আল-জামি` আল-কামিল
6368 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"رسول الرجل إلى الرجل إذنه".
صحيح: رواه أبو داود (5189) والبخاري في الأدب المفرد (1076) كلاهما عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سلمة، عن حبيب وهشام، عن محمد، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده صحيح، ومحمد هو ابن سيرين. وحبيب هو ابن شهيد.
وأما ما روي عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا دُعي أحدكم إلى طعام، فجاء مع الرسول، فإن ذلك له إذن" فهو منقطع.
رواه أبو داود (5190) والبخاري في الأدب المفرد (1075) كلاهما من حديث عبد الأعلى، قال: حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أبي رافع، عن أبي هريرة فذكره.
قال أبو علي اللؤلؤي:"سمعت أبا داود يقول: قتادة لم يسمع من أبي رافع شيئا".
قلت: وقال الإمام أحمد: يدخل بينه وبين أبي رافع الحسن وخلّاسًا.
وأبو رافع هو نفيع البصري الصائغ. ثم إن قتادة مدلس، ولم يصرح بالسماع فالظاهر أنه دلّس في هذا الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "একজনের পক্ষ থেকে অন্যজনের কাছে পাঠানো দূত বা বার্তাবাহকই তার (প্রবেশের) অনুমতি।"
6369 - عن أبي هريرة أنه كان يقول:"شر الطعام طعام الوليمة، يُدعى لها الأغنياء، ويُترك المساكين، ومن لم يأت الدعوة فقد عصى اللهَ ورسولَه".
متفق عليه: رواه مالك في النكاح (50) عن ابن شهاب، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (5177) ومسلم في النكاح (197: 1432) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
وهذا الحديث موقوف على أبي هريرة، ولكن قوله آخره:"ومن لم يأت الدعوة فقد عصى الله ورسوله، ويقتضي رفعه، ولأجل ذلك أخرجه الشيخان.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: "নিকৃষ্টতম খাদ্য হলো সেই ওয়ালীমার খাদ্য, যেখানে ধনীদের দাওয়াত দেওয়া হয় এবং মিসকিনদের বাদ দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি দাওয়াতে সাড়া দেয় না, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্য হলো।"
6370 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"شرُّ الطعام طعام الوليمة، يُمنعها من يأتيها، ويدعى إليها من يأباها، ومن لم يجب الدعوة، فقد عصى الله ورسوله".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (110: 1432) عن ابن أبي عمر، حدثنا سفيان (هو ابن عيينة)،
سمعت زياد بن سعد قال: سمعت ثابتًا الأعرج، يحدّث عن أبي هريرة، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال (فذكره).
وثابت هو ابن عياض الأحنف ويلقب بالأعرج.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিকৃষ্টতম খাদ্য হলো ওলিমার (বিবাহ ভোজের) খাদ্য। যা থেকে সে ব্যক্তিকে বঞ্চিত করা হয় যে তাতে আসে (বা আসা উচিত), আর সে ব্যক্তিকে তাতে ডাকা হয় যে তাতে আসতে অস্বীকার করে (বা অনিচ্ছুক)। আর যে ব্যক্তি দাওয়াত কবুল (গ্রহণ) করলো না, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্য হলো।”
6371 - عن أنس بن مالك قال: أبصر النبيُّ صلى الله عليه وسلم نساءً وصِبيانًا مقبلين من عرس، فقام ممتنا، فقال:"اللَّهم أنتم من أحب الناس إلي".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5180) ومسلم في فضائل الصحابة (174: 2508) من طريق عبد العزيز بن صهيب، عن أنس بن مالك، قال: فذكره.
قوله:"فقام ممتنا" أي من الامتنان، فمن قام له النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأكرمه بذلك فقد امتنّ عليه بشيء لا أعظم منه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদল মহিলা ও শিশুকে দেখতে পেলেন, যারা একটি বিবাহ অনুষ্ঠান থেকে ফিরছিলেন। তখন তিনি তাদের প্রতি ভালোবাসার প্রকাশে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! তোমরা (এই লোকেরা) আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় মানুষদের অন্তর্ভুক্ত।"
6372 - عن أبي مسعود الأنصاري قال: جاء رجل من الأنصار، يكنى أبا شعيب فقال لغلام له قصّاب - وفي رواية - لحّام، اجعل لي طعامًا يكفي خمسة، فإني أريد أن أدعو النبي صلى الله عليه وسلم خامس خمسة. فإني قد عرفت في وجهه الجوع، فدعاهم، فجاء معهم رجل فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن هذا قد تبعنا، فإن شئت أن تأذنَ له، فأذن له، وإن شئت أن يرجع رجع". فقال: لا، بل قد أذنت له.
