আল-জামি` আল-কামিল
6388 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيما امرأةٍ نكحت على صداقٍ أو جِباء، أو عِدة قبل عصمة النكاح فهو لها، وما كان بعد عصمة النكاح فهو لمن أُعطيه، وأحق ما أُكرِمَ عليه الرجلُ ابنتُه أو أختُه".
حسن: رواه أبو داود (2129) وابن ماجه (1955) والنسائي (3353) وأحمد (6709) كلهم من حديث ابن جريج، قال: قال عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
قال البخاري وغيره:"ابن جريج لم يسمع من عمرو بن شعيب".
لكن تابعه الحجاج بن أرطاة فرواه عن عمرو بن شعيب بإسناده ولفظه:"ما استحل به فرج المرأة من مهر أو عدة فهي لها، وما أكرم به أبوها أو أخوها أو وليها بعد عقدة النكاح فهو له، وأحقُّ ما أُكرِمَ الرجلُ به ابنتُه أو أختُه". رواه البيهقي (7/ 248) والحجاج بن أرطاة فيه كلام. ولكن بمجموع الإسنادين يصير الحديث حسنا.
وأما المعنى فقال بعض أهل العلم: يُحمل هذا الحديث على أن الولي لو اشترط لنفسه مالًا سوى المهر فهو له، وأما المهر فهو حق للمرأة، وقد رُوي عن علي بن حسين أنه زوّج ابنتَه رجلًا، واشترط لنفسه عشرةَ آلاف درهم.
ومن العادات والعُرف تبادل الهدايا بين الطرفين، وهو إن لم يكن من الشروط الفاسدة فلا حرجَ في ذلك. ومنه تجهيزُ الرجل ابنتَه من الأسرّة، والأواني المنزلية، وغيرها كما جاء في الحديث الآتي.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে কোনো নারী মোহরের বিনিময়ে, অথবা (মোহর ব্যতিরেকে অন্য) কোনো উপঢৌকন কিংবা শর্তের বিনিময়ে বিবাহ করে, যা বিবাহের বন্ধন সম্পন্ন হওয়ার আগে নির্ধারণ করা হয়, তবে তা তার (মহিলার) প্রাপ্য। আর যা বিবাহের বন্ধন সম্পন্ন হওয়ার পরে (উপহার হিসেবে) দেওয়া হয়, তা তাকেই দেওয়া হয়, যে তা গ্রহণ করে। আর পুরুষ যার উপর সম্মান লাভের অধিক উপযুক্ত, তারা হলো তার কন্যা অথবা বোন।”
6389 - عن علي قال: جهّز رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فاطمةَ في خَميل، وقربة، ووِسادة أدم، حشوها ليف الإذخر.
صحيح: رواه النسائي (3384) وأحمد (643) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن زائدة بن قدامة، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن علي فذكره.
وإسناده صحيح غير أن عطاء بن السائب ممن اختلط في آخر حياته. فقال الإمام أحمد:"هو ثقة، رجل صالح من سمع منه قديما فسماعه صحيح، ومن سمع منه حديثا فسماعه ليس بشيء". فذكر أن شعبة وسفيان ممن سمع منه قديمًا.
وقال غير واحد من أهل العلم:"فما رواه عنه المتقدمون فهو صحيح: مثل سفيان، وشعبة، وزهير، وزائدة، وحماد بن زيد، وأيوب".
قال الحافظ ابن حجر:"فيحصل لنا من مجموع كلامهم أن سماع سفيان الثوري، وشعبة، وزهير، وحماد بن زيد، وأيوب، عنه صحيح، وما عداهم يتوقف فيه".
وأمَّا أبوه فهو السائب بن مالك أبو يحيى، ويقال: أبو كثير وثَّقَه يحيى بن معين، والعجلي، وابن حبان.
وقال ابن أبي حاتم في المراسيل (106):"قال أبي: السائب بن مالك ليست له صحبة". يعني والد عطاء بن السائب.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমার জন্য একটি পশমের চাদর (খামিল), একটি মশক (চামড়ার পানির পাত্র) এবং চামড়ার একটি বালিশের ব্যবস্থা করলেন, যার ভেতরে ইযখির ঘাসের আঁশ ভরা ছিল।
6390 - عن جابر قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: هل لكم أنماط؟". قلت: وأنى يكون
لنا الأنماط؟ قال:"أما أنه سيكون لكم الأنماط".
قال جابر: فأنا أقول لها - يعني امرأته - أخِّري عني أنماطكِ، فتقول: ألم يقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنها ستكونُ لكم الأنماط؟" فأدعُها.
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3631) ومسلم في اللباس (2083) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا سفيان، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره. واللفظ للبخاري.
وأما مسلم فأحال على ما قبله.
وقوله:"الأنماط": هو ضرب من البسط له حَمْل رقيق، يستعمل في الغالب في ليلة الزفاف، وفي الليالي التي تليها لاستقبال العروس.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন, "তোমাদের কি কোনো নমাট (পশমী চাদর বা গালিচা) আছে?" আমি বললাম, "আমাদের আবার নমাট কোথা থেকে আসবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সাবধান! নিশ্চয় তোমাদের নমাট হবে।"
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমি আমার স্ত্রীকে বলি—(অর্থাৎ আমার স্ত্রীকে উদ্দেশ্য করে বলি)—তোমার নমাটগুলো আমার কাছ থেকে দূরে সরিয়ে রাখো। তখন সে বলে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি বলেননি, "তোমাদের অবশ্যই নমাট হবে?" তখন আমি তাকে ছেড়ে দিই।
6391 - عن * *
৬৩৯১ - থেকে * *
6392 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من خبب امرأة على زوجها، أو عبدًا على سيده".
صحيح: رواه أبو داود (2175) وأحمد (9157) وصححه ابن حبان (568، 5560) والحاكم (2/ 196) والبيهقي (8/ 13) كلهم من طريق عمار بن رزيق، عن عبد الله بن عيسى، عن عكرمة، عن يحيى بن يعمر، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.
وقوله:"خبّب" معناه: أفسد، وخدع، وقد جاء بلفظ"أفسد" في بعض الروايات الأخرى.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো নারীকে তার স্বামীর বিরুদ্ধে খেপিয়ে তোলে, অথবা কোনো গোলামকে তার মনিবের বিরুদ্ধে খেপিয়ে তোলে, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।”
6393 - عن بريدة بن حصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من حلف بالأمانة، ومن خبّب على امرئ زوجته، أو مملوكهـ".
صحيح: رواه أبو داود (3253) وأحمد (22980) وصححه ابن حبان (4363) والحاكم (4/ 298) والبيهقي (10/ 30) كلهم من حديث الوليد بن ثعلبة الطائي، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
واقتصر أبو داود على قوله:"من حلف بالأمانة فليس منا" مع أنه رواه من حديث زهير بن معاوية، وهو ممن روى الحديث باللفظ المذكور كاملا. ومن طريقه رواه البيهقي كما ذكر أعلاه.
فلعل أبا داود لم يسمع من شيخه أحمد بن يونس، عن زهير بن معاوية إلا هذا الجزء، ولذا أخرجه في كتاب الأيمان والنذور.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: وهو كما قال، الوليد بن ثعلبة، وثقه ابن معين وابن حبان وهو من رجال السنن.
