আল-জামি` আল-কামিল
6701 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رجلا قتل عبده متعمدًا، فجلده النبي صلى الله عليه وسلم مائة جلدة، ونفاه سنة، ومحا سهمه من المسلمين، ولم يقده به، وأمره أن يعتق رقبة.
حسن: رواه الدارقطني (3/ 143 - 144) وعنه البيهقي (8/ 36) والطحاوي في شرحه (3/ 137 - 138) كلهم من حديث محمد بن عبد العزيز الرملي، نا إسماعيل بن عياش، عن الأوزاعي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسماعيل بن عياش ضعيف ولكن رواه عن الأوزاعي، وروايته عن الشاميين قوية.
وفي الإسناد محمد بن عبد العزيز الرملي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، بل وقد تابعه ابن الطباع قال: حدثنا إسماعيل بن عياش عن إسحاق بن عبد الله بن أبي فروة، عن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، عن علي بن أبي طالب وعمرو بن شعيب فذكراه مثله.
رواه ابن ماجه (2664) عن محمد بن يحيى، قال حدثنا ابن الطباع بإسناده. وابن الطباع هو
إسحاق بن عيسى إلا أن هذا الإسناد ضعيف جدًّا.
وإسحاق بن أبي فروة متروك، ومن طريقه رواه ابن أبي شيبة (9/ 304) والدارقطني (3/ 144) والبيهقي (8/ 36) وإسماعيل بن عياش ضعيف في روايته عن غير أهل بلده الشام. وهذا منها.
ثم إبراهيم بن عبد الله بن حنين لم يسمع من علي بن أبي طالب فالعمدة فيه هو الإسناد الأول.
ثم قال البيهقي:"أسانيد هذه الأحاديث ضعيفة لا تقوم بشيء منها الحجة، إلا أن أكثر أهل العلم على أن لا يُقتل الرجل بعبده". انتهى.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার ক্রীতদাসকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে একশত বেত্রাঘাত করলেন, তাকে এক বছরের জন্য নির্বাসিত করলেন, মুসলমানদের (অধিকার থেকে) তার অংশ মুছে দিলেন, কিন্তু ক্রীতদাসের বদলে তাকে হত্যা করলেন না (কেসাস নিলেন না), এবং তাকে একটি দাস মুক্ত করার নির্দেশ দিলেন।
6702 - عن عبد الله بن عمرو قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم صارخًا. فقال له سول الله صلى الله عليه وسلم:"ما لك؟" قال: سيدي رآني أقبّل جارية له، فجب مذاكيري، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"علي بالرجل" فطلب، فلم يقدر عليه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اذهب فأنت حر" قال: على من نُصرتي يا رسول الله؟ قال: يقول: أرأيت إن استرقني مولاي؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"على كل مؤمن أو مسلم".
حسن: رواه أبو داود (4519) وابن ماجه (2680) وأحمد (6710) والبيهقي (8/ 36) وعبد الرزاق (17932) كلهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره وإسناده حسن من أجله.
قال أبو داود:"الذي عُتق كان اسمه روح بن دينار".
قال أبو داود:"الذي جبّه زنباع".
قال أبو داود:"هذا زنباع أبو روح كان مولى العبد".
وفي أحمد: أن زنباعًا أبا روح وجد غلامًا له مع جارية له، فجدع أنفه وجبّه. فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"من فعل هذا بك؟" قال: زنباع. فدعاء النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ما حملك على هذا؟" فقال: كان من أمره كذا وكذا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم للعبد:"اذهب فأنت حر" فقال: يا رسول الله، فمولى من أنا؟ قال:"مولى الله ورسوله" فأوصى به رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلمين، قال: فلما قُبض رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء إلى أبي بكر، فقال: وصية رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، نجري عليك النفقة وعلى عيالك. فأجراها عليه، حتى قُبض أبو بكر، فلما استخلف عمر جاءه، فقال: وصية رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، أين تريد؟ قال: مصر، فكتب عمر إلى صاحب مصر أن يعطيه أرضًا يأكلها. فلعله في بداية الأمر لم يقدر سيده، ثم قدر عليه وأنه صلى الله عليه وسلم لم يقده.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি চিৎকার করতে করতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তোমার কী হয়েছে?" সে বললো: আমার মনিব তার এক দাসীর সাথে আমাকে চুম্বন করতে দেখে আমার পুরুষাঙ্গ কেটে ফেলেছে। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "লোকটিকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" এরপর তাকে খোঁজা হলো, কিন্তু পাওয়া গেল না। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যাও, তুমি মুক্ত (স্বাধীন)।" সে বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার উপর কার সাহায্য থাকবে? সে জিজ্ঞেস করলো: আপনি কি মনে করেন যদি আমার মনিব আমাকে আবার দাস বানিয়ে নেয়? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "প্রত্যেক মুমিন বা মুসলিমের উপর।"
আহমদ-এর বর্ণনায় রয়েছে যে, যিনবা’ আবু রুহ তার এক দাসকে তার এক দাসীর সাথে পেয়ে তার নাক কেটে দিলো এবং তার পুরুষাঙ্গ কর্তন করলো। সে তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলো এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে তোমার সাথে এমন করলো?" সে বললো: যিনবা’। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (যিনবা’কে) ডাকালেন এবং বললেন: "কিসে তোমাকে এমন করতে প্ররোচিত করলো?" সে বললো: তার ঘটনা এই এই ছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাসটিকে বললেন: "যাও, তুমি মুক্ত (স্বাধীন)।" সে বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আমি কার মুক্ত দাস? তিনি বললেন: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের মুক্ত দাস।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (সাহায্য করার জন্য) মুসলিমদের প্রতি অসিয়ত করলেন। সে বললো: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইন্তেকাল করলেন, তখন সে আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে এলো এবং বললো: এটা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অসিয়ত। তিনি (আবূ বকর) বললেন: হ্যাঁ, আমরা তোমার এবং তোমার পরিবারের জন্য ভরণপোষণ চালু রাখবো। তিনি তা চালু রাখলেন, যতক্ষণ না তিনি ইন্তেকাল করলেন। যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, তখন সে তার কাছে এলো এবং বললো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অসিয়ত। তিনি (উমর) বললেন: হ্যাঁ, তুমি কোথায় যেতে চাও? সে বললো: মিশর। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিশরের প্রশাসকের কাছে লিখে দিলেন যেন তাকে এমন জমি দেওয়া হয় যা থেকে সে জীবন নির্বাহ করতে পারে।
6703 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: نحلت الرجل من بني مدلج جارية، فأصاب منها ابنا، فكان يستخدمها، فلما شب الغلام دعاها يومًا فقال: اصنعي كذا وكذا. فقال: لا تأتيك، حتى متى تستأمي أمي؟ قال:
فغضب فحذفه بسيفه. فأصاب رجله. فنزف الغلام فمات. فأنطلق في رهط من قومه إلى عمر. فقال: يا عدو نفسه، أنت الذي قتلت ابنك، لولا أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقاد الأب من ابنه" لقتلتك. هلم ديته. قال: فأتاه بعشرين أو ثلاثين ومائة بعير. قال: فخيّر منها مائة فدفعها إلى ورثته، وترك أباه.
حسن: رواه البيهقي (8/ 38) وابن الجارود (788) والدارقطني (3/ 140) كلهم من حديث محمد بن مسلم بن وارة، نا محمد بن سعيد بن سابق، نا عمرو بن أبي قيس، عن منصور، عن محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده واللفظ للبيهقي وابن الجارود.
وأما الدارقطني فاختصره على قوله:"لا يقاد الأب من ابنه" وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وقال البيهقي في"المعرفة" (12/ 40) وإسناده صحيح.
قلت: محمد بن عجلان صدوق، وتابعه الحجاج بن أرطاة في قوله:"لا يقتل والد بولده".
رواه الترمذي (1400) وابن ماجه (2662) وأحمد (346) وأبو عاصم في الديات (134) والدارقطني والبيهقي وغيرهم، كلهم من طريق الحجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قتل رجل ابنه عمدًا. فرفع إلى عمر بن الخطاب فجعل عليه مئة من الإبل إلى أن قال: ولولا أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقتل والد بولده" لقتلتك.
والحجاج بن أرطاة مدلس وهو ضعيف، ولكن تابعه أيضا ابن لهيعة فقال: حدثنا عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقاد والد من ولد" وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يرث المال من يرث الولاء".
رواه الإمام أحمد (147) عن أبي سعيد، حدثنا عبد الله بن لهيعة بإسناده وقيل: إن ابن لهيعة لم يسمع من عمرو بن شعيب، فهذه الرواية ترده لأن فيها التصريح بالتحديث.
والخلاصة في حديث عمرو بن شعيب أنه حسن من أجله، وقد صححه البيهقي كما مضى.
ولحديث عمرو بن شعيب أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته أصحها.
