আল-জামি` আল-কামিল
6688 - عن أنس قال: ما رفع إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر فيه القصاص، إلا أمر فيه بالعفو.
حسن: رواه أبو داود (4497) والنسائي (4783، 4784) وابن ماجه (2692) وأحمد (13220) والبيهقي (8/ 54) كلهم من حديث عبد الله بن بكر المزني، حدثنا عطاء بن أبي ميمونة قال: ولا أعلمه إلا عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده حسن من أجل عبد الله بن بكر بن عبد الله المزني البصري فإنه حسن الحديث.
وفي الباب ما رُوي عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أُصيب بشيء في جسده فتركه لله، كان كفارة له".
رواه أحمد (23494) عن يحيى بن سعيد القطان، عن مجالد، عن عامر، عن المحرر بن أبي هريرة، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل مجالد وهو ابن سعيد بن عمير الهمداني ضعيف عند جمهور أهل العلم إلا أن البخاري كان حسن الرأي فيه فقال:"صدوق".
وبمعناه رُوي عن عبادة بن الصامت قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من رجل يُجرح في جسده جراحة فيتصدق بها إلا كفر الله عنه مثل ما تصدق به".
رواه أحمد (22701) عن سُريج بن النعمان، حدثنا هشيم، عن المغيرة، عن الشعبي، أن عبادة بن الصامت قال: فذكر الحديث.
ورواه البيهقي (8/ 56) من طريق أبي داود الطيالسي (587) ثنا محمد بن أبان، عن علقمة بن مرثد، عن الشعبي قال: قال عبادة بن الصامت عند معاوية: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أصيب بجسده بقدر نصف ديته، فعفا، كفر عنه نصف بأنه، وإن كان ثلثا، أو رُبعا فعلى قدر ذلك" فقال رجل: والله لسمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال عبادة: والله لسمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
قال البيهقي:"منقطع" أي أن الشعبي وهو عامر بن شراحيل لم يدرك عبادة بن الصامت. وقد أكد العلائي أنه أرسل عن عمرو وطلحة وابن مسعود وعائشة وعبادة بن الصامت.
وبمعناه روي أيضا عن أبي الدرداء قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من رجل يصاب بشيء في جسده فيتصدق به إلا رفعه الله به درجة، وحطّ عنه به خطيئة".
رواه الترمذي (1393) عن أحمد بن محمد، حدثنا عبد الله بن المبارك، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، حدثنا أبو السفر قال: دقّ رجل من قريش سنّ رجل من الأنصار فاستعدي عليه معاوية. فقال لمعاوية: يا أمير المؤمنين! إن هذا دقّ سني. فقال معاوية: إنا سنُرضيك. وألحّ الآخر على معاوية فأبرمه فلم يرضه. فقال له معاوية: شأنك بصاحبك. وأبو الدرداء جالس عنده فقال أبو الدرداء سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث. فقال الأنصاري: أأنت سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: سمعتْه أذناي، ووعاه قلبي. قال: فإني أذرها له. قال معاوية: لا جرم لا أخيّبك، فأمر له بمال.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه، ولا أعرف لأبي السفر سماعًا من أبي الدرداء، وأبو السفر اسمه: سعيد بن أحمد. ويقال: ابن محمد الثوري". انتهى.
قال ذلك تبعا لشيخه وهو البخاري، فإنه صرّح كما في"العلل الكبير" (2/ 962): أبو السفر لم يسمع من أبي الدرداء، واسمه سعيد بن يحيى ويقال: سعيد بن أحمد الثوري". انتهى.
وممن قال فيه الانقطاع البيهقي (8/ 56).
ومن هذا الوجه رواه أيضا ابن ماجه (2693) مختصرًا.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে কিসাস (প্রতিশোধ) সংক্রান্ত কোনো বিষয় পেশ করা হলেই তিনি তাতে ক্ষমার নির্দেশ দিতেন।
6689 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يحث في خطبته على الصدقة، وينهى عن المثلة.
صحيح: رواه النسائي (4047) وابن أبي عاصم في الديات (324) والضياء في المختارة (7/ 68) كلهم من حديث عبد الصمد، نا هشام، عن قتادة، عن أنس فذكره، وإسناده صحيح.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খুতবায় সাদাকা (দান) করার জন্য উৎসাহিত করতেন না এবং তিনি (শারীরিক) অঙ্গহানি করতে নিষেধ করতেন।
6690 - عن الحسن البصري قال: جاءه رجل فقال: إن عبدًا له أبق، وإنه نذر إن قدر عليه أن يقطع يده. فقال الحسن: حدثنا سمرة قال: فما خطب النبي صلى الله عليه وسلم إلا أمر فيها بالصدقة، ونهى فيها عن المثلة.
صحيح: رواه أحمد (20136) عن هشيم، حدثنا حميد، عن الحسن فذكره.
وفيه دليل لمن يقول: إن الحسن سمع من سمرة غير حديث العقيقة أيضا، لأن الأصل وهو كان عنده كتاب سمعه من سمرة - فيروي منه في أوقات متفرقة.
وقد رُوي هذا الحديث بألوان مختلفة. فمنها ما رواه أبو داود (2667) عن محمد بن المثنى، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن الحسن، عن الهيّاج بن عمران بن الفضل البصري، أن عمران أبق له غلام، فجعل الله عليه لئن قدر عليه ليقطعن يده، فأرسلني لأسأل له، فأتيت سمرة بن جندب فسألته فقال: كان نبي الله يحثنا على الصدقة، وينهانا عن المثلة، وأتيت عمران بن حصين فسألته فقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحثنا على الصدقة وينهانا عن المثلة.
وهذا إسناد حسن، فإن الهياج بن عمران بن الفضل وثّقه ابن سعد وابن حبان والعجلي، وهو"صدوق". وفيه تصريح الحسن من سماع هذا الحديث من سمرة بن جندب وعمران بن حصين.
ورواه الإمام أحمد (19844) من طريق قتادة به نحوه.
وفي الباب ما رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن أعف الناس قتلة أهل الإيمان". رواه أبو داود (2666) وابن ماجه (2681، 2682) وأحمد (3728) وابن حبان (5994) وابن الجارود في المنتقي (840) وابن أبي شيبة (9/ 420) وابن أبي عاصم في الديات (229) كلهم من طريق المغيرة بن مقسم الضبي، عن إبراهيم النخعي، عن هُني بن نويرة، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
واضطرب في إسناده اضطرابا كثيرًا فمنهم من أدخل بين مغيرة الضبي وإبراهيم النخعي"شباك الضبي" والصواب ما رواه شعبة، عن ابن مقسم الضبي بدون ذكر شباك الضبي، وإن كان قد اختلف على شعبة أيضا كما قال الدارقطني في العلل (5/ 142).
كما أنه روي موقوفا على ابن مسعود.
رواه ابن أبي شيبة (9/ 420) عن حفص، عن الأعمش، عن إبراهيم أنه مر على ابن مُكعبر، وقد قطع زياد يديه ورجليه فقال: سمعت عبد الله يقول: إن أعفَّ الناسِ قتلةً أهلُ الإيمان".
ورواه عبد الرزاق (10/ 22) عن الثوري، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة قال: قال ابن مسعود:"إن أعف الناس فتلة أهل الإيمان".
والموقوف أشبه بالصواب لثقة رجاله، والمرفوع مداره على هني بن نويرة وهو مجهول، لم يوثقه غير ابن حبان وقال أبو داود:"كان من العباد" دليل على أنه لم يتعاهد الحديث، ولكن رواه البعض بإسقاط"هني بن نويرة" وهذا كله يجعل المرفوع مضطربا. والله تعالى أعلم.
সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। হাসান বসরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বললো, তার একজন গোলাম পালিয়ে গেছে। সে মানত করেছে যে, যদি তাকে ধরতে পারে তবে সে তার হাত কেটে ফেলবে। তখন হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখনই কোনো ভাষণ দিতেন, তখনই তাতে সাদাকা করার নির্দেশ দিতেন এবং অঙ্গহানি (মুছলা) করতে নিষেধ করতেন।
6691 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى بالقصاص في السن، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كتاب الله القصاص".
