হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6501)


6501 - عن المسور بن مخرمة أنه أخبره أن سُبيعة الأسلمة نُفِسَتْ بعد وفاة زوجها بليال، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد حللتِ فانكِحي من شئتِ".
صحيح: رواه مالك في الطلاق (58) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة، به، فذكره. ورواه البخاري في الطلاق (5320) من طريق مالك، به، بنحوه.




মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুবাই‘আ আল-আসলামিয়্যা তাঁর স্বামীর মৃত্যুর কয়েক রাত পর সন্তান প্রসব করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি (ইদ্দত থেকে) মুক্ত হয়ে গেছ। সুতরাং তুমি যাকে ইচ্ছা বিবাহ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6502)


6502 - عن أم الطفيل امرأة أبي بن كعب قالت: إنها سمعت عمر بن الخطاب وأبي بن كعب يختصمان، فقالت أم الطفيل: أفلا يسأل عمرُ بن الخطاب سُبيعة الأسلمية؟ توفي عنها زوجها وهي حامل، فوضعت بعد ذلك بأيام، فأنكحها رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أحمد (27109) عن يحيى بن إسحاق وقتيبة بن سعيد، قالا: حدثنا ابن لهيعة، عن بكير بن عبد الله بن الأشج، عن بسر بن سعيد، قال: سمعت أم الطفيل، فذكرته. وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة، فإن سماع قتيبة بن سعيد كان قبل اختلاطه.




উম্মুল তুফাইল থেকে বর্ণিত, যিনি উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন। তিনি বলেন: তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিতর্ক করতে শুনেছিলেন। তখন উম্মুল তুফাইল বললেন: উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেন সুবাই'আহ আল-আসলামিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করছেন না? তার স্বামী মারা যান যখন তিনি ছিলেন গর্ভবতী। এরপর তিনি কয়েকদিন পরেই সন্তান প্রসব করেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (সন্তান প্রসবের পর) বিবাহ করিয়ে দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6503)


6503 - عن أبي السنابل بن بعكك قال: وضعتْ سُبيعةُ بعد وفاة زوجها بثلاثة وعشرين، أو خمسة وعشرين يومًا. فلما تعلّتْ تشوّفتْ للنكاح فأنكر عليها. فذُكِر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"إن تفعل فقد حلَّ أجلُها".

صحيح: رواه الترمذي (1193) والنسائي (3508) وابن ماجه (2027) وأحمد (18713) وصحّحه ابن حبان (4299) كلهم من حديث منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن أبي السنابل فذكره.

قال الترمذي:"حديث أبي السنابل حديث مشهور من هذا الوجه، ولانعرف للأسود سماعًا من أبي السنابل، وسمعت محمدًا يقول: لا أعرف أن أبا السنابل عاش بعد النبي صلى الله عليه وسلم".

كذا قال البخاري على قاعدته في اشتراط ثبوت اللقاء، ولو مرة، والأسود بن يزيد النخعي من كبار التابعين من أصحاب ابن مسعود، ولم يُوصف بالتدليس، فالحديث صحيح على شرط مسلم قاله الحافظ ابن حجر في"الفتح" (9/ 472).




আবূস সানাবিল ইবনু বা'কাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সুবাই'আহ তার স্বামীর মৃত্যুর তেইশ দিন বা পঁচিশ দিন পরে সন্তান প্রসব করেন। এরপর তিনি যখন সুস্থ হলেন, তখন বিবাহের জন্য আগ্রহ প্রকাশ করলেন। এতে লোকেরা তাকে তিরস্কার করলো। অতঃপর বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করা হলে তিনি বললেন: "যদি সে তা করে (অর্থাৎ বিবাহ করে), তবে তার ইদ্দতকাল সমাপ্ত হয়ে গেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6504)


6504 - عن مسروق وعمرو بن عتبة، أنهما كتبا إلى سُبيعة بنت الحارث يسألانها عن أمرها. فكتبت إليهما: أنها وضعت بعد وفاة زوجها بخمسة وعشرين. فتهيأت تطلب الخير. فمَرَّ بها أبو السنابل بن بعكك. فقال: قد أسرعت. اعتدي آخر الأجلين، أربعة أشهر وعشرا. فأتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم. فقلتُ: يا رسول الله، استغفر لي. قال"وفيم ذاك؟" فأخبرته. فقال:"إن وجدت زوجا صالحا فتزوجي".

صحيح: رواه ابن ماجه (2028) حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا علي بن مسهر، عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن مسروق وعمرو بن عتبة، فذكراه. وإسناده صحيح.

وأبو السنابل اختلف في اسمه كثيرًا، وقد جزم العسكري أن اسمه كنيته.

وأما قول البخاري:"لا يصح أن أبا السنابل عاش بعد النبي صلى الله عليه وسلم فقد جزم ابن سعد أنه بقيَ بعد النبي صلى الله عليه وسلم زمنا".
وقال البرقي:"إن أبا السنابل تزوّج سُبيعةَ بعد ذلك، فولد له سنابل بن أبي السنابل".

وسكن بعد ذلك في مكة، وقيل: الكوفة، وفي كل ذلك إشارة إلى أنه عاش بعد النبي صلى الله عليه وسلم زمنا. فلا يبعد سماع الأسود منه.

وقوله:"تعلّت" أي ارتفعتْ بمعني طهرتْ من النفاس.

وقوله:"فتشوّفت" بالفاء أي طمعت، وتشوقت للنكاح.

قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، أن الحامل المتوفى عنها زوجُها، إذا وضعتْ فقد حلَّ الترويجُ لها، وإن لم تكن انقضت عدّتُها. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق"، وقال بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم:"تعتد آخر الأجلين" والقول الأول أصح. انتهى.

والحامل المطلقة حكمها حكمُ الحامل المتوفَّى عنها زوجُها.

وأما ما روي عن الزبير بن العوام أنه كانت عنده أم كلثوم بنت عقبة فقالت له: وهي حامل: طيِّب نفسي بتطلّيقة. فطلّقها تطليقة، ثم خرج إلى الصلاة، فرجع وقد وضعتْ. فقال: ما لها؟ خدعتْني خدعها الله، ثم أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"سبق الكتابُ أجلَه، اخطبها إلى نفسها" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (2064) محمد بن عمر بن هياج قال: حدثنا قبيصة بن عقبة، قال: حدثنا سفيان، عن عمرو بن ميمون، عن أبيه، عن الزبير بن العوام فذكره.

قلت: فيه قبيصة بن عقبة، تكلموا في روايته عن سفيان الثوري لصغر سنه، فكان يغلط في روايته عنه، وفيه أيضا الانقطاع فإن ميمون وهو: ابن مهران روايته عن الزبير بن العوام مرسلة كما قال البوصبري: ولكن رواه البيهقي (7/ 421) من وجه آخر عن عبيد الله الأشجعي، عن عمرو بن ميمون، عن أبيه، عن أم كلثوم بنت عقبة أنها كانت تحت الزبير، فجاءته، وهو يتوضأ فذكر القصة.

