হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6528)


6528 - عن عائشة أم المؤمنين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يحرم من الرضاعة ما يحرم من الولادة".

صحيح: رواه مالك في الرضاع (16) عن عبد الله بن دينار، عن سليمان بن يسار وعن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.

وغلِطَ يحيى في قوله:"وعن" أي بزيادة الواو - ولم يتابعه أحد من رواة الموطأ عليه. وفي سائر الروايات"عن سليمان، عن عروة" بدون زيادة"الواو". قاله ابن عبد البر.

قلت: وهو كما قال، كذا رواه أبو داود (2055) عن عبد الله بن مسلمة والترمذي (1147) من رواية يحيى بن سعيد ومعن، وكذا النسائي (3300) وأحمد (24170) من حديث يحيى بن سعيد وحده، كل هؤلاء عن مالك بإسناده بدون زيادة الواو.

وإسناده صحيح. وصحّحه ابن حبان (4223) ورواه من حديث أحمد بن أبي بكر، عن مالك بإسناده. وسيأتي لفظ هذا الحديث في باب لبن الفحل.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب
النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، لا نعلم بينهم في ذلك اختلافا.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুধপানের কারণে সেসব সম্পর্ক হারাম হয়, যা জন্মসূত্রে (বংশীয় কারণে) হারাম হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6529)


6529 - عن ابن عباس قال: قيل للنبي صلى الله عليه وسلم ألا تتزوج ابنة حمزة؟ قال:"إنها ابنة أخي من الرضاعة".

وزاد في رواية:"وإنه يَحرُم من الرضاعة ما يَحرُم من النَّسب".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5100)، ومسلم في الرضاع (13: 1447) كلاهما من طريق شعبة، عن قتادة، عن جابر بن زيد، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ للبخاري.

والرواية الأخرى لمسلم من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، به.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল, "আপনি কি হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যাকে বিবাহ করবেন না?" তিনি বললেন, "সে তো আমার দুধ-ভাইয়ের কন্যা।"

অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "বংশগত কারণে যা কিছু হারাম, দুধের সম্পর্কের কারণেও তা হারাম হয়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6530)


6530 - عن علي قال: قلت: يا رسول الله، ما لك تَنَوَّقُ في قريش وتدعُنا؟ فقال"وعندكم شيء؟" قلت: نعم، بنتُ حمزة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنها لا تَحِلُّ لي، إنها ابنة أخي من الرضاعة".

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1446) من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن سعد بن عيبدة، عن أبي عبد الرحمن، عن علي، فذكره.

قوله:"تنوَّقُ" أي تختار وتبالغ في الاختيار من قريش، وتدعنا يعني بني هاشم. وضبط بعضهم بتاءين مثناتين الثانية مضمومة:"تتُوق" من التوق وهو الشوق والميل.

وفي معناه ما رُويَ عن علي بن أبي طالب قال: قلت لرسول الله صلى الله عليه وسلم ألا أدلك على أجمل فتاة في قريش؟ قال:"ومن هي؟" قلت: ابنة حمزة. قال:"أما علمت أنها ابنة أخي من الرضاعة، إن
الله حرَّم من الرضاع ما حرَّم من النسب" إلا أنه ضعيف.

رواه أحمد (1096) والبزار - كشف الأستار - (525) وأبو يعلى (381) واختصره الترمذي (1146) كلهم من حديث علي بن زيد، عن سعيد بن المسيب، عن علي بن أبي طالب فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل علي بن زيد - وهو ابن جدعان ضعيف باتفاق أهل العلم. ومع هذا قال الترمذي:"حديث على صحيح" وفي نسخة"حسن صحيح"، ولعله صحّحه من أجل أسانيده الأخرى التي تُقوّيه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আপনার কী হলো যে আপনি কুরাইশদের মধ্য থেকে (বিয়ের জন্য) বেছে নেন, আর আমাদের ছেড়ে দেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আর তোমাদের কাছে কি (কিছু) আছে?" আমি বললাম, হ্যাঁ, হামযা'র কন্যা। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয় সে আমার জন্য হালাল নয়। সে আমার দুধ ভাইয়ের মেয়ে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6531)


6531 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: قيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم: أين أنت يا رسول الله، عن ابنة حمزة؟ أو قيل: ألا تخطب بنتَ حمزة بن عبد المطلب؟ قال:"إن حمزة أخي من الرضاعة".

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1448) من طريق ابن وهب، أخبرني مخرمة بن بكير، عن أبيه، قال: سمعت عبد الله بن مسلم يقول: سمعت محمد بن مسلم يقول: سمعت حميد بن عبد الرحمن يقول: سمعت أم سلمة تقول: فذكرته.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি হামযার কন্যার ব্যাপারে কেন নীরব? অথবা বলা হলো: আপনি কি হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের কন্যাকে বিবাহের প্রস্তাব দেবেন না? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই হামযা আমার দুধভাই।"









আল-জামি` আল-কামিল (6532)


6532 - عن عائشة أم المؤمنين قالت: جاء عمي من الرضاعة يستأذن عليّ، فأبيتُ أن آذن له عليّ، حتى أسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك. فجاء رسول الله صلى الله عليه وسلم فسألته عن ذلك. فقال:"إنه عمك فأذني له" قالت: فقلت: يا رسول الله، إنما أرْضَعتْني المرأةُ ولم يُرضِعْني الرجل. فقال:"إنه عمك فليَلِج عليك".

قالت عائشة: وذلك بعد ما ضرب علينا الحجاب.

وقالت عائشة: يَحرُم من الرضاعة ما يَحرُم من الولادة.

متفق عليه: رواه مالك في الرضاع (2) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة أم المؤمنين، قالت: فذكرته.

ورواه البخاري في النكاح (5239) من طريق مالك، به، مثله. ورواه مسلم في الرضاع (7: 1445) من طريق ابن نمير، عن هشام، به، مثله إلى قوله:"فلْيلج عليكِ".




আয়েশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার দুধ-চাচা আমার কাছে আসার অনুমতি চাইলেন। আমি তাঁকে অনুমতি দিতে অস্বীকার করলাম, যতক্ষণ না আমি এই ব্যাপারে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করি। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন। আমি তাঁকে এ ব্যাপারে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "তিনি তোমার চাচা, সুতরাং তাকে অনুমতি দাও।" তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে তো শুধু মহিলাটিই দুধ পান করিয়েছেন, পুরুষটি তো পান করাননি।" তিনি বললেন: "তিনি তোমার চাচা, সুতরাং তিনি যেন তোমার কাছে প্রবেশ করেন।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এই ঘটনাটি পর্দার বিধান অবতীর্ণ হওয়ার পরে ঘটেছিল। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন: বংশের কারণে যা যা হারাম হয়, দুধপানের কারণেও তা তা হারাম হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6533)


6533 - عن عائشة أم المؤمنين، أنها أخبرتْ، أن أفلح أخا أبي القُعَيْس، جاء يستأذن عليها - وهو عمها من الرضاعة - بعد أن أنزل الحجاب. قالت: فأبيتُ أن آذن له عليَّ. فلما جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبرته بالذي صنعتُ، فأمرني أن آذن له عليَّ.

متفق عليه: رواه مالك في الرضاع (3) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة أم
المؤمنين، فذكرته.

ورواه البخاري في النكاح (5103)، ومسلم في الرضاع (3: 1445) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি খবর দেন যে, আবূল কু’আয়সের ভাই আফলাহ তাঁর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইতে এলেন—আর সে ছিল তাঁর দুধ-চাচা—যখন পর্দার (হিজাবের) আয়াত অবতীর্ণ হয় তার পরে। তিনি বলেন: আমি তাকে আমার কাছে প্রবেশের অনুমতি দিতে অস্বীকার করলাম। অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এলেন, তখন আমি তাঁকে আমার কাজটি সম্পর্কে জানালাম। তখন তিনি আমাকে তাকে আমার কাছে প্রবেশের অনুমতি দিতে নির্দেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6534)


6534 - عن عائشة أم المؤمنين، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان عندها، وأنها سمعتْ صوت رجل يستأذنُ في بيت حفصة. قالت عائشة: فقلت: يا رسول الله، هذا رجلٌ يستأذن في بيتك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أراه فلانا". لعمٍّ لحفصةَ من الرضاعة. فقالت عائشة: يا رسول الله، لو كان فلان حيا - لعمِّها من الرضاعة - دخل عليّ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم، إن الرضاعة تُحرِّم ما تُحرِّم الولادة".

