হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6708)


6708 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قتل عمدًا دفع إلى أولياء القتيل، فإن شاؤوا قتلوا، وإن شاؤوا أخذوا الدية. وذلك ثلاثون حقة، وثلاثون جذعة، وأربعون خلفة. وذلك عقل العمد، وما صولحوا فهو لهم، وذلك تشديد العقل".

حسن: رواه الترمذيّ (1387) وابن ماجة (2626) وأبو داود (4506) مختصرًا كلّهم من حديث محمد بن راشد، قال: أخبرنا سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.

قال الترمذيّ:"حسن غريب".




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে (কাউকে) হত্যা করে, তাকে নিহত ব্যক্তির অভিভাবকদের কাছে সোপর্দ করা হবে। অতঃপর তারা চাইলে (কিসাস স্বরূপ) তাকে হত্যা করতে পারে, অথবা তারা চাইলে দিয়াত (রক্তমূল্য) গ্রহণ করতে পারে। আর তা (দিয়াত হলো) ত্রিশটি হিক্কাহ, ত্রিশটি জাযআহ এবং চল্লিশটি গর্ভবতী উটনী। এটাই হলো ইচ্ছাকৃত হত্যার দিয়াত। আর (অতিরিক্ত) যা কিছু নিয়ে তারা আপোসে রাজি হবে, সেটাও তাদের জন্য। আর এটাই হলো দিয়াতের কঠোরতা (বৃদ্ধি)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6709)


6709 - عن أبي شريح الكعبي يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا إنكم معشر خُزاعة قتلتم هذا القتيل من هُذيل، وإني عاقله. فمن قتل له بعد مقالتي هذه قتيل فأهله بين خيرين: أن يأخذوا العقل، أو يقتلوه".

صحيح: رواه أبو داود (4504) والتِّرمذيّ (1439) وأحمد (27160) والدارقطني (3/ 95 - 96) كلّهم من حديث يحيى بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب قال: حَدَّثَنَا سعيد المقبريّ، قال: سمعت أبا شريح الكعبي فذكره. وإسناده صحيح.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".

ولأبي شريح الكعبي حديث آخر في الصحيحين في تحريم سفك الدماء في سياق طويل في فضائل مكة.




আবূ শুরাইহ আল-কা'বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শোনো! হে খুযাআ গোত্রের লোকেরা, তোমরা হুযাইল গোত্রের এই লোকটিকে হত্যা করেছ। আর আমি তার রক্তপণ (দিয়াত) প্রদান করব। সুতরাং আমার এই কথার পর যদি কারো কোনো আত্মীয়কে হত্যা করা হয়, তবে তার অভিভাবকগণ দুটি বিষয়ের মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নিতে পারবে: হয় তারা রক্তপণ গ্রহণ করবে, অথবা তাকে (ঘাতককে) হত্যা করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6710)


6710 - عن أبي شُريح الخزاعي قال: لما بعث عمرو بن سعيد إلى مكة، بعثه يغزو ابن الزُّبير، أتاه أبو شريح فكلمه، وأخبره بما سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم فمما قال:"يا معشر خزاعة، ارفعوا أيديكم عن القتل، فقد كثر أن يقع، لئن قتلتم قتيلًا لأدينّه. فمن قتل بعد مقامي هذا فأهله بخير النظرين: إن شاؤوا فدم قاتله، وإن شاؤوا فعقله".

حسن: رواه أحمد (16377) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبيّ، عن محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي شريح الخزاعي فذكره في خطبة يوم الفتح الطويلة.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.

وهذا الحديث روي أيضًا بإسناد آخر، وبلفظ آخر عن محمد بن إسحاق، عن الحارث بن فُضيل، عن سفيان بن أبي العوجاء، عن أبي شريح الخزاعي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أصيب بدم أو خَبْل فهو بالخيار بين إحدى ثلاث، فإن أراد الرابعة، فخذوا على يديه: أن يقتل، أو يعفو،
أو يأخذ الدية. فمن فعل شيئًا من ذلك فعاد، فإن له نار جهنّم خالدًا مخلدًا فيها أبدًا".

رواه أبو داود (4496) وابن ماجة (2623) وأحمد (16375) والدارقطني (3/ 96) كلّهم من هذا الوجه. وسفيان بن أبي العوجاء ضعيف عند جمهور العلماء. وعد الذّهبيّ في"الميزان" (2/ 169 - 170) هذا الحديث من مناكيره. وفيه محمد بن إسحاق مدلِّس، وقد عنعن.




আবু শুরাইহ আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমর ইবনু সাঈদকে মক্কায় পাঠানো হলো—তিনি তাঁকে ইবনুয যুবাইরকে আক্রমণ করার জন্য পাঠিয়েছিলেন—তখন আবু শুরাইহ তাঁর কাছে এসে তাঁর সাথে কথা বললেন এবং তাঁকে অবহিত করলেন যা তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে শুনেছেন। তিনি যা বলেছিলেন তার মধ্যে এও ছিল: "হে খুযাআ গোত্রের লোকেরা, তোমরা হত্যা করা থেকে তোমাদের হাত গুটিয়ে নাও, কারণ তা অনেক বেশি ঘটছে। যদি তোমরা কোনো ব্যক্তিকে হত্যা করো, তবে আমি অবশ্যই তার দিয়াত পরিশোধ করব। সুতরাং আমার এই অবস্থানের (বা ঘোষণার) পরে যে কাউকে হত্যা করবে, তার (নিহতের) পরিবার দু'টি পছন্দের মধ্যে উত্তমটির অধিকারী হবে: তারা যদি চায়, তবে হত্যাকারীর রক্ত (কিসাস), আর যদি চায় তবে তার দিয়াত (রক্তমূল্য)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6711)


6711 - عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل في عميّة، أو عصبية بحجر أو سوط أو عصا، فعليه عقل الخطأ، ومن قتل عمدًا فهو قود، ومن حال بينه وبينه، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يُقبل منه صرف، ولا عدْل".

وفي رواية:"من قتل عمدًا فقود يده".

حسن: رُوي موصولًا ومرسلا.

فأما الموصول فرواه أبو داود (4540) والنسائي (4789)، وابن ماجة (2635) والطحاوي في مشكله (4900) والدارقطني (3/ 94)، والبيهقي (7/ 25، 53) كلّهم من طريق سليمان بن كثير، عن عمرو بن دينار عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.

وقال ابن الملقن في الدر المنير (8/ 409):"رواية ابن ماجة على شرط الشّيخين". وقال في التنقيح (4/ 481):"وإسناده جيد، لكن رُوي مرسلًا".

وقال الحافظ ابن حجر في بلوغ المرام (1001) إسناده قويّ، وسكت في تعليقه على المشكاة (3408) فيكون حسنا كما صرَّح به في المقدمة: ما سكت عليه فهو حسن.

قلت: ظاهر إسناده حسن فإن سلمان بن كثير مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في غير الزّهريّ، وهذا ليس من حديث الزهري. وتابعه الحسن بن عمارة وإسماعيل بن مسلم كما قال البيهقيّ، ومن طريقهما رواه الدَّارقطنيّ في سننه (3/ 93 - 94).

وأمّا المرسل: فرواه أبو داود (4539) من وجهين من حديث حمّاد وسفيان كلاهما عن عمرو، عن طاوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث نحوه.