صحيح: رواه النسائي (4752) وابن أبي عاصم في الديات (126) وابن الجارود (841) كلهم من حديث أبي خالد سليمان بن حيان قال: حدثنا حُميد، عن أنس فذكره.
وهو مختصر من قصة الربيع أخت أنس بن النضر وقوله:"كتاب الله القصاص" أراد به قوله تعالي المذكور أعلاه.
وفيه دليل على أن شرع من قبلنا شرع لنا، إذا لم يأت ما ينسخه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁতের (ক্ষতির) জন্য কিসাস (প্রতিশোধ) প্রদানের ফায়সালা দিয়েছিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কিতাব হলো কিসাস"।
6692 - عن أنس أن الربيع وهي ابنة النضر كسرت ثنية جارية، فطلبوا الأرش، وطلبوا العفو فأبوا، فأتوا النبي صلى الله عليه وسلم فأمرهم بالقصاص، فقال أنس بن النضر: أتكسر ثنية الربيع يا رسول الله؟ لا والذي بعثك بالحق لا تكسر ثنيتها! فقال:"يا أنس، كتاب الله القصاص" فرضي القوم وعفوا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن من عباد الله، من لو أقسم على الله لأبرّه".
زاد الفرازي، عن حميد، عن أنس:"فرضي القوم وقبلوا الأرش".
صحيح: رواه البخاري في الصلح (2703) عن محمد بن عبد الله الأنصاري قال: حدثني حمد، أن أنسا حدثهم فذكر الحديث.
ورواية الفزاري (هو مروان بن معاوية) وصلها البخاري في التفسير (4611) عن حميد، عن أنس قال: كسرت الربيع وهي عمة أنس بن مالك - ثنية جارية من الأنصار فذكر بقية الحديث مثله.
ووقعت قصة شبيهة في جرح إنسان وهو الآتي:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাসের ফুফু রুবাই’ (যিনি নাযর-এর কন্যা) একজন দাসীর দাঁত ভেঙে দিয়েছিলেন। তখন তারা (ক্ষতিগ্রস্ত পক্ষ) ক্ষতিপূরণ (আর্শ) দাবি করল এবং (রুবাই’র পরিবার) ক্ষমা চাইল, কিন্তু তারা (দাসীর পরিবার) তা প্রত্যাখ্যান করল। এরপর তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো। তিনি তাদেরকে কিসাস (প্রতিশোধমূলক দণ্ড) গ্রহণ করার নির্দেশ দিলেন। তখন আনাস ইবনুন নাযর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! রুবাই’র দাঁত কি ভেঙে দেওয়া হবে? না, কক্ষনো না! সেই সত্তার কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে পাঠিয়েছেন, তার দাঁত ভাঙা হবে না! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আনাস, আল্লাহর কিতাবে কিসাসের বিধান রয়েছে।" এরপর দলটি (ক্ষতিগ্রস্ত পক্ষ) সন্তুষ্ট হলো এবং ক্ষমা করে ক্ষতিপূপূরণ (আর্শ) গ্রহণ করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে এমন কিছু লোক আছে, যারা যদি আল্লাহর নামে শপথ করে, তবে আল্লাহ তা পূর্ণ করেন।"
6693 - عن أنس أن أخت الربيع أم حارثة جرحت إنسانًا فاختصموا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"القصاص القصاص" فقالت أم الربيع: يا رسول الله! أيقتص من فلانة؟ والله لا يُقتص منها. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سبحان الله! يا أم الربيع! القصاص في كتاب الله" قالت: لا والله لا يقتص منها أبدًا. قال: فما زالت حتى قبلوا الدية. فقال رسول الله:"إن من عباد الله من لو أقسم على الله لأبره".
صحيح: رواه مسلم في القسامة (1675) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا عفان بن مسلم، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا ثابت، عن أنس فذكره.
جزم أبو محمد بن حزم بأنهما قصتان صحيحتان وقعتا لامرأة واحدة إحداهما أنها جرحت إنسانًا، والأخرى أنها كسرت ثنية جارية فقضى عليها بالقصاص.
في الأولى كان الحالف أخوها، وفي الثانية كانت الحالفة أمها.
وقال البيهقي أيضا (8/ 64):"ظاهر الخبر يدل على كونهما قصتين، وإلا فثابت أحفظ" إلا أنه ذكر في حديث حمد الطويل:"لطمت الربيع بنت النضر جارية فكسرت ثنيتها".
وفي الحديث دليل على جواز القصاص بين الرجال والنساء قال ابن المنذر:"أجمعوا على أن الرجل يقتل بالمرأة، والمرأة بالرجل".
أخرج البيهقي من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه قال: كل من أدركت من فقهائنا وذكر السبعة في مشيخة سواهم أهل فقه وفضل ودين، قال: وربما اختلفوا في الشيء فأخذنا بقول أكثرهم، وأفضلهم رأيًا. أنهم كانوا يقولون:"المرأة تقاد من الرجل عينا بعين، وأذنا بأذن، وكل شيء من الجراح على ذلك، وإن قتلها قتل بها". وأما كيف يقتص من السن؟
فقال أبو داود: سمعت أحمد بن حنبل قيل له: كيف يقتص من السن؟ قال: تُبرد. ذكره المنذري في مختصر أبي داود.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আর-রাবি‘-এর বোন উম্মে হারিছা একজন লোককে আহত করেছিলেন। অতঃপর তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বিচারপ্রার্থী হলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “বিনিময় (কিসাস), বিনিময় (কিসাস)।” তখন উম্মু আর-রাবি‘ বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! অমুক মহিলার উপর কি কিসাস কার্যকর করা হবে? আল্লাহর শপথ! তার উপর কিসাস কার্যকর করা হবে না।” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সুবহানাল্লাহ! হে উম্মু আর-রাবি‘! কিসাস আল্লাহর কিতাবে (বিধান) রয়েছে।” তিনি বললেন: “না, আল্লাহর শপথ! তার উপর কখনোই কিসাস কার্যকর করা হবে না।” বর্ণনাকারী বলেন: তিনি এমনভাবে পীড়াপীড়ি করতে থাকলেন যে অবশেষে তারা দিয়াত (রক্তপণ) গ্রহণ করে নিলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে এমন কিছু লোক আছে, যারা আল্লাহর নামে কসম করলে আল্লাহ তা পূর্ণ করে দেন।”
6694 - عن أنس قال: خرجت جارية عليها أوضاح بالمدينة، قال: فرماها يهودي بحجر، قال: فجيء بها إلى النبي صلى الله عليه وسلم وبها رمق، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فلان قتلك؟" فرفعت رأسها، فأعاد عليها، قال:"فلان قتلك؟" فرفعت رأسها، فقال لها في الثالثة:"فلان قتلك؟" فخفضت رأسها، فدعا به رسول الله صلى الله عليه وسلم فقتله بين الحجرين.
وفي رواية: فأخذ فأتي به رسول الله صلى الله عليه وسلم فأمر به أن يرجم حتى يموت، فرجم حتى مات.
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6877) ومسلم في القسامة (15: 1672) كلاهما من طريق شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس بن مالك، فذكره.
والرواية الثانية عند مسلم من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أنس.
وقوله:"فرجم حتى مات" لا تنافي الرواية الأولى بأنه قتل بين الحجرين.
قال القاضي عياض:"رضخه بين حجرين ورضه بالحجارة ورجمه بها بمعنى، والجامع أنه رمي بحجر أو أكثر ورأسه على آخره". ذكره النووي في شرح مسلم (11/ 157).
قال الترمذي:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق. وقال بعض أهل العلم: لا قود إلا بالسيف".
ورواه أبو داود الطيالسي (802) عن قيس، عن جابر بإسناده نحو لفظ ابن ماجه"لا قوة إلا بحديدة" أي السيف.
ورواه الدارقطني (3/ 107) من حديث قيس وزهير، عن جابر بلفظ:"كل شيء سوى الحديدة فهو خطأ. وفي كل خطأ أرش".
قال البيهقي:"مدار هذا الحديث علي جابر الجعفي وقيس بن الربيع ولا يحتج بهما".
وقال في المعرفة (12/ 80):"تفرد به جابر الجعفي وهو ضعيف، لا يحتج به، واختلف عليه في لفظه" وقال:"وروي عن مبارك بن فضالة، عن الحسن، عن النعمان بن بشير وقيل: عن أبي بكرة وكلاهما ضعيف، وروي من أوجه أخرى كلها ضعيف" انتهى.