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2081) ومسلم في الأشربة (2036) كلاهما من حديث الأعمش، قال: حدثني شقيق، عن أبي مسعود الأنصار قال: فذكره.
আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসারদের মধ্য থেকে আবূ শুআইব উপনামে এক ব্যক্তি এলেন। তিনি তাঁর কাস্সাব (গোশত বিক্রেতা) গোলামকে বললেন, আমার জন্য এমন খাবার তৈরি করো যা পাঁচজনের জন্য যথেষ্ট হয়। কারণ আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পাঁচজনের মধ্যে পঞ্চম ব্যক্তি হিসেবে দাওয়াত দিতে চাই। আমি তাঁর চেহারায় ক্ষুধার ছাপ দেখতে পেয়েছি। এরপর তিনি তাঁদেরকে (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সহ) দাওয়াত দিলেন। তখন তাঁদের সাথে (অতিরিক্ত) একজন লোক এলো।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই লোকটি আমাদের সাথে এসেছে। তুমি যদি চাও যে তাকে অনুমতি দাও, তবে তাকে অনুমতি দিতে পারো। আর যদি চাও যে সে ফিরে যাক, তবে সে ফিরে যাবে।" লোকটি (আবূ শুআইব) বললেন, "না, বরং আমি তাকে অনুমতি দিয়ে দিলাম।"
6373 - عن سهل قال: لما عَرّس أبو أسيد الساعدي، دعا النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه، فما صنع لهم طعاما، ولا قرّبه إليهم إلا امرأته أمُّ أُسيد، بلّتْ تمراتٍ في تورٍ من حجارةٍ
من الليل، فلما فرغ النبي صلى الله عليه وسلم من الطعام أماثتْه له، فسَقَتْه، تُتْحِفه بذلك.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5182) ومسلم في الأشربة (87: 2006) كلاهما من طريق سعيد بن أبي مريم، حدثنا محمد أبو غسان، حدثني أبو حازم، عن سهل قال: فذكره.
قوله:"أماثته" من ماثه وأماثه - ثلاثيا رباعيا أي أَذَابته.
وقوله:"تُتْحفُه" من الإتحاف وهو إعطاء التحفة.
وذلك عند الضرورة، ويشترط فيها أن تكون متسترة ومتحجبة، لا يظهر منها شيء من الزينة، وهي محتفظة ومحتشمة، وإن استغنى عن خدمتها فهو الأفضل، لأن خدمتها للضيوف لم تكن منتشرة في عهد النبوة ولا بعدها.
সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আবূ উসাইদ আস-সা'ঈদী (তাঁর স্ত্রীকে) গ্রহণ করলেন (বিয়ে করলেন), তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণকে দাওয়াত করলেন। কিন্তু তাঁর স্ত্রী উম্মু উসাইদ ব্যতীত অন্য কেউ তাদের জন্য খাবার তৈরি করেননি এবং তাদের নিকট পরিবেশনও করেননি। তিনি পাথর নির্মিত পাত্রে রাতে কয়েকটি খেজুর ভিজিয়ে রেখেছিলেন। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাবার থেকে অবসর হলেন, তখন তিনি তা (ভিজানো খেজুরের পানীয়) গুলে নিলেন এবং তাঁকে (নবীকে) তা পান করালেন, এভাবে তিনি তাঁকে আপ্যায়ন করলেন।
6374 - عن علي قال: صنعتُ طعامًا، فدعوت النبي صلى الله عليه وسلم فجاء، فدخل فرأى سترًا، فيه تصاوير فرجع. قال: فقلت: يا رسول الله، ما رجعك بأبي أنت وأمي؟ قال:"إن في البيتِ سترًا فيه تصاوير، وإن الملائكةَ لا تدخل بيتا فيه تصاوير".