وأما ما رُوي عن سراقة بن مالك قال: حضرت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُقيد الأب من ابنه، ولا يُقيد الابن من أبيه. فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1399) عن علي بن حُجر، ثنا إسماعيل بن عياش، حدثنا المثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن سراقة بن مالك فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه من حديث سراقة إلا من هذا الوجه، وليس إسناده بصحيح، رواه إسماعيل بن عياش، عن المثنى بن الصباح، والمثني بن الصباح يُضَعَّف في الحديث".
قلت: وإسماعيل بن عياش ضعيف في غير الشاميين. وهذا منه، فإن المثنى بن الصباح ليس بشامي.
ثم قال الترمذي:"وقد روى هذا الحديث أبو خالد الأحمر، عن الحجاج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقد روي هذا الحديث عن عمرو بن شعيب مرسلًا وهذا حديث فيه اضطراب. ثم ساق رواية الحجاج بن أرطاة كما مر.
وكذلك ما رُوي عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُقام الحدود في المساجد، ولا يُقتل الوالد بالولد" وهو ضعيف أيضًا.
رواه الترمذي (1401) وابن ماجه (2661) والدارمي (2402) من حديث إسماعيل بن مسلم المكي، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه بهذا الإسناد مرفوعًا إلا من حديث إسماعيل بن مسلم، وإسماعيل بن مسلم المكي تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه".
ومن هذا الوجه رواه أيضا الدارقطني (3/ 141) والبيهقي (8/ 39) وأعله بإسماعيل بن مسلم المكي. إلا أنه توبع بمتابعات ضعيفة منها: سعيد بن بشير، عن عمرو بن دينار بإسناده مثله.
رواه الحاكم (4/ 369) وسكت هو والذهبي. مع أن سعيد بن بشير وهو الأزدي ضعيف عند جمهور أهل العلم، تكلم فيه البخاري وابن معين وأبو داود والنسائي وغيرهم إلا ابن عدي فإنه كان لا يرى بأسًا بروايته، وقول الجمهور أولى.
وله متابعات أخرى لا يفرح بها، والخلاصة فيه حديث ابن عباس لا يصح.
وأما قول عبد الحق في أحكامه (4/ 70) وابن القطان في الوهم والإيهام (3/ 565): هذه الأحاديث كلها معلولة، لا يصح منها شيء ففيه نظر لما سبق.
فإن حديث عمر بن الخطاب حسن في أقل أحواله، وقد قال البيهقي: صحيح. وصحّحه أيضا ابن عبد البر في التمهيد (23/ 437) وقال:"هو حديث مشهور عند أهل العلم بالحجاز والعراق، مستفيض عندهم، يتغنى بشهرته وقبوله والعمل به عن الإسناد فيه حتى يكاد أن يكون الإسناد في مثله لشهرته تكلفا". كذا قال مع أن وجود الإسناد أساس لصحة الحديث وضعفه.
فقه الحديث: قال الشافعي: وقد حفظت عن عدد من أهل العلم لقيتهم أن لا يقتل الوالد بالولد، وبذلك أقول. ذكره البيهقي (8/ 38).
وقال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم أن الأب إذا قتل ابنه لا يُقتل به، وإذا قذف ابنه لا يحد". قلتُ: وبه قال الحنفية والحنابلة.
عبد الله بن عبد الله الأموي، عن ابن جريج وعثمان بن الأسود ويعقوب بن عطاء، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وعبد الله بن عبد الله الأموي مجهول، ويعقوب بن عطاء ضعيف ضعّفه أحمد وابن معين وغيرهما. قال ابن الهادي في"التنقيح" (4/ 490):"قال بعضهم هو من مناكير يعقوب".
وأخرج الطحاوي في شرح المعاني (3/ 184): ثنا روح بن الفرج، ثنا مهدي بن جعفر، ثنا عبد الله بن المبارك، عن عنبسة بن سعيد، عن الشعبي، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يستقاد من الجرح حتى يبرأ".
سئل أبو زرعة عن حديث رواه ابن المبارك. فقال:"هو مرسل مقلوب" العلل (1/ 456) يعني المحفوظ من الشعبي مرسلًا.
وقال البيهقي في"المعرفة" (12/ 85):"وقد روي من أوجه كلها ضعيف عن أبي الزبير، عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُمتثل من الجارح حتى يبرأ المجروح".
وروي أيضا عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في رجل طعن رجلًا بقرن في رجله فقال: يا رسول الله، أقدني. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تعجل حتى يبرأ جرحك" قال: فأبى الرجل إلا أن يستقيد. فأقاده رسول الله صلى الله عليه وسلم منه، قال: فخرج المستقيد، وبرأ المستقاد منه، فأتي المستقيد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له: يا رسول الله، عرجتُ، وبرأ صاحبي. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم آمرك أن لا تستقيد حتى يبرأ جرحك، فعصيتني فأبعدك الله، وبطل جرحك" ثم أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد الرجل الذي عرج:"من كان به جرح أن لا يستقيد حتى تبرأ جراحته، فإذا برئت جراحته استقاد".
رواه الإمام أحمد (7034) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق قال: عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.
هكذا رواه محمد بن إسحاق عن عمرو بن شعيب مرفوعا. وهو مدلس، وليس فيه صيغة الأداء فالظاهر أنه لم يسمع منه.
وتابعه ابن جريج عن عمرو بن شعيب. ومن طريقه رواه الدارقطني (3/ 90)، وفي طريقه إليه مسلم بن خالد وهو الزنجي ضعيف.
وخالفهما أيوب فرواه عن عمرو بن شعيب مرسلًا. وهو عند الدارقطني أيضا كما رواه أيضا أيوب، عن عمرو بن دينار، عن محمد بن طلحة، عن النبي صلى الله عليه وسلم رواه أيضا الدارقطني وكذلك رواه أيضا ابن جريج، عن عمرو بن دينار، وكذلك رواه حماد بن زيد عن عمرو بن دينار. وروي من وجه آخر عن جابر كما قال البيهقي (8/ 67).
وقال ابن أبي حاتم:"سألت أبا زرعة عن حديث اختلف في الرواية عن عمرو بن دينار: أيوب
السختياني وحماد بن سلمة فروى ابن علية، عن أيوب، عن عمرو بن دينار، عن جابر أن رجلا طعن رجلا بقرن في ركبته، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم يستقيد، فقيل له: حتى يبرأ. فعجل، فاستقاد … فذكر الحديث.
وقال: ورواه حماد بن سلمة، عن عمرو بن دينار، عن محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة أن رجلا طعن رجلا فذكر الحديث.
قال أبو زرعة:"حديث حماد بن سلمة أشبه"."العلل" (1/ 463).
قلت: حديث ابن علية أخرجه ابن أبي شيبة (9/ 369) والدارقطني (3/ 89) وقال الدارقطني: قال أبو أحمد بن عبدوس: ما جاء بهذا إلا أبو بكر وعثمان. قال الشيخ: أخطأ فيه ابنا أبي شيبة. وخالفهما أحمد بن حنبل وغيره، عن ابن علية، عن أيوب، عن عمرو مرسلًا. وكذلك قال أصحاب عمرو بن دينار عنه، وهو المحفوظ مرسلًا". انتهى.
ونقل الزيلعي في نصب الراية (4/ 376 - 377) عن التنقيح:"ظاهر هذا الحديث الانقطاع".
يستفاد من أحاديث الباب مع ضعفها وإنْ كان يعضد بعضه بعضا، أنه لا يجوز الاقتصاص من الجرح حتى يستقر أمره، إما باندمال أو غيره وهو مذهب جمهور أهل العلم. وأجاز الشافعي إذا رضي به المجروح وطلبه على إسقاط ما يؤول إليه جرحه من الموت أو العيب.
انظر للمزيد"المنة الكبرى" (7/ 68).
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وهذا وهمٌ منه فإن أبا فراس وهو النهدي، وقيل: اسمه الربيع بن زياد لم يخرج له مسلم، وهو من رجال أبي داود والنسائي، ثم هو ممن انفرد بالرواية عنه أبو نضرة، ولم يوثقه أحد غير ابن حبان. فهو"مجهول"، وقال أبو زرعة: لا أعرفه.
وأما الجزء الأول من الخطبة فهو صحيح. رواه البخاري (2641) عن الحكم بن نافع، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: حدثني حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أنا عبد الله بن عتبة، قال: سمعت عمر بن الخطاب يقول:"إن أناسا كانوا يؤخذون بالوحي في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن الوحي قد انقطع، وإنما تأخذكم الآن بما ظهر لنا من أعمالكم، فمن أظهر لنا خيرا أمِنّاه وقرّبناه، وليس إلينا من سريرته شيء، اللهُ يحاسبه في سريرته، ومن أظهر لنا سوءا لم نأمنه ولم نصدقه وإن قال: إن سريرته حسنة.