وعبيد الله الأشجعي أثبت في سفيان من قبيصة بن عقبة، وجعل الحديث من مسند أم كلثوم وهذا أصح من ذاك، ولكن علة الإرسال لا تزال موجودة فيه، فإن ميمون بن مهران ولد سنة (40) كما في تهذيب الكمال، وأم كلثوم بنت عقبة من المهاجرات، هاجرت إلى المدينة وليس لها زوج في مكة فتزوجها زيد بن حارثة، فقتل، ثم تزوجها الزبير بن العوام، ثم طلقها، ثم تزوج عبد الرحمن بن عوف، فمات عنها، ثم تزوجها عمرو بن العاص فماتت عنده.

وعمرو بن العاص مات سنة (43 هـ) على الصحيح كما قال ابن حجر في"التهذيب"، وقيل: إن أم كلثوم بنت عقبة ماتت في خلافة علي الذي مات سنة (40 هـ).

وبهذا تبين أن لقاء ميمون بن مهران لا يمكن مع أم كلثوم بنت عقبة أيضا وإن كانت متأخرة الوفاة من الزبير بن العوام وبالله التوفيق.

والأمر الذي لا خلاف فيه أن المطلَّقةَ الحاملَ عدّتُها الوضع لقوله تعالى، كما سبق، ولأن
العدة شرعت لاستبراء الرحم.

وقد روي عن ابن مسعود أنه قال:"أجل كل حامل أن تضع ما في بطنها".

والحداد تابع للعدة، فإن كانت المرأةُ الحامل المتوفى عنها زوجُها في الأشهر الأول من الحمل، فحدادها يستمر إلى الوضع، ولو بلغ تسعة أشهر أو زيادة.




সুবাইয়া বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসরূক ও আমর ইবনে উতবাহ তাঁকে তাঁর (ইদ্দতের) বিষয়ে জিজ্ঞেস করে চিঠি লিখেছিলেন। তিনি উত্তরে তাঁদের নিকট লিখলেন: তাঁর স্বামী মারা যাওয়ার পঁচিশ দিন পর তিনি সন্তান প্রসব করেন। এরপর তিনি (বিবাহের জন্য) প্রস্তুত হলেন। তখন আবূ সানাবিল ইবনু বা‘কাক্ক তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: তুমি তো খুব দ্রুত করছো। শেষ যে সময়সীমা (ইদ্দতের) রয়েছে, অর্থাৎ চার মাস দশ দিন পর্যন্ত ইদ্দত পালন করো। আমি তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। তিনি বললেন: "সেটা কীসের জন্য?" আমি তাঁকে (ঘটনাটি) জানালাম। তখন তিনি বললেন: "যদি তুমি কোনো সৎ ও উপযুক্ত স্বামী পাও, তবে তাকে বিবাহ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6505)


6505 - عن عائشة وحفصة زوجي النبي صلى الله عليه وسلم، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحلُّ لامرأةٍ تؤمن بالله واليوم الآخر أن تُحِدَّ على ميتٍ فوق ثلاث ليالٍ إلا على زوج".

صحيح: رواه مالك في الطلاق (104) عن نافع، عن صفية بنت أبي عبيد، عن عائشة وحفصة، فذكرتاه. ورواه مسلم في الطلاق (1490) من طريق الليث بن سعد، عن نافع، به، مثله.

وزاد في رواية يحيى بن سعيد، عن نافع من حديث حفصة وحدها:"فإنها تُجِدّ عليه أربعة أشهر وعَشْرًا".




আয়িশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা উভয়েই ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে নারী আল্লাহ ও আখেরাত দিবসের ওপর বিশ্বাস রাখে, তার জন্য স্বামীর (মৃত্যু) ব্যতীত অন্য কোনো মৃত ব্যক্তির জন্য তিন রাতের বেশি শোক পালন করা বৈধ নয়।"

[অপর একটি বর্ণনায় বলা হয়েছে যে, স্বামীর জন্য] "সে চার মাস দশ দিন শোক পালন করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6506)


6506 - عن زينب ابنة أبي سلمة قالت: لما جاء نعي أبي سفيان من الشام دعتْ أم حبيبة بصفرة في اليوم الثالث، فمحتْ عارضَيها وذِراعَيها وقالت: إني كنت عن هذا لغنية، لولا أني سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل لامرأةٍ تؤمن بالله واليوم الآخر أن تُحِدّ على ميت فوق ثلاث، إلا على زوج فإنها تُجِدُّ عليه أربعة أشهر وعشرًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1280) ومسلم في الطلاق (1486) كلاهما من حديث سفيان، حدثنا أيوب بن موسى، قال: أخبرني حميد بن نافع، عن زينب ابنة أبي سلمة فذكرت مثله، ولفظهما سواء.




যায়নাব বিনতে আবী সালামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবূ সুফইয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর খবর শাম থেকে আসলো, তখন উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (শোক পালনের) তৃতীয় দিন হলুদ রং আনালেন। অতঃপর তিনি তাঁর গাল ও দু'হাতে মালিশ করলেন (বা মুছে দিলেন) এবং বললেন: আমার এর কোনো প্রয়োজন ছিল না, যদি না আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে না শুনতাম: "যে নারী আল্লাহ ও পরকালে বিশ্বাস করে, তার জন্য তিন দিনের বেশি কারো (মৃত্যুতে) শোক পালন করা বৈধ নয়, তবে স্বামীর (মৃত্যুতে শোক পালন করা বৈধ)। স্বামীর (মৃত্যুতে) সে চার মাস দশ দিন শোক পালন করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6507)


6507 - عن أم عطية قالت: كنا نُنْهي أن نُحِدّ على ميت فوق ثلاث إلا على زوج أربعة أشهر وعشرًا، ولا نكتحلُ ولا نتطيبُ ولا نلبسُ ثوبًا مصبوغًا إلا ثوب عصب.

وقد رُخِّصَ لنا عند الطهر إذا اغتسلت إحدانا من محيضها في نبذة من كُستِ أظفار. وكُنّا نُنْهى عن اتباع الجنائز.

وفي رواية: عن محمد بن سيرين قال: تُوفي ابن لأم عطية. فلما كان اليوم الثالث دعتْ بصفرةٍ فتمسحتْ به وقالت: نُهينا أن نُحِدّ أكثر من ثلاثٍ إلا بزوج.

متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (313) عن عبد الله بن عبد الوهاب، قال: حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن حفصة.

قال أبو عبد الله: أو هشام بن حسان، عن حفصة، عن أم عطية فذكرت مثله.

ورواه مسلم في الجنائز (938) من حديث أيوب، عن محمد بن سيرين ومن حديث هشام عن
حفصة - كلاهما عن أم عطية مقتصرا على قوله:"نهينا عن اتباع الجنائز ولم يُعزم علينا".

والرواية الثانية عند البخاري (1279) من طريق سلمة بن علقمة، عن محمد بن سيرين بإسناده مثله.




উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদেরকে (নারীদেরকে) নির্দেশ দেওয়া হতো যে কোনো মৃতের জন্য তিন দিনের বেশি শোক পালন না করার জন্য, শুধুমাত্র স্বামীর মৃত্যু ছাড়া (স্বামীর জন্য শোক পালনের সময়কাল চার মাস দশ দিন)।

(শোক পালনের সময়) আমরা সুরমা ব্যবহার করতাম না, সুগন্ধি ব্যবহার করতাম না এবং রং করা কাপড়ও পরিধান করতাম না, তবে 'আসাব' (নামক বিশেষ ধরনের ডোরাকাটা) কাপড় ব্যতীত। আর আমাদেরকে এই অনুমতি দেওয়া হয়েছিল যে, যখন আমাদের কেউ মাসিক থেকে পবিত্র হয়ে গোসল করত, তখন সামান্য পরিমাণ 'কুস্ত আযফার' (এক প্রকার সুগন্ধি) ব্যবহার করতে পারত। আর আমাদেরকে জানাযার পিছু পিছু যেতে (অনুসরণ করতে) নিষেধ করা হয়েছিল।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, (উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) ছেলের ইন্তিকাল হলে যখন তৃতীয় দিন হলো, তখন তিনি হলুদ রঙের সুগন্ধি আনালেন এবং তা মেখে বললেন: আমাদেরকে স্বামীর মৃত্যু ব্যতীত অন্য কারও জন্য তিন দিনের বেশি শোক পালন করতে নিষেধ করা হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6508)


6508 - عن حُميد بن نافع، عن زينب بنت أبي سلمة، أنها أخبرتْه هذه الأحاديث الثلاثة.

قالت زينب: دخلتُ على أم حبيبة، زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين توفي أبوها أبو سفيان بن حرب. فدعتْ أمُّ حبيبة بطيب فيه صفرةٌ خلوقٌ أو غيره. فدهنتْ به جاريةً. ثم مسحتْ بعارضَيْها. ثم قالت: والله، ما لي بالطيب من حاجةٍ، غير أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل لامرأة تُؤمن بالله واليوم الآخر أن تُحِدَّ على ميت فوق ثلاث ليال، إلا على زوج أربعة أشهرٍ وعشرًا". (هذا أولها).

قالت زينب: ثم دخلت على زينب بنت جحش، زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين تُوُفّي أخوها، فدعتْ بطيب فمسّتْ منه. ثم قالت: والله ما لي بالطيب من حاجة غير أني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: ولا يحل لامرأة تُؤمن بالله واليوم الآخر أن تُحِدَّ على ميت فوق ثلاث ليال، إلا على زوج أربعة أشهرٍ وعشرًا". (هذا ثانيها).

متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (101 - 102) عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن حُميد بن نافع، به، فذكره.

ورواه البخاري في الطلاق (5334، 5335) ومسلم في الطلاق (1486 - 1489) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




যায়নাব বিনত আবি সালামা থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁকে এই তিনটি হাদীস বর্ণনা করেছেন।

যায়নাব বিনত আবি সালামা বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম, যখন তাঁর পিতা আবূ সুফিয়ান ইবনু হারব ইনতিকাল করলেন। তখন উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমন সুগন্ধি আনতে বললেন, যাতে হলুদ রঙ (খুলূক বা অন্য কিছু) ছিল। তিনি তা দিয়ে একজন দাসীকে সুগন্ধি মাখালেন। এরপর তিনি নিজের কপালের দু’পাশে (অল্প) মালিশ করলেন। এরপর তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! সুগন্ধির প্রতি আমার কোনো প্রয়োজন ছিল না। তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে নারী আল্লাহ ও আখিরাতের প্রতি ঈমান রাখে, তার জন্য কোনো মৃতের জন্য তিন দিনের বেশি শোক পালন করা বৈধ নয়, তবে স্বামীর জন্য চার মাস দশ দিন (শোক পালন করবে)।" (এটি প্রথম ঘটনা)।

যায়নাব বিনত আবি সালামা বললেন: এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম, যখন তাঁর ভাই ইনতিকাল করলেন। তিনি সুগন্ধি আনতে বললেন এবং তা থেকে কিছুটা মাখলেন। এরপর তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! সুগন্ধির প্রতি আমার কোনো প্রয়োজন ছিল না। তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে নারী আল্লাহ ও আখিরাতের প্রতি ঈমান রাখে, তার জন্য কোনো মৃতের জন্য তিন দিনের বেশি শোক পালন করা বৈধ নয়, তবে স্বামীর জন্য চার মাস দশ দিন (শোক পালন করবে)।" (এটি দ্বিতীয় ঘটনা)।









আল-জামি` আল-কামিল (6509)


6509 - عن زينب قالت: سمعتُ أمي أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم تقول: جاءت امرأة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله. إن ابنتي تُوفّي عنها زوجُها. وقد اشتكتْ عينَيْها. أفتَكْحَلُهما؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا" مرتين أو ثلاثا. كل ذلك يقول:"لا" ثم قال:"إنما هي أربعة أشهر وعشرًا. وقد كانت إحداكن في الجاهلية ترمي بالبعرة على رأس الحول".

قال حميد: فقلت لزينب: ومن ترمي البعرة على رأس الحول؟ فقالت زينب: كانت المرأة إذا توفي عنها زوجُها. دخلت جِفْشًا ولبستْ شر ثيابها. ولم تمس طيبًا ولا شيئًا حتى تمر بها سنة، ثم تؤتي بدابةٍ، حمارٍ أو شاةٍ أو طيرٍ، فتفتضُّ به، فقلما تفتضُّ بشيء إلا مات، ثم تخرج، فتُعطى بعرة فترمي بها، ثم تُراجع بعد ما شاءت من طيب أو غيره. (وهذا ثالثُها).

متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (103) عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن حميد بن نافع، عن زينب بنت أبي سلمة تقول: فذكرته. ورواه البخاري في الطلاق (5336) ومسلم في الطلاق (1488) كلاهما من حديث مالك به.
قال مالك:"الحِفْش: البيت الرديء، وتفتضُّ - بتشديد الضاد تمسح به جلدها كالنُّشرة" أي تأخذ طائرًا، فتمسح به فرجها، وتنبذه، فلا يكاد يعيش من الفض. كذا في"النهاية".




যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার মা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার মেয়ের স্বামী মারা গিয়েছে এবং তার চোখ দুটো অসুস্থ হয়ে পড়েছে। সে কি চোখে সুরমা লাগাবে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না।" (তিনি) দুই বা তিনবার 'না' বললেন। প্রত্যেকবারই তিনি বললেন: "না।" অতঃপর তিনি বললেন: "এটা (ইদ্দত) তো মাত্র চার মাস দশ দিন। অথচ তোমাদের কেউ কেউ জাহিলী যুগে এক বছর পূর্ণ হওয়ার পর গোবর ছুঁড়ে ফেলত।"

হুমায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: এক বছর পূর্ণ হওয়ার পর কে গোবর ছুঁড়ে ফেলত? যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: জাহিলিয়াতের যুগে যখন কোনো মহিলার স্বামী মারা যেত, তখন সে একটি সংকীর্ণ ঘরে (জ্বিফশ) প্রবেশ করত এবং নিকৃষ্টতম পোশাক পরিধান করত। সে সুগন্ধি বা অন্য কিছু স্পর্শ করত না, যতক্ষণ না তার উপর দিয়ে এক বছর অতিক্রান্ত হতো। অতঃপর তার কাছে একটি প্রাণী আনা হতো—হয় গাধা, অথবা ছাগল, অথবা পাখি। সে তা দিয়ে (শরীরের গোপন অংশ) মুছে ফেলত। এমন কমই ঘটত যে, সে কোনো কিছু দিয়ে মুছত আর তা মারা যেত না। এরপর সে বের হয়ে আসত, তখন তাকে একটি গোবর দেওয়া হতো এবং সে তা ছুঁড়ে দিত। এর পর সে যা চাইত সুগন্ধি বা অন্য কিছু ব্যবহার করতে পারত। (আর এই ঘটনাটি ছিল তার তৃতীয় ঘটনা)।









আল-জামি` আল-কামিল (6510)


6510 - عن أم سلمة، أن امرأة تُوفي عنها زوجُها، فخَشوا عينيها فأتوا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فاستأذنوه في الكحل فقال:"لا تكحَّل، قد كانت إحداكن تمكثُ في شر أحلاسها، أو شر بيتها، فإذا كان حول فمرَّ كلب رمت ببعرة، فلا حتى تمضي أربعة أشهر وعشرًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5338) ومسلم في الطلاق (60: 1488) كلاهما من حديث شعبة، عن حميد بن نافع، قال: سمعت زينب بنت أم سلمة، تحدث عن أمها أم سلمة فذكرته.

وفي رواية عند مسلم: عن أم سلمة وأم حبيبة تذكران أن امرأة أتت النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت له …

وقولها:"شر أحلاسها" بفتح همزة، جمع حلم وهو كساء يلي ظهر البعير، أي شر ثيابها، مأخوذ من حلس البعير.

وقولها:"شر بيتها" كذا في البخاري. وفي مسلم:"شر بيتها في أحلاسها" أو في"شر أحلاسها في بيتها".

وفي الباب ما روي عن أم حكيم بنت أسيد، عن أمِّها أن زوجَها توفي، وكانت تشتكي عينُها، فتكتحل الجلاء، فأرسلت مولاةَ لهم إلى أم سلمة فسألتْها عن كحل الجلاء. فقالت: لا تكحل إلا من أمر لا بد منه. دخل عليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حين تُوفي أبو سلمة، وقد جعلت على عيني صبرًا. فقال:"ما هذا؟ يا أم سلمة" قلت: إنما هو صبر يا رسول الله! ليس فيه طيب، قال:"إنه يشب الوجه، فلا تجعليها إلا بالليل، ولا تمتشطي بالطيب، ولا بالحناء، فإنه خضاب" قلت: بأي شيء أمتشط يا رسول الله؟ قال:"بالسدر تغلفين به رأسك".

رواه أبو داود (2305) والنسائي (3537) كلاهما من حديث ابن وهب، قال: أخبرنا مخرمة، عن أبيه، قال: سمعت المغيرة بن الضحاك يقول: حدّثتْني أمُّ حكيم فذكرته.

وإسناده ضعيف لوجود المسلسل بالمجهولين. المغيرة بن الضحاك لم يرو عنه إلا أبو مخرمة، وهو بكير بن عبد الله بن الأشج، فهو"مجهول"، ولم يُوثّقِه غير ابن حبان. ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول"، والصواب أنه مجهول، فإن توثيق ابن حبان لا يرفع عنه جهالة العين.

وأم حكيم بنت أسيد وأمها لا تُعرفان كما قال الذهبي وابن حجر.

وقولها:"كحل الجلاء": بالكسر - الأثمد.

وقولها:"صبرًا": عُصارة شجر.

وقوله:"يشب الوجه": أي يتلألأُ نورًا وضياءً.

وقوله:"تغلفين به رأسك": من التغليف، أي تُغطين وتجعلين كالغلاف لرأسك، والمراد: تكثرين منه على شعرك.
حديث أم سلمة الأول اختصره مالك وأرسله وذكره بلاغا في الطلاق (119) أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على أم سلمة وهي حاد على أبي سلمة فذكره.

كما أنه ذكر بلاغا آخر (116) عن أم سلمة قالت لامرأة حاد على زوجها، اشتكتْ عينَيْها:"اكتحلي بكحل الجلاء بالليل، وامسحيه بالنهار" وهو الذي وصله أبو داود وغيره وفيه المسلسل بالمجهولين.

وقال أيضا (117) بلغني عن سالم بن عبد الله وسليمان بن يسار أنهما كانا يقولان في المرأة المتوفّى عنها زوجُها:"إنها إذا خشِيَتْ على بصرها من رمد، أو شكوى أصابها، إنها تكتَحِل وتتداوى بدواء، أو كحل، وإن كان فيه طيب". وقد اختلف أهل العلم في اكتحال المتوفّى عنها زوجُها.

فقالوا: إنْ كان الاكتحال لزينة العين وتحسينها فلا خلاف في تحريمها.

وأما إذا كان للضرورة مثل أن يُخشى على ذهاب بصرها، أو إصابتها برمدٍ وغيره من الأمراض فلا حرج في ذلك؛ لأن من مقاصد الشريعة رفع الحرج، وحديث أم سلمة الأول يدل على الاكتحال مطلقا فنهى النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك، والحديث الثاني يدل على جواز الاستعمال عند الضرورة جمعًا بين الحديثين، وبين آثار الصحابة والتابعين والفقهاء والمحدثين، فإن الضرورات تُبيح المحظورات.

وأما ما روي عن أسماء بنت عميس قالت: لما أصيب جعفر بن أبي طالب أتانا النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"تَسَلَّبِي ثلاثا، ثم اصنعي ما شئت" فهو شاذ.

رواه أحمد (27468) وابن حبان (3148) والبيهقي (7/ 438) كلهم من طرق عن محمد بن طلحة بن مصرف، عن الحكم بن عتيبة، عن عبد الله بن شداد بن الهاد، عن أسماء بنت عميس، فذكرته.

وأسماء هي زوج جعفر بن أبي طالب، وهي والدة عبد الله ومحمد وعون وغيرهم من أولاد جعفر.

رجاله ثقات غير محمد بن طلحة بن مصرف؛ فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إلا أنه أخطأ في هذا الحديث لمخالفته للأحاديث الصحيحة في حداد المرأة على زوجها. ولذا حكم عليه بالنكارة. وأعله أحمد بالشذوذ كما ذكره ابن حجر في الفتح (9/ 487).

وقوله:"تَسَلَّبِي" أي: البسي ثوب الحداد ثلاثا، وتحرف في صحيح ابن حبان إلى"تَسَلَّمِي" وجعل يبين معنى"تسلَّمي"، وفيه تكلف، والصواب أنه محرف من"تَسَلَّبِي".