متفق عليه: رواه مالك في الرضاع (1) عن عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة بنت عبد الرحمن، أن عائشة أم المؤمنين أخبرتها، فذكرته.

ورواه البخاري في الشهادات (2646)، ومسلم في الرضاع (1: 1444) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

قال الترمذي (1148) عقب حديث عائشة الأول:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم. كرهوا لبن الفحل، والأصل في هذا حديث عائشة. وقد رخص بعض أهل العلم في لبن الفحل. والقول الأول أصح.

وقد سئل ابن عباس عن رجل له جاريتان. أرضعت إحداهما جارية، والأخرى غلامًا. أن يحل للغلام أن يتزوج بالجارية فقال: لا، اللقاح واحد.

ذكره مالك، ومن طريقه الترمذي (1149) وإسناده صحيح.

قال الترمذي:"وهذا تفسير لبن الفحل، وهذا الأصل في هذا الباب. وهو قول أحمد وإسحاق".

وكذلك ممن كان يحرِّمُ بلبن الفحل: مالك، وسفيان الثوري، والأوزاعي، والأحناف، وغيرهم، وممّن رخّص في ذلك سعيد بن المسيب، وأبو سلمة بن عبد الرحمن، وسليمان بن يسار، وعطاء بن يسار، والنخعي، والقاسم بن محمد، وأبو قلابة.

وقال القاسم بن محمد: كان يدخل على عائشة من أرضعه بنات أبي بكر، ولا يدخل عليها من أرضع نساء بني أبي بكر.

ورُويَ عن ابن عمر أنه قال:"لا بأس بلبن الفحل" ذكره ابن المنذر في"الأوسط" (8/ 563 - 565) وقال:"وبالقول الأول أقول، وذلك لثبوت الأخبار عن النبي صلى الله عليه وسلم الدالة على ذلك".




আয়িশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর (আয়িশার) নিকট ছিলেন। সে সময় তিনি একজন পুরুষের কণ্ঠস্বর শুনতে পেলেন, যে হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে প্রবেশের অনুমতি চাচ্ছিল।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি আপনার ঘরে (প্রবেশের) অনুমতি চাইছে।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "আমার মনে হয় এ হলো অমুক (পুরুষ)—সে ছিল হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দুধ-চাচা।"

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল! যদি আমার অমুক ব্যক্তি—অর্থাৎ আমার দুধ-চাচা—জীবিত থাকত, তবে কি সে আমার নিকট প্রবেশ করতে পারত?

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "হ্যাঁ। নিশ্চয়ই দুগ্ধপান সেই সব সম্পর্ককে হারাম করে দেয়, যা জন্মসূত্র (রক্তের সম্পর্ক) হারাম করে দেয়।"

[ইমাম তিরমিযী (১১৪৮) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এবং অন্যান্যদের মধ্যে কিছু আহলে ইলম এই হাদীস অনুসারে আমল করেন। তাঁরা 'লাবানুল ফাহল' (দুধের কারণে সৃষ্ট পিতার সম্পর্ক) অপছন্দ করতেন। এর মূল ভিত্তি হলো আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীস।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো, যার দুটি দাসী ছিল। তাদের একজন একটি মেয়েকে এবং অন্যজন একটি ছেলেকে দুধ পান করাল। জিজ্ঞেস করা হলো, ছেলেটির জন্য কি মেয়েটিকে বিবাহ করা বৈধ? তিনি বললেন: না, বীজ (স্বামী) একজনই। তিরমিযী বলেন: এটিই হলো 'লাবানুল ফাহল'-এর ব্যাখ্যা। এই মাসআলার মূল ভিত্তি এটাই। এটিই ইমাম আহমাদ ও ইসহাকের অভিমত।]









আল-জামি` আল-কামিল (6535)


6535 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: كان فيما أُنزل من القرآن - عشرُ رضعات
معلوماتٍ يحرِّمْنَ، ثم نُسِخْنَ بخمس معلومات، فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو فيما يقرأ من القرآن.

صحيح: رواه مالك في الرضاع (17) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: فذكرته.

ورواه مسلم في الرضاع (24: 1452) من طريق مالك، به، مثله.

قولها:"فتوفّيَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو فيما يقرأ من القرآن".

وقد اعتُرِض على حديث عائشة بأنها لم تنقل هذا الخبر نَقْلَ الحديث، وإنما نقلتْه نقلَ القرآنِ، والقرآنُ إنما يثبت بالتواتر، فأجيب عليه بأن المسألة ذو شقين:

أحدهما: كونه من القرآن.

والثاني: وجوب العمل به.

أما الأون: فكونه من القرآن فإنه لم يثبت ذلك، ولو ثبت لجازت قراءته في الصلاة.

وأما الثاني: وهو وجوب العمل به، فإن انتفاء الأحكام لعدم التواتر، لم يلزم انتفاءَ العمل به، فإنه يكفي فيه الظن. وقد احتج كلٌّ من الأئمة الأربعة به في مواضع. فاحتج الشافعي وأحمد في هذا الموضع، واحتج أبو حنيفة في وجوب التتابع في صيام الكفارة بقراءة ابن مسعود"فصيام ثلاثة أيام متتابعات" انظر للمزيد: زاد المعاد (5/ 573).

وقال النووي: معناه أن النسخَ خمسُ رضعاتٍ تأخر إنزالُه حتى توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم. وبعض الناس يقرأ"عشر رضعات". ويجعلها قرأنًا متلوًا لكونه لم يبلغه النسخُ لقرب عهده. فلما بلغه النسخُ بعد ذلك رجعوا عن ذلك. وأجمعوا على أن هذا لا يُتْلَى.

والنسخُ ثلاثة أنواع: أحدها: ما نُسِخَ حكمُه وتلاوتُه كعشر رضعات.

والثاني: ما نُسِختْ تلاوتُه دون حكمِه كخمس رضعات، وكالشيخ والشيخة إذا زنيا فارجموهما.

والثالث: ما نُسِخَ حكمُه، وبقيت تلاوتُه. وهذا هو الأكثر ومنه قوله تعالى: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا وَصِيَّةً لِأَزْوَاجِهِمْ} [البقرة: 240] الآية. انتهى.

وهذا مما نسخ رسمُه كما ذكره ابن الجوزي في نواسخ القرآن (ص 118).

وأما ما روي عن عائشة قالت: لقد نزلت آيةُ الرجم، ورضاعةُ الكبير عشرًا. ولقد كان في صحيفة تحت سريري، فلما مات رسول الله صلى الله عليه وسلم وتشاغَلنا بموته، دخل داجن فأكلها. فهو منكر.

والداجن هو الشاة التي تؤلف في البيوت ولا تخرج إلى المرعى.

رواه ابن ماجه (1944) وأحمد (36316) وابن الجوزي في نواسخ القرآن (ص 118) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة، عن عائشة. وعبد الرحمن بن
القاسم، عن أبيه، عن عائشة. وهذا كله عند ابن ماجة، وعند الإمام أحمد رواية عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم، عن عمرة وحدها ولفظه:"لقد أنزلت آيةُ الرجم ورضعاتُ الكبير عشرٌ، فكانت في ورقةٍ تحت سرير بيتيّ، فلمّا اشتكى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم تشاغلنا بأمره، ودخلت دويبةٌ فأكلتْها".

وعند ابن الجوزي من هذا الطريق وحده وجاء فيه:"ربيبة لنا فأكلتها، تعني الشاة".

ومداره على محمد بن إسحاق هو: ابن يسار أبو بكر المخزومي مولاهم المدنيّ، المؤرخ المعروف، وإمام في المغازي وهو حسن الحديث إذا صرَّح، ولكن إذا تفرّد في الأحكام فأهل العلم لا يقبلون تفرده، فكيف يُقبل قولُه في ذهاب آيةٍ من كتاب الله، ففي القصة نكارة واضحة، لأن هذه الصحيفةَ التي أكلها الداجن إن كانت تشمل أيةً من القرآن، ولم ينسخها الله تعالى فكانت محفوظة في قلب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وفي قلوب أصحابه لأن الله تعالى يقول: {إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ (9)} [الحجر: 9].

وحيث أنها لا توجد في القرآن، فدل على بطلان هذه القصة، وإن كان ظاهر إسناده حسن؛ لأن محمد بن إسحاق مدلِّس، ولكنه صرَّح بالتحديث غير أنه لا يقبل تفرده كما قال الذّهبيّ في"الميزان"، ولذا أنكر ابن حزم القصة بشدة، وجعلها مكذوبة.