صحيح: رواه النسائي (5351) واللفظ له، وابن ماجه (3359) وأبو يعلى (436) كلهم من حديث وكيع، عن هشام الدستوائي، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن علي فذكره، وإسناده صحيح.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কিছু খাদ্য তৈরি করলাম এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাওয়াত দিলাম। তিনি আসলেন, তারপর ঘরে প্রবেশ করে একটি পর্দা দেখতে পেলেন, যাতে ছবি (বা প্রতিকৃতি) ছিল। অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোক, আপনি কেন ফিরে গেলেন? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই ঘরে এমন একটি পর্দা রয়েছে যাতে ছবি (বা প্রতিকৃতি) আছে। আর ফেরেশতারা এমন ঘরে প্রবেশ করে না যেখানে ছবি (বা প্রতিকৃতি) থাকে।"
6375 - عن سفينة أبي عبد الرحمن، أن رجلا أضاف عليّ بن أبي طالب، فصنع له طعامًا. فقالتْ فاطمةُ: لو دعونا النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأكل معنا. فدعوه فجاء، فوضع يده على عضادتي الباب، فرأى قرامًا في ناحية البيت فرجع. فقالت فاطمة لعلي: الحق فقل له: ما رجعك؟ يا رسول الله، قال:"إنه ليس لي أن أدخل بيتا مزوقا".
حسن: رواه أبو داود (3755) وابن ماجه (3360) وصحّحه ابن حبان (6345) والحاكم (2/ 186) كلهم من حديث حماد بن سلمة، قال: حدثنا سعيد بن جمهان قال: حدثنا سفينة فذكره.
وإسناده حسن من أجل سعيد بن جمهان فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.
والقرام: الستر الرقيم. والمزوق: المنقش.
সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মেহমান হলো। অতঃপর তিনি তার জন্য খাবার তৈরি করলেন। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাওয়াত দিতাম, তবে তিনি আমাদের সাথে খাবার খেতেন। এরপর তাঁরা তাঁকে দাওয়াত দিলেন। তিনি আসলেন এবং দরজার উভয় পাশে (চৌকাঠের ওপর) হাত রাখলেন। অতঃপর তিনি ঘরের এক কোণে একটি (নকশা করা) পর্দা দেখতে পেলেন এবং ফিরে গেলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তাঁর পিছু নিন এবং তাঁকে জিজ্ঞেস করুন, হে আল্লাহ্র রাসূল, কী কারণে আপনি ফিরে গেলেন? তিনি বললেন: "নকশা করা বা চিত্রিত গৃহে প্রবেশ করা আমার জন্য শোভনীয় নয়।"
6376 - عن محمد بن حاطب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فصلٌ بين الحلال والحرام: الدفُّ والصوتُ في النكاح".
حسن: رواه الترمذي (1088) والنسائي (3369) وابن ماجه (1896) وصحّحه الحاكم (2/ 184) والبيهقي (7/ 289) كلهم من حديث أبي بلْج، عن محمد بن حاطب فذكره.
قال الترمذي:"حديث محمد بن حاطب حديث حسن، وأبو بلْج اسمه يحيى بن أبي سُليم، ويقال ابن سليم أيضًا. ومحمد بن حاطب قد رأى النبي صلى الله عليه وسلم وهو غلام صغير". وقال الحاكم: صحيح الإسناد". وإسناده حسن من أجل أبي بلج فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وفي الباب ما روي عن عبد الله بن الزبير أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أَعْلنوا النكاح". رواه أحمد (1613) والبزار - كشف الأستار - (1433) والطبراني في الأوسط (5141) وابن حبان في صحيحه (4066) والحاكم (2/ 138) وعنه البيهقي (7/ 288) كلهم من حديث عبد الله بن وهب، قال: حدثني عبد الله بن الأسود القرشي، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح".
قلت: فيه عبد الله بن الأسود القرشي مجهول من رجال"التعجيل" لم يوثقه أحد، وقال أبو حاتم: شيخ، لم يرو عنه غير ابن وهب. وكذلك لم يذكر ابن حبان في ثقاته (7/ 15) من الرواة عنه غير ابن وهب.
وقال البيهقي:"تفرد به عبد الله بن الأسود عن عامر" وهو إعلال منه.
وأما معنى الحديث فقال ابن حبان: معناه: أعلنوا بشاهدين عدلين.
وقد جاء مثل هذا المعنى عن كثير من السلف.
والمعنى الآخر المتبادر هو إظهار السرور، والفرح بدون أن تكون فيه المخالفة الشرعية، مثل نصب الخيمة للضيوف، وإنارة البيت، وضرب الدفوف، ورفع الصوت نحو القول" أتيناكم أتيناكم" وأما الصوت بمعنى السماع بالأغاني المهيجة، المشتملة على وصف الجمال والفجور فلم يقل به أحد.
ولذا قال البيهقي (7/ 290):"وبعض الناس يذهب به إلى السماع. وهذا خطأ. وإنما معناه عندنا إعلان النكاح، واضطراب الصوت به، والذكر في الناس".
