আল-জামি` আল-কামিল
6488 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لم يكذب إبراهيم عليه السلام إلا ثلاث كذبات، ثنتين منهن في ذات الله عز وجل.
وقوله لسارة: أختي".
متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3358) ومسلم في الفضائل (2371) كلاهما من حديث أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكره في سياق أطول كما هو مذكور في أخبار الأنبياء.
وأما ما روي عن أبي تميمة الهجيمي - وهو طريف بن مجالد البصري - أن رجلا قال لامرأته: يا أخية فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أختك هي؟" فكره ذلك، ونهى عنه فهذا مرسل كما قال المنذري في مختصر أبي داود.
رواه أبو داود (2210) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد.
ح وحدثنا أبو كامل، حدثنا عبد الواحد وخالد الطحان المعني كلهم عن خالد، عن أبي تميمة الهجيمي فذكره.
ورواه أيضا أبو داود (2211) عن محمد بن إبراهيم البزار، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا عبد السلام - يعني ابن حرب، عن خالد الحذاء، عن أبي تَميمة، عن رجل من قومه أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم سمع رجلا يقول لامرأته فذكره.
قال أبو داود:"ورواه عبد العزيز بن المختار، عن خالد، عن أبي عثمان، عن أبي تميمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. ورواه شعبة، عن خالد، عن رجل، عن أبي تميمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
قال المنذري:"وذكر أبو داود ما يدل على اضطرابه".
قلت: وفيه عبد السلام بن حرب مختلفة فيه، والخلاصة فيه أنه مع إمامته في بعض أحاديثه مناكير، وقد اختلف في وصله وإرساله، والصواب الإرسال.
وفيه من الفقه: أن من قال لزوجته: أنتِ أختي ولم ينو الظهار، وإنما نوى الكرامة والتوقير أو التورية فهو ليس بظهار، وأما إذا نوى الظهار فهو مثل قوله: أنتِ كأمي.
وأما كذب إبراهيم فيحمل على التورية.
وقد أشكل على الناس تسميتها كذبة لكون المتكلم إنما أراد باللفظ المعنى الذي قصده، فكيف يكون كذبا. والتحقيق في ذلك أنها كذب بالنسبة على إفهام المخاطب، لا بالنسبة إلى غاية المتكلم. فإن الكلام له نسبتان: نسبة إلى المتكلم، ونسبة إلى المخاطب، فلما أراد الموري أن يفهمَ المخاطبُ خلاف ما قصده بلفظه أطلق الكذب عليه بهذا الاعتبار، وإن كان المتكلم صادقًا باعتبار قصده ومراده": قاله الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (3/ 137).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইবরাহীম (আঃ) মাত্র তিনটি মিথ্যা ছাড়া আর মিথ্যা বলেননি। এর মধ্যে দুটি ছিল মহান আল্লাহর কারণে। এবং (তৃতীয়টি ছিল) তাঁর স্ত্রী সারাকে, 'আমার বোন', বলা।
6489 - عن عبد الله بن عمر كان يقول في الايلاء الذي سمى الله:"لا يحلُّ لأحد بعد الأجل إلا أن يُمْسِك بالمعروف، أو يعزم الطلاق كما أمرَ اللهُ عز وجل".
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5290) عن قتيبة، حدثنا الليث، عن نافع، أن ابن عمر كان يقول: وعنه أيضا قال: إذا مضتْ أربعةُ أشهرٍ يُوقَفُ حتى يطلّق، ولا يقع عليه الطلاق حتى يُطلِّق.
رواه البخاري أيضا (5291) وقال: ويُذكر ذلك عن عثمان، وعلي، وأبي الدرداء، وعائشة، واثنتي عشر رجلًا من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.
يعني: إذا مضتْ أربعة أشهر يُوقف، فإما أن يَفيء أي يجامع، وإما أن يُطلِّق. وبه قان جمهور أهل العلم منهم: مالك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، وغيرهم.
وقال الثوري وأهل الكوفة: إذا مضت أربعةُ أشهر فهي تطليقة بائنة.
والإيلاء: الحلف، جمعه ألايا، وهو أن يحلِف ألا يدخل على أهله شهرًا فجعل الله المدة القصوى أربعة أشهر، وفي خلال هذه المدة إما أن يرجع عن حلفه ويُكفر، أو يطلق. فإنه لا يجوز له أن يجعل المرأة معلقة، لا يُجامعها ولا يُطلقها. فإن رفض الأمرين فإن القاضي يُطلق عليه، أو يفسخ.
আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর কিতাবে উল্লেখিত ইলা' (স্ত্রী থেকে দূরে থাকার শপথ)-এর ব্যাপারে বলতেন: "নির্ধারিত সময় (চার মাস) পার হওয়ার পর আর কারও জন্য বৈধ নয় যে সে স্ত্রীকে ভালোভাবে রেখে দেবে অথবা আল্লাহ তাআলা যেভাবে নির্দেশ দিয়েছেন সেভাবে তালাক দেওয়ার সিদ্ধান্ত নেবে।"
তিনি (ইবনু উমার) আরও বলতেন: যখন চার মাস অতিবাহিত হয়ে যায়, তখন তাকে (স্বামীকে) থামানো হবে (আদালতের মাধ্যমে) যতক্ষণ না সে তালাক দেয়। আর সে তালাক না দেওয়া পর্যন্ত তালাক কার্যকর হবে না।
এই একই মত উসমান, আলী, আবূ দারদা, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বারোজন সাহাবী থেকেও উল্লেখ করা হয়েছে।
অর্থাৎ, যখন চার মাস অতিবাহিত হয়, তখন তাকে থামানো হবে। হয় সে ফায় (মিলিত) হবে, অর্থাৎ সহবাস করবে, অথবা তালাক দেবে। এই মতটিই জমহুর (অধিকাংশ) আহলে ইলম—তাদের মধ্যে মালিক, শাফিঈ, আহমাদ, ইসহাক ও অন্যান্যরা—গ্রহণ করেছেন।
তবে সাওরী ও আহলে কূফা বলেছেন: যদি চার মাস অতিবাহিত হয়ে যায়, তবে তা তালাকে বাইন (বাইন তালাক) বলে গণ্য হবে।
ইলা' হলো শপথ করা। এর বহুবচন হলো আলায়্যা। এটি হলো এই যে, স্বামী শপথ করবে যে সে তার স্ত্রীর কাছে এক মাসের জন্য যাবে না। আল্লাহ তাআলা এই ধরনের শপথের জন্য সর্বোচ্চ সময়সীমা চার মাস ধার্য করেছেন। এই সময়ের মধ্যে হয় সে তার শপথ ভঙ্গ করে কাফফারা আদায় করবে, অথবা তালাক দেবে। কারণ তার জন্য স্ত্রীকে ঝুলন্ত অবস্থায় রাখা জায়েজ নয়—যে সে তার সঙ্গে সহবাসও করবে না, আবার তালাকও দেবে না। যদি সে এই দুটি কাজই করতে অস্বীকার করে, তবে কাজী তার উপর তালাক কার্যকর করবেন অথবা বিবাহ বাতিল করে দেবেন।
6490 - عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: لم أزل حريصا على أن أسأل عمر بن الخطاب عن المرأتين من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم اللتين قال الله تعالى: {إِنْ تَتُوبَا إِلَى اللَّهِ فَقَدْ
صَغَتْ قُلُوبُكُمَا} [التحريم: 4] حتى حجَّ وحججتُ معه، وعدل وعدلتُ معه بإداوة، فتبرزَ ثم جاء فسكبتُ على يديه منها فتوضأ، فقلت له: يا أمير المؤمنين! مَن المرأتان من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم اللتان قال الله تعالى: {{إِنْ تَتُوبَا إِلَى اللَّهِ فَقَدْ صَغَتْ قُلُوبُكُمَا} [التحريم: 4]؟ قال: واعجبا لك يا ابن عباس، هما عائشة وحفصة، ثم استقبل عمر الحديث يسوقه قال: كنت أنا وجار لي من الأنصار في بني أمية بن زيد وهم من عَوالي المدينة، وكنا نتناوب النزول على النبي صلى الله عليه وسلم، فينزل يوما وأنزل يوما، فإذا نزلت جئته بما حدث من خبر ذلك اليوم من الوحي أو غيره، وإذا نزل فعل مثل ذلك، وكنا معشر قريش نغلب النساء، فلما قدمنا على الأنصار، إذا قوم تغلبهم نساؤُهم، فطفق نساؤُنا يأخذن من أدب نساء الأنصار. فصَخِبْتُ على امرأتي فراجعتني، فأنكرتُ أن تراجعني قالت: ولم تُنكر أن أراجعك؟ فوالله إن أزواج النبي صلى الله عليه وسلم ليراجعنَه، وإن إحداهن لتهجره اليوم حتى الليل. فأَفْزعني ذلك فقلت لها: قد خاب من فعل ذلك منهن. ثم جمعتُ علي ثيابي، فنزلت حتى دخلتُ على حفصة فقلت لها: أي حفصة، أتُغاضب إحداكن النبي صلى الله عليه وسلم اليوم حتى الليل؟ قالت: نعم، فقلت: قد خبتِ وخسرتِ، أفتأمنين أن يغضب الله لغضب رسول الله صلى الله عليه وسلم فتهلكي؟ لا تستكثري النبي صلى الله عليه وسلم ولا تراجعيه في شيء ولا تهجريه، وسَليني ما بدا لكِ، ولا يغرنك أن كانت جارتُك أوضأَ منك، وأحب إلى النبي صلى الله عليه وسلم، - يريد عائشة - قال عمر: وكنا قد تحدثنا أن غسان تُنْعل الخيلَ لتغزونا، فنزل صاحبي الأنصاري يومَ نوبتِه، فرجع إلينا عشاء فضرب بابي ضربًا شديدًا وقال: أثم هو؟ ففزعتُ فخرجتُ إليه، فقال: قد حدثَ اليوم أمرٌ عظيم، قلت: ما هو؟ أجاء غسان؟ قال: لا، بل أعظم من ذلك وأهولُ، طلّق النبي صلى الله عليه وسلم نساءه.
