হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6381)


6381 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعائشة:"أهديتم الجارية إلى بيتها؟". قالت نعم، قال:"فهلا بعثتم معها من يُغنين يقول:

أتيناكم أتيناكم فحيُّونا نُحيّيكم … فإن الأنصار قوم فيهم غزل"

حسن: رواه أحمد (15209) والبزار - كشف الأستار - (1432) كلاهما من حديث أجلح، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وإسناده يكون حسنا من أجل أجلح وهو ابن عبد الله بن حُجية فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث في الشواهد لولا أنه اضطرب فيه، فمرة رواه هكذا من مسند جابر، وأخرى من مسند ابن عباس كما رواه ابن ماجه (1900) عنه عن أبي الزبير، عن ابن عباس قال: أنكحتْ عائشةُ ذات قرابة لها من الأنصار. فجاء رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أهديتم الفتاة؟" ثم ذكر نحوه. وثالثة رواه عن أبي الزبير، عن جابر، عن عائشة أنها أنكحت ذا قرابة لها من الأنصار فذكرت نحوه.

وللحديث طرق أخرى وهي ما رواه الطبراني في الأوسط (3265) من طريق محمد بن أبي السري العسقلاني، أنا أبو عصام رواد بن الجراح، عن شريك بن عبد الله، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أن النبي قال:"ما فعلت فلانة؟" ليت يمة كانت عندها. فقلت: أهديناها إلى زوجها. قال: فهل بعثتم معها جارية تضربُ بالدف وتُغنّي" قالت: تقول ماذا؟ قال: تقول:

أتيناكم أتيناكم … فحيونا نحييكم

لولا الذهب الأحمر … ما حلتْ بواديكم

لولا الحبة السمراء … ما سمنتْ عذاريكم

قال الطبراني:"لم يرو عن هشام إلا شريك، ولا عنه إلا رواد، تفرد به محمد بن أبي السري".

قلت: شريك سيء الحفظ، والراوي عنه رواد بن الجراح أبو عصام مختلف فيه فضعّفه النسائي والدارقطني. ووثقه الدارمي. وقال أحمد:"صاحب سنة لا بأس به".

قلت: ولكنه اختلط بأخره فترك كما في"التقريب".

وفي مسند الإمام أحمد (26313) عن عائشة قالت: كانت في حجري جارية من الأنصار، فزوجتها قالت: فدخل عليّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يوم عُرسها، فلم يسمع لعبًا فقال:"يا عائشة إن هذا الحي من الأنصار يحبون كذا وكذا".

رواه عن يعقوب وسعد قالا: حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن
إبراهيم بن الحارث التيمي، عن إسحاق بن سهل بن أبي حثمة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وأخرجه ابن حبان في صحيحه (5875) فرواه عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، بإسناده ولفظه: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عرسها فلم يسمع غناء ولا لعبا، فقال:"يا عائشة، هل غنيتم عليها أولا تغنون؟"ثم قال: إن هذا الحيّ من الأنصار يحبون الغناء".

وفيه إسحاق بن سهل بن أبي حثمة لم يذكره أحد بالتوثيق غير ابن حبان، فإنه ذكره في:"الثقات" (4/ 22) ولم يذكر من الرواة عنه إلا محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي فهو في عداد المجهولين. ولكن مجموع هذه الطرق باختلاف مخارجها يدل على أصله، كما هو مخرج في صحيح البخاري من حديث عائشة.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, "তোমরা কি মেয়েটিকে তার বাড়িতে পৌঁছে দিয়েছ?" তিনি (আয়েশা) বললেন, "হ্যাঁ।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তবে তোমরা কেন তার সাথে এমন কাউকে পাঠাওনি যে গান গেয়ে বলবে:

'আমরা তোমাদের কাছে এসেছি, আমরা তোমাদের কাছে এসেছি,
অতএব আমাদের স্বাগত জানাও, আমরা তোমাদের স্বাগত জানাব...
কেননা আনসাররা এমন এক সম্প্রদায় যাদের মধ্যে কাব্যচর্চার প্রবণতা রয়েছে'?"









আল-জামি` আল-কামিল (6382)


6382 - عن عامر بن سعد البجلي يقول: شهدت ثابت بن وديعة وقرظة بن كعب الأنصاري في عرس، وإذا غناء، فقلت لهما في ذلك. فقالا: إنه رُخَّصَ في الغناء في العُرس، والبكاء على الميت في غير نياحة.

صحيح: رواه أبو داود الطيالسي (1317) ومن طريقه البيهقي (7/ 289) عن شعبة، عن أبي إسحاق، قال: سمعت عامر بن سعد البجلي، يقول: فذكر الحديث.

ورواه أيضا ابن أبي شيبة (4/ 193) والحاكم (2/ 184) كلاهما من حديث شعبة بإسناده مثله. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

قال البيهقي:"ورواه إسرائيل، عن أبي إسحاق".

وقلت: وكذلك رواه أيضا شريك عن أبي إسحاق.

