আল-জামি` আল-কামিল
6721 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النَّبِيّ قال:"في المواضع خمس".
حسن: رواه أبو داود (4566) والتِّرمذيّ (1390) والنسائي (4852) وابن ماجة (2655) والبيهقي (8/ 81) وابن الجارود (785) وأبو عاصم في الديات (157) كلّهم من طريق حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب به مثله.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وكذا حسّنه أيضًا الترمذيّ وقال:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق أن في الموضحة خمسًا من الإبل". انتهى.
والموضحة هو الشجة التي توضح العظم أي تظهره.
وهي الغالب ما تكون في الوجه والرأس ففيها خمس من الإبل.
والموضحة في غير الوجه والرأس ففيها حكومة.
وفي كلام الفقهاء تفاصيل كثيرة في أنواع الشجاجات وتحديد موضع الموضحة، هل تكون في الوجه والرأس دون سائر الجسد، أو هي شاملة لجميع الجسم؟ راجع تفاصيل ذلك في كتب الفقه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাওদি'আহ-এর (অর্থাৎ, যে আঘাতের ফলে হাড় উন্মুক্ত হয় তার) দিয়াত হলো পাঁচটি (উট)।"
6722 - عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"هذه وهذه سواء"، يعني الخنصر والإبهام.
صحيح: رواه البخاريّ في الديات (6895) عن آدم، حَدَّثَنَا شعبة، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه أبو داود (4559) وابن الجارود (6895) كلاهما من حديث عبد الصمد بن عبد الوارث، حَدَّثَنِي شعبة بإسناده وفيه:"الأصابع سواء، والأسنان سواء، الثنية والضرس سواء، هذه وهذه سواء".
قال أبو داود:"ورواه النضر بن شميل، عن شعبة بمعني عبد الصمد".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই এবং এই উভয়টি সমান।" অর্থাৎ তিনি (তা দ্বারা) কনিষ্ঠা আঙ্গুল (ছোট আঙ্গুল) এবং বৃদ্ধাঙ্গুলকে (বুড়ো আঙ্গুল) বুঝিয়েছেন।
6723 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دية الأصابع اليدين والرجلين سواء. عشرة من الإبل لكل أصبع".
صحيح: رواه الترمذيّ (1391) واللّفظ له، وأبو داود (4560، 4561) والنسائي (4849) وابن الجارود (780) كلّهم من طريق عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ومنهم من أبهم بقوله: هذه سواء الإبهام والخنصر كما في رواية شعبة عند البخاريّ.
قال الترمذيّ:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وبه يقول سفيان والشافعي وأحمد وإسحاق".
وبه كان يفتي ابن عباس، فأرسل مروان إليه فقال: أتُفتي في الأصابع عشر عشر. وقد بلغك عن عمر في الأصابع. فقال ابن عباس: رحم الله عمر، قول رسول الله صلى الله عليه وسلم أحق أن يتبع من قول عمر. أخرجه البيهقيّ (8/ 93) بإسناد صحيح. لأن عمر بن الخطّاب فضي في الإبهام بخمس عشرة، وفي التي تليها بعشر، وفي الوسطى بعشر، وفي اللتي تلي الخنصر بتسع، وفي الخنصر بست. رواه الشافعي عن سفيان وعبد الوهّاب الثقفيّ، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن عمر فذكره. وأخرجه البيهقيّ (8/ 93) من طريق الشافعي.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাত ও পায়ের আঙ্গুলের দিয়াত (রক্তমূল্য) সমান। প্রতিটি আঙ্গুলের জন্য দশটি করে উট।"
6724 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال في خطبته - وهو مسند ظهره إلى الكعبة -"في الأصابع عشر عشر".
حسن: رواه أبو داود (4562) وابن ماجة (2653) والنسائي (4850) واحمد (7013) والدارقطني (3/ 210) كلّهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو فإنه حسن الحديث.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর খুতবায়—যখন তিনি কাবা ঘরের দিকে পিঠ দিয়ে হেলান দিয়েছিলেন—বলেন: "আঙ্গুলসমূহের (দিয়াত) জন্য দশ দশ রয়েছে।"
6725 - عن أبي موسى الأشعريّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الأصابع سواء عشر عشر من الإبل".
حسن: رواه أبو داود (4557) وأحمد (19550) والدارقطني (3/ 211) والبيهقي (8/ 92) والدارمي (2414) وصحّحه ابن حبَّان (6013) كلّهم من حديث شعبة، عن غالب التمَّار، عن مسروق بن أوس، عن أبي موسى فذكره.
قال أبو داود: ورواه محمد بن جعفر، عن شعبة، عن غالب قال: سمعت مسروق بن أوس.
قلت: لأنه رواه غير شعبة فأدخل بين غالب التمار وبين مسروق بن أوس"حميد بن هلال" كما عند أبي داود (4556) والنسائي (4845) وابن ماجة (2654) وأبو عاصم في الديات (152) كلّهم من حديث سعيد بن أبي عروبة عن غالب التمار.
إِلَّا أن الدَّارقطنيّ رجّح في"العلل" (7/ 249) قول شعبة، وتابعه على ذلك ابن علية، وخالد بن يحيى البصريّ، وحنظلة بن أبي صفية، وعلي بن عاصم، كلّهم عن غالب، عن مسروق بن أوس، عن أبي موسى إِلَّا أن شعبة ربما شك فقال: مسروق بن أوس، أو أوس بن مسروق، والصواب قول من قال: مسروق بن أوس.
قلت: وأخرج أحاديث هؤلاء في سننه (3/ 211).
وإسناده حسن من أجل مسروق بن أوس فقد روى عنه جمعٌ، ووثَّقه ابن حبَّان، وكان معروفا غزا في خلافة عمر، قال الحافظ في"التهذيب":"بين المصنف في الأطراف أن الصواب مسروق بن أوس، وأن شعبة روى الحديث مرة بالشك، وعنه أحمد وغيره من رواية شعبة عن غالب سمعت أوس بن مسروق رجلًا منا .... وسنده صحيح".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عمرو بن حزم مرفوعًا:"وفي كل أصبع من أصابع اليد والرجل عشر من الإبل" وكتاب عمرو بن حزم الذي كتبه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى أهل اليمن وذكر فيه الديات، والفرائض، والسنن، والصدقات كتاب مشهور، يرى ابن عبد البر أن شهرته تُغني عن الإسناد، لأنه أشبه التواتر في مجيئه لتلقي الناس له بالقبول والمعرفة. التمهيد (17/ 338 - 339).
وجمهور أهل العلم أنه لم يرو بإسناد صحيح، وإنما رواه الزهري مرسلًا. راجع تخريجه مفصلا وكلام أهل العلم فيه في"البدر المنير" (8/ 377 - 387).
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আঙুলগুলো (দিয়াতের ক্ষেত্রে) সমান। (প্রত্যেক) আঙুলের জন্য দশ দশটি করে উট (রক্তপণ হিসেবে নির্ধারিত) রয়েছে।
6726 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأسنان سواء، والأصابع سواء".
صحيح: رواه أبو داود (4560) وأحمد (2624) والبيهقي (8/ 90) كلّهم من حديث عليّ بن الحسن بن شقيق، قال: أخبرنا أبو حمزة، قال: حَدَّثَنَا يزيد النحويّ، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه ابن ماجة (2651) عن إسماعيل بن إبراهيم البالسيّ، قال: حَدَّثَنَا عليّ بن الحسن بن شقيق بإسناده وقال فيه:"قضى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في السن خمسا من الإبل".
وإسماعيل بن إبراهيم ثقة، وإسناده صحيح أيضًا كما قال البوصيري.
وروى مالك في العقول (29) عن داود بن الحصين، عن أبي غطفان بن طريف المريّ، أن مروان بن الحكم بعثه إلى عبد الله بن عباس يسأله ماذا في الضرس فقال: فيه خمس من الإبل.
قال: فردني إليه مروان قال: أتجعل مقدم الفم مثل الأضراس؟ فقال ابن عباس: لو لم تعتبر ذلك إِلَّا بالأصابع، عقلها سواء".
