হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6288)


6288 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يجمع بين المرأة وعمتها، ولا بين المرأة وخالتها".

متفق عليه: رواه مالك في النكاح (20) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (5109)، ومسلم في النكاح (33: 1408) كلاهما من طريق مالك، به، مثله. ورواه البخاري (5110)، ومسلم (35) كلاهما من طريق الزهري، عن قبيصة بن ذؤيب، عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تُنكح العمةُ على بنت الأخ، ولا ابنةُ الأخت على الخالة" واللفظ لمسلم.

قال ابن شهاب:"فنُري خالة أبيها وعمة أبيها بتلك المنزلة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মহিলাকে তার ফুফুর সাথে একত্রে বিবাহ করা যাবে না, আর না কোনো মহিলাকে তার খালার সাথে একত্রে বিবাহ করা যাবে।"

অন্য এক বর্ণনায় (যা ইমাম মুসলিমের শব্দ) আছে, তিনি (আবু হুরায়রা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ফুফুকে ভ্রাতুষ্পুত্রীর (ভাইয়ের মেয়ের) উপর বিবাহ করা যাবে না, আর না খালাকে ভাগিনীর (বোনের মেয়ের) উপর বিবাহ করা যাবে।"

ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "সুতরাং আমরা তার পিতার খালা এবং তার পিতার ফুফুকেও সেই একই মর্যাদার অন্তর্ভুক্ত মনে করি।"









আল-জামি` আল-কামিল (6289)


6289 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تنكح المرأة على عمتها أو خالتها.

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5108) عن عبدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا عاصم، عن الشعبي، سمع جابرا يقول: فذكره.

قال البخاري عقبه:"وقال داود وابن عون عن الشعبي، عن أبي هريرة".

وفي قول البخاري:"وقال داود وابن عون … الخ" إشارة منه إلى الاختلاف على الشعبي، وإخراجه حديث جابر دليل على ثبوته عنده، وأن الاختلاف المشار إليه لا يضر ولا يقدح، ولذلك قال الحافظ ابن حجر:"وهذا الاختلاف لم يقدح عند البخاري، لأن الشعبي أشهر بجابر منه بأبي هريرة".

وقال في موضع آخر:"والذي يظهر أن الطريقين محفوظان"، الفتح (9/ 161).

وهو كما قال كما في الحديث الآتي:




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর অথবা তার খালার উপর বিবাহ করা হোক।









আল-জামি` আল-কামিল (6290)


6290 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن تُنكح المرأة على عمتها، أو العمة على ابنة أخيها، أو المرأة على خالتها، أو الخالة على ابنة أختها، ولا تُنكح الصغرى على الكبرى، ولا الكبرى على الصغرى.

صحيح: رواه أبو داود (2065) والترمذي (1126) والنسائي (3296) وابن أبي شيبة (4/ 246) وابن نصر المروزي في السنة (239) وابن الجارود (685) وصححه ابن حبان (4117) كلهم من حديث داود بن أبي هند حدثنا عامر الشعبي، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح" وقال:"أدرك الشعبي أبا هريرة وروى عنه". سألت محمدا
عن هذا فقال: صحيح.

وقال الترمذي:"وروى الشعبي عن رجل، عن أبي هريرة". انتهى.

وحديث ابن عون، عن الشعبي، عن أبي هريرة رواه البيهقي (7/ 166) وقال:"وقد أخرج البخاري رواية عاصم الأحول، عن الشعبي، عن جابر بن عبد الله، إلا أنهم يرون أنها خطأ، وأن الصواب رواية داود بن أبي هند وعبد الله بن عون، عن الشعبي، عن أبي هريرة".

وردّه ابن التركماني فقال:"يحتمل أن الشعبي سمعه منهما أعني أبا هريرة وجابرًا، وهذا أولى من تخطئة أحد الطريقين، إذ لو كان كذلك لم يخرجه البخاري في صحيحه، على أن داود بن أبي هند اختلف عنه فيه، فرُويَ عنه، عن الشعبي كما ذكره البيهقي، وأخرجه مسلم من حديثه عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، ولا يلزم من كون الشيخين لم يخرجاه أن لا يكون صحيحا كما عرف".

ولحديث أبي هريرة طريق آخر وهو ما ساقه الترمذي في العلل الكبير (1/ 443 - 444) عن محمد بن العلاء، نا محمد بن الصلت، عن مندل، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال الترمذي: سألت محمدا عن هذا الحديث فقال:"مندل ضعيف الحديث، أنا لا أكتب حديثه"كأنه لم يعرف هذا الحديث من حديث الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة من غير هذا الوجه. انتهى.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারীকে তার ফুফুর সাথে (একই বিবাহ বন্ধনে) আনা যাবে না, অথবা ফুফুকে তার ভাইঝির সাথে; অথবা কোনো নারীকে তার খালার সাথে, অথবা খালাকে তার ভাগ্নীর সাথে। আর ছোটকে বড়র সাথেও বিবাহ দেওয়া যাবে না এবং বড়কেও ছোটর সাথে (একত্রে আনা) যাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (6291)


6291 - عن عبد الله بن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن تُزوج المرأة على عمتها، أو على خالتها.

صحيح: رواه الترمذي (1125) عن نصر بن علي، ثنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن أبي حريز، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال الترمذي:"أبو حريز اسمه: عبد الله بن حسين".

قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: ليس بصحيح، ولكن يحتمل أن يكون حسنا، فإن أبا حريز عبد الله بن حسين مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وسعيد بن أبي عروبة اختلط بآخره، ولكن رواه عنه عبد الأعلى بن عبد الأعلى قبل الاختلاط، وكذلك رواه أحمد (3530) عن روح، عن سعيد بن أبي عروبة، وروح هو ابن عبادة روى أيضا عن سعيد بن أبي عروبة قبل الاختلاط. كما أن سعيد بن أبي عروبة توبع، تابعه الفُضيل بن مبسرة، عن أبي حريز، رواه ابن حبان في صحيحه (4116) ولكنه زاد في آخره:"إنكن إذا فعلتنّ ذلك قطعتن أرحامكنّ" والفضيل بن ميسرة صدوق، وزيادته شاذة ثم يتابع عليها ولكن رواه أبو داود في مراسيله (197) عن عيسى بن طلحة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تنكح المرأة على قرابتها مخافة القطيعة. ورجاله بين ثقات وصدوق.

