عبيد الله بن عمر، عن نافع، به، مثله.
وفيه: قلت لنافع: ما الشغار؟ قال:"ينكح ابنة الرجل، ويُنْكحه ابْنته بغير صداق، وينكحُ أخت الرجل ويُنكحُه أخته بغير صداق".
فتبيّن بهذا أن تفسير الشغار في طريق مالك أنه من قول نافع، وبذلك جزم عبد الحق الإشبيلي في"الجمع بين الصحيحين" (2/ 388).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিগার করতে নিষেধ করেছেন। আর শিগার হলো, একজন ব্যক্তি তার মেয়েকে এই শর্তে অন্যজনের কাছে বিবাহ দেবে যে, অন্যজন তার মেয়েকে এর বিনিময়ে এই প্রথম ব্যক্তির কাছে বিবাহ দেবে। তাদের উভয়ের মাঝে কোনো মোহর থাকবে না।
6322 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الشغار.
زاد ابن نُمير: والشغار أن يقول الرجل للرجل: زوِّجني ابنتك، وأزوّجك ابتي، أو زوّجني أختك، وأزوّجك أختي.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1416) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا ابن نمير وأبو أسامة، عن عبيد الله، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه النسائي (3338) من وجه آخر عن عبيد الله بإسناده وجاء فيه:
قال عبيد الله: والشغار كان الرجل يزوّج ابنته على أن يزوجه أختَه. فتبين من هذا أن هذا التفسير من عبيد الله، وليس هو بمرفوع، ولا من قول الصحابي.
ولم يقف عليه القرطبي فقال في"المفهم" (4/ 112).
"وقد جاء تفسير الشغار في حديث ابن عمر من قول نافع، وجاء في حديث أبي هريرة من كلام رسول الله صلى الله عليه وسلم وفي مساقه. وظاهره: الرفع إلى النبي صلى الله عليه وسلم ويحتمل أن يكون من تفسير أبي هريرة، أو غيره من الرواة، أعني: في حديث أبي هريرة. وكيفما كان فهو تفسير صحيح موافق لما حكاه أهل اللسان. فإن كان من قول رسول الله صلى الله عليه وسلم فهو المقصود، وإن كان من قول صحابي فمقبول، لأنهم أعلم بالمقال وأقعدُ بالحال".أهـ.
وأما قول أهل العلم في حكم نكاح الشغار فانظر"المنة الكبرى" (6/ 190 - 191).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ‘শিগার’ (বিনিময় বিবাহ) থেকে নিষেধ করেছেন। ইবনু নুমাইর (রাহিমাহুল্লাহ) অতিরিক্ত বর্ণনা করেন: আর ‘শিগার’ হলো, কোনো ব্যক্তি অন্য ব্যক্তিকে বলবে: তুমি আমার সাথে তোমার কন্যার বিবাহ দাও, আর আমি আমার কন্যার বিবাহ তোমার সাথে দেব; অথবা তুমি আমার সাথে তোমার বোনের বিবাহ দাও, আর আমি আমার বোনের বিবাহ তোমার সাথে দেব।
6323 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الشغار.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1417) من طريق حجاج بن محمد، وعبد الرزاق - فرقهما - كلاهما عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিগার (বিনিময় বিবাহ) করতে নিষেধ করেছেন।
6324 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شغار في الإسلام".
صحيح: رواه ابن ماجه (1885) عن الحُسين بن مهدي، قال: أنبأنا عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، عن أنس فذكره. وكذا رواه أيضا ابن حبان في صحيحه (4154) عن عبد الرزاق.
ولكن رواه عبد الرزاق في مصنفه (10434) عن معمر، عن ثابت وأبان، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شغار في الإسلام" والشغار أن يُبدل الرجلُ الرجلَ أخته بأخته بغير صداق. ولا إسعاد في الإسلام، ولا جلب في الإسلام، ولا جنَبَ.
فزاد في الإسناد أبان وهو ابن أبي عياش متروك. كذلك رواه الإمام أحمد (12686) عن عبد الرزاق مقتصرا على حديث"لا شغار في الإسلام".
وإسناده صحيح، بدون أبان بن عياش.