আবদুল্লাহ ইবন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বানু মুদলিজের এক ব্যক্তিকে একটি দাসী প্রদান করেছিলাম। সে তার মাধ্যমে একটি পুত্র সন্তান লাভ করে। ছেলেটি তাকে (দাসীটিকে) ব্যবহার করত (সেবা নিত)। যখন ছেলেটি বড় হলো, একদিন সে তাকে ডাকল এবং বলল, ‘এটা কর এবং ওটা কর।’ সে (দাসী) বলল, ‘আমি তোমার কাছে আসব না। কতকাল তুমি আমার মাকে এভাবে জোর খাটাতে থাকবে?’ বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোকটি (পিতা) রাগান্বিত হয়ে তাকে তার তরবারি দ্বারা আঘাত করল। আঘাতটি তার পায়ে লাগে। ছেলেটির রক্তক্ষরণ হতে থাকে এবং সে মারা যায়। লোকটি তার গোত্রের কিছু লোককে নিয়ে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘হে নিজের আত্মার শত্রু! তুমিই তোমার ছেলেকে হত্যা করেছ! যদি আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে না শুনতাম যে, "ছেলের হত্যার জন্য পিতাকে কিসাস করা হবে না," তাহলে আমি তোমাকে হত্যা করতাম। রক্তমূল্য (দিয়াহ) নিয়ে এসো।’ তিনি (লোকটি) একশ বিশ অথবা একশ ত্রিশটি উট আনলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেগুলোর মধ্য থেকে একশটি বেছে নিলেন এবং তা তার ওয়ারিশদের নিকট অর্পণ করলেন, আর পিতাকে (সেখান থেকে বঞ্চিত) রাখলেন।
6704 - عن * *
৬৭০৪ - থেকে * *
6705 - عن ابن عباس يقول: كان في بني إسرائيل القصاص، ولم تكن فيهم الدية. فقال الله تعالى لهذه الأمة: {كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ فِي الْقَتْلَى الْحُرُّ بِالْحُرِّ وَالْعَبْدُ بِالْعَبْدِ وَالْأُنْثَى بِالْأُنْثَى فَمَنْ عُفِيَ لَهُ مِنْ أَخِيهِ شَيْءٌ} [البقرة: 178] فالعفو أن يقبل الدية في العمد. {فَاتِّبَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ وَأَدَاءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَانٍ} [البقرة: 178] يتبع المعروف ويؤدي بإحسان {ذَلِكَ تَخْفِيفٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ} [البقرة: 178] مما كتب على من كان قبلكم {فَمَنِ اعْتَدَى بَعْدَ ذَلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ} [البقرة: 178] أي قتل بعد قبول الدية.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4498) عن الحميدي، حدثنا سفيان، حدثنا عمرو قال: سمعت مجاهدًا قال: سمعت ابن عباس يقول: فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনী ইসরাঈলের মধ্যে কিসাস (মৃত্যুদণ্ড) ছিল, কিন্তু তাদের মধ্যে দিয়াত (রক্তমূল্য) ছিল না। অতঃপর আল্লাহ তাআলা এই উম্মতের (মুসলমানদের) জন্য বললেন: {তোমাদের উপর নিহতদের ব্যাপারে কিসাসের বিধান দেওয়া হলো: স্বাধীন ব্যক্তির বদলে স্বাধীন, দাসের বদলে দাস এবং নারীর বদলে নারী। অতঃপর তার ভাইয়ের পক্ষ থেকে যদি তাকে (হত্যার অপরাধীকে) কিছু মাফ করে দেওয়া হয়...} [সূরা বাকারা: ১৭৮] তখন (এই আয়াতে) ‘মাফ করে দেওয়া’ মানে হলো ইচ্ছাকৃত (হত্যা)-এর ক্ষেত্রে দিয়াত (রক্তমূল্য) গ্রহণ করা। {তখন যথাযথ নিয়মে তার অনুসরণ করা এবং সুন্দরভাবে তার (দিয়াত) পরিশোধ করা কর্তব্য।} [সূরা বাকারা: ১৭৮] সে যেন যথাযথ নিয়মের অনুসরণ করে এবং সুন্দরভাবে (দিয়াত) পরিশোধ করে। {এটা তোমাদের রবের পক্ষ থেকে লঘু বিধান ও দয়া।} [সূরা বাকারা: ১৭৮] যা তোমাদের পূর্ববর্তীদের উপর যা লেখা হয়েছিল, তার তুলনায় (লঘু বিধান)। {অতঃপর এরপর যে সীমালঙ্ঘন করবে, তার জন্য রয়েছে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি।} [সূরা বাকারা: ১৭৮] অর্থাৎ দিয়াত (রক্তমূল্য) গ্রহণ করার পরেও (যদি সে হত্যাকারীকে) হত্যা করে।
6706 - عن أبي جحيفة قال: سألت عليًّا رضي الله عنه: هل عندكم شيء ما ليس في القرآن. وقال مرة: ما ليس عند الناس؟ فقال: والذي فلق الحبة وبرأ النسمة ما عندنا إلا ما في القرآن إلا فهمًا يعطى رجل في كتابه وما في الصحيفة. قلت: وما في الصحيفة؟ قال: العقل، وفكاك الأسير، وأن لا يقتل مسلم بكافر.
صحيح: رواه البخاري في الديات (6903) عن صدقة بن الفضل، أخبرنا ابن عيينة، حدّثنا مطرّف، قال: سمعت الشعبي قال: سمعت أبا جحيفة فذكره.
قوله:"العقل": أي الدية. وسميت الدية عقلًا تسميةً بالمصدر.
لأن الإبل كانت تعقل بفناء ولي القتيل، ثم كثر الاستعمال حتى أطلق العقل على الدية ولو لم تكن إبلًا. فتح الباري (1
আবু জুহায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনাদের কাছে কি এমন কিছু আছে যা কুরআনে নেই? তিনি একবার বললেন: এমন কিছু যা সাধারণ মানুষের কাছে নেই? তিনি (আলী) বললেন: সেই সত্তার শপথ, যিনি শস্যদানা বিদীর্ণ করেছেন এবং প্রাণ সৃষ্টি করেছেন! আমাদের কাছে কুরআনে যা আছে তা ছাড়া অন্য কিছু নেই, তবে (আমাদের কাছে) সেই বোধগম্যতা আছে যা কোনো ব্যক্তিকে আল্লাহ্র কিতাব (কুরআনের জ্ঞান) থেকে দান করা হয় এবং আছে এই সহীফায় যা আছে। আমি বললাম: সহীফায় কী আছে? তিনি বললেন: দিয়াত (রক্তপণ), বন্দীর মুক্তি এবং কোনো মুসলমানকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না।
6707 - عن أبي هريرة قال: لما فتح الله على رسوله مكة قام في الناس، فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: ...."ومن قتل له قتيل فهو بخير النظرين: إما أن يُفدى وإما أن يُقيد".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2434)، ومسلم في الحج (1355) كلاهما من حديث الوليد
ابن مسلم، حَدَّثَنَا الأوزاعي، حَدَّثَنِي يحيى بن أبي كثير، حَدَّثَنِي أبو سلمة، حَدَّثَنِي أبو هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আল্লাহ তাঁর রাসূলের জন্য মক্কা বিজয় দান করলেন, তখন তিনি লোকদের মাঝে দাঁড়ালেন। অতঃপর তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি বর্ণনা করলেন এবং বললেন: ...‘আর যার কোনো নিহত হয়েছে, সে দুটি বিষয়ের মধ্যে উত্তমটি গ্রহণ করবে: হয় ক্ষতিপূরণ (দিয়ত) গ্রহণ করবে, নতুবা প্রতিশোধ (কিসাস) গ্রহণ করবে।’
6708 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قتل عمدًا دفع إلى أولياء القتيل، فإن شاؤوا قتلوا، وإن شاؤوا أخذوا الدية. وذلك ثلاثون حقة، وثلاثون جذعة، وأربعون خلفة. وذلك عقل العمد، وما صولحوا فهو لهم، وذلك تشديد العقل".
حسن: رواه الترمذيّ (1387) وابن ماجة (2626) وأبو داود (4506) مختصرًا كلّهم من حديث محمد بن راشد، قال: أخبرنا سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
قال الترمذيّ:"حسن غريب".
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে (কাউকে) হত্যা করে, তাকে নিহত ব্যক্তির অভিভাবকদের কাছে সোপর্দ করা হবে। অতঃপর তারা চাইলে (কিসাস স্বরূপ) তাকে হত্যা করতে পারে, অথবা তারা চাইলে দিয়াত (রক্তমূল্য) গ্রহণ করতে পারে। আর তা (দিয়াত হলো) ত্রিশটি হিক্কাহ, ত্রিশটি জাযআহ এবং চল্লিশটি গর্ভবতী উটনী। এটাই হলো ইচ্ছাকৃত হত্যার দিয়াত। আর (অতিরিক্ত) যা কিছু নিয়ে তারা আপোসে রাজি হবে, সেটাও তাদের জন্য। আর এটাই হলো দিয়াতের কঠোরতা (বৃদ্ধি)।"
6709 - عن أبي شريح الكعبي يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا إنكم معشر خُزاعة قتلتم هذا القتيل من هُذيل، وإني عاقله. فمن قتل له بعد مقالتي هذه قتيل فأهله بين خيرين: أن يأخذوا العقل، أو يقتلوه".