وأما ما روي عن ابن عباس" أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُجمع بين العمة والخالة، وبين الحالتين
والعمتين" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (2067) وأحمد (1878) كلاهما من حديث خُصيف عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وخصيف هو ابن عبد الرحمن الجزري مختلف فيه. ضقفه أحمد وقال:"روى أحاديث منكرة وقال النسائي:"ليس بالقوي". وقال أبو حاتم:"صالح يخلط، وتكلم في سوء حفظه".

وقال ابن حبان:"كان شيخا صالحا فقيها عابدا إلا أنه كان يخطئ كثيرا فيما يروي، يتفرد عن المشاهير بما لا يتابع عليه، وهو صدوق في روايته.

والخلاصة كما في التقريب"صدوق سيء الحفظ، خلط بآخره".

قلت: ومما انفرد به، وأخطأ قوله:"بين الخالتين والعمتين" فإنه لم يتابع عليه، وقد خالفه أبو حريز فرواه عن عكرمة، عن ابن عباس، ولم يذكر هذه اللفظة، فهي منكرة، وقد أشكل على أهل العلم فهم معناه. فكل فسّره بخلاف غيره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারীকে যেন তার ফুফুর উপর অথবা তার খালার উপর বিবাহ করা না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6292)


6292 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: لما فُتحت مكة على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث بطوله وفيه"ولا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها".

حسن: رواه أحمد (6681، 6712) وابن أبي شيبة (4/ 247) وعبد الرزاق (10750) والمروزي في السنة (245، 246) كلهم من حديث عمرو بن شعيب بإسناده.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.




তাঁর দাদা থেকে বর্ণিত, যখন মক্কা বিজিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন—এরপর তিনি পুরো হাদীসটি বর্ণনা করলেন এবং তাতে এ কথাটিও ছিল: "কোনো নারীকে তার ফুফুর ওপর (একই সাথে সতীন রূপে) অথবা তার খালার ওপর (একই সাথে সতীন রূপে) বিবাহ করা যাবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6293)


6293 - عن أبي سعيد الخدري قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى أن يجمع بين المرأة وخالتها، وبين المرأة وعمتها.

حسن: رواه ابن ماجه (1930) وأحمد (11637) وابن نصر المروزي في السنة (242) وابن أبي شيبة (4/ 646) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عبد الله بن عتبة، عن سليمان بن يسار، عن أبي سعيد الخدري فذكره في حديث طويل.

ومحمد بن إسحاق صرح بالتحديث عند المروزي، وهو حسن الحديث إذا صرح وهذا منه.

وفي معناه ما روي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها.

رواه ابن حبان (5996) في سياق طويل من حديث سنان بن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.

وسنان بن الحارث ذكره المؤلف في"الثقات" (6/ 44) وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 254) ولم يقل فيه شيئا، فهو في عداد المجهولين، ولكن رواه البزار - كشف الأستار - (1436) والترمذي في العلل الكبير (1/ 441) والمروزي في السنة (250) كلهم من حديث كثير بن هشام، قال: حدثنا جعفر بن برقان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم
عن نكاحين: أن تتزوج المرأة على عمتها، أو على خالتها.

قال البزار:"لا نعلم رواه عن الزهري هكذا إلا أبو جعفر، ولا عنه إلا كثير".

وقال الترمذي:"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: هو غلط، إنما هو عن الزهري، عن قبيصة بن ذُؤيب، عن أبي هريرة".

قلت: رواية الزهري عن قبيصة، عن أبي هريرة في الصحيحين كما سبق.

وقال ابن أبي حاتم:"سألت أبي عن حديث رواه كثير بن هشام، عن جعفر بن برقان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه نهى أن يجلس الرجل على مائدة يشرب عليها الخمر، وأن تنكح المرأة على عمتها، قال أبي: هذان الحديثان خطأ. يرويه عن جعفر، عن رجل، عن الزهري هكذا. وليس هذا من حديث الزهري. وأما حديث"نهى أن تنكح المرأة على عمتها، وعلى خالتها"، فإن عقيلا رواه عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، وقبيصة بن ذؤيب، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم وهو أشبه، وأما قصة المائدة، فهو مفتعل، ليس من حديث الثقات" العلل (1/ 402 - 403).

قلت: آفة هذا الحديث جعفر بن برقان الكلابي وهو ثقة من ثقات المسلمين كما قال ابن عيينة، ولكنه مضطرب في حديث الزهري وقد نص على ذلك الإمام أحمد، وابن معين، والنسائي، وابن عدي، والعقيلي، وغيرهم من أئمة هذا الشأن. وقد خالفه في هذه الرواية الثقاتُ الضابطون فرووه عن الزهري عن قبيصة، عن أبي هريرة.

وفي الباب أيضا ما رُوي عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها".

رواه ابن ماجه (1931) عن جبارة بن المغلّس، قال: حدثنا أبو بكر النهشلي، قال: حدثني أبو بكر بن أبي موسى، عن أبيه قال: فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل شيخ ابن ماجه وهو جبارة بن المغلس فقد اتفق أئمة النقد على تضعيفه حتى قال الدارقطني:"متروك".

وفي الباب أيضا عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها".

رواه أحمد (577) والبزار - كشف الأستار - (1434) وأبو يعلى (360) والمروزي في السنة (249) كلهم من حديث عبد الله بن لهيعة، ثنا عبد الله بن هبيرة، عن عبد الله بن رزين، عن علي بن أبي طالب فذكره.

قال البزار: لا نعلمه عن علي إلا بهذا الإسناد.

قلت: في الإسناد عبد الله بن لهيعة، وفيه كلام معروف.

وفي الباب أيضا عن عتاب بن أسيد وسعد بن أبي وقاص وغيرهما وكلها معلولة.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিষেধ করতে শুনেছি যে, যেন কোনো নারীকে তার খালা এবং কোনো নারীকে তার ফুফুর সঙ্গে একত্রে (বিবাহ বন্ধনে) রাখা না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6294)


6294 - عن عائشة قالت: وجدت في قائم سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابًا:"إن أشد الناس عُتوّا من ضرب غير ضاربه، ورجل قتل غير قاتله، ورجل تولّى غير أهل نعمته، فمن فعل ذلك فقد كفر بالله ورسوله، لا يقبل الله منه صرفًا، ولا عدلًا، وفي الأجر المؤمنون تكافأ دماؤهم، ويسعى بذمتهم أدناهم، لا يُقتل مسلم بكافر، ولا ذو عهد في عهده، ولا يتوارث أهلُ ملتين، ولا تُنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها، ولا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا تسافر المرأة ثلاث ليال مع غير ذي محرم".