قال مالك: الأمر عندنا أن مقدم الفم والأضراس والأنياب عقلها سواء. وذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في السن خمس من الإبل، والضرس سن من الأسنان، لا يفضل بعضها على بعض". انتهى.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাঁতগুলি (দিয়তের ক্ষেত্রে) সমান এবং আঙ্গুলগুলিও (দিয়তের ক্ষেত্রে) সমান।"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাঁতের জন্য পাঁচটি উট (ক্ষতিপূরণ) ধার্য, আর মাড়ির দাঁতও অন্যান্য দাঁতেরই অংশ, যার একটির উপর অপরটির কোনো প্রাধান্য নেই।"
6727 - عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب يوم فتح مكة، فكبّر ثلاثًا ثمّ قال:"لا إله إِلَّا الله وحده، صدق وعده، ونصر عبده، وهزم الأحزاب وحده، ألا إن كل مأثرةٍ كانت في الجاهليّة تذكر وتُدعى من دم، أو مال تحت قدمَيَّ، إِلَّا ما كان من سقاية الحاج، وسدانة البيت". ثمّ قال:"ألا إن دية الخطأ شبه العمد ما كان بالسوط والعصا مائة من الإبل، منها أربعون في بطونها أولادها".
حسن: رواه أبو داود (4547) وابن ماجة (2627) والدارقطني (3/ 104 - 105) وابن الجارود (773) وصحّحه ابن حبَّان (6011) كلّهم من طرق عن خالد الحذاء، عن القاسم بن ربيعة، عن عقبة بن أوس، عن عبد الله بن عمرو فذكره واللّفظ لأبي داود. واختصره البعض.
وهذا إسناد حسن من أجل عقبة بن أوس الدوسي فإنه حسن الحديث.
ولكن رواه ابن ماجة (2627) والنسائي (4791) وأحمد (6533) كلّهم من حديث شعبة، عن أيوب، سمعت القاسم بن ربيعة يحدث عن عبد الله بن عمرو فذكره مختصرًا.
فأسقط أيوب من الإسناد"عقبة بن أوس".
فلعل القاسم بن ربيعة سمع الحديث من الوجهين، فإن ابن عمرو وعقبة بن أوس، ويقال يعقوب بن أوس من شيوخه وهو ثقة.
وللحديث أسانيد أخرى ذكرها النسائيّ والدارقطني وغيرهما، إِلَّا أن الصَّحيح منها لا يضره
اختلاف الأسانيد كما هو مقرر في أصول الحديث. وبالله التوفيق
وأمّا ما رواه أبو داود (4549) وابن ماجة (2628) والنسائي (4799) والدارقطني (3/ 105) كلّهم من حديث عليّ بن زيد، عن القاسم بن ربيعة، عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بمعناه كما قال أبو داود قال: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح أو فتح مكة على درجة البيت أو الكعبة كذا عند أبي داود.
وجاء فيه:"ألا إن قتيل الخطأ قتيل السوط والعصا، فيه مائة إبل. منها أربعون خِلفة في بطونها أولادها" فهو ضعيف.
عليّ بن زيد بن جدعان ضعيف لا يحتج به، وخاصة إذا خالف.
فإنه جعل الحديث من مسند عبد الله بن عمر بن الخطّاب، والصحيح أنه من مسند عبد الله بن
عمرو بن العاص.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন খুৎবা প্রদান করলেন। তিনি তিনবার তাকবীর বললেন, অতঃপর বললেন: "একমাত্র আল্লাহ ছাড়া অন্য কোনো ইলাহ নেই। তিনি তাঁর ওয়াদা সত্য করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং তিনি একাই সম্মিলিত বাহিনীকে (আহযাবকে) পরাজিত করেছেন।" তিনি আরও বললেন, "শুনে রাখো! জাহিলিয়্যাতের যুগের সকল গর্ব ও অহংকার, যা স্মরণ করা হয় বা ডাকা হয়, তা রক্ত (হত্যার প্রতিশোধ) হোক বা সম্পদ (সুদ ইত্যাদি) হোক, সব আমার এই দুই পায়ের নিচে (বাতিল)। তবে হাজীদের পানি পান করানোর (সিকায়াতুল হাজ্জ) এবং কাবা ঘরের রক্ষণাবেক্ষণের (সিদানাতুল বাইত) দায়িত্ব ছাড়া।" অতঃপর তিনি বললেন, "শুনে রাখো! ইচ্ছাকৃত হত্যার সদৃশ ভুলবশত হত্যার দিয়াত হলো (যা চাবুক বা লাঠি দ্বারা সংঘটিত হয়), একশটি উট। এর মধ্যে চল্লিশটি এমন হবে, যেগুলোর পেটে বাচ্চা রয়েছে।"
6728 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى أن من قتل خطأ فديته مائة من الإبل: ثلاثون بنت مخاض، وثلاثون بنت لبون، وثلاثون حقة، وعشر بني لبون ذكر.
حسن: رواه أبو داود (4541) وابن ماجة (2630) والدارقطني (3/ 95) ومن طريقه البيهقيّ (8/ 74) كلّهم من حديث يزيد بن هارون، حَدَّثَنَا محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره واللّفظ لأبي داود.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث ومحمد بن راشد هو الدّمشقيّ المكحولي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وزاد ابن ماجة: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقومها على أهل القرى أربع مائة دينار، أو عدلها من الورق، ويقومها على أزمان الإبل، إذا غلتْ رفع في ثمنها، وإذا هانت نقص من ثمنها، على نحو الزمان ما كان فبلغ قيمتها على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ما بين الأربع مئة دينار إلى ثمان مائة دينار، أو عدلها من الورق ثمانية آلاف درهم.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই ফয়সালা দিয়েছেন যে, যে ব্যক্তি ভুলক্রমে (কাউকে) হত্যা করে, তার দিয়াত হলো একশত উট: ত্রিশটি বিনতে মাখাদ, ত্রিশটি বিনতে লাবুন, ত্রিশটি হিক্কাহ এবং দশটি ইবনু লাবুন যাকার।
(ইবনে মাজাহ-এর বর্ণনায় অতিরিক্ত অংশ): রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গ্রামীণ অধিবাসীদের জন্য এর (দিয়াতের) মূল্য নির্ধারণ করেছিলেন চারশো দিনার, অথবা তার সমপরিমাণ রূপা। তিনি উটের বাজার মূল্যের ভিত্তিতে এর মূল্য নির্ধারণ করতেন। যখন উটের মূল্য বৃদ্ধি পেত, তখন তিনি তার মূল্য বাড়িয়ে দিতেন, আর যখন তার মূল্য হ্রাস পেত, তখন তিনি তার মূল্য কমিয়ে দিতেন—সময় ও পরিস্থিতির সাথে সামঞ্জস্য রেখে। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এর মূল্য চারশো দিনার থেকে আটশো দিনারের মধ্যে পৌঁছাত, অথবা এর সমপরিমাণ রূপা ছিল আট হাজার দিরহাম।
6729 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: كانت قيمة الدية في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمانمائة دينار، أو ثمانية آلاف درهم، ودية أهل الكتاب يومئذ النصف من دية المسلمين. قال: فكان ذلك كذلك حتَّى استخلف عمر رضي الله عنه فقام خطيبًا فقال: ألا إن الإبل قد غلتْ، ففرضها عمر على أهل الذهب ألف دينار، وعلى أهل الورق اثني عشر ألف درهم، وعلى أهل البقر مائتي بقرة، وعلى أهل الشاء ألفي شاة، وعلى أهل الحلل مائتي حلة، قال: وترك دية أهل الذمة لم يرفعها فيما رفع من الدية.
حسن: رواه أبو داود (4542) عن يحيى بن حكيم، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن عثمان، حَدَّثَنَا حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا البيهقيّ (8/ 77) وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب وهو حسن الحديث.
وفي الباب ما رواه أيضًا أبو داود (4543) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا حمّاد، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن عطاء بن أبي رباح أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في الدية على أهل الإبل مئة من الإبل، وعلى أهل البقر مئتي بقرة، وعلى أهل الشاء ألفي شاة، وعلى أهل الحلل مئتي حلة، وعلى أهل القمح شيئًا لم يحفظه محمد (يعني ابن إسحاق) وهذا مرسل.
ثمّ وصله أبو داود (4544) فقال: قرأت على سعيد بن يعقوب الطالقانيّ، قال: حَدَّثَنَا أبو تُميلة، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق قال: ذكر عطاء، عن جابر بن عبد الله قال: فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم.
فذكر مثل حديث موسى. قال: وعلى أهل الطعام شيئًا لم أحفظه.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقي (8/ 78) وقال: كذا رواه محمد بن إسحاق بن يسار، ورواية من رواه عن عمر أكثر وأشهر.
قلت: ومحمد بن إسحاق مدلِّس، ولم يسمع هذا الحديث من عطاء، وبهذا قالت الحنابلة وبعض الحنفية.