وأشار إليه البيهقيّ بقوله: رواه حمّاد بن زيد في آخرين عن عمرو، عن طاوس مرسلًا. وقد صحَّ الدَّارقطنيّ في العلل (11/ 35 - 36) الإرسال.

ومما لا شك فيه أن سفيان أقوى وأثبت من سليمان بن كثير ولكن قال الطحاويّ:"إنَّ سفيان قد كان يحدث به هكذا بآخره، وقد كان يحدث به قبل ذلك كما حدّث به سليمان بن كثير، ولو اختلفا لكان سليمان مقبول الرواية، ثبتا فيها ممن لو روى حديثًا فتفرد به لكان مقبولًا منه، وإذا كان كذلك كان فيما زاده على غيره في حديث مقبولة زيادتُه فيه عليه". انتهى.

قلت: علاوة على ذلك فإن سليمان بن كثير لم ينفرد بوصلة كما سبق.

وأمّا معنى الحديث في قوله:"من قتل عمدًا فهو قود". أي أن الواجب هو القود، ولكن إذا
تنازل أولياء المقتول عن القود فلهم ذلك إما العفو وإما الدية، فلا تعارض بين القود وقبول الدية. وقوله:"لا يقبل منه صرف" أي توبة.

وقوله:"ولا عدل" أي فدية.

وفي الباب ما رُوي عن زيد بن ضُميرة قال: حَدَّثَنِي أبي وعمي، وكانا شهدا حنينًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالا: صلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم الظهر، ثمّ جلس تحت شجرة، فقام إليه الأقرع بن حابس، وهو سيد خِنْدِف، يردُ عن دم محلم بن جثّامة، وقام عيينة بن حصن يطلب بدم عامر بن الأضبط، وكان أشجعيا، فقال لهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"تقبلون الدية؟" فأبوا، فقام رجل من بني ليث، يقال مُكَيِتل، فقال: يا رسول الله! والله! ما شبّهت هذا القتيل، في غرة الإسلام، إِلَّا كغنم وردت، فرميت فنفر آخرها، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: لكم خمسون في سفرنا، وخمسون إذا رجعنا" فقبلوا الدية.

رواه ابن ماجة (2625) واللّفظ له، وأبو داود (4503) وابن الجارود (777) وعبد الله بن أحمد في مسند أبيه (21081) والبيهقي (9/ 116) كلّهم من حديث محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي محمد بن جعفر، عن زيد بن ضُميرة فذكروه مطوَّلًا وقال فيهم: إن أباه وجَدَّه شهدا حنينًا.

زيد بن ضُميرة ويقال: زياد بن سعد بن ضُميرة، ويقال: زياد بن ضُميرة بن سعد لم يرو عنه غير محمد بن جعفر، ولم يوثقه غير ابن حبَّان ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة. ولم أقف على ذلك. وقد اختلف في إسناده أيضًا. فرواه أبو داود عن وهب بن بيان وأحمد بن سعيد الهمدانيّ، قالا: حَدَّثَنَا ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن أبي الزّناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن محمد بن جعفر أنه سمع زياد بن سعد بن ضُميرة السلمي يُحدث عروة بن الزُّبير، عن أبيه. ولم يذكر فيه"وعن جده" ومن طريقه رواه البيهقيّ.

فمرة يحكي القصة عن أبيه وعمه الذين شهدا حنينًا، وأخرى عن أبيه وجده، وثالثة عن أبيه وحده.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি বিশৃঙ্খল অবস্থার (আম্মিয়্যাহ) কারণে অথবা গোত্রীয় গোঁড়ামির (আসাবিয়্যাহ) কারণে পাথর, চাবুক বা লাঠি দ্বারা নিহত হয়, তার (হত্যাকারীর) উপর অনিচ্ছাকৃত হত্যার দিয়াত (ক্ষতিপূরণ) ওয়াজিব হবে। আর যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে (কাউকে) হত্যা করে, তার ক্ষেত্রে কিসাস (প্রতিশোধমূলক শাস্তি) প্রযোজ্য। আর যে ব্যক্তি তার (কিসাসপ্রাপ্ত ব্যক্তির) এবং তার (কিসাসের) মাঝে বাধা সৃষ্টি করে, তার উপর আল্লাহ, ফিরিশতাগণ এবং সমস্ত মানুষের লানত (অভিসম্পাত)। তার পক্ষ থেকে কোনো তওবা (সর্ফ) বা মুক্তিপণ (আদল) কবুল করা হবে না।”

এবং অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: “যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করে, তার হাতেই কিসাস (প্রতিফল) কার্যকর হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6712)


6712 - عن جابر بن عبد الله يقول: كتب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على كل بطن عقوله.

صحيح: رواه مسلم في العنق (1507) عن محمد بن رافع، ثنا عبد الرزّاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزُّبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.

والعقول: الديات، واحدها عقل كفلس وفلوس.

ومعناه: أن الدية في قتل الخطأ وعمد الخطأ تجب على العاقلة. وهم العصبات. سواء الآباء والأبناء، وإن علوا أو سفلوا.

والبطن دون القبيلة، والفخذ دون البطن.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রত্যেক গোত্র (বতন)-এর উপর তাদের দিয়ত (রক্তমূল্য) ধার্য করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6713)


6713 - عن أبي هريرة أن امرأتين من هذيل رمت إحداهما الأخرى، فطرحتْ جنينها، فقضى فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم بغرة عبد أو وليدة.

متفق عليه: رواه مالك في العقول (5) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الديات (6904)، ومسلم في القمامة (1681) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

والغرة: من كل شيء أنفسه، والمراد من الحديث: النسمة في الرقيق ذكرًا كان أو أنثى، يكون ثمنها نصف عشر الدية. ومن أهل العلم ممن حملوا الحديث على الظاهر فقالوا: الغرة: عبد أبيض، أو أمة بيضاء، فلا يقبل العبد الأسود، وهو خلاف الإجماع.

وقيل: أصل الغرة: بياض في الوجه، فعبر بذلك عن الجسم كله كإطلاق الرقية على العبد المملوك. وذلك في حالة الجنين ميتا، وإن سقط حيا ثمّ مات، ففيه الدية كاملة.

وقال الترمذيّ (1410) بعد أن أخرج حديث أبي هريرة:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وقال بعضهم: الغرة: عبد، أو أمة، أو خمس مائة درهم، وقال بعضهم: أو فرس أو بغل".

قلت: وهو يشير إلى حديث رواه أبو داود (2579) وأبو عاصم في الديات (172) والدارقطني (3/ 114 - 115) والبيهقي (8/ 115) وصحّحه ابن حبَّان (6022) كلّهم من طريق عيسى بن يونس قال: حَدَّثَنَا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجنين بغرة: عبد أو أمة، أو فرس، أو بغل.

قال أبو داود:"روى هذا الحديث حمّاد بن سلمة وخالد بن عبد الله عن محمد بن عمرو، لم يذكرا: أو فرس أو بغل".

قال الخطّابي في معالمه:"يقال: إن عيسى بن يونس قد وهم فيه، وهو يغلط أحيانًا فيما يرويه،
إِلَّا أنه قد رُوي عن طاوس ومجاهد وعروة بن الزُّبير أنهم قالوا: الغرة: عبد أو أمة أو فرس.

ويُشبه أن يكون الأصل عندهم فيما ذهبوا إليه حديث أبي هريرة هذا، وقال: وأمّا البغل فأمره أعجب، ويحتمل أن تكون هذه الزيادة إنّما جاءت من قبل بعض الرواة على سبيل القيمة إذا عدمت الغرة من الرقاب". والله أعلم.