فأما رواية إسرائيل: فرواه البيهقي (7/ 289) عن أبي إسحاق، عن عامر بن ربيعة البجلي قال: دخلت على قرظة بن كعب وأبي مسعود وذكر ثالثا، - ذَهَب عَلَيَّ - والجواري يضربن بالدف ويغنين. فقلت: تُقِرّون على هذا، وأنتم أصحابُ محمد صلى الله عليه وسلم قالوا:"إنه قد رخص في العرسات والنياحة عند المصيبة" وأما حديث شريك فرواه عنه ابن أبي شيبة (4/ 192) عن أبي إسحاق، عن عامر بن سعد قال: دخلت على أبي مسعود وقرظة بن كعب وعندهما جوار تُغَنِّين. فقلت: أتفعلون هذا؟ وأنتم أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فقال:"إنه رُخِّص لنا في اللَّهو عند العرس".

ورواه النسائي (3383) والحاكم (2/ 184) من وجه آخر عن شريك، وفيه: فقالا: إن شئت فأقِمْ معنا، وإن شئتَ فاذهبْ، فإنه رُخِّص لنا في اللَّهو عند العُرس، وفي البكاء عند المصيبة.

قال شريك:"أُراه قال: في غير نوح" انتهى. وذكره البيهقي ملخصا وشريك هو ابن عبد الله سيء الحفظ، ولكنه توبع كما رأيت.

وفي الباب ما رُوي عن زوج ابنة أبي لهب قال: دخل علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حين تزوجت ابنة أبي لهب فقال:"هل من لهو؟".
رواه أحمد (16626) والطبراني (24/ 258) كلاهما من حديث الزبيري، قال: حدثنا إسرائيل، عن سماك، عن معبد بن قيس، عن عبد الله بن عُمير أو عَمِيرة، قال: حدثني زوج ابنة أبي لهب فذكره.

ومعبد بن قيس، وشيخه عبد الله بن عُمير مجهولان، والزبيري هو أبو أحمد محمد بن عبد الله بن الزبير الأسدي.

قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 289): فيه معبد بن قيس لم أعرفه.

وأما ما روي عن شيخ شهدَ أبا وائل في وليمة، فجعلوا يَلعبون يُغنون، فحلِّ أبو وائل حُبْوتَه وقال: سمعت عبد الله يقول: سمعت رسول صلى الله عليه وسلم الله يقول:"إن الغناء يُنبت النفاق في القلب" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (4927) عن مسلم بن إبراهيم، قال: حدثنا سلّام بن مسكين، عن شيخ فذكره. وإسناده ضعيف من جهالة هذا الشيخ.

وقد رُوي بإسناد آخر: إلا أنه موقوف على عبد الله بن مسعود.

رواه المروزي في تعظيم قدر الصلاة (680) والبيهقي (10/ 223).

كلاهما من طرق عن غندر، عن شعبة، عن الحكم، عن حماد، عن إبراهيم، عن عبد الله بن مسعود. ورجاله ثقات.

وذكره الديلمي في الفردوس (4319) من حديث أنس بن مالك مرفوعا:"الغناء واللَّهوُ يُنبتان في القلب النفاق، كما ينبت الماء العشب، والذي نفسي بيده إن القرآن والذكر يُنبتان الإيمان في القلب، كما يُنبت الماءُ العشبَ" وأورده السخاوي في المقاصد الحسنة (731) وقال:"لا يصح كما قاله النووي".

فقه هذا الباب:

قال سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله تعالى: يستحب ضرب الدف في النكاح للنساء خاصة لإعلانه، والتمييز بينه وبين السفاح، ولا بأس بأغاني النساء فيما بينهن مع الدف، إذا كانت تلك الأغاني ليس فيها تشجيع على منكر، ولا تثبيط عن واجب، ويشترط أن يكون ذلك فيما بينهن من غير مخالطة للرجال.

وأما اللعب واللَّهْو للرجال فقال رحمه الله: الرجال وحدهم إذا كان بالسلاح والرمي، أو بالأشعار العربية، وأما الطبول فلا، أو بالأغاني المنكرة".

انظر: الاختيارات الفقهية له (ص 490 - 491).

وأما رقص النساء فقد سئل فضيلة الشيخ صالح الفوزان عن ذلك فقال:"لا بأس برقص النساء بمناسبة الزواج وضربهن بالدف مع شيء من الغناء النزيه؛ لأن هذا من إعلان الزواج المأمور به شرعا، لكن بشرط أن يكون ذلك في محيط النساء فقط، وبصوت لا يرتفع ولا يتجاوز مكانهن،
وبشرط التستر الكامل بحيث لا يبدو شيء من عورة المرأة في حالة الرقص كسيقانها وذراعيها وعضديها، وإنما يبدو منها ما جرت عادة المرأة المسلمة بكشفه بحضرة النساء".

قلت: ليس المراد بالرقص هنا الرقص المعهود في الأفلام وإنما المقصود منه تحريك النساء الأيدي والأجسام، وخاصة عند حضور العرس، وإخراج الأصوات الخاصة بهذه المناسبة إظهارا للفرح والسرور مع الالتزام بالآداب الشرعية.