وأما ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أعلنوا هذا النكاح، واجعلوه في المساجد، واضربوا عليه بالدفوف" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1089) عن أحمد بن منيع، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا عيسى بن ميمون الأنصاري، عن القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب حسن في هذا الباب. وعيسى بن ميمون الأنصاري يُضعَف في الحديث. وعيسى بن ميمون الذي يروي عن ابن أبي نجيح التفسير هو ثقة". انتهى.
قلت: عيسى بن ميمون الواسطي الأنصاري قال فيه البخاري: منكر الحديث. ومن طريقه رواه أيضا البيهقي (7/ 290) وضعّفه.
ورواه ابن ماجه (1995) من وجه آخر، عن خالد بن إلياس، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن،
عن القاسم، عن عائشة بلفظ:"أعلِنُوا هذا النكاح، واضربوا عليه بالغربال" وخالد بن إلياس العدوي المدني إمام المسجد النبوي ضعيف باتفاق أهل العلم.
وفي معناه أحاديث أخرى ذكرها البيهقي وضعَّفها.
মুহাম্মাদ ইবনু হাতিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হালাল ও হারামের মধ্যে পার্থক্য হলো বিয়ের মধ্যে দফ (বাদ্যযন্ত্র) এবং শব্দ (আওয়াজ/ঘোষণা) করা।"
6377 - عن الرُّبَيع بنت معوذ بن عفراء قالت: جاء النبي صلى الله عليه وسلم فدخل حين بُنِيَ عليّ، فجلس على فراشي كمجلسك مني. فجعلتْ جويريات لنا يضربن بالدف، ويندُبْنَ من قُتِلَ من آبائي يوم بدر، إذ قالت إحداهن: وفينا نبي يعلم ما في غد.
فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"دعي هذه، وقولي بالذي كنتِ تقُولين".
صحيح: رواه البخاري في النكاح (5147) عن مسدد، حدثنا بشر بن المفضل، حدثنا خالد بن ذكوان، قال: قالت الربيع بنت معوذ فذكرته.
রুবাই’ বিনত মু’আওবিয ইবন আফরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বললেন: যখন আমার বাসর ঘর তৈরি হলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং প্রবেশ করলেন। তিনি আমার বিছানায় বসলেন, ঠিক যেমন আপনি আমার কাছে বসে আছেন। তখন আমাদের ছোট বালিকারা দফ বাজাচ্ছিল এবং বদরের দিনে আমাদের পূর্বপুরুষদের মধ্যে যারা শহীদ হয়েছিলেন, তাদের প্রশংসা করে গান গাইছিল। এমন সময় তাদের মধ্যে একজন বলে উঠল: আমাদের মধ্যে এমন এক নবী আছেন, যিনি আগামীকাল কী হবে তা জানেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই কথাটি বাদ দাও এবং তোমরা যা বলছিলে, তাই বলতে থাকো।"
6378 - عن عائشة أنها زَفّتْ امرأةً من الأنصار، فقال نبي الله صلى الله عليه وسلم:"يا عائشة، ما كان معكم من لهو، فإن الأنصار يُعجبهم اللَّهْو".
صحيح: رواه البخاري في النكاح (5162) عن الفضل بن يعقوب، حدثنا محمد بن سابق، حدثنا إسرائيل، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনসারদের) এক মহিলার বিবাহ কার্য সম্পন্ন করলেন। তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে আয়িশা! তোমাদের সাথে কি কোনো আমোদ-প্রমোদ বা বিনোদনের ব্যবস্থা ছিল না? কারণ আনসাররা আমোদ-প্রমোদ পছন্দ করে।”
6379 - عن عائشة قالت: إن النبي صلى الله عليه وسلم سمع أناسا يُغنُّون في عُرْسٍ، وهم يقولون: وأهدي لها أكبشا … تُبَحْبَحُ في المربدِ
وزوجك في المنادي … ويعلم ما في غدِ
فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يعلم ما في غد إلا الله عز وجل".