وكذا قال البغوي (10/ 209) بأن عيسى بن يونس وهم فيه، وقد رواه حمّاد وخالد الواسطي عن محمد بن عمرو ولم يذكرا الفرس والبغل.

وقال البيهقيّ: ذكر الفرس في المرفوع وهم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুজাইল গোত্রের দুজন মহিলার মধ্যে একজন অন্যজনকে আঘাত করল, যার ফলে আঘাতপ্রাপ্ত মহিলাটি তার গর্ভের সন্তান নষ্ট করে ফেলল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বিষয়ে ফায়সালা দিলেন যে, এর ক্ষতিপূরণ হবে একজন গোলাম বা বাঁদির 'গুররাহ'।









আল-জামি` আল-কামিল (6714)


6714 - عن أبي هريرة قال: اقتلت امرأتان من هذيل، فرمت إحداهما الأخرى بحجر فقتلتها وما في بطنها، فاختصموا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن دية جنينها غرة عبدٍ أو وليدةٍ، وقضى بدية المرأة على عاقلتها، وورّثها ولدَها ومن معهم.

فقال حمل بن النابغة الهذلي: يا رسول الله، كيف أغرم من لا شرب ولا أكل، ولا نطق ولا استهل؟ فمثل ذلك يُطلّ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّما هذا من إخوان الكهّان" من أجل سجعه الذي سجع.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الديات (6910) ومسلم في القسامة (36: 1681) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن ابن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة رضي الله عنه قال فذكره، واللّفظ لمسلم. وليس عند البخاريّ قال حمل بن النابغة ولا قوله:"وورّثها ولدها ومن معهم".

قوله:"على عاقلته": عاقلة الرّجل: قراباته من قبل الأب وهم عصبته وفيه أن الولد ليس من العاقلة، وأن العاقلة لا ترث إِلَّا ما فضل عن أصحاب الفروض.

قوله:"يطلّ": أي يهدر ولا يضمن.

وفيه دليل على أن دية شبه العمد على العاقلة بخلاف دية العمد فإنها هي على الجاني في ماله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুযাইল গোত্রের দুজন মহিলা ঝগড়া করেছিল। তাদের একজন অন্যজনকে পাথর ছুঁড়ে আঘাত করল, ফলে সে মারা গেল এবং তার গর্ভের সন্তানটিও মারা গেল। তখন তারা বিষয়টি নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বিচার প্রার্থনা করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা দিলেন যে, গর্ভের সন্তানের দিয়ত (রক্তপণ) হলো একটি দাস অথবা দাসী, এবং মহিলাটির দিয়ত তার ‘আক্বিলাহ (রক্তপণ দানে দায়িত্বশীল গোত্রের পুরুষ সদস্য)-এর উপর নির্ধারণ করলেন এবং তার সম্পত্তি তার সন্তান ও তাদের সাথে যারা আছে, তাদের মধ্যে বন্টন করলেন।

তখন হামল ইবনু আন-নাবিগাহ আল-হুযালী (নামক ব্যক্তি) বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমি এমন ব্যক্তির দিয়ত কীভাবে দেব যে পান করেনি, খায়নি, কথা বলেনি এবং যার কান্না শোনা যায়নি (অর্থাৎ মৃত জন্ম নিয়েছে)? এমন দিয়ত বাতিল হওয়াই উচিত।’

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এই ব্যক্তি তো গণকদের ভাইদের অন্তর্ভুক্ত।”—তার এই ছন্দবদ্ধ কথা বলার কারণে।









আল-জামি` আল-কামিল (6715)


6715 - عن المغيرة بن شعبة، عن عمر رضي الله عنه أنه استشارهم في إملاص المرأة للمرأة؟ فقال المغيرة: قضى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالغرة عبد أو أمة. قال: أنت من يشهد معك. فشهد محمد بن مسلمة أنه شهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قضى به.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الديات (6905 - 6908) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا وُهيب، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة، به، وعن عبيد الله بن موسى، عن هشام، عن أبيه، أن عمر نشد الناس … الحديث.

ومن طريق زائدة، حَدَّثَنَا هشام بن عروة، عن أبيه أنه سمع المغيرة بن شعبة يحدّث عن عمر.

فتبين بهذا الطريق أن عروة بن الزُّبير إنّما سمعه من المغيرة بن شعبة بلا واسطة. ولكن رواه
مسلم في القسامة (1689) من طرق عن وكيع، عن هشام ابن عروة، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة، قال: استشار عمر بن الخطّاب الناس في مِلاص المرأة فقال المغيرة … الحديث.

والمسور بن مخرمة صحابي صغير، وقد سمع منه عروة بن الزُّبير أحاديث، فيجوز أن يكون لعروة في هذا الحديث شيخان.

وأمّا الحافظ الدَّارقطنيّ في كتابه"التتبع" (85) فتعقب فيه مسلمًا ووهم وكيعًا لمخالفته أصحاب هشام فلم يذكروا (المسور) قال: وهو الصواب".




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নারীদের পরস্পরের মধ্যে ভ্রূণ হত্যা (ইমলাস) [এর দণ্ড] সম্পর্কে তাদের সাথে পরামর্শ করলেন। তখন মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর ফায়সালা দিয়েছেন যে, এর (ক্ষতিপূরণ) হলো একটি দাস অথবা দাসী (গুররাহ)। তিনি (উমার) বললেন: তোমার সাথে কে সাক্ষী আছে? তখন মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাক্ষ্য দিলেন যে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এর ফায়সালা দিতে দেখেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6716)


6716 - عن المغيرة بن شعبة قال: ضربت امرأة ضرّتها بعمود فُسطاط وهي حبلى، فقتلتها قال: وإحداهما لِحْيانية. قال: فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم دية المقتولة على عصبة القاتلة. وغرةً لما في بطنها. فقال رجل من عصبة القاتلة: أنغرم دية من لا أكل ولا شرب ولا استهل؟ فمثل ذلك يطلّ! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أسجع كسجع الأعراب؟ !" قال: وجعل عليهم الدية.

صحيح: رواه مسلم في القسامة (37: 1682) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظليّ، أخبرنا جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن عُبيد بن نضيلة الخزاعيّ، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক মহিলা তার সতীনের উপর তাঁবুর খুঁটি দিয়ে আঘাত করলো, যখন সে গর্ভবতী ছিল, ফলে তাকে হত্যা করে ফেলল। বর্ণনাকারী বলেন: তাদের একজন ছিল লিহইয়ান গোত্রের। তিনি (মুগীরাহ) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিহত মহিলার রক্তপণ হত্যাকারী মহিলার আসাবাহ (পুরুষ আত্মীয়স্বজন)-এর উপর ধার্য করলেন এবং তার পেটের সন্তানের জন্য একটি ‘গুররাহ’ (ক্রীতদাস বা দাসী) ধার্য করলেন। তখন হত্যাকারীর আসাবাহদের মধ্য থেকে একজন লোক বলল: আমরা কি এমন ব্যক্তির রক্তপণ দেব যে না খেয়েছে, না পান করেছে এবং না চিৎকার (জন্মের পর) করেছে? এমন ক্ষেত্রে তো রক্তপণ বাতিল হয়ে যাওয়া উচিত! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "এ কি তুমি বেদুঈনদের মতো মিলযুক্ত ছন্দের কথা বলছ?!" বর্ণনাকারী বলেন: এবং তিনি তাদের ওপর রক্তপণ ধার্য করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6717)


6717 - عن أسامة بن عمير الهذلي. وكان قد صحب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: كانت فينا امرأتان، فضربت إحداهما الأخرى بعمود، فقتلتها، وقتلت ما في بطنها، فقضى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في المرأة بالدية، وقضى بدية الغرة لزوجها، وقضى بالعقل على عصبة القاتلة، وقضى في الجنين بغرة عبد، أو أمة.