حسن: رواه أبو يعلى (4757) والدارقطني (3/ 131) والحاكم (4/ 349) والبيهقي (8/ 29 - 30) والمروزي في السنة (248) كلهم من طرق عن عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، قال: سمعت مالك بن محمد بن عبد الرحمن، قال: سمعت عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة قالت: فذكرته واختصره البعض. قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل عبيد الله بن عبد الله بن موهب فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তলোয়ারের খাপে একটি লেখা পেলাম: “নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সীমালঙ্ঘনকারী সে, যে আঘাত করে এমন ব্যক্তিকে, যে তাকে আঘাত করেনি; আর সে ব্যক্তি, যে হত্যা করে এমন ব্যক্তিকে, যে তাকে হত্যা করেনি; আর সে ব্যক্তি, যে আনুগত্য করে এমন কারো, যে তার প্রতি অনুগ্রহ করেনি। সুতরাং যে ব্যক্তি এমন কাজ করে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সাথে কুফরি (অকৃতজ্ঞতা বা অবাধ্যতা) করল। আল্লাহ তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কিছুই কবুল করবেন না। আর (এতে আরও রয়েছে) মুমিনদের রক্ত সমান (পরস্পর সমান মূল্য রাখে), তাদের মধ্যেকার সর্বনিম্ন ব্যক্তিও তাদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা দিতে পারে, কোনো মুসলিমকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না, আর চুক্তিবদ্ধ কোনো ব্যক্তিকে তার চুক্তির মধ্যে থাকা অবস্থায় (হত্যা করা হবে না), দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না, কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর বা তার খালার উপর বিবাহ দেওয়া যাবে না, আর আসরের পর সূর্য ডোবা পর্যন্ত কোনো সালাত (নামাজ) নেই, আর কোনো নারী যেন তিন রাতের দূরত্বে তার মাহরাম ছাড়া ভ্রমণ না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6295)


6295 - عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حدثتها أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم يا رسول الله! انكح أختي عزَّة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتحبين ذلك؟". فقالت: نعم، يا رسول الله! لست لك بمُخْلِية. وأحب من شركني في خير أختي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإن ذلك لا يحل لي" قالت: فقلت: يا رسول الله! فإنا نتحدث أنك تريد أن تنكح دُرّة بنت أبي سلمة. قال:"بنت أبي سلمة؟" قالت: نعم. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أنها لم تكن ربيبتي في حجري ما حلت لي. إنها ابنة أخي من الرضاعة، أرضعتني وأبا سلمة ثويبة. فلا تعرضنَّ علي بناتِكنَّ ولا أخواتِكنَّ".

متفق عليه: رواه مسلم في الرضاعة (16: 1449) عن محمد بن رمح بن المهاجر، أخبرنا الليث، عن يزيد بن أبي حبيب، أن محمد بن شهاب كتب يذكر أن عروة حدثه، أن زينب بنت أبي سلمة حدثته، أن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم وحدثتها فذكرته.

ورواه البخاري في النكاح (5107) من حديث الليث، عن عُقيل، عن ابن شهاب بإسناده نحوه ولم يسم"غَزّة". قال مسلم:"لم يُسم أحد منهم في حديثه"عزّة" غير يزيد بن أبي حبيب.



أيهما شئت".

رواه أبو داود (2243) والترمذي (1130) وابن ماجه (1951) والدارقطني (3/ 273) والبيهقي (7/ 184) وصحّحه ابن حبان (4155) كلهم من طريق وهب بن جرير، قال: حدثنا أبي، قال: سمعت يحيى بن أيوب، يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي وهب الجيشاني، عن الضحاك بن فيروز، عن أبيه فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن".

قلت: فيه الضحاك بن فيروز من تابعي أهل اليمن كان معروفا عند ابن معين وخليفة بن خياط.

ولكن قال البخاري كما في"تهذيب الكمال":"الضحاك بن فيروز، عن أبيه، روى عنه أبو وهب الجيشاني، لا يُعرف سماع بعضهم من بعض".

وأبو وهب الجيشاني قال البخاري في إسناده نظر، وقال ابن القطان:"مجهول".

ثم هو اضطرب، فمرة رواه هكذا، وأخرى عن أبي خراش الرُعيني، عن الديلمي. رواه ابن ماجه (1950) وأبو خراش"مجهول".

قال ابن عبد البر في"التمهيد" في إسناد هذا الحديث نظر. كذا قال البخاري. بل أحاديث هذا الباب كلها معلولة، وليست أسانيدها قوية" ذكره ابن التركماني في"الجوهر النقي".

ولكن يساندها عمل الخلفاء ففي مصنف ابن أبي شيبة (4/ 316) عن ابن علية، عن عوف، قال: ثنا أشياخ عمريين - من جلساء قيامة بن زهير أن هنّام بن عمير - رجلا من بني تيم الله - كان جمع بين أختين في الجاهلية. فلم يفرّق بين واحدة منهما حتى كان في خلافة عمر، أنه رُفِع شأنه إلى عمر، فأرسل إليه فقال:"اخترْ إحداهما، والله لئن قربت الأخرى لأضربن رأسك".

وإسناده ضعيف من أجل جهالة أشياخ عمريين، وقسامة بن زهير المازني وإن كان ثقة إلا أنه لم يدرك عمرَ بن الخطاب، وكذلك أشياخ لم يدركوا عمر بن الخطاب.

وكذلك رُوي عن علي في رجل أسلم وتحته أختان فقال:"لتفارقهما أو لأضربن عنقك" رواه عبد الرزاق (12630).

وقال الشافعي:"إذا أسلم وتحته أختان، خُيّر أيهما شاء، فإن اختار واحدة ثبت نكاحها، وانفسخ نكاح الأخرى، وسواء كان نكحها في عقدة أو عقدتين". ذكره الدارقطني (3/ 274).

وقال غيره:"إن كان في عقد واحد فهو كما قال الشافعي، وإن كان في عقدين مختلفين فتبقى التي عقد عليها أولا، وتنفسخ التي عقد عليها بعدها، ولا يخير، وأما الأولاد فهم يُلحقون به.