আমের ইবনু সা'দ আল-বাজালী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একটি বিয়ের অনুষ্ঠানে সাবিত ইবনু ওয়াদী‘আ এবং কুরযাহ ইবনু কা‘ব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেলাম। সেখানে গান হচ্ছিল। আমি এ বিষয়ে তাঁদের জিজ্ঞেস করলে তাঁরা দুজন বললেন: নিশ্চয়ই বিয়ের অনুষ্ঠানে গান গাওয়ার এবং মাইয়্যেতের জন্য মাতম (নিইয়াহাহ) না করে কাঁদার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6383)


6383 - عن عقبة بن عامر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والدخولَ على النساء". فقال رجل من الأنصار: يا رسول الله، أفرأيت الحموُ؟ قال:"الحموُ موتٌ".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5232) ومسلم في السلام (2172) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره.

والحَمْوُ: على وزن الدَلْو، قال النووي:"والمراد بالحمو هنا أقارب الزوج غير آبائه وأبنائه، فأما الآباء والأبناء فمحارم لزوجته، تجوز لهم الخلوة بها ولا يوصفون بالموت، وإنما المراد هو: الأخ وابن الأخ والعم وابنه ونحوهم ممن ليس بمحرم". اهـ.




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মহিলাদের নিকট প্রবেশ করা থেকে বিরত থাকো।" তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'হামউ' (স্বামীর নিকটাত্মীয় পুরুষদের) সম্পর্কে আপনার কী নির্দেশ? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হামউ হলো মৃত্যুস্বরূপ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6384)


6384 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا لا يبيتنَّ رجل عند امرأة ثيب، إلا أن يكون ناكحًا، أو ذو محرم".

صحيح: رواه مسلم في السلام (2171) من طريق هُشيم، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكره.

وأما ما روي عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تلجوا على المغيبّات، فإن الشيطان يجري من أحدكم مجرى الدم" قلنا: ومنك؟ قال:"ومني، ولكن الله أعانني عليه فأسلم". فهو ضعيف.

رواه الترمذي (1172) عن نصر بن علي قال: حدثنا عيسى بن يونس، عن مجالد، عن الشعبي، عن جابر فذكره.

قال الترمذي: هذا حديث غريب من هذا الوجه، وقد تكلم بعضهم في مجالد بن سعيد من قبل حفظه". وسمعت علي بن خشرم يقول: قال سفيان بن عيينة في تفسير قول النبي صلى الله عليه وسلم:"ولكن الله أعانني عليه فأسلم" يعني أسلم أنا منه.

قال سفيان:"والشيطان لا يسلم".

وقوله:"ولا تلجوا على المغيبّات" والمغيبة: المرأة التي يكون زوجها غائبا. والمغيبات جماعة المغيبة. انتهى كلام الترمذي.

ولكن يرد هذا المعنى الذي ذكره سفيان حديث عبد الله بن مسعود وهو الآتي.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাবধান! কোনো পুরুষ যেন কোনো সধবা (পূর্বে বিবাহিতা) মহিলার কাছে রাত্রি যাপন না করে, যদি না সে তার স্বামী হয় অথবা (তার) মাহরাম হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6385)


6385 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما منكم من أحد إلا وقد وُكِّل به قرينُه من الجن".

قالوا: وإياك يا رسول الله؟ قال:"وإياي إلا أن الله أعانني عليه فأسلم فلا يأمرني إلا بخير".

صحيح: رواه مسلم في صفة القيامة (2114) من طرق عن جرير، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

فقوله:"أسلم" من الإسلام دون السلامة هذا الذي فسّر به جمهور العلماء هذا الحديث إلا سفيان بن عيينة فإن فسره بقوله: أسلم - أي أجد منه السلامة - يعني أن النبي صلى الله عليه وسلم سالم من أن يجري الشيطان فيه مجرى الدم، وهذا لا يشاركه فيه غيره.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের এমন কেউ নেই, যার সাথে জিন্নদের মধ্য থেকে তার সহচর (কারীন) নিযুক্ত করা হয়নি।

সাহাবীরা জিজ্ঞেস করলেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনার সাথেও কি?
তিনি বললেন: আমার সাথেও (নিযুক্ত করা হয়েছে)। তবে আল্লাহ আমাকে তার বিরুদ্ধে সাহায্য করেছেন, ফলে সে ইসলাম গ্রহণ করেছে। তাই সে আমাকে কেবল ভালোর নির্দেশই দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6386)


6386 - عن ابن عباس يقول: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"ألا لا يخلونَّ رجل بامرأة، إلَّا ومعها ذو محرم".

متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1341) والبخاري في الجهاد (3006) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، حدثنا عمرو بن دينار، عن أبي معبد، قال: سمعت ابن عباس يقول: فذكره في حديث أطول من هذا، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “সাবধান! কোনো পুরুষ যেন কোনো নারীর সাথে নির্জনে অবশ্যই না থাকে, তবে তার সাথে তার কোনো মাহরাম থাকলে ভিন্ন কথা।”









আল-জামি` আল-কামিল (6387)


6387 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أن نفرا من بني هاشم دخلوا على أسماء بنت عميس، فدخل أبو بكر الصديق، وهي تحته يومئذ، فرآهم. فكره ذلك. فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم وقال: لم أر إلا خيرًا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إن الله قد برأها من ذلك. ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فقال:"لا يدخلٌ رجل بعد يومي هذا على مغيبة إلا ومعه رجل أو اثنان".

صحيح: رواه مسلم في السلام (2173) من طرق عن عمرو بن الحارث أن بكر بن سوادة حدّثه، أن عبد الرحمن بن جبر حدثه أن عبد الله بن عمرو بن العاص حدثه فذكر الحديث.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু হাশিমের একদল লোক আসমা বিনত উমাইসের নিকট প্রবেশ করল। ঐ দিন আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে প্রবেশ করলেন— যখন তিনি (আসমা) তার স্ত্রী ছিলেন— এবং তাদেরকে দেখলেন। তিনি এটা অপছন্দ করলেন। এরপর তিনি বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন এবং বললেন, "আমি তো কোনো খারাপ কিছু দেখিনি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাকে (আসমাকে) তা থেকে মুক্ত ঘোষণা করেছেন।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে দাঁড়িয়ে বললেন, "আজকের দিনের পর থেকে কোনো পুরুষ যেন এমন কোনো স্ত্রীর নিকট প্রবেশ না করে, যার স্বামী অনুপস্থিত, তবে তার সাথে একজন কিংবা দুজন লোক থাকলে ভিন্ন কথা।"









আল-জামি` আল-কামিল (6388)


6388 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيما امرأةٍ نكحت على صداقٍ أو جِباء، أو عِدة قبل عصمة النكاح فهو لها، وما كان بعد عصمة النكاح فهو لمن أُعطيه، وأحق ما أُكرِمَ عليه الرجلُ ابنتُه أو أختُه".

حسن: رواه أبو داود (2129) وابن ماجه (1955) والنسائي (3353) وأحمد (6709) كلهم من حديث ابن جريج، قال: قال عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
قال البخاري وغيره:"ابن جريج لم يسمع من عمرو بن شعيب".

لكن تابعه الحجاج بن أرطاة فرواه عن عمرو بن شعيب بإسناده ولفظه:"ما استحل به فرج المرأة من مهر أو عدة فهي لها، وما أكرم به أبوها أو أخوها أو وليها بعد عقدة النكاح فهو له، وأحقُّ ما أُكرِمَ الرجلُ به ابنتُه أو أختُه". رواه البيهقي (7/ 248) والحجاج بن أرطاة فيه كلام. ولكن بمجموع الإسنادين يصير الحديث حسنا.

وأما المعنى فقال بعض أهل العلم: يُحمل هذا الحديث على أن الولي لو اشترط لنفسه مالًا سوى المهر فهو له، وأما المهر فهو حق للمرأة، وقد رُوي عن علي بن حسين أنه زوّج ابنتَه رجلًا، واشترط لنفسه عشرةَ آلاف درهم.

ومن العادات والعُرف تبادل الهدايا بين الطرفين، وهو إن لم يكن من الشروط الفاسدة فلا حرجَ في ذلك. ومنه تجهيزُ الرجل ابنتَه من الأسرّة، والأواني المنزلية، وغيرها كما جاء في الحديث الآتي.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে কোনো নারী মোহরের বিনিময়ে, অথবা (মোহর ব্যতিরেকে অন্য) কোনো উপঢৌকন কিংবা শর্তের বিনিময়ে বিবাহ করে, যা বিবাহের বন্ধন সম্পন্ন হওয়ার আগে নির্ধারণ করা হয়, তবে তা তার (মহিলার) প্রাপ্য। আর যা বিবাহের বন্ধন সম্পন্ন হওয়ার পরে (উপহার হিসেবে) দেওয়া হয়, তা তাকেই দেওয়া হয়, যে তা গ্রহণ করে। আর পুরুষ যার উপর সম্মান লাভের অধিক উপযুক্ত, তারা হলো তার কন্যা অথবা বোন।”









আল-জামি` আল-কামিল (6389)


6389 - عن علي قال: جهّز رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فاطمةَ في خَميل، وقربة، ووِسادة أدم، حشوها ليف الإذخر.

صحيح: رواه النسائي (3384) وأحمد (643) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن زائدة بن قدامة، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن علي فذكره.

وإسناده صحيح غير أن عطاء بن السائب ممن اختلط في آخر حياته. فقال الإمام أحمد:"هو ثقة، رجل صالح من سمع منه قديما فسماعه صحيح، ومن سمع منه حديثا فسماعه ليس بشيء". فذكر أن شعبة وسفيان ممن سمع منه قديمًا.