وقال الشافعي: إن الواجب الأصلي في الدية هو مائة إبل إن وجدت، فإن انعدمت يرجع إلى القيمة من عملة البلد في حينه.
وفي الباب ما رُوي عن عبادة بن الصَّامت أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قضى في دية الكبرى المغلظة ثلاثين ابنة لبون، وثلاثين حقة، وأربعين خلفة، وقضى في دية الصغرى: ثلاثين ابنة لبون، وثلاثين حقة، وعشرين ابنة مخاض، وعشرين بني مخاض ذكور.
ثمّ غلت الإبل بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهانت الدراهم. فقوم عمر بن الخطّاب إبل الدية ستة آلاف درهم حساب أوقية لكل بعير، ثمّ غلت الإبل وهانت الورق، فزاد عمر بن الخطّاب ألفين حساب أوقيتين لكل بعير، ثمّ غلت الإبل، وهانت الدراهم فأتمها عمر اثني عشر ألفا حساب ثلاث أواق لكل بعير. قال: فزاد ثلث الدية في الشهر الحرام، وثلثا آخر في البلد الحرام. قال: فتمت دية الحرمين عشرين ألفا.
قال: فكان يقال: يؤخذ من أهل البادية من ماشيتهم لا يكلفون الورق ولا الذهب. ويؤخذ من كل قوم ما لهم قيمة العدل من أموالهم.
رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (22778) وابن أبي عاصم في الديات (141) والبيهقي (8/ 74) كلّهم من حديث الفُضيل بن سليمان، حَدَّثَنَا موسى بن عقبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصَّامت، عن عبادة بن الصَّامت قال: فذكره.
وإسحاق لم يلق جد أبيه عبادة بن الصَّامت فهو مرسل كما قال البيهقيّ ولم يرو عنه إِلَّا موسى بن عقبة فهو"مجهول" أيضًا، والفضيل بن سلمان ضعيف ضعَّفه ابن معين وأبو زرعة وأبو حاتم وغيرهم.
وقوله:"دية الكبرى": أي إذا قتله عمدًا. وقوله:"دية الصغرى": أي إذا قتله خطأ.
حديث الحجاج بن أرطاة، عن زيد بن جبير، عن خشْف بن مالك، قال: سمعت ابن مسعود فذكره.
قال أبو داود: وهو قول عبد الله. والحجاج بن أرطاة مدلس، وقد عنعن.
وخشف بن مالك مختلف فيه. فوثّقه النسائيّ، وذكره ابن حبَّان في الثّقات، ولم يرو عنه إِلَّا زيد بن جبير الجشميّ، ونقل ابن حجر في"التهذيب": قال الدَّارقطنيّ في السنن: مجهول، وتبعه البغوي في المصابيح، وقال الأزدي: ليس بذاك. ورجح الترمذيّ أنه موقوف فقال: حديث ابن مسعود لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه، وقد رُوي عن عبد الله موقوفًا.
وقال الدَّارقطنيّ (3/ 172 - 173) بعد أن رواه من طريق أبي عبيدة عن ابن مسعود قوله: دية الخطأ خمسة أخماس موقوفًا عليه.
وقال: وهذا إسناد حسن، ورواته ثقات، وقد رُويَ عن علقمة، عن عبد الله نحوه.
قلت: أما رواية علقمة فرواه ابن أبي شيبة في المصنف (9/ 134) وأبو داود (4553) والبيهقي (8/ 69) كلّهم من حديث أبي الأحوص، عن أبي إسحاق، عن علقمة النخعيّ، عن ابن مسعود فذكره. وفيه أبو إسحاق مختلط، ولم يعرف عن أبي الأحوص هل روى عنه قبل الاختلاط أم بعد الاختلاط. ثمّ قال الدَّارقطنيّ بعد أن ساق الحديث من طريق الحجاج، عن زيد بن جبير، عن خلف بن مالك، عن عبد الله مرفوعًا: هذا حديث ضعيف، غير ثابت عند أهل المعرفة بالحديث من وجوه عدة. ثمّ ذكر هذه الوجوه - والخلاصة فيه أنه موقوف عليه".
ورأى البيهقيّ (8/ 76) بعد أن ساق عدة أسانيد إلى ابن مسعود موقوفًا عليه أن الموقوف عليه أيضًا ليس بصحيح فإن فيه انقطاعا بين ابن مسعود وبين من روى عنه، كما أن المرفوع ضعيف لجهالة خشف بن مالك لم يرو عنه إِلَّا زيد بن جبير وقال: ولا نعلم أحدًا رواه عن زيد بن جبير إِلَّا حجَّاج بن أرطاة. والحجاج رجل مشهور بالتدليس، وإنه يحدث عمن لم يلقه، ولم يسمع منه". انتهى.
وجعل الشافعي مكان بني المخاض بني لبون لحديث ابن مسعود موقوفًا عليه وهو قوله: دية الخطأ خمس أخماس: عشرون حقة، وعشرون جذعة، وعشرون بنات مخاض، وعشرون بنات لبون، وعشرون بني لبون ذكور.
رواه الدَّارقطنيّ (3/ 172) عن دعْلج، ثنا حمزة بن جعفر الشيرازيّ، ثنا أبو سلمة، ثنا حمّاد بن سلمة، أنا سليمان التميميّ، عن أبي مجلز، عن أبي عبيدة، أن ابن مسعود قال: فذكره.
قال الدَّارقطنيّ:"هذا إسناد حسن. ورواته ثقات. وقد رُوي عن علقمة عن عبد الله نحوه".
وقال: أما حديث خِشف بن مالك فضعيف غير ثابت عند أهل المعرفة بالحديث من وجوه عدة، أحدها أنه مخالف لما رواه أبو عبيدة بن عبد الله بن مسعود عن أبيه بالسند الصَّحيح عنه الذي لا مطعن فيه ولا تأويل عليه، وأبو عبيدة أعلم بحديث أبيه وبمذهبه وفتياه من خشف بن مالك ونظرائه وعبد الله بن مسعود أتقى لربه وأشح على دينه من أن يرُوي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه يقضي
بقضاء، ويفتي هو بخلافه، هذا لا يتوهم مثله على عبد الله بن مسعود، وهو القائل في مسألة وردت عليه لم يسمع فيها من رسول الله صلى الله عليه وسلم شيئًا ولم يبلغه عنه فيها قول، أقول فيها برأيي، فإن يكن صوابًا فمن الله ورسوله، وإن يكن خطأ فمني، ثمّ بلغه بعد ذلك أن فتياه وافق قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم في مثلها، فرآه أصحابه عند ذلك فرح فرحًا لم يروه فرح مثله، من موافقة فتياه قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم، فمن كانت هذه صفته وهذا حاله، فكيف يصح عنه أن يروي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم شيئًا ويخالفه، ويشهد أيضًا لرواية أبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود عن أبيه، ما رواه وكيع وعبد الله بن وهب وغيرهما، عن سفيان الثوري، عن منصور، عن إبراهيم، عن عبد الله بن مسعود أنه قال: دية الخطأ أخماسًا.
قلت: كذا قال رحمه الله تعالى، ومن المعروف أن أبا عبيدة لم يسمع من أبيه، ثمّ أدرك الدَّارقطنيّ قائلًا:"ويشهد أيضًا لرواية أبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، ما رواه وكيع وعبد الله بن وهب وغيرهما عن سفيان الثوري، عن منصور، عن إبراهيم، عن عبد الله بن مسعود أنه قال: دية الخطأ أخماسًا.
ثمّ قال: ثمّ فسرها كما فسرها أبو عبيدة وعلقمة عنه سواء. فهذه الرواية وإن كان فيها إرسال.
فإبراهيم النخعي هو أعلم الناس بعبد الله وبرأيه وبفتياه وأطال الكلام فيه.
ولكن رواه البيهقيّ (8/ 75) من حديث يزيد بن هارون، أنبأنا سليمان التيميّ، عن أبي مجلز، عن أبي عبيدة، عن عبد الله في دية الخطأ أخماس: خمس بنو مخاض، وخمس بنات مخاض، وخمس بنات لبون، وخمس حقاق، وخمس جذاع. وقال: هذا هو المعروف عن عبد الله بن مسعود بهذه الأسانيد. قد روى بعض حفاظنا وهو الشّيخ أبو الحسن الدَّارقطنيّ هذه الأسانيد عن عبد الله، وجعل مكان بني المخاض - بني لبون، وهو غلط منه. وقد رأيته أيضًا في كتاب محمد بن إسحاق بن خزيمة وهو إمام، في رواية وكيع، عن سفيان بإسناديه كذلك بني لبون، وفي رواية سعيد بن بشير عن قتادة، عن أبي مجلز، عن أبي عبيدة، عن ابن مسعود كذلك بني لبون".