وهو التحريم.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ছিলেন, তিনি তাঁকে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমার বোন আযযাকে বিবাহ করুন।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এটা পছন্দ করো?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো আপনার জন্য একা নই (অর্থাৎ আপনার প্রতি ঈর্ষান্বিতা নই)। আর যে আমার বোনের কল্যাণে আমার শরীক হবে, তাকে আমি পছন্দ করি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই এটা আমার জন্য হালাল নয়।"

তিনি (উম্মে হাবীবা) বললেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা বলাবলি করছি যে আপনি আবূ সালামাহর কন্যা দুররাকে বিবাহ করতে চান।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আবূ সালামাহর কন্যা?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যদি আমার প্রতিপালিত না-ও হতো এবং আমার তত্ত্বাবধানে না-ও থাকতো, তবুও সে আমার জন্য হালাল হতো না। কারণ সে হলো আমার দুধভাইয়ের মেয়ে। সুওয়াইবা (নামক দাসী) আমাকে এবং আবূ সালামাকে দুধ পান করিয়েছিল। সুতরাং তোমরা তোমাদের কন্যাদের বা তোমাদের বোনদের আমার কাছে বিবাহের জন্য প্রস্তাব করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6296)


6296 - عن البراء بن عازب قال: لقيت عمي ومعه راية، فقلت له: أين تريد؟ قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى رجل نكح امرأة أبيه، فأمرني أن أضرب عنقه، وآخذ ماله.

صحيح: رواه أبو داود (4457) والنسائي (3332) وابن الجارود (681) والحاكم (4/ 357) ومن طريقه البيهقي (7/ 162) والدارقطني في"العلل" (6/ 22) كلهم من طريق زيد بن أبي أنيسة، عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن أبيه فذكره.

وإسناده صحيح. وهذا الذي صوبه أبو حاتم وأبو زرعة كما في"العلل" (1/ 403) وقالا: وخاله: أبو بردة، ومنهم من يقول: عن عمه أبي بردة".

وأبو بردة هو ابن نبار - بكسر النون - صحابي اسمه هانئ، وقيل: الحارث بن عمرو، وقيل: مالك بن هبيرة.

وقد اختلف على عدي بن ثابت كما قال الترمذي (1362) بعد أن رواه عن أشعث، عن عدي بن ثابت، عن البراء قال: مرَّ بي خالي أبو بردة بن نبار، ومعه لواء فذكر الحديث. ومن هذا الوجه رواه أيضا ابن ماجه (2607).

وقال الترمذي:"حديث البراء حديث حسن غريب، وقد روي محمد بن إسحاق هذا الحديث عن عدي بن ثابت، عن عبد الله بن يزيد، عن البراء.

وقد رُوي هذا الحديث عن أشعث، عن عدي، عن يزيد بن البراء، عن أبيه.

ورُوي عن أشعث، عن عدي، عن يزيد بن البراء، عن خاله، عن النبي صلى الله عليه وسلم". انتهى كلام الترمذي.

وحديث عدي بن يزيد بن البراء رواه البيهقي (8/ 238).

وقد تبين من هذا أن أشعث وهو ابن سوار الكندي وهو ضعيف باتفاق أهل العلم - اضطرب في إسناده. فلا أدري هل الترمذي وقف على أسانيد أخرى أم لا؟

وكذلك ذكر الدارقطني في"العلل" (6/ 20) الاختلاف إلا أنه لم يرجح كما رجح أبو حاتم وأبو زرعة.

وللحديث إسناد آخر وهو ما أخرجه النسائي (3331) وابن حبان (4112) والحاكم (2/ 191) كلهم من حديث السدي، عن عدي بن ثابت، عن البراء وفيه: لقيت خالي أبا بردة فذكر الحديث.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

وقوله: عمي، وفي رواية خالي لا منافاة بينهما، فهو قد يكون عمه من جهة النسب، وخاله من جهة الرضاعة، وكون اسمه جاء صريحا بأنه الحارث بن عمرو، أو أبو بردة بن نيار فالظاهر أنه خاله لا عمه.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার চাচার সাথে সাক্ষাত করলাম। তাঁর সাথে একটি পতাকা ছিল। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, ‘আপনি কোথায় যাচ্ছেন?’ তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠিয়েছেন, যে তার পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করেছে। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই (বা তাকে মৃত্যুদণ্ড দেই) এবং তার সম্পদ গ্রহণ করি।









আল-জামি` আল-কামিল (6297)


6297 - عن البراء بن عازب قال: بينا أنا أطوف على إبل لي ضلّت، إذ أقبل ركب، أو
فوارس، معهم لواء. فجعل الأعراب يطوفون بي لمنزلتي من النبي صلى الله عليه وسلم إذ أتوا قبة. فاستخرجوا منها رجلًا فضربوا عنقه. فسألت عنه فذكروا أنه أعرس بامرأة أبيه.

صحيح: رواه أبو داود (4456) وأحمد (18609) والطحاوي في شرحه (3/ 149) وسعيد بن منصور (943) كلهم من حديث مطرف، عن أبي الجهم، عن البراء بن عازب فذكره مثله. إلا عند أحمد:"دخل بأم امرأته".

وإسناده صحيح. ومطرف هو ابن عبد الله الشخير، وأبو الجهم هو سليمان بن أبي الجهم مولى البراء.

وقد قيل: إن قوله تعالى: {وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ} [النساء: 22] نزل في منظور بن زبّان، خلف على امرأة أبيه، واسمها مليكة.

وقد قيل: وهو الذي أرسل إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم خال البراء بن عازب في قتله.

وقيل: إنه غير ذلك، لأن منظور بن زبان بني في عهد أبي بكر الصديق، وإنه وجده في البحرين، فأقدمه المدينة، وفرق بينه وبين امرأة أبيه، وأراد عمر أن يقتله فحلف بالله أنه ما علم أن الله حرم ذلك فتركهـ.

وأعلّه المنذري في مختصر أبي داود بكثرة اختلافه، وسكت بدون بيان الترجيح.

وأهل العلم يعلمون أن كثرة المخارج لا تُعل الحديث، وقد روي عن بعض السلف: إذا ما جاء الحديث من مائة وجه ما فقهناه.

ولذا رد الحافظ ابن القيم على المنذري بعد أن ساق كلامه كاملًا. فقال: وهذا كله يدل على أن الحديث محفوظ، ولا يوجب هذا تركهـ بوجه. ثم قال: فأي علة في هذا توجب ترك الحديث؟ والحديث له طرق حسان يؤيد بعضها بعضا ثم ذكر هذه الطرق. انتهى ملخصا.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার হারিয়ে যাওয়া উট খুঁজতে বের হয়ে তা তাওয়াফ (ঘোরাফেরা) করছিলাম। হঠাৎ একদল আরোহী অথবা অশ্বারোহী আসলো, তাদের সাথে একটি ঝাণ্ডা ছিল। বেদুঈনরা আমার আশেপাশে ঘুরতে লাগল—নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার মর্যাদার কারণে। যখন তারা একটি তাঁবুর কাছে পৌঁছাল, তখন সেখান থেকে একজনকে বের করে আনল এবং তার গর্দান কেটে দিল। আমি তার (পরিচয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, তখন তারা উল্লেখ করল যে, সে তার পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করেছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6298)


6298 - عن قرة قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى رجل تزوج امرأة أبيه، أن أضرب عنقه، وأُصفّي ماله.