صحيح: رواه ابن أبي عاصم في الديات (171) والطحاوي في مشكله (4521) والطَّبرانيّ في الكبير (1/ 160) وعنه الضياء في المختارة (1416) كلّهم من طرق عن سفيان بن عينة، عن أيوب السختيانيّ، قال: سمعت أبا المليح الهذلي بن أسامة، عن أبيه فذكره واللّفظ لأبي عاصم مثله عند الطحاويّ. وإسناده صحيح.

وأمّا ما روي بزيادة: أو خمس مائة درهم، أو فرس، أو عشرون ومائة شاة فهو ضعيف.

رواه الطبرانيّ في الكبير (1/ 160) والبزّار في كشف الأستار - (1523) ولم يذكر لفظه كاملًا، والطحاوي في مشكله (4528) وأبو عاصم في الديات (174) كلّهم من حديث المنهال بن خليفة، عن سلمة بن تمام، عن أبي المليح عن أبيه فذكره.

وفي سياقه قصة أخي الضاربة. فإنه انطلق بالضاربة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يقال له: عمران بن عويمر، فلمّا قصوا على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قصتها قال:"دوه" فقال عمران: يا نبي الله، أندي من لا أكل، ولا شرب، ولا صاح فاستهل، مثل هذا يطل؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دعني من رجز الأعراب، فيه
غرة عبد أو أمة أو خمس مائة، أو فرس، أو عشرون ومائة شاة، فقال: يا نبي الله! إن لها ابنان هما سادة الحي وهم أحق أن يعقلوا عن أمهم. قال:"أنت أحق أن تعقل عن أختك من ولدها" قال: ما لي شيء أعقل فيه، قال:"يا حمل بن مالك" وهو يومئذ على صدقات هذيل، وهو زوج المرأتين، وأبو الجنين المقتول: اقبض من تحت يدك من صدقات هذيل عشرين ومائة شاة" ففعل.

وفي إسناده المنهال بن خليفة قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 300) رواه الطبرانيّ، والبزّار باختصار كثير، والمنهال بن خليفة وتقه أبو حاتم، وضعّفه جماعة، وبقية رجاله ثقات.

قلت: كذا نقل عن أبي حاتم، والصواب أنه قال: صالح يكتب حديثه وقال البزّار: ثقة، وتكلم فيه البخاريّ والنسائي وابن حبَّان وأبو أحمد الحاكم وغيرهم، وجعله الحافظ في مرتبة"ضعيف" وسلمة بن تمام ضعَّفه أحمد والنسائي.

وأمّا البزّار فلم يذكر لفظه كاملًا بل اكتفى بقوله: بغرة عبد أو أمة وقال: لا نعلمه يُروى عن أبي المليح إِلَّا من هذا الوجه وإسناده حسن".

وهذا ليس بصحيح، فقد ثبت أنه رواه أيوب عن أبي المليح، والمنهال كما قلت ضعَّفه الجماعة.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس، عن عمر بن الخطّاب أنه نشد الناس قضاء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في ذلك - يعني في الجنين.

وجاء فيه: فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجنين بغرة عبد، وأن تقتل بها. فهو شاذ. رواه أبو داود (4572) وابن ماجة (2641) والنسائي (4739) وأبو عاصم في الديات (167) والدارقطني (3/ 117) والبيهقي (8/ 114) وأحمد (16729) وصحّحه ابن حبَّان (6021) كلّهم من حديث ابن جريج، قال: حَدَّثَنِي عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.

ورواه أحمد (3439) من هذا الوجه وفيه: قلت لعمرو بن دينار: أخبرني ابن طاوس، عن أبيه كذا وكذا (أي لم يذكر فيه تقتل المرأة) فقال: لقد شككتني.

ورواية ابن جريج عن ابن طاوس، عن أبيه أخرجه عبد الرزّاق (18342) وجاء فيه: ذكر لعمر بن الخطّاب قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك. فأرسل إلى زوج المرأتين. فأخبره: إنّما ضربت إحدى امرأتيه الأخرى بعمود البيت. فقتلتها وذا بطنها، فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم بديتها وغرة في جنينها. فكبّر عمر وقال: كدنا نقضي في مثل هذا برأينا.

قال البيهقيّ بعد سرد رواية عمرو بن دينار السابقة: كذا قال:"أن تقتل بها" يعني المرأة القاتلة، ثمّ شك عمرو بن دينار. والمحفوظ أنه قضى بديتها على عاقلة القاتلة.

وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس في صفة الجنين الذي قضى فيه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"قد نبتت ثنيّتاه، ونبت شعره" قال: فقال أبو القاتلة: والله ما أكل، ولا شرب ولا استهل، فمثل ذلك يطل. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أسجع الجاهليّة وكهانتها؟ أدّ الغرة".
قال ابن عباس:"اسم إحداهما مليكة، والأخرى: أم عفيف".

رواه أبو داود (4574) والنسائي (4828) وأبو عاصم في الديات (168) وصحّحه ابن حبَّان (6019) كلّهم من طريق عمرو بن طلحة، نا أسباط بن نصر، عن سماك بن حرب، عن ابن عباس فذكره.

وأسباط بن نصر ضعَّفه النسائيّ وابن معين في رواية.

وقال الساجي:"روى أحاديث لا يتابع عليها عن سماك بن حرب".

وفي الباب ما رُوي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في عقل الجنين إذا كان في بطن أمه بغرة عبد أو أمة. فقضى بذلك في امرأة حمل بن مالك بن النابغة الهذلي.

رواه الإمام أحمد (7026) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبي، عن ابن إسحاق، قال: ذكر عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

وابن إسحاق لم يسمع هذا الحديث من عمرو بن شعيب.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر أن امرأتين من هذيل قتلت إحداهما الأخرى، ولكل واحدة منها زوج وولد، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم دية المقتول على عائلة القاتلة، وبرّأ زوجها وولدها.

قال: فقال عاقلة المقتول: ميراثها لنا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا، ميراثها لزوجها ولولدها".

قال: وكانت حُبلى فقالت عائلة المقتولة: إنها كانت حبلى، وألقت جنينًا.

قال: فخاف عائلة القاتلة أن يُضمّنهم.

قال: فقالوا: يا رسول الله! لا شرب، ولا أكل، ولا صاح فاستهل. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أشجع الجاهليّة؟" فقضى في الجنين غرّة: عبدًا أو أمة.

رواه أحمد (1823) واللّفظ له، وأبو داود (4575) وابن ماجة (2648) وأبو يعلى (1823) كلّهم من حديث عبد الواحد بن زياد، حَدَّثَنَا مجالد بن سعيد، حَدَّثَنِي الشعبي، عن جابر فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل مجالد بن سعيد بن عمير الهمداني ضعَّفه جمهور أهل العلم، إِلَّا أن البخاريّ كان حسن الرأي فيه.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن بريدة أن امرأة خذفت امرأة، فأسقطتْ فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم في ولدها خمسين شاة ونهي يومئذ عن الخذف.