عمرو، عن عكرمة سمعناه مرة يقول: عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قضى باثني عشر ألفا في الدية".
ورواه الدَّارقطنيّ (3/ 130) وقال فيه محمد بن ميمون: وإنما قال لنا فيه: عن ابن عباس مرة واحدة، وأكثر من ذلك يقول: عن عكرمة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
وقال الترمذيّ في"العلل الكبير" (2/ 577):"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: سفيان بن عيينة يقول: عمرو بن دينار عن عكرمة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا. وكأن حديث ابن عيينة عنده أصح". وكذا رجّح أيضًا أبو حاتم المرسل."العلل" (1/ 463).
قال الترمذيّ بعد أن ذكر حديث ابن عباس:"والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم. وهو قول أحمد. ورأى بعض أهل العلم الدية عشرة آلاف. وهو قول سفيان الثوري وأهل الكوفة. وقال الشافعي:"لا أعرف الدية إِلَّا من الإبل وهي مائة من الإبل". انتهى.
قلت: وقال الشافعي أيضًا: فإن عدمت الإبل فيعدل إلى ألف دينار، أو اثني عشر ألف درهم، أو إلى قيمة الإبل حين القبض زائدة وناقصة.
وأمّا مالك فكان يجعلها في الإبل، وفي الدنانير وفي الدراهم. وكذلك قول أبي حنيفة.
তাঁর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে দিয়াতের (রক্তমূল্যের) মূল্য ছিল আটশ' দিনার অথবা আট হাজার দিরহাম। আর আহলে কিতাবদের দিয়াত সে সময় মুসলমানদের দিয়াতের অর্ধেক ছিল। তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলিফা নিযুক্ত হওয়া পর্যন্ত সেভাবেই চলছিল। অতঃপর তিনি (উমর) দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: সাবধান! নিশ্চয়ই উট দুর্মূল্য হয়ে গেছে। তাই উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) স্বর্ণের (ব্যবহারকারী) লোকদের উপর এর পরিমাণ ধার্য করলেন এক হাজার দিনার, রৌপ্যের (ব্যবহারকারী) লোকদের উপর বারো হাজার দিরহাম, গরুর (ব্যবহারকারী) লোকদের উপর দু'শ গরু, ভেড়া-বকরীর (ব্যবহারকারী) লোকদের উপর দুই হাজার ভেড়া-বকরী, আর পোশাকের (ব্যবহারকারী) লোকদের উপর দু'শ জোড়া পোশাক। তিনি (দাদা) বলেন: তিনি যিম্মিদের দিয়াতকে সেভাবে ছেড়ে দিলেন; অন্যান্য দিয়াত বৃদ্ধি করলেও তাদেরটা বৃদ্ধি করেননি।
6730 - عن رُوي عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أصاب المكاتب حدا أو ميراثا ورث بحساب ما عتق منه" وقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: يؤدي المكاتب بحصة ما أدى دية حر، وما بقي دية عبد".
رواه أبو داود (4581)، والتِّرمذيّ (1259) والنسائي (4808) وأحمد (1944) وابن أبي عاصم في الديات (242) والدارقطني (3/ 199) وصحّحه الحاكم (2/ 218) والبيهقي (10/ 326) كلّهم من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس إِلَّا الترمذيّ فإنه رواه عن أيوب، عن عكرمة به واللّفظ للترمذي.
وقال: حديث حسن، وهكذا روي يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. وروي خالد الحذاء، عن عكرمة، عن عليٍّ قولَه.
وقال: سألت البخاريّ عن هذا الحديث فقال: روى بعضهم هذا الحديث عن أيوب، عن عكرمة، عن عليّ.
وقال أبو داود بعد أن رواه أيضًا من طريق حمّاد بن سلمة، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس:"رواه وهيب، عن أيوب، عن عكرمة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. وأرسله حمّاد بن زيد وإسماعيل عن أيوب، عن عكرمة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. وجعله إسماعيل ابن علية قول عكرمة". انتهى.
وقال أبو عليّ التغلبي: سألت أحمد بن حنبل عن هذا الحديث فقال: أنا أذهب إلى حديث بريدة
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بشرائها - يعني أنها بقيت على حكم الرق حتَّى أمر بشرائها."ذكره البيهقيّ.
وقال: وحديث عكرمة إذا وقع فيه الاختلاف وجب التوقف فيه.
وهذا المذهب إنّما يروى عن عليّ بن أبي طالب، وهو أن يعتق بقدر ما أدّى. وفي ثبوته عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نظر". انتهى.
قلت: ولذا لم يأخذ بهذا الحديث جمهور أهل العلم، وإنما قال به بعض أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم.
وقال أكثر أهل العلم من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم: المكاتب عبد ما بقي عليه درهم. وهو قول سفيان الثوريّ، والشافعيّ، وأحمد، وإسحاق كما قال الترمذيّ.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যদি মুকাতাব (মুক্তি চুক্তিবদ্ধ গোলাম) কোনো হদ্ (শরীয়তি শাস্তি) অথবা মীরাসের (উত্তরাধিকারের) সম্মুখীন হয়, তবে সে তার যতটুকু মুক্ত হয়েছে, সেই অনুপাতে উত্তরাধিকারী হবে।" এবং নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুকাতাব যে পরিমাণ মূল্য পরিশোধ করেছে, সেই অনুপাতে সে স্বাধীন ব্যক্তির দিয়ত (রক্তমূল্য) দেবে, আর যা বাকি আছে তার জন্য সে গোলামের দিয়ত দেবে।"
(ইমাম) আবূ দাউদ (৪৫৮১), তিরমিযী (১২৫৯), নাসাঈ (৪৮০৮), আহমাদ (১৯৪৪), ইবনু আবী 'আসিম আদ-দিয়্যাত (২৪২), দারাকুতনী (৩/১৯৯) এটি বর্ণনা করেছেন এবং হাকিম (২/২১৮) ও বায়হাকী (১০/৩২৬) একে সহীহ বলেছেন। এঁরা সবাই ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর, তিনি ইকরিমাহ, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তবে ইমাম তিরমিযী এটিকে আইয়ুব, তিনি ইকরিমাহ, তাঁর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আর শব্দগুলো তিরমিযীর।
তিনি (তিরমিযী) বলেন: হাদীসটি হাসান (উত্তম)। একইভাবে ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর, তিনি ইকরিমাহ, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন। আর খালিদ আল-হিযা, তিনি ইকরিমাহ, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব কথা হিসেবে এটি বর্ণনা করেছেন।
তিনি (তিরমিযী) বলেন: আমি বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ)-কে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন: কেউ কেউ এই হাদীসটি আইয়ুব, তিনি ইকরিমাহ, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন।
আবূ দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) হাম্মাদ ইবনু সালামাহ, তিনি আইয়ুব, তিনি ইকরিমাহ, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে হাদীসটি বর্ণনা করার পর বলেন: ওয়াহাইব, তিনি আইয়ুব, তিনি ইকরিমাহ, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। আর হাম্মাদ ইবনু যায়েদ ও ইসমাঈল এটি মুরসাল হিসেবে আইয়ুব, তিনি ইকরিমাহ, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আর ইসমাঈল ইবনু উলাইয়্যা একে ইকরিমাহর নিজস্ব উক্তি হিসেবে গণ্য করেছেন। [সমাপ্ত]
আবূ আলী আত-তাগলাবী বলেন: আমি আহমাদ ইবনু হাম্বল (রাহিমাহুল্লাহ)-কে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন: আমি বুরাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের দিকে যাই, যেখানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা (মুকাতাবাকে) ক্রয় করার নির্দেশ দিয়েছেন — অর্থাৎ, এটি দাসত্বের হুকুমের উপর ছিল যতক্ষণ না তিনি এটি ক্রয় করার নির্দেশ দেন। (বায়হাকী এটি উল্লেখ করেছেন।)
তিনি (আহমাদ) বলেন: ইকরিমাহর হাদীসে যখন মতপার্থক্য দেখা দেয়, তখন এর উপর আমল করা থেকে বিরত থাকা আবশ্যক।
এই মতটি মূলত আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, সে যতটুকু মূল্য পরিশোধ করেছে, ততটুকু সে মুক্ত হবে। আর নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এর প্রমাণিত হওয়ার বিষয়ে সংশয় রয়েছে। [সমাপ্ত]
আমি (গ্রন্থকার) বলি: এই কারণে জমহুর (অধিকাংশ) আলিম এই হাদীস গ্রহণ করেননি। বরং নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবী ও অন্যান্যদের মধ্যে কতিপয় আলিম এই মত দিয়েছেন।
নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবী ও অন্যান্যদের মধ্যে অধিকাংশ আলিম বলেছেন: মুকাতাব যতক্ষণ পর্যন্ত তার উপর একটি দিরহামও বাকি থাকবে, ততক্ষণ সে গোলাম হিসেবেই গণ্য হবে। এটি সুফইয়ান সাওরী, শাফিঈ, আহমাদ ও ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত, যেমনটি তিরমিযী উল্লেখ করেছেন।
6731 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"المسلمون تتكافأ دماؤهم: يسعى بذمتهم أدناهم، ويجير عليه أقصاهم، وهم يد على من سواهم، يرد مشدهم على مُضْعفهم، ومتسريهم على قاعدهم، لا يُقتل مؤمن بكافر، ولا ذو عهد في عهده".