حسن: رواه ابن ماجه (2608) والدارقطني (3/ 200) والبيهقي (8/ 208) كلهم من حديث عبد الله بن إدريس، عن خالد بن أبي كريمة، عن معاوية بن قرة، عن أبيه فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن أبي كريمة فإنه حسن الحديث.

وقد اختلف في علة قتله. فقيل: إنما هو زنا محصن فكل من نكح ذات محرم يقام عليه حد الزنا، الرجم أو الجلد وهو قول مالك والشافعي وصاحبي أبي حنيفة، ورواية عن الإمام أحمد.

وقال أبو حنيفة، وسفيان الثوري:"يعزر ولا يُجلد".

وقال أحمد:"يقتل على كل حال ويؤخذ ماله". وهي الرواية الثانية عنده أن النبي صلى الله عليه وسلم إنما أمر بقتله.

ولعل هذا يعود إلى استحلاله نكاح امرأة أبيه على رسم أهل الجاهلية.
فكان الرجل منهم يرى أنه أولى بامرأة أيه من الأجنبي فيرثها كما يرث ماله، وفاعل هذا مرتد عن الدين، فكان جزاؤه القتل لردته وأخذ ماله.




কুররা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠালেন, যে তার বাবার স্ত্রীকে বিবাহ করেছিল। (তিনি নির্দেশ দিলেন) যেন আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই (তাকে হত্যা করি) এবং তার সম্পদ বাজেয়াপ্ত করি।









আল-জামি` আল-কামিল (6299)


6299 - عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حدثتها أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله! انكح أختي عزّة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتحبين ذلك؟". فقالت: نعم، يا رسول الله! لست لك بمُخْلِية. وأحب من شركني في خير أختي! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإن ذلك لا يحل لي" قالت: فقلت: يا رسول الله! فإنا نتحدث أنك تريد أن تنكح درة بنت أبي سلمة. قال:"بنت أبي سلمة؟" قالت: نعم. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أنها لم تكن ربيبتي في حجري ما حلت لي. إنها ابنة أخي من الرضاعة، أرضعتني وأبا سلمة ثويبة. فلا تعرضنَّ عليَّ بناتكنَّ ولا أخواتكنَّ".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5107) ومسلم في الرضاعة (16: 1449) كلاهما من طريق محمد بن شهاب الزهري، أن عروة أخبره أن زينب بنت أبي سلمة أخبرته أن أم حبيبة قالت: فذكرته. وفي الآثار الأخرى أن حمزة أيضا ممن أرضعنه ثويبة.

فصار النبي صلى الله عليه وسلم وأبو سلمة وحمزة إخوة من الرضاعة.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, বর্ণনা করেছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমার বোন আয্‌যাকে বিবাহ করুন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এটা পছন্দ কর?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! (আপনার স্ত্রী হিসেবে) আমি আপনার জন্য একাকী নই (অন্য স্ত্রীরাও আছে)। আর আমি চাই যে আমার বোন আমার সাথে কল্যাণে শরীক হোক! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু এটা আমার জন্য হালাল নয়।" তিনি বললেন: আমি তখন বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তো আলাপ করি যে, আপনি আবূ সালামার কন্যা দুররাকে বিবাহ করতে চান। তিনি বললেন: "আবূ সালামার কন্যা?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে আমার লালন-পালনে থাকা আমার পালিতা কন্যা (রবীবা) না-ও হতো, তবুও সে আমার জন্য হালাল হতো না। কারণ সে হলো আমার দুধ-ভাইয়ের মেয়ে। সুওয়াইবা আমাকে ও আবূ সালামাকে দুধ পান করিয়েছেন। সুতরাং তোমরা তোমাদের কন্যাদেরকে অথবা তোমাদের বোনদেরকে আমার কাছে (বিয়ের জন্য) পেশ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6300)


6300 - عن عروة أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب عائشة إلى أبي بكر، فقال له أبو بكر: إنما أنا أخوك، فقال:"أنت أخي في دين الله، وكتابه، وهي لي حلال".

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5081) عن عبد الله بن يوسف، حدثنا الليث، عن يزيد، عن عراك، عن عروة فذكره.

وصورته مرسل كما قال جماعة من أهل العلم منهم: الإسماعيلي والدارقطني وأبو نعيم وأبو مسعود وغيرهم. ولكن ظاهره أنه حمل ذلك عن خالته عائشة، أو عن أمه أسماء بنت أبي بكر.

ولذا قال ابن عبد البر:"إذا علم لقاء الراوي لمن أخبر عنه، ولم يكن مدلسا، حمل ذلك على سماعه ممن أخبر عنه ولو لم يأت بصيغة تدل على ذلك."انظر"الفتح"
رواه الترمذي (1117) عن قتيبة، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث لا يصح من قبل إسناده، وإنما رواه ابن لهيعة والمثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب. والمثنى بن الصباح وابن لهيعة بضعفان في الحديث".

وقال الحافظ في التلخيص (3/ 166) عقب قول الترمذي:"وقال غيره: يُشبه أن يكون ابن لهيعة أخذه عن المثنى، ثم أسقطه، فإن أبا حاتم قال: لم يسمع ابن لهيعة من عمرو بن شعيب".

ثم قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم، قالوا: إذا تزوج الرجل امرأة، ثم طلقها قبل أن يدخل بها حلّ له أن ينكح ابنتَها. وإذا تزوج الرجل الابنة، فطلّقها قبل أن يدخل بها لم يحل نكاح أمها لقوله تعالى: {وَأُمَّهَاتُ نِسَائِكُمْ} [النساء: 23] وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق.

وقد روى مالك عن غير واحد أن عبد الله بن مسعود استُفتي وهو بالكوفة عن نكاح الأم بعد الابنة إذا لم تكن الابنة مُسّت، فأرخص في ذلك، ثم إن ابن مسعود قدم المدينة فأل عن ذلك، فأخبر أنه ليس كما قال، وإنما الشرط في الربائب. فرجع ابن مسعود إلى الكوفة، فلم يصل إلى منزله حتى أتى الرجل الذي أفتاه بذلك، فأمره أن يفارق امرأته. مالك في النكاح (24).




উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: “আমি তো আপনার ভাই।” নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আপনি আল্লাহর দ্বীন ও তাঁর কিতাবের ক্ষেত্রে আমার ভাই, আর সে (আইশা) আমার জন্য হালাল।”

[এরপর হাদীসের যাচাই, বিভিন্ন সনদ ও ফিকহ বিষয়ক দীর্ঘ আলোচনা রয়েছে, যা মূল হাদীসের অংশ নয়।]









আল-জামি` আল-কামিল (6301)


6301 - عن ابن عمر أن غيلان بن سلمة الثقفي أسلم وعنده عشر نسوة، فأمره النبي صلى الله عليه وسلم أن يمسك منهن أربعًا. فلما كان زمان عمر طلقهنَّ، فأمره عمر أن يرتجعهن. وقال: لو مت لورثتهن منك، ولأمرت بقبرك يرجم كما رجم قبر أبي رغال.

حسن: رواه النسائي كما ذكره الحافظ في التلخيص (3/ 169) ولم أجده في"الكبرى" ولا في"المجتبى" كما لم يذكره أيضا ابن الملقن في"البدر المنير" ورواه الدارقطني (3/ 271) والبيهقي (7/ 183) كلهم من طريق سيف بن عبد الله الجرمي، حدثنا سرّار بن مُجشّر أبو عبيدة العنزي، عن أيوب، عن نافع وسالم، عن ابن عمر فذكره واللفظ للدارقطني.

قال الحافظ:"رجاله ثقات". وقال الدارقطني في"العلل" (13/ 124): تفرد به سيف بن عبد الله، عن سرّار".

قلت: لا يضر تفرده، فإنه ثقة كما قال البزار في مسنده، وقال الذهبي: ثّقة صالح، ووثقه ابن حبان، وأما سرّار بن مجشّر أبو عبيدة فهو أيضا ثقة من أهل البصرة.

وأما ما رواه الترمذي (1128) وابن ماجه (1953) والإمام أحمد (4631) وصحّحه ابن حبان (4156) والحاكم (2/ 192 - 193) كلهم من طريق معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه أن غيلان بن سلمة الثقفي أسلم وتحته عشرُ نسوة فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"خذ منهن أربعا" فذكر الحديث
فهو معلول. والصحيح أنه مرسل، وهم فيه معمر فجعله موصولًا لأنه حدّث في العراق من حفظه فأخطأ، وإذا روى في اليمن من كتبه لم يقع منه الوهم. وهذا مما رواه في العراق.

قال الترمذي:"هكذا رواه معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه".

وسمعت محمد بن إسماعيل يقول: هذا حديث غير محفوظ. والصحيح ما روي شُعيب بن أبي حمزة، وغيرُه عن الزهري وحمزة قال: حُدثت عن محمد بن سويد الثقفي، أن غيلان بن سلمة أسلم وعنده عشر نسوة.

قال محمد (البخاري):"وإنما حديث الزهري، عن سالم، عن أبيه أن رجلًا من ثقيف طلّق نساءه. فقال له عمر: لتراجعنّ نساءك، أو لأرجمنَّ قبرك كما رُجم قبر أبي رغال". انتهى.

ورده ابن القطان في الوهم والإيهام (3/ 500) فبعد أن ذكر وجوه العلل على الزهري قال:"وهذا عندي غير مستبعد أن يحدث به على هذه الوجوه كلها، فيعلق كل واحد من الرواة عنه منها بما تيسر له حفظه، فربما اجتمع كل ذلك عند أحدهم، أو أكثر، أو أقله".

ثم قال:"والمتحصل من هذا، هو أن هذا حديث الزهري، عن سالم، عن أبيه، من رواية معمر في قصة غيلان صحيح، ولم يعتلَّ عليه من ضعّفه بأكثر من الاختلاف على الزهري فاعلمْ ذلك. انتهى.

قال الحافظ ابن حجر في التلخيص (3/ 169) معلقا على كلام ابن القطان:"ومما يقوي نظر ابن القطان أن الإمام أحمد أخرجه في مسنده عن ابن علية ومحمد بن جعفر جميعا عن معمر بالحديثين معا. حديثه المرفوع، وحديثه الموقوف على عمر. ثم ذكر لفظ الحديث.

قلت: وهو ما أخرجه الإمام أحمد (4631) حدثنا إسماعيل ومحمد بن جعفر، قالا: حدثنا معمر، عن الزهري. قال ابن جعفر في حديثه: أخبرنا ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، أن غيلان بن سلمة الثقفي أسلم، وتحته عشر نسوة. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"اختر منهن أربعا" فلما كان في عهد عمر طلّق ناءه، وقسم ماله بين بنيه. فبلغ ذلك عمر فقال: إني لأظن الشيطان فيما يسترق من السمع، سمع بموتك، فقفزه في نفسك، ولعلك أن لا تمكث إلا قليلا. وأيم الله لتراجعن نساءك، ولتراجعن في مالك، أو لأورثهن منك، ولأمرنّ بقبرك فيرجم كما رُجم قبر أبي رغال".

قال ابن حجر: الموقوف على عمر هو الذي حكم البخاري بصحته عن الزهري، عن سالم، عن أبيه بخلاف أول القصة. كان إنكار عمر على غيلان رجوعًا منه إلى عادات أهل الجاهلية بحرمان النساء من الميراث.

تنبيه: قوله: غيلان بن سلمة. وقد وقع في اسم هذا الرجل ثلاثة أقوال.

أحدها: أنه غيلان بن سلمة المذكور.

وثانيها: عروة بن مسعود (وحديثه في البيهقي (7/ 184) وفي إسناده محمد بن عبد الله الثقفي
لم يدرك عروة.

وثالثها: مسعود بن عبد ياليل بن عمرو بن عمرو بن عبيد.

ذكره الخطيب في الأسماء المبهمة (5/ 363) وابن الملقن في"البدر المنير" (7/ 610 - 611).

ونقل عن الأثرم قال: ذكرت لأبي عبد الله هذا الحديث فقال:"ما هو صحيح، هذا حديث معمر بالبصرة، فأسنده لهم، وقد حدث بأشياء بالبصرة أخطأ فيها، والناس يهمون. وقال: سألت الإمام أحمد عن هذا الحديث فقال:"ليس بصحيح والعمل عليه". انتهى.