صحيح: رواه أبو داود (4504) والتِّرمذيّ (1439) وأحمد (27160) والدارقطني (3/ 95 - 96) كلّهم من حديث يحيى بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب قال: حَدَّثَنَا سعيد المقبريّ، قال: سمعت أبا شريح الكعبي فذكره. وإسناده صحيح.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".
ولأبي شريح الكعبي حديث آخر في الصحيحين في تحريم سفك الدماء في سياق طويل في فضائل مكة.
আবূ শুরাইহ আল-কা'বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শোনো! হে খুযাআ গোত্রের লোকেরা, তোমরা হুযাইল গোত্রের এই লোকটিকে হত্যা করেছ। আর আমি তার রক্তপণ (দিয়াত) প্রদান করব। সুতরাং আমার এই কথার পর যদি কারো কোনো আত্মীয়কে হত্যা করা হয়, তবে তার অভিভাবকগণ দুটি বিষয়ের মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নিতে পারবে: হয় তারা রক্তপণ গ্রহণ করবে, অথবা তাকে (ঘাতককে) হত্যা করবে।"
6710 - عن أبي شُريح الخزاعي قال: لما بعث عمرو بن سعيد إلى مكة، بعثه يغزو ابن الزُّبير، أتاه أبو شريح فكلمه، وأخبره بما سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم فمما قال:"يا معشر خزاعة، ارفعوا أيديكم عن القتل، فقد كثر أن يقع، لئن قتلتم قتيلًا لأدينّه. فمن قتل بعد مقامي هذا فأهله بخير النظرين: إن شاؤوا فدم قاتله، وإن شاؤوا فعقله".
حسن: رواه أحمد (16377) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبيّ، عن محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي شريح الخزاعي فذكره في خطبة يوم الفتح الطويلة.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.
وهذا الحديث روي أيضًا بإسناد آخر، وبلفظ آخر عن محمد بن إسحاق، عن الحارث بن فُضيل، عن سفيان بن أبي العوجاء، عن أبي شريح الخزاعي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أصيب بدم أو خَبْل فهو بالخيار بين إحدى ثلاث، فإن أراد الرابعة، فخذوا على يديه: أن يقتل، أو يعفو،
أو يأخذ الدية. فمن فعل شيئًا من ذلك فعاد، فإن له نار جهنّم خالدًا مخلدًا فيها أبدًا".
رواه أبو داود (4496) وابن ماجة (2623) وأحمد (16375) والدارقطني (3/ 96) كلّهم من هذا الوجه. وسفيان بن أبي العوجاء ضعيف عند جمهور العلماء. وعد الذّهبيّ في"الميزان" (2/ 169 - 170) هذا الحديث من مناكيره. وفيه محمد بن إسحاق مدلِّس، وقد عنعن.
আবু শুরাইহ আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমর ইবনু সাঈদকে মক্কায় পাঠানো হলো—তিনি তাঁকে ইবনুয যুবাইরকে আক্রমণ করার জন্য পাঠিয়েছিলেন—তখন আবু শুরাইহ তাঁর কাছে এসে তাঁর সাথে কথা বললেন এবং তাঁকে অবহিত করলেন যা তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে শুনেছেন। তিনি যা বলেছিলেন তার মধ্যে এও ছিল: "হে খুযাআ গোত্রের লোকেরা, তোমরা হত্যা করা থেকে তোমাদের হাত গুটিয়ে নাও, কারণ তা অনেক বেশি ঘটছে। যদি তোমরা কোনো ব্যক্তিকে হত্যা করো, তবে আমি অবশ্যই তার দিয়াত পরিশোধ করব। সুতরাং আমার এই অবস্থানের (বা ঘোষণার) পরে যে কাউকে হত্যা করবে, তার (নিহতের) পরিবার দু'টি পছন্দের মধ্যে উত্তমটির অধিকারী হবে: তারা যদি চায়, তবে হত্যাকারীর রক্ত (কিসাস), আর যদি চায় তবে তার দিয়াত (রক্তমূল্য)।"
6711 - عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل في عميّة، أو عصبية بحجر أو سوط أو عصا، فعليه عقل الخطأ، ومن قتل عمدًا فهو قود، ومن حال بينه وبينه، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يُقبل منه صرف، ولا عدْل".
وفي رواية:"من قتل عمدًا فقود يده".
حسن: رُوي موصولًا ومرسلا.
فأما الموصول فرواه أبو داود (4540) والنسائي (4789)، وابن ماجة (2635) والطحاوي في مشكله (4900) والدارقطني (3/ 94)، والبيهقي (7/ 25، 53) كلّهم من طريق سليمان بن كثير، عن عمرو بن دينار عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
وقال ابن الملقن في الدر المنير (8/ 409):"رواية ابن ماجة على شرط الشّيخين". وقال في التنقيح (4/ 481):"وإسناده جيد، لكن رُوي مرسلًا".
وقال الحافظ ابن حجر في بلوغ المرام (1001) إسناده قويّ، وسكت في تعليقه على المشكاة (3408) فيكون حسنا كما صرَّح به في المقدمة: ما سكت عليه فهو حسن.
قلت: ظاهر إسناده حسن فإن سلمان بن كثير مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في غير الزّهريّ، وهذا ليس من حديث الزهري. وتابعه الحسن بن عمارة وإسماعيل بن مسلم كما قال البيهقيّ، ومن طريقهما رواه الدَّارقطنيّ في سننه (3/ 93 - 94).
وأمّا المرسل: فرواه أبو داود (4539) من وجهين من حديث حمّاد وسفيان كلاهما عن عمرو، عن طاوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث نحوه.
وأشار إليه البيهقيّ بقوله: رواه حمّاد بن زيد في آخرين عن عمرو، عن طاوس مرسلًا. وقد صحَّ الدَّارقطنيّ في العلل (11/ 35 - 36) الإرسال.
ومما لا شك فيه أن سفيان أقوى وأثبت من سليمان بن كثير ولكن قال الطحاويّ:"إنَّ سفيان قد كان يحدث به هكذا بآخره، وقد كان يحدث به قبل ذلك كما حدّث به سليمان بن كثير، ولو اختلفا لكان سليمان مقبول الرواية، ثبتا فيها ممن لو روى حديثًا فتفرد به لكان مقبولًا منه، وإذا كان كذلك كان فيما زاده على غيره في حديث مقبولة زيادتُه فيه عليه". انتهى.
قلت: علاوة على ذلك فإن سليمان بن كثير لم ينفرد بوصلة كما سبق.
وأمّا معنى الحديث في قوله:"من قتل عمدًا فهو قود". أي أن الواجب هو القود، ولكن إذا
تنازل أولياء المقتول عن القود فلهم ذلك إما العفو وإما الدية، فلا تعارض بين القود وقبول الدية. وقوله:"لا يقبل منه صرف" أي توبة.
وقوله:"ولا عدل" أي فدية.
وفي الباب ما رُوي عن زيد بن ضُميرة قال: حَدَّثَنِي أبي وعمي، وكانا شهدا حنينًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالا: صلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم الظهر، ثمّ جلس تحت شجرة، فقام إليه الأقرع بن حابس، وهو سيد خِنْدِف، يردُ عن دم محلم بن جثّامة، وقام عيينة بن حصن يطلب بدم عامر بن الأضبط، وكان أشجعيا، فقال لهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"تقبلون الدية؟" فأبوا، فقام رجل من بني ليث، يقال مُكَيِتل، فقال: يا رسول الله! والله! ما شبّهت هذا القتيل، في غرة الإسلام، إِلَّا كغنم وردت، فرميت فنفر آخرها، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: لكم خمسون في سفرنا، وخمسون إذا رجعنا" فقبلوا الدية.
رواه ابن ماجة (2625) واللّفظ له، وأبو داود (4503) وابن الجارود (777) وعبد الله بن أحمد في مسند أبيه (21081) والبيهقي (9/ 116) كلّهم من حديث محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي محمد بن جعفر، عن زيد بن ضُميرة فذكروه مطوَّلًا وقال فيهم: إن أباه وجَدَّه شهدا حنينًا.
زيد بن ضُميرة ويقال: زياد بن سعد بن ضُميرة، ويقال: زياد بن ضُميرة بن سعد لم يرو عنه غير محمد بن جعفر، ولم يوثقه غير ابن حبَّان ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة. ولم أقف على ذلك. وقد اختلف في إسناده أيضًا. فرواه أبو داود عن وهب بن بيان وأحمد بن سعيد الهمدانيّ، قالا: حَدَّثَنَا ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن أبي الزّناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن محمد بن جعفر أنه سمع زياد بن سعد بن ضُميرة السلمي يُحدث عروة بن الزُّبير، عن أبيه. ولم يذكر فيه"وعن جده" ومن طريقه رواه البيهقيّ.