وفي الباب عن ابن عمر وابن عباس وغيرهما، إلا أن الصحيح منها ما ذكرته.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আমানতের নামে শপথ করে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়। আর যে ব্যক্তি কোনো লোকের বিরুদ্ধে তার স্ত্রীকে অথবা তার দাসকে উত্তেজিত করে (বা নষ্ট করে দেয়), সেও (আমাদের দলভুক্ত নয়)।”
6394 - عن عبد الله بن عمر قال: كانت تحتي امرأة، وكنت أحبها، وكان عمر يكرهها، فقال لي: طلِّقْها، فأبيتُ، فأتى عمر رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"طلِّقها".
وفي رواية:"أطعْ أباك".
حسن: رواه أبو داود (5138) والترمذي (1189) وابن ماجه (2088) وأحمد (4711)
وصحّحه ابن حبان (426) والحاكم (2/ 197، 4/ 152) كلهم من حديث ابن أبي ذئب، عن خاله الحارث بن عبد الرحمن، عن حمزة بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحارث بن عبد الرحمن، وهو القرشي العامري خال ابن أبي ذئب حسن الحديث.
قال الترمذي:"حسن صحيح، إنما نعرفه من حديث ابن أبي ذئب".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার অধীনে একজন স্ত্রী ছিল এবং আমি তাকে ভালোবাসতাম, কিন্তু (আমার পিতা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে অপছন্দ করতেন। তিনি আমাকে বললেন: তাকে তালাক দাও। কিন্তু আমি (তা করতে) অস্বীকার করলাম। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বিষয়টি তাঁর কাছে বললেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে তালাক দাও।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমার পিতার আনুগত্য করো।"
6395 - عن أبي الدرداء أن رجلا أتاه فقال: إن لي امرأة، وإن أمي تأمرني بطلاقها.
قال أبو الدرداء: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الوالد أوسط أبواب الجنة، فإن شئت فأضِعْ ذلك البابَ، أو احفظْه".
صحيح: رواه الترمذي (1900) وأحمد (27511) والحاكم (4/ 152) كلهم من طريق سفيان بن عيينة، عن عطاء بن السائب، عن أبي عبد الرحمن السلمي عن أبي الدرداء فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث صحيح".
قلت: إسناده صحيح. وعطاء بن السائب مختلط إلا أن سماع سفيان بن عيينة كان قبل الاختلاط. وتابعه أيضًا شعبة وهو ممن سمع منه قبل الاختلاط. ومن طريقه رواه ابن ماجه (2089) وأحمد (21617) والحاكم (4/ 152) وفيه أن رجلا أمره أبوه أو أمه، أو كلاهما أن يطلق امرأته.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد"، وزاد الذهبي فقال:"على شرط مسلم".
قلت: لكن محمد بن عثمان بن أبي شيبة ليس من رجال مسلم، بل ليس من رجال الستة، وإنما من أقران مسلم وأبي داود وغيرهما، ثم هو ممن كذبه أحمد، وقال ابن خراش:"كان يضع الحديث". فكيف يقبل منه مخالفة أبي داود الذي رواه مرسلا بدون ذكر ابن عمر.
وإليه أشار البيهقي بقوله: ولا أراه حفظه.
وقد رواه مرصولًا أيضًا محمد بن خالد الوهبي، عن معرف بن واصل، عن محارب بن دثار، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أبغض الحلال إلى الله عز وجل الطلاق".
رواه أبو داود (2178) عن كثير بن عبيد، حدّثنا محمد بن خالد فذكره. ومحمد بن خالد وإن كان ثقة وثّقه الدارقطني وغيره، إلا أنه خالف ثلاث ثقات وهم أحمد بن عبد الله بن يونس، ووكيع بن الجراح، ويحيى بن بكير فكل هؤلاء رووه عن محارب بن دثار مرسلا.
وقد سئل أبو حاتم عن حديث رواه محمد بن خالد الوهبي، عن الوضاح، عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وعن محمد بن خالد الوهبي، عن معرف بن واصل، عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إنما هو محارب عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسل. علل الحديث (1/ 431).
وقد تبيّن من هذا أن محمد بن خالد الوهبي مع مخالفته الثقات، قد اضطرب فيه فمرة رواه عن معرف بن واصل كما مضى، وأخرى عن الوضاح، وثالثة عن عبيد الله بن الوليد الصافي، وهو عند ابن ماجه (2018) كل هؤلاء عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث.
وعبيد الله بن الوليد الصافي ضعيف.
ولذا رجح كونه مرسلا مع أبي حاتم الدارقطني في العلل (1/ 431) والبيهقي وغيرهم، والله تعالى أعلم بالصواب.
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن شهر بن حوشب مرفوعًا:"إن الله لا يحب كل ذواق من الرجال، ولا كل ذواقة من النساء" رواه ابن أبي شيبة (19536) عن محمد بن فضيل، عن ليث، عن شهر بن حوشب قال: تزوج رجل امرأة على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، فطلقها، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"طلقتها" قال: نعم، قال:"من بأس؟" قال: لا، يا رسول الله، ثم تزوج أخرى ثم طلقها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"طلقتها؟" قال: نعم، قال: لمن بأس؟ قال: لا، يا رسول الله، ثم تزوج أخرى ثم طلقها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"طلقتها؟" قال: نعم، قال:"من بأس؟" قال: لا، يا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم في الثالثة:"إن الله لا يحب كل ذواق من الرجال، ولا كل ذواقة من النساء".
وفيه ليث وهو ابن أبي سُليم سيء الحفظ، وشهر بن حوشب فيه كلام معروف، ثم هو مرسل، وقد روي موصولا بذكر أبي هريرة ولا يصح كما رُوي نحوه عن أبي موسى. رواه البزار - كشف
الأستار - (2/ 192) من ثلاثة أوجه وكلها ضعيفة. وقد سأل عبد الرحمن بن أبي حاتم، عن حديث أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تطلقوا النساء إلا عن ريبة؛ فإن الله تعالى يَكرهُ الذواقين والذواقات".
قال: قال أبي:"عبادة بن نُسَي، عن أبي موسى لا يجيء". العلل (128
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বলল: আমার স্ত্রী আছে, কিন্তু আমার মা আমাকে তাকে তালাক দিতে আদেশ করছেন। আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "পিতা-মাতা জান্নাতের দরজাসমূহের মধ্যম দরজা। সুতরাং তুমি যদি চাও, তবে সেই দরজা নষ্ট করে ফেলো, অথবা তা রক্ষা করো।"
6396 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن إبليس يضع عرشه على الماء، ثم يبعث سراياه، فأدناهم منه منزلة أعظمهم فتنة. يجيء أحدهم فيقول: فعلت كذا وكذا. فيقول: ما صنعت شيئًا. قال: ثم يجيء أحدهم فيقول: ما تركته حتى فَرَّقْتُ بينه وبين امرأته. قال: فيدنيه منه، ويقول: نِعْمَ أنت".