حسن: رواه الطبراني في الصغير (343) والحاكم (2/ 175 - 186) وعنه البيهقي (7/ 289) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، حدثني أبي، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عمرة، عن عائشة فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن أبي أويس فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক বিবাহের অনুষ্ঠানে কিছু লোককে গান গাইতে শুনলেন। তারা বলছিল: "তাকে ভেড়া উপহার দেওয়া হয়েছে... যা আস্তাবলে বিচরণ করে... এবং তোমার স্বামী আহ্বানকারীর কাছে আছে, আর সে জানে আগামীকাল কী হবে।" তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আগামীকাল কী ঘটবে, তা একমাত্র মহান আল্লাহ আযযা ওয়াজাল্ল ছাড়া কেউ জানে না।"
6380 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم مر ببعض المدينة فإذا هو بجوار يضرِبْنَ بدُفِّهن، ويتغنَّين ويقُلْنَ:
نحن جوارِ من بني النجار … يا حبذا محمد من جار
فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"الله يعلم إني لأحبكنَّ".
حسن: رواه ابن ماجه (1899) عن هشام بن عمار قال: حدثنا عيسى بن يونس، قال: حدثنا عوف، عن ثمامة بن عبد الله، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده حسن من أجل ثمامة بن عبد الله فإنه حسن الحديث.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনার কিছু অংশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি এমন কিছু কিশোরীকে দেখতে পেলেন যারা তাদের দফ বাজাচ্ছিল, গান গাইছিল এবং বলছিল:
"আমরা বনু নাজ্জারের বালিকা... কতই না উত্তম প্রতিবেশী এই মুহাম্মদ।"
অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ জানেন, আমি তোমাদেরকে অবশ্যই ভালোবাসি।"
6381 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعائشة:"أهديتم الجارية إلى بيتها؟". قالت نعم، قال:"فهلا بعثتم معها من يُغنين يقول:
أتيناكم أتيناكم فحيُّونا نُحيّيكم … فإن الأنصار قوم فيهم غزل"
حسن: رواه أحمد (15209) والبزار - كشف الأستار - (1432) كلاهما من حديث أجلح، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وإسناده يكون حسنا من أجل أجلح وهو ابن عبد الله بن حُجية فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث في الشواهد لولا أنه اضطرب فيه، فمرة رواه هكذا من مسند جابر، وأخرى من مسند ابن عباس كما رواه ابن ماجه (1900) عنه عن أبي الزبير، عن ابن عباس قال: أنكحتْ عائشةُ ذات قرابة لها من الأنصار. فجاء رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أهديتم الفتاة؟" ثم ذكر نحوه. وثالثة رواه عن أبي الزبير، عن جابر، عن عائشة أنها أنكحت ذا قرابة لها من الأنصار فذكرت نحوه.
وللحديث طرق أخرى وهي ما رواه الطبراني في الأوسط (3265) من طريق محمد بن أبي السري العسقلاني، أنا أبو عصام رواد بن الجراح، عن شريك بن عبد الله، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أن النبي قال:"ما فعلت فلانة؟" ليت يمة كانت عندها. فقلت: أهديناها إلى زوجها. قال: فهل بعثتم معها جارية تضربُ بالدف وتُغنّي" قالت: تقول ماذا؟ قال: تقول:
أتيناكم أتيناكم … فحيونا نحييكم
لولا الذهب الأحمر … ما حلتْ بواديكم
لولا الحبة السمراء … ما سمنتْ عذاريكم
قال الطبراني:"لم يرو عن هشام إلا شريك، ولا عنه إلا رواد، تفرد به محمد بن أبي السري".
قلت: شريك سيء الحفظ، والراوي عنه رواد بن الجراح أبو عصام مختلف فيه فضعّفه النسائي والدارقطني. ووثقه الدارمي. وقال أحمد:"صاحب سنة لا بأس به".
قلت: ولكنه اختلط بأخره فترك كما في"التقريب".
وفي مسند الإمام أحمد (26313) عن عائشة قالت: كانت في حجري جارية من الأنصار، فزوجتها قالت: فدخل عليّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يوم عُرسها، فلم يسمع لعبًا فقال:"يا عائشة إن هذا الحي من الأنصار يحبون كذا وكذا".
رواه عن يعقوب وسعد قالا: حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن
إبراهيم بن الحارث التيمي، عن إسحاق بن سهل بن أبي حثمة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وأخرجه ابن حبان في صحيحه (5875) فرواه عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، بإسناده ولفظه: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عرسها فلم يسمع غناء ولا لعبا، فقال:"يا عائشة، هل غنيتم عليها أولا تغنون؟"ثم قال: إن هذا الحيّ من الأنصار يحبون الغناء".