رواه النسائيّ (4813) وأبو داود (4578) والبيهقي (8/ 115) وأبو عاصم في الديات (173) كلّهم من حديث عبد الله بن موسى، عن يوسف بن صُهَيب، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره واللّفظ للنسائي.

ولفظ أبي داود: فجعل في ولدها خمس مائة شاة وكذا عند أبي عاصم أيضًا.

قال أبو داود:"كذا الحديث."خمس مائة شاة" والصواب: مائة شاة.

قال أبو داود: هكذا قال عباس (وهو عباس بن عبد العظيم شيخ أبي داود، عن عبيد الله بن
موسى) وهو وهم. انتهى. وقال النسائيّ:"أرسله أبو نعيم".

ثمّ رواه من حديث أبي نعيم، حَدَّثَنَا يوسف بن صُهيب، قال: حَدَّثَنِي عبد الله بن بريدة أن امرأة خذفتْ امرأة، فأسقطت المخذوفة فرفع ذلك إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فجعل عقل ولدها خمس مائة من الغر، ونهى يومئذ عن الخذف.

قال النسائيّ:"هذا وهم، وينبغي أن يكون أراد مائة من الغرّ".




উসামা ইবনু উমায়র আল-হুযালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছিলেন, তিনি বলেন, আমাদের মাঝে দুজন নারী ছিল। তাদের একজন অপরজনকে একটি লাঠি দিয়ে আঘাত করল, ফলে তাকে হত্যা করল এবং তার পেটে যা ছিল (ভ্রূণ), তাকেও হত্যা করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিহত নারীর জন্য দিয়াতের (রক্তপণ) ফায়সালা দিলেন, এবং তার স্বামীর জন্য দিয়াতুল গুরাহর (রক্তপণ) ফায়সালা দিলেন। আর হত্যাকারী নারীর নিকটাত্মীয় পুরুষদের ('আসিবা) উপর দিয়াত পরিশোধের দায়িত্ব (আক্বল) ধার্য করলেন, এবং ভ্রূণের জন্য একটি গোলাম অথবা বাঁদী (গুররাহ্) ফায়সালা দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6718)


6718 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يعقل المرأة عصبتها من كانوا، ولا يرثون منها شيئًا إِلَّا ما فَضل عن ورثتها، وإن قُتلت فعقلها بين ورثتها، فهم يقتلون قاتلها.

حسن: رواه ابن ماجة (2647) عن إسحاق بن منصور، قال: أنبأنا يزيد بن هارون، قال: أخبرنا محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করেছেন যে, মহিলার দিয়ত (রক্তমূল্য) বহন করবে তার আসাবাগণ (পিতা ও পুরুষ আত্মীয়), তারা যেই হোক না কেন। কিন্তু তারা তার (সম্পত্তির) কিছুই উত্তরাধিকারসূত্রে পাবে না, কেবল তার অন্যান্য ওয়ারিশদের প্রাপ্য দেওয়ার পর যা উদ্বৃত্ত থাকে, তা ছাড়া। আর যদি সে (মহিলা) নিহত হয়, তবে তার দিয়ত তার ওয়ারিশদের মধ্যে বণ্টিত হবে। সুতরাং, তারাই তার হত্যাকারীকে হত্যা করবে (কিসাস কার্যকর করবে)।









আল-জামি` আল-কামিল (6719)


6719 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوم دية الخطأ على أهل القرى أربع مئة دينار أو عدلها من الورق. ويقوّمها على أثمان الإبل، فإذا غلت رفع في قيمتها، وإذا هاجت رخصًا نقص من قيمتها، وبلغت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ما بين أربع مئة دينار إلى ثمان مئة دينار، أو عدلها من الورق ثمانية آلاف درهم.

قال: وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم على أهل البقر مئتي بقرة.

ومن كان دية عقله في الشاء فألفي شاة.

قال: وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن العقل ميراث بين ورثة القتيل على قرابتهم، فما فضل فللعصبة.

قال: وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأنف إذا جدع الدية كاملة، وإن جدعت ثندوته فنصف العقل: خمسون من الإبل أو عدلها من الذهب أو الورق، أو مئة بقرة أو ألف شاة.

وفي اليد إذا قطعت نصف العقل.

وفي الرّجل نصف العقل.

وفي المأمومة ثلث العقل: ثلاث وثلاثون من الإبل وثلث، أو قيمتها من الذهب أو الورق أو البقر أو الشاء. والجائفة مثل ذلك.

وفي الأصابع في كل إصبع عشر من الإبل.

وفي الأسنان في كل سن خمس من الإبل.

وقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن عقل المرأة بين عصبتها من كانوا: لا يرثون منها شيئًا إِلَّا
ما فضل عن ورثتها، وإن قتلت فعقلها بين ورثتها، وهم يقتلون قاتلهم.

وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس للقاتل شيء، وإن لم يكن له وارث فوارثه أقرب الناس إليه، ولا يرث القاتل شيئًا".

قال محمد: هذا كله حَدَّثَنِي به سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.

قال أبو داود: محمد بن راشد من أهل دمشق هرب إلى البصرة من القتل.

حسن: رواه أبو داود (4564) والبيهقي (6/ 220) كلاهما من حديث شيبان بن فروخ، ثنا محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره واللّفظ لأبي داود. واكتفى البيهقيّ بذكر"ليس للقاتل ميراث".

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث وكذلك محمد بن راشد وهو المكحولي الشّاميّ وشيخه سليمان بن موسى الأموي الدّمشقيّ حسنا الحديث.

قال البيهقيّ:"رواه جماعة عن إسماعيل بن عَيَّاش، وقيل عنه عن يحيى بن سعيد وابن جريج والمثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب عن أبيه، عن جده، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثله.

وقوله:"القاتل لا يرث" له شواهد انظر: كتاب الفرائض.

وأمّا بقية فقرات الحديث فلكل منها شواهد مذكورة في أبوابها.

والمأمومة: ما كان الجراح في الرأس، وهي ما بلغت أم الدماغ.

والجائفة: هي الطعنة التي تبلغ الجوف.

وقيل: التي تصل الجوف من بطن، أو ظهر، أو ثغرة نحر، أو كيف كان. وفيها ثلث الدية كما في الحديث.

قال الخطّابي:"وهو قول عامة أهل العلم، فإن نفذت الجائفة حتَّى خرجت من الجانب الآخر فإن فيها ثلثي الدية، لأنها حينئذ جائفتان". انتهى قوله.

ومن الجراحات أيضًا التي تجب فيها الدية دون القصاص الدامية الخارمة، والباضعة، والملاحقة، والسمحاق، والهاشمة، والموضحة، والمنقلة، وجاء ذكر بعضها في كتاب عمرو بن حزم.

قال ابن شهاب: قد قرأت كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي كتبه لعمرو بن حزم حين بعثه على نجران، وكان الكتاب عند أبي بكر بن حزم وجاء فيه:

"هذا بيان من الله ورسوله {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ} [المائدة: 1] فكتب الآية حتَّى بلغ {إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ (4)} [المائدة: 4] ثمّ كتب:"هذا كتاب الجراح. في النفس مائة من الإبل، وفي الأنف إذا أوعى جذعه مائة من الإبل، وفي العين خمسون من الإبل، وفي اليد خمسون من الإبل، وفي
الرّجل خمسون من الإبل، وفي كل إصبع مما هنالك عشر من الإبل، وفي المأمومة ثلث النفس، وفي الجائفة ثلث النفس، وفي المقلة خمس عشر، وفي الواضحة خمس من الإبل، وفي السن خمس من الإبل.