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলার স্বামী মারা গেলে তারা তার চোখ নিয়ে আশঙ্কা করল (সমস্যা হওয়ার ভয় করল)। তখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে সুরমা ব্যবহার করার অনুমতি চাইল। তিনি বললেন, 'সুরমা ব্যবহার করবে না। তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ (জাহিলিয়াতের যুগে) তার সবচেয়ে খারাপ পোশাক বা তার সবচেয়ে খারাপ ঘরে অবস্থান করত। যখন এক বছর পূর্ণ হতো এবং একটি কুকুর পাশ দিয়ে যেত, তখন সে একটি গোবরের টুকরা ছুঁড়ে মারত। সুতরাং (এখন তা করো না), বরং চার মাস দশ দিন অতিবাহিত না হওয়া পর্যন্ত (সুরমা ব্যবহার করবে না)।'









আল-জামি` আল-কামিল (6511)


6511 - عن أم عطية أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُحِدَّ المرأة على ميت فوق ثلاث، إلا على زوج أربعة أشهر وعشرًا، ولا تلبس ثوبًا مصبوغًا إلا ثوب عَصْبٍ، ولا تَكْتَحِل، ولا تمس طيبًا، إلا عند طهرها حين تطهر: نبذة من قسط وأظفار".

متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (313) ومسلم في الطلاق (938) كلاهما من حديث
هشام بن حسان، عن حفصة، عن أم عطية فذكرته.




উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মৃত ব্যক্তির জন্য কোনো মহিলা যেন তিন দিনের বেশি শোক পালন না করে, তবে স্বামীর জন্য চার মাস দশ দিন শোক পালন করবে। আর সে রঙিন পোশাক পরিধান করবে না, তবে 'আসাব' (নামক নকশাযুক্ত সূতা দ্বারা তৈরি) কাপড় ব্যতীত। আর সে সুরমা লাগাবে না এবং সুগন্ধি স্পর্শ করবে না, তবে হায়েয থেকে পবিত্র হওয়ার সময় ছাড়া— যখন সে পবিত্র হয়— (তখন) সামান্য পরিমাণ কুস্ত (সুগন্ধি কাঠ/ধূপ) ও আযফার (নখ) ব্যবহার করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6512)


6512 - عن أم سلمة زَوج النبي صلى الله عليه وسلم، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"المتوفى عنها زوجُها لا تلبس المُعَصْفر من الثياب، ولا المُمشَّقة، ولا الحُلِيّ، ولا تَخْتضب، ولا تكْتَحِل".

صحيح: رواه أبو داود (2304) والنسائي (3535) وأحمد (26581) وصحّحه ابن حبان (4306) كلهم من حديث يحيى بن أبي بكر، حدثنا إبراهيم بن طهمان، قال: حدثني بُديل، عن الحسن بن مسلم، عن صفية بنت شيبة، عن أم سلمة فذكرته.

وإسناده صحيح، وبُديل هو: ابن ميسرة العقيلي ثقة.




উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে নারীর স্বামী মৃত্যুবরণ করেছে, সে যেন হলুদ রঙ্গে রঞ্জিত কাপড় পরিধান না করে, আর না লাল (কুসুম বা গেরুয়া) রঙ্গে রঞ্জিত কাপড়, আর না কোনো অলংকার। সে যেন খেজাব (মেহেদি) ব্যবহার না করে এবং সুরমাও ব্যবহার না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6513)


6513 - عن زينب بنت كعب بن عُجْرة، أن الفُريعة بنت مالك بن سنان، وهي أخت أبي سعيد الخدري، أخبرتْها، أنها جاءتْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم تسأله أن ترجع إلى أهلها في بني خُدرة، وأن زوجَها خرج في طلب أعبد له أبقوا، حتى إذا كان بطرف القدوم لَحِقهم فقتلوه. قالت: فسألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أرجع إلى أهلي، فإن زوجي لم يترك لي مسكنا يملكه، ولا نفقة. قالت: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم" قالت: فانصرفت، حتى إذا كنتُ في الحجرة أو في المسجد ناداني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، أو أمر بي فنوديتُ له، فقال:"كيف قلت؟" قالت: فرددت عليه القصة التي ذكرت له من شأن زوجي. قال:"امكثِي في بيتك حتى يبلغَ الكتابُ أجلَه" قالت: فاعتددتُ فيه أربعةَ أشهر وعشرًا. قالت: فلما كان عثمان، أرسل إليَّ فسألني عن ذلك فأخبرته، فاتبعه وقضى به.

صحيح: رواه مالك في الطلاق (96) عن سعد بن إسحاق بن كعب بن عُجرة، عن عمته زينب بنت كعب بن عُجرة فأخبرته، أن الفُريعة بنت مالك أخبرتها أنها جاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فذكرته.

ومن طريق مالك رواه أبو داود (2300) والترمذي (1204) وابن ماجه (2031) والنسائي (3528) وصحّحه ابن حبان (4292) والحاكم (2/ 208) إلا أن النسائي رواه من أوجه أخر عن زينب بنت كعب.

ورواه أبو داود الطيالسي (1769) عن شعبة، عن سعد بن إسحاق، عن زينب، عن فُريعة أخت أبي سعيد أن زوجَها تبع أعلاجا، فقتلوه - وهي في قرية من قرى المدينة - فأتت النبيَّ صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له، واستأذنتْ أن تأتي أخواتها فتعتد عندهم فذكرت بقية الحديث نحوه.

ورواه ابن حبان (4293) من وجه آخر عن شعبة. وإسناده صحيح.

وزينب بنت كعب بن عُجرة الأنصارية ذكرها ابن حبان في"الثقات" وذكرها ابن الأثير وابن فتحون في الصحابة.
قال الترمذي عقب إخراج حديث زينب:

"هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم لم يروا للمعتدة أن تنتقلَ من بيت زوجها حتى تنقضي عدّتُها، وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق.

وقال بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم: للمرأة أن تعتد حيث شاءت، وإن لم تعتد في بيت زوجها.

والقول الأول أصح". انتهى.

وبالقول الأول قال الأئمة الأربعة، قال ابن عبد البر:"وهو قول جماعة فقهاء الأمصار بالحجاز، والشام، والعراق، ومصر".

وقالوا أيضا: لو جاء النعي في غير منزلها فإنها تعتد في منزلها.

والقول الثاني روي عن علي، وابن عباس، وجابر، وعائشة من الصحابة، وكذلك قال به جماعة من التابعين.

وكانت حجتُهم قوله تعالى: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِأَزْوَاجِهِمْ مَتَاعًا إِلَى الْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِي مَا فَعَلْنَ فِي أَنْفُسِهِنَّ مِنْ مَعْرُوفٍ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ} [البقرة: 240] فكانت المرأةُ في الجاهلية تمكثُ سنة في بيت زوجها المتوفى عنها، يُنفق عليها من ميراثه، فإذا تمَّ الحولُ خرجتْ إلى أهلها.

ثم جاء الإسلام فأقرهم على ما كانوا عليه من مكث الحول بهذه الآية، ثم نسخ ذلك بالآية المتقدمة في نظم القرآن على هذه الآية وهي قوله تعالى: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنْفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ} [البقرة: 234] فجعل المكث أربعة أشهر وعشرًا، ونسخ الأمر بالوصية لها بما فرض لها من ميراثه، وبقي الخروج من بيت زوجها من غير إخراج لها على حالها.