صحيح: رواه مسلم في صفة القيامة (2812/ 67) من طرق عن أبي معاوية، حدّثنا الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় ইবলিস তার আরশ পানির উপর স্থাপন করে, তারপর সে তার বাহিনীসমূহ প্রেরণ করে। তাদের মধ্যে যে ফিতনা সৃষ্টিতে সবচেয়ে বড়, পদমর্যাদায় সে তার নিকটবর্তী। তাদের একজন এসে বলে: আমি এমন এমন কাজ করেছি। সে (ইবলিস) বলে: তুমি কিছুই করোনি। অতঃপর অন্য একজন এসে বলে: আমি তাকে ততক্ষণ পর্যন্ত ছাড়িনি, যতক্ষণ না তার ও তার স্ত্রীর মাঝে বিচ্ছেদ ঘটিয়েছি। তখন সে (ইবলিস) তাকে তার নিকটবর্তী করে এবং বলে: তুমিই উত্তম কাজ করেছ।"
6397 - عن نافع، إن عبد الله بن عمر طلق امرأته وهي حائض على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. فسأل عمر بن الخطاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مره فليراجعها، ثم يمسكها حتى تطهر، ثم تحيض، ثم تطهر، ثم إن شاء أمسك بعد وإن شاء طلّق قبل أن يمسّ، فتلك العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء".
متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (53) عن نافع، به.
ورواه البخاري في الطلاق (5251)، ومسلم في الطلاق (1: 1417) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم أيضًا من طريق الليث بن سعد، عن نافع، عن عبد الله أنه طلق امرأة له وهي حائض تطليقة واحدة، فأمره رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يراجعها، ثم يمسكها حتى تطهر، ثم تحيض عنده حيضة أخرى. ثم يمهلها حتى تطهر من حيضتها، فإن أراد أن يطلقها فليطلقها حين تطهر من قبل أن يجامعها، فتلك العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء.
وكذلك رواه مسلم أيضًا من طريق عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر قال: طلقت امرأتي على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وهي حائض، فذكر ذلك عمر لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"مُرْهُ فليراجعها، ثم لدعها حتى تطهر، ثم تحيض حيضة أخرى، فإذا طهرت فليطلقها قبل أن يجامعها، أو يمسكها، فإنها العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء".
وكذلك رواه أيوب، عن نافع، أن ابن عمر طلق امرأته وهي حائض، فسأل عمر النبي صلى الله عليه وسلم فأمره أن يراجعها، ثم يمهلها حتى تحيض حيضة أخرى، ثم يمهلها حتى تطهرَ، ثم يطلقها قبل أن يمسها. فتلك العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء. رواه مسلم.
আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে তাঁর স্ত্রীকে হায়িয অবস্থায় তালাক দিয়েছিলেন। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে তার স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেয় (রুজু করে), অতঃপর তাকে নিজের কাছে রেখে দেয় যতক্ষণ না সে পবিত্র হয়, অতঃপর আবার তার হায়িয হয়, অতঃপর সে আবার পবিত্র হয়। এরপর যদি সে চায় তবে তাকে রেখে দেবে, আর যদি চায় তবে সহবাস করার পূর্বে তাকে তালাক দেবে। এটাই হলো সেই ইদ্দত, যার ভিত্তিতে আল্লাহ্ নারীদেরকে তালাক দিতে আদেশ করেছেন।"
6398 - عن سالم بن عبد الله أن عبد الله بن عمر قال: طلّقت امرأتي وهي حائض. فذكر ذلك عمر للنبي صلى الله عليه وسلم، فتغيظ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم قال:"مره فليراجعها حتى تحيض حيضة أخرى مستقبلة، سوى حيضتها التي طلقها فيها، فإن بدا له أن يطلقها، فليطلقها طاهرًا من حيضتها قبل أن يمسها، فذلك الطلاق للعدة كما أمر الله" وكان عبد الله طلقها تطليقة واحدة، فحسبت من طلاقها، وراجعها عبد الله كما أمره رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4908)، ومسلم في الطلاق (4: 1471) كلاهما من طريق الزّهريّ، قال: أخبرني سالم به، فذكره.
واللفظ لمسلم، وليس عند البخاري قوله:"وكان عبد الله … الخ".
ورواية سالم بن عبد الله موافقة لرواية نافع.
ولكن رواه غير الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر أنه طلق امرأته وهي حائض فذكر ذلك عمر للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"مره فليراجعها، ثم يطلقها طاهرا أو حاملا" رواه مسلم من حديث محمد بن عبد الرحمن (مولى آل طلحة) عن سالم فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার স্ত্রীকে ঋতুস্রাবকালীন অবস্থায় তালাক দিয়েছিলাম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন, অতঃপর বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে তাকে ফিরিয়ে নেয়, যতক্ষণ না সে অন্য একটি ঋতুস্রাবে উপনীত হয়—যে ঋতুস্রাবে সে তাকে তালাক দিয়েছে, তা ছাড়া। এরপর যদি তার মনে চায় যে, সে তাকে তালাক দেবে, তাহলে যেন সে ঋতুস্রাব থেকে পবিত্র হওয়ার পর তাকে স্পর্শ করার পূর্বে তালাক দেয়। এই হলো সেই তালাক, যা আল্লাহ্র নির্দেশ মোতাবেক ইদ্দতের জন্য (গ্রহণযোগ্য)।" আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে একটি তালাক দিয়েছিলেন এবং সেটা তার তালাকের হিসাবে গণ্য করা হয়েছিল। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নির্দেশ অনুযায়ী তাকে ফিরিয়ে নিলেন।
6399 - عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر أنه طلق امرأته وهي حائض فسأل عمر عن ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"مره فليراجعها حتى تطهر، ثم تحيض، ثم تطهر، ثم يطلق بعد أو يمسك".
صحيح: رواه مسلم (6: 1471) عن أحمد بن عثمان بن حكيم الأودي، حدّثنا خالد بن مخلد، حدثني سليمان (هو ابن بلال) حدثني عبد الله بن دينار فذكره.
الوجه الثاني: إنه أمر بمراجعتها. فإذا طهرت فليطلقها لطهرها.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর স্ত্রীকে হায়েয (ঋতু) অবস্থায় তালাক দিয়েছিলেন। ফলে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে নির্দেশ দাও, যেন সে তার স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেয় (রুজু করে) যতক্ষণ না সে পবিত্র হয়, এরপর সে আবার ঋতুমতী হয়, তারপর আবার পবিত্র হয়। এরপর সে চাইলে তালাক দিতে পারে অথবা (স্ত্রী হিসেবে) রেখে দিতে পারে।"
6400 - عن أنس بن سيرين قال: سألت ابن عمر عن امرأته التي طلق. فقال: طلقتها وهي حائض، فذُكر ذلك لعمر، فذكره للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"مره فليراجعها، فإذا طهرت فليطلقها لطهرها" قال: فراجعتها ثم طلقتها لطهرها، قلت: فاعتددت بتلك التطليقة التي طلقت وهي حائض؟ قال: ما لي لا أعتد بها؟ وإن كنت عجزت واستحمقت".
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5252) ومسلم في الطلاق (12: 1471) كلاهما من طريق شعبة، عن أنس بن سيرين فذكره.