وقال الترمذي عقب تخريج الحديث:"والعمل على حديث غيلان بن سلمة عند أصحابنا منهم: الشافعي وأحمد وإسحاق.

وأبو رغال - بكسر الراء - كان من ثمود. وكان بالحرم حين أصاب قومه الصيحة، فلما خرج من الحرم أصابه من الهلاك ما أصاب قومه فدفن هناك. وهو بين مكة والطائف. وكان عشارا في الزمن الأول فرجم الناس قبره.

قال جرير:"إذا مات الفرزدق فارجموه كما ترجمون قبر أبي رغال".

وأما ما يروي عن عبد الله بن عمرو يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول حين خرجنا معه إلى الطائف، فمررنا بقبر فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذا قبر أبي رغال، وكان بهذا الحرم يدفع عنه، فلما خرج أصابته النقمة التي أصابت قومه بهذا المكان فدفن فيه، وآية ذلك أنه دفن معه غُصن من ذهب، إن أنتم نبشتموه أصبتموه معه" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (3088) عن يحيى بن معين، حدثنا وهب بن جرير، حدثنا أبي قال: سمعت محمد بن إسحاق يحدث عن إسماعيل بن أمية، عن بجير بن أبي بجير، قال: سمعت عبد الله بن عمرو فذكره.

وفيه محمد بن إسحاق مدلس ولم يصرح ولكنه توبع. رواه الطحاوي في مشكله (3753) والبيهقي في الدلائل (6/ 296) وفي السنن (4/ 156) كلاهما من طريق روح بن القاسم، عن إسماعيل بن أمية بإسناده فذكره.

وله متابع آخر وهو معمر، عن إسماعيل بن أمية قال: مر النبي صلى الله عليه وسلم بقبره فذكره. رواه عبد الرزاق (20989) عنه إلا أن فيه إعضالا.

ومداره على بُجير بن أبي بجير، وهو لم يوثّقه أحد غير ابن حبان (4/ 82) وقد سبقه ابن معين فقال: لم أسمع أحدا يحدث عنه غير إسماعيل بن أمية. وقال مرة: لا أدري من هو؟ لا أعرفه. لذا قال ابن حجر فيه:"مجهول" وأما المزي فقال في ترجمته:"هو حديث حسن عزيز" لعله اعتمد على توثيق ابن حبان.

وسيأتي مزيد من الكلام في أخبار الأنبياء.
وقول النبي صلى الله عليه وسلم:"اختر منهن أربعا" استدل به الجمهور على تحريم الزيادة على أربع، هو مستفاد من قوله تعالى: {مَثْنَى وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ} [النساء: 23].

والزيادة على أربع من اختصاص النبي صلى الله عليه وسلم قال الشافعي رحمه الله تعالى:"دلّت سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم المبينة عن الله أن انتهاءه إلى أربع تحريما منه، لا يجمع أحد غير النبي صلى الله عليه وسلم بين أكثر من أربع" ذكره البيهقي (7/ 139) وفي الباب أحاديث أخرى إلا أنها كلها معلولة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গাইলান ইবনু সালামাহ আস-সাকাফী ইসলাম গ্রহণ করেন, যখন তার অধীনে দশজন স্ত্রী ছিলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তাদের মধ্য থেকে চারজনকে বেছে নাও।" অতঃপর যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ এলো, তখন তিনি তার স্ত্রীদের তালাক দিলেন এবং তার সম্পদ পুত্রদের মাঝে ভাগ করে দিলেন। এই সংবাদ উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছালে তিনি বললেন: "আমার মনে হচ্ছে, নিশ্চয় শয়তান কান পেতে যে খবর শোনে, তার মাধ্যমে তোমার মৃত্যুর খবর শুনে তোমার মনে (এই ধারণা) ঢুকিয়ে দিয়েছে, আর হয়তো তুমি অল্প সময়ই বাঁচবে। আল্লাহর কসম! তুমি অবশ্যই তোমার স্ত্রীদের ফিরিয়ে নেবে এবং অবশ্যই তোমার সম্পদের মাঝে প্রত্যাবর্তন করবে, অন্যথায় আমি তাদের তোমার সম্পত্তির ওয়ারিশ বানিয়ে দেব এবং তোমার কবরকে পাথর মেরে রজম করার আদেশ দেব, যেমন আবূ রিগালের কবরকে রজম করা হয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (6302)


6302 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس لنا نساء، فقلنا: ألا نستخصي؟ فنهانا عن ذلك. ثم رخّص لنا أن ننْكح المرأة بالثوب إلى أجل. ثم قرأ عبد الله {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ} [سورة المائدة: 87].

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5075) ومسلم في النكاح (11: 1404) كلاهما من طريق إسماعيل (هو ابن أبي خالد)، عن قيس، قال: سمعت عبد الله يقول: فذكره. واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري نحوه غير أنه لم يقل:"إلى أجل".

وقيس هو ابن أبي حازم.

ومعنى الآية: إن المتعة كانت مباحة مشروعة في صدر الإسلام للسبب الذي ذكره ابن مسعود. ولكن أشار الترمذي (1122) إلى سبب آخر وهو ما رواه عن محمد بن غيلان، حدثنا سفيان بن عقبة أخر قبيصة بن عقبة، حدثنا سفيان الثوري، عن موسى بن عُبيدة، عن محمد بن كعب، عن ابن عباس قال: إنما كانت المتعة في أول الإسلام، كان الرجل يقدم البلدة، ليس له بها معرفة، فيتزوج المرأة بقدر ما يرى أنه يُقيم، فتحفظ له متاعه وتُصلح له شيئه حتى إذا نزلت الآية: {إِلَّا عَلَى أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ} [المعارج: 30] قال ابن عباس:"فكل فرج سوى هذين فهو حرام". انتهى.

ورواه البيهقي (7/ 205) من طريق موسى بن عبيدة بإسناده وجاء فيه: وتُصلح له شأنه حتى نزلت هذه الآية: {حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَاتُكُمْ} [النساء: 23] إلى آخر الآية. فنسخ الله عز وجل الأولى، فحُرمت المتعة. وتصديقها من القرآن {إِلَّا عَلَى أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ} [المعارج: 30] وما سوى ذلك من الفرج فهو حرام، ولكن إسناده ضعيف من أجل موسى بن عبيدة وهو الرَبذي ضعّفه جمهور أهل العلم.

وقال الترمذي:"إنما روي عن ابن عباس شيء من الرخصة في المتعة، ثم رجع عن قوله حيث أُخبرَ عن النبي صلى الله عليه وسلم.