وقال عبيد بن حنين: سمع ابن عباس عن عمر فقال: اعتزل النبي صلى الله عليه وسلم أزواجه، فقلت: خابت حفصةُ وخسرتْ، وقد كنت أظنُّ هذا يوشك أن يكون، فجمعتُ عليّ ثيابي، فصليتُ صلاة الفجر مع النبي صلى الله عليه وسلم، فدخل النبي صلى الله عليه وسلم مشربةً له فاعتزل فيها، ودخلت على حفصة فإذا هي تبكي، فقلت: ما يُبكيك؟ ألم أكن حذّرتك هذا، أطلّقكن النبي صلى الله عليه وسلم؟ قالت: لا أدري، ها هو ذا معتزل في المشربة. فخرجت فجئت إلى المنبر فإذا حوله رهط يبكي بعضهم، فجلستُ معهم قليلا، ثم غلبني ما أجد فجئتُ المشربةَ التي فيها النبي صلى الله عليه وسلم، فقلتُ لغلام أسود: استأذنْ لعمر. فدخل الغلام فكلّم النبي صلى الله عليه وسلم ثم رجع فقال: كلّمتُ النبي صلى الله عليه وسلم وذكرتُك له فصمتَ، فانصرفتُ حتى
جلستُ مع الرهط الذين عند المنبر. ثم غلبني ما أجدُ فجئت فقلت للغلام: استأذن لعمر، فدخل ثم رجع فقال: قد ذكرتك له فصمتُ، فرجعتُ فجلست مع الرهط مع المنبر، ثم غلبني ما أجد، فجئت الغلام فقلت: استأذن لعمر، فدخل ثم رجع إليَّ فقال: قد ذكرتك له فصمَتَ، فلمّا ولَّيتُ منصرفا قال: إذا الغلام يدعوني فقال: قد أذنَ لك النبي صلى الله عليه وسلم. فدخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم فإذا هو مُضطجع على رمال حصير ليس بينه وبينه فراش قد أثّر الرمال بجنبه، متكئا على وسادة من أدم حشوها ليف، فسلّمتُ عليه. ثم قلت وأنا قائم: يا رسول الله! أطلقتَ نساءك؟ فرفع إليَّ بصره فقال:"لا". فقلت: الله أكبر. ثم قلت وأنا قائم أستأنس: يا رسولَ الله! لو رأيتني وكنا معشر قريش نغلبُ النساءَ، فلما قدمنا المدينة إذا قوم تغلبهم نساؤهم، فتبسّم النبي صلى الله عليه وسلم ثم قلت: يا رسول الله، لو رأيتني ودخلت على حفصة فقلت لها: لا يغرنّك أن كانت جارتُك أوضأ منك وأحب إلى النبي صلى الله عليه وسلم يريد عائشة. فتبسّم النبي صلى الله عليه وسلم تبسمة أخرى. فجلستُ حين رأيته تبسَّم، فرفعت بصري في بيته فوالله ما رأيت في بيته شيئا يرد البصر غير أهبة ثلاثة، فقلت: يا رسول الله! ادع الله فليُوسّع على أمتك، فإن فارس والروم قد وُسّعَ عليهم، وأعطوا الدنيا وهم لا يعبدون الله. فجلس النبي صلى الله عليه وسلم وكان متكئا فقال:"أوفي هذا أنت يا ابن الخطاب؟ إن أولئك قوم قد عُجِّلُوا طيباتهم في الحياة الدنيا" فقلت: يا رسول الله! استغفر لي.
فاعتزل النبي صلى الله عليه وسلم نساءَه من أجل ذلك الحديث حين أفشته حفصةُ إلى عائشة تسعا وعشرين ليلة، وكان قال:"ما أنا بداخل عليهن شهرًا" من شدة موجدتِه عليهن حين عاتبه الله عز وجل، فلما مضت تسعٌ وعشرون ليلة دخل على عائشة فبدأ بها، فقالت له عائشة: يا رسول الله! إنك كنتَ قد أقسمتَ أن لا تدخل علينا شهرا، وإنما أصبحت من تسع وعشرين ليلة أعدها عدًا، فقال: الشهر تسع وعشرون ليلة، فكان ذلك الشهر تسعا وعشرين ليلة، قالت عائشة: ثم أنزل الله تعالى آية التخيير فبدأ بي أول امرأة من نسائه فاخترتُه، ثم خّير نساءه كلهن فقلن مثل ما قالت عائشة.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5191) من طريق شعيب، عن الزهري قال: أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن أبي ثور، عن ابن عباس، فذكره. ورواه مسلم (34: 1479) من طريق معمر، عن الزهري، به، مثله إلى قوله:"حين عاتبه الله عز وجل" وفي مسلم"حتى عاتبه الله عز وجل" ثم قال مسلم (35: 1475) قال الزهري: فأخبرني عروة، عن عائشة قالت:"لما مضى تسع
وعشرون ليلة …" وذكرت بقية الحديث.
ويؤخذ من هذه القصة أنه شاع بين الناس أن النبي صلى الله عليه وسلم طلّق نساءَه لأخبار الأنصاري به، فتناقله أهل النفاق، وأصله هو ما وقع من اعتزاله صلى الله عليه وسلم نساءه ولم تجر عادته بذلك، فظنوا أنه طلّقهن. ولذلك لم يعاتب عمرُ الأنصاري على قوله، وعلى هذا يُحمل ما يروي في كتب السنن بأن النبي صلى الله عليه وسلم طلّق حفصة، ثم راجعها كما قال عمر بن الخطاب رضي الله عنه.
رواه أبو داود (2383) والنسائي (3562) وابن ماجه (2016) والدارمي (2310) وصحّحه ابن حبان (4275) والحاكم (2/ 197) كلهم من حديث يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن صالح بن صالح بن حي، عن سلمة بن كهيل، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن عمر فذكره. وإسناده صحيح. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وكذلك روى ابنه عبد الله بن عمر قال: دخل عمر على حفصة وهي تبكي فقال: ما يُبكِيك؟ لعلَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم طلَّقك؟ إنه قد كان طلقك، ثم راجعك من أجلي، فأيم الله لئن كان طلّقك لا كلمتك كلمة أبدًا.
رواه الطبراني في الكبير (23/ 187) وابن حبان (4276) كلاهما من حديث محمد بن عبد الله بن نمير، قال: حدثنا يونس بن بكير، قال: حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن ابن عمر فذكره.
وإسناده حسن من أجل يونس بن بكير فإنه حسن الحديث.
وكذلك روي عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم طلّق حفصة ثم راجعها.
رواه الدارمي (2311) وأبو يعلى (3815) والحاكم (2/ 196 - 197) والبيهقي (7/ 367 - 368) كلهم من حديث هُشيم، عن حميد، عن أنس فذكره.
ونقل الدارمي قول علي بن المديني أنه: أنكر هذا الحديث. وقال: ليس عندنا هذا الحديث بالبصرة عن حميد. وأما الحاكم فقال:"صحيح على شرط الصحيح".