وفيه إسحاق بن سهل بن أبي حثمة لم يذكره أحد بالتوثيق غير ابن حبان، فإنه ذكره في:"الثقات" (4/ 22) ولم يذكر من الرواة عنه إلا محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي فهو في عداد المجهولين. ولكن مجموع هذه الطرق باختلاف مخارجها يدل على أصله، كما هو مخرج في صحيح البخاري من حديث عائشة.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, "তোমরা কি মেয়েটিকে তার বাড়িতে পৌঁছে দিয়েছ?" তিনি (আয়েশা) বললেন, "হ্যাঁ।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তবে তোমরা কেন তার সাথে এমন কাউকে পাঠাওনি যে গান গেয়ে বলবে:
'আমরা তোমাদের কাছে এসেছি, আমরা তোমাদের কাছে এসেছি,
অতএব আমাদের স্বাগত জানাও, আমরা তোমাদের স্বাগত জানাব...
কেননা আনসাররা এমন এক সম্প্রদায় যাদের মধ্যে কাব্যচর্চার প্রবণতা রয়েছে'?"
6382 - عن عامر بن سعد البجلي يقول: شهدت ثابت بن وديعة وقرظة بن كعب الأنصاري في عرس، وإذا غناء، فقلت لهما في ذلك. فقالا: إنه رُخَّصَ في الغناء في العُرس، والبكاء على الميت في غير نياحة.
صحيح: رواه أبو داود الطيالسي (1317) ومن طريقه البيهقي (7/ 289) عن شعبة، عن أبي إسحاق، قال: سمعت عامر بن سعد البجلي، يقول: فذكر الحديث.
ورواه أيضا ابن أبي شيبة (4/ 193) والحاكم (2/ 184) كلاهما من حديث شعبة بإسناده مثله. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قال البيهقي:"ورواه إسرائيل، عن أبي إسحاق".
وقلت: وكذلك رواه أيضا شريك عن أبي إسحاق.
فأما رواية إسرائيل: فرواه البيهقي (7/ 289) عن أبي إسحاق، عن عامر بن ربيعة البجلي قال: دخلت على قرظة بن كعب وأبي مسعود وذكر ثالثا، - ذَهَب عَلَيَّ - والجواري يضربن بالدف ويغنين. فقلت: تُقِرّون على هذا، وأنتم أصحابُ محمد صلى الله عليه وسلم قالوا:"إنه قد رخص في العرسات والنياحة عند المصيبة" وأما حديث شريك فرواه عنه ابن أبي شيبة (4/ 192) عن أبي إسحاق، عن عامر بن سعد قال: دخلت على أبي مسعود وقرظة بن كعب وعندهما جوار تُغَنِّين. فقلت: أتفعلون هذا؟ وأنتم أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فقال:"إنه رُخِّص لنا في اللَّهو عند العرس".
ورواه النسائي (3383) والحاكم (2/ 184) من وجه آخر عن شريك، وفيه: فقالا: إن شئت فأقِمْ معنا، وإن شئتَ فاذهبْ، فإنه رُخِّص لنا في اللَّهو عند العُرس، وفي البكاء عند المصيبة.
قال شريك:"أُراه قال: في غير نوح" انتهى. وذكره البيهقي ملخصا وشريك هو ابن عبد الله سيء الحفظ، ولكنه توبع كما رأيت.
وفي الباب ما رُوي عن زوج ابنة أبي لهب قال: دخل علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حين تزوجت ابنة أبي لهب فقال:"هل من لهو؟".
رواه أحمد (16626) والطبراني (24/ 258) كلاهما من حديث الزبيري، قال: حدثنا إسرائيل، عن سماك، عن معبد بن قيس، عن عبد الله بن عُمير أو عَمِيرة، قال: حدثني زوج ابنة أبي لهب فذكره.
ومعبد بن قيس، وشيخه عبد الله بن عُمير مجهولان، والزبيري هو أبو أحمد محمد بن عبد الله بن الزبير الأسدي.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 289): فيه معبد بن قيس لم أعرفه.
وأما ما روي عن شيخ شهدَ أبا وائل في وليمة، فجعلوا يَلعبون يُغنون، فحلِّ أبو وائل حُبْوتَه وقال: سمعت عبد الله يقول: سمعت رسول صلى الله عليه وسلم الله يقول:"إن الغناء يُنبت النفاق في القلب" فهو ضعيف.
رواه أبو داود (4927) عن مسلم بن إبراهيم، قال: حدثنا سلّام بن مسكين، عن شيخ فذكره. وإسناده ضعيف من جهالة هذا الشيخ.
وقد رُوي بإسناد آخر: إلا أنه موقوف على عبد الله بن مسعود.