وفي رواية:"دية عقل الكافر نصف دية عقل المؤمن".
حسن: رواه أبو داود (2751) واللّفظ له والتِّرمذيّ (1413) والنسائي (4806) وابن ماجة (2659) وأحمد (6692) وابن الجارود (1052) واليهقي (8/ 29) والبغوي (2542) كلّهم من طرق عن عمرو بن شعيب به مثله، وهو جزء من خطبة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: عام الفتح ذكره أحمد وابن الجارود والبيهقي والبغوي مطولة، وستأتي كاملة في موضعه.
وإسناده حسن من أجل عمرو وأبيه.
والرّواية الثانية عند الترمذيّ وقال: حديث عبد الله بن عمرو في هذا الباب حديث حسن". قلت: وهو كما قال.
رُوي عن مُجَّاعَةَ أنه أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: يطلب دية أخيه - قتلته بنو سدوس من بني ذهل - فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لو كنت جاعلا لمشرك دية جعلتها لأخيك، ولكن سأعطيك منه عقبي" فكتب له النَّبِيّ صلي الله عليه وسلم بمائة من الإبل من أول خمس يخرج من مشركي بني ذهل، فأخذ طائفة منها، وأسلمت بنو ذهل، فطلبها بعد مجاعة إلى أبي بكر، وأتاه بكتاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فكتب له أبو بكر باثني عشر ألف صاع من صدقة اليمامة: أربعة آلاف بر، وأربعة آلاف شعير، وأربعة آلاف تمر، وكان في كتاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لمجاعة:"بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، هذا كتاب من محمد النَّبِيّ، لمجاعة بن مرارة من بني سلمى، إني أعطيته مائة من الإبل من أول خمس يخرج من مشركي بني ذهل عقبةً من أخيه".
رواه أبو داود (2990) وابن قانع في مُعْجَمُ الصّحابة (3/ 112 - 113) من طريق عنبسة بن عبد الواحد القرشيّ، حَدَّثَنِي الدخيل بن إياس بن نوح بن مجاعة، عن هلال بن سراج بن مجاعة، عن أبيه، عن جده مجاعة، فذكره.
وفي إسناده الدخيل بن إياس بن نوح بن مجاعة، لم يؤثر توثيقه عن أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقاته، ولم يتابع. وفيه أيضًا سراج بن مجاعة، قيل: إن له صحبة. لكن لم تثبت له من وجه معتبر، ولذا ذكره البخاريّ وابن أبي حاتم في جملة التابعين، ولم يؤثر توثيقه عن أحد إِلَّا أن ابن حبَّان ذكره في ثقات التابعين، ولم يتابع أيضًا.
قال الترمذيّ:"واختلف أهل العلم في دية اليهودي والنصراني".
فذهب بعض أهل العلم في دية اليهودية والنصراني إلى ما رُوي عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. وقال عمر بن عبد العزيز: دية اليهودي والنصراني نصف دية المسلم. وبهذا يقول أحمد بن حنبل.
ورُوي عن عمر بن الخطّاب أنه قال: دية اليهودي والنصراني أربعة آلاف درهم، ودية المجوسي ثمانمائة درهم. وبهذا يقول مالك بن أنس والشافعي وإسحاق وقال بعض أهل العلم:"دية اليهودي والنصراني مثل دية المسلم. وهو قول سفيان الثوري وأهل الكوفة". انتهى.
وأمّا الإمام أحمد فذهب إلى نصف الدية إن كان القتل خطأ، فإن كان عمدا لم يقد به، ويضاعف عليه باثني عشر ألفًا.
روى عبد الرزّاق (18492) عن معمر، عن الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر أن رجلًا مسلما قتل رجلًا من أهل الذمة عمدًا. فرفع إلى عثمان فلم يقتل به، وغلّظ عليه الدية مثل قتل المسلم.
وكذلك قاله ابن مسعود وعلي والشعبي والنخعي على أن يكون ذميا أو معاهدًا.
وأمّا من رُوي عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ودى العامريّين بدية المسلمين. وكان لهما عهد من رسول الله صلى الله عليه وسلم. فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (1404) والبيهقي (8/ 102) كلاهما من حديث أبي بكر بن عَيَّاش، عن أبي سعد البقال، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه، وأبو سعد البقال اسمه: سعيد بن المرزبان".
قلت: سعيد بن مرزبان العبسي مولاهم، الكوفي الأعور ضعيف باتفاق أهل العلم حتَّى قال البخاريّ: منكر الحديث.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুসলমানদের রক্ত (মূল্যের দিক থেকে) পরস্পর সমান (কিসাস প্রযোজ্য হয়)। তাদের মধ্যেকার নিম্নস্তরের বা সাধারণ ব্যক্তিও (অন্যকে) নিরাপত্তা (আমান) দিতে পারে, আর তাদের দূরবর্তী বা শক্তিশালী ব্যক্তিও সেই নিরাপত্তা রক্ষা করে। তারা তাদের প্রতিপক্ষদের বিরুদ্ধে ঐক্যবদ্ধ (এক হাতস্বরূপ)। তাদের শক্তিশালীরা তাদের দুর্বলদের পক্ষে সাহায্যকারী হবে এবং অভিযানে গমনকারীরা তাদের ঘরে অবস্থানকারীদের পক্ষে থাকবে। কোনো কাফেরের বদলে কোনো মু'মিনকে হত্যা করা হবে না, আর চুক্তিবদ্ধ থাকা অবস্থায় চুক্তিবদ্ধ কোনো ব্যক্তিকে (হত্যা করা হবে না)।"
আরেক বর্ণনায় রয়েছে: কাফেরের দিয়াত (রক্তমূল্য) মু'মিনের দিয়াতের অর্ধেক।
6732 - عن عائشة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث أبا جهم بن حذيفة مصدقا، فلاجَّه رجل في
صدقته، فضربه أبو جهم، فشجَّه، فأتوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: القودَ يا رسول الله! فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لكم كذا وكذا" فلم يرضوا، فقال:"لكم كذا وكذا" فرضوا، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنِّي خاطب العشية على الناس ومخبرهم برضاكم؟" فقالوا: نعم. فخطب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"إنَّ هؤلاء الليثيين أتوني يريدون القود، فعرضت عليهم كذا وكذا فرضوا، أرضيتم؟" قالوا: لا. فهم بهم المهاجرون، فأمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن يكفوا عنهم، فكفوا، ثمّ دعاهم فزادهم، فقال:"أرضيتم؟" قالوا: نعم، قال:"إنِّي خاطب على الناس ومخبرهم برضاكم، قالوا: نعم، فخطب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"أرضيتم؟" قالوا: نعم.