فمرة يحكي القصة عن أبيه وعمه الذين شهدا حنينًا، وأخرى عن أبيه وجده، وثالثة عن أبيه وحده.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি বিশৃঙ্খল অবস্থার (আম্মিয়্যাহ) কারণে অথবা গোত্রীয় গোঁড়ামির (আসাবিয়্যাহ) কারণে পাথর, চাবুক বা লাঠি দ্বারা নিহত হয়, তার (হত্যাকারীর) উপর অনিচ্ছাকৃত হত্যার দিয়াত (ক্ষতিপূরণ) ওয়াজিব হবে। আর যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে (কাউকে) হত্যা করে, তার ক্ষেত্রে কিসাস (প্রতিশোধমূলক শাস্তি) প্রযোজ্য। আর যে ব্যক্তি তার (কিসাসপ্রাপ্ত ব্যক্তির) এবং তার (কিসাসের) মাঝে বাধা সৃষ্টি করে, তার উপর আল্লাহ, ফিরিশতাগণ এবং সমস্ত মানুষের লানত (অভিসম্পাত)। তার পক্ষ থেকে কোনো তওবা (সর্ফ) বা মুক্তিপণ (আদল) কবুল করা হবে না।”
এবং অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: “যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করে, তার হাতেই কিসাস (প্রতিফল) কার্যকর হবে।”
6712 - عن جابر بن عبد الله يقول: كتب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على كل بطن عقوله.
صحيح: رواه مسلم في العنق (1507) عن محمد بن رافع، ثنا عبد الرزّاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزُّبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.
والعقول: الديات، واحدها عقل كفلس وفلوس.
ومعناه: أن الدية في قتل الخطأ وعمد الخطأ تجب على العاقلة. وهم العصبات. سواء الآباء والأبناء، وإن علوا أو سفلوا.
والبطن دون القبيلة، والفخذ دون البطن.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রত্যেক গোত্র (বতন)-এর উপর তাদের দিয়ত (রক্তমূল্য) ধার্য করেছিলেন।
6713 - عن أبي هريرة أن امرأتين من هذيل رمت إحداهما الأخرى، فطرحتْ جنينها، فقضى فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم بغرة عبد أو وليدة.
متفق عليه: رواه مالك في العقول (5) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه البخاريّ في الديات (6904)، ومسلم في القمامة (1681) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
والغرة: من كل شيء أنفسه، والمراد من الحديث: النسمة في الرقيق ذكرًا كان أو أنثى، يكون ثمنها نصف عشر الدية. ومن أهل العلم ممن حملوا الحديث على الظاهر فقالوا: الغرة: عبد أبيض، أو أمة بيضاء، فلا يقبل العبد الأسود، وهو خلاف الإجماع.
وقيل: أصل الغرة: بياض في الوجه، فعبر بذلك عن الجسم كله كإطلاق الرقية على العبد المملوك. وذلك في حالة الجنين ميتا، وإن سقط حيا ثمّ مات، ففيه الدية كاملة.
وقال الترمذيّ (1410) بعد أن أخرج حديث أبي هريرة:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وقال بعضهم: الغرة: عبد، أو أمة، أو خمس مائة درهم، وقال بعضهم: أو فرس أو بغل".
قلت: وهو يشير إلى حديث رواه أبو داود (2579) وأبو عاصم في الديات (172) والدارقطني (3/ 114 - 115) والبيهقي (8/ 115) وصحّحه ابن حبَّان (6022) كلّهم من طريق عيسى بن يونس قال: حَدَّثَنَا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجنين بغرة: عبد أو أمة، أو فرس، أو بغل.
قال أبو داود:"روى هذا الحديث حمّاد بن سلمة وخالد بن عبد الله عن محمد بن عمرو، لم يذكرا: أو فرس أو بغل".
قال الخطّابي في معالمه:"يقال: إن عيسى بن يونس قد وهم فيه، وهو يغلط أحيانًا فيما يرويه،
إِلَّا أنه قد رُوي عن طاوس ومجاهد وعروة بن الزُّبير أنهم قالوا: الغرة: عبد أو أمة أو فرس.
ويُشبه أن يكون الأصل عندهم فيما ذهبوا إليه حديث أبي هريرة هذا، وقال: وأمّا البغل فأمره أعجب، ويحتمل أن تكون هذه الزيادة إنّما جاءت من قبل بعض الرواة على سبيل القيمة إذا عدمت الغرة من الرقاب". والله أعلم.
وكذا قال البغوي (10/ 209) بأن عيسى بن يونس وهم فيه، وقد رواه حمّاد وخالد الواسطي عن محمد بن عمرو ولم يذكرا الفرس والبغل.
وقال البيهقيّ: ذكر الفرس في المرفوع وهم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুজাইল গোত্রের দুজন মহিলার মধ্যে একজন অন্যজনকে আঘাত করল, যার ফলে আঘাতপ্রাপ্ত মহিলাটি তার গর্ভের সন্তান নষ্ট করে ফেলল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বিষয়ে ফায়সালা দিলেন যে, এর ক্ষতিপূরণ হবে একজন গোলাম বা বাঁদির 'গুররাহ'।
6714 - عن أبي هريرة قال: اقتلت امرأتان من هذيل، فرمت إحداهما الأخرى بحجر فقتلتها وما في بطنها، فاختصموا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن دية جنينها غرة عبدٍ أو وليدةٍ، وقضى بدية المرأة على عاقلتها، وورّثها ولدَها ومن معهم.
فقال حمل بن النابغة الهذلي: يا رسول الله، كيف أغرم من لا شرب ولا أكل، ولا نطق ولا استهل؟ فمثل ذلك يُطلّ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّما هذا من إخوان الكهّان" من أجل سجعه الذي سجع.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الديات (6910) ومسلم في القسامة (36: 1681) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن ابن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة رضي الله عنه قال فذكره، واللّفظ لمسلم. وليس عند البخاريّ قال حمل بن النابغة ولا قوله:"وورّثها ولدها ومن معهم".
قوله:"على عاقلته": عاقلة الرّجل: قراباته من قبل الأب وهم عصبته وفيه أن الولد ليس من العاقلة، وأن العاقلة لا ترث إِلَّا ما فضل عن أصحاب الفروض.
قوله:"يطلّ": أي يهدر ولا يضمن.
وفيه دليل على أن دية شبه العمد على العاقلة بخلاف دية العمد فإنها هي على الجاني في ماله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুযাইল গোত্রের দুজন মহিলা ঝগড়া করেছিল। তাদের একজন অন্যজনকে পাথর ছুঁড়ে আঘাত করল, ফলে সে মারা গেল এবং তার গর্ভের সন্তানটিও মারা গেল। তখন তারা বিষয়টি নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বিচার প্রার্থনা করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা দিলেন যে, গর্ভের সন্তানের দিয়ত (রক্তপণ) হলো একটি দাস অথবা দাসী, এবং মহিলাটির দিয়ত তার ‘আক্বিলাহ (রক্তপণ দানে দায়িত্বশীল গোত্রের পুরুষ সদস্য)-এর উপর নির্ধারণ করলেন এবং তার সম্পত্তি তার সন্তান ও তাদের সাথে যারা আছে, তাদের মধ্যে বন্টন করলেন।
তখন হামল ইবনু আন-নাবিগাহ আল-হুযালী (নামক ব্যক্তি) বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমি এমন ব্যক্তির দিয়ত কীভাবে দেব যে পান করেনি, খায়নি, কথা বলেনি এবং যার কান্না শোনা যায়নি (অর্থাৎ মৃত জন্ম নিয়েছে)? এমন দিয়ত বাতিল হওয়াই উচিত।’
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এই ব্যক্তি তো গণকদের ভাইদের অন্তর্ভুক্ত।”—তার এই ছন্দবদ্ধ কথা বলার কারণে।
6715 - عن المغيرة بن شعبة، عن عمر رضي الله عنه أنه استشارهم في إملاص المرأة للمرأة؟ فقال المغيرة: قضى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالغرة عبد أو أمة. قال: أنت من يشهد معك. فشهد محمد بن مسلمة أنه شهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قضى به.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الديات (6905 - 6908) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا وُهيب، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة، به، وعن عبيد الله بن موسى، عن هشام، عن أبيه، أن عمر نشد الناس … الحديث.
ومن طريق زائدة، حَدَّثَنَا هشام بن عروة، عن أبيه أنه سمع المغيرة بن شعبة يحدّث عن عمر.
فتبين بهذا الطريق أن عروة بن الزُّبير إنّما سمعه من المغيرة بن شعبة بلا واسطة. ولكن رواه
مسلم في القسامة (1689) من طرق عن وكيع، عن هشام ابن عروة، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة، قال: استشار عمر بن الخطّاب الناس في مِلاص المرأة فقال المغيرة … الحديث.