رواه المروزي في تعظيم قدر الصلاة (680) والبيهقي (10/ 223).
كلاهما من طرق عن غندر، عن شعبة، عن الحكم، عن حماد، عن إبراهيم، عن عبد الله بن مسعود. ورجاله ثقات.
وذكره الديلمي في الفردوس (4319) من حديث أنس بن مالك مرفوعا:"الغناء واللَّهوُ يُنبتان في القلب النفاق، كما ينبت الماء العشب، والذي نفسي بيده إن القرآن والذكر يُنبتان الإيمان في القلب، كما يُنبت الماءُ العشبَ" وأورده السخاوي في المقاصد الحسنة (731) وقال:"لا يصح كما قاله النووي".
فقه هذا الباب:
قال سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله تعالى: يستحب ضرب الدف في النكاح للنساء خاصة لإعلانه، والتمييز بينه وبين السفاح، ولا بأس بأغاني النساء فيما بينهن مع الدف، إذا كانت تلك الأغاني ليس فيها تشجيع على منكر، ولا تثبيط عن واجب، ويشترط أن يكون ذلك فيما بينهن من غير مخالطة للرجال.
وأما اللعب واللَّهْو للرجال فقال رحمه الله: الرجال وحدهم إذا كان بالسلاح والرمي، أو بالأشعار العربية، وأما الطبول فلا، أو بالأغاني المنكرة".
انظر: الاختيارات الفقهية له (ص 490 - 491).
وأما رقص النساء فقد سئل فضيلة الشيخ صالح الفوزان عن ذلك فقال:"لا بأس برقص النساء بمناسبة الزواج وضربهن بالدف مع شيء من الغناء النزيه؛ لأن هذا من إعلان الزواج المأمور به شرعا، لكن بشرط أن يكون ذلك في محيط النساء فقط، وبصوت لا يرتفع ولا يتجاوز مكانهن،
وبشرط التستر الكامل بحيث لا يبدو شيء من عورة المرأة في حالة الرقص كسيقانها وذراعيها وعضديها، وإنما يبدو منها ما جرت عادة المرأة المسلمة بكشفه بحضرة النساء".
قلت: ليس المراد بالرقص هنا الرقص المعهود في الأفلام وإنما المقصود منه تحريك النساء الأيدي والأجسام، وخاصة عند حضور العرس، وإخراج الأصوات الخاصة بهذه المناسبة إظهارا للفرح والسرور مع الالتزام بالآداب الشرعية.
আমের ইবনু সা'দ আল-বাজালী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একটি বিয়ের অনুষ্ঠানে সাবিত ইবনু ওয়াদী‘আ এবং কুরযাহ ইবনু কা‘ব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেলাম। সেখানে গান হচ্ছিল। আমি এ বিষয়ে তাঁদের জিজ্ঞেস করলে তাঁরা দুজন বললেন: নিশ্চয়ই বিয়ের অনুষ্ঠানে গান গাওয়ার এবং মাইয়্যেতের জন্য মাতম (নিইয়াহাহ) না করে কাঁদার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।
6383 - عن عقبة بن عامر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والدخولَ على النساء". فقال رجل من الأنصار: يا رسول الله، أفرأيت الحموُ؟ قال:"الحموُ موتٌ".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5232) ومسلم في السلام (2172) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره.
والحَمْوُ: على وزن الدَلْو، قال النووي:"والمراد بالحمو هنا أقارب الزوج غير آبائه وأبنائه، فأما الآباء والأبناء فمحارم لزوجته، تجوز لهم الخلوة بها ولا يوصفون بالموت، وإنما المراد هو: الأخ وابن الأخ والعم وابنه ونحوهم ممن ليس بمحرم". اهـ.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মহিলাদের নিকট প্রবেশ করা থেকে বিরত থাকো।" তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'হামউ' (স্বামীর নিকটাত্মীয় পুরুষদের) সম্পর্কে আপনার কী নির্দেশ? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হামউ হলো মৃত্যুস্বরূপ।"
6384 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا لا يبيتنَّ رجل عند امرأة ثيب، إلا أن يكون ناكحًا، أو ذو محرم".
صحيح: رواه مسلم في السلام (2171) من طريق هُشيم، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكره.