ثم رواه الحاكم (4/ 15) من وجه آخر عن الحسن بن أبي جعفر، ثنا ثابت، عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم طلق حفصة تطليقة فأتاه جبريل عليه السلام فقال:"يا محمد، طلقت حفصة، وهي صرامة قوامة وهي زوجتك في الجنة فراجعها".
والحسن بن أبي جعفر هو الجفري البصري، ضعيف باتفاق أهل العلم.
ثم رواه الحاكم (4/ 15) من وجه آخر عن حماد بن سلمة، أنبأنا أبو عمران الجوني، عن قيس بن زيد: أن النبي صلى الله عليه وسلم طلّق حفصة بنت عمر، فدخل عليها خالاها قدامة وعثمان ابنا مظعون فبكت، وقالت: والله ما طلّقني عن شبع، وجاء النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"قال لي جبريل عليه السلام راجعْ حفصةَ فإنها صوامة قوامة، وأنها زوجتك في الجنة".
وفيه قيس بن زيد مجهول، لم يوثّقه غير ابن حبان (5/ 316) وذكر الحافظ ابن حجر في
الإصابة (9/ 226 في ترجمة قيس بن زيد) أن في متنه وهما، لأن عثمان بن مظعون مات قبل أن يتزوج النبي صلى الله عليه وسلم حفصة، لأنه مات قبل أُحد بلا خلاف، وزوجُ حفصة مات بأحُدٍ، فتزوجها النبي صلى الله عليه وسلم بعد أُحد بلا خلاف.
ولما لم تتحقق الروايات على الطلاق المعهود تجنب الشيخان إخراج هذه الأحاديث.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সবসময় আগ্রহী ছিলাম যে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে সেই দুই মহিলা কারা, যাদের সম্পর্কে আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {যদি তোমরা উভয়ে আল্লাহর কাছে তওবা করো, তবে তোমাদের অন্তর তো ঝুঁকেই পড়েছে} [সূরা তাহরীম: ৪]। অবশেষে তিনি হজ্জে গেলেন এবং আমিও তাঁর সাথে হজ্জে গেলাম। একটি চামড়ার পাত্র (ইদাওয়া) নিয়ে তিনি একপাশে গেলেন এবং আমিও তাঁর সাথে গেলাম। তিনি পেশাব-পায়খানার কাজ সারলেন। এরপর ফিরে আসলেন। আমি তার দু'হাতে পানি ঢেলে দিলাম, তখন তিনি উযু করলেন। আমি তাঁকে বললাম: হে আমীরুল মু'মিনীন! নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে সেই দুই মহিলা কারা, যাদের সম্পর্কে আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {যদি তোমরা উভয়ে আল্লাহর কাছে তওবা করো, তবে তোমাদের অন্তর তো ঝুঁকেই পড়েছে}? তিনি বললেন: হে ইবনু আব্বাস! তোমার জন্য আশ্চর্য! তারা হলেন আয়েশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই ঘটনা বর্ণনা করতে শুরু করলেন। তিনি বললেন: আমি এবং আমার একজন আনসার প্রতিবেশী বনী উমাইয়া ইবনু যায়দ গোত্রে বসবাস করতাম। তারা ছিল মদীনার উঁচু অঞ্চলের (আওয়ালী) অধিবাসী। আমরা পালাক্রমে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসা-যাওয়া করতাম। একদিন সে আসতো আর একদিন আমি আসতাম। আমি যখন আসতাম, তখন সেই দিনের ওহী বা অন্যান্য খবর যা কিছু ঘটতো, তা তাঁকে বলতাম। আর সে যখন আসতো, তখন সেও তাই করতো। আমরা কুরাইশরা নিজেদের স্ত্রীদের ওপর কর্তৃত্ব করতাম। কিন্তু যখন আমরা আনসারদের কাছে আসলাম, তখন দেখলাম তারা এমন এক কওম, যাদের ওপর তাদের স্ত্রীরা কর্তৃত্ব করে। তখন আমাদের স্ত্রীরাও আনসার মহিলাদের কাছ থেকে তাদের অভ্যাস গ্রহণ করতে শুরু করল।
আমি আমার স্ত্রীর ওপর কঠোর হলাম, কিন্তু সে আমার কথার প্রতিবাদ করল। তার প্রতিবাদ করাটা আমি অপছন্দ করলাম। সে বলল: তুমি কেন আমার প্রতিবাদ করাকে অপছন্দ করছ? আল্লাহর কসম! নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীরাও তাঁর কথার প্রতিবাদ করেন, এমনকি তাঁদের কেউ কেউ তো সারাদিন রাত পর্যন্ত তাঁর সাথে কথা বলা বন্ধ রাখেন (অভিমান করে)।
এতে আমি খুবই ভীত হয়ে পড়লাম এবং তাকে বললাম: তাদের মধ্যে যে এমন কাজ করেছে, সে ব্যর্থ হয়েছে। এরপর আমি কাপড় গুছিয়ে হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং তাকে বললাম: হে হাফসা, তোমাদের মধ্যে কি কেউ কেউ নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সারাদিন রাত পর্যন্ত মনোমালিন্য করে থাকে? সে বলল: হ্যাঁ। আমি বললাম: তুমি ব্যর্থ হলে এবং ক্ষতিগ্রস্ত হলে! তোমার কি ভয় নেই যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রাগের কারণে আল্লাহ অসন্তুষ্ট হবেন, ফলে তুমি ধ্বংস হয়ে যাবে? নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কোনো বিষয়ে বেশি কিছু বলবে না, তাঁর কোনো কথার প্রতিবাদ করবে না, আর তাঁকে এড়িয়ে চলবে না। তোমার যা প্রয়োজন তা আমার কাছে চাও। তোমার প্রতিবেশী তোমার চেয়ে বেশি সুন্দরী এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বেশি প্রিয়—এই বিষয়টি যেন তোমাকে ধোঁকায় না ফেলে। (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর দ্বারা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইঙ্গিত করছিলেন)।
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা পরস্পরে আলাপ করছিলাম যে, গাসসান গোত্রের লোকেরা আমাদের আক্রমণ করার জন্য ঘোড়ার পায়ে নাল পরাচ্ছে। যখন আমার আনসার বন্ধুর পালা আসলো (নবীজীর কাছে যাওয়ার), সে সন্ধ্যায় ফিরে এসে আমার দরজায় খুব জোরে করাঘাত করল এবং বলল: সে কি ওখানে আছে? আমি ভীত হয়ে তার কাছে বেরিয়ে আসলাম। সে বলল: আজ এক বিরাট ঘটনা ঘটে গেছে। আমি বললাম: কী হয়েছে? গাসসানের লোকেরা কি এসে পড়েছে? সে বলল: না, বরং তার চেয়েও বড় ও ভয়াবহ ঘটনা; নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের তালাক দিয়ে দিয়েছেন।
উবাইদ ইবনু হুনাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে শুনেছিলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে আলাদা হয়ে গিয়েছিলেন। আমি বললাম: হাফসা ব্যর্থ ও ক্ষতিগ্রস্ত হয়েছে! আমি তো ভাবছিলাম, এমনটি হওয়া খুব কাছাকাছি। আমি আমার পোশাক পরিধান করলাম এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ফজরের সালাত আদায় করলাম। এরপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর একটি ছোট কক্ষে (মাশরাবা) প্রবেশ করে একাকী অবস্থান করতে লাগলেন। আমি হাফসার কাছে গেলাম। দেখি সে কাঁদছে। আমি তাকে বললাম: কেন কাঁদছ? আমি কি তোমাকে এই বিষয়ে সতর্ক করিনি? নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তোমাদের তালাক দিয়েছেন? সে বলল: আমি জানি না, এই তো তিনি ছোট কক্ষে একাকী অবস্থান করছেন।
আমি সেখান থেকে বেরিয়ে মিম্বরের কাছে আসলাম। দেখলাম একদল লোক তার চারপাশে বসে কাঁদছে। আমি তাদের সাথে কিছুক্ষণ বসলাম। কিন্তু আমার অস্থিরতা আমাকে কাবু করে ফেলল। আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেখানে ছিলেন সেই কক্ষের কাছে গেলাম এবং একজন কালো গোলামকে বললাম: উমরের জন্য অনুমতি চাও। গোলামটি প্রবেশ করে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলল, তারপর ফিরে এসে বলল: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলেছি এবং আপনার কথা তাঁকে বলেছি, কিন্তু তিনি নীরব রইলেন। আমি ফিরে এসে মিম্বরের কাছে বসা লোকগুলোর সাথে বসলাম। এরপর আমার অস্থিরতা আমাকে আবার কাবু করে ফেলল। আমি এসে গোলামটিকে বললাম: উমরের জন্য অনুমতি চাও। সে ভেতরে গেল, তারপর ফিরে এসে বলল: আমি আপনার কথা তাঁকে বলেছি, কিন্তু তিনি নীরব রইলেন। আমি ফিরে এসে মিম্বরের কাছে বসা লোকগুলোর সাথে বসলাম। এরপর আবার আমার অস্থিরতা আমাকে কাবু করে ফেলল। আমি গোলামটির কাছে এসে বললাম: উমরের জন্য অনুমতি চাও। সে ভেতরে গেল, তারপর ফিরে এসে আমাকে বলল: আমি আপনার কথা তাঁকে বলেছি, কিন্তু তিনি নীরব রইলেন। যখন আমি হতাশ হয়ে চলে যেতে লাগলাম, তখন গোলামটি আমাকে ডাকল এবং বলল: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে অনুমতি দিয়েছেন।
আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। দেখলাম তিনি একটি চাটাইয়ের বালির ওপর শুয়ে আছেন। তাঁর এবং চাটাইয়ের মাঝে কোনো বিছানা ছিল না, ফলে তাঁর শরীরে চাটাইয়ের দাগ পড়ে গিয়েছিল। তিনি খেজুর গাছের ছালভরা একটি চামড়ার বালিশে হেলান দিয়েছিলেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। তারপর দাঁড়িয়ে থাকা অবস্থায় বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি আপনার স্ত্রীদের তালাক দিয়েছেন? তিনি আমার দিকে তাকালেন এবং বললেন: "না।" আমি বললাম: আল্লাহু আকবার!