انظر: الإحكام في أصول الأحكام (4/ 453 - 454).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআন মাজীদে যা নাযিল হয়েছিল, তার মধ্যে ছিল— 'দশটি সুনির্দিষ্ট দুধপান সম্পর্ককে হারাম করে দেয়।' অতঃপর তা পাঁচটি সুনির্দিষ্ট দুধপান দ্বারা রহিত (নাসখ) করা হয়েছিল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, যখন (এই পাঁচটি দুধপানের বিধানটি) কুরআন থেকে পঠিত অংশের অন্তর্ভুক্ত ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6536)


6536 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُحرّمُ المصَّةُ والمصَّتان".

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1450) من طريق أيوب، عن ابن أبي مُليكة، عن عبد الله بن الزُّبير، عن عائشة قالت: فذكرته.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একবার বা দুইবার স্তন পান দ্বারা (বিবাহের ক্ষেত্রে) হুরমাত সাব্যস্ত হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6537)


6537 - عن عائشة قالت: دخل عليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وعندي رجل قاعد، فاشتد ذلك عليه، ورأيتُ الغضبَ في وجهه، قالت: فقلت: يا رسول الله، إنه أخي من الرضاعة. قالت: فقال:"انظرنَ إخوتكن من الرضاعة، فإنما الرضاعةُ من المجاعة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5102)، ومسلم في الرضاع (1450) من طريق أشعث بن أبي الشعثاء، عن أبيه، عن مسروق. قال: قالت عائشة: فذكرته، والسياق لمسلم.

قوله:"فإنما الرضاعة من المجاعة": أي أن الرضاعة التي تَثبتُ بها الحرمةُ، وتَحِلُّ بها الخلوةُ هي حيث يكون الرضيعُ طفلا، ويكون اللبنُ هو غذاءَه، ويسد به جوعُه، ويكون هذا الإرضاع خلال السنتين الأوّليين من عمر الرضيع لقوله تعالى: {وَالْوَالِدَاتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَادَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ لِمَنْ أَرَادَ أَنْ يُتِمَّ الرَّضَاعَةَ} [البقرة: 233] مع قوله تعالى: {وَفِصَالُهُ فِي عَامَيْنِ} [لقمان: 14] وعليه يدل حديث أم سلمة.

وأبو الشعثاء هو: سُليم بن أسود المحاربي والد أشعث، روى عن مسروق بن الأجدع، عن عائشة كما رُوي عن عائشة أيضًا بدون الواسطة كما في الحديث الآتي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট আগমন করলেন, তখন আমার কাছে একজন পুরুষ বসেছিল। এতে তিনি অত্যন্ত কঠোরতা অনুভব করলেন এবং আমি তাঁর চেহারায় রাগ দেখতে পেলাম। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! সে তো আমার দুধভাই। তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের দুধভাইদের বিষয়ে ভালোভাবে লক্ষ্য রাখো (সতর্ক থাকো), কারণ দুগ্ধপান (যা সম্পর্ক স্থাপন করে) তা তো ক্ষুধার কারণে হয়ে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6538)


6538 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُحَرِّمُ الخطفةُ والخطفتان".
صحيح: رواه النسائيّ (3311) عن محمد بن عبد الله بن بَزيع، - بالباء المفتوحة والزاء المكسورة - قال ثنا يزيد - يعني ابن زريع -، قال: ثنا سعيد، عن قتادة قال: كتبنا إلى إبراهيم بن يزيد النخعي نسأله عن الرضاع. فكتب أن شُريحًا حَدَّثَنَا أن عليًّا وابنَ مسعود كانا يقولان: يحرمُ من الرضاع قليلُه وكثيرُه. وكان في كتابه: أن أبا الشعثاء المحاربيّ، ثنا، أن عائشة حدّثته أن نبي الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكرته. وإسناده صحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক ঢোক বা দুই ঢোক (দুধপান) হারাম করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6539)


6539 - عن عبد الله بن الزُّبير أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يُحرِّم من الرضاعة المصَّةُ والمصتان". صحيح: رواه النسائيّ (3309) وأحمد (16110) وعبد الرزّاق (7/ 469) والبيهقي (7/ 454) والمروزي في السنة (279، 280، 283) كلّهم من طرق عن عروة بن الزُّبير، عن أخيه عبد الله بن الزُّبير فذكره.

وإسناده صحيح. وقد أدرك عبد الله بن الزُّبير النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو ابن تسع سنين كما قال الشافعي وفي كلام الشافعي إشارة إلى صحة رواية عبد الله بن الزُّبير، وقد أشار أيضًا ابن حبَّان إلى هذا فقال:"لستُ أنكر أن يكون ابن الزُّبير سمع هذا الخبر عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فمرة أدى ما سمع، وأخرى رُوي عن عائشة، وهذا شيء مستفيض في الصّحابة".

وقال البيهقيّ بعد أن نقل قول الشافعي:"وهو كما قال، إِلَّا أن ابن الزُّبير إنّما أخذ هذا الحديث عن عائشة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم"، السنن الكبري (7/ 454).

وهو كما قال: فقد سبق تخريج مسلم له من طريق ابن أبي مليكة، عن عبد الله بن الزُّبير، عن عائشة.

وقد رواه أيضًا البيهقيّ من طريق محمد بن إسحاق، نا أبو عبيد، نا يحيى بن سعيد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن ابن الزُّبير، عن عائشة.

وأمّا ما رواه محمد بن دينار الطاحيّ، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزُّبير، عن الزُّبير فزاد فيه"الزُّبير" فهو خطأ.

رواه ابن حبَّان في صحيحه (4226) من طريقه، وقد نبَّه البخاريّ في"العلل الكبير" (1/ 454) على أنه أخطأ فيه محمد بن دينار فزاد في الإسناد"الزُّبير" وكذا قال الترمذيّ في سننه (1150) عند تخريج حديث ابن أبي مليكة، عن عبد الله بن الزُّبير، عن عائشة.




আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুধপানের কারণে একটি বা দু'টি চুষা/স্তন্যপান দ্বারা (বিবাহ) হারাম হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6540)


6540 - عن عبد الله بن الزُّبير أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا رضاع إِلَّا ما فتقَ الأمعاءَ".

حسن: رواه ابن ماجة (1946) عن حرملة بن يحيى، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، قال: أخبرني ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عروة، عن عبد الله بن الزُّبير فذكره.

وإسناده حسن من اجل ابن لهيعة، وفيه كلام معروف، إِلَّا رواية العبادلة عنه أعدل من غيرهم، وهذا منها.




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুধপান (যা হারাম সম্পর্ক তৈরি করে) কেবল সেটাই, যা অন্ত্র ভেদ করে (অর্থাৎ ক্ষুধা নিবারণ করে এবং দুধ ছাড়ানোর বয়সের মধ্যে হয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6541)


6541 - عن أم الفضل قالت: دخل أعرابي على نبي الله صلى الله عليه وسلم وهو في بيتي. فقال:
يا نبي الله! إني كانتْ لي امرأةٌ فتزوجتُ عليها أخرى. فزعمت امرأتي الأوّلى أنها أرضعتْ امرأتي الحُدْثَى رضعةً أو رضعتين. فقال نبي الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُحرِّم الإملاجةُ والإملاجتان".

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (18: 1451) من طريق المعتمر بن سليمان عن أيوب، يحدث عن أبي الخليل، عن عبد الله بن الحارث، عن أم الفضل فذكرته.

وفي رواية:"لا تُحرم الرضعةُ أو الرضعتان، أو المصةُ أو المصتان".

وفي رواية:"والرضعتان والمصتان".

وفي رواية:"هل تُحرم الرضعة الواحدة"، قال:"لا".

قوله:"الإملاجة" هي المصة، يقال: ملج الصبيُّ أمه إذا رضعها. وأملجتْه أمُّه أي أرضعتْه.




উম্মুল ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক বেদুঈন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলো, যখন তিনি আমার ঘরে ছিলেন। সে বললো: হে আল্লাহর নবী! আমার একজন স্ত্রী আছে এবং আমি তার উপরে আরেকজনকে বিবাহ করেছি। আমার প্রথম স্ত্রী দাবি করছে যে সে আমার নতুন স্ত্রীকে এক বা দুইবার দুধ পান করিয়েছিল। তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "একবার বা দুইবার দুধ পান করানো (বিবাহকে) হারাম করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6542)


6542 - عن أم سلمة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُحرِّمُ من الرضاعة إِلَّا ما فتقَ الأمعاءَ في الثديّ، وكان قبل الفِطام".