صحيح: رواه أبو داود (4534) والنسائي (4778) وابن ماجة (2638) وابن أبي عاصم في الديات (247) وصحّحه ابن حبَّان (4478) كلّهم من حديث عبد الرزّاق وهو في مصنفه (18032) عن معمر، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ জাহম ইবনু হুযাইফাকে যাকাত আদায়কারী (মুষাদ্দিক) হিসেবে প্রেরণ করেছিলেন। এক ব্যক্তি তার যাকাতের (পরিমাণ) নিয়ে তার সাথে বিতর্কে জড়িয়ে পড়ল। ফলে আবূ জাহম তাকে মারলেন এবং তার মাথা ফাটিয়ে দিলেন (আহত করলেন)। তখন তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! কিসাস (প্রতিশোধের অধিকার) চাই! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তোমাদের জন্য এত এত (ক্ষতিপূরণ) রয়েছে। কিন্তু তারা তাতে সন্তুষ্ট হলো না। অতঃপর তিনি বললেন, তোমাদের জন্য এত এত (আরও বেশি ক্ষতিপূরণ) রয়েছে। এবার তারা সন্তুষ্ট হলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, আমি আজ সন্ধ্যায় জনগণের সামনে ভাষণ দিতে যাচ্ছি এবং তাদের কাছে তোমাদের এই সন্তুষ্টির কথা ঘোষণা করব, কেমন? তারা বলল, হ্যাঁ। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিলেন এবং বললেন, এই লাইসী গোত্রের লোকেরা আমার কাছে এসেছিল কিসাস চাইতে। আমি তাদের সামনে এত এত (ক্ষতিপূরণ) পেশ করলাম এবং তারা সন্তুষ্ট হলো। তোমরা কি সন্তুষ্ট হয়েছো? তারা বলল, না। মুহাজিরগণ তাদের প্রতি (ক্রোধে) উদ্যত হলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের (মুহাজিরদের) বিরত থাকতে নির্দেশ দিলেন। ফলে তারা বিরত থাকলেন। অতঃপর তিনি তাদের (ক্ষতিগ্রস্ত পক্ষকে) ডাকলেন এবং আরও বাড়িয়ে দিলেন। তিনি বললেন, তোমরা কি সন্তুষ্ট হয়েছো? তারা বলল, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আমি জনগণের সামনে ভাষণ দিতে যাচ্ছি এবং তোমাদের এই সন্তুষ্টির কথা ঘোষণা করব, কেমন? তারা বলল, হ্যাঁ। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিলেন এবং বললেন, তোমরা কি সন্তুষ্ট হয়েছো? তারা বলল, হ্যাঁ।
6733 - عن أبي رِمْثة قال: انطلقت مع أبي نحو النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي:"ابنك هذا؟" قال: إي ورب الكعبة قال:"حقًّا" قال: أشهد به، قال: فتبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم ضاحكًا من ثبْت شبهي في أبي. ومن حلف أبي عليّ. ثمّ قال:"أما إنه لا يجني عليك، لا تجني عليه" وقرأ: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [فاطر: 18].
صحيح: رواه أبو داود (4495) والنسائي (1572) والتِّرمذيّ (2812) وأحمد (7109) وصحّحه ابن حبَّان (5995) والحاكم (2/ 425) كلّهم من حديث عبيد الله بن إياد بن لقيط، قال: حَدَّثَنَا إياد بن لقيط، عن أبي رمثة فذكره. واللّفظ لأبي داود، وقد اختصره البعض، ورواه البعض مطوَّلًا. انظر كتاب اللباس باب في الخضاب.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إِلَّا من حديث عبيد الله بن إياد، وأبو رمْثة التيمي: اسمه حبيب بن حبَّان، ويقال: اسمه رفاعة بن يثْربي". انتهى.
كذا قال الترمذيّ: حسن، والحق أنه صحيح، وعبيد الله بن إياد، وثَّقه جمع من أهل العلم منهم ابن معين والنسائي والعجلي وأبو نعيم الفضل بن دكين وغيرهم.
ثمّ قوله: لا نعرفه إِلَّا من حديث عبيد الله بن زياد …
قلت: ليس كما قال بل رواه أيضًا عبد الملك بن أبحر. رواه أحمد (17492) والنسائي (4832) وابن أبي عاصم في الديات (315) كلّهم من حديث سفيان بن عيينة، عنه، عن إياد بن لقيط فذكر نحوه. وعبد الملك بن أبحر هو عبد الملك بن سعيد بن حبَّان بن أبحر ثقة.
وله أسانيد أخرى عن إياد بن لقيط.
আবু রিম্ছা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতার সাথে নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের দিকে (তাঁর কাছে) গেলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পিতাকে বললেন, “এ কি তোমার পুত্র?” তিনি (আমার পিতা) বললেন, হ্যাঁ, কা'বার রবের শপথ! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “সত্যিই?” তিনি বললেন, আমি এর সাক্ষ্য দিচ্ছি। তিনি (আবু রিম্ছা) বললেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃদু হাসলেন—আমার পিতার কাছে আমার সাদৃশ্য নিশ্চিত হওয়া দেখে এবং আমার পিতার আমার ব্যাপারে শপথ করার কারণে। অতঃপর তিনি বললেন, “জেনে রাখো, সে তোমার উপর (দোষের বোঝা) চাপাবে না এবং তুমিও তার উপর (দোষের বোঝা) চাপাবে না।” আর তিনি তিলাওয়াত করলেন: “কেউ অন্যের বোঝা বহন করবে না।” (সূরা ফাতির, ১৮)।
6734 - عن الخشخاش العنبريّ، قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ومعي ابن لي، قال: فقال:"ابنك هذا؟" قال: قلت: نعم، قال:"لا يجني عليك، ولا تجني عليه".
صحيح: رواه ابن ماجة (2671) وأحمد (19031) كلاهما من طريق هُشيم بن بشير، أخبرنا يونس بن عبيد، عن حصين بن أبي الحر، عن الخشخاش فذكره.
وحصين بن أبي الحر: اسم أبي الحر مالك، وهو ابن الخشخاش العنبري. لأبيه، ولجده صحبة روى عن جده الخشخاش. وهذا إسناد صحيح.
ولكن قال الإمام أحمد: قال هُشيم مرة: حَدَّثَنَا يونس بن عبيد، قال: أخبرني مخبر، عن حصين بن أبي الحر، فجعل بين يونس وحصين أحدًا مبهمًا.
والمبهم هو: الوليد بن مسلم بن شهاب العنبري أبي بشر كما ذكره المزي في ترجمة حصين، رواه عمرو بن عون، عن هُشيم، عن يونس بن عبيد، عن حصين بن أبي الحر، أو قال: عن الوليد بن أبي بشر، عن حصين بن أبي الحرّ.
وقال: رواه غيرهم عن هُشيم، عن يونس، عن الوليد بن أبي بشر، عن حصين بن أبي الحرّ من غير شك، وهو الصَّحيح. انتهى كلام المزي.
قلت: كذا رواه ابن أبي عاصم في الديات (313) عن إسماعيل بن سالم نا هُشيم، عن يونس، عن الوليد بن مسلم، بدون الشك.
والإسناد صحيح، وقد يكون ليونس بن عبيد شيخان: حصين بن أبي الحر، والوليد بن أبي بشر، ولم يضبطه هُشيم بن بشير، وكلا الإسنادين صحيح. وقد رُوي مرسلًا والموصول أصح.
খুশখাশ আল-আনবারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম, আমার সাথে আমার এক পুত্র ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "এ কি তোমার পুত্র?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে তোমার অপরাধের জন্য দায়ী হবে না, আর তুমিও তার অপরাধের জন্য দায়ী হবে না।"
6735 - عن طارق المحاربي أن رجلًا قال: يا رسول الله! هؤلاء بنو ثعلبة الذين قتلوا فلانًا في الجاهليّة فخذ لنا بثأرنا. فرفع يديه حتَّى رأيت بياض إبطيه وهو يقول:"لا تجني أم على ولد مرتين".
حسن: رواه النسائيّ (4839) وابن ماجة (2670) واللّفظ لهما وصحّحه ابن حبَّان (6562) والحاكم (2/ 611 - 612) كلّهم من حديث يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن جامع بن شداد، عن طارق بن عبد الله المحاربي فذكره في سياق طويل مذكور في السيرة النبوية ما لاقاه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من قومه. قال الحاكم: صحيح على شرط الشّيخين.
وإسناده حسن من أجل يزيد بن زياد بن أبي الجعد فإنه حسن الحديث.
তারিক আল-মুহারিবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এরা হলো বনু সা‘লাবা, যারা জাহিলিয়্যাতের যুগে অমুক ব্যক্তিকে হত্যা করেছিল। অতএব আপনি আমাদের পক্ষ থেকে তাদের কাছ থেকে প্রতিশোধ গ্রহণ করুন।’ অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু’হাত উপরে তুললেন। এমনকি আমি তাঁর বগলের শুভ্রতা দেখতে পেলাম। তিনি বললেন, "কোনো মা তার সন্তানের অপরাধের জন্য দু'বার অভিযুক্ত হয় না।"
6736 - عن أسامة بن شريك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجني نفس على أخرى".