وقال غير واحد من أهل العلم:"فما رواه عنه المتقدمون فهو صحيح: مثل سفيان، وشعبة، وزهير، وزائدة، وحماد بن زيد، وأيوب".

قال الحافظ ابن حجر:"فيحصل لنا من مجموع كلامهم أن سماع سفيان الثوري، وشعبة، وزهير، وحماد بن زيد، وأيوب، عنه صحيح، وما عداهم يتوقف فيه".

وأمَّا أبوه فهو السائب بن مالك أبو يحيى، ويقال: أبو كثير وثَّقَه يحيى بن معين، والعجلي، وابن حبان.

وقال ابن أبي حاتم في المراسيل (106):"قال أبي: السائب بن مالك ليست له صحبة". يعني والد عطاء بن السائب.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমার জন্য একটি পশমের চাদর (খামিল), একটি মশক (চামড়ার পানির পাত্র) এবং চামড়ার একটি বালিশের ব্যবস্থা করলেন, যার ভেতরে ইযখির ঘাসের আঁশ ভরা ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6390)


6390 - عن جابر قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: هل لكم أنماط؟". قلت: وأنى يكون
لنا الأنماط؟ قال:"أما أنه سيكون لكم الأنماط".

قال جابر: فأنا أقول لها - يعني امرأته - أخِّري عني أنماطكِ، فتقول: ألم يقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنها ستكونُ لكم الأنماط؟" فأدعُها.

متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3631) ومسلم في اللباس (2083) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا سفيان، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره. واللفظ للبخاري.

وأما مسلم فأحال على ما قبله.

وقوله:"الأنماط": هو ضرب من البسط له حَمْل رقيق، يستعمل في الغالب في ليلة الزفاف، وفي الليالي التي تليها لاستقبال العروس.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন, "তোমাদের কি কোনো নমাট (পশমী চাদর বা গালিচা) আছে?" আমি বললাম, "আমাদের আবার নমাট কোথা থেকে আসবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সাবধান! নিশ্চয় তোমাদের নমাট হবে।"

জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমি আমার স্ত্রীকে বলি—(অর্থাৎ আমার স্ত্রীকে উদ্দেশ্য করে বলি)—তোমার নমাটগুলো আমার কাছ থেকে দূরে সরিয়ে রাখো। তখন সে বলে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি বলেননি, "তোমাদের অবশ্যই নমাট হবে?" তখন আমি তাকে ছেড়ে দিই।









আল-জামি` আল-কামিল (6391)


6391 - عن * *




৬৩৯১ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (6392)


6392 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من خبب امرأة على زوجها، أو عبدًا على سيده".

صحيح: رواه أبو داود (2175) وأحمد (9157) وصححه ابن حبان (568، 5560) والحاكم (2/ 196) والبيهقي (8/ 13) كلهم من طريق عمار بن رزيق، عن عبد الله بن عيسى، عن عكرمة، عن يحيى بن يعمر، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"خبّب" معناه: أفسد، وخدع، وقد جاء بلفظ"أفسد" في بعض الروايات الأخرى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো নারীকে তার স্বামীর বিরুদ্ধে খেপিয়ে তোলে, অথবা কোনো গোলামকে তার মনিবের বিরুদ্ধে খেপিয়ে তোলে, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (6393)


6393 - عن بريدة بن حصيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من حلف بالأمانة، ومن خبّب على امرئ زوجته، أو مملوكهـ".

صحيح: رواه أبو داود (3253) وأحمد (22980) وصححه ابن حبان (4363) والحاكم (4/ 298) والبيهقي (10/ 30) كلهم من حديث الوليد بن ثعلبة الطائي، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.

واقتصر أبو داود على قوله:"من حلف بالأمانة فليس منا" مع أنه رواه من حديث زهير بن معاوية، وهو ممن روى الحديث باللفظ المذكور كاملا. ومن طريقه رواه البيهقي كما ذكر أعلاه.

فلعل أبا داود لم يسمع من شيخه أحمد بن يونس، عن زهير بن معاوية إلا هذا الجزء، ولذا أخرجه في كتاب الأيمان والنذور.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: وهو كما قال، الوليد بن ثعلبة، وثقه ابن معين وابن حبان وهو من رجال السنن.

وفي الباب عن ابن عمر وابن عباس وغيرهما، إلا أن الصحيح منها ما ذكرته.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আমানতের নামে শপথ করে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়। আর যে ব্যক্তি কোনো লোকের বিরুদ্ধে তার স্ত্রীকে অথবা তার দাসকে উত্তেজিত করে (বা নষ্ট করে দেয়), সেও (আমাদের দলভুক্ত নয়)।”









আল-জামি` আল-কামিল (6394)


6394 - عن عبد الله بن عمر قال: كانت تحتي امرأة، وكنت أحبها، وكان عمر يكرهها، فقال لي: طلِّقْها، فأبيتُ، فأتى عمر رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"طلِّقها".

وفي رواية:"أطعْ أباك".