والمسور بن مخرمة صحابي صغير، وقد سمع منه عروة بن الزُّبير أحاديث، فيجوز أن يكون لعروة في هذا الحديث شيخان.
وأمّا الحافظ الدَّارقطنيّ في كتابه"التتبع" (85) فتعقب فيه مسلمًا ووهم وكيعًا لمخالفته أصحاب هشام فلم يذكروا (المسور) قال: وهو الصواب".
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নারীদের পরস্পরের মধ্যে ভ্রূণ হত্যা (ইমলাস) [এর দণ্ড] সম্পর্কে তাদের সাথে পরামর্শ করলেন। তখন মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ফায়সালা দিয়েছেন যে, এর (ক্ষতিপূরণ) হলো একটি দাস অথবা দাসী (গুররাহ)। তিনি (উমার) বললেন: তোমার সাথে কে সাক্ষী আছে? তখন মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাক্ষ্য দিলেন যে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এর ফায়সালা দিতে দেখেছেন।
6716 - عن المغيرة بن شعبة قال: ضربت امرأة ضرّتها بعمود فُسطاط وهي حبلى، فقتلتها قال: وإحداهما لِحْيانية. قال: فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم دية المقتولة على عصبة القاتلة. وغرةً لما في بطنها. فقال رجل من عصبة القاتلة: أنغرم دية من لا أكل ولا شرب ولا استهل؟ فمثل ذلك يطلّ! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أسجع كسجع الأعراب؟ !" قال: وجعل عليهم الدية.
صحيح: رواه مسلم في القسامة (37: 1682) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظليّ، أخبرنا جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن عُبيد بن نضيلة الخزاعيّ، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.
মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক মহিলা তার সতীনের উপর তাঁবুর খুঁটি দিয়ে আঘাত করলো, যখন সে গর্ভবতী ছিল, ফলে তাকে হত্যা করে ফেলল। বর্ণনাকারী বলেন: তাদের একজন ছিল লিহইয়ান গোত্রের। তিনি (মুগীরাহ) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিহত মহিলার রক্তপণ হত্যাকারী মহিলার আসাবাহ (পুরুষ আত্মীয়স্বজন)-এর উপর ধার্য করলেন এবং তার পেটের সন্তানের জন্য একটি ‘গুররাহ’ (ক্রীতদাস বা দাসী) ধার্য করলেন। তখন হত্যাকারীর আসাবাহদের মধ্য থেকে একজন লোক বলল: আমরা কি এমন ব্যক্তির রক্তপণ দেব যে না খেয়েছে, না পান করেছে এবং না চিৎকার (জন্মের পর) করেছে? এমন ক্ষেত্রে তো রক্তপণ বাতিল হয়ে যাওয়া উচিত! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "এ কি তুমি বেদুঈনদের মতো মিলযুক্ত ছন্দের কথা বলছ?!" বর্ণনাকারী বলেন: এবং তিনি তাদের ওপর রক্তপণ ধার্য করলেন।
6717 - عن أسامة بن عمير الهذلي. وكان قد صحب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: كانت فينا امرأتان، فضربت إحداهما الأخرى بعمود، فقتلتها، وقتلت ما في بطنها، فقضى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في المرأة بالدية، وقضى بدية الغرة لزوجها، وقضى بالعقل على عصبة القاتلة، وقضى في الجنين بغرة عبد، أو أمة.
صحيح: رواه ابن أبي عاصم في الديات (171) والطحاوي في مشكله (4521) والطَّبرانيّ في الكبير (1/ 160) وعنه الضياء في المختارة (1416) كلّهم من طرق عن سفيان بن عينة، عن أيوب السختيانيّ، قال: سمعت أبا المليح الهذلي بن أسامة، عن أبيه فذكره واللّفظ لأبي عاصم مثله عند الطحاويّ. وإسناده صحيح.
وأمّا ما روي بزيادة: أو خمس مائة درهم، أو فرس، أو عشرون ومائة شاة فهو ضعيف.
رواه الطبرانيّ في الكبير (1/ 160) والبزّار في كشف الأستار - (1523) ولم يذكر لفظه كاملًا، والطحاوي في مشكله (4528) وأبو عاصم في الديات (174) كلّهم من حديث المنهال بن خليفة، عن سلمة بن تمام، عن أبي المليح عن أبيه فذكره.
وفي سياقه قصة أخي الضاربة. فإنه انطلق بالضاربة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يقال له: عمران بن عويمر، فلمّا قصوا على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قصتها قال:"دوه" فقال عمران: يا نبي الله، أندي من لا أكل، ولا شرب، ولا صاح فاستهل، مثل هذا يطل؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دعني من رجز الأعراب، فيه
غرة عبد أو أمة أو خمس مائة، أو فرس، أو عشرون ومائة شاة، فقال: يا نبي الله! إن لها ابنان هما سادة الحي وهم أحق أن يعقلوا عن أمهم. قال:"أنت أحق أن تعقل عن أختك من ولدها" قال: ما لي شيء أعقل فيه، قال:"يا حمل بن مالك" وهو يومئذ على صدقات هذيل، وهو زوج المرأتين، وأبو الجنين المقتول: اقبض من تحت يدك من صدقات هذيل عشرين ومائة شاة" ففعل.
وفي إسناده المنهال بن خليفة قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 300) رواه الطبرانيّ، والبزّار باختصار كثير، والمنهال بن خليفة وتقه أبو حاتم، وضعّفه جماعة، وبقية رجاله ثقات.
قلت: كذا نقل عن أبي حاتم، والصواب أنه قال: صالح يكتب حديثه وقال البزّار: ثقة، وتكلم فيه البخاريّ والنسائي وابن حبَّان وأبو أحمد الحاكم وغيرهم، وجعله الحافظ في مرتبة"ضعيف" وسلمة بن تمام ضعَّفه أحمد والنسائي.
وأمّا البزّار فلم يذكر لفظه كاملًا بل اكتفى بقوله: بغرة عبد أو أمة وقال: لا نعلمه يُروى عن أبي المليح إِلَّا من هذا الوجه وإسناده حسن".
وهذا ليس بصحيح، فقد ثبت أنه رواه أيوب عن أبي المليح، والمنهال كما قلت ضعَّفه الجماعة.
وأمّا ما رُوي عن ابن عباس، عن عمر بن الخطّاب أنه نشد الناس قضاء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في ذلك - يعني في الجنين.
وجاء فيه: فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجنين بغرة عبد، وأن تقتل بها. فهو شاذ. رواه أبو داود (4572) وابن ماجة (2641) والنسائي (4739) وأبو عاصم في الديات (167) والدارقطني (3/ 117) والبيهقي (8/ 114) وأحمد (16729) وصحّحه ابن حبَّان (6021) كلّهم من حديث ابن جريج، قال: حَدَّثَنِي عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
ورواه أحمد (3439) من هذا الوجه وفيه: قلت لعمرو بن دينار: أخبرني ابن طاوس، عن أبيه كذا وكذا (أي لم يذكر فيه تقتل المرأة) فقال: لقد شككتني.
ورواية ابن جريج عن ابن طاوس، عن أبيه أخرجه عبد الرزّاق (18342) وجاء فيه: ذكر لعمر بن الخطّاب قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك. فأرسل إلى زوج المرأتين. فأخبره: إنّما ضربت إحدى امرأتيه الأخرى بعمود البيت. فقتلتها وذا بطنها، فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم بديتها وغرة في جنينها. فكبّر عمر وقال: كدنا نقضي في مثل هذا برأينا.
قال البيهقيّ بعد سرد رواية عمرو بن دينار السابقة: كذا قال:"أن تقتل بها" يعني المرأة القاتلة، ثمّ شك عمرو بن دينار. والمحفوظ أنه قضى بديتها على عاقلة القاتلة.
وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس في صفة الجنين الذي قضى فيه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"قد نبتت ثنيّتاه، ونبت شعره" قال: فقال أبو القاتلة: والله ما أكل، ولا شرب ولا استهل، فمثل ذلك يطل. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أسجع الجاهليّة وكهانتها؟ أدّ الغرة".
قال ابن عباس:"اسم إحداهما مليكة، والأخرى: أم عفيف".
رواه أبو داود (4574) والنسائي (4828) وأبو عاصم في الديات (168) وصحّحه ابن حبَّان (6019) كلّهم من طريق عمرو بن طلحة، نا أسباط بن نصر، عن سماك بن حرب، عن ابن عباس فذكره.
وأسباط بن نصر ضعَّفه النسائيّ وابن معين في رواية.
وقال الساجي:"روى أحاديث لا يتابع عليها عن سماك بن حرب".
وفي الباب ما رُوي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في عقل الجنين إذا كان في بطن أمه بغرة عبد أو أمة. فقضى بذلك في امرأة حمل بن مالك بن النابغة الهذلي.