وأما حديث عبد الله بن مسعود فرواه الطبراني في الكبير (10/ 109) وابن أبي عاصم في الديات (113) والدارقطني (3/ 88) والبيهقي (8/ 63) كلهم من حديث بقية، عن أبي معاذ، عن عبد الكريم بن أبي المخارق، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا قود إلا بسلاح". وفيه سلسلة الضعفاء والمتروكين.
بقية هو ابن الوليد مدلس كان يدلس تدليس التسوية.
وأبو معاذ: هو سليمان بن أرقم، قال الدراقطني:"متروك".
شيخه عبد الكريم بن أبي المخارق ضعيف باتفاق أهل العلم.
وأما حديث أبي هريرة، فأخرجه ابن عدي في"الكامل" (6/ 2384) من طريق بقية، عن ورقاء، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا قود إلا بالسلاح".
قال ابن عدي:"هكذا رواه المسيب فقال: بقية، عن ورقاء، عن الزهري.
وورقاء عن الزهري ليس بالمستوى، ولم يلق الزهري، وإنما يروي بقية هذا الحديث عن سليمان بن أرقم عن الزهري". اهـ
ورواه الدارقطني (3/ 87 - 88) من طريق بقية عن أبي معاذ، عن الزهري، به. ومن طريق عامر بن سيار، عن سليمان بن أرقم، عن الزهري، به.
وأبو معاذ كنية سليمان بن أرقم وهو مدار الحديث، وهو متروك كما قاله الدارقطني وغيره.
وفيه بقية وهو ابن الوليد مدل يدلس التسوية. وهذا الحديث من تخليطه.
وأما حديث علي بن أبي طالب فرواه الدارقطني (3/ 88) والبيهقي (8/ 63) ولفظه:"لا قود إلا بحديدة، ولا قود في النفس وغيرها إلا بحديدة" قال الدارقطني: وفيه معلى بن هلال متروك.
خلاصة القول: أنه لم يثبت في هذا الباب شيء كما قال ابن عدي في"الكامل" ونقل عنه البيهقي في"الصغرى". انظر"المنة الكبرى" (7/ 63).
وكذلك لا يصح ما رُوي عن البراء بن عازب، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من عرض عرضنا له، ومن
حرّق حرّقناه، ومن غرّق غرّقناه".
رواه البيهقي في"الكبرى" (8/ 43) من طريق بشر بن حازم، عن عمران بن يزيد بن البراء، عن أبيه، عن جده.
ورواه أيضا في المعرفة (12/ 409 - 410) وقال:"وفي هذا الإسناد بعض من يجهل".
إلا أن مجموع هذه الأحاديث يدل على أن له أصلا، وإليه ذهب أهل الكوفة، ومنهم أصحاب أبي حنيفة، وأما الإمام أحمد فاختلفت الرواية عنه، فرُويَ عنه لا يستوفي إلا بالسيف في العنق كما في"المغني".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদীনায় একজন দাসী (বা বালিকা) বের হয়েছিল, যার গায়ে অলংকার ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: তখন এক ইয়াহুদী তাকে পাথর দ্বারা আঘাত করে। বর্ণনাকারী বলেন: তাকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আনা হলো, তখনো তার প্রাণ ছিল (মৃত্যু ঘটেনি)। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "অমুক কি তোমাকে হত্যা করেছে?" সে মাথা ওঠালো। তিনি তাকে আবার জিজ্ঞেস করলেন: "অমুক কি তোমাকে হত্যা করেছে?" সে মাথা ওঠালো। তৃতীয়বার তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "অমুক কি তোমাকে হত্যা করেছে?" তখন সে মাথা নামিয়ে নিল (অর্থাৎ ইঙ্গিতে সম্মতি দিল)। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (ইয়াহুদীকে) ডেকে আনলেন এবং দুটি পাথরের মাঝখানে তাকে হত্যা করলেন।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তাকে (ইয়াহুদীকে) ধরা হলো এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আনা হলো। তিনি তাকে পাথর নিক্ষেপ করে হত্যা করার নির্দেশ দিলেন যতক্ষণ না সে মারা যায়। ফলে তাকে পাথর নিক্ষেপ করা হলো এবং সে মারা গেল।
(এটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি (সহীহ বুখারী ও সহীহ মুসলিম কর্তৃক বর্ণিত)। ইমাম বুখারী এটি কিতাবুদ দিয়াত (৬৯৭৭) এবং ইমাম মুসলিম কিতাবুল কাসসামাহ (১৫: ১৬৭২)-এ শু'বাহ থেকে, তিনি হিশাম ইবনু যায়দ থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক থেকে বর্ণনা করেছেন।
আর দ্বিতীয় বর্ণনাটি ইমাম মুসলিমের নিকট আব্দুর রাযযাক-এর সূত্রে আছে, তিনি বলেন, আমাদেরকে মা'মার অবহিত করেছেন, তিনি আইয়ূব থেকে, তিনি আবূ কিলাবাহ থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।
আর তাঁর উক্তি: "পাথর নিক্ষেপ করা হলো এবং সে মারা গেল"—এটি প্রথম বর্ণনার পরিপন্থী নয় যে তাকে দুটি পাথরের মাঝে হত্যা করা হয়েছিল। কাযী ইয়ায (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "তাকে দুটি পাথরের মাঝে নিষ্পেষিত করা, তাকে পাথর দ্বারা চূর্ণ করা এবং তাকে পাথর নিক্ষেপ করা—সব একই অর্থ বহন করে। এর মূল কথা হলো, তাকে এক বা একাধিক পাথর দ্বারা আঘাত করা হয়েছিল এবং (আঘাতের ফলে) সে মারা গিয়েছিল।" ইমাম নববী শারহুল মুসলিম (১১/১৫৭)-এ এটি উল্লেখ করেছেন।
ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "কিছু সংখ্যক আহলে ইলমের নিকট এই (হাদীসের) ওপর আমল করা হয়। এটি আহমাদ ও ইসহাকের অভিমত। আর কিছু আহলে ইলম বলেন: তরবারি ব্যতীত কিসাস (প্রতিশোধমূলক মৃত্যুদণ্ড) নেই।"
আবূ দাঊদ তায়ালিসী (৮০২) কায়স, তিনি জাবির থেকে ইবনু মাজাহর শব্দের মতো বর্ণনা করেছেন: "লোহার হাতিয়ার (তরবারি) ব্যতীত কিসাস নেই।"
দারাকুতনী (৩/১০৭) কায়স ও যুহায়র, তারা জাবির থেকে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: "লোহার হাতিয়ার ব্যতীত অন্য সবকিছুই ভুল (ক্ষমাযোগ্য)। আর সব ভুল/ক্ষমাযোগ্য হত্যার ক্ষতিপূরণ (আর্শ) আছে।"
ইমাম বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "এই হাদীসের ভিত্তি জাবির আল-জু’ফী এবং কায়স ইবনুর রাবী’র ওপর। তাদের দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যায় না।"
আর আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদের হাদীসটি হলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "অস্ত্র ব্যতীত কিসাস নেই।" এর সনদে দুর্বল এবং মাতরূক (পরিত্যক্ত) রাবী রয়েছে।
আলী ইবনু আবী তালিবের হাদীসটি দারাকুতনী (৩/৮৮) ও বায়হাকী (৮/৬৩) বর্ণনা করেছেন, যার শব্দ হলো: "লোহার হাতিয়ার ব্যতীত কিসাস নেই। আর জীবন ও অন্যান্য ক্ষেত্রে লোহার হাতিয়ার ব্যতীত কিসাস নেই।" দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এর সনদে মু'আল্লা ইবনু হিলাল নামক মাতরূক রাবী রয়েছেন।
সারসংক্ষেপ: ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) এবং বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মতে এই অধ্যায়ে (কিসাসের পদ্ধতির বিষয়ে) কোনো কিছুই প্রমাণিত নয়।
তবে এই দুর্বল হাদীসগুলোর সম্মিলিত সারমর্ম ইঙ্গিত করে যে এর একটি ভিত্তি আছে। কূফার আহলে ইলমগণ এবং আবূ হানীফার অনুসারীগণ এই মতই গ্রহণ করেছেন। আর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ক্ষেত্রে বর্ণনা ভিন্ন ভিন্ন হয়েছে; যেমনটি আল-মুগনীতে আছে, তাঁর থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, কিসাস শুধুমাত্র গর্দানের ওপর তরবারি দ্বারাই সম্পন্ন করা হবে।
6695 - عن أبي جحيفة قال: سألت عليًّا رضي الله عنه: هل عندكم شيء مما ليس في القرآن؟ وقال ابن عيينة مرة: ما ليس عند الناس؟ فقال: والذي فلق الحبة وبرأ النسمة ما عندنا إلا ما في القرآن، إلا فهمًا يعطى الرجل في كتابه، وما في الصحيفة. قلت: وما في الصحيفة؟ قال: العقل، وفكاك الأسير، وأن لا يُقتل مسلم بكافر.