حسن: رواه أبو داود (5138) والترمذي (1189) وابن ماجه (2088) وأحمد (4711)
وصحّحه ابن حبان (426) والحاكم (2/ 197، 4/ 152) كلهم من حديث ابن أبي ذئب، عن خاله الحارث بن عبد الرحمن، عن حمزة بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل الحارث بن عبد الرحمن، وهو القرشي العامري خال ابن أبي ذئب حسن الحديث.

قال الترمذي:"حسن صحيح، إنما نعرفه من حديث ابن أبي ذئب".




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার অধীনে একজন স্ত্রী ছিল এবং আমি তাকে ভালোবাসতাম, কিন্তু (আমার পিতা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে অপছন্দ করতেন। তিনি আমাকে বললেন: তাকে তালাক দাও। কিন্তু আমি (তা করতে) অস্বীকার করলাম। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বিষয়টি তাঁর কাছে বললেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে তালাক দাও।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমার পিতার আনুগত্য করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6395)


6395 - عن أبي الدرداء أن رجلا أتاه فقال: إن لي امرأة، وإن أمي تأمرني بطلاقها.

قال أبو الدرداء: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الوالد أوسط أبواب الجنة، فإن شئت فأضِعْ ذلك البابَ، أو احفظْه".

صحيح: رواه الترمذي (1900) وأحمد (27511) والحاكم (4/ 152) كلهم من طريق سفيان بن عيينة، عن عطاء بن السائب، عن أبي عبد الرحمن السلمي عن أبي الدرداء فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث صحيح".

قلت: إسناده صحيح. وعطاء بن السائب مختلط إلا أن سماع سفيان بن عيينة كان قبل الاختلاط. وتابعه أيضًا شعبة وهو ممن سمع منه قبل الاختلاط. ومن طريقه رواه ابن ماجه (2089) وأحمد (21617) والحاكم (4/ 152) وفيه أن رجلا أمره أبوه أو أمه، أو كلاهما أن يطلق امرأته.



قال الحاكم:"صحيح الإسناد"، وزاد الذهبي فقال:"على شرط مسلم".

قلت: لكن محمد بن عثمان بن أبي شيبة ليس من رجال مسلم، بل ليس من رجال الستة، وإنما من أقران مسلم وأبي داود وغيرهما، ثم هو ممن كذبه أحمد، وقال ابن خراش:"كان يضع الحديث". فكيف يقبل منه مخالفة أبي داود الذي رواه مرسلا بدون ذكر ابن عمر.

وإليه أشار البيهقي بقوله: ولا أراه حفظه.

وقد رواه مرصولًا أيضًا محمد بن خالد الوهبي، عن معرف بن واصل، عن محارب بن دثار، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أبغض الحلال إلى الله عز وجل الطلاق".

رواه أبو داود (2178) عن كثير بن عبيد، حدّثنا محمد بن خالد فذكره. ومحمد بن خالد وإن كان ثقة وثّقه الدارقطني وغيره، إلا أنه خالف ثلاث ثقات وهم أحمد بن عبد الله بن يونس، ووكيع بن الجراح، ويحيى بن بكير فكل هؤلاء رووه عن محارب بن دثار مرسلا.

وقد سئل أبو حاتم عن حديث رواه محمد بن خالد الوهبي، عن الوضاح، عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وعن محمد بن خالد الوهبي، عن معرف بن واصل، عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إنما هو محارب عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسل. علل الحديث (1/ 431).

وقد تبيّن من هذا أن محمد بن خالد الوهبي مع مخالفته الثقات، قد اضطرب فيه فمرة رواه عن معرف بن واصل كما مضى، وأخرى عن الوضاح، وثالثة عن عبيد الله بن الوليد الصافي، وهو عند ابن ماجه (2018) كل هؤلاء عن محارب بن دثار، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث.

وعبيد الله بن الوليد الصافي ضعيف.

ولذا رجح كونه مرسلا مع أبي حاتم الدارقطني في العلل (1/ 431) والبيهقي وغيرهم، والله تعالى أعلم بالصواب.

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن شهر بن حوشب مرفوعًا:"إن الله لا يحب كل ذواق من الرجال، ولا كل ذواقة من النساء" رواه ابن أبي شيبة (19536) عن محمد بن فضيل، عن ليث، عن شهر بن حوشب قال: تزوج رجل امرأة على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، فطلقها، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"طلقتها" قال: نعم، قال:"من بأس؟" قال: لا، يا رسول الله، ثم تزوج أخرى ثم طلقها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"طلقتها؟" قال: نعم، قال: لمن بأس؟ قال: لا، يا رسول الله، ثم تزوج أخرى ثم طلقها، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"طلقتها؟" قال: نعم، قال:"من بأس؟" قال: لا، يا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم في الثالثة:"إن الله لا يحب كل ذواق من الرجال، ولا كل ذواقة من النساء".