واللفظ لمسلم. وأما البخاري فاقتصر على لفظ:"ليراجعها. قلت: تحتسب؟ قال:"فمه" وعن قتادة، عن يونس بن جبير، عن ابن عمر. قال:"فمره فليراجعها" قلت: نحتسب؟ قال:"أرأيت إن عجز واستحمق".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাস ইবনু সীরীন বলেন: আমি তাঁকে (ইবনু উমরকে) তাঁর তালাক দেওয়া স্ত্রী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: আমি তাকে ঋতু অবস্থায় তালাক দিয়েছিলাম। বিষয়টি (আমার পিতা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করা হলো, অতঃপর তিনি তা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে তাকে ফিরিয়ে নেয় (রুযু' করে)। এরপর যখন সে পবিত্র হবে, তখন সে যেন পবিত্র অবস্থায় তাকে তালাক দেয়।" তিনি (ইবনু উমর) বললেন: আমি তাকে ফিরিয়ে নিলাম, এরপর পবিত্র অবস্থায় তাকে তালাক দিলাম। আমি (আনাস) জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি ওই তালাককে গণনা করেছিলেন, যা আপনি তাকে ঋতু অবস্থায় দিয়েছিলেন? তিনি বললেন: কেন আমি তা গণনা করব না? যদিও আমি ভুল করেছিলাম এবং বোকামি করেছিলাম।
6401 - عن أبي الزبير أنه سمع عبد الله بن عبد الرحمن بن أيمن مولى عزة يسأل ابن عمر - وأبو الزبير يسمع ذلك -: كيف ترى في رجل طلق امرأته حائضًا؟ فقال: طلق ابن عمر امرأته وهي حائض على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأل عمر رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إن عبد الله بن عمر طلق امرأته وهي حائض، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليراجعها" فردها وقال:"إذا طهرت فليطلق أو ليمسك".
قال ابن عمر: وقرأ النبي صلى الله عليه وسلم: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ} [الطلاق: 1].
صحيح: رواه مسلم في الطلاق (14: 1471) عن هارون بن عبد الله، حدّثنا حجاج بن محمد، قال: قال ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، به، فذكره.
ثم رواه مسلم من طريق عبد الرزاق - وهو في مصنفه (10960) - أخبرنا ابن جريج، أخبرني، أبو الزبير، أنه سمع عبد الرحمن بن أيمن (مولى عروة) يسأل ابن عمر، وأبو الزبير يسمع بمثل حديث حجاج. وفيه بعض الزيادات.
ولم يُشر مسلم إلى هذه الزيادة، وهي كما في مصنف عبد الرزاق:"فردّها ولم يرها شيئًا" وكذلك رواه الإمام أحمد (5524) عن روح، عن ابن جريج، بهذه الزيادة، وعدم ذكر مسلم هذه الزيادة إعلال منه، فالظاهر أنه اختلف على أبي الزبير في هذه الزيادة. فرواه حجاج بن محمد، عن ابن جريج، عنه بدون هذه الزيادة.
ورواه عبد الرزاق، عن ابن جريج عنه بهذه الزيادة، وتابعه عليه روح بن عبادة عند الإمام أحمد.
والعلماء أنكروا على أبي الزبير في هذه الزيادة منهم: أبو داود (2185) فقال بعد أن أخرج الحديث من طريق عبد الرزاق بلفظه:"روى هذا الحديث عن ابن عمر: يونس بن جبير، وأنس بن
سيرين، وسعيد بن جبير، وزيد بن أسلم، وأبو الزبير، ومنصور، عن أبي وائل، معناهم كلهم أن النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن يراجعها حتى تطهر ثم إن شاء طلق، وإن شاء أمسك. وكذلك رواه محمد بن عبد الرحمن، عن سالم، عن ابن عمر.
أما رواية الزّهريّ عن سالم ونافع، وعن ابن عمر، أن النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن يراجعها حتى تطهر ثم تحيض ثم تطهر، ثم إن شاء طلق وإن شاء أمسك، وروي عن عطاء الخراساني، عن الحسن، عن ابن عمر نحو رواية نافع والزهري، والأحاديث كلها على خلاف ما قال أبو الزبير. انتهى.
وقال الخطابي:"قال أهل العلم: لم يرو أبو الزبير حديثا أنكر من هذا".
وكذلك قال ابن عبد البر أن قوله:"ولم يرها شيئًا" منكر، لم يقله غير أبي الزبير، وهو ليس بحجة فيما خالفه فيه مثله، فكيف بمن هو أثبت منه".
ولكن رواه أيضًا أبو بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر ما يفيد معناه - وهو أن ابن عمر طلق امرأته، وهي حائض، فردها عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى طلقها وهي طاهر. رواه النسائي (3398) عن زياد بن أيوب، قال: حدّثنا هشيم، قال: أخبرنا أبو بشر فذكره.
وهذا اللفظ محتمل أن يكون بمعنى"لم يره شيئًا" كما يحتمل بمعنى المراجعة كما في سائر الروايات.
وقد ذهب بعض أهل العلم إلى تأويل حديث أبي الزبير ليوافق سائر الروايات.
ثم إن في قوله:"فإذا طهرت فليطلق أو يمسك" أي يطلقها في الطهر الأول، فلعل هذا اختصار من بعض الرواة وقد جاء مجملا أيضًا، وهو اللفظ الثالث.
والوجه الثالث: مجمل، وهو أنه طلق امرأته وهي حائض فأمر أن يراجعها. كما في الرواية الآتية:
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবুয যুবাইর (নামক রাবী) বর্ণনা করেন যে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুর রহমান ইবনে আইমানকে (উযযাহর মুক্তদাস) ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে জিজ্ঞেস করতে শুনছিলেন—যে ব্যক্তি তার স্ত্রীকে ঋতুমতী অবস্থায় তালাক দেয়, তার ব্যাপারে আপনি কী মনে করেন? তখন তিনি (ইবনে উমর) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমার স্ত্রীকে ঋতুমতী অবস্থায় তালাক দিয়েছিলাম। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন এবং বললেন: আব্দুল্লাহ ইবনে উমর তার স্ত্রীকে ঋতুমতী অবস্থায় তালাক দিয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "সে যেন তাকে ফিরিয়ে নেয়।" অতঃপর তিনি তাকে ফিরিয়ে নিলেন। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন সে (স্ত্রী) পবিত্র হবে, তখন সে যেন তালাক দেয় অথবা তাকে রেখে দেয়।"
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঠ করলেন: "হে নবী! যখন তোমরা স্ত্রীদেরকে তালাক দিতে চাও, তখন তাদেরকে ইদ্দতের প্রতি লক্ষ্য রেখে তালাক দাও।" [সূরা ত্বলাক: ১]।
6402 - عن ابن سيرين قال: مكثت عشرين سنة يحدثني من لا أنهم أن ابن عمر طلق امرأته ثلاثا وهي حائض. فأمر أن يراجعها. فجعلت لا أتهمهم ولا أعرف الحديث حتى لقيت أبا غلّاب يونس بن جبير الباهلي. وكان ذا ثبت فحدثني أنه سأل ابن عمر، فحدثه أنه طلق امرأته تطليقة وهي حائض، فأمر أن يرجعها.
قال: قلت: أفحسبت عليه؟ قال: فمه، أو إن عجز واستحمق؟
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5333) من طريق يزيد بن إبراهيم ومسلم في الطلاق (7: 1471) من طريق أيوب، كلاهما عن ابن سيرين، به، واللفظ لمسلم وهو عند البخاري مختصر لم يذكر أول القصة.
وذكره البخاري معلقا (5253) من طريق أيوب، عن سعيد بن جبير عن ابن عمر قال: حسبت علي بتطليقة.
ومما سبق يظهر أنه لا خلاف بين أهل العلم أن الذي طلق امرأته في الحيض وجب عليه مراجعته، ثم الانتظار إلى الطهر الثاني، فإن شاء أمسكها، وإن شاء طلقها.