তারপর আমি দাঁড়িয়ে থেকে স্বস্তি পাওয়ার জন্য বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি আমাকে দেখতেন! আমরা কুরাইশরা ছিলাম যারা স্ত্রীদের ওপর কর্তৃত্ব করতাম। যখন আমরা মদীনায় আসলাম, তখন দেখলাম তারা এমন এক কওম, যাদের ওপর তাদের স্ত্রীরা কর্তৃত্ব করে। এতে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন। এরপর আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি আমাকে দেখতেন! আমি হাফসার কাছে গিয়ে তাকে বলেছিলাম: তোমার প্রতিবেশী তোমার চেয়ে বেশি সুন্দরী এবং নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অধিক প্রিয় (অর্থাৎ আয়েশা)- এই বিষয়টি যেন তোমাকে ধোঁকায় না ফেলে। এতে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্বিতীয়বার মুচকি হাসলেন।
আমি যখন তাঁকে হাসতে দেখলাম, তখন বসে পড়লাম। আমি তাঁর ঘরের দিকে চোখ তুলে দেখলাম। আল্লাহর কসম! তাঁর ঘরে তিনটি চামড়ার পাত্র ছাড়া আর কিছুই দেখলাম না যা দৃষ্টি আকর্ষণ করে। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর কাছে দুআ করুন, যেন তিনি আপনার উম্মতকে প্রাচুর্য দান করেন। কারণ পারস্য ও রোমের লোকেরা প্রাচুর্য পেয়েছে এবং তাদেরকে দুনিয়ার ভোগ-বিলাস দেওয়া হয়েছে, অথচ তারা আল্লাহকে ইবাদত করে না। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেলান দেওয়া থেকে সোজা হয়ে বসলেন এবং বললেন: "হে খাত্তাবের পুত্র! তুমি কি এই বিষয়ে (চিন্তিত)? তারা এমন এক সম্প্রদায় যাদেরকে তাদের উত্তম বস্তু দুনিয়ার জীবনে দ্রুত দিয়ে দেওয়া হয়েছে।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন।
হাফসা যখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে সেই গোপনীয় কথা ফাঁস করে দিয়েছিলেন, সেই কথার কারণে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে উনত্রিশ রাত দূরে ছিলেন। তিনি তাদের প্রতি তীব্র রাগের কারণে বলেছিলেন: "আমি তাদের কাছে এক মাস যাব না," যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা তাঁকে তিরস্কার করলেন। যখন উনত্রিশ রাত কেটে গেল, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে দিয়েই শুরু করলেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো কসম করেছিলেন যে এক মাস আমাদের কাছে আসবেন না। অথচ আমি গুণে দেখেছি আজ উনত্রিশ রাত পূর্ণ হয়েছে। তিনি বললেন: মাস উনত্রিশ দিনেও হয়। সেই মাসটি উনত্রিশ দিনেরই হয়েছিল। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তারপর আল্লাহ তাআলা 'তাখয়ীরের' (পছন্দ দেওয়ার) আয়াত নাযিল করলেন। তিনি তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে আমাকে দিয়েই প্রথম শুরু করলেন। আমি তাঁকে পছন্দ করলাম। এরপর তিনি তাঁর সব স্ত্রীদের পছন্দ করতে দিলেন এবং তাঁরা সবাই আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতোই কথা বললেন।
6491 - عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم حلف لا يدخل على بعض أهله شهرًا، فلما مضى تسعة وعشرون يومًا غدا عليهن - أو راح - فقيل له: يا نبي الله، حَلفتَ أن لا تدخل عليهن شهرًا؟ قال:"إن الشهر يكون تسعةً وعشرين يومًا".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5202) ومسلم في الصيام (1085) من طريق ابن جريج، أخبرني يحيى بن عبد الله بن محمد بن صيفي، أن عكرمة بن عبد الرحمن بن الحارث أخبره، أن أم سلمة أخبرته، فذكرته.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কোনো কোনো স্ত্রীর নিকট এক মাস প্রবেশ করবেন না বলে কসম করলেন। অতঃপর যখন ঊনত্রিশ দিন অতিবাহিত হয়ে গেল, তখন তিনি সকালে অথবা সন্ধ্যায় তাদের কাছে গেলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: হে আল্লাহর নবী! আপনি কসম করেছিলেন যে, আপনি তাদের কাছে এক মাস প্রবেশ করবেন না? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মাস ঊনত্রিশ দিনেও হয়ে থাকে।"
6492 - عن أنس بن مالك قال: آلَى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من نسائه، وكان انفكَّتْ رجلُه، فأقام في مشربة له تسعًا وعشرين، ثم نزل، فقالوا: يا رسول الله، آليت شهرًا؟ فقال:"الشهر يكون تسع وعشرون".
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5289) عن إسماعيل بن أبي أويس، عن أخيه، عن سليمان، عن حميد الطويل، أنه سمع أنس بن مالك يقول: فذكره. ورواه في كتاب الصلاة (378) من وجه آخر عن حميد الطويل مطولًا.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে ই'লা (শপথ) করেছিলেন, আর তাঁর পা মচকে গিয়েছিল। তাই তিনি তাঁর একটি মাশরুবাতে (উপরের কামরায়) ঊনত্রিশ দিন অবস্থান করলেন। অতঃপর তিনি নেমে আসলেন। তখন লোকেরা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি এক মাসের ই'লা (শপথ) করেছিলেন? তিনি বললেন, "মাস ঊনত্রিশ দিনও হয়।"
6493 - عن جابر قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم اعتزل نساءَه شهرًا. فخرج إلينا في تسع وعشرين فقلنا: إنما اليوم تسع وعشرون فقال:"إنما الشهرة وصفّق بيديه ثلاث مرات، وحبس إصبعا واحدة في الآخرة.
صحيح: رواه مسلم في الصوم (1084) من طرق عن الليث، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের থেকে এক মাস বিচ্ছিন্ন ছিলেন। অতঃপর তিনি ঊনত্রিশতম দিনে আমাদের কাছে এলেন। আমরা বললাম: আজ তো মাত্র ঊনত্রিশ দিন। তিনি বললেন: "মাস তো (কখনো এমনও) হয়।" আর তিনি তাঁর উভয় হাত দিয়ে তিনবার ইশারা করলেন, শেষবারে একটি আঙ্গুল গুটিয়ে রাখলেন।
6494 - عن الزهري قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم أقسم أن لا يدخل على أزواجه شهرًا، قال الزهري:"فأخبرني عروة، عن عائشة قالت: لما مضت تسعٌ وعشرون ليلة أعُدُّهن، دخل عليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قالت: بدأ بي. فقلت: يا رسول الله! إنك أقسمت أن لا تدخل علينا شهرًا، وإنك دخلت من تسع وعشرين أعدهن فقال:"إن الشهر تسع وعشرون".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1083) عن عبد بن حميد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري فذكره.