رواه الإمام أحمد (7026) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبي، عن ابن إسحاق، قال: ذكر عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وابن إسحاق لم يسمع هذا الحديث من عمرو بن شعيب.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر أن امرأتين من هذيل قتلت إحداهما الأخرى، ولكل واحدة منها زوج وولد، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم دية المقتول على عائلة القاتلة، وبرّأ زوجها وولدها.
قال: فقال عاقلة المقتول: ميراثها لنا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا، ميراثها لزوجها ولولدها".
قال: وكانت حُبلى فقالت عائلة المقتولة: إنها كانت حبلى، وألقت جنينًا.
قال: فخاف عائلة القاتلة أن يُضمّنهم.
قال: فقالوا: يا رسول الله! لا شرب، ولا أكل، ولا صاح فاستهل. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أشجع الجاهليّة؟" فقضى في الجنين غرّة: عبدًا أو أمة.
رواه أحمد (1823) واللّفظ له، وأبو داود (4575) وابن ماجة (2648) وأبو يعلى (1823) كلّهم من حديث عبد الواحد بن زياد، حَدَّثَنَا مجالد بن سعيد، حَدَّثَنِي الشعبي، عن جابر فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل مجالد بن سعيد بن عمير الهمداني ضعَّفه جمهور أهل العلم، إِلَّا أن البخاريّ كان حسن الرأي فيه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن بريدة أن امرأة خذفت امرأة، فأسقطتْ فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم في ولدها خمسين شاة ونهي يومئذ عن الخذف.
رواه النسائيّ (4813) وأبو داود (4578) والبيهقي (8/ 115) وأبو عاصم في الديات (173) كلّهم من حديث عبد الله بن موسى، عن يوسف بن صُهَيب، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره واللّفظ للنسائي.
ولفظ أبي داود: فجعل في ولدها خمس مائة شاة وكذا عند أبي عاصم أيضًا.
قال أبو داود:"كذا الحديث."خمس مائة شاة" والصواب: مائة شاة.
قال أبو داود: هكذا قال عباس (وهو عباس بن عبد العظيم شيخ أبي داود، عن عبيد الله بن
موسى) وهو وهم. انتهى. وقال النسائيّ:"أرسله أبو نعيم".
ثمّ رواه من حديث أبي نعيم، حَدَّثَنَا يوسف بن صُهيب، قال: حَدَّثَنِي عبد الله بن بريدة أن امرأة خذفتْ امرأة، فأسقطت المخذوفة فرفع ذلك إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فجعل عقل ولدها خمس مائة من الغر، ونهى يومئذ عن الخذف.
قال النسائيّ:"هذا وهم، وينبغي أن يكون أراد مائة من الغرّ".
উসামা ইবনু উমায়র আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছিলেন, তিনি বলেন, আমাদের মাঝে দুজন নারী ছিল। তাদের একজন অপরজনকে একটি লাঠি দিয়ে আঘাত করল, ফলে তাকে হত্যা করল এবং তার পেটে যা ছিল (ভ্রূণ), তাকেও হত্যা করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিহত নারীর জন্য দিয়াতের (রক্তপণ) ফায়সালা দিলেন, এবং তার স্বামীর জন্য দিয়াতুল গুরাহর (রক্তপণ) ফায়সালা দিলেন। আর হত্যাকারী নারীর নিকটাত্মীয় পুরুষদের ('আসিবা) উপর দিয়াত পরিশোধের দায়িত্ব (আক্বল) ধার্য করলেন, এবং ভ্রূণের জন্য একটি গোলাম অথবা বাঁদী (গুররাহ্) ফায়সালা দিলেন।
6718 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يعقل المرأة عصبتها من كانوا، ولا يرثون منها شيئًا إِلَّا ما فَضل عن ورثتها، وإن قُتلت فعقلها بين ورثتها، فهم يقتلون قاتلها.
حسن: رواه ابن ماجة (2647) عن إسحاق بن منصور، قال: أنبأنا يزيد بن هارون، قال: أخبرنا محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করেছেন যে, মহিলার দিয়ত (রক্তমূল্য) বহন করবে তার আসাবাগণ (পিতা ও পুরুষ আত্মীয়), তারা যেই হোক না কেন। কিন্তু তারা তার (সম্পত্তির) কিছুই উত্তরাধিকারসূত্রে পাবে না, কেবল তার অন্যান্য ওয়ারিশদের প্রাপ্য দেওয়ার পর যা উদ্বৃত্ত থাকে, তা ছাড়া। আর যদি সে (মহিলা) নিহত হয়, তবে তার দিয়ত তার ওয়ারিশদের মধ্যে বণ্টিত হবে। সুতরাং, তারাই তার হত্যাকারীকে হত্যা করবে (কিসাস কার্যকর করবে)।
6719 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوم دية الخطأ على أهل القرى أربع مئة دينار أو عدلها من الورق. ويقوّمها على أثمان الإبل، فإذا غلت رفع في قيمتها، وإذا هاجت رخصًا نقص من قيمتها، وبلغت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ما بين أربع مئة دينار إلى ثمان مئة دينار، أو عدلها من الورق ثمانية آلاف درهم.
قال: وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم على أهل البقر مئتي بقرة.
ومن كان دية عقله في الشاء فألفي شاة.
قال: وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن العقل ميراث بين ورثة القتيل على قرابتهم، فما فضل فللعصبة.
قال: وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأنف إذا جدع الدية كاملة، وإن جدعت ثندوته فنصف العقل: خمسون من الإبل أو عدلها من الذهب أو الورق، أو مئة بقرة أو ألف شاة.
وفي اليد إذا قطعت نصف العقل.
وفي الرّجل نصف العقل.
وفي المأمومة ثلث العقل: ثلاث وثلاثون من الإبل وثلث، أو قيمتها من الذهب أو الورق أو البقر أو الشاء. والجائفة مثل ذلك.
وفي الأصابع في كل إصبع عشر من الإبل.
وفي الأسنان في كل سن خمس من الإبل.
وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن عقل المرأة بين عصبتها من كانوا: لا يرثون منها شيئًا إِلَّا
ما فضل عن ورثتها، وإن قتلت فعقلها بين ورثتها، وهم يقتلون قاتلهم.
وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس للقاتل شيء، وإن لم يكن له وارث فوارثه أقرب الناس إليه، ولا يرث القاتل شيئًا".
قال محمد: هذا كله حَدَّثَنِي به سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
قال أبو داود: محمد بن راشد من أهل دمشق هرب إلى البصرة من القتل.
حسن: رواه أبو داود (4564) والبيهقي (6/ 220) كلاهما من حديث شيبان بن فروخ، ثنا محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره واللّفظ لأبي داود. واكتفى البيهقيّ بذكر"ليس للقاتل ميراث".
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث وكذلك محمد بن راشد وهو المكحولي الشّاميّ وشيخه سليمان بن موسى الأموي الدّمشقيّ حسنا الحديث.
قال البيهقيّ:"رواه جماعة عن إسماعيل بن عَيَّاش، وقيل عنه عن يحيى بن سعيد وابن جريج والمثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب عن أبيه، عن جده، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثله.
وقوله:"القاتل لا يرث" له شواهد انظر: كتاب الفرائض.
وأمّا بقية فقرات الحديث فلكل منها شواهد مذكورة في أبوابها.
والمأمومة: ما كان الجراح في الرأس، وهي ما بلغت أم الدماغ.
والجائفة: هي الطعنة التي تبلغ الجوف.
وقيل: التي تصل الجوف من بطن، أو ظهر، أو ثغرة نحر، أو كيف كان. وفيها ثلث الدية كما في الحديث.
قال الخطّابي:"وهو قول عامة أهل العلم، فإن نفذت الجائفة حتَّى خرجت من الجانب الآخر فإن فيها ثلثي الدية، لأنها حينئذ جائفتان". انتهى قوله.
ومن الجراحات أيضًا التي تجب فيها الدية دون القصاص الدامية الخارمة، والباضعة، والملاحقة، والسمحاق، والهاشمة، والموضحة، والمنقلة، وجاء ذكر بعضها في كتاب عمرو بن حزم.
قال ابن شهاب: قد قرأت كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي كتبه لعمرو بن حزم حين بعثه على نجران، وكان الكتاب عند أبي بكر بن حزم وجاء فيه:
"هذا بيان من الله ورسوله {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ} [المائدة: 1] فكتب الآية حتَّى بلغ {إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ (4)} [المائدة: 4] ثمّ كتب:"هذا كتاب الجراح. في النفس مائة من الإبل، وفي الأنف إذا أوعى جذعه مائة من الإبل، وفي العين خمسون من الإبل، وفي اليد خمسون من الإبل، وفي
الرّجل خمسون من الإبل، وفي كل إصبع مما هنالك عشر من الإبل، وفي المأمومة ثلث النفس، وفي الجائفة ثلث النفس، وفي المقلة خمس عشر، وفي الواضحة خمس من الإبل، وفي السن خمس من الإبل.