صحيح: رواه البخاري في الديات (6915) من طريق مطرّف قال: سمعت الشعبي يحدث قال: سمعت أبا جحفة (واسمه وهب بن عبد الله السوائي) فذكره.
وقوله:"لا يقتل مؤمن بكافر" لشرف الإسلام ونقص الكفر، والقصاص يُشعر بالمساواة، ولا مساواة بين الكافر والمسلم، لكن يجوز للامام وولي الأمر أن يقتل القاتل المسلم تعزيرًا لحفظ الأمن، وقد قال جماعة من فقهاء الكوفة منهم أبو حنيفة: بل يقتل به، لأن النبي صلى الله عليه وسلم أتى برجل من المسلمين قتل معاهدًا من أهل الذمة. فقدّم رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلم فضرب عنقه وقال:"أنا أولى من أوفى بذمته".
رواه أبو داود في مراسيله (241) والدارقطني (3/ 135) والبيهقي (8/ 31) كلهم من طريق ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن عبد الرحمن بن البيلماني، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وعبد الرحمن بن البيلماني ضعيف، لا تقوم الحجة إذا وصل الحديث، فكيف إذا أرسله. وقد روي موصولا ولا يصح.
ورواه أيضا (242) بإسناد آخر عن عبد الله بن عبد العزيز بن صالح الحضرمي قال: قتل رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم خيبر مسلمًا بكافر. قتله غيلة. وقال:"أنا أولى أو أحق من أوفى بذمته" هذا مرسل ضعيف أيضا. عبد الله بن عبد العزيز والراوي عنه عبد الله بن يعقوب مجهولان.
والغيلة والاغتيال: هو أن يخدع ويقتل.
وقال مالك وأهل المدينة: إن القتل غيلة لا تشترط له المكافأة فيقتل فيه المسلم والكافر.
আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: 'কুরআনে যা নেই, এমন কিছু কি আপনাদের কাছে আছে?' ইবনু উয়াইনা একবার বললেন: 'সাধারণ মানুষের কাছে যা নেই?' জবাবে তিনি (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বললেন: "ঐ সত্তার শপথ, যিনি শস্যদানা বিদীর্ণ করেছেন এবং জীবন সৃষ্টি করেছেন! আমাদের কাছে কুরআনে যা আছে, তা ব্যতীত আর কিছুই নেই। তবে, [তা আছে] কিতাব সম্পর্কে কোনো ব্যক্তিকে যে বিশেষ জ্ঞান (ফাহাম) দেওয়া হয়, এবং যা এই সহীফাতে (লিখিত পাণ্ডুলিপি) রয়েছে।"
আমি (আবু জুহাইফা) বললাম: 'সহীফাতে কী আছে?'
তিনি বললেন: 'দিয়ত (রক্তমূল্য), বন্দীর মুক্তি, এবং কোনো কাফিরের বদলে কোনো মুসলিমকে হত্যা করা হবে না।'
সহীহ: এটি বুখারী (৬৯১৫) দিয়াত অধ্যায়ে মুতাররিফের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমি শা'বীকে হাদিস বর্ণনা করতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমি আবূ জুহাইফা (তাঁর নাম ওয়াহব ইবনু আবদুল্লাহ আস-সুয়ায়ী)-কে এটি বলতে শুনেছি।
তাঁর এই উক্তি, "কোনো কাফিরের বদলে কোনো মু'মিনকে হত্যা করা হবে না"—তা ইসলামের শ্রেষ্ঠত্ব এবং কুফরের দুর্বলতার কারণে। কিসাস (প্রতিশোধমূলক মৃত্যুদণ্ড) সমতার ইঙ্গিত বহন করে, কিন্তু কাফির ও মুসলিমের মধ্যে কোনো সমতা নেই। তবে, নিরাপত্তা বজায় রাখার জন্য শাসক বা অভিভাবকের জন্য দোষী মুসলিম হত্যাকারীকে তা'যীর (শাস্তিমূলক) হিসেবে হত্যা করা জায়েয। আর কুফার ফকীহগণের একটি দল—যাদের মধ্যে আবূ হানীফাও ছিলেন—বলেছেন: বরং এর (কাফিরের) বদলে তাকে (মুসলিমকে) হত্যা করা হবে। কারণ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এমন একজন মুসলিমকে আনা হয়েছিল যে যিম্মি (চুক্তিভিত্তিক) কাফিরকে হত্যা করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই মুসলিমকে এগিয়ে আনলেন এবং তার গর্দান কেটে দিলেন এবং বললেন: "আমিই সেই ব্যক্তি, যে তার চুক্তির মর্যাদা রক্ষা করার অধিক হকদার।"
এটি আবূ দাঊদ তাঁর মারাসীল (২৪১), দারাকুতনী (৩/১৩৫) এবং বাইহাকী (৮/৩১) বর্ণনা করেছেন। সকলেই রাবী'আহ ইবনু আবূ আবদুর রহমান-এর সূত্রে, তিনি আবদুর রহমান ইবনু আল-বাইলামানী থেকে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর আবদুর রহমান ইবনু আল-বাইলামানী দুর্বল। যখন হাদিসটি মাউসুল (সংযুক্ত) হিসেবে বর্ণিত হয়, তখন তা দ্বারা প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয় না; সুতরাং যখন তা মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে বর্ণিত হয়, তখন তার অবস্থা কেমন হবে? এটি মাউসুল হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে, তবে তা সহীহ নয়।
এটি আরো বর্ণনা করেছেন (২৪২), আরেকটি ইসনাদে আবদুল্লাহ ইবনু আবদুল আযীয ইবনু সালিহ আল-হাযরামী থেকে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন এক কাফিরের বদলে একজন মুসলিমকে হত্যা করেছিলেন। সে তাকে প্রতারণামূলকভাবে (গিলাহ) হত্যা করেছিল। তিনি বলেছিলেন: "আমিই সেই ব্যক্তি, যে তার চুক্তির মর্যাদা রক্ষা করার অধিক হকদার।" এই বর্ণনাটিও মুরসাল এবং দুর্বল। আবদুল্লাহ ইবনু আবদুল আযীয এবং তাঁর থেকে বর্ণনাকারী আবদুল্লাহ ইবনু ইয়াকূব উভয়েই মাজহুল (অজ্ঞাত)।
গিলাহ (الغيلة) এবং ইগতিয়াল (الاغتيال) হলো: প্রতারণা করে হত্যা করা। ইমাম মালিক এবং মদীনার ফকীহগণ বলেছেন: গিলাহ (প্রতারণামূলক) হত্যার ক্ষেত্রে প্রতিশোধের শর্ত প্রযোজ্য হয় না। তাই এক্ষেত্রে মুসলিম এবং কাফির উভয়কেই (একই অবস্থায়) হত্যা করা যাবে।
6696 - عن علي بن أبي طالب قال: ما كتبنا عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا القرآن وما في هذه
الصحيفة، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"المدينة حرام ما بين عائر إلى كذا. فمن أحدث حدثًا أو آوى محدثًا فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه عدل ولا صرف، وذمة المسلمين واحدة، بسعى بها أدناهم، فمن أخفر مسلمًا فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين .." الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الجزية والموادعة (3179) ومسلم في الحج (468: 1370) كلاهما من طريق الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن أبيه، عن علي، فذكره إسحاق والسياق للبخاري.