واختلفوا في تطليقها في الطهر الأول فذهب أبو حنيفة إلى جوازه، لأن التحريم كان لأجل الحيض، فإذا طهرت زال موجب التحريم، فجاز طلاقها في هذا الطهر كما يجوز في الطهر الذي بعده.
وعند الإمام أحمد رواية في جواز ذلك، وكذلك عند الشافعية وجه، ولكن الصحيح عنده المنع.
وقد ذكروا حكما كثيرة في تأخيره إلى الطهر الثاني منها أن لا تكون المراجعة لغرض الطلاق، فإذا أمسكها زمانا فقد يجامع فيه، ولا يجوز له أن يطلقها في طهر جامع فيه، فيتراجع عن إيقاع الطلاق أصلا.
ইবনু সীরীন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বিশ বছর অতিবাহিত করি, যখন আমাকে এমন ব্যক্তিরা হাদীস বলতেন যাদেরকে আমি সন্দেহ করতাম না, যে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্ত্রীকে মাসিক চলাকালীন তিন তালাক দিয়েছিলেন। অতঃপর তাঁকে নির্দেশ দেওয়া হয় যে তিনি যেন স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেন। আমি তাদের (বর্ণনাগুলো) সন্দেহ করতাম না, আবার হাদীসটিও পুরোপুরি জানতাম না, অবশেষে আমি আবু গাল্লাব ইউনুস ইবনু জুবাইর আল-বাহিলীর সাথে সাক্ষাৎ করি। তিনি ছিলেন নির্ভরযোগ্য রাবী। তিনি আমাকে বললেন যে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলেন। অতঃপর তিনি (ইবনু উমর) তাঁকে জানান যে, তিনি তাঁর স্ত্রীকে মাসিক চলাকালীন এক তালাক দিয়েছিলেন। অতঃপর তাঁকে (ইবনু উমরকে) নির্দেশ দেওয়া হয় যে তিনি যেন স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেন।
তিনি (ইউনুস) বললেন: আমি (ইবনু উমরকে) জিজ্ঞেস করলাম: এটি কি আপনার উপর (তালাক হিসেবে) গণ্য হয়েছিল? তিনি বললেন: তাহলে কি হবে? নাকি কেউ অপারগ হলে বা বোকামি করলে (তবে গণ্য হবে না)?
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি ‘তালাক’ অধ্যায়ে (৫৩৩৩) ইয়াযিদ ইবনু ইব্রাহীমের সূত্রে এবং মুসলিম ‘তালাক’ অধ্যায়ে (৭: ১৪৭১) আইয়ুবের সূত্রে—উভয়ে ইবনু সীরীন থেকে বর্ণনা করেছেন। শব্দগুলো ইমাম মুসলিমের। আর বুখারীর নিকট এটি সংক্ষিপ্তাকারে রয়েছে, যেখানে কাহিনীর প্রথম অংশ উল্লেখ করা হয়নি।
আর বুখারী এটিকে মু‘আল্লাক হিসেবে (৫২৫৩) আইয়ুবের সূত্রে সাঈদ ইবনু জুবাইর থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেছেন: এটি আমার উপর এক তালাক হিসেবে গণ্য করা হয়েছিল।
উপরিউক্ত বর্ণনা থেকে প্রতীয়মান হয় যে, যে ব্যক্তি তার স্ত্রীকে হায়েয অবস্থায় তালাক দেয়, তার জন্য স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেওয়া ওয়াজিব (আবশ্যক)। অতঃপর দ্বিতীয় পবিত্রতা (তুহুর) আসা পর্যন্ত অপেক্ষা করা। এরপর সে চাইলে স্ত্রীকে রাখতে পারে, আর চাইলে তালাক দিতে পারে। এ বিষয়ে আলিমদের মধ্যে কোনো মতপার্থক্য নেই।
আর প্রথম পবিত্রতার সময় স্ত্রীকে তালাক দেওয়া নিয়ে তারা (আলিমগণ) মতভেদ করেছেন। ইমাম আবূ হানীফা (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে জায়েয (বৈধ) বলে মত দিয়েছেন। কারণ (ঐ সময়) নিষিদ্ধতার কারণ ছিল মাসিক, যখন সে পবিত্র হয়ে গেল, তখন নিষিদ্ধতার কারণ দূরীভূত হয়ে গেল। সুতরাং এ পবিত্রতার সময়ে তালাক দেওয়া বৈধ, যেমন এর পরবর্তী পবিত্রতার সময়ে বৈধ।
আর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকটও এর বৈধতা সম্পর্কে একটি বর্ণনা রয়েছে। অনুরূপভাবে শাফেয়ী মাযহাবের মতেও একটি মত রয়েছে। তবে শাফেয়ীদের নিকট সহীহ মত হলো নিষেধ করা।
আর এই তালাক দ্বিতীয় পবিত্রতা পর্যন্ত বিলম্বিত করার ব্যাপারে তারা বহু হিকমত (রহস্য/কারণ) উল্লেখ করেছেন। তার মধ্যে একটি হলো—ফিরিয়ে নেওয়ার উদ্দেশ্য যেন কেবল তালাক দেওয়া না হয়। যদি সে কিছুকাল স্ত্রীকে রেখে দেয়, তবে সে হয়তো তার সাথে সহবাসও করতে পারে। আর যেই পবিত্রতাতে সে সহবাস করেছে, সেই পবিত্রতায় তালাক দেওয়া তার জন্য বৈধ নয়। ফলে সে (স্বামী) মূলত তালাক কার্যকর করা থেকে সম্পূর্ণরূপে বিরত থাকবে।
6403 - عن عبد الله أنه قال: طلاق السنة تطليقة وهي طاهر، في غير جماع، فإذا حاضت، وطهرت طلّقها أخرى، فإذا حاضت وطهرت طلقها أخرى، ثم تعتد بعد ذلك بحيضة.
صحيح: رواه النسائي (3394) واللفظ له، وابن ماجه (2021) كلاهما من حديث حفص بن غياث، قال: حدّثنا الأعمش، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد الله فذكره.
قال الأعمش: سألت إبراهيم فقال مثل ذلك.
وعند النسائي (3395) وابن ماجه (2020) كلاهما من وجه آخر عن يحيى بن سعيد، عن سفيان، عن أبي إسحاق عن أبي الأحوص، عن عبد الله قال: طلاق السنة أن يطلقها طاهرا من غير جماع. وإسناده صحيح، وسفيان من قدماء أصحاب أبي إسحاق.
طلاق السنة عند الأئمة إذا توفرت فيه أربعة شروط:
1 - أن تكون طاهرا.
2 - لم يمسها في ذلك الطهر.
3 - أن يطلقها طلقة واحدة.
4 - أن لا يتبعها طلاقا آخر حتى تنقضي العدة.
اختلف في الشرط الرابع فقال أهل الكوفة مستدلين بقول ابن مسعود: طلاق السنة أن يطلقها في كل قرء طلقة.
وقال الإمام أحمد:"طلاق السنة واحدة، ثم يتركها حتى تحيض ثلاث حيضات. وكذلك قال مالك والشافعي.
وقالوا: تلك هي العدة التي أمر الله تعالى تطلق فيها النساء بقوله سبحانه: {فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ} [الطلاق: 1].
ويظهر الخلاف بين القولين أن المطلقة تكون بائنة إذا انقضى الطهر الثاني عند أصحاب القول الأول، بخلاف القول الثاني فإنها تكون بائنة بعد انقضاء الحيضة الثالثة. وفي الموضوع كلام كثير
عند الفقهاء.