ولكن رواه أيضا الإمام أحمد (13032) عن عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، عن أنس بطوله الذي ذكرته، ولم يذكر من الإسناد"أبان".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে শিগার (বিনিময় বিবাহ) নেই।"
6325 - عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا شغار في الإسلام".
صحيح: رواه الإمام أحمد (19962) عن إبراهيم بن خالد، حدثنا رباح، عن معمر، عن ابن سيرين، عن عمران بن حصين فذكره.
وإسناده صحيح. ورباح هو ابن زيد القرشي مولاهم الصنعاني ثقة فأضل، وثّقه أبو حاتم والنسائي وغيرهما. وهو من رجال أبي داود والنسائي.
وللحديث طرق أخرى معللة:
منها: ما رواه النسائي (3591) وأحمد (19855) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي قزعة، عن الحسن، عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا جلب، ولا جنب، ولا شغار" والحسن لم يسمع من عمران بن حصين. ورواه أبو داود الطيالسي في مسنده وقال: لا أحفظه عن شعبة مرفوعًا.
ومنها: ما رواه أيضا النسائي (3335) والترمذي (1123) من وجه آخر عن بشر بن المفضّل قال: حدثنا حميد، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكر مثله. وزاد فيه:"من انتهب نُهبة فليس منا".
ومنها: ما رواه أيضا النسائي (3336) عن محمد بن كثير، عن الفزاري، عن حميد، عن أنس فذكر الحديث مثله وقال:"هذا خطأ فاحش والصواب حديث بشر". انتهى.
قلت: والحسن البصري مدلس، ولم يسمع من عمران بن حصين إلا أنه توبع في الإسناد الأول، كما أنه توبع في قصة طويلة سبق ذكرها في كتاب المظالم في النهي عن النهبى.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ইসলামে শিগার (বিনিময় বিবাহ) নেই।"
6326 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا شغار في الإسلام".
حسن: رواه أحمد (7027) عن يعقوب وسعد قالا: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق - بعني محمدًا - حدثني عبد الرحمن بن الحارث، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق لأنه صرّح بالتحديث، كما أنه توبع.
وهو ما رواه أحمد (7012) من وجه آخر عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عباس بن أبي ربيعة بإسناده في سياق طويل وفيه:"ألا ولا شغار في الإسلام.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা দিয়েছেন (এবং) বলেছেন: ইসলামে শিগার (বিয়ে) নেই।
6327 - عن العباس بن عبد الله بن عباس أنه أنكح عبد الرحمن بن الحكم ابنته، وأنكحه عبد الرحمن ابنته، وقد كانا جعلا صداقًا. فكتب معاوية بن أبي سفيان - وهو خليفة - إلى مروان يأمره بالتفريق بينهما. وقال في كتابه: هذا الشعار الذي نهى عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (2075) ومن طريقه البيهقي (7/ 200) عن محمد بن يحيى بن فارس، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، أن العباس بن عبد الله بن عباس أنكح عبد الرحمن بن الحكم ابنته فذكره بقية القصة.
ورواه أيضا أحمد (1656) وابن حبان (44153) كلهم من طريق يعقوب بن إبراهيم به مثله - وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق وهو مدلس إلا أنه صرح فزالت تهمة التدليس.
وقوله:"وقد كانا جعلا صداقا" أي جعلا الشغار صداقة. ولكن إنْ أنكح ابنته وأنكحه ابنته مع الصداق فخرج من الشغار المنهي عنه.
আব্বাস ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস থেকে বর্ণিত, তিনি আব্দুর রহমান ইবনুল হাকামের সাথে তাঁর মেয়ের বিয়ে দিলেন, আর আব্দুর রহমানও তাঁর মেয়ের বিয়ে দিলেন। আর তারা উভয়েই মোহর ধার্য করেছিল। অতঃপর খলীফা মুআবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারওয়ানের কাছে লিখলেন এবং তাদের দু'জনের মধ্যে বিচ্ছেদ ঘটানোর নির্দেশ দিলেন। এবং তিনি (মুআবিয়া) তাঁর চিঠিতে বললেন: এটিই সেই শিগার, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন।