قال ابن عباس: نسختْ هذه الآية (أعني الآية 234) عدتها عند أهلها فتعتد حيث شاءت وهو قوله تعالى: {غَيْرَ إِخْرَاجٍ} [البقرة: 240] (أي الآية 240) وتكملة الآية {فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ} [البقرة: 240] قول ابن عباس ذكره البخاري في تفسير الآية.




ফুরায়'আ বিনতে মালিক ইবনে সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বোন। তিনি (ফুরায়'আ) তাঁকে (যাইনাবকে) জানিয়েছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বনু খুদরার মধ্যে বসবাসকারী তাঁর পরিবারের কাছে ফিরে যাওয়ার অনুমতি চাইতে এসেছিলেন।

তাঁর স্বামী কিছু পলাতক দাসের খোঁজে বের হয়েছিলেন। যখন তিনি কদূমের এক প্রান্তে পৌঁছলেন, তখন দাসেরা তাঁকে ধরে ফেলে এবং হত্যা করে ফেলে। তিনি (ফুরায়'আ) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমার পরিবারের কাছে ফিরে যাওয়ার অনুমতি চাইলাম, কারণ আমার স্বামী এমন কোনো বাসস্থান বা ভরণপোষণ রেখে যাননি, যা তিনি মালিকানাভুক্ত করে দিয়েছিলেন।

তিনি (ফুরায়'আ) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হ্যাঁ।"

তিনি বলেন: আমি ফিরে আসলাম। যখন আমি একটি কামরায় ছিলাম অথবা মসজিদে ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ডাকলেন, অথবা আমাকে ডাকার জন্য নির্দেশ দিলেন, ফলে আমাকে ডাকা হলো। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কী বলেছিলে?" তিনি বলেন: আমি আমার স্বামীর বিষয়ে পূর্বে যা বলেছিলাম, সেই ঘটনাটি তাঁর কাছে আবার বললাম।

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার ঘরেই অবস্থান করো, যতক্ষণ না ইদ্দতের সময়সীমা শেষ হয়।"

তিনি বলেন: তখন আমি সেই ঘরেই চার মাস দশ দিন ইদ্দত পালন করলাম।

তিনি বলেন: এরপর যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, তখন তিনি আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং এ বিষয়ে জানতে চাইলেন। আমি তাঁকে তা জানালাম। তিনি সেই ফায়সালা অনুসরণ করলেন এবং সে অনুযায়ী সিদ্ধান্ত দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6514)


6514 - عن فاطمة بنت قَيس، أن أبا عمرو بن حفص طلَّقها البتَّة - وهو غائب بالشام - فأرسلَ إليها وكيلَه بشعير، فسخطَتْه. فقال: والله ما لكِ علينا من شيء، فجاءت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرتْ ذلك له. فقال:"ليس لك عليه نفقة" وأمرها أن تعتدَّ في بيتِ أم
شريك، ثم قال:"تلك امرأة يَغْشَاها أصحابي، اعتدَّيْ عند عبد الله بن أم مكتوم، فإنه رجل أعمى، تضعين ثيابكِ عنده، فإذا حللتِ فآذنيني" قالت: فلما حللتُ ذكرتُ له أن معاوية بن أبي سفيان، وأبا جهم بن هشام خَطباني. فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"أما أبو جهم فلا يضعُ عصَاه عن عاتقه، وأما معاويةُ فصعلوكٌ لا مال له، انكحي أسامة بن زيد" قالت: فكرهتُه، ثم قال:"انكحي أسامة بن زيد" فنكحتُه، فجعل الله في ذلك خيرًا واغتبطتُ به.

صحيح: رواه مالك في الطلاق (67) عن عبد الله بن يزيد مولى الأسود بن سفيان، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن فاطمةَ بنت قيس، فذكرتُه. ورواه مسلم في الطلاق (36: 1480) من طريق مالك، به، مثله.

رواه مسلم (37) من وجه آخر عن أبي سلمة، به، مختصرًا، وفيه قوله صلى الله عليه وسلم:"لا نفقةَ لكِ ولا سُكْنى".

ورواه (38) من طريق آخر عن أبي سلمة، به، بنحو حديث مالك. وفيه:"ليست لها نفقةٌ، وعليها العدَةُ".

وقوله صلى الله عليه وسلم في أبي جهم:"لا يضعُ عصاه عن عاتِقه" كناية عن شدته على النساء وضربه إياهن، كما جاء مصرحا به في بعض الروايات.




ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু আমর ইবনে হাফস তাকে বায়েন তালাক দিলেন, যখন তিনি সিরিয়ায় অনুপস্থিত ছিলেন। তিনি (আবু আমর) তার এজেন্টের মাধ্যমে তার কাছে কিছু যব পাঠালেন। কিন্তু ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা অপছন্দ করলেন। তখন এজেন্ট বললো: আল্লাহর কসম, আমাদের কাছে তোমার কোনো হক নেই। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে ব্যাপারটি উল্লেখ করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার কাছে তোমার কোনো ভরণপোষণ প্রাপ্য নেই।" তিনি তাকে উম্মে শারীকের বাড়িতে ইদ্দত পালন করতে আদেশ দিলেন। এরপর বললেন: "সেখানে আমার সাহাবীরা ঘন ঘন আসা-যাওয়া করে। তুমি বরং আব্দুল্লাহ ইবনে উম্মে মাকতূমের বাড়িতে ইদ্দত পালন করো। কারণ তিনি একজন অন্ধ মানুষ, তার কাছে তুমি তোমার কাপড় খুলে রাখতে পারবে। যখন তোমার ইদ্দত শেষ হবে, তখন আমাকে জানাবে।" ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমার ইদ্দত পূর্ণ হলো, আমি তাঁকে (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) জানালাম যে মু'আবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান এবং আবুল জাহম ইবনে হিশাম আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিয়েছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আবুল জাহমের ব্যাপার হলো, সে তার কাঁধ থেকে লাঠি নামায় না। আর মু'আবিয়ার ব্যাপার হলো, সে একজন দরিদ্র (সা'লূক), তার কোনো সম্পদ নেই। তুমি উসামা ইবনে যায়েদকে বিবাহ করো।" তিনি বললেন: আমি তাকে অপছন্দ করলাম। এরপর তিনি বললেন: "তুমি উসামা ইবনে যায়েদকে বিবাহ করো।" তাই আমি তাকে বিবাহ করলাম। আল্লাহ তাতে (ঐ বিবাহে) কল্যাণ রাখলেন এবং আমি এর মাধ্যমে সুখী হলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (6515)


6515 - عن أبي بكر بن أبي الجهم قال: سمعت فاطمةَ بنت قيس تقول: أرسلَ إليَّ زَوجي أبو عمرو بن حفص بن المغيرة بن عياش بن أبي ربيعة بطَلاقي، وأرسل إليّ بخمس آصع تمر، وخمسِ آصع شعير. فقلت: ما لي نفقة إلا هذا؟ ولا أعتد في بيتكم؟ قال: لا. فشددتُ عليّ ثيابي، ثم أتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم فذكرتُ له ذلك، فقال:"كم طلَّقَكِ؟" قلت: ثلاثًا، قال:"صدق، ليس لكِ نفقةٌ، واعتدِّي في بيت ابن عمك ابن أم مكتوم، فإنه ضرير البصر، تلقين ثيابكِ عنكِ، فإذا انقضتْ عدّتُكِ فآذنيني" قالت: فخطبني خُطّابٌ، فيهم معاوية وأبو جهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن معاويةَ تَرِتٌ خفيفٌ الحال، وأبوجهم يضرب النساء - أي - فيه شدة على النساء - ولكن عليكِ أسامةَ بن زيد". أو قال:"انكحيْ أسامةَ بن زيد"

صحيح: رواه مسلم في الطلاق (48: 1480)، عن إسحاق بن منصور، حدثنا عبد الرحمن، عن سفيان، عن أبي بكر بن أبي الجهم فذكره.