وأما ما روي عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تلجوا على المغيبّات، فإن الشيطان يجري من أحدكم مجرى الدم" قلنا: ومنك؟ قال:"ومني، ولكن الله أعانني عليه فأسلم". فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1172) عن نصر بن علي قال: حدثنا عيسى بن يونس، عن مجالد، عن الشعبي، عن جابر فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث غريب من هذا الوجه، وقد تكلم بعضهم في مجالد بن سعيد من قبل حفظه". وسمعت علي بن خشرم يقول: قال سفيان بن عيينة في تفسير قول النبي صلى الله عليه وسلم:"ولكن الله أعانني عليه فأسلم" يعني أسلم أنا منه.
قال سفيان:"والشيطان لا يسلم".
وقوله:"ولا تلجوا على المغيبّات" والمغيبة: المرأة التي يكون زوجها غائبا. والمغيبات جماعة المغيبة. انتهى كلام الترمذي.
ولكن يرد هذا المعنى الذي ذكره سفيان حديث عبد الله بن مسعود وهو الآتي.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাবধান! কোনো পুরুষ যেন কোনো সধবা (পূর্বে বিবাহিতা) মহিলার কাছে রাত্রি যাপন না করে, যদি না সে তার স্বামী হয় অথবা (তার) মাহরাম হয়।
6385 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما منكم من أحد إلا وقد وُكِّل به قرينُه من الجن".
قالوا: وإياك يا رسول الله؟ قال:"وإياي إلا أن الله أعانني عليه فأسلم فلا يأمرني إلا بخير".
صحيح: رواه مسلم في صفة القيامة (2114) من طرق عن جرير، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
فقوله:"أسلم" من الإسلام دون السلامة هذا الذي فسّر به جمهور العلماء هذا الحديث إلا سفيان بن عيينة فإن فسره بقوله: أسلم - أي أجد منه السلامة - يعني أن النبي صلى الله عليه وسلم سالم من أن يجري الشيطان فيه مجرى الدم، وهذا لا يشاركه فيه غيره.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের এমন কেউ নেই, যার সাথে জিন্নদের মধ্য থেকে তার সহচর (কারীন) নিযুক্ত করা হয়নি।
সাহাবীরা জিজ্ঞেস করলেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনার সাথেও কি?
তিনি বললেন: আমার সাথেও (নিযুক্ত করা হয়েছে)। তবে আল্লাহ আমাকে তার বিরুদ্ধে সাহায্য করেছেন, ফলে সে ইসলাম গ্রহণ করেছে। তাই সে আমাকে কেবল ভালোর নির্দেশই দেয়।
6386 - عن ابن عباس يقول: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"ألا لا يخلونَّ رجل بامرأة، إلَّا ومعها ذو محرم".
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1341) والبخاري في الجهاد (3006) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، حدثنا عمرو بن دينار، عن أبي معبد، قال: سمعت ابن عباس يقول: فذكره في حديث أطول من هذا، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “সাবধান! কোনো পুরুষ যেন কোনো নারীর সাথে নির্জনে অবশ্যই না থাকে, তবে তার সাথে তার কোনো মাহরাম থাকলে ভিন্ন কথা।”
6387 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أن نفرا من بني هاشم دخلوا على أسماء بنت عميس، فدخل أبو بكر الصديق، وهي تحته يومئذ، فرآهم. فكره ذلك. فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم وقال: لم أر إلا خيرًا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إن الله قد برأها من ذلك. ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فقال:"لا يدخلٌ رجل بعد يومي هذا على مغيبة إلا ومعه رجل أو اثنان".
صحيح: رواه مسلم في السلام (2173) من طرق عن عمرو بن الحارث أن بكر بن سوادة حدّثه، أن عبد الرحمن بن جبر حدثه أن عبد الله بن عمرو بن العاص حدثه فذكر الحديث.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু হাশিমের একদল লোক আসমা বিনত উমাইসের নিকট প্রবেশ করল। ঐ দিন আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে প্রবেশ করলেন— যখন তিনি (আসমা) তার স্ত্রী ছিলেন— এবং তাদেরকে দেখলেন। তিনি এটা অপছন্দ করলেন। এরপর তিনি বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন এবং বললেন, "আমি তো কোনো খারাপ কিছু দেখিনি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাকে (আসমাকে) তা থেকে মুক্ত ঘোষণা করেছেন।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে দাঁড়িয়ে বললেন, "আজকের দিনের পর থেকে কোনো পুরুষ যেন এমন কোনো স্ত্রীর নিকট প্রবেশ না করে, যার স্বামী অনুপস্থিত, তবে তার সাথে একজন কিংবা দুজন লোক থাকলে ভিন্ন কথা।"