قوله:"أخفر" أي نقض عهده.
আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে কুরআন ছাড়া আর কিছু লিখিনি, তবে এই সহীফাতে (লিখিত বিষয়াদি) আছে। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মদীনা হারাম (পবিত্র), 'আইর থেকে অমুক স্থান পর্যন্ত। সুতরাং যে ব্যক্তি সেখানে কোনো (অপরাধমূলক) বিদ'আত সৃষ্টি করবে অথবা কোনো অপরাধী বা বিদ'আতীকে আশ্রয় দেবে, তার উপর আল্লাহ, ফিরিশতাগণ এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ। তার কাছ থেকে (কেয়ামতের দিন) কোনো বিনিময় বা মুক্তিপণ কবুল করা হবে না। আর মুসলমানদের নিরাপত্তা চুক্তি একটিই, যা তাদের মধ্যেকার সর্বনিম্ন ব্যক্তিও দিতে পারে (অর্থাৎ সকলের উপর প্রযোজ্য)। সুতরাং যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের (দেওয়া নিরাপত্তা) চুক্তি ভঙ্গ করবে, তার উপর আল্লাহ, ফিরিশতাগণ এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ..." এই হাদীসটি।
6697 - عن إبراهيم التيمي، عن أبيه قال: خطبنا علي بن أبي طالب فقال: من زعم أن عندنا شيئا نقرأه إلا كتاب الله وهذه الصحيفة فقد كذب. فيها أسنان الإبل، وأشياء من الجراحات، وذمة المسلمين واحد يسعى بها أدناهم ...... وذكر بقية الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الاعتصام (7300) ومسلم في الحج (1370) كلاهما من حديث الأعمش، عن إبراهيم التيمي بإسناده فذكره.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: যে ব্যক্তি ধারণা করে যে, আল্লাহ্র কিতাব এবং এই সহীফা (লিখিত দলিল) ব্যতীত আমাদের নিকট এমন কিছু আছে যা আমরা পাঠ করি, সে মিথ্যা বলেছে। এতে (এই সহীফাতে) উটের দিয়াত (ক্ষতিপূরণ), যখম সংক্রান্ত কিছু বিষয়াবলী এবং মুসলমানদের নিরাপত্তা দেওয়ার অধিকার এক (অভিন্ন), তাদের মধ্যকার নিকৃষ্ট ব্যক্তিও তা দিতে পারে। ... এবং তিনি অবশিষ্ট হাদীস বর্ণনা করলেন।
6698 - عن الأشتر أنه قال لعلي: إن الناس قد تفشّع بهم ما يسمعون. فإن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد إليك عهدًا فحدّثنا به، قال: ما عهد إلي رسول الله صلى الله عليه وسلم عهدًا لم يعهده إلى الناس غير أن في قراب سيفي صحيفة فإذا فيها: المؤمنون تتكافأ دماؤهم، يسعى بذمتهم أدناهم، لا يُقتل مؤمن بكافر، ولا ذو عهد في عهده".
صحيح: رواه النسائي (4746)، عن أحمد بن حفص قال: حدثني أبي قال: حدثني إبراهيم بن طهمان، عن الحجاج بن الحجاج، عن قتادة، عن أبي حسان الأعرج، عن الأشتر فذكره.
وأبو حسان هو مسلم بن عبد الله الأحرد، مشهور بكنيته.
ورواه أبو داود (2035) والنسائي (4745) وأحمد (959) كلهم من طريق همام، أخبرنا قتادة، عن أبي حسان أن عليًّا كان يأمر بالأمر فيُوتي فذكره. وأبو حسان لم يسمع من علي.
ولكن في سياق أحمد إشعار بأن الجزء المرفوع من الحديث يرويه الأشتر عن علي بن أبي طالب.
وقوله:"تفشّغ" أي فشا وانتشر.
وقال قيس بن عبّاد: انطلقت أنا والأشتر إلى علي، فقلنا: هل عهد إليك نبي الله صلى الله عليه وسلم شيئًا لم يعهده إلى الناس عامة، فقال: لا، إلا ما كان في كتابي هذا. فأخرج كتابًا من قراب سيفه فإذا فيه:"المؤمنون تكافأ دماؤهم، وهم يد على من سواهم، ويسعى بذمتهم أدناهم، ألا لا يُقتل مؤمن بكافر، ولا ذو عهد بعده ...." فذكر الحديث.
رواه النسائي (4734) وأبو داود (4530) وأحمد (993) والبيهقي (7/ 133 - 134) كلهم من
حديث يحيى بن سعيد، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، عن قيس بن عُباد فذكره.
رجاله ثقات وكان سماع يحيى بن سعيد من سعيد بن أبي عروبة قبل اختلاطه. والحسن مدلس وقد عنعن والحديث صحيح بما قبله.
আশতার থেকে বর্ণিত, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "লোকেরা যা শুনছে, তাতে তারা বিভ্রান্ত ও শঙ্কিত হয়ে পড়েছে। যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার প্রতি বিশেষ কোনো অঙ্গীকার করে থাকেন, তবে তা আমাদেরকে জানান।" তিনি (আলী) বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার প্রতি এমন কোনো অঙ্গীকার করেননি যা তিনি সাধারণ মানুষের প্রতি করেননি, তবে আমার তলোয়ারের খাপের ভেতরে একটি সহীফা (লিখিত দলিল) আছে।" আর তাতে লেখা আছে: "মুমিনদের রক্ত সমান (সকল মুমিনের জীবনের মূল্য সমান); তাদের মধ্যে সর্বনিম্ন ব্যক্তিও যদি কাউকে নিরাপত্তা দেয় (আমান দেয়), তবে তা পূরণযোগ্য; কোনো মুমিনকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না; এবং চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে চুক্তির সময়ে হত্যা করা হবে না।"
6699 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقتل مسلم بكافر، وقال: دية عقل الكافر نصف دية عقل المؤمن".
حسن: رواه الترمذي (1413) واللفظ له، وأحمد (6692) وغيرهما من طرق عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وهو جزء من خطبة النبي صلى الله عليه وسلم في فتح مكة. وهي بتمامها في فتح مكة.
وفي معناه ما روي عن ابن عمر في حديث طويل:"ولا يقتل مؤمن بكافر، ولا ذو عهد في عهده.
رواه ابن حبان (5996) من طريق القاسم بن الوليد، عن سنان بن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.
وذكر ابن حبان سنان هذا في"الثقات" (6/ 424) ولم يذكر من الرواة عنه إلا القاسم بن الوليد وزاد أبو حاتم: محمد بن طلحة، وزاد ابنه"صالح بن حيي والد حسن بن صالح". ولكن لم يوثقه أحد غيره فهو على رأي ابن حجر"مقبول" أي عند المتابعة.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো মুসলিমকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না। আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কাফিরের দিয়াত (রক্তমূল্য) হলো মুমিনের দিয়াতের (রক্তমূল্যের) অর্ধেক।
6700 - عن عائشة قالت: وجدت في قائم سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابًا:"إن أشد الناس عُتوًّا من ضرب غير ضاربه، ورجل قتل غير قاتله، ورجل تولّى غير أهل نعمته، فمن فعل ذلك فقد كفر بالله ورسوله، لا يقبل الله منه صرفًا، ولا عدلًا، وفي الأجر المؤمنون تكافأ دماؤهم، ويسعى بذمتهم أدناهم، لا يقتل مسلم بكافر، ولا ذو عهد في عهده، ولا يتوارث أهل ملتين، ولا تُنكح المرأة على عمتها، ولا على خذلتها، ولا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا تسافر امرأة ثلاث ليال مع غير ذي محرم".
حسن: رواه أبو يعلى (4757) عن أبي خيثمة، حدثنا عبيد الله بن عبد المجيد، حدثنا عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، سمعت مالك بن محمد بن عبد الرحمن قال: سمعت عمرة بنت عبد الرحمن، تحدث عن عائشة فذكرته.
ورواه أيضا ابن أبي عاصم في الديات (107) والدارقطني (3/ 131) والبيهقي (8/ 29 - 30) كلهم من حديث عبيد الله بن عبد المجيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل مالك بن محمد أبي رجال سئل الدارقطني عنه فقال:"صالح" سؤالات البرقاني (498) وهو أخو حارثة بن أبي الرجال، وعبد الرحمن بن أبي الرجال، اشتهروا
بكنية أبيهم.