ورواه أبو عاصم، عن سفيان مثل حديث عبد الرحمن بن مهدي وزاد فيه: قالت: فتزوجتُه فشرَّفني اللهُ بأبي زيد، وكرَّمني الله بأبي زيد.




ফাতেমা বিন্তে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার স্বামী আবূ আমর ইবনু হাফস ইবনুল মুগীরা ইবনু আইয়াশ ইবনু আবী রাবী'আ আমার কাছে তার তালাকের (সংবাদ) পাঠালেন এবং পাঁচ সা' খেজুর ও পাঁচ সা' যব পাঠালেন। আমি বললাম: আমার জন্য কি শুধু এইটুকুই খোরপোশ? আমি কি তোমাদের ঘরে ইদ্দত পালন করব না? তিনি বললেন: না। তখন আমি আমার কাপড় শক্ত করে পরিধান করলাম এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এসে বিষয়টি তাঁর কাছে বললাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "সে তোমাকে কয়টি তালাক দিয়েছে?" আমি বললাম: তিনটি। তিনি বললেন: "সে সত্য বলেছে। তোমার জন্য (তার কাছে) আর কোনো খোরপোশ নেই। তুমি তোমার চাচাতো ভাই ইবনু উম্মে মাকতুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে ইদ্দত পালন কর। কেননা তিনি দৃষ্টিহীন, (এতে) তুমি তার সামনে তোমার কাপড় খুলতে পারবে। যখন তোমার ইদ্দত শেষ হবে, তখন আমাকে জানাবে।" ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর অনেক বিবাহের প্রস্তাব আসলো, তাদের মধ্যে মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ জাহমও ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই মু'আবিয়া হলো গরীব এবং তার অবস্থা দুর্বল। আর আবূ জাহম স্ত্রীদেরকে মারে (অর্থাৎ নারীদের ব্যাপারে তার কঠোরতা রয়েছে)। বরং তুমি উসামা ইবনু যায়িদকে গ্রহণ কর।" অথবা তিনি বললেন: "তুমি উসামা ইবনু যায়িদকে বিবাহ কর।" ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর আমি তাঁকে (উসামাকে) বিবাহ করলাম। আল্লাহ আবূ যায়িদের মাধ্যমে আমাকে সম্মান দান করলেন এবং আবূ যায়িদের মাধ্যমে আমাকে সম্মানিত করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6516)


6516 - عن فاطمة بنت قيس قالت: طلَّقني زَوجي ثلاثًا، فلم يجعل لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم -
سُكنى ولا نفقةَ.

صحيح: رواه مسلم في الطلاق (51: 1480) عن حسن بن علي الحُلواني، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا حسن بن صالح، عن السدي، عن البهي، عن فاطمة بنت قيس فذكرته.




ফাতেমা বিনতে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার স্বামী আমাকে তিন তালাক দিয়েছিলেন। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার জন্য বাসস্থান ও ভরণপোষণ কোনোটিই নির্ধারণ করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (6517)


6517 - عن فاطمة بنت قيس، عن النبي صلى الله عليه وسلم في المطلقة ثلاثًا قال:"ليس لها سُكنى ولا نفقةَ".

صحيح: رواه مسلم في الطلاق (44/ 1480) من طرق عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن الشعبي، عن فاطمة بنت قيس فذكرته.

وفي معناه ما رُوي عن ابن عباس قال: حدّثتْني فاطمةُ بنت قيس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يجعل لها سُكنى ولا نفقة.

رواه أحمد (27330) والطبراني في الكبير (24/ 362) والصغير (381) من طرق عن عبد الواحد بن زياد، قال: حدثنا الحجاج بن أرطاة قال: حدثنا عطاء، عن ابن عباس فذكره. والحجاج ضعيف.

وقال الدارقطني في"العلل" (15/ 374): ورواه عمرو بن دينار عن عطاء، عن فاطمة بنت قيس، ولم يذكر فيه ابن عباس. وهو أشبه بالصواب.

وأما ما رُوي بزيادة قول النبي صلى الله عليه وسلم:"إنما الفقةُ والسُّكنى للمرأة إذا كان لزوجِها عليها الرجعةُ" فهي ضعيفة.

رواه عامر الشعبي عن فاطمة بنت قيس.

وعنه رواه اثنان:

أحدهما سعيد بن يزيد الأحمسي، قال: حدثنا الشعبي ومن طريقه رواه النسائي (3403).

والثاني: مجالد قال: حدثنا عامر، قال: قدمت المدينة فأتيتُ فاطمة بنت قيس فذكر الحديث بطوله، ومن طريقه رواه أحمد (27100).

وخالفهما جميع أصحاب عامر الشعبي فلم يذكروا هذه الزيادة في حديثهم، ومن هؤلاء ذكرهم مسلم وهم: سيار، وحصين، ومغيرة، وأشعث، ومجالد، وإسماعيل بن أبي خالد، وداود، كلهم عن الشعبي قال: دخلتُ على فاطمة بنت قيس فسألتُها عن قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم عليها، فقالت: طلَّقها زوجها البتة. فقالت: فخاصمته إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في السُّكنى والنفقةِ. قالت: فلم يجعل لها سكنى ولا نفقة.

والعمل عند فقهاء أهل الحديث على حديث فاطمة بنت قيس قالوا: ليس للمطلَّقة سُكنى ولا نفقة إذا لم يملك زوجُها الرجعةَ، وهم: أحمد، وإسحاق، وأبو ثور، وداود الظاهري، وكثير من السلف. وهو مذهب علي، وابن عباس، وجابر، وفاطمة بنت قيس صاحبة القصة، وكانت تناظر عليه.

وذهب أبو حنيفة، وأكثرُ أهل العراق إلى أن لها السُّكنى والنفقة.
وهو مذهب عمر، وعبد الله بن مسعود.

وقال مالك، والشافعي: أن لها السُّكنى دون النفقة. وهو مذهب عائشة وفقهاء المدينة السبعة.

قال الشافعي: إنما جعلنا لها السُّكنى بكتاب الله تعالى: {لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِنْ بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخْرُجْنَ إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ} [الطلاق: 1].