حسن: رواه ابن ماجة (2672) عن محمود بن عبد الله بن عبيد بن عقيل، قال: حَدَّثَنَا عمرو بن عاصم، قال: حَدَّثَنَا أبو العوام القطان، عن محمد بن جحادة، عن زياد بن عِلاقة، عن أسامة بن
شريك فذكره. وإسناده حسن من أجل أبي العوّام القطان وهو عمران بن داود مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
উসামা ইবনু শারীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো ব্যক্তি অন্য কারো বিরুদ্ধে অপরাধের জন্য দায়ী হবে না।"
6737 - عن ثعلبة بن زهدم اليربوعي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب في أناس من الأنصار. فقالوا: يا رسول الله! هؤلاء بنو ثعلبة بن يربوع قتلوا فلانًا في الجاهليّة فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهتف بصوته:"ألا لا تجني نفس على الأخرى".
صحيح: رواه النسائيّ (4833) عن محمود بن غيلان قال: حَدَّثَنَا بشر بن السري، قال: حَدَّثَنَا سفيان (وهو الثوري) عن أشعث، عن الأسود بن هلال، عن ثعلبة بن زهدم اليربوعي فذكره.
وإسناده صحيح إن صحَّ صحبةُ ثعلبة بن زهدم. - والكلام فيه كما يأتي - وإن لم تصحّ صحبتُه فهو يرُوي عن أناس من بني ثعلبة أدركوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كما رواه شعبة، عن أشْعث بن أبي الشعثاء، قال: سمعت الأسود بن هلال، يحدث عن رجل من بني ثعلبة بن يربوع أن ناسًا من بني ثعلبة أتوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكر نحوه.
رواه أيضًا النسائيّ (4835) عن محمود بن غيلان، عن أبي داود قال: أنبأنا شعبة.
ورواه أبو عوانة ومن طريقه النسائيّ وأحمد (16613)، وأبو الأحوص عند النسائيّ، كلاهما من حديث أشعث، عن أبيه (وهو سليم أبو الشعثاء المحاربي) عن رجل من بني ثعلبة بن يربوع قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يتكلم فقال رجل: يا رسول الله! هؤلاء بنو ثعلبة بن يربوع الذين أصابوا فلانًا فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا، يعني لا تجني نفس على نفس".
والإسنادان صحيحان، وأشعث وهو ابن أبي الشعثاء ثقة، له شيخان: الأسود بن هلال، وأبوه أبو الشعثاء إِلَّا أن ثعلبة بن زهدم مختلف في صحبته.
ففي"التهذيب" قال ابن حجر: جزم بصحة صحبته ابن حبَّان وابن السكن وأبو محمد بن حزم وجماعة ممن صنّف في الصّحابة بطول تعدادهم. وذكره البخاريّ في التاريخ الكبير وقال: قال الثوري: له صحبة، ولا يصح، وقال الترمذيّ في تاريخه: أدرك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وعامة روايته عن الصّحابة. وقال العجلي: تابعي ثقة، ذكره مسلم في الطبقة الأوّلى من التابعين". انتهى قول الحافظ ابن حجر.
قلت: فإن صحت صحبتُه فذاك، وإلَّا فإبهام الصحابي في رواية أبي عوانة وأبي الأحوص لا يضر كما هو معلوم.
وفي الباب عن عمرو بن الأحوص قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول في حجّة الوداع:"ألا لا يجني والد على ولده، ولا مولود على والده".
رواه ابن ماجة (2669) والتِّرمذيّ (1163، 2159) وأحمد (16064) وابن أبي عاصم في الديات (312) كلّهم من حديث شبيب بن غرقدة، عن سليمان بن عمرو بن الأحوص، عن أبيه
فذكره. قال الترمذيّ: حسن صحيح.
قلت: فيه سليمان بن عمرو لم يرو عنه سوى شبيب بن غرقدة، ولم يوثقه غير ابن حبَّان. ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعًا. وجهله ابن القطان.
وهذا جزء من خطب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع، انظر كتاب الحجّ.
وأمّا ما رُوي عن عاصم بن لقيط أن لقيطا خرج وافدًا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه صاحب له يقال له: نهيك بن عاصم بن مالك بن المنتفق فذكر الحديث بطوله. وجاء فيه:"ولا يجني عليك إِلَّا نفسك"، فهو ضعيف جدًّا.
رواه عبد الله بن أحمد (16206) قال: كتب إليّ إبراهيم بن حمزة بن محمد بن حمزة بن مصعب بن الزُّبير الزُّبيري: كتبتُ إليك بهذا الحديث، وقد عرضته وسمعتُه على ما كتبت به إليك. فحدّث بذلك عني قال: حَدَّثَنِي عبد الرحمن بن المغيرة الحزاميّ، قال: حَدَّثَنِي عبد الرحمن بن عَيَّاش السمعي الأنصاري القبائي من بني عمرو بن عوف، عن دَلهم بن الأسود بن عبد الله بن حاجب بن عامر بن المنتفق العقيليّ، عن أبيه، عن عمه لقيط بن عامر قال دلْهم: وحدثنيه أبي الأسود، عن عاصم بن لقيط أن لقيطة خرج وافدًا فذكره.
أورده الهيثميّ في"المجمع" (10/ 338 - 340) وقال: رواه عبد الله (ابن أحمد) والطَّبرانيّ نحوه، وأحد طريقي عبد الله إسنادها متصل، ورجالها ثقات، والإسناد الآخر وإسناد الطبرانيّ مرسل عن عاصم بن لقيط، أن لقيطًا". انتهى.
وقال ابن حجر في"تهذيبه" في ترجمة (عاصم بن لقيط بن عامر) رواه أبو القاسم الطبرانيّ مطوَّلًا وهو حديث غريب جدًّا.
قلت: أخرجه أبو داود (3266) مختصرًا بقوله:"لعمر إلهك" من طريق إبراهيم بن حمزة، ثنا عبد الملك بن عباس السمعي الأنصاري عن دلْهم بن الأسود بإسناده.
وأعله البيهقيّ بعلة أخرى فقال:"ورواه حمود بن خالد، عن الوليد، عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن جده، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ولم يذكر أباه".
كذا قال، مع أن النسائيّ (4831) رواه بالإسناد الثاني عن محمود بن خالد قال: حَدَّثَنَا الوليد، عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده مثله سواء". أي بذكر أبيه.
فانحصرت العلة في أمرين:
أحدهما: عنعنة ابن جريج.
والثاني: غير الوليد بن مسلم رواه عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب مرسلًا عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كما قال الدَّارقطنيّ ولم أقف على هذا الإرسال. إِلَّا أن ابن حجر قال في بلوغ المرام (1011):"أن من أرسله أقوى ممن وصله".
وفي الباب ما رواه أيضًا أبو داود (4587) عن محمد بن العلاء، حَدَّثَنَا حفص، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، حَدَّثَنِي بعض الوفد الذين قدموا على أبي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيما طبيب تطبّب على قوم لا يعرف له تطبب قبل ذلك فأعْنَتَ فهو ضامن".
قال عبد العزيز:"أما إنا ليس بالنعت، إنّما هو قطع العروق والبط والكي".
وفيه جهالة الوفد، مع الإرسال فإن الغالب أن الوفد ليس من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
قال الخطّابي:"لا أعلم خلافًا في المعالج إذا تعدّى فتلف المريض كان ضامنًا. والمتعاطي علمًا أو عملًا لا يعرفه متعد. فإذا تولد من فعله التلف ضمن الدية. وسقط عنه القود، لأنه لا يستبد بذلك دون إذن المريض. وجناية الطبيب في قول عامة الفقهاء على عاقلته".
সা'লাবাহ ইবনু যুহদুম আল-ইয়ারবু'ঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের কিছু লোকের মাঝে ভাষণ দিচ্ছিলেন। তখন তারা বললো, হে আল্লাহর রাসূল! এই বনু সা'লাবাহ ইবনু ইয়ারবু' গোত্র জাহিলিয়াতের যুগে অমুক ব্যক্তিকে হত্যা করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উচ্চস্বরে ঘোষণা করলেন: "সাবধান! এক আত্মা যেন অন্য আত্মার উপর (অপরাধ) চাপিয়ে না দেয়।"
6738 - عن عمران بن الحصين أن غلامًا لأناس فقراء قطع أذن غلام لأناس أغنياء. فأتى أهله النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: يا رسول الله! إنا أناس فقراء. فلم يجعل عليه شيئًا.