رواه البيهقيّ (8/ 80 - 81) وهو مرسل، ولكن اشتهر هذا الكتاب بين أهل العلم، فتلقوه بالقبول، واعتمدوا عليه، ومضى ذكره في كتاب الزّكاة.
وهذا مما لا خلاف فيه أنه لا قصاص في الجراحات والشجاج، وإنما القصاص في كسر أو جرح. كما روى ذلك عدد من فقهاء أهل المدينة. لأن القصاص يقتضي المماثلة لقوله تعالى: {وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِهِ} [النحل: 126] {فَمَنِ اعْتَدَى عَلَيْكُمْ فَاعْتَدُوا عَلَيْهِ بِمِثْلِ مَا اعْتَدَى عَلَيْكُمْ} [البقرة: 194] ولا تحقق المماثلة إِلَّا إذا توفر فيه ثلاثة شروط:
1 - التماثل في الفعل.
2 - التماثل في المحل.
3 - التماثل في المنفعة.
وهذه الشروط لا تتوفر في الجراحات المذكورة، انظر للمزيد"المنة الكبرى" (7/ 92) باب جماع الديات فيما دون النفس.
وأمّا ما روي: لا قود في المأمومة والجائفة والمنقلة وغيرها فأسانيدها كلها ضعيفة.
منها ما رُوي عن العباس بن عبد المطلب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا قود في المأمومة، ولا الجائفة، ولا المنقلة".
رواه ابن ماجة (2637) وأبو يعلى (6700) وعنه البيهقيّ (8/ 65) عن أبي كريب، ثنا رشدين بن سعد، عن معاوية بن صالح، عن معاذ بن محمد الأنصاريّ، عن ابن صُهبان، عن العباس فذكره.
وفيه رشدين بن سعد ضعيف، وابن صُهبان"مجهول".
ورواه أبو عاصم في الديات (162) من حديث بشر بن عمر، عن ابن لهيعة، نا معاذ بن محمد الأنصاري فذكره. وابن لهيعة فيه كلام معروف.
وكذلك لا يصح ما روي نمران بن جارية، عن أبيه، أن رجلًا ضرب رجلًا بالسيف على ساعده فقطعها من غير مفصل، فاستعدى عليه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأمر له بالدية، فقال: يا رسول الله! أريد القصاص. قال له:"خذ الدية بارك الله فيها" ولم يقض له بالقصاص.
رواه ابن ماجة (2636) وفيه دهشم بن قُرّان ضعيف باتفاق أهل العلم. وقال ابن الجنيد: متروك. وشيخه نمران بن جارية"مجهول".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن يحيى وعيسى ابني طلحة، أو أحدهما عن طلحة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس في المأمومة قود".
رواه البيهقيّ (8/ 65) وفي أسانيده من لا يعرف. وقال: هذه الأسانيد لا تثبت.
আবদুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম গ্রামবাসীর ওপর অনিচ্ছাকৃত হত্যার দিয়াত (রক্তপণ) নির্ধারণ করেছিলেন চারশো (৪০০) দীনার, অথবা এর সমমূল্যের রৌপ্য (ওয়ারাক)।
তিনি এর মূল্য উটের দামের ওপরও নির্ধারণ করতেন। যখন উটের দাম বেড়ে যেত, তখন এর মূল্যও বাড়িয়ে দিতেন। আর যখন উটের দাম কমে যেত, তখন এর মূল্যও কমিয়ে দিতেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে (দিয়াত) চারশো (৪০০) দীনার থেকে আটশো (৮০০) দীনারের মধ্যে ছিল, অথবা এর সমমূল্যের রৌপ্য আট হাজার (৮,০০০) দিরহাম ছিল।
তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গরুর মালিকদের জন্য (দিয়াত) হিসেবে দুইশো (২০০) গরু ধার্য করেছিলেন।
আর যার দিয়াত ভেড়ার মাধ্যমে (পরিশোধ করার কথা ছিল), তার জন্য দুই হাজার (২,০০০) ভেড়া ধার্য করা হয়েছিল।
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করেছেন যে, দিয়াত (রক্তপণ) নিহত ব্যক্তির ওয়ারিশদের মধ্যে তাদের আত্মীয়তার ভিত্তিতে বণ্টিত হবে। এরপর যা অবশিষ্ট থাকবে, তা আসাবারা (নিহত ব্যক্তির পুরুষ আত্মীয় যারা সম্পত্তি লাভ করে) পাবে।
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এও ফায়সালা করেছেন যে, যদি কারো নাক সম্পূর্ণ কেটে ফেলা হয়, তবে পূর্ণ দিয়াত দিতে হবে। আর যদি নাকের ডগা কেটে ফেলা হয়, তবে অর্ধ দিয়াত দিতে হবে: যা হলো পঞ্চাশ (৫০)টি উট, অথবা এর সমমূল্যের স্বর্ণ বা রৌপ্য, অথবা একশো (১০০) গরু, অথবা এক হাজার (১,০০০) ভেড়া।
যদি হাত কেটে ফেলা হয়, তবে অর্ধ দিয়াত। আর যদি পা কেটে ফেলা হয়, তবে অর্ধ দিয়াত।
আর 'মামূমাহ' (মগজের চামড়া ভেদ করে ভেতরের দিকে পৌঁছানো আঘাত)-এর জন্য দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ (১/৩): তেত্রিশ (৩৩)টি উট এবং এক-তৃতীয়াংশ, অথবা এর সমমূল্যের স্বর্ণ, রৌপ্য, গরু অথবা ভেড়া। 'জা-ইফাহ' (পেট বা শরীরের গহ্বরে পৌঁছানো আঘাত)-এর ক্ষেত্রেও অনুরূপ।
আঙুলের ক্ষেত্রে, প্রতি আঙুলে দশ (১০)টি উট। আর দাঁতের ক্ষেত্রে, প্রতি দাঁতে পাঁচটি (৫) উট।
আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করেছেন যে, নারীর দিয়াত (রক্তপণ) তার আসাবাদের (পুরুষ আত্মীয়) মধ্যে বণ্টিত হবে, তারা (আসাবা) তার কাছ থেকে কিছুই উত্তরাধিকার সূত্রে পাবে না, তবে তার ওয়ারিশদের ভাগ দেওয়ার পর যা অবশিষ্ট থাকে (তা পাবে)। আর যদি নারীকে হত্যা করা হয়, তবে তার দিয়াত তার ওয়ারিশদের মধ্যে বণ্টিত হবে এবং তারাই তাদের হত্যাকারীকে হত্যা (বদলা) করতে পারবে।
আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হত্যাকারীর জন্য (দিয়াতের) কোনো অংশ নেই। যদি নিহত ব্যক্তির কোনো ওয়ারিশ না থাকে, তবে তার ওয়ারিশ হবে তার নিকটতম ব্যক্তি, আর হত্যাকারী কিছুই উত্তরাধিকার সূত্রে পাবে না।"
মুহাম্মাদ (রাবী) বলেন: এই সবকিছুই সুলায়মান ইবনু মূসা আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি আমর ইবনু শুআইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন।
6720 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في العين العوراء السادة لمكانها إذا طُمست بثلث دينها. وفي اليد الشلّاء إذا قطعت بثلث ديتها، وفي السن السوداء إذا نُزعت بثلث ديتها.
حسن: رواه النسائيّ (4840) وأبو داود (4567) كلاهما من حديث الهيثم بن حميد، حَدَّثَنَا العلاء بن الحارث، حَدَّثَنِي عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، والراوي عنه العلاء بن الحارث بن الوارث الحضرمي الدّمشقيّ ثقة، وثَّقه جمهور أهل العلم إِلَّا أنه خولط اختلاطا خفيفًا ولذا لم يهتم الأئمة باختلاطه، وأحاديثه قليلة. وبهذا قال الإمام أحمد في إحدى روايتيه، والرّواية الثانية عنده في كل واحدة حكومة. وبه قال الأئمة الآخرون أبو حنيفة ومالك والشافعي.
وفي الموطأ العقول (20) عن زيد بن ثابت: في العين القائمة إذا طفئت مائة دينار. قال مالك:"الأمر عندنا في العين القائمة العوراء إذا طفئت، وفي اليد الشلاء إذا قطعت أنه ليس في ذلك إِلَّا الاجتهاد، وليس في ذلك عقل مسمى".
وقال الشافعي:"قضاء زيد بن ثابت كان اجتهادا منه".
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অন্ধ চোখ সম্পর্কে, যা তার স্থানে বিদ্যমান থাকা সত্ত্বেও নষ্ট হয়ে যায়, তার ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ নির্ধারণ করেছেন। আর পক্ষাঘাতগ্রস্ত (অবশ) হাত যদি কেটে ফেলা হয়, তবে এর ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ এবং কালো (ক্ষয়প্রাপ্ত) দাঁত যদি উপড়ে ফেলা হয়, তবে এর ক্ষতিপূরণও পূর্ণ দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ নির্ধারণ করেছেন।