وفيه ليث وهو ابن أبي سُليم سيء الحفظ، وشهر بن حوشب فيه كلام معروف، ثم هو مرسل، وقد روي موصولا بذكر أبي هريرة ولا يصح كما رُوي نحوه عن أبي موسى. رواه البزار - كشف
الأستار - (2/ 192) من ثلاثة أوجه وكلها ضعيفة. وقد سأل عبد الرحمن بن أبي حاتم، عن حديث أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تطلقوا النساء إلا عن ريبة؛ فإن الله تعالى يَكرهُ الذواقين والذواقات".

قال: قال أبي:"عبادة بن نُسَي، عن أبي موسى لا يجيء". العلل (128




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বলল: আমার স্ত্রী আছে, কিন্তু আমার মা আমাকে তাকে তালাক দিতে আদেশ করছেন। আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "পিতা-মাতা জান্নাতের দরজাসমূহের মধ্যম দরজা। সুতরাং তুমি যদি চাও, তবে সেই দরজা নষ্ট করে ফেলো, অথবা তা রক্ষা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6396)


6396 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن إبليس يضع عرشه على الماء، ثم يبعث سراياه، فأدناهم منه منزلة أعظمهم فتنة. يجيء أحدهم فيقول: فعلت كذا وكذا. فيقول: ما صنعت شيئًا. قال: ثم يجيء أحدهم فيقول: ما تركته حتى فَرَّقْتُ بينه وبين امرأته. قال: فيدنيه منه، ويقول: نِعْمَ أنت".

صحيح: رواه مسلم في صفة القيامة (2812/ 67) من طرق عن أبي معاوية، حدّثنا الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় ইবলিস তার আরশ পানির উপর স্থাপন করে, তারপর সে তার বাহিনীসমূহ প্রেরণ করে। তাদের মধ্যে যে ফিতনা সৃষ্টিতে সবচেয়ে বড়, পদমর্যাদায় সে তার নিকটবর্তী। তাদের একজন এসে বলে: আমি এমন এমন কাজ করেছি। সে (ইবলিস) বলে: তুমি কিছুই করোনি। অতঃপর অন্য একজন এসে বলে: আমি তাকে ততক্ষণ পর্যন্ত ছাড়িনি, যতক্ষণ না তার ও তার স্ত্রীর মাঝে বিচ্ছেদ ঘটিয়েছি। তখন সে (ইবলিস) তাকে তার নিকটবর্তী করে এবং বলে: তুমিই উত্তম কাজ করেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6397)


6397 - عن نافع، إن عبد الله بن عمر طلق امرأته وهي حائض على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. فسأل عمر بن الخطاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مره فليراجعها، ثم يمسكها حتى تطهر، ثم تحيض، ثم تطهر، ثم إن شاء أمسك بعد وإن شاء طلّق قبل أن يمسّ، فتلك العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء".

متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (53) عن نافع، به.

ورواه البخاري في الطلاق (5251)، ومسلم في الطلاق (1: 1417) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم أيضًا من طريق الليث بن سعد، عن نافع، عن عبد الله أنه طلق امرأة له وهي حائض تطليقة واحدة، فأمره رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يراجعها، ثم يمسكها حتى تطهر، ثم تحيض عنده حيضة أخرى. ثم يمهلها حتى تطهر من حيضتها، فإن أراد أن يطلقها فليطلقها حين تطهر من قبل أن يجامعها، فتلك العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء.

وكذلك رواه مسلم أيضًا من طريق عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر قال: طلقت امرأتي على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وهي حائض، فذكر ذلك عمر لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"مُرْهُ فليراجعها، ثم لدعها حتى تطهر، ثم تحيض حيضة أخرى، فإذا طهرت فليطلقها قبل أن يجامعها، أو يمسكها، فإنها العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء".

وكذلك رواه أيوب، عن نافع، أن ابن عمر طلق امرأته وهي حائض، فسأل عمر النبي صلى الله عليه وسلم فأمره أن يراجعها، ثم يمهلها حتى تحيض حيضة أخرى، ثم يمهلها حتى تطهرَ، ثم يطلقها قبل أن يمسها. فتلك العدة التي أمر الله أن يطلق لها النساء. رواه مسلم.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে তাঁর স্ত্রীকে হায়িয অবস্থায় তালাক দিয়েছিলেন। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে তার স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেয় (রুজু করে), অতঃপর তাকে নিজের কাছে রেখে দেয় যতক্ষণ না সে পবিত্র হয়, অতঃপর আবার তার হায়িয হয়, অতঃপর সে আবার পবিত্র হয়। এরপর যদি সে চায় তবে তাকে রেখে দেবে, আর যদি চায় তবে সহবাস করার পূর্বে তাকে তালাক দেবে। এটাই হলো সেই ইদ্দত, যার ভিত্তিতে আল্লাহ্‌ নারীদেরকে তালাক দিতে আদেশ করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6398)


6398 - عن سالم بن عبد الله أن عبد الله بن عمر قال: طلّقت امرأتي وهي حائض. فذكر ذلك عمر للنبي صلى الله عليه وسلم، فتغيظ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم قال:"مره فليراجعها حتى تحيض حيضة أخرى مستقبلة، سوى حيضتها التي طلقها فيها، فإن بدا له أن يطلقها، فليطلقها طاهرًا من حيضتها قبل أن يمسها، فذلك الطلاق للعدة كما أمر الله" وكان عبد الله طلقها تطليقة واحدة، فحسبت من طلاقها، وراجعها عبد الله كما أمره رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4908)، ومسلم في الطلاق (4: 1471) كلاهما من طريق الزّهريّ، قال: أخبرني سالم به، فذكره.