قال أبو حاتم:"مالك أحسن حالًا من إخوته".
وذكره ابن حبان في"الثقات" (9/ 164)، وهو من رجال"التعجيل".
وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المسلمون تتكافأ دماؤهم، وهم يد على من سواهم، يسعى بذمتهم أدناهم، ويرد على أقصاهم" رواه ابن ماجه (2683) وإسناده ضعيف جدًّا فإن فيه حنش وهو الحسين بن قيس الرحبي أبو علي الواسطي، لقبه: حنش ضعيف باتفاق أهل العلم. بل قال البخاري: أحاديثه منكرة جدًّا.
وقال النسائي:"متروك الحديث".
وكذلك لا يصح ما روي أيضا عن معقل بن يسار قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"المسلمون يد على من سواهم، وتتكافأ دماؤهم".
رواه ابن ماجه (2684) وفيه عبد السلام بن أبي الجَنُوب المدني قال أبو حاتم: شيخ متروك وضعّفه أيضا جمهور أهل العلم.
وقوله:"تتكافأ دماؤهم" التكافؤ التساوي أي الشريف والوضيع تتساوى في القصاص. معناه: إن دماء المسلمين متساوية في القصاص، يقاد الشريف بالوضيع، والكبير بالصغير فلا يقتل غير قاتله وإن كان المقتول شريفًا، أو ثريًا، بخلاف ما كان يفعله أهل الجاهلية. ما كانوا يرضون في دم الشريف بقاتله فقط بل كانوا يقتلون عددا من قبيلة القاتل.
وقوله:"يسعى بذمتهم أدناهم": الذمة هي الأمان أي إن أدنى رجل من المسلمين إذا أعطى أمانا فليس للباقين إخفاره كالعبد والمرأة وغيرهما، وفي المسألة تفاصيل تُذكر في مواضعها.
وقوله:"المؤمنون يد على من سواهم": أي أن المسلمين إخوة يعاون بعضهم بعضا على غيرهم من الكفار والمشركين.
رواه أبو داود (4518) عن مسلم بن إبراهيم، حدثنا هشام، عن قتادة، عن الحسن. فمع اختلاف سماع الحسن من سمرة مطلقًا وقع فيه اضطراب أيضا ولذا طعن فيه الإمام أحمد وغيره.
ولكن نقل الترمذي في العلل الكبير (2/ 588) عن البخاري قال: كان علي بن المديني يقول بهذا الحديث. وقال البخاري: وأنا أذهب إليه.
وذكر البخاري في التاريخ الكبير (2/ 290) في ترجمة الحسن البصري قال علي: وسماع الحسن من سمرة صحيح، وأخذ بحديثه:"من قتل عبده قتلناه".
وقال الترمذي:"حسن غريب". وقال:"وذهب بعض أهل العلم من التابعين منهم إبراهيم النخعي إلى هذا الحديث".
قلت: وبه قال ابن المسيب والشعبي وقالوا:"القصاص بين الأحرار والعبيد ثابت في النفس.
وذهب سفيان الثوري إلى أنه إذا قتل عبده عمدا قُتل. وفرق أبو حنيفة بين عبده وعبد غيره.
فقال: إن قتل عبد غيره عمدًا قتل. وهو قول سفيان الثوري أيضا.
وذهب جمهور أهل العلم منهم: مالك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، إلى أنه لا قصاص بين الأحرار والعبيد. وهو مذهب أبي بكر وعمر. وكذلك روي عن ابن الزبير والحسن وعطاء وعكرمة وعمر بن عبد العزيز وغيرهم، لأنهم أجمعوا على أن لا قصاص بين الأحرار والعبيد في الأطراف فإذا منعوا منه في القليل كان منعه في الكثير أولى. هذا مختصر من إفادة الخطابي في"معالمه".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের তরবারির হাতলে একটি লেখা পেলাম: "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সীমালঙ্ঘনকারী সে, যে তার আক্রমণকারী ভিন্ন অন্য কাউকে আঘাত করে এবং সে ব্যক্তি যে তার হত্যাকারী ভিন্ন অন্য কাউকে হত্যা করে, এবং সে ব্যক্তি যে তার নেয়ামতের (উপকারের) পাত্র ভিন্ন অন্য কারো সাথে মিত্রতা স্থাপন করে। সুতরাং যে এমন কাজ করে, সে অবশ্যই আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সাথে কুফরি করল। আল্লাহ তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কবুল করেন না। আর সওয়াবের ক্ষেত্রে, মুমিনদের রক্ত সমমর্যাদার অধিকারী (সমান), তাদের মধ্যেকার নিম্নতম ব্যক্তিও তাদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা দিতে পারে, কোনো মুসলিমকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না, আর চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে তার চুক্তির সময়কালে (হত্যা করা হবে না), আর দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না, আর কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর এবং তার খালার উপর (একই সাথে বিবাহ করা) যাবে না, আর আসরের পর সূর্য ডোবা পর্যন্ত কোনো সালাত (নফল) নেই, আর কোনো নারী তিন রাতের দূরত্ব (পথ) মাহরাম ব্যতীত ভ্রমণ করবে না।"
6701 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رجلا قتل عبده متعمدًا، فجلده النبي صلى الله عليه وسلم مائة جلدة، ونفاه سنة، ومحا سهمه من المسلمين، ولم يقده به، وأمره أن يعتق رقبة.
حسن: رواه الدارقطني (3/ 143 - 144) وعنه البيهقي (8/ 36) والطحاوي في شرحه (3/ 137 - 138) كلهم من حديث محمد بن عبد العزيز الرملي، نا إسماعيل بن عياش، عن الأوزاعي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسماعيل بن عياش ضعيف ولكن رواه عن الأوزاعي، وروايته عن الشاميين قوية.
وفي الإسناد محمد بن عبد العزيز الرملي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، بل وقد تابعه ابن الطباع قال: حدثنا إسماعيل بن عياش عن إسحاق بن عبد الله بن أبي فروة، عن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، عن علي بن أبي طالب وعمرو بن شعيب فذكراه مثله.
رواه ابن ماجه (2664) عن محمد بن يحيى، قال حدثنا ابن الطباع بإسناده. وابن الطباع هو
إسحاق بن عيسى إلا أن هذا الإسناد ضعيف جدًّا.
وإسحاق بن أبي فروة متروك، ومن طريقه رواه ابن أبي شيبة (9/ 304) والدارقطني (3/ 144) والبيهقي (8/ 36) وإسماعيل بن عياش ضعيف في روايته عن غير أهل بلده الشام. وهذا منها.
ثم إبراهيم بن عبد الله بن حنين لم يسمع من علي بن أبي طالب فالعمدة فيه هو الإسناد الأول.
ثم قال البيهقي:"أسانيد هذه الأحاديث ضعيفة لا تقوم بشيء منها الحجة، إلا أن أكثر أهل العلم على أن لا يُقتل الرجل بعبده". انتهى.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার ক্রীতদাসকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে একশত বেত্রাঘাত করলেন, তাকে এক বছরের জন্য নির্বাসিত করলেন, মুসলমানদের (অধিকার থেকে) তার অংশ মুছে দিলেন, কিন্তু ক্রীতদাসের বদলে তাকে হত্যা করলেন না (কেসাস নিলেন না), এবং তাকে একটি দাস মুক্ত করার নির্দেশ দিলেন।
6702 - عن عبد الله بن عمرو قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم صارخًا. فقال له سول الله صلى الله عليه وسلم:"ما لك؟" قال: سيدي رآني أقبّل جارية له، فجب مذاكيري، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"علي بالرجل" فطلب، فلم يقدر عليه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اذهب فأنت حر" قال: على من نُصرتي يا رسول الله؟ قال: يقول: أرأيت إن استرقني مولاي؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"على كل مؤمن أو مسلم".
حسن: رواه أبو داود (4519) وابن ماجه (2680) وأحمد (6710) والبيهقي (8/ 36) وعبد الرزاق (17932) كلهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره وإسناده حسن من أجله.