رواه البيهقيّ (8/ 80 - 81) وهو مرسل، ولكن اشتهر هذا الكتاب بين أهل العلم، فتلقوه بالقبول، واعتمدوا عليه، ومضى ذكره في كتاب الزّكاة.

وهذا مما لا خلاف فيه أنه لا قصاص في الجراحات والشجاج، وإنما القصاص في كسر أو جرح. كما روى ذلك عدد من فقهاء أهل المدينة. لأن القصاص يقتضي المماثلة لقوله تعالى: {وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِهِ} [النحل: 126] {فَمَنِ اعْتَدَى عَلَيْكُمْ فَاعْتَدُوا عَلَيْهِ بِمِثْلِ مَا اعْتَدَى عَلَيْكُمْ} [البقرة: 194] ولا تحقق المماثلة إِلَّا إذا توفر فيه ثلاثة شروط:

1 - التماثل في الفعل.

2 - التماثل في المحل.

3 - التماثل في المنفعة.

وهذه الشروط لا تتوفر في الجراحات المذكورة، انظر للمزيد"المنة الكبرى" (7/ 92) باب جماع الديات فيما دون النفس.

وأمّا ما روي: لا قود في المأمومة والجائفة والمنقلة وغيرها فأسانيدها كلها ضعيفة.

منها ما رُوي عن العباس بن عبد المطلب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا قود في المأمومة، ولا الجائفة، ولا المنقلة".

رواه ابن ماجة (2637) وأبو يعلى (6700) وعنه البيهقيّ (8/ 65) عن أبي كريب، ثنا رشدين بن سعد، عن معاوية بن صالح، عن معاذ بن محمد الأنصاريّ، عن ابن صُهبان، عن العباس فذكره.

وفيه رشدين بن سعد ضعيف، وابن صُهبان"مجهول".

ورواه أبو عاصم في الديات (162) من حديث بشر بن عمر، عن ابن لهيعة، نا معاذ بن محمد الأنصاري فذكره. وابن لهيعة فيه كلام معروف.

وكذلك لا يصح ما روي نمران بن جارية، عن أبيه، أن رجلًا ضرب رجلًا بالسيف على ساعده فقطعها من غير مفصل، فاستعدى عليه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأمر له بالدية، فقال: يا رسول الله! أريد القصاص. قال له:"خذ الدية بارك الله فيها" ولم يقض له بالقصاص.

رواه ابن ماجة (2636) وفيه دهشم بن قُرّان ضعيف باتفاق أهل العلم. وقال ابن الجنيد: متروك. وشيخه نمران بن جارية"مجهول".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن يحيى وعيسى ابني طلحة، أو أحدهما عن طلحة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس في المأمومة قود".

رواه البيهقيّ (8/ 65) وفي أسانيده من لا يعرف. وقال: هذه الأسانيد لا تثبت.




আবদুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম গ্রামবাসীর ওপর অনিচ্ছাকৃত হত্যার দিয়াত (রক্তপণ) নির্ধারণ করেছিলেন চারশো (৪০০) দীনার, অথবা এর সমমূল্যের রৌপ্য (ওয়ারাক)।

তিনি এর মূল্য উটের দামের ওপরও নির্ধারণ করতেন। যখন উটের দাম বেড়ে যেত, তখন এর মূল্যও বাড়িয়ে দিতেন। আর যখন উটের দাম কমে যেত, তখন এর মূল্যও কমিয়ে দিতেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে (দিয়াত) চারশো (৪০০) দীনার থেকে আটশো (৮০০) দীনারের মধ্যে ছিল, অথবা এর সমমূল্যের রৌপ্য আট হাজার (৮,০০০) দিরহাম ছিল।

তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গরুর মালিকদের জন্য (দিয়াত) হিসেবে দুইশো (২০০) গরু ধার্য করেছিলেন।

আর যার দিয়াত ভেড়ার মাধ্যমে (পরিশোধ করার কথা ছিল), তার জন্য দুই হাজার (২,০০০) ভেড়া ধার্য করা হয়েছিল।

তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করেছেন যে, দিয়াত (রক্তপণ) নিহত ব্যক্তির ওয়ারিশদের মধ্যে তাদের আত্মীয়তার ভিত্তিতে বণ্টিত হবে। এরপর যা অবশিষ্ট থাকবে, তা আসাবারা (নিহত ব্যক্তির পুরুষ আত্মীয় যারা সম্পত্তি লাভ করে) পাবে।

তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এও ফায়সালা করেছেন যে, যদি কারো নাক সম্পূর্ণ কেটে ফেলা হয়, তবে পূর্ণ দিয়াত দিতে হবে। আর যদি নাকের ডগা কেটে ফেলা হয়, তবে অর্ধ দিয়াত দিতে হবে: যা হলো পঞ্চাশ (৫০)টি উট, অথবা এর সমমূল্যের স্বর্ণ বা রৌপ্য, অথবা একশো (১০০) গরু, অথবা এক হাজার (১,০০০) ভেড়া।

যদি হাত কেটে ফেলা হয়, তবে অর্ধ দিয়াত। আর যদি পা কেটে ফেলা হয়, তবে অর্ধ দিয়াত।

আর 'মামূমাহ' (মগজের চামড়া ভেদ করে ভেতরের দিকে পৌঁছানো আঘাত)-এর জন্য দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ (১/৩): তেত্রিশ (৩৩)টি উট এবং এক-তৃতীয়াংশ, অথবা এর সমমূল্যের স্বর্ণ, রৌপ্য, গরু অথবা ভেড়া। 'জা-ইফাহ' (পেট বা শরীরের গহ্বরে পৌঁছানো আঘাত)-এর ক্ষেত্রেও অনুরূপ।

আঙুলের ক্ষেত্রে, প্রতি আঙুলে দশ (১০)টি উট। আর দাঁতের ক্ষেত্রে, প্রতি দাঁতে পাঁচটি (৫) উট।

আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা করেছেন যে, নারীর দিয়াত (রক্তপণ) তার আসাবাদের (পুরুষ আত্মীয়) মধ্যে বণ্টিত হবে, তারা (আসাবা) তার কাছ থেকে কিছুই উত্তরাধিকার সূত্রে পাবে না, তবে তার ওয়ারিশদের ভাগ দেওয়ার পর যা অবশিষ্ট থাকে (তা পাবে)। আর যদি নারীকে হত্যা করা হয়, তবে তার দিয়াত তার ওয়ারিশদের মধ্যে বণ্টিত হবে এবং তারাই তাদের হত্যাকারীকে হত্যা (বদলা) করতে পারবে।

আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হত্যাকারীর জন্য (দিয়াতের) কোনো অংশ নেই। যদি নিহত ব্যক্তির কোনো ওয়ারিশ না থাকে, তবে তার ওয়ারিশ হবে তার নিকটতম ব্যক্তি, আর হত্যাকারী কিছুই উত্তরাধিকার সূত্রে পাবে না।"

মুহাম্মাদ (রাবী) বলেন: এই সবকিছুই সুলায়মান ইবনু মূসা আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি আমর ইবনু শুআইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6720)


6720 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في العين العوراء السادة لمكانها إذا طُمست بثلث دينها. وفي اليد الشلّاء إذا قطعت بثلث ديتها، وفي السن السوداء إذا نُزعت بثلث ديتها.