وأما الطلاق البدعي فهو أن يطلقها في حيض، أو نفاس، أو طهر جامع فيه. أو طلق ثلاثا بكلمة واحدة، أو طلق متفرقات في مجلس واحدة.
وفي قول ابن عمر:"أرأيت إن عجز واستحمق" وقوله:"حسبت علي بتطليقة" دليل على وقوع الطلاق البدعي وبه قال جمهور أهل العلم.
وأما في رواية أبي الزبير"ولم يروه شيئًا" ففيه حجة لمن قال: إن الطلاق البدعي لا يقع، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية وتلميذه ابن القيم. وقد أطال النفس فيه ابن القيم في زاد المعاد، وذكرتُ خلاصة الموضوع في"المنة الكبرى" (6/ 323) فراجعه، وتبين لي من خلال النصوص الواردة عن ابن عمر وغيره أن الطلاق البدعي يقع كما قال به جمهور العلماء.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সুন্নাত সম্মত তালাক হলো একটি তালাক দেওয়া, যখন স্ত্রী পবিত্র অবস্থায় থাকে এবং তার সাথে সহবাস করা হয়নি। এরপর যখন সে হায়িযগ্রস্ত হবে এবং পবিত্র হবে, তখন তাকে আরেকটি তালাক দেবে। এরপর যখন সে আবার হায়িযগ্রস্ত হবে এবং পবিত্র হবে, তখন তাকে আরেকটি তালাক দেবে। অতঃপর এর পরে সে এক হায়িয (মাসিক) দ্বারা ইদ্দত পালন করবে।
সহীহ। এটি নাসাঈ (৩৩৯৪) বর্ণনা করেছেন এবং শব্দচয়ন তারই, এবং ইবনু মাজাহও (২০২১) বর্ণনা করেছেন। উভয়েই হাফস ইবনু গিয়াস থেকে বর্ণনা করেছেন, যিনি বলেছেন: আমাদেরকে আল-আ'মাশ হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আবূল আহওয়াস থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তা উল্লেখ করেছেন।
আল-আ'মাশ বলেছেন: আমি ইবরাহীমকে (নাখায়ী) জিজ্ঞেস করেছিলাম, তিনিও একই রকম বলেছিলেন।
নাসাঈ (৩৩৯৫) এবং ইবনু মাজাহ'র (২০২০) নিকট তা ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি সুফিয়ান থেকে, তিনি আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আবূল আহওয়াস থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য সূত্রে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: সুন্নাত সম্মত তালাক হলো, সে যেন তাকে পবিত্র অবস্থায় সহবাস না করে তালাক দেয়। এর সনদ সহীহ এবং সুফিয়ান হলেন আবূ ইসহাকের প্রাচীনতম শিষ্যদের একজন।
ইমামদের (ফুকাহাদের) নিকট সুন্নাত সম্মত তালাক চারটি শর্ত পূরণ সাপেক্ষে হয়: ১. স্ত্রী পবিত্র অবস্থায় থাকবে। ২. ঐ পবিত্রতার সময়টিতে তার সাথে সহবাস করা হয়নি। ৩. তাকে একটি মাত্র তালাক দেবে। ৪. ইদ্দত শেষ না হওয়া পর্যন্ত তাকে অন্য কোনো তালাক দ্বারা অনুসরণ করবে না।
চতুর্থ শর্তে মতপার্থক্য রয়েছে। কূফার অধিবাসীরা ইবনু মাসঊদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বক্তব্য দ্বারা প্রমাণ পেশ করে বলেন: সুন্নাত সম্মত তালাক হলো, সে যেন প্রতিটি ক্বুরুতে (তুহরে/মাসিকে) একটি করে তালাক দেয়।
আর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: সুন্নাত সম্মত তালাক হলো একটি, এরপর তাকে ছেড়ে দেবে যাতে সে তিনটি মাসিক (হায়িয) পার করে। অনুরূপ কথা বলেছেন ইমাম মালিক ও ইমাম শাফিঈও (রাহিমাহুল্লাহ)।
তাঁরা বলেন: এটিই সেই ইদ্দত, যে অনুযায়ী আল্লাহ তাআলা নারীদের তালাক দিতে নির্দেশ দিয়েছেন তাঁর বাণী: "সুতরাং তোমরা তাদেরকে ইদ্দতের প্রতি লক্ষ্য রেখে তালাক দাও" [সূরা ত্বালাক: ১] এর মাধ্যমে।
দুই মতের মধ্যে পার্থক্য হলো, প্রথম মতের অনুসারীদের মতে, দ্বিতীয় পবিত্রতার সময় শেষ হলেই তালাকপ্রাপ্তা বায়েন (সম্পর্ক ছিন্নকারী) হয়ে যাবে। পক্ষান্তরে দ্বিতীয় মত অনুসারে, তৃতীয় মাসিক শেষ হওয়ার পরে সে বায়েন হয়ে যাবে। এই বিষয়ে ফুকাহাদের নিকট আরও অনেক আলোচনা রয়েছে।
আর বিদ‘আতী তালাক হলো তাকে হায়িয অবস্থায়, অথবা নিফাস (সন্তান প্রসব পরবর্তী রক্তপাত) অবস্থায়, অথবা এমন পবিত্রতার সময়ে যখন তার সাথে সহবাস করা হয়েছে, তালাক দেওয়া। অথবা এক শব্দে তিনটি তালাক দেওয়া, অথবা একই মজলিসে ভিন্ন ভিন্নভাবে একাধিক তালাক দেওয়া।
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাণী: "তুমি কি মনে কর যদি সে অক্ষমতা দেখায় বা নির্বুদ্ধিতা করে?" এবং তাঁর অন্য বাণী: "তা আমার উপর এক তালাক হিসেবে গণ্য করা হয়েছিল," তা বিদ‘আতী তালাক পতিত হওয়ার প্রমাণ বহন করে। এর পক্ষেই অধিকাংশ আহলে ইলম মত দিয়েছেন।
কিন্তু আবূ যুবাইরের বর্ণনায় (রিবায়াত): "এবং তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটাকে কিছুই মনে করেননি," সেই মতের পক্ষে প্রমাণ রয়েছে যারা বলেন যে বিদ‘আতী তালাক পতিত হয় না। এটি শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়া এবং তার শিষ্য ইবনুল কাইয়্যিমের (রাহিমাহুল্লাহ) মনোনীত মত। ইবনুল কাইয়্যিম (রাহিমাহুল্লাহ) 'যাদুল মাআদ' গ্রন্থে এই বিষয়ে দীর্ঘ আলোচনা করেছেন, আর আমি 'আল-মিন্না আল-কুবরা' (৬/৩২৩) গ্রন্থে এই বিষয়ের সারসংক্ষেপ উল্লেখ করেছি। সেখানে তা পর্যালোচনা করুন। আমার নিকট ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রমুখ থেকে বর্ণিত নসসমূহ (মূল পাঠ) দ্বারা এটি স্পষ্ট হয়েছে যে, বিদ‘আতী তালাক পতিত হয়, যেমনটি জুমহুর উলামা (অধিকাংশ বিদ্বান) বলেছেন।
6404 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا طلاق إلا فيما تملك، ولا عتق إلا فيما تملك، ولا بيع إلا فيما تملك، ولا وفاء نذر إلا فيما تملك".