وفيه دليل على أن ابن عباس رجع إلى قول الجمهور.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে যেতাম, অথচ আমাদের সাথে কোনো স্ত্রী ছিল না। তখন আমরা বললাম: আমরা কি খাসী হয়ে যাব না? তখন তিনি আমাদেরকে তা করতে নিষেধ করলেন। অতঃপর তিনি আমাদেরকে নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য কাপড়ের বিনিময়ে নারীদের বিবাহ করার অনুমতি দিলেন। এরপর আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসউদ) এই আয়াতটি পাঠ করলেন: "হে মুমিনগণ, আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না এবং সীমালঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমালঙ্ঘনকারীদের পছন্দ করেন না।" (সূরা আল-মায়িদাহ: ৮৭)।









আল-জামি` আল-কামিল (6303)


6303 - عن ابن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فتطول غُربتنا. فقلنا: ألا
نستخصي يا رسول الله، فنهانا، ثم رخص أن نتزوج المرأة إلى أجل بالشيء، ثم نهانا عنها يوم خيبر، وعن لحوم الحمر الأهلية.

صحيح: رواه عبد الرزاق (14048) عن ابن عيينة، عن إسماعيل، عن قيس، عن عبد الله بن مسعود فذكره. وإسناده صحيح.

وكان الترخيص في المتعة قبل خبير.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে যুদ্ধ করতাম, ফলে আমাদের প্রবাস দীর্ঘ হতো। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমরা কি খাসি (বন্ধ্যা) হয়ে যাব না? তিনি আমাদের তা থেকে নিষেধ করলেন। এরপর তিনি নির্দিষ্ট সময়ের জন্য কিছু বিনিময়ের মাধ্যমে নারীকে বিবাহ করার অনুমতি দিলেন। এরপর খাইবারের দিন তিনি আমাদেরকে তা (মুতা বিবাহ) এবং গৃহপালিত গাধার গোশত খেতে নিষেধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6304)


6304 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن شباب، وليس لنا نساء، فقلنا: يا رسول الله ألا نستخصي؟ فنهانا عن ذلك.

صحيح: رواه أحمد (3706) عن يزيد، حدثنا إسماعيل، عن قيس، عن ابن مسعود فذكره.

ورواه مسلم (12: 1404) عن أبي بكر بن أبي شية، حدثنا وكيع، عن إسماعيل بإسناده مثله غير أنه لم يقل فيه:"نغزو".

وقد سبق أن الترخيص كان قبل خيبر، ويدل عليه أيضا قوله:"نحن شباب" وقد يكون ذلك في غزوة بني المصطلق التي وقعت في عام خمسة من الهجرة، وفيها غنم المسلمون غنائم كثيرة وأسروا، وكانت منها جويرية بنت الحارث. فأعتقها رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتزوج بها وكان عتقها صداقُها.

ثم جاء النهي عن المتعة في غزوة خيبر كما تدل عليه أيضا الأحاديث الآتية، إلا أني لم أقف على أحد من أهل السير نص على ذلك، وقد أشار السهيلي في"الروض الأنف" إلى اختلاف تحريم نكاح المتعة فراجعه.

إلا أنه لم يأت بخبر يقين، والجمع الذي ذكره في تحريمها في غزوة خيبر لا يتفق مع الروايات الصحيحة عند الشيخين. راجع أيضا نصب الراية (3/ 178 - 179).




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যুবক অবস্থায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে অংশ নিতাম, অথচ আমাদের সাথে কোনো স্ত্রীলোক ছিল না। তখন আমরা বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা কি খাসি হয়ে যাব না? (অর্থাৎ, নিজেদের পুরুষত্বহানি ঘটাব না?) তিনি আমাদেরকে তা থেকে বারণ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6305)


6305 - عن علي بن أبي طالب، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن متعة النساء يوم خيبر، وعن أكل لحوم الحمر الإنسيّة.

متفق عليه: رواه مالك في النكاح (41) عن ابن شهاب، عن عبد الله والحسن ابْني محمد بن علي بن أبي طالب، عن أبيهما، عن علي بن أبي طالب، فذكره. ورواه البخاري في المغازي (4216)، ومسلم في النكاح (29: 1407) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

ورواه البخاري في النكاح (5115)، ومسلم (30: 1407) من طريق سفيان بن عينة، عن الزهري، به، مثله.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন নারীদের মুত‘আ (সাময়িক বিবাহ) করতে এবং গৃহপালিত গাধার মাংস খেতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6306)


6306 - عن علي بن أبي طالب أنه سمع ابن عباس يُليّن في متعة النساء. فقال: مهلًا يا ابن عباس! فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عنها يوم خيبر، وعن لحوم الحمر الأهلية.

متفق عليه: رواه مسلم في النكاح (31: 1407) عن محمد بن عبد الله بن نمير، قال: حدثنا
أبي، حدثنا عبد الله، عن ابن شهاب، عن الحسن وعبد الله ابني محمد بن علي، عن أبيهما، عن علي فذكره.

ورواه البخاري في الحيل (6961) عن يحيى، عن عبيد الله بإسناده وفيه: إن ابن عباس لا يرى بمتعة النساء بأسًا فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عنها يوم خيبر، وعن لحوم الحمر الأهلية.

قال البخاري: وقال بعض الناس: إن احتال حتى تمتع فالنكاح فاسد. وقال بعضهم: النكاح جائز، والشرط باطل.

وفي صحيح مسلم: قال علي بن أبي طالب لابن عباس: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن متعة النساء يوم خيبر. رواه يونس، عن الزهري.




আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবন আব্বাসকে মহিলাদের মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) সম্পর্কে শিথিলতা প্রদর্শন করতে শুনলেন। তখন তিনি বললেন: "হে ইবন আব্বাস, ক্ষান্ত হও! নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খায়বারের দিনে তা (মুত'আ) এবং গৃহপালিত গাধার গোশত নিষিদ্ধ করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6307)


6307 - عن علي بن أبي طالب يقول لابن عباس: إنك رجل تائه، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن متعة النساء.

صحيح: رواه الطحاوي في شرحه (3/ 24) من طريق جويرية عن مالك، عن الزهري، أن عبد الله بن محمد بن علي بن أبي طالب، والحسن بن محمد بن علي أخبراه، أن أباهما أخبرهما، أنه سمع علي بن أبي طالب يقول ذلك فذكره.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবনে আব্বাসকে বলছিলেন: আপনি একজন পথহারা (বা: ভ্রান্ত) মানুষ। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারীদের সাথে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) করতে নিষেধ করেছেন।