حسن: رواه النسائيّ (4840) وأبو داود (4567) كلاهما من حديث الهيثم بن حميد، حَدَّثَنَا العلاء بن الحارث، حَدَّثَنِي عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، والراوي عنه العلاء بن الحارث بن الوارث الحضرمي الدّمشقيّ ثقة، وثَّقه جمهور أهل العلم إِلَّا أنه خولط اختلاطا خفيفًا ولذا لم يهتم الأئمة باختلاطه، وأحاديثه قليلة. وبهذا قال الإمام أحمد في إحدى روايتيه، والرّواية الثانية عنده في كل واحدة حكومة. وبه قال الأئمة الآخرون أبو حنيفة ومالك والشافعي.

وفي الموطأ العقول (20) عن زيد بن ثابت: في العين القائمة إذا طفئت مائة دينار. قال مالك:"الأمر عندنا في العين القائمة العوراء إذا طفئت، وفي اليد الشلاء إذا قطعت أنه ليس في ذلك إِلَّا الاجتهاد، وليس في ذلك عقل مسمى".

وقال الشافعي:"قضاء زيد بن ثابت كان اجتهادا منه".




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অন্ধ চোখ সম্পর্কে, যা তার স্থানে বিদ্যমান থাকা সত্ত্বেও নষ্ট হয়ে যায়, তার ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ নির্ধারণ করেছেন। আর পক্ষাঘাতগ্রস্ত (অবশ) হাত যদি কেটে ফেলা হয়, তবে এর ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ এবং কালো (ক্ষয়প্রাপ্ত) দাঁত যদি উপড়ে ফেলা হয়, তবে এর ক্ষতিপূরণও পূর্ণ দিয়াতের এক-তৃতীয়াংশ নির্ধারণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6721)


6721 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النَّبِيّ قال:"في المواضع خمس".

حسن: رواه أبو داود (4566) والتِّرمذيّ (1390) والنسائي (4852) وابن ماجة (2655) والبيهقي (8/ 81) وابن الجارود (785) وأبو عاصم في الديات (157) كلّهم من طريق حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب به مثله.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.

وكذا حسّنه أيضًا الترمذيّ وقال:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق أن في الموضحة خمسًا من الإبل". انتهى.

والموضحة هو الشجة التي توضح العظم أي تظهره.

وهي الغالب ما تكون في الوجه والرأس ففيها خمس من الإبل.

والموضحة في غير الوجه والرأس ففيها حكومة.

وفي كلام الفقهاء تفاصيل كثيرة في أنواع الشجاجات وتحديد موضع الموضحة، هل تكون في الوجه والرأس دون سائر الجسد، أو هي شاملة لجميع الجسم؟ راجع تفاصيل ذلك في كتب الفقه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাওদি'আহ-এর (অর্থাৎ, যে আঘাতের ফলে হাড় উন্মুক্ত হয় তার) দিয়াত হলো পাঁচটি (উট)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6722)


6722 - عن ابن عباس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"هذه وهذه سواء"، يعني الخنصر والإبهام.

صحيح: رواه البخاريّ في الديات (6895) عن آدم، حَدَّثَنَا شعبة، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه أبو داود (4559) وابن الجارود (6895) كلاهما من حديث عبد الصمد بن عبد الوارث، حَدَّثَنِي شعبة بإسناده وفيه:"الأصابع سواء، والأسنان سواء، الثنية والضرس سواء، هذه وهذه سواء".

قال أبو داود:"ورواه النضر بن شميل، عن شعبة بمعني عبد الصمد".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই এবং এই উভয়টি সমান।" অর্থাৎ তিনি (তা দ্বারা) কনিষ্ঠা আঙ্গুল (ছোট আঙ্গুল) এবং বৃদ্ধাঙ্গুলকে (বুড়ো আঙ্গুল) বুঝিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6723)


6723 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دية الأصابع اليدين والرجلين سواء. عشرة من الإبل لكل أصبع".

صحيح: رواه الترمذيّ (1391) واللّفظ له، وأبو داود (4560، 4561) والنسائي (4849) وابن الجارود (780) كلّهم من طريق عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

ومنهم من أبهم بقوله: هذه سواء الإبهام والخنصر كما في رواية شعبة عند البخاريّ.

قال الترمذيّ:"والعمل على هذا عند أهل العلم. وبه يقول سفيان والشافعي وأحمد وإسحاق".

وبه كان يفتي ابن عباس، فأرسل مروان إليه فقال: أتُفتي في الأصابع عشر عشر. وقد بلغك عن عمر في الأصابع. فقال ابن عباس: رحم الله عمر، قول رسول الله صلى الله عليه وسلم أحق أن يتبع من قول عمر. أخرجه البيهقيّ (8/ 93) بإسناد صحيح. لأن عمر بن الخطّاب فضي في الإبهام بخمس عشرة، وفي التي تليها بعشر، وفي الوسطى بعشر، وفي اللتي تلي الخنصر بتسع، وفي الخنصر بست. رواه الشافعي عن سفيان وعبد الوهّاب الثقفيّ، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن عمر فذكره. وأخرجه البيهقيّ (8/ 93) من طريق الشافعي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাত ও পায়ের আঙ্গুলের দিয়াত (রক্তমূল্য) সমান। প্রতিটি আঙ্গুলের জন্য দশটি করে উট।"









আল-জামি` আল-কামিল (6724)


6724 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال في خطبته - وهو مسند ظهره إلى الكعبة -"في الأصابع عشر عشر".

حسن: رواه أبو داود (4562) وابن ماجة (2653) والنسائي (4850) واحمد (7013) والدارقطني (3/ 210) كلّهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو فإنه حسن الحديث.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর খুতবায়—যখন তিনি কাবা ঘরের দিকে পিঠ দিয়ে হেলান দিয়েছিলেন—বলেন: "আঙ্গুলসমূহের (দিয়াত) জন্য দশ দশ রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6725)


6725 - عن أبي موسى الأشعريّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الأصابع سواء عشر عشر من الإبل".

حسن: رواه أبو داود (4557) وأحمد (19550) والدارقطني (3/ 211) والبيهقي (8/ 92) والدارمي (2414) وصحّحه ابن حبَّان (6013) كلّهم من حديث شعبة، عن غالب التمَّار، عن مسروق بن أوس، عن أبي موسى فذكره.
قال أبو داود: ورواه محمد بن جعفر، عن شعبة، عن غالب قال: سمعت مسروق بن أوس.

قلت: لأنه رواه غير شعبة فأدخل بين غالب التمار وبين مسروق بن أوس"حميد بن هلال" كما عند أبي داود (4556) والنسائي (4845) وابن ماجة (2654) وأبو عاصم في الديات (152) كلّهم من حديث سعيد بن أبي عروبة عن غالب التمار.

إِلَّا أن الدَّارقطنيّ رجّح في"العلل" (7/ 249) قول شعبة، وتابعه على ذلك ابن علية، وخالد بن يحيى البصريّ، وحنظلة بن أبي صفية، وعلي بن عاصم، كلّهم عن غالب، عن مسروق بن أوس، عن أبي موسى إِلَّا أن شعبة ربما شك فقال: مسروق بن أوس، أو أوس بن مسروق، والصواب قول من قال: مسروق بن أوس.