صحيح: رواه الترمذيّ (1152) والنسائي في الكبرى (5441) كلاهما عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن فاطمة بنت المنذر، عن أم سلمة فذكرته.

إسناده صحيح، وصحّحه أيضًا ابن حبَّان (4224) ورواه من وجه آخر عن أبي عوانة مختصرًا.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح. والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم، أن الرضاعة لا تُحرِّم إِلَّا ما كان دون الحولين، وما كان بعد الحولين الكاملين فإنه لا يُحرِّم شيئًا".

وفاطمة بنت المنذر بن الزُّبير بن العوّام هي امرأة هشام بن عروة، ولكن اختلف على هشام بن عروة فرواه عنه أبو عوانة هكذا مرفوعًا، وخالفه وهيب وهو - ابن خالد بن عجلان - فرواه عن هشام بإسناده موقوفًا على أم سلمة. رواه إسحاق بن راهويه (4/ 175) عن المخزوميّ، نا وهيب به.

وكذا خالفه يحيى القطان، فرواه عن هشام، عن يحيى بن عبد الرحمن، عن أم سلمة موقوفًا.

ذكره الدَّارقطنيّ في"العلل" (15/ 255) وقال:"قول يحيى أشبه".

قلت: هشام بن عروة له شيخان: أحدُهما: فاطمة بنت المنذر زوجته وهي رواية أبي عوانة المرفوعة وهي أشبه بالصواب لأنها من روايته عن زوجته. ولكن يعكره ما رواه وهيب بن خالد وهو ثقة أيضًا - موقوفًا.

فلعل فاطمة بنت المنذر تروي مرة مرفوعًا، وأخرى موقوفًا. والحكم للزيادة.

وأعله ابن حزم في"المحلى" (11/ 202) بالانقطاع بين فاطمة بنت المنذر - وبين أم سلمة فقال: وُلدتْ فاطمة سنة (48 هـ) وماتت أم سلمة سنة (59 هـ).
قلت: هذه العلة غير قادحة؛ فإن فاطمة كان عمرها (11 سنة) وهي كانت بالمدينة فلقاءهما ممكن.

وأمّا رواية يحيى القطان ففيه يحيى بن عبد الرحمن لم أعرف من هو؟ وفي الإسناد أيضًا انقطاع فلا يعتمد عليه.

وقد صحح هذا الحديث أيضًا الحاكم، وابن القيم، وسكت عليه الحافظ في الفتح بعد أن نقل حكم الترمذيّ بأنه: حسن صحيح.

وقوله:"فتق الأمعاء" أي شقَّها، ودخل فيها بحيث صار غذاء للولد.

وقوله:"في الثدي" أي في زمن الثدي.

قال الحافظ ابن القيم في زاده (5/ 580):"وهذه لغة معروفة عند العرب، فإن العرب يقولون: فلان مات في الثدي، أي: في زمن الرضاع قبل الفطام، ومنه الحديث المشهور:"إن إبراهيم مات في الثدي، وإن له مُرْضِعًا في الجنّة تُتِمُّ رضاعَه" يعني إبراهيم ابنه صلوات الله وسلامه عليه، قالوا: وأكد ذلك بقوله:"لا رضاعَ إِلَّا ما فتقَ الأمعاءَ، وكان في الثدي قبل الفِطام".

وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا رضاعَ إِلَّا ما كان في الحولين".

رواه الدَّارقطنيّ (4/ 174) والبيهقي (7/ 462) كلاهما من حديث أبي الوليد بن برد الأنطاكيّ، نا الهشم بن جميل، نا سفيان، عن عمرو بن دينار، عن ابن عباس فذكره.

قال الدَّارقطنيّ:"لم يُسنده عن ابن عيينة غير الهيثم بن جميل، وهو ثقة حافظ".

ونقل البيهقيّ عن ابن عدي أنه قال:"هذا يعرف بالهيثم بن جميل، عن ابن عيينة مسندًا، وغير الهيثم يُوقِف على ابن عباس".

قلت: وهو كما قال: فقد رواه سعيد بن منصور، عن ابن عيينة موقوفًا.

والهيثم بن جميل وإن كان ثقة حافظا كما قال الدارقطنيّ، إِلَّا أنه وهم في رفع هذا الحديث، والصحيح وقفه على ابن عباس.

وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تحرّم من الرضاعة المصّةُ والمصّتان، ولا يحرّمُ منه إِلَّا ما فتقَ الأمعاء".

رواه البزّار - كشف الأستار - (1444)، والبيهقي (7/ 455) كلاهما من حديث محمد بن إسحاق، عن إبراهيم بن عقبة، عن حجَّاج بن حجَّاج، عن أبي هريرة فذكره.

قال البزّار:"لا نعلمه بهذا اللّفظ إِلَّا بهذا الإسناد، وحجاج بن حجَّاج رُوي عن أبيه وأبي هريرة، وروى عنه عروة وهو معروف".

وقال البيهقيّ:"ورواه الزهري وهشام عن عروة موقوفًا على أبي هريرة بعض معناه.

وقد رُويَ من أوجه أخرى أضعف من هذا.

ومنها: ما ذكره أبو حاتم في"العلل" (1/ 417) فإنه ذكره من طريق ابن لهيعة، عن عيسى بن
عبد الرحمن الزرقيّ، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، أو أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وقال:"هذا حديث باطل، وعبسي هذا أبو عباد لا أعرف له حديثًا صحيحًا.

وقال ابن عدي:"يروي المناكير عن الزهري".

فقه الحديث: يستفاد من أحاديث الباب أن خمس رضعات فما فوقها هي المحرمة، وبه قال أحمد والشافعي وإسحاق ومعظم أهل الحديث.

قال الإمام أحمد:"إن ذهب ذاهب إلى قول عائشة في خمس رضعات فهو مذهب قوي".

والمراد بالخمس الرضعات هنا: خمس مصّات، فإذا مصَّ الطفلُ ثدي المرأة، ثمّ تركهـ باختياره فهذه رضعة واحدة، ثمّ عاد إليه، فهذه رضعة ثانية، ثمّ عاد إلى المص، ثمّ تركه للتنفس، أو للانتقال إلى ثدي آخر، فهذه ثالثة، وهكذا الرابعة والخامسة أيضًا، وليس المراد منه كما يَفْهم بعضُ الناس أن الشبع في فترةٍ واحدةٍ تُعتبر رضعةٌ واحدةٌ، ولو مصر خمس مرات أو أكثر، فعلي قولهم يجب أن يشبع خمس مرات، ولو كثر عدد الرضعات، وإنما الصَّحيح هو عدد المصات لا عدد الشبعات.

وبه أفتتِ اللجنةُ الدائمةُ للفتوى للمملكة العربية السعودية، وقالت اللجنة:"ولو وصل اللبن إلى جوف الطفل بغير الإرضاع، كأن يُقطر في فمه، أو يشربه في إناء ونحوه، فحكمه حكم الرضاع بشرط أن يحصل من ذلك خمس مرات. ولو لم يحصل الشبع في بعض المرات حُسبتْ رضعة، وهكذا حتَّى تتم خمسُ رضعات، فإذا نقص ولو رضعة واحدةٌ فإنها لا تُحرِّم".

وقالت اللجنة:"وسواء ارتضع من الثدي، أو شربه في إناء خمس جرعات".

وقالت اللجنة:"وإن حصل الشك في عدد الرضعات هل هي خمس أو أقل؟ فالأصل عدم الرضاع، فلا يحرم". انتهى.

والقول الثاني: إن رضعةً واحدةً تُحرِّم بظاهر القرآن في قوله تعالى: {وَأَخَوَاتُكُمْ مِنَ الرَّضَاعَةِ} [النساء: 23].

وبه قال أبو حنيفة ومالك، وتركا لذلك الأحاديثَ الصحيحةَ بحجة إنها زيادة على القرآن.

والقول الثالث: لا تُحرّمه أقل من ثلاث رضعات لقول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تحرِّمُ المصة والمصتان". وبه قال داود الظاهري.

والصحيح هو القول الأوّل لوجود أدلة صحيحة واضحة من السنة الصحيحة، وهي ليست زائدة على القرآن، بل هي مُخصّصة لمطلقه مثل أحكام الصّلاة والزكاة والصوم والحج وغيرها. وبالله التوفيق.




উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: দুধপানের মাধ্যমে কেবল সেই দুধপানেই (বিয়ে) হারাম হয় যা দুধপানের সময়কালে (শিশুর) অন্ত্র ভেদ করে (পেটে প্রবেশ করে) এবং যা দুধ ছাড়ানোর (ফিতামের) পূর্বেই সম্পন্ন হয়।

সহীহ: এটি ইমাম তিরমিযী (১১৫২), এবং নাসায়ী তাঁর আল-কুবরা গ্রন্থে (৫৪৪১) বর্ণনা করেছেন। উভয়েই বর্ণনা করেছেন কুতায়বাহ থেকে। তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আওয়ানা, তিনি হিশাম ইবনে উরওয়া থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি ফাতিমা বিনত আল-মুনযির থেকে, তিনি উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।

এর সনদ সহীহ। ইবনে হিব্বানও এটিকে সহীহ বলেছেন (৪২২৪)। তিনি অন্য সূত্রে আবূ আওয়ানা থেকে সংক্ষেপে এটি বর্ণনা করেছেন।

ইমাম তিরমিযী বলেছেন: "এই হাদীসটি হাসান সহীহ। সাহাবায়ে কেরাম ও অন্যান্যদের মধ্যে অধিকাংশ আলিমের আমল এই হাদীস অনুযায়ীই, যে কেবল দুই বছর পূর্ণ হওয়ার মধ্যে যে দুধপান করানো হয়, তাই হারাম করে। আর যা দুই বছর পূর্ণ হওয়ার পরে হয়, তা কিছুই হারাম করে না।"

ফাতিমা বিনত আল-মুনযির ইবনে আয-যুবাইর ইবনে আল-আওয়াম হলেন হিশাম ইবনে উরওয়ার স্ত্রী। তবে হিশাম ইবনে উরওয়ার ওপর (বর্ণনার ক্ষেত্রে) মতভেদ হয়েছে। আবূ আওয়ানা এটিকে মারফূ‘ (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত পৌঁছানো) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। কিন্তু ওয়াহিব (তিনি হলেন ইবনে খালিদ ইবনে আজলান) তাঁর বিরোধিতা করেছেন। তিনি হিশাম থেকে একই সূত্রে এটি মাওকূফ (উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি হিসেবে) বর্ণনা করেছেন। ইসহাক ইবনে রাহাওয়াইহ (৪/১৭৫) এটি আল-মাখযূমী থেকে, তিনি ওয়াহিব থেকে বর্ণনা করেছেন।

অনুরূপভাবে ইয়াহইয়া আল-কাত্তানও তাঁর বিরোধিতা করেছেন। তিনি হিশাম থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনে আবদুর রহমান থেকে, তিনি উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

দারাকুতনী তাঁর "আল-ইলাল" (১৫/২৫৫)-এ এটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: "ইয়াহইয়ার বর্ণনাটিই বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ।"

আমি বলি: হিশাম ইবনে উরওয়ার দুজন শায়খ আছেন: তাদের একজন হলেন তাঁর স্ত্রী ফাতিমা বিনত আল-মুনযির। আর এটিই আবূ আওয়ানার মারফূ‘ বর্ণনা এবং এটিই সঠিকের বেশি নিকটবর্তী, কারণ এটি তিনি তাঁর স্ত্রীর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তবে ওয়াহিব ইবনে খালিদ (তিনিও নির্ভরযোগ্য) এর মাওকূফ বর্ণনাটি এর পথে বাধা সৃষ্টি করে। সম্ভবত ফাতিমা বিনত আল-মুনযির একবার মারফূ‘ হিসেবে এবং আরেকবার মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর (উসুলুল হাদীসের নীতি অনুযায়ী) বর্ধিত অংশটিই গ্রহণযোগ্য হবে।

ইবনে হাযম তাঁর "আল-মুহাল্লা" (১১/২০২)-এ ফাতিমা বিনত আল-মুনযির ও উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে ইনকিতা' (বিচ্ছিন্নতা) থাকার কারণে এই হাদীসকে দুর্বল বলেছেন। তিনি বলেন: ফাতিমা (৪৮ হিঃ) সনে জন্মগ্রহণ করেন এবং উম্মে সালমা (৫৯ হিঃ) সনে ইন্তেকাল করেন।

আমি বলি: এই ত্রুটি (ইল্লত) ক্ষতিকারক নয়। কারণ ফাতিমার বয়স তখন (১১ বছর) ছিল এবং তিনি মদীনায় ছিলেন। তাই তাঁদের সাক্ষাৎ সম্ভব।

আর ইয়াহইয়া আল-কাত্তানের বর্ণনার ক্ষেত্রে, তাতে ইয়াহইয়া ইবনে আবদুর রহমান রয়েছেন। ইনি কে, তা আমি জানতে পারিনি। এই সনদেও বিচ্ছিন্নতা রয়েছে, তাই এর উপর নির্ভর করা যাবে না।

এই হাদীসটিকে হাকিম এবং ইবনুল কায়্যিমও সহীহ বলেছেন। হাফিয ইবনে হাজার ফাতহুল বারীতে ইমাম তিরমিযীর রায়—যে এটি হাসান সহীহ—উদ্ধৃত করার পর নীরবতা অবলম্বন করেছেন।

তাঁর বাণী: "ফাতাক্বাল আমা‘আ" (অন্ত্রকে ভেদ করে) এর অর্থ হলো: এটিকে বিদীর্ণ করে এবং এর ভেতরে প্রবেশ করে, যাতে তা শিশুর খাদ্যে পরিণত হয়।

তাঁর বাণী: "ফীস সাদ্য়ী" (স্তন্যপানের সময়) অর্থাৎ স্তন্যপানের যুগে।

হাফিয ইবনুল কায়্যিম তাঁর যাদুল মা‘আদ (৫/৫৮০)-এ বলেছেন: "এটি আরবের একটি সুপরিচিত ভাষা। আরবীয়রা বলে: অমুক স্তন্যপানের সময় মারা গেছে, অর্থাৎ দুধ ছাড়ানোর আগে তার শৈশবে। আর এ থেকেই প্রসিদ্ধ হাদীসটি এসেছে: ‘ইবরাহীম স্তন্যপানের সময়ে মারা গেছেন এবং জান্নাতে তার জন্য একজন দুধমা আছেন, যিনি তার দুধপান পূর্ণ করবেন’—অর্থাৎ তাঁর পুত্র ইবরাহীম (সালাওয়াতুল্লাহি ওয়া সালামুহু আলাইহি)। তাঁরা বলেছেন: আর এটিকে আরও জোরদার করা হয়েছে তাঁর বাণী দ্বারা: ‘কেবল সেই দুধপানেই (হারাম হয়) যা অন্ত্রকে ভেদ করে এবং যা স্তন্যপানের সময়, দুধ ছাড়ানোর আগেই ঘটে’।"

এই সংক্রান্ত আরেকটি বর্ণনা ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কেবল সেই দুধপানেই (হারাম হয়) যা দুই বছরের মধ্যে হয়।"

এটি দারাকুতনী (৪/১৭৪) এবং বায়হাকী (৭/৪৬২) উভয়েই আবূল ওয়ালীদ ইবনে বারদ আল-আন্তাকী, তিনি আল-হাইসাম ইবনে জামীল, তিনি সুফিয়ান, তিনি আমর ইবনে দীনার, তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

দারাকুতনী বলেছেন: "ইবনে উয়াইনা থেকে আল-হাইসাম ইবনে জামীল ছাড়া আর কেউ এটিকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেননি। তিনি নির্ভরযোগ্য হাফিয (স্মৃতিশক্তি সম্পন্ন)।"

বায়হাকী ইবনে আদী থেকে উদ্ধৃত করেছেন যে তিনি বলেছেন: "এটি আল-হাইসাম ইবনে জামীল কর্তৃক ইবনে উয়াইনা থেকে মুসনাদ হিসেবে বর্ণনা করার জন্য পরিচিত। হাইসাম ছাড়া অন্যরা এটিকে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি (মাওকূফ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।"

আমি বলি: তিনি ঠিকই বলেছেন। সাঈদ ইবনে মানসূর ইবনে উয়াইনা থেকে এটিকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আল-হাইসাম ইবনে জামীল দারাকুতনী যেমনটি বলেছেন, যদিও তিনি নির্ভরযোগ্য হাফিয ছিলেন, তবুও তিনি এই হাদীসটিকে মারফূ‘ করতে গিয়ে ভুল করেছেন। এর সহীহ হলো এটিকে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি (মাওকূফ) হিসেবে রাখা।

এরই অনুরূপ অর্থে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এক বা দুইবার চোষণে হারাম হয় না, বরং কেবল সেই দুধপানেই হারাম হয় যা অন্ত্রকে ভেদ করে।"