حسن: رواه أبو داود (2190) والترمذي (1181) والنسائي (4613) وابن ماجه (2047) وأحمد (6769) وابن الجارود (743) والحاكم (2/ 205) كلهم من طرق كثيرة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره، واختصره البعض على بعض الفقرات.
قال الترمذي:"حسن صحيح، وهو أحسن شيء رُوي في هذا الباب".
وسكت عليه الحاكم ولكن قال الذهبي في التلخيص:"صحيح".
قلت: إسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب وهو حسن الحديث.
هكذا هذا الحديث رواه عامر الأحول ومطر الوراق وعبد الرحمن بن الحارث وحبيب المعلم وحسين المعلم كلهم عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده.
وخالفهم ابن جريج فرواه عن عمرو بن شعيب، عن طاوس، عن معاذ بن جبل أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه عبد الرزاق (6/ 417، 418) والطبراني في الكبير (20/ 166) والدارقطني (4/ 14)
والحاكم (2/ 419) والبيهقي (7/ 320) وسكت عنه الحاكم والذهبي، وهذه رواية شاذة المخالفة ابن جريج لجماعة من رووه عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده.
وقد سئل الدارقطني عن حديث طاوس، عن معاذ بن جبل، فبين الاختلاف على عمرو، ورجّع رواية عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده."العلل" (6/ 65).
وفي الباب عن علي، ومعاذ بن جبل، وجابر، وابن عباس، وعائشة. وهي كلها معلولة ولا يصح في هذا الباب غير حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده.
روي عن ابن عباس قال: ما قالها ابن مسعود - وإن يكن قاله - فزلة من عالم في الرجل يقول: إن تزوجت فلانة فهي طالق. قال الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ} [الأحزاب: 49] ولم يقل إذا طلقتم المؤمنات ثم نكحتموهن.
رواه الحاكم (2/ 250) وعنه البيهقي (7/ 321) من حديث علي بن حسن بن شقيق، نا الحسين بن واقد وأبو حمزة جميعا عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
قال الحاكم:"حديث صحيح الإسناد".
قلت: إسناده حسن، الحسين بن واقد فيه كلام يسير إلا أنه توبع.
وذكر البخاري تعليقا (9/ 381 - مع الفتح).
قال الخطابي في"معالم السنن":"وقوله:"لا طلاق" ومعناه نفي حكم الطلاق المرسل على المرأة قبل أن تملك بعقد النكاح، وهو يقتضي نفي وقوعه على العموم، سواء كان في امرأة بعينها أو في نساء لا بأعيانهن.
وقد اختلف الناس في هذا: فروي عن علي، وابن عباس، وعائشة، رضي الله عنهم أنهم لم يروا طلاقا إلا بعد النكاح، وروي ذلك عن شريح، وابن المسيب، وعطاء، وطاوس، وسعيد بن جبير، وعروة، وعكرمة، وقتادة. وإليه ذهب الشافعي.
وروي عن ابن مسعود إيقاع الطلاق قبل النكاح، وبه قال الزّهريّ، وإليه ذهب أصحاب الرأي. وقال مالك والأوزاعي وابن أبي ليلى: إن خص امرأة بعينها، أو قال: من قبيلة، أو بلد بعينه جاز، وإن عم فليس بشيء، وكذلك قال ربيعة بن أبي عبد الرحمن، وقال سفيان الثوري نحوا من ذلك إذا قال: إلى سنة، أو وقت معلوم.
وقال أحمد بن حنبل وأبو عبيد: إن كان نكح لم يؤمر بالفراق، وإن لم يكن نكح لم يؤمر بالتزويج. وقد روي نحو من هذا عن الأوزاعي".
قال الشيخ: وأسعد الناس بهذا الحديث من قال بظاهره وأجراه على عمومه. إذ لا حجة مع من فرق بين حال وحال. والحديث حديث حسن.
وقال أبو عيسى الترمذي: سألت محمد بن إسماعيل، فقلت: أي شيء أصح في الطلاق قبل
النكاح؟ فقال: حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. وسئل ابن عباس عن هذا؟ فقرأ قوله عز وجل: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ} [الأحزاب: 49] انتهى كلام الخطابي.
وقد ذكر البخاري - الفتح (9/ 381) والترمذي، والبيهقي (7/ 317 - 320) عددا كثيرا من الأخبار في عدم وقوع الطلاق والعتاق. ثم قال البيهقي كما في"الفتح":"هذه الآثار تدل على أن معظم الصحابة والتابعين فهموا من الأخبار أن الطلاق أو العتاق الذي علق قبل النكاح والملك لا يعمل بعد وقوعها، وأن تأويل المخالف في حمله عدم الوقوع على ما إذا وقع الملك، والوقوع إذا وقع بعده ليس بشيء، لأن كل أحد يعلم بعدم الوقوع قبل وجود عقد النكاح أو الملك. فلا يبقى في الأخبار فائدة، بخلاف ما إذا حملناه على ظاهره، فإن فيه فائدة، وهو الإعلام بعدم الوقوع، ولو بعد وجود العقد. فهذا يرجح ما ذهبنا إليه من حمل الأخبار على ظاهرها". انتهى.
ولم أقف على هذا النص في السنن الكبرى المطبوعة في باب الطلاق قبل النكاح في الصفحات المشار إليها أعلاه فتأكد من مصدر كلامه.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তালাক বৈধ নয়, তবে যার মালিক তুমি হও (তার উপর)। দাসমুক্তি বৈধ নয়, তবে যার মালিক তুমি হও (তার থেকে)। বেচা-কেনা বৈধ নয়, তবে যার মালিক তুমি হও (তারই)। আর মানত পূর্ণ করা বৈধ নয়, তবে যার মালিক তুমি হও (তাতেই)।"
6405 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: إن الله تجاوز لأمتي ما حدّثت به أنفُسُها ما لم يتكلموا أو يعملوا".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2528) ومسلم في الإيمان (127) كلاهما من حديث مسعر، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ আমার উম্মতের জন্য তাদের মনের ভেতরের কথাবার্তা ক্ষমা করে দিয়েছেন, যতক্ষণ না তারা তা নিয়ে কথা বলে বা কাজ করে।
6406 - عن عائشة تقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا طلاق ولا عتاق في إغلاق".
حسن: له طرق منها ما رواه أبو داود (2193) وابن ماجه (2046) والدارقطني (4/ 36) والحاكم (2/ 198) والبيهقي (7/ 357) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، قال: حدثني ثور بن يزيد الكلاعي - وكان ثقة - عن محمد بن عبيد بن أبي صالح المكي قال: حججتُ مع عدي بن عدي الكندي، فبعثني إلى صفية بنت شيبة بن عثمان صاحب الكعبة أسألها عن أشياء سمعتْها من عائشة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم. فكان فيما حدثتني أنها سمعث عائشة تقول: فذكرت الحديث.
وإسناده ضعيف من أجل محمد بن عبيد بن أبي صالح المكي.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
فتعقبه الذهبي بقوله: كذا قال، ومحمد بن عبيد لم يحتج به مسلم. وقال أبو حاتم: ضعيف.
وبه أعله المنذري في مختصر أبي داود، والحافظ ابن حجر في التلخيص (3/ 210).
ومنها ما قاله الحاكم: وقد تابع أبو صفوان الأموي محمد بن إسحاق على روايته عن ثور بن
يزيد فأسقط من الإسناد محمد بن عبيد".