واللفظ لمسلم، وليس عند البخاري قوله:"وكان عبد الله … الخ".

ورواية سالم بن عبد الله موافقة لرواية نافع.

ولكن رواه غير الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر أنه طلق امرأته وهي حائض فذكر ذلك عمر للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"مره فليراجعها، ثم يطلقها طاهرا أو حاملا" رواه مسلم من حديث محمد بن عبد الرحمن (مولى آل طلحة) عن سالم فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার স্ত্রীকে ঋতুস্রাবকালীন অবস্থায় তালাক দিয়েছিলাম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন, অতঃপর বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে তাকে ফিরিয়ে নেয়, যতক্ষণ না সে অন্য একটি ঋতুস্রাবে উপনীত হয়—যে ঋতুস্রাবে সে তাকে তালাক দিয়েছে, তা ছাড়া। এরপর যদি তার মনে চায় যে, সে তাকে তালাক দেবে, তাহলে যেন সে ঋতুস্রাব থেকে পবিত্র হওয়ার পর তাকে স্পর্শ করার পূর্বে তালাক দেয়। এই হলো সেই তালাক, যা আল্লাহ্‌র নির্দেশ মোতাবেক ইদ্দতের জন্য (গ্রহণযোগ্য)।" আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে একটি তালাক দিয়েছিলেন এবং সেটা তার তালাকের হিসাবে গণ্য করা হয়েছিল। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নির্দেশ অনুযায়ী তাকে ফিরিয়ে নিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6399)


6399 - عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر أنه طلق امرأته وهي حائض فسأل عمر عن ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"مره فليراجعها حتى تطهر، ثم تحيض، ثم تطهر، ثم يطلق بعد أو يمسك".

صحيح: رواه مسلم (6: 1471) عن أحمد بن عثمان بن حكيم الأودي، حدّثنا خالد بن مخلد، حدثني سليمان (هو ابن بلال) حدثني عبد الله بن دينار فذكره.
الوجه الثاني: إنه أمر بمراجعتها. فإذا طهرت فليطلقها لطهرها.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর স্ত্রীকে হায়েয (ঋতু) অবস্থায় তালাক দিয়েছিলেন। ফলে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে নির্দেশ দাও, যেন সে তার স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেয় (রুজু করে) যতক্ষণ না সে পবিত্র হয়, এরপর সে আবার ঋতুমতী হয়, তারপর আবার পবিত্র হয়। এরপর সে চাইলে তালাক দিতে পারে অথবা (স্ত্রী হিসেবে) রেখে দিতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6400)


6400 - عن أنس بن سيرين قال: سألت ابن عمر عن امرأته التي طلق. فقال: طلقتها وهي حائض، فذُكر ذلك لعمر، فذكره للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"مره فليراجعها، فإذا طهرت فليطلقها لطهرها" قال: فراجعتها ثم طلقتها لطهرها، قلت: فاعتددت بتلك التطليقة التي طلقت وهي حائض؟ قال: ما لي لا أعتد بها؟ وإن كنت عجزت واستحمقت".

متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5252) ومسلم في الطلاق (12: 1471) كلاهما من طريق شعبة، عن أنس بن سيرين فذكره.

واللفظ لمسلم. وأما البخاري فاقتصر على لفظ:"ليراجعها. قلت: تحتسب؟ قال:"فمه" وعن قتادة، عن يونس بن جبير، عن ابن عمر. قال:"فمره فليراجعها" قلت: نحتسب؟ قال:"أرأيت إن عجز واستحمق".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাস ইবনু সীরীন বলেন: আমি তাঁকে (ইবনু উমরকে) তাঁর তালাক দেওয়া স্ত্রী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: আমি তাকে ঋতু অবস্থায় তালাক দিয়েছিলাম। বিষয়টি (আমার পিতা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করা হলো, অতঃপর তিনি তা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে তাকে ফিরিয়ে নেয় (রুযু' করে)। এরপর যখন সে পবিত্র হবে, তখন সে যেন পবিত্র অবস্থায় তাকে তালাক দেয়।" তিনি (ইবনু উমর) বললেন: আমি তাকে ফিরিয়ে নিলাম, এরপর পবিত্র অবস্থায় তাকে তালাক দিলাম। আমি (আনাস) জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি ওই তালাককে গণনা করেছিলেন, যা আপনি তাকে ঋতু অবস্থায় দিয়েছিলেন? তিনি বললেন: কেন আমি তা গণনা করব না? যদিও আমি ভুল করেছিলাম এবং বোকামি করেছিলাম।