قول الزهري أوله مرسل، وآخره متصل. ووصله أيضا ابن ماجه (2059) وأحمد (24743) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن أبي الرجال قال: سمعت أبي، يحدث عن عمرة، عن عائشة
قالت:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم حلف أن لا يدخل على نسائه شهرًا ....".
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الرجال فإنه حسن الحديث. وأما أبوه فهو ثقة.
وأما ما روي عن عائشة قالت:"آلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من نسائه، وحرّم، فجعل الحرام حلالًا، وجعل في اليمين كفارة" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1201) وابن ماجه (2072) وصححه ابن حبان (4278) والبيهقي (7/ 352) كلهم من طريق مسلمة بن علقمة، قال: حدثنا داود بن أبي هند، عن عامر، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.
وإسناده ضعيف من أجل مسلمة بن عَلْقمة فقد اختلف فيه، والجمهور على تضعيفه وقالوا: له أحاديث مناكير عن داود بن أبي هند، وقالوا: وهذا منها.
وأعله الترمذي بالمخالفة فقال: حديث مسلمة بن عَلْقمة عن داود، رواه علي بن مسهر وغيره، عن داود، عن الشعبي، أن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا، وليس فيه عن مسروق، عن عائشة وقال: وهذا أصح من حديث مسلمة بن علقمة.
وقال:"والإيلاء هو أن يحلف الرجل أن لا يقرب امرأته أربعة أشهر فأكثر".
وكذلك لا يصحُّ ما ذكر من سبب إيلاء النبي صلى الله عليه وسلم، أن زينب ردَّت عليه هديّتَه، وهو ما رواه ابن ماجه (2060) عن سويد بن سعيد، حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن حارثة بن محمد، عن عمرة، عن عائشة:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم إنما آلى، لأن زينب ردت عليه هديته. فقالت عائشة: لقد أقمأتك، فغضب صلى الله عليه وسلم فآلى منهن".
حارثة بن محمد وهو: ابن عبد الرحمن بن أبي الرجال، ضعيف جدًّا.
وقوله:"أقمأتك": أي أحقرتك.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কসম করেছিলেন যে, তিনি এক মাস তাঁর স্ত্রীদের কাছে প্রবেশ করবেন না। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন ২৯ (উনত্রিশ) রাত পূর্ণ হলো—যা আমি গুনে রেখেছিলাম—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট প্রবেশ করলেন। তিনি আমাকে দিয়েই শুরু করলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি কসম করেছিলেন যে, আপনি আমাদের নিকট এক মাস প্রবেশ করবেন না, অথচ আপনি ২৯ দিনেই প্রবেশ করলেন, যা আমি গুনেছি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “নিশ্চয়ই মাস ২৯ (উনত্রিশ) দিনের হয়।"
6495 - عن * *
৬৪৯৫ - থেকে * *
6496 - عن أبي سلمة قال: جاء رجل إلى ابن عباس، وأبو هريرة جالس عنده فقال: أفْتِني في امرأة ولدت بعد زوجها بأربعين ليلة، فقال ابن عباس: آخر الأجلين. قلت أنا: {وَأُولَاتُ الْأَحْمَالِ أَجَلُهُنَّ أَنْ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ} [الطلاق: 4] قال أبو هريرة: أنا مع ابن أخي، يعني أبا سلمة، فأرسل ابن عباس كُريبًا إلى أم سلمة، يسألها، فقالت: قُتل زوجُ سُبَيْعة الأسلمية وهي حُبلى، فوضعت بعد موته بأربعين ليلة، فخُطِبتْ، فأنكحَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وكان أبو السَّنابل فيمن خَطَبَها.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4909) عن سعد بن حفص، حدثنا شيبان، عن يحيى (هو ابن أبي كثير) قال: أخبرني أبو سلمة، فذكره.
ورواه مالك في الطلاق (86)، ومسلم في الطلاق (1485) من طريق عبد الوهاب - كلاهما عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري) عن سليمان بن يسار، أن عبد الله بن عباس وأبا سلمة بن عبد الرحمن بن عوف اختلفا في المرأة تنفس بعد وفاة زوجها بليال … فذكر الحديث نحوه.
وفي لفظ مالك:"قد حللتِ فانكحِي من شئت".
اختلفت الروايات في تحديد أيام وضعها بعد وفاة زوجها، فالترجيح لما في الصحيحين، ولكن المهم أنها حلت بمجرد وضعها بدون تقيد من الشارع بتحديد الأيام.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালামাহ বলেন: এক ব্যক্তি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলো, তখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পাশে বসা ছিলেন। লোকটি বলল: যে নারী তার স্বামীর মৃত্যুর চল্লিশ দিন পর সন্তান প্রসব করেছে, তার (ইদ্দতের) বিষয়ে আমাকে ফতোয়া দিন। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দুই মেয়াদের মধ্যে যা দীর্ঘতম, সেটাই (তার ইদ্দত)। আবূ সালামাহ বলেন: আমি তখন বললাম, (আল্লাহ্ তা’আলা বলেছেন) “আর গর্ভবতী নারীদের ইদ্দতকাল হলো, তাদের গর্ভস্থ সন্তান ভূমিষ্ঠ হওয়া পর্যন্ত।” [সূরা তালাক: ৪] আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার ভাতিজা—অর্থাৎ আবূ সালামাহ—এর পক্ষে। অতঃপর ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুরাইবকে উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠালেন, যেন তিনি তাঁকে জিজ্ঞেস করেন। তিনি (উম্মে সালামাহ) বললেন: সুবাইয়াহ আল-আসলামিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্বামী নিহত হয়েছিলেন যখন তিনি গর্ভবতী ছিলেন। স্বামীর মৃত্যুর চল্লিশ দিন পর তিনি সন্তান প্রসব করেন। এরপর তাঁকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়া হলো, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বিবাহ দিলেন। আবূস সানাবিল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর প্রস্তাবকারীদের মধ্যে ছিলেন।
6497 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه قال: سُئل عبد الله بن عباس، وأبو هريرة عن المرأة الحامل يتوفى عنها زوجُها؟ فقال ابن عباس: آخر الأجلين. وقال أبو هريرة: إذا ولدتْ فقد حلَّتْ. فدخل أبو سلمة بن عبد الرحمن على أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فسألها عن ذلك، فقالت أم سلمة: ولدتْ سُبَيْعة الأسلمية بعد وفاة زوجها بنصف شهر، فخطبها رجلان، أحدهما شابٌّ، والآخر كهلٌ، فحطّتْ إلى الشاب، فقال الشيخ: لم تَحِلّي بعد، وكان أهلُها غيبًا، ورجا إذا جاء أهلُها أن يؤثروه بها، فجاءتْ
رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"قد حللتِ فانكِحي من شئت".
صحيح: رواه مالك في الطلاق (83) عن عبد ربه بن سعد بن قيس، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، فذكره.
وإسناده صحيح، ومن طريق مالك أخرجه أيضا النسائي (3510).
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালামা ইবনু আবদুর রহমান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেই গর্ভবতী মহিলা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যার স্বামী মারা যায়।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দুই ইদ্দতের মধ্যে যেটি দীর্ঘতম হবে (সেটি পূর্ণ করবে)। আর আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন সে সন্তান প্রসব করবে, তখনই সে হালাল (বিবাহের জন্য মুক্ত) হয়ে যাবে।
এরপর আবূ সালামা ইবনু আবদুর রহমান (রাহিমাহুল্লাহ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন। উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সুবাই'আ আল-আসলামিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্বামী মারা যাওয়ার অর্ধ মাস পরে সন্তান প্রসব করেছিলেন। এরপর দুইজন পুরুষ তাঁকে বিবাহের প্রস্তাব দিল। তাদের একজন ছিল যুবক, আর অন্যজন ছিল বয়স্ক। সুবাই'আ যুবকের দিকে ঝুঁকলেন (তাকে পছন্দ করলেন)। তখন বয়স্ক লোকটি বলল: তুমি এখনও হালাল (বিবাহের জন্য মুক্ত) হওনি। সুবাই'আ-এর আত্মীয়-স্বজন তখন অনুপস্থিত ছিল এবং বয়স্ক লোকটি আশা করল যে তার আত্মীয়রা ফিরে এলে তারা যেন তাকেই সুবাই'আ-এর জন্য প্রাধান্য দেয়।
অতঃপর সুবাই'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি অবশ্যই হালাল হয়ে গেছ। অতএব যাকে ইচ্ছা বিবাহ করতে পারো।"
6498 - عن أم سلمة أن امرأة من أسلم يقال لها سُبَيْعة كان تحت زوجها توفي عنها وهي حُبلى، وخطبها أبو السنابل بن بعكك، فأبتْ أن تنكحه، فقال: والله ما يصلح أن تَنْكِحيه حتى تعتدِّي آخر الأجلين، فمكثت قريبا من عشر ليال، ثم جاء النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"انكحي".