এটি বাযযার (কাশফুল আসতার ১৪৪৪) এবং বায়হাকী (৭/৪৫৫) উভয়েই মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক, তিনি ইবরাহীম ইবনে উক্ববাহ, তিনি হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজ, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

বাযযার বলেছেন: "এই শব্দে এই সনদ ছাড়া আর কোনো সনদে আমরা এটিকে জানি না। হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজ তাঁর পিতা এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর উরওয়া তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি পরিচিত (রাবী)।"

বায়হাকী বলেছেন: "যুহরী এবং হিশাম এটি উরওয়া থেকে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি (মাওকূফ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন, যার অর্থ আংশিক একই।"

এটি এর চেয়েও দুর্বল অন্যান্য সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।

এর মধ্যে একটি হলো: যা আবূ হাতিম তাঁর "আল-ইলাল" (১/৪১৭)-এ উল্লেখ করেছেন। তিনি ইবনে লাহীআহ থেকে, তিনি ঈসা ইবনে আবদুর রহমান আয-যুরাকী থেকে, তিনি আয-যুহরী থেকে, তিনি সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব অথবা আবূ সালামাহ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

তিনি বলেছেন: "এই হাদীসটি বাতিল। আর আবসী এই আবূ আব্বাদ কে, আমি তার কোনো সহীহ হাদীস জানি না।"

ইবনে আদী বলেছেন: "তিনি যুহরী থেকে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করেন।"

**হাদীসের ফিকহ:** এই পরিচ্ছেদের হাদীসসমূহ থেকে বোঝা যায় যে পাঁচবার দুধপান বা তার বেশি হলে তা (বিয়েকে) হারাম করে। ইমাম আহমাদ, শাফিঈ, ইসহাক এবং অধিকাংশ মুহাদ্দিসগণ এই মত পোষণ করেন।

ইমাম আহমাদ বলেছেন: "যদি কেউ পাঁচবার দুধপান সম্পর্কে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মত গ্রহণ করে, তবে এটি একটি শক্তিশালী মাযহাব।"

এখানে পাঁচবার দুধপান বলতে পাঁচটি চোষণকে বোঝানো হয়েছে। শিশু যখন নারীর স্তন চোষণ করে, এরপর স্বেচ্ছায় তা ছেড়ে দেয়, তখন এটি একটি দুধপান (রাদ্আহ) হিসেবে গণ্য হয়। তারপর আবার গ্রহণ করলে তা দ্বিতীয় দুধপান। এরপর আবার চোষণ করে শ্বাস নেওয়ার জন্য বা অন্য স্তনে যাওয়ার জন্য ছেড়ে দিলে তা তৃতীয়, আর এভাবেই চতুর্থ ও পঞ্চম। এর উদ্দেশ্য এই নয় যে, কিছু লোক যা বোঝে—একবারে পেট ভরে পান করাকে একটি দুধপান হিসেবে গণ্য করা হবে, যদিও সে পাঁচবার বা তার বেশি চোষণ করুক না কেন। তাদের মতে পাঁচবার তৃপ্তি সহকারে পান করতে হবে, চোষণের সংখ্যা যাই হোক না কেন। বরং সঠিক হলো চোষণের সংখ্যা, তৃপ্তির সংখ্যা নয়।

সৌদি আরবের ফতোয়া বিষয়ক স্থায়ী কমিটি এই মত অনুযায়ী ফতোয়া দিয়েছে। কমিটি বলেছে: "যদি দুধ স্তন্যপান করানো ছাড়াই শিশুর পেটে পৌঁছায়—যেমন তার মুখে ফোঁটা ফোঁটা করে দেওয়া হয়, বা সে কোনো পাত্র থেকে পান করে—তবে তার হুকুমও দুধপানের হুকুমের অনুরূপ, তবে শর্ত হলো এটি পাঁচবার হতে হবে। যদি কিছুবারে পেট না ভরেও, তবুও তা একটি দুধপান হিসেবে গণ্য হবে। আর এভাবেই পাঁচটি দুধপান পূর্ণ হবে। যদি একটিও কম হয়, তবে তা হারাম করবে না।"

কমিটি আরও বলেছে: "সে স্তন থেকে পান করুক বা কোনো পাত্র থেকে পাঁচ ঢোক পান করুক, উভয় ক্ষেত্রেই একই।"

কমিটি আরও বলেছে: "যদি দুধপানের সংখ্যা পাঁচ না কম, এ নিয়ে সন্দেহ তৈরি হয়, তবে মূল নীতি হলো দুধপান ঘটেনি, সুতরাং তা হারাম করবে না।" সমাপ্ত।

দ্বিতীয় মত: একবার দুধপান করানোই হারাম করে দেয়, কুরআনের সুস্পষ্ট বক্তব্যের ভিত্তিতে। মহান আল্লাহর বাণী: {وَأَخَوَاتُكُمْ مِنَ الرَّضَاعَةِ} [সূরা নিসা: ২৩] (তোমাদের দুধপানের বোনেরা)।

আবূ হানীফা ও মালিক এই মত পোষণ করেন। তাঁরা এই কারণে সহীহ হাদীসগুলোকে বর্জন করেছেন, এই যুক্তিতে যে এটি কুরআনের ওপর অতিরিক্ত (বৃদ্ধি)।

তৃতীয় মত: তিনবারের কম দুধপান হারাম করে না। কারণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একবার বা দুবার চোষণ হারাম করে না।" দাউদ আয-যাহিরী এই মত পোষণ করেন।

সঠিক হলো প্রথম মতটি, কারণ সহীহ সুন্নাহ থেকে সুস্পষ্ট সহীহ প্রমাণ রয়েছে। আর এটি কুরআনের ওপর অতিরিক্ত নয়, বরং এটি নামায, যাকাত, সাওম ও হজ্বের বিধানের মতো কুরআনের সাধারণ বিষয়কে নির্দিষ্ট (মুখাচ্ছাস) করে দেয়। আর আল্লাহর নিকটই সাহায্য চাওয়া হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6543)


6543 - عن عائشة أن أبا حذيفة بن عتبة بن ربيعة بن عبد شمس - وكان ممن شهد بدرًا
مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تبنّى سالمًا، وأنكحَه بنتَ أخيه هند بنت الوليد بن عتبة بن ربيعة، وهو مولى لامرأةٍ من الأنصار، كما تبنّى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم زيدًا، وكان من تبنّى رجلًا في الجاهليّة دعاء الناس إليه، وورث من ميراثه، حتَّى أنزل الله: {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ فَإِنْ لَمْ تَعْلَمُوا آبَاءَهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ وَمَوَالِيكُمْ} [الأحزاب: 5] فردوا إلى آبائهم، فمن لم يُعلم له أب كان مولى وأخًا في الدين، فجاءتْ سهلةُ بنت سُهيل بن عمرو القرشيّ، ثمّ السامريّ، - وهو امرأة أبي حذيفة بن عتبة - إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! إنا كنا نرى سالمًا ولدًا، وقد أنزل الله فيه ما قد علمت" فذكرت الحديث.

صحيح: رواه البخاريّ في النكاح (5088) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزّهريّ، قال: أخبرني عروة بن الزُّبير، عن عائشة فذكرته.

هكذا قال البخاريّ يعني: فذكر الحديث وفيه إشارة إلى اختصار الحديث.

ورواه أيضًا في كتاب المغازي (4000) من حديث عقيل، عن ابن شهاب بإسناده واختصره أيضًا. ولم يكمله. وهذا يحتاج إلى التأمل هل البخاريّ ما كان يرى رضاعة الكبير؟ فحذف بقية القصة عمدًا؟ وكان يرى أنها من خصوصية سالم كغيره من العلماء.

وتمام الحديث عند أبي داود (2061) من طريق يونس، عن ابن شهاب، حَدَّثَنِي عروة بن الزُّبير، عن عائشة وأم سلمة وجاء فيه:"فقال لها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أرضعيه" فأرضعتْه خمس رضعات. فكان بمنزلة ولدها من الرضاعة. فبذلك كانت عائشة تأمر بنات أخواتها، وينات إخوتها أن يُرضِعن من أحبتْ عائشةُ أن يراها، ويدخل عليها، وإن كان كبيرًا، خمس رضعات ثمّ يدخل عليها، وأبتْ أم سلمة وسائرُ أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن يُدخلنَ عليهن بتلك الرضاعة أحدًا من الناس حتَّى يُرْضَع في المهد. وقلنا لعائشة: والله ما ندري لعلها كانت رخصة من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لسالم دون الناس.