ثم رواه من طريق نعيم بن حماد، ثنا أبو صفوان.
قلت: إذًا رجع الإسناد إلى محمد بن عبيد.
قال الذهبي في التلخيص:"نعيم صاحب مناكير".
قلت: ومحمد بن إسحاق مدلس، ولكنه صرّح في بعض طرقه، وكما توبع أيضًا.
ومنها: ما رواه عطان بن خالد قال: حدثني محمد بن عبيد، عن عطاء، عن عائشة ذكره ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 430) وقال: قلت لأبي: أيهما الصحيح؟ فقال:"حديث صفية أشبه".
ومنها: ما رواه الدارقطني (4/ 36) والبيهقي من طريق قرعة بن سويد، عن زكريا بن إسحاق، ومحمد بن عثمان جميعا عن صفية بنت شيبة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا طلاق ولا عتاق في إغلاق" وقزعة بن سويد ضعيف كما في التقريب.
وبمجموع هذه الطرق يكون الحديث حسنًا، لأن من الحسن ما روي من غير وجه ليس فيه متهم.
وقوله: إغلاق" فسروه بالإكراه، لأن المكره يغلق عليه أمره، وتصرفه، وقيل: كأن يغلق عليه الباب ويحبس، ويضيق عليه حتى يطلق. وقيل: الإغلاق هنا: الغضب، وقيل: معناه: النهي عن إيقاع الطلاق الثلاثة كله في دفعة واحدة حتى لا يبقى منه شيء، ولكنه ليطلق للسنة كما أمر. ذكره المنذري في مختصر أبي داود.
وقال الخطابي:"معنى"الإغلاق" الإكراه. وكان عمر بن الخطاب، وعلي بن أبي طالب، وابن عمر، وابن عباس، رضي الله عنهم لا يرون طلاق المكره طلاقا. وهو قول شريح، وعطاء، وجابر بن زيد، والحسن، وعمر بن عبد العزيز، والقاسم، وسالم. وإليه ذهب مالك بن أنس، والأوزاعي، والشافعي، وأحمد بن حنبل، وإسحاق بن راهويه.
وكان الشعبي، والنخعي، والزهري، وقتادة، يرون طلاق المكره جائزا. وإليه ذهب أصحاب الرأي. وقالوا في بيع المكره: إنه غير جائز. انتهين ا
وأما تفسيره بالغضب فقيل: لو كان كذلك لم يقع على أحد طلاق، لأن أحدا لا يطلق حتى يغضب. فالصحيح هو الإكراه والتضييق، وبه فسره أيضًا أبو عبيد، وابن قتيبة، وابن السيد وغيرهم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ইগলাকের (জোর-জবরদস্তি বা চরম মানসিক চাপের) ক্ষেত্রে কোনো তালাক নেই এবং কোনো দাসমুক্তি নেই।"
6407 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"رفع القلم عن ثلاثة: عن النائم حتى يستيقظ، وعن الصغير حتى يكبر، وعن المجنون حتى يعقل أو يُفيق".
حسن: رواه أبو داود (4398) والنسائي (6/ 156) وابن ماجه (2041) وابن الجارود (148) وأحمد (24694) وصححه ابن حبان (142) والحاكم (2/ 59) كلهم من حديث حماد بن سلمة،
عن حماد، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: إسناده حسن من أجل حماد وهو ابن أبي سليمان فإنه حسن الحديث.
وروي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كل طلاق جائز إلا طلاق المعتوه المغلوب على عقله".
رواه الترمذي (1191) وقال:"هذا حديث لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث عطاء بن عجلان، وعطاء بن عجلان ضعيف، ذاهب الحديث".
قلت: وهو كما قال، فإن عطاء بن عجلان هذا هو الحنفي، أبو محمد البصري العطار ضعيف باتفاق أهل العلم.
والصواب في هذا ما جاء عن علي بن أبي طالب موقوفا ولفظه:"كل الطلاق جائز إلا المعتوه" رواه البيهقي (7/ 359) بإسناد صحيح إليه.
قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم أن طلاق المعتوه والمغلوب على عقله لا يجوز، إلا أن يكون معتوها يُفيق أحيانا، فيطلق في حال إفاقته". انتهى.
بقية أحاديث هذا الباب مخرجة في كتاب الحدود.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন ব্যক্তির থেকে (তাদের আমলের হিসাব লেখার) কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে: ঘুমন্ত ব্যক্তি, যতক্ষণ না সে জেগে ওঠে; শিশু, যতক্ষণ না সে প্রাপ্তবয়স্ক হয়; এবং পাগল, যতক্ষণ না সে সুস্থ (বা জ্ঞানসম্পন্ন) হয়।"
হাসান: এটি আবূ দাউদ (৪৩৯৮), নাসাঈ (৬/১৫৬), ইবনু মাজাহ (২০৪১), ইবনুল জারূদ (১৪৮) এবং আহমাদ (২৪৬৯৪) বর্ণনা করেছেন। ইবনু হিব্বান (১৪২) ও হাকেম (২/৫৯) এটিকে সহীহ বলেছেন। তারা সকলেই হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হতে, তিনি হাম্মাদ হতে, তিনি ইবরাহীম হতে, তিনি আসওয়াদ হতে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।
হাকেম বলেছেন: ‘এটি মুসলিমের শর্ত অনুযায়ী সহীহ।’
আমি (গ্রন্থকার) বলি: এর সনদ হাম্মাদের কারণে হাসান, আর তিনি হলেন ইবনু আবী সুলাইমান। তিনি উত্তম হাদীস বর্ণনাকারী।
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক তালাকই কার্যকর হবে, তবে মস্তিষ্কবিকৃত বা জ্ঞান হারানো ব্যক্তির তালাক কার্যকর হবে না।"
এটি তিরমিযী (১১৯১) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এই হাদীসটি আমরা আতা ইবনু আজলান-এর সূত্র ব্যতীত মারফূ‘ (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী হিসেবে) জানি না। আর আতা ইবনু আজলান দুর্বল এবং যাঁর হাদীস মূল্যহীন।’
আমি বলি: তিনি যেমন বলেছেন, তেমনই। কেননা এই আতা ইবনু আজলান হলেন আল-হানাফী, আবূ মুহাম্মাদ আল-বাসরী আল-আত্তার, যিনি সমস্ত জ্ঞানীদের ঐকমত্যে দুর্বল।
তবে এই বিষয়ে সঠিক হলো, যা আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি হিসেবে) সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, যার শব্দ হলো: "পাগল ব্যতীত অন্য সকলের তালাক কার্যকর।" এটি বাইহাকী (৭/৩৫৯) সহীহ সনদে তাঁর পর্যন্ত বর্ণনা করেছেন।
তিরমিযী বলেছেন: 'নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এবং অন্যান্যদের মধ্যে জ্ঞানীদের আমল এর উপরেই যে, মস্তিষ্কবিকৃত ও জ্ঞান হারানো ব্যক্তির তালাক কার্যকর নয়, তবে যদি সে মাঝে মাঝে সুস্থ হয় এবং সুস্থ অবস্থায় তালাক দেয়, তবে তা কার্যকর হবে।' (আলোচিত হাদীসের) এই অধ্যায়ের বাকি হাদীসগুলো কিতাবুল হুদূদ (দণ্ডবিধি)-এ উল্লেখ করা হয়েছে।