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5318) عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن جعفر بن ربيعة، عن عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن أن زينب ابنة أبي سلمة أخبرته عن أمها أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم فذكرته.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসলাম গোত্রের সুবাই‘আহ (সুবাই’আহ) নাম্নী এক মহিলা তার স্বামীর বিবাহাধীনে থাকা অবস্থায় স্বামী মারা গেলেন, যখন সে গর্ভবতী ছিল। আবূ সানাবিল ইবনু বা’কাক তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিল। কিন্তু সে তাকে বিবাহ করতে অস্বীকার করল। তখন আবূ সানাবিল বলল: আল্লাহর কসম! তোমার জন্য বিবাহ করা বৈধ হবে না, যতক্ষণ না তুমি দু’টি নির্ধারিত সময়ের মধ্যে শেষ সময়টি (দীর্ঘতম) পর্যন্ত ইদ্দত পূর্ণ করো। এরপর সে প্রায় দশ রাত অবস্থান করল। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন এবং বললেন, "তুমি বিবাহ করো।"
6499 - عن عبد الله بن عتبة بن مسعود أن أباه كتب إلى عمر بن عبد الله بن الأرقم الزهري، يأمره أن يدخل على سُبيعة بنت الحارث الأسلمية، فيسألها عن حَديثها وعما قال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم حين اسْتَفَتْه. فكتب عمر بن عبد الله إلى عبد الله بن عتبة يخبره، أن سبيعة أخبرته، أنها كانت تحت سعد بن خولة. وهو في بني عامر بن لُؤي. وكان ممن شهد بدرًا. فتوفي عنها في حجة الوداع وهي حامل. فلم تَنْشبْ أن وضعتْ حملَها بعد وفاته. فلما تعلّت من نفاسها تجمَّلتْ للخُطّاب. فدخل عليها أبو السَّنابل بن بعكك (رجل من بني عبد الدار) فقال لها: ما لي أراك متجمِّلة؟ لعلكِ ترْجِين النكاح. إنك، والله! ما أنت بناكحٍ حتى تمر عليك أربعة أشهر وعشر. قالت سُبيعة: فلما قال لي ذلك، جمعتُ عليَّ ثيابي حين أمسيتُ. فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فسألته عن ذلك؟ فأفتاني بأني قد حللتُ حين وضعتُ حملي. وأمرني بالتزوج إن بدا لي.
قال ابن شهاب: فلا أرى بأسا أن تتزوج حين وضعتْ. وإن كانت في دمها. غير أن لا يقربها زوجُها حتى تطهر.
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5319) من طريق يزيد - ومسلم في الطلاق (1484) من طريق يونس بن يزيد - كلاهما عن ابن شهاب الزهري، حدثني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود أن أباه كتب إلى عمر بن عبد الله بن الأرقم الزهري، فذكره واللفظ لمسلم، وعند البخاري مختصرا جدًّا.
وعلقه في المغازي (3991) عن الليث، قال حدثني يونس، عن ابن شهاب، به فذكره بتمامه.
قال الحافظ في"الفتح" (7/ 311):"وصله في"التاريخ الكبير" قال: قال لنا عبد الله بن صالح، أنبأنا الليث" فذكره بتمامه.
আব্দুল্লাহ ইবনু উতবাহ ইবনু মাসউদ থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা উমার ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আরকাম আয-যুহরীর কাছে চিঠি লিখলেন। তিনি তাঁকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি সুবাইয়া বিনতে আল-হারিথ আল-আসলামিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করেন এবং তাঁর ঘটনা ও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে যে ফাতওয়া দিয়েছিলেন, সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেন।
উমার ইবনু আব্দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) আব্দুল্লাহ ইবনু উতবাহ-কে জবাবে লিখে জানালেন যে, সুবাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে খবর দিয়েছেন, তিনি সা'দ ইবনু খাওলা-এর বিবাহাধীনে ছিলেন। তিনি ছিলেন বানূ আমির ইবনু লুয়াই গোত্রের। সা’দ বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। বিদায় হজ্জের সময় তিনি ইন্তেকাল করেন, যখন সুবাইয়া গর্ভবতী ছিলেন। তার ইন্তেকালের অল্প কিছুদিনের মধ্যেই সুবাইয়া সন্তান প্রসব করলেন। যখন তিনি নিফাস (প্রসব-পরবর্তী স্রাব) থেকে পবিত্র হলেন, তখন তিনি বিবাহের প্রস্তাবকারীদের জন্য নিজেকে সজ্জিত করলেন।
তখন আবূস সানাবিল ইবনু বা‘কাক (বানূ আবদুদ দার গোত্রের এক ব্যক্তি) তার নিকট প্রবেশ করে বললেন: আমি তোমাকে সজ্জিত দেখছি কেন? সম্ভবত তুমি বিবাহ করার আশা করছো। আল্লাহর কসম! তোমার উপর চার মাস দশ দিন অতিবাহিত না হওয়া পর্যন্ত তুমি বিবাহ করতে পারবে না।
সুবাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন সে আমাকে এই কথা বলল, তখন সন্ধ্যা হওয়ার পর আমি কাপড় জড়ো করলাম (পরিধান করলাম)। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি আমাকে ফাতওয়া দিলেন যে, আমি সন্তান প্রসব করার সাথে সাথেই হালাল (বিবাহের জন্য মুক্ত) হয়ে গেছি। আর তিনি আমাকে ইচ্ছা হলে বিবাহ করার আদেশ দিলেন।
ইবনু শিহাব (আয-যুহরী) বলেন: আমার মতে, সন্তান প্রসবের সাথে সাথেই তার বিবাহ করতে কোনো অসুবিধা নেই, যদি সে তখনো নিফাসের রক্তস্রাবের মধ্যে থাকেও। তবে তার স্বামী পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত তার কাছে যেতে পারবে না।
6500 - عن محمد بن سيرين قال: جلست إلى مجلس فيه عُظْم من الأنصار، وفيهم عبد الرحمن بن أبي ليلى، فذكرتُ حديث عبد الله بن عتبة في شأن سُبيعة بنت الحارث. فقال عبد الرحمن: ولكن عمّه كان لا يقول ذلك فقلت: إني لجريء إن كذبتُ على رجل في جانب الكوفة، ورفع صوته، قال: ثم خرجتُ، فلقيتُ مالك بن عامر أو مالك بن عوف. قلت: كيف كان قول ابن مسعود في المتوفى عنها زوجُها. وهي حامل؟ فقال: قال ابن مسعود: أتجعلون عليها التغليظَ، ولا تجعلون لها الرخصة؟ لنزلتْ سورةُ النساء القصري بعد الطولي.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4532) عن حبان، حدثنا عبد الله، أخبرنا عبد الله بن عون، عن محمد بن سيرين فذكره.
وذكره معلقا في تفسير سورة الطلاق (4910).
وقوله:"عمه كان لا يقول ذلك". المراد به عبد الله بن مسعود ما كان يقول بهذا سُبيعة بنت الحارث. إلا أن هذا النقل منه ليس بصحيح، فإن ابن مسعود كان يقول خلاف ذلك، فلعله كان يقول أولًا ثم رجع عنه، أو وهم الناقل عنه كذا قاله ابن حجر.
وقوله: سورة النساء القصرى - أي سورة الطلاق.
وقوله: بعد الطولى: أي بعد البقرة.
ففي سورة البقرة: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} [البقرة: 234].
وفي سورة الطلاق: {وَأُولَاتُ الْأَحْمَالِ أَجَلُهُنَّ أَنْ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ} [سورة الطلاق: 4].
ومراد ابن مسعود أنه وقع نسخ، فالمتأخر هو الناسخ.
وإلى هذا يُشير ابن مسعود بقوله:"من شاء لاعنتُه لأُنزلتْ سورة النساء القصري بعد الأربعة الأشهر وعشرا" والملاعنة هنا بمعنى: المباهلة.
رواه أبو داود (2307) وابن ماجه (2030) بإسناد صحيح.