قال أبو داود:"الذي عُتق كان اسمه روح بن دينار".
قال أبو داود:"الذي جبّه زنباع".
قال أبو داود:"هذا زنباع أبو روح كان مولى العبد".
وفي أحمد: أن زنباعًا أبا روح وجد غلامًا له مع جارية له، فجدع أنفه وجبّه. فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"من فعل هذا بك؟" قال: زنباع. فدعاء النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ما حملك على هذا؟" فقال: كان من أمره كذا وكذا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم للعبد:"اذهب فأنت حر" فقال: يا رسول الله، فمولى من أنا؟ قال:"مولى الله ورسوله" فأوصى به رسول الله صلى الله عليه وسلم المسلمين، قال: فلما قُبض رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء إلى أبي بكر، فقال: وصية رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، نجري عليك النفقة وعلى عيالك. فأجراها عليه، حتى قُبض أبو بكر، فلما استخلف عمر جاءه، فقال: وصية رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، أين تريد؟ قال: مصر، فكتب عمر إلى صاحب مصر أن يعطيه أرضًا يأكلها. فلعله في بداية الأمر لم يقدر سيده، ثم قدر عليه وأنه صلى الله عليه وسلم لم يقده.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি চিৎকার করতে করতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তোমার কী হয়েছে?" সে বললো: আমার মনিব তার এক দাসীর সাথে আমাকে চুম্বন করতে দেখে আমার পুরুষাঙ্গ কেটে ফেলেছে। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "লোকটিকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" এরপর তাকে খোঁজা হলো, কিন্তু পাওয়া গেল না। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যাও, তুমি মুক্ত (স্বাধীন)।" সে বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার উপর কার সাহায্য থাকবে? সে জিজ্ঞেস করলো: আপনি কি মনে করেন যদি আমার মনিব আমাকে আবার দাস বানিয়ে নেয়? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "প্রত্যেক মুমিন বা মুসলিমের উপর।"
আহমদ-এর বর্ণনায় রয়েছে যে, যিনবা’ আবু রুহ তার এক দাসকে তার এক দাসীর সাথে পেয়ে তার নাক কেটে দিলো এবং তার পুরুষাঙ্গ কর্তন করলো। সে তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলো এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে তোমার সাথে এমন করলো?" সে বললো: যিনবা’। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (যিনবা’কে) ডাকালেন এবং বললেন: "কিসে তোমাকে এমন করতে প্ররোচিত করলো?" সে বললো: তার ঘটনা এই এই ছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাসটিকে বললেন: "যাও, তুমি মুক্ত (স্বাধীন)।" সে বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আমি কার মুক্ত দাস? তিনি বললেন: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের মুক্ত দাস।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (সাহায্য করার জন্য) মুসলিমদের প্রতি অসিয়ত করলেন। সে বললো: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইন্তেকাল করলেন, তখন সে আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে এলো এবং বললো: এটা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অসিয়ত। তিনি (আবূ বকর) বললেন: হ্যাঁ, আমরা তোমার এবং তোমার পরিবারের জন্য ভরণপোষণ চালু রাখবো। তিনি তা চালু রাখলেন, যতক্ষণ না তিনি ইন্তেকাল করলেন। যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, তখন সে তার কাছে এলো এবং বললো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অসিয়ত। তিনি (উমর) বললেন: হ্যাঁ, তুমি কোথায় যেতে চাও? সে বললো: মিশর। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিশরের প্রশাসকের কাছে লিখে দিলেন যেন তাকে এমন জমি দেওয়া হয় যা থেকে সে জীবন নির্বাহ করতে পারে।
6703 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: نحلت الرجل من بني مدلج جارية، فأصاب منها ابنا، فكان يستخدمها، فلما شب الغلام دعاها يومًا فقال: اصنعي كذا وكذا. فقال: لا تأتيك، حتى متى تستأمي أمي؟ قال:
فغضب فحذفه بسيفه. فأصاب رجله. فنزف الغلام فمات. فأنطلق في رهط من قومه إلى عمر. فقال: يا عدو نفسه، أنت الذي قتلت ابنك، لولا أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقاد الأب من ابنه" لقتلتك. هلم ديته. قال: فأتاه بعشرين أو ثلاثين ومائة بعير. قال: فخيّر منها مائة فدفعها إلى ورثته، وترك أباه.
حسن: رواه البيهقي (8/ 38) وابن الجارود (788) والدارقطني (3/ 140) كلهم من حديث محمد بن مسلم بن وارة، نا محمد بن سعيد بن سابق، نا عمرو بن أبي قيس، عن منصور، عن محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده واللفظ للبيهقي وابن الجارود.
وأما الدارقطني فاختصره على قوله:"لا يقاد الأب من ابنه" وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وقال البيهقي في"المعرفة" (12/ 40) وإسناده صحيح.
قلت: محمد بن عجلان صدوق، وتابعه الحجاج بن أرطاة في قوله:"لا يقتل والد بولده".
رواه الترمذي (1400) وابن ماجه (2662) وأحمد (346) وأبو عاصم في الديات (134) والدارقطني والبيهقي وغيرهم، كلهم من طريق الحجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قتل رجل ابنه عمدًا. فرفع إلى عمر بن الخطاب فجعل عليه مئة من الإبل إلى أن قال: ولولا أني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقتل والد بولده" لقتلتك.
والحجاج بن أرطاة مدلس وهو ضعيف، ولكن تابعه أيضا ابن لهيعة فقال: حدثنا عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقاد والد من ولد" وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يرث المال من يرث الولاء".
رواه الإمام أحمد (147) عن أبي سعيد، حدثنا عبد الله بن لهيعة بإسناده وقيل: إن ابن لهيعة لم يسمع من عمرو بن شعيب، فهذه الرواية ترده لأن فيها التصريح بالتحديث.
والخلاصة في حديث عمرو بن شعيب أنه حسن من أجله، وقد صححه البيهقي كما مضى.
ولحديث عمرو بن شعيب أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته أصحها.
وأما ما رُوي عن سراقة بن مالك قال: حضرت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُقيد الأب من ابنه، ولا يُقيد الابن من أبيه. فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1399) عن علي بن حُجر، ثنا إسماعيل بن عياش، حدثنا المثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن سراقة بن مالك فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه من حديث سراقة إلا من هذا الوجه، وليس إسناده بصحيح، رواه إسماعيل بن عياش، عن المثنى بن الصباح، والمثني بن الصباح يُضَعَّف في الحديث".
قلت: وإسماعيل بن عياش ضعيف في غير الشاميين. وهذا منه، فإن المثنى بن الصباح ليس بشامي.
ثم قال الترمذي:"وقد روى هذا الحديث أبو خالد الأحمر، عن الحجاج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقد روي هذا الحديث عن عمرو بن شعيب مرسلًا وهذا حديث فيه اضطراب. ثم ساق رواية الحجاج بن أرطاة كما مر.
وكذلك ما رُوي عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُقام الحدود في المساجد، ولا يُقتل الوالد بالولد" وهو ضعيف أيضًا.
رواه الترمذي (1401) وابن ماجه (2661) والدارمي (2402) من حديث إسماعيل بن مسلم المكي، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه بهذا الإسناد مرفوعًا إلا من حديث إسماعيل بن مسلم، وإسماعيل بن مسلم المكي تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه".
ومن هذا الوجه رواه أيضا الدارقطني (3/ 141) والبيهقي (8/ 39) وأعله بإسماعيل بن مسلم المكي. إلا أنه توبع بمتابعات ضعيفة منها: سعيد بن بشير، عن عمرو بن دينار بإسناده مثله.
رواه الحاكم (4/ 369) وسكت هو والذهبي. مع أن سعيد بن بشير وهو الأزدي ضعيف عند جمهور أهل العلم، تكلم فيه البخاري وابن معين وأبو داود والنسائي وغيرهم إلا ابن عدي فإنه كان لا يرى بأسًا بروايته، وقول الجمهور أولى.
وله متابعات أخرى لا يفرح بها، والخلاصة فيه حديث ابن عباس لا يصح.
وأما قول عبد الحق في أحكامه (4/ 70) وابن القطان في الوهم والإيهام (3/ 565): هذه الأحاديث كلها معلولة، لا يصح منها شيء ففيه نظر لما سبق.