صحيح: رواه أبو داود (4590) والنسائي (4751) كلاهما من حديث معاذ بن هشام، حَدَّثَنَا أبي، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن عمران بن الحصين قال: فذكره. وإسناده صحيح.
والغلام معناه الولد الصغير، والظاهر من السياق أنه كان حرًا، وجنايته كانت خطأ. وكانت عاقلته فقراء، وكذلك الغلام المجني عليه أيضًا كان حرًا لأنه لو كان عبدًا لم يكن لاعتذار أهله بالفقر معنى، لأن العاقلة لا تحمل عبدًا، كما لا تحمل عمدًا، ولا اعترافًا في قول أكثر أهل العلم كما قاله الخطّابي. وقد فهم النسائيّ وأبو داود أن المراد بالغلام العبد.
فلو كان هذا صحيحًا فإن الغلام المملوك إذا جنى على عبد، أو حر فجنايته في رقبته في قول عامة الفقهاء.
ইমরান ইবনুল হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় গরিব সম্প্রদায়ের একটি বালক ধনী সম্প্রদায়ের একটি বালকের কান কেটে ফেলেছিল। এরপর সেই বালকের অভিভাবকরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমরা গরিব লোক।' তখন তিনি [নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] তার (অপরাধীর) উপর কিছু (ক্ষতিপূরণ বা দণ্ড) আরোপ করলেন না।
6739 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"جرح العجماء جبار، والبئر جبار، والعدن جبار، وفي الركاز الخمس".
متفق عليه: رواه مالك في العقول (42) عن ابن شهاب، عن سعيد وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه البخاريّ (6912) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم عن قُتَيبة بن سعيد كلاهما عن اللّيث، عن ابن شهاب بإسناد مثله.
وقد رواه عن أبي هريرة ابن سيرين ومحمد بن زياد والأعرج وأبو صالح وعروة بن الزُّبير وهمام وغيرهم وأحاديثهم مخرج في مصنف ابن أبي شيبة (9/ 271 - 272).
قال أبو داود (4593):"العجماء التي تكون منفلتة، ولا يكون معها أحد. وتكون بالنهار، ولا تكون بالليل". وقال الزهري:"يغرم قاتل البهيمة، ولا يغرم أهلها ما قتلت.
وعن إبراهيم أن بعيرًا افترس رجلًا فقتله. فجاء رجل فقتل البعير. فأبطل شريح دية الرّجل، وضمن الرّجل قيمة البهيمة. ذكره ابن أبي شيبة في مصنفه.
وأمّا ما رواه أبو داود (4592) وابن أبي عاصم في الديات (193) والدارقطني (3/ 152) والبيهقي (8/ 343) كلّهم من سفيان بن حسين، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الرّجل جبار" فهو ضعيف.
قال أبو داود: الدابة تضرب برجلها وهو راكب.
قلت: إسناده ضعيف من أجل سفيان بن حسين بن حسن أبو محمد الواسطي ثقة وثَّقه جماعة إِلَّا في الزهري فإنه ضعيف فيه. لأنه لا يتابع على الزّهريّ، وقد خالفه جماعة من الثّقات عن الزّهريّ، ولم يذكروا"الرّجل جبار".
قال الدَّارقطنيّ:"هذا وهم، لأن الثّقات الذين قدّمنا أحاديثهم خالفوه. ولم يذكروا ذلك. وكذلك رواه أبو صالح السمان وعبد الرحمن الأعرج ومحمد بن سيرين ومحمد بن زياد وغيرهم، عن أبي هريرة ولم يذكروا فيه:"الرّجل جبار".
وقال الخطّابي:"وقد تكلم الناس في هذا الحديث، وقيل: إنه غير محفوظ، وسفيان بن حسين معروف بسوء الحفظ".
وقالوا: وإنما هو"العجماء جرحها جبار" ولو صحَّ الحديث لكان القول به واجبا. وقد قال به أبو حنيفة وأصحابه، وذهبوا إلى أن الراكب إذا رمحت دابته إنسانا برجلها فهو هدر، فإن نفحته بيدها فهو ضامن. قالوا: وذلك أن الراكب يملك تصريفا من قدامها. ولا يملك منها فيما وراءها.
وقال الشافعي:"اليد والرجل سواء. لا فرق بينهما وهو ضامن". انتهى.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"النّار جبار".
رواه أبو داود (4594) وابن ماجة (2676) وابن أبي عاصم في الديات (192) كلّهم من حديث عبد الرزّاق، وقرنه أبو داود بعبد الملك الصنعانيّ، عن معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة فذكره.
قال الدَّارقطنيّ (3/ 153):"يقول أحمد بن حنبل في حديث عبد الرزّاق في حديث أبي هريرة:"والنار جبار".
ليس بشيء، لم يكن في الكتب، باطل ليس هو بصحيح، وقال أحمد أيضًا: أهل اليمن يكتبون النّار النير، ويكتبون البير مثل ذلك. وإنما لقن عبد الرزّاق: النّار جبار".
ولكن قال الخطّابي:"لم أزل أسمع أصحاب الحديث يقولون: غلط فيه عبد الرزّاق، إنّما هو"البئر جبار" حتَّى وجدته لأبي داود عن عبد الملك الصنعاني عن معمر فدل أن الحديث لم ينفرد به عبد الرزّاق، ومن قال هو تصحيف"البئر" احتج في ذلك بأن أهل اليمن يميلون"النّار" ويكسرون النون فيها. فسمعه بعضهم على الإمالة، فكتبه بالباء، ثمّ نقله الرواة مصحفًا".
وأمّا معنى الحديث فقال بعض أهل العلم: النّار تطير بها الريح، فتحرق متاعا لقوم فإنه لا يلزم موقدها غرامة. وفرق قوم بين النّار التي يوقدها صاحبها ليشوي عليها لحمًا، وبين أن يوقدها عبثًا فقالوا: ما تجني هذه فيه الغرامة.
وأمّا ما رُوي عن عامر بن ربيعة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"العجماء جبار" فهو خطأ. رواه النسائيّ في الكبرى (5830) والطَّبرانيّ في الأوسط (3940) كلاهما من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد عن اللّيث بن سعد، عن ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، عن عامر بن ربيعة فذكره.
قال النسائيّ:"خالفه قُتَيبة بن سعيد. فرواه عن اللّيث، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة وابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.
وقال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن ليث بن سعد إِلَّا يعقوب بن إبراهيم". فالصواب أنه من حديث أبي هريرة.
والعجماء: البهيمة، وسميت العجماء لأنها لا تتكلم.
وقوله: جبار أي هدر، لا دية فيه.
وقوله: البئر جبار: أي أن الإنسان لو حفر بئرًا في بلكهـ أو في موات فوقع فيها إنسان فلا ضمان عليه. وكذلك لو استأجره لحفرها فوقعتْ عليه فمات، فلا ضمان عليه.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নির্বাক পশুর জখম জাবার (ক্ষতিপূরণবিহীন), কূপ হলো জাবার, খনি হলো জাবার, আর রিকায (গুপ্তধন)-এর মধ্যে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) রয়েছে।”
6740 - عن عمران بن حصين أن رجلًا عض يد رجل فنزع يده من فمه فوقعت ثنيتاه،
فاختصموا إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يعض أحدكم أخاه كما يعضّ الفحل، لا دية له".
وفي لفظ: فرفع إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأبطله، وقال:"أردت أن تأكل لحمه؟ !".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الديات (6892) ومسلم في القسامة (18: 1673) كلاهما من طريق شعبة، حَدَّثَنَا قتادة، قال: سمعت زرارة بن أوفى، عن عمران بن حصين، فذكره.
واللّفظ الثاني: رواه مسلم من وجه آخر عن قتادة، به.
ইমরান ইবন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি অন্য এক ব্যক্তির হাত কামড়ে ধরল। তখন লোকটি তার হাত কামড়দাতার মুখ থেকে জোরে টেনে বের করে নিলে তার (কামড়দাতার) সামনের দাঁতগুলো পড়ে গেল। অতঃপর তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বিচারপ্রার্থী হলো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমাদের কেউ কি তার ভাইকে পশুর মতো কামড়ায়? এর কোনো দিয়ত (ক্ষতিপূরণ) নেই।
অন্য এক বর্ণনায় (এসেছে), ঘটনাটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পেশ করা হলো। তিনি তা বাতিল করে দিলেন এবং বললেন: তুমি কি তার গোশত খেতে চেয়েছিলে?!