قال الحافظ ابن حجر:"وإلا فالتحقيقُ أن لا نسخ هناك، بل عموم آية البقرة، مخصوصٌ بأية الطلاق"."الفتح" (8/ 656)
মুহাম্মদ ইবনে সিরীন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এমন এক মজলিসে বসলাম যেখানে আনসারদের মধ্যের বিশিষ্টজনেরা ছিলেন এবং তাঁদের মধ্যে আবদুর রহমান ইবনে আবী লায়লাও ছিলেন। তখন আমি সুবায়আ বিনত আল-হারিছ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয় নিয়ে আবদুল্লাহ ইবনে উতবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি উল্লেখ করলাম। তখন আবদুর রহমান (ইবনে আবী লায়লা) বললেন, কিন্তু তাঁর চাচা তা বলতেন না। আমি বললাম, আমি যদি কুফার কোনো লোক সম্পর্কে মিথ্যা বলি, তবে আমি অবশ্যই খুব দুঃসাহসী। (তিনি তাঁর কণ্ঠস্বর উঁচু করলেন)। [মুহাম্মদ ইবনে সিরীন] বলেন, এরপর আমি বেরিয়ে পড়লাম। এরপর আমি মালিক ইবনে আমির অথবা মালিক ইবনে আওফের সাথে দেখা করলাম। আমি তাঁকে বললাম, যে মহিলার স্বামী ইন্তেকাল করেছে এবং সে গর্ভবতী, তার সম্পর্কে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য কী ছিল? তিনি বললেন, ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: তোমরা কি তার উপর কঠোরতা আরোপ করবে, আর তার জন্য সহজতা/সুযোগ রাখবে না? (কারণ) ছোট সূরাহ নিসা (সূরাহ ত্বালাক্ব), দীর্ঘ সূরাহ নিসা (সূরাহ বাকারাহ)-এর পরে অবতীর্ণ হয়েছে।
6501 - عن المسور بن مخرمة أنه أخبره أن سُبيعة الأسلمة نُفِسَتْ بعد وفاة زوجها بليال، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد حللتِ فانكِحي من شئتِ".
صحيح: رواه مالك في الطلاق (58) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة، به، فذكره. ورواه البخاري في الطلاق (5320) من طريق مالك، به، بنحوه.
মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুবাই‘আ আল-আসলামিয়্যা তাঁর স্বামীর মৃত্যুর কয়েক রাত পর সন্তান প্রসব করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি (ইদ্দত থেকে) মুক্ত হয়ে গেছ। সুতরাং তুমি যাকে ইচ্ছা বিবাহ করো।"
6502 - عن أم الطفيل امرأة أبي بن كعب قالت: إنها سمعت عمر بن الخطاب وأبي بن كعب يختصمان، فقالت أم الطفيل: أفلا يسأل عمرُ بن الخطاب سُبيعة الأسلمية؟ توفي عنها زوجها وهي حامل، فوضعت بعد ذلك بأيام، فأنكحها رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أحمد (27109) عن يحيى بن إسحاق وقتيبة بن سعيد، قالا: حدثنا ابن لهيعة، عن بكير بن عبد الله بن الأشج، عن بسر بن سعيد، قال: سمعت أم الطفيل، فذكرته. وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة، فإن سماع قتيبة بن سعيد كان قبل اختلاطه.
উম্মুল তুফাইল থেকে বর্ণিত, যিনি উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন। তিনি বলেন: তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিতর্ক করতে শুনেছিলেন। তখন উম্মুল তুফাইল বললেন: উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেন সুবাই'আহ আল-আসলামিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করছেন না? তার স্বামী মারা যান যখন তিনি ছিলেন গর্ভবতী। এরপর তিনি কয়েকদিন পরেই সন্তান প্রসব করেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (সন্তান প্রসবের পর) বিবাহ করিয়ে দেন।
6503 - عن أبي السنابل بن بعكك قال: وضعتْ سُبيعةُ بعد وفاة زوجها بثلاثة وعشرين، أو خمسة وعشرين يومًا. فلما تعلّتْ تشوّفتْ للنكاح فأنكر عليها. فذُكِر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"إن تفعل فقد حلَّ أجلُها".
صحيح: رواه الترمذي (1193) والنسائي (3508) وابن ماجه (2027) وأحمد (18713) وصحّحه ابن حبان (4299) كلهم من حديث منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن أبي السنابل فذكره.
قال الترمذي:"حديث أبي السنابل حديث مشهور من هذا الوجه، ولانعرف للأسود سماعًا من أبي السنابل، وسمعت محمدًا يقول: لا أعرف أن أبا السنابل عاش بعد النبي صلى الله عليه وسلم".
كذا قال البخاري على قاعدته في اشتراط ثبوت اللقاء، ولو مرة، والأسود بن يزيد النخعي من كبار التابعين من أصحاب ابن مسعود، ولم يُوصف بالتدليس، فالحديث صحيح على شرط مسلم قاله الحافظ ابن حجر في"الفتح" (9/ 472).
আবূস সানাবিল ইবনু বা'কাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সুবাই'আহ তার স্বামীর মৃত্যুর তেইশ দিন বা পঁচিশ দিন পরে সন্তান প্রসব করেন। এরপর তিনি যখন সুস্থ হলেন, তখন বিবাহের জন্য আগ্রহ প্রকাশ করলেন। এতে লোকেরা তাকে তিরস্কার করলো। অতঃপর বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করা হলে তিনি বললেন: "যদি সে তা করে (অর্থাৎ বিবাহ করে), তবে তার ইদ্দতকাল সমাপ্ত হয়ে গেছে।"
6504 - عن مسروق وعمرو بن عتبة، أنهما كتبا إلى سُبيعة بنت الحارث يسألانها عن أمرها. فكتبت إليهما: أنها وضعت بعد وفاة زوجها بخمسة وعشرين. فتهيأت تطلب الخير. فمَرَّ بها أبو السنابل بن بعكك. فقال: قد أسرعت. اعتدي آخر الأجلين، أربعة أشهر وعشرا. فأتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم. فقلتُ: يا رسول الله، استغفر لي. قال"وفيم ذاك؟" فأخبرته. فقال:"إن وجدت زوجا صالحا فتزوجي".
صحيح: رواه ابن ماجه (2028) حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا علي بن مسهر، عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن مسروق وعمرو بن عتبة، فذكراه. وإسناده صحيح.
وأبو السنابل اختلف في اسمه كثيرًا، وقد جزم العسكري أن اسمه كنيته.
وأما قول البخاري:"لا يصح أن أبا السنابل عاش بعد النبي صلى الله عليه وسلم فقد جزم ابن سعد أنه بقيَ بعد النبي صلى الله عليه وسلم زمنا".
وقال البرقي:"إن أبا السنابل تزوّج سُبيعةَ بعد ذلك، فولد له سنابل بن أبي السنابل".
وسكن بعد ذلك في مكة، وقيل: الكوفة، وفي كل ذلك إشارة إلى أنه عاش بعد النبي صلى الله عليه وسلم زمنا. فلا يبعد سماع الأسود منه.
وقوله:"تعلّت" أي ارتفعتْ بمعني طهرتْ من النفاس.
وقوله:"فتشوّفت" بالفاء أي طمعت، وتشوقت للنكاح.
قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، أن الحامل المتوفى عنها زوجُها، إذا وضعتْ فقد حلَّ الترويجُ لها، وإن لم تكن انقضت عدّتُها. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق"، وقال بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم:"تعتد آخر الأجلين" والقول الأول أصح. انتهى.
والحامل المطلقة حكمها حكمُ الحامل المتوفَّى عنها زوجُها.
وأما ما روي عن الزبير بن العوام أنه كانت عنده أم كلثوم بنت عقبة فقالت له: وهي حامل: طيِّب نفسي بتطلّيقة. فطلّقها تطليقة، ثم خرج إلى الصلاة، فرجع وقد وضعتْ. فقال: ما لها؟ خدعتْني خدعها الله، ثم أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"سبق الكتابُ أجلَه، اخطبها إلى نفسها" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (2064) محمد بن عمر بن هياج قال: حدثنا قبيصة بن عقبة، قال: حدثنا سفيان، عن عمرو بن ميمون، عن أبيه، عن الزبير بن العوام فذكره.
قلت: فيه قبيصة بن عقبة، تكلموا في روايته عن سفيان الثوري لصغر سنه، فكان يغلط في روايته عنه، وفيه أيضا الانقطاع فإن ميمون وهو: ابن مهران روايته عن الزبير بن العوام مرسلة كما قال البوصبري: ولكن رواه البيهقي (7/ 421) من وجه آخر عن عبيد الله الأشجعي، عن عمرو بن ميمون، عن أبيه، عن أم كلثوم بنت عقبة أنها كانت تحت الزبير، فجاءته، وهو يتوضأ فذكر القصة.