كذا قال رحمه الله مع أن السُّكني تستلزِمُ النفقةَ، فإن قوله تعالى: {لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِنْ بُيُوتِهِنَّ} [الطلاق: 1] يستلزم السُّكنى والنفقة معا.




ফাতিমা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন তালাকপ্রাপ্তা নারী সম্পর্কে বলেন: "তার জন্য বাসস্থান ও ভরণপোষণ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (6518)


6518 - عن عروة قال: تزوج يحيى بن سعيد بن العاص بنتَ عبد الرحمن بن الحكم، فطلّقها، فأخرجَها من عنده، فعاب ذلك عليهم عروة. فقالوا: إن فاطمة قد خرجتْ. قال عروة: فأتيت عائشة فأخبرتها بذلك، فقالت: ما لفاطمة بنت قيس خير في أن تذكر هذا الحديث.

متفق عليه: رواه مسلم في الطلاق (52/ 1481)، عن أبي كُريب، حدثنا أبو أسامة، عن هشام، حدثني أبي قال: فذكره.

ورواه البخاري في الطلاق (5324، 5326) من طريق سفيان، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، قال: قال عروة بن الزبير لعائشة فذكره بنحوه.

قال البخاري: وزاد ابن أبي الزناد، عن هشام، عن أبيه، عابتْ عائشة أشدَّ العيب وقالت: إن فاطمةَ كانت في مكان وحشٍ مُخيف على ناحيتها فلذلك أرْخصَ لها النبي صلى الله عليه وسلم.

قال الحافظ في الفتح (9/ 479):"وصله أبو داود من طريق ابن وهب، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد".

وقوله تعالى: {إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ} [الطلاق: 1].

قال ابن عباس: أن تبدو على أهلها، فإذا بذتْ عليهم فقد حل لهم إخراجَها. ذكره البيهقي (7/ 431).




'উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ ইবনুল 'আস আব্দুর রহমান ইবনুল হাকামের কন্যাকে বিবাহ করেন। অতঃপর তিনি তাকে তালাক দেন এবং নিজের নিকট থেকে বের করে দেন। 'উরওয়াহ এই কাজের জন্য তাঁদের সমালোচনা করেন (বা দোষ ধরেন)। তখন তারা বলল: ফাতিমাকেও তো (তার স্বামী) বের করে দিয়েছিলেন। 'উরওয়াহ বলেন: অতঃপর আমি 'আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম এবং তাঁকে এই বিষয়ে অবহিত করলাম। তিনি বললেন: এই হাদীসটি বর্ণনা করার মধ্যে ফাতিমা বিনত কায়েসের কোনো মঙ্গল নেই।

আল-বুখারী উল্লেখ করেছেন: ইবনু আবিয-যিনাদ, হিশাম, তাঁর পিতা ('উরওয়াহ) সূত্রে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন যে, 'আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কঠোরভাবে এর দোষারোপ করলেন এবং বললেন: ফাতিমা (বিনত কায়েস) এমন এক স্থানে ছিলেন যা ছিল জনমানবহীন এবং ভীতিকর। এই কারণে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (সেখান থেকে বের হয়ে যাওয়ার) অনুমতি দিয়েছিলেন।

আর আল্লাহ তা'আলার বাণী: {যদি না তারা প্রকাশ্য কোনো অশ্লীলতায় লিপ্ত হয়} [সূরা আত-তালাক: ১]। ইবনু 'আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: (এর অর্থ হলো) যদি সে তার পরিবারের সাথে অশালীন ব্যবহার করে। যখন সে তাদের উপর অশালীনতা প্রকাশ করে, তখন তাকে বের করে দেওয়া তাদের জন্য বৈধ হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6519)


6519 - عن عائشة قالت: ما لفاطمة - ألا تتقي الله يعني في قولها: لا سكنى ولا نفقة.

متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5323) ومسلم في الطلاق (54: 1481) كلاهما من حديث شعبة، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ফাত্বিমাহ বিনত কায়িস সম্পর্কে) বলেন: ফাত্বিমাহর কী হয়েছে—সে কি আল্লাহকে ভয় করে না? অর্থাৎ, তার এই কথা বলার কারণে যে: ‘[তালাকের ইদ্দতকালে] কোনো বাসস্থান এবং খোরপোষ নেই।’









আল-জামি` আল-কামিল (6520)


6520 - عن القاسم بن محمد، وسليمان بن يسار، أنه سَمِعَهما يذكُران، أن يحيى بن
سعيد بن العاص طلّق ابنة عبد الرحمن بن الحكم البتة. فانتقلها عبد الرحمن بن الحكم. فأرسلت عائشة أم المؤمنين إلى مروان بن الحكم، وهو يومئذ أمير المدينة. فقالت: اتقِ الله واردد المرأة إلى بيتها. فقال مروان، في حديث سليمان: إن عبد الرحمن غلبني. وقال مروان، في حديث القاسم: أو ما بلغك شأن فاطمة بنت قيس؟ فقالت عائشة: لا يضرك أن لا تذكر حديث فاطمة. فقال مروان: إن كان بك الشرُّ، فحسبُك ما بين هذَين من الشر.

صحيح: رواه مالك في الطلاق (36) عن يحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد به، فذكره. ورواه البخاري في الطلاق (5321، 5322) من طريق مالك، به، مثله.

ومعنى كلامه: إن كان خروج فاطمة كما يقال من شرٍّ كان في لسانها، فيكفيك ما بين يحيى بن سعيد بن العاص وبين امرأته من الشر.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

(কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ এবং সুলাইমান ইবনু ইয়াসার উল্লেখ করেছেন যে,) ইয়াহিয়া ইবনু সাঈদ ইবনুল আস, আবদুর রহমান ইবনুল হাকামের কন্যাকে চূড়ান্ত তালাক (তালাকুল বাত্তা) দিলেন। এরপর আবদুর রহমান ইবনুল হাকাম তাকে (তালাকপ্রাপ্ত স্ত্রীকে) নিজের বাড়িতে নিয়ে গেলেন। তখন উম্মুল মু'মিনীন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারওয়ান ইবনুল হাকামের নিকট লোক পাঠালেন, যিনি সেই সময় মদীনার আমীর ছিলেন। তিনি (আয়েশা) বললেন: আল্লাহকে ভয় করো এবং মহিলাটিকে তার (স্বামীর) বাড়িতে ফিরিয়ে দাও। সুলাইমানের বর্ণনায় মারওয়ান বললেন: আবদুর রহমান আমার উপর প্রাধান্য বিস্তার করেছেন (অর্থাৎ, তিনি জোর করে নিয়ে গেছেন)। আর কাসিমের বর্ণনায় মারওয়ান বললেন: ফাতেমা বিনতে কাইসের ব্যাপারটি কি আপনার নিকট পৌঁছায়নি? তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ফাতেমার হাদীস উল্লেখ না করলেও আপনার কোনো ক্ষতি হবে না। তখন মারওয়ান বললেন: যদি আপনার মধ্যে কোনো মন্দ থাকে, তবে এই দুজনের (ইয়াহিয়া ও তার স্ত্রীর) মধ্যে যে মন্দটি রয়েছে, সেটাই আপনার জন্য যথেষ্ট।