وذكره مالك أيضًا القصة الكاملة وهي:




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু হুযাইফা ইবনু উৎবা ইবনু রাবী‘আ ইবনু ‘আব্দ শামস (যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে বদরের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন) সালিমকে দত্তক নিয়েছিলেন। সালিম ছিলেন আনসারী এক মহিলার মুক্তদাস। আবু হুযাইফা সালিমের বিয়ে দেন তার ভাতিজি হিন্দ বিনত আল-ওয়ালীদ ইবনু উৎবা ইবনু রাবী‘আর সাথে। যেমন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দকে দত্তক নিয়েছিলেন। জাহিলী যুগে যে ব্যক্তি কাউকে দত্তক নিত, লোকেরা তাকে তার পিতার নামেই ডাকত এবং সে তার সম্পত্তির উত্তরাধিকারী হতো, যে পর্যন্ত না আল্লাহ তা‘আলা এ আয়াত নাযিল করলেন:

{তোমরা তাদেরকে তাদের পিতৃপরিচয়সহ ডাকো, এটাই আল্লাহর কাছে অধিক ইনসাফপূর্ণ। যদি তোমরা তাদের পিতৃ-পরিচয় না জানো, তবে তারা তোমাদের দীনী ভাই ও বন্ধু} [সূরাহ আল-আহযাব: ৫]

অতঃপর তাদের পিতৃপরিচয়ের দিকে ফিরিয়ে দেওয়া হলো। যার পিতা জানা ছিল না, সে (দীনের মধ্যে) মুক্তদাস (মাওলা) ও ভাই বলে গণ্য হতো। তখন সুহাইল ইবনু আমর আল-কুরাশী, আস-সামারী-এর কন্যা সাহলা (যিনি আবু হুযাইফা ইবনু উৎবার স্ত্রী ছিলেন)- নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আমরা সালিমকে সন্তানের মতোই মনে করতাম। কিন্তু আপনি তো জানেনই, আল্লাহ তা‘আলা এ ব্যাপারে যা নাযিল করেছেন।” তিনি (আয়েশা) অবশিষ্ট হাদীস উল্লেখ করলেন।

(হাদীসের পূর্ণাঙ্গ বিবরণে এসেছে, সাহলা জিজ্ঞাসা করলে) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “তুমি তাকে দুধ পান করাও।” অতঃপর তিনি তাকে পাঁচবার দুধ পান করালেন। ফলে সে (সালিম) দুধের সম্পর্কের সূত্রে তার সন্তানের মর্যাদায় চলে এলো। এ কারণেই আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ভাই-বোনদের মেয়েদেরকে নির্দেশ দিতেন, যেন তারা সেই ব্যক্তিকে—যাকে আয়েশা দেখতে পছন্দ করতেন এবং তার কাছে প্রবেশ করা বৈধ করতে চাইতেন—তাঁকে বড় হওয়া সত্ত্বেও পাঁচবার দুধ পান করিয়ে দেয়, যেন সে তারপর তাঁর কাছে প্রবেশ করতে পারে। কিন্তু উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অন্যান্য স্ত্রীগণ এই ধরনের দুধপানের মাধ্যমে কাউকে তাঁদের কাছে প্রবেশ করাতে অস্বীকার করতেন, যতক্ষণ না তাকে শৈশবেই (দোলনায় থাকা অবস্থায়) দুধ পান করানো হয়। তাঁরা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: “আল্লাহর কসম! আমরা জানি না, সালিমের জন্য হয়তো এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে একটি বিশেষ অনুমতি ছিল, যা অন্যদের জন্য প্রযোজ্য নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (6544)


6544 - عن ابن شهاب قال: أخبرني عروة بن الزُّبير، أن أبا حذيفة بن عتبة بن ربيعة، وكان من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم وكان قد شهد بدرًا. وكان تبنّي سالمًا الذي يقال له: سالم مولى أبي حذيفة، كما تبنّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم زيدَ بن حارثة، وأنكح أبو حذيفة سالمًا، وهو يرى أنه ابنه، أنكحه بنتَ أخيه فاطمةَ بنت الوليد بن عتبة بن ربيعة، وهي يومئذ من المهاجرات الأُوَل. وهي من أفضل أيامي قريش. فلمّا أنزل الله في كتابه: {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ فَإِنْ لَمْ تَعْلَمُوا آبَاءَهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ وَمَوَالِيكُمْ} [الأحزاب: 5] رُدَّ كلُّ واحدٍ من أولئك إلى أبيه، فإن لم يُعلم أبوه رُدَّ إلى مولاه. فجاءت سهلة بنت سُهيل وهي امرأة أبي حذيفة، وهي من بني عامر بن لؤي - إلى رسول الله
صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! كنا نرى سالمًا ولدًا وكان يدخل عليَّ، وأنا فُضُلٌ وليس لنا إِلَّا بيت واحد. فماذا ترى في شأنه؟ فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أرضِعيه خمسَ رضعات فيَحرُمُ بلبنها" وكانت تراه ابنا من الرضاعة. فأخذت بذلك عائشة أم المؤمنين. فيمن كانت تُحب أن يدخل عليها من الرجال. فكانت تأمر أختَها أم كلثوم بنت أبي بكر الصديق. وبنات أخيها أن يُرضعنَ من أحبتْ أن يدخل عليها من الرجال. وأبى سائرُ أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن يدخل عليهن بتلك الرضاعة أحد من الناس. وقلن: لا، ما نرى الذي أمر به رسول الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا رخصة من رسول الله صلى الله عليه وسلم في رضاعة سالم وحده. لا، والله، لا يدخل علينا بهذه الرضاعة أحد.

فعلى هذا كان أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في رضاعة الكبير بأنه خاص بسالم.

صحيح: رواه مالك في الرضاع (12) عن ابن شهاب، أنه سئل عن رضاعة الكبير، فقال: أخبرني عروة بن الزُّبير، به. هكذا رواه يحيى، عن مالك مرسلًا.

ورواه عبد الرزّاق (13886) موصولًا عن مالك، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، أن أبا حُذيفة بن عتبة بن ربيعة - وكان بدريا - فذكره.

وكذلك رواه عثمان بن عمر، عن مالك موصولًا بذكر عائشة. ذكره ابن عبد البر في"التمهيد" (8/ 25) وإسناده صحيح.

وقول سهلة بنت سهيل:"يدخل عليّ وأنا فُضُل".

قال ابن عبد البر:"معنى الحديث عندي أنه كان يدخل عليها، وهي متكشفة بعضها، مثل الشعر، واليد، والوجه".

وقال في صفة إرضاع الكبير هو أن يُحلَب له اللبن ويسقاه.

قال: وأمّا أن تلقمه المرأة ثديها كما نصنع بالطفل فلا، لأن ذلك لا يحل عند جماعة العلماء. انتهى.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

আবু হুযাইফা ইবনু উৎবা ইবনু রাবী'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী ছিলেন এবং বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, তিনি সালিমকে পালকপুত্র হিসেবে গ্রহণ করেছিলেন—যাকে সালিম, আবু হুযাইফার মাওলা (মুক্ত দাস) বলা হতো—যেমন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দ ইবনু হারিসাকে পালকপুত্র হিসেবে গ্রহণ করেছিলেন। আবু হুযাইফা সালিমকে তার ভাতিজী ফাতিমা বিনত আল-ওয়ালিদ ইবনু উৎবা ইবনু রাবী'আর সাথে বিবাহ দিয়েছিলেন, যখন তিনি তাকে নিজের পুত্র মনে করতেন। ফাতিমা ছিলেন প্রথম দিকের মুহাজির নারীদের মধ্যে অন্যতম এবং কুরাইশ গোত্রের শ্রেষ্ঠ নারীদের একজন।

অতঃপর আল্লাহ যখন তাঁর কিতাবে এ আয়াত নাযিল করলেন: "তোমরা তাদেরকে তাদের পিতাদের নামে ডাকো। আল্লাহর কাছে এটাই অধিক ন্যায়সংগত। যদি তোমরা তাদের পিতাদের নাম না জানো, তাহলে তারা দ্বীনে তোমাদের ভাই ও তোমাদের মাওলা (মুক্ত দাস)।" [সূরা আহযাব: ৫] — তখন ঐসব পালিত পুত্রদের প্রত্যেকেই তাদের নিজ নিজ পিতার দিকে প্রত্যাবর্তিত হলো। আর যদি তাদের পিতার নাম জানা না যেত, তবে তাদেরকে তাদের মাওলার দিকে প্রত্যাবর্তন করানো হতো।