قلت: وأخرج أحاديث هؤلاء في سننه (3/ 211).

وإسناده حسن من أجل مسروق بن أوس فقد روى عنه جمعٌ، ووثَّقه ابن حبَّان، وكان معروفا غزا في خلافة عمر، قال الحافظ في"التهذيب":"بين المصنف في الأطراف أن الصواب مسروق بن أوس، وأن شعبة روى الحديث مرة بالشك، وعنه أحمد وغيره من رواية شعبة عن غالب سمعت أوس بن مسروق رجلًا منا .... وسنده صحيح".

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عمرو بن حزم مرفوعًا:"وفي كل أصبع من أصابع اليد والرجل عشر من الإبل" وكتاب عمرو بن حزم الذي كتبه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى أهل اليمن وذكر فيه الديات، والفرائض، والسنن، والصدقات كتاب مشهور، يرى ابن عبد البر أن شهرته تُغني عن الإسناد، لأنه أشبه التواتر في مجيئه لتلقي الناس له بالقبول والمعرفة. التمهيد (17/ 338 - 339).

وجمهور أهل العلم أنه لم يرو بإسناد صحيح، وإنما رواه الزهري مرسلًا. راجع تخريجه مفصلا وكلام أهل العلم فيه في"البدر المنير" (8/ 377 - 387).




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আঙুলগুলো (দিয়াতের ক্ষেত্রে) সমান। (প্রত্যেক) আঙুলের জন্য দশ দশটি করে উট (রক্তপণ হিসেবে নির্ধারিত) রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6726)


6726 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأسنان سواء، والأصابع سواء".

صحيح: رواه أبو داود (4560) وأحمد (2624) والبيهقي (8/ 90) كلّهم من حديث عليّ بن الحسن بن شقيق، قال: أخبرنا أبو حمزة، قال: حَدَّثَنَا يزيد النحويّ، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه ابن ماجة (2651) عن إسماعيل بن إبراهيم البالسيّ، قال: حَدَّثَنَا عليّ بن الحسن بن شقيق بإسناده وقال فيه:"قضى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في السن خمسا من الإبل".

وإسماعيل بن إبراهيم ثقة، وإسناده صحيح أيضًا كما قال البوصيري.

وروى مالك في العقول (29) عن داود بن الحصين، عن أبي غطفان بن طريف المريّ، أن مروان بن الحكم بعثه إلى عبد الله بن عباس يسأله ماذا في الضرس فقال: فيه خمس من الإبل.
قال: فردني إليه مروان قال: أتجعل مقدم الفم مثل الأضراس؟ فقال ابن عباس: لو لم تعتبر ذلك إِلَّا بالأصابع، عقلها سواء".

قال مالك: الأمر عندنا أن مقدم الفم والأضراس والأنياب عقلها سواء. وذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في السن خمس من الإبل، والضرس سن من الأسنان، لا يفضل بعضها على بعض". انتهى.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাঁতগুলি (দিয়তের ক্ষেত্রে) সমান এবং আঙ্গুলগুলিও (দিয়তের ক্ষেত্রে) সমান।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাঁতের জন্য পাঁচটি উট (ক্ষতিপূরণ) ধার্য, আর মাড়ির দাঁতও অন্যান্য দাঁতেরই অংশ, যার একটির উপর অপরটির কোনো প্রাধান্য নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (6727)


6727 - عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب يوم فتح مكة، فكبّر ثلاثًا ثمّ قال:"لا إله إِلَّا الله وحده، صدق وعده، ونصر عبده، وهزم الأحزاب وحده، ألا إن كل مأثرةٍ كانت في الجاهليّة تذكر وتُدعى من دم، أو مال تحت قدمَيَّ، إِلَّا ما كان من سقاية الحاج، وسدانة البيت". ثمّ قال:"ألا إن دية الخطأ شبه العمد ما كان بالسوط والعصا مائة من الإبل، منها أربعون في بطونها أولادها".

حسن: رواه أبو داود (4547) وابن ماجة (2627) والدارقطني (3/ 104 - 105) وابن الجارود (773) وصحّحه ابن حبَّان (6011) كلّهم من طرق عن خالد الحذاء، عن القاسم بن ربيعة، عن عقبة بن أوس، عن عبد الله بن عمرو فذكره واللّفظ لأبي داود. واختصره البعض.

وهذا إسناد حسن من أجل عقبة بن أوس الدوسي فإنه حسن الحديث.

ولكن رواه ابن ماجة (2627) والنسائي (4791) وأحمد (6533) كلّهم من حديث شعبة، عن أيوب، سمعت القاسم بن ربيعة يحدث عن عبد الله بن عمرو فذكره مختصرًا.

فأسقط أيوب من الإسناد"عقبة بن أوس".

فلعل القاسم بن ربيعة سمع الحديث من الوجهين، فإن ابن عمرو وعقبة بن أوس، ويقال يعقوب بن أوس من شيوخه وهو ثقة.

وللحديث أسانيد أخرى ذكرها النسائيّ والدارقطني وغيرهما، إِلَّا أن الصَّحيح منها لا يضره

اختلاف الأسانيد كما هو مقرر في أصول الحديث. وبالله التوفيق

وأمّا ما رواه أبو داود (4549) وابن ماجة (2628) والنسائي (4799) والدارقطني (3/ 105) كلّهم من حديث عليّ بن زيد، عن القاسم بن ربيعة، عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بمعناه كما قال أبو داود قال: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح أو فتح مكة على درجة البيت أو الكعبة كذا عند أبي داود.

وجاء فيه:"ألا إن قتيل الخطأ قتيل السوط والعصا، فيه مائة إبل. منها أربعون خِلفة في بطونها أولادها" فهو ضعيف.

عليّ بن زيد بن جدعان ضعيف لا يحتج به، وخاصة إذا خالف.

فإنه جعل الحديث من مسند عبد الله بن عمر بن الخطّاب، والصحيح أنه من مسند عبد الله بن
عمرو بن العاص.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন খুৎবা প্রদান করলেন। তিনি তিনবার তাকবীর বললেন, অতঃপর বললেন: "একমাত্র আল্লাহ ছাড়া অন্য কোনো ইলাহ নেই। তিনি তাঁর ওয়াদা সত্য করেছেন, তাঁর বান্দাকে সাহায্য করেছেন এবং তিনি একাই সম্মিলিত বাহিনীকে (আহযাবকে) পরাজিত করেছেন।" তিনি আরও বললেন, "শুনে রাখো! জাহিলিয়্যাতের যুগের সকল গর্ব ও অহংকার, যা স্মরণ করা হয় বা ডাকা হয়, তা রক্ত (হত্যার প্রতিশোধ) হোক বা সম্পদ (সুদ ইত্যাদি) হোক, সব আমার এই দুই পায়ের নিচে (বাতিল)। তবে হাজীদের পানি পান করানোর (সিকায়াতুল হাজ্জ) এবং কাবা ঘরের রক্ষণাবেক্ষণের (সিদানাতুল বাইত) দায়িত্ব ছাড়া।" অতঃপর তিনি বললেন, "শুনে রাখো! ইচ্ছাকৃত হত্যার সদৃশ ভুলবশত হত্যার দিয়াত হলো (যা চাবুক বা লাঠি দ্বারা সংঘটিত হয়), একশটি উট। এর মধ্যে চল্লিশটি এমন হবে, যেগুলোর পেটে বাচ্চা রয়েছে।"