فإن حديث عمر بن الخطاب حسن في أقل أحواله، وقد قال البيهقي: صحيح. وصحّحه أيضا ابن عبد البر في التمهيد (23/ 437) وقال:"هو حديث مشهور عند أهل العلم بالحجاز والعراق، مستفيض عندهم، يتغنى بشهرته وقبوله والعمل به عن الإسناد فيه حتى يكاد أن يكون الإسناد في مثله لشهرته تكلفا". كذا قال مع أن وجود الإسناد أساس لصحة الحديث وضعفه.
فقه الحديث: قال الشافعي: وقد حفظت عن عدد من أهل العلم لقيتهم أن لا يقتل الوالد بالولد، وبذلك أقول. ذكره البيهقي (8/ 38).
وقال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم أن الأب إذا قتل ابنه لا يُقتل به، وإذا قذف ابنه لا يحد". قلتُ: وبه قال الحنفية والحنابلة.
عبد الله بن عبد الله الأموي، عن ابن جريج وعثمان بن الأسود ويعقوب بن عطاء، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وعبد الله بن عبد الله الأموي مجهول، ويعقوب بن عطاء ضعيف ضعّفه أحمد وابن معين وغيرهما. قال ابن الهادي في"التنقيح" (4/ 490):"قال بعضهم هو من مناكير يعقوب".
وأخرج الطحاوي في شرح المعاني (3/ 184): ثنا روح بن الفرج، ثنا مهدي بن جعفر، ثنا عبد الله بن المبارك، عن عنبسة بن سعيد، عن الشعبي، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يستقاد من الجرح حتى يبرأ".
سئل أبو زرعة عن حديث رواه ابن المبارك. فقال:"هو مرسل مقلوب" العلل (1/ 456) يعني المحفوظ من الشعبي مرسلًا.
وقال البيهقي في"المعرفة" (12/ 85):"وقد روي من أوجه كلها ضعيف عن أبي الزبير، عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُمتثل من الجارح حتى يبرأ المجروح".
وروي أيضا عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم في رجل طعن رجلًا بقرن في رجله فقال: يا رسول الله، أقدني. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تعجل حتى يبرأ جرحك" قال: فأبى الرجل إلا أن يستقيد. فأقاده رسول الله صلى الله عليه وسلم منه، قال: فخرج المستقيد، وبرأ المستقاد منه، فأتي المستقيد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له: يا رسول الله، عرجتُ، وبرأ صاحبي. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم آمرك أن لا تستقيد حتى يبرأ جرحك، فعصيتني فأبعدك الله، وبطل جرحك" ثم أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد الرجل الذي عرج:"من كان به جرح أن لا يستقيد حتى تبرأ جراحته، فإذا برئت جراحته استقاد".
رواه الإمام أحمد (7034) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق قال: عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.
هكذا رواه محمد بن إسحاق عن عمرو بن شعيب مرفوعا. وهو مدلس، وليس فيه صيغة الأداء فالظاهر أنه لم يسمع منه.
وتابعه ابن جريج عن عمرو بن شعيب. ومن طريقه رواه الدارقطني (3/ 90)، وفي طريقه إليه مسلم بن خالد وهو الزنجي ضعيف.
وخالفهما أيوب فرواه عن عمرو بن شعيب مرسلًا. وهو عند الدارقطني أيضا كما رواه أيضا أيوب، عن عمرو بن دينار، عن محمد بن طلحة، عن النبي صلى الله عليه وسلم رواه أيضا الدارقطني وكذلك رواه أيضا ابن جريج، عن عمرو بن دينار، وكذلك رواه حماد بن زيد عن عمرو بن دينار. وروي من وجه آخر عن جابر كما قال البيهقي (8/ 67).
وقال ابن أبي حاتم:"سألت أبا زرعة عن حديث اختلف في الرواية عن عمرو بن دينار: أيوب
السختياني وحماد بن سلمة فروى ابن علية، عن أيوب، عن عمرو بن دينار، عن جابر أن رجلا طعن رجلا بقرن في ركبته، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم يستقيد، فقيل له: حتى يبرأ. فعجل، فاستقاد … فذكر الحديث.
وقال: ورواه حماد بن سلمة، عن عمرو بن دينار، عن محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة أن رجلا طعن رجلا فذكر الحديث.
قال أبو زرعة:"حديث حماد بن سلمة أشبه"."العلل" (1/ 463).
قلت: حديث ابن علية أخرجه ابن أبي شيبة (9/ 369) والدارقطني (3/ 89) وقال الدارقطني: قال أبو أحمد بن عبدوس: ما جاء بهذا إلا أبو بكر وعثمان. قال الشيخ: أخطأ فيه ابنا أبي شيبة. وخالفهما أحمد بن حنبل وغيره، عن ابن علية، عن أيوب، عن عمرو مرسلًا. وكذلك قال أصحاب عمرو بن دينار عنه، وهو المحفوظ مرسلًا". انتهى.
ونقل الزيلعي في نصب الراية (4/ 376 - 377) عن التنقيح:"ظاهر هذا الحديث الانقطاع".
يستفاد من أحاديث الباب مع ضعفها وإنْ كان يعضد بعضه بعضا، أنه لا يجوز الاقتصاص من الجرح حتى يستقر أمره، إما باندمال أو غيره وهو مذهب جمهور أهل العلم. وأجاز الشافعي إذا رضي به المجروح وطلبه على إسقاط ما يؤول إليه جرحه من الموت أو العيب.
انظر للمزيد"المنة الكبرى" (7/ 68).
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وهذا وهمٌ منه فإن أبا فراس وهو النهدي، وقيل: اسمه الربيع بن زياد لم يخرج له مسلم، وهو من رجال أبي داود والنسائي، ثم هو ممن انفرد بالرواية عنه أبو نضرة، ولم يوثقه أحد غير ابن حبان. فهو"مجهول"، وقال أبو زرعة: لا أعرفه.
وأما الجزء الأول من الخطبة فهو صحيح. رواه البخاري (2641) عن الحكم بن نافع، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: حدثني حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أنا عبد الله بن عتبة، قال: سمعت عمر بن الخطاب يقول:"إن أناسا كانوا يؤخذون بالوحي في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن الوحي قد انقطع، وإنما تأخذكم الآن بما ظهر لنا من أعمالكم، فمن أظهر لنا خيرا أمِنّاه وقرّبناه، وليس إلينا من سريرته شيء، اللهُ يحاسبه في سريرته، ومن أظهر لنا سوءا لم نأمنه ولم نصدقه وإن قال: إن سريرته حسنة.
আবদুল্লাহ ইবন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বানু মুদলিজের এক ব্যক্তিকে একটি দাসী প্রদান করেছিলাম। সে তার মাধ্যমে একটি পুত্র সন্তান লাভ করে। ছেলেটি তাকে (দাসীটিকে) ব্যবহার করত (সেবা নিত)। যখন ছেলেটি বড় হলো, একদিন সে তাকে ডাকল এবং বলল, ‘এটা কর এবং ওটা কর।’ সে (দাসী) বলল, ‘আমি তোমার কাছে আসব না। কতকাল তুমি আমার মাকে এভাবে জোর খাটাতে থাকবে?’ বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোকটি (পিতা) রাগান্বিত হয়ে তাকে তার তরবারি দ্বারা আঘাত করল। আঘাতটি তার পায়ে লাগে। ছেলেটির রক্তক্ষরণ হতে থাকে এবং সে মারা যায়। লোকটি তার গোত্রের কিছু লোককে নিয়ে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘হে নিজের আত্মার শত্রু! তুমিই তোমার ছেলেকে হত্যা করেছ! যদি আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে না শুনতাম যে, "ছেলের হত্যার জন্য পিতাকে কিসাস করা হবে না," তাহলে আমি তোমাকে হত্যা করতাম। রক্তমূল্য (দিয়াহ) নিয়ে এসো।’ তিনি (লোকটি) একশ বিশ অথবা একশ ত্রিশটি উট আনলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেগুলোর মধ্য থেকে একশটি বেছে নিলেন এবং তা তার ওয়ারিশদের নিকট অর্পণ করলেন, আর পিতাকে (সেখান থেকে