এরপর আবু হুযাইফার স্ত্রী সাহলা বিনত সুহায়ল (যিনি বনু আমির ইবনু লুয়াই গোত্রের ছিলেন) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা সালিমকে পুত্র হিসেবে দেখতাম। সে আমার কাছে এমন অবস্থায় প্রবেশ করত যখন আমি (পর্যাপ্ত কাপড় না থাকায়) হালকা পোশাকে বা অসম্পূর্ণ আবরণে থাকতাম এবং আমাদের একটি মাত্র ঘর ছাড়া আর কিছুই নেই। এখন আপনি তার বিষয়ে কী মত দেন?"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি তাকে পাঁচবার দুধ পান করাও, তাহলে এর মাধ্যমে সে (তোমাদের জন্য মাহরাম হয়ে) হারাম হয়ে যাবে।" (এভাবে) সাহলা সালিমকে দুধপানের মাধ্যমে আপন পুত্র হিসেবে গণ্য করতেন।

উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই বিধান গ্রহণ করেছিলেন এবং যেসব পুরুষ তাঁর নিকট প্রবেশ করুক বলে তিনি পছন্দ করতেন, তাদের ক্ষেত্রে তিনি (এ বিধান প্রয়োগ করতেন)। তিনি তাঁর বোন উম্মু কুলসুম বিনত আবী বাকর আস-সিদ্দীক এবং তাঁর ভাইয়ের মেয়েদের নির্দেশ দিতেন, যেন তাঁরা সেই পুরুষদের দুধ পান করিয়ে দেন, যাদের তিনি তাঁর নিকট প্রবেশ করা পছন্দ করতেন।

কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অন্যান্য স্ত্রীগণ (উম্মাহাতুল মু'মিনীন) এই প্রকার দুধপানের দ্বারা কারো তাদের কাছে প্রবেশ করতে অস্বীকার করেন। তাঁরা বলেন: "না! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা নির্দেশ দিয়েছেন, আমরা তাকে শুধুমাত্র সালিমের জন্য আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পক্ষ থেকে প্রদত্ত একটি বিশেষ ছাড় (রুখসাত) হিসেবেই দেখি। না, আল্লাহর শপথ! এই দুধপানের মাধ্যমে আমাদের নিকট কেউ প্রবেশ করবে না।"

সুতরাং, এই নীতির ভিত্তিতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ প্রাপ্তবয়স্কের দুধপানকে শুধুমাত্র সালিমের জন্য খাস (নির্দিষ্ট) মনে করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6545)


6545 - عن عائشة قالت: جاءت سهلة بنت سهيل النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، إني أرى في وجه أبي حذيفة من دخول سالم - وهو حليفُه - فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أرضِعِيه" قالت: وكيف أُرضعه وهو رجل كبير؟ ! فتبسَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"قد علمتُ أنه رجل كبير".

وفي رواية:"أرْضِعيه تحرُمي عليه، ويذهبُ الذي في نفس أبي حذيفة" فرجعت فقالت: إني قد أرضعته، فذهب الذي في نفس أبي حذيفة.

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1453) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
والرّواية الثانية رواها من طريق عبد الوهّاب الثقفيّ، عن أيوب، عن ابن أبي مليكة، عن القاسم، عن عائشة.

قال: فمكثت سنة، أو قريبًا منها، لا أحدث به، وهِبْته، ثمّ لقيت القاسم فقلت له: لقد حدّثتني حديثًا ما حدثتُه بعد. قال: فما هو؟ فأخبرته، قال: فحدِّثه عني أن عائشة أخبرتْنيه.

وأمّا ما رواه حمّاد بن سلمة، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن القاسم بن محمد، عن سهلة نفسها، فهو خطأ. أخطأ فيه حمّاد بن سلمة، والصحيح أنه سقط فيه"عن عائشة" كما في رواية سفيان عند مسلم.

وحديث حمّاد بن سلمة رواه أحمد (27005) عن يونس بن محمد، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، فذكره.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাহলা বিনতে সুহায়ল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! সালিম—যে তার (আবূ হুযাইফার) মওলা—তার (ঘরে) প্রবেশ করার কারণে আমি আবূ হুযাইফার চেহারায় (অসন্তুষ্টির ছাপ) দেখতে পাচ্ছি।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে দুধ পান করাও।" সাহলা বললেন: 'সে তো একজন প্রাপ্তবয়স্ক পুরুষ, আমি তাকে কীভাবে দুধ পান করাবো?!' রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন এবং বললেন: "আমি তো জানি যে সে একজন প্রাপ্তবয়স্ক পুরুষ।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তুমি তাকে দুধ পান করাও, তাহলে সে তোমার জন্য হারাম হয়ে যাবে এবং আবূ হুযাইফার মনের সন্দেহ দূর হয়ে যাবে।" অতঃপর সে (সাহলা) ফিরে এসে বলল: আমি তাকে দুধ পান করিয়েছি, ফলে আবূ হুযাইফার মনের সন্দেহ দূর হয়ে গেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6546)


6546 - عن عائشة قالت: جاءت سهلة بنت سهيل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسولَ الله! إن سالمًا يُدعى لأبي حذيفة، ويأوي معه، ويدخل عليّ فيراني فُضُلًا. ونحن في منزل ضيِّق. وقال الله تعالى: {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ} [الأحزاب: 5] فقال:"أرْضِعيه تحرُمي عليه".

صحيح: رواه عبد الرزّاق (13885) عن معمر، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

قال الزهري:"قالت بعض أزواج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: لا ندري لعل هذه كانت رخصة لسالم خاصة.

وقال الزهري:"وكانت عائشةُ تُفتي بأنه يُحرّم الرضاع بعد الفصال حتَّى ماتت".

وقولها:"فُضُل" أي مبتذلة وهي المرأة إذا لبستْ ثيابَ مهنتِها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সুহাইল-কন্যা সাহলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! সালিমকে আবূ হুযাইফার সন্তান বলে ডাকা হয়। সে তার সাথে বসবাস করে এবং সে আমার নিকট প্রবেশ করে যখন সে আমাকে অপ্রস্তুত (সাধারণ পোশাকে) অবস্থায় দেখে। আর আমরা একটি সংকীর্ণ ঘরে থাকি। আর আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "তোমরা তাদেরকে তাদের পিতাদের নামে ডাকো; আল্লাহর নিকট এটাই অধিক ন্যায়সঙ্গত।" [সূরা আহযাব: ৫] তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে দুধ পান করাও, তাহলে তুমি তার উপর হারাম হয়ে যাবে।"

যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় স্ত্রী বলেছেন: আমরা জানি না, হয়তো এটি সালিমের জন্য একটি বিশেষ ছাড় ছিল।

আর যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমৃত্যু এই ফাতওয়া দিতেন যে, দুধ ছাড়ানোর পরেও (প্রাপ্তবয়স্কের) দুধ পান করানো (বিবাহের জন্য) হারাম করে দেয়।

আর সাহলার উক্তি 'ফুদূল' (فُضُل) অর্থ হলো: সাধারণ পরিধেয় (অপ্রস্তুত), অর্থাৎ যখন কোনো নারী তার নিত্যদিনের বা কাজের কাপড় পরিধান করে।









আল-জামি` আল-কামিল (6547)


6547 - عن زينب بنت أم سلمة قالت: قالت أم سلمة لعائشة: إنه يدخل عليك الغلام الأيفعُ الذي ما أحب أن يدخل عليّ. قال: فقالت عائشة: أما لك في رسول الله صلى الله عليه وسلم أسوة؟ قالت: إن امرأة أبي حذيفة قالت: يا رسول الله! إن سالمًا يدخل عليّ وهو رجل، وفي نفس أبي حذيفة منه شيء. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أرْضِعيه حتَّى يدخلَ عليكِ".

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (29: 1453) عن محمد بن المثنى، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن حميد بن نافع، عن زينب بنت أم سلمة، قالت: فذكرته.




যয়নব বিনত উম্মে সালামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: এমন যুবক (আইফা’ - যিনি বয়ঃপ্রাপ্তির কাছাকাছি) তোমার নিকট প্রবেশ করে, যার প্রবেশ করা আমার নিকট পছন্দ নয়। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে কি তোমার জন্য আদর্শ নেই? তিনি বললেন: আবূ হুযায়ফার স্ত্রী বলেছিলেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! সালিম আমার নিকট প্রবেশ করে, আর সে একজন প্রাপ্তবয়স্ক পুরুষ। আবূ হুযায়ফার মনে এ নিয়ে কিছু অস্বস্তি আছে। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে স্তন্যদান করো, যাতে সে তোমার নিকট প্রবেশ করতে পারে (মাহরামের মতো)।"