وعبيد الله الأشجعي أثبت في سفيان من قبيصة بن عقبة، وجعل الحديث من مسند أم كلثوم وهذا أصح من ذاك، ولكن علة الإرسال لا تزال موجودة فيه، فإن ميمون بن مهران ولد سنة (40) كما في تهذيب الكمال، وأم كلثوم بنت عقبة من المهاجرات، هاجرت إلى المدينة وليس لها زوج في مكة فتزوجها زيد بن حارثة، فقتل، ثم تزوجها الزبير بن العوام، ثم طلقها، ثم تزوج عبد الرحمن بن عوف، فمات عنها، ثم تزوجها عمرو بن العاص فماتت عنده.
وعمرو بن العاص مات سنة (43 هـ) على الصحيح كما قال ابن حجر في"التهذيب"، وقيل: إن أم كلثوم بنت عقبة ماتت في خلافة علي الذي مات سنة (40 هـ).
وبهذا تبين أن لقاء ميمون بن مهران لا يمكن مع أم كلثوم بنت عقبة أيضا وإن كانت متأخرة الوفاة من الزبير بن العوام وبالله التوفيق.
والأمر الذي لا خلاف فيه أن المطلَّقةَ الحاملَ عدّتُها الوضع لقوله تعالى، كما سبق، ولأن
العدة شرعت لاستبراء الرحم.
وقد روي عن ابن مسعود أنه قال:"أجل كل حامل أن تضع ما في بطنها".
والحداد تابع للعدة، فإن كانت المرأةُ الحامل المتوفى عنها زوجُها في الأشهر الأول من الحمل، فحدادها يستمر إلى الوضع، ولو بلغ تسعة أشهر أو زيادة.
সুবাইয়া বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসরূক ও আমর ইবনে উতবাহ তাঁকে তাঁর (ইদ্দতের) বিষয়ে জিজ্ঞেস করে চিঠি লিখেছিলেন। তিনি উত্তরে তাঁদের নিকট লিখলেন: তাঁর স্বামী মারা যাওয়ার পঁচিশ দিন পর তিনি সন্তান প্রসব করেন। এরপর তিনি (বিবাহের জন্য) প্রস্তুত হলেন। তখন আবূ সানাবিল ইবনু বা‘কাক্ক তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: তুমি তো খুব দ্রুত করছো। শেষ যে সময়সীমা (ইদ্দতের) রয়েছে, অর্থাৎ চার মাস দশ দিন পর্যন্ত ইদ্দত পালন করো। আমি তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। তিনি বললেন: "সেটা কীসের জন্য?" আমি তাঁকে (ঘটনাটি) জানালাম। তখন তিনি বললেন: "যদি তুমি কোনো সৎ ও উপযুক্ত স্বামী পাও, তবে তাকে বিবাহ করো।"
6505 - عن عائشة وحفصة زوجي النبي صلى الله عليه وسلم، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحلُّ لامرأةٍ تؤمن بالله واليوم الآخر أن تُحِدَّ على ميتٍ فوق ثلاث ليالٍ إلا على زوج".
صحيح: رواه مالك في الطلاق (104) عن نافع، عن صفية بنت أبي عبيد، عن عائشة وحفصة، فذكرتاه. ورواه مسلم في الطلاق (1490) من طريق الليث بن سعد، عن نافع، به، مثله.
وزاد في رواية يحيى بن سعيد، عن نافع من حديث حفصة وحدها:"فإنها تُجِدّ عليه أربعة أشهر وعَشْرًا".
আয়িশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা উভয়েই ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে নারী আল্লাহ ও আখেরাত দিবসের ওপর বিশ্বাস রাখে, তার জন্য স্বামীর (মৃত্যু) ব্যতীত অন্য কোনো মৃত ব্যক্তির জন্য তিন রাতের বেশি শোক পালন করা বৈধ নয়।"
[অপর একটি বর্ণনায় বলা হয়েছে যে, স্বামীর জন্য] "সে চার মাস দশ দিন শোক পালন করবে।"
6506 - عن زينب ابنة أبي سلمة قالت: لما جاء نعي أبي سفيان من الشام دعتْ أم حبيبة بصفرة في اليوم الثالث، فمحتْ عارضَيها وذِراعَيها وقالت: إني كنت عن هذا لغنية، لولا أني سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل لامرأةٍ تؤمن بالله واليوم الآخر أن تُحِدّ على ميت فوق ثلاث، إلا على زوج فإنها تُجِدُّ عليه أربعة أشهر وعشرًا".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1280) ومسلم في الطلاق (1486) كلاهما من حديث سفيان، حدثنا أيوب بن موسى، قال: أخبرني حميد بن نافع، عن زينب ابنة أبي سلمة فذكرت مثله، ولفظهما سواء.
যায়নাব বিনতে আবী সালামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবূ সুফইয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর খবর শাম থেকে আসলো, তখন উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (শোক পালনের) তৃতীয় দিন হলুদ রং আনালেন। অতঃপর তিনি তাঁর গাল ও দু'হাতে মালিশ করলেন (বা মুছে দিলেন) এবং বললেন: আমার এর কোনো প্রয়োজন ছিল না, যদি না আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে না শুনতাম: "যে নারী আল্লাহ ও পরকালে বিশ্বাস করে, তার জন্য তিন দিনের বেশি কারো (মৃত্যুতে) শোক পালন করা বৈধ নয়, তবে স্বামীর (মৃত্যুতে শোক পালন করা বৈধ)। স্বামীর (মৃত্যুতে) সে চার মাস দশ দিন শোক পালন করবে।"
6507 - عن أم عطية قالت: كنا نُنْهي أن نُحِدّ على ميت فوق ثلاث إلا على زوج أربعة أشهر وعشرًا، ولا نكتحلُ ولا نتطيبُ ولا نلبسُ ثوبًا مصبوغًا إلا ثوب عصب.
وقد رُخِّصَ لنا عند الطهر إذا اغتسلت إحدانا من محيضها في نبذة من كُستِ أظفار. وكُنّا نُنْهى عن اتباع الجنائز.
وفي رواية: عن محمد بن سيرين قال: تُوفي ابن لأم عطية. فلما كان اليوم الثالث دعتْ بصفرةٍ فتمسحتْ به وقالت: نُهينا أن نُحِدّ أكثر من ثلاثٍ إلا بزوج.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (313) عن عبد الله بن عبد الوهاب، قال: حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن حفصة.
قال أبو عبد الله: أو هشام بن حسان، عن حفصة، عن أم عطية فذكرت مثله.
ورواه مسلم في الجنائز (938) من حديث أيوب، عن محمد بن سيرين ومن حديث هشام عن
حفصة - كلاهما عن أم عطية مقتصرا على قوله:"نهينا عن اتباع الجنائز ولم يُعزم علينا".
والرواية الثانية عند البخاري (1279) من طريق سلمة بن علقمة، عن محمد بن سيرين بإسناده مثله.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদেরকে (নারীদেরকে) নির্দেশ দেওয়া হতো যে কোনো মৃতের জন্য তিন দিনের বেশি শোক পালন না করার জন্য, শুধুমাত্র স্বামীর মৃত্যু ছাড়া (স্বামীর জন্য শোক পালনের সময়কাল চার মাস দশ দিন)।
(শোক পালনের সময়) আমরা সুরমা ব্যবহার করতাম না, সুগন্ধি ব্যবহার করতাম না এবং রং করা কাপড়ও পরিধান করতাম না, তবে 'আসাব' (নামক বিশেষ ধরনের ডোরাকাটা) কাপড় ব্যতীত। আর আমাদেরকে এই অনুমতি দেওয়া হয়েছিল যে, যখন আমাদের কেউ মাসিক থেকে পবিত্র হয়ে গোসল করত, তখন সামান্য পরিমাণ 'কুস্ত আযফার' (এক প্রকার সুগন্ধি) ব্যবহার করতে পারত। আর আমাদেরকে জানাযার পিছু পিছু যেতে (অনুসরণ করতে) নিষেধ করা হয়েছিল।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, (উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) ছেলের ইন্তিকাল হলে যখন তৃতীয় দিন হলো, তখন তিনি হলুদ রঙের সুগন্ধি আনালেন এবং তা মেখে বললেন: আমাদেরকে স্বামীর মৃত্যু ব্যতীত অন্য কারও জন্য তিন দিনের বেশি শোক পালন করতে নিষেধ করা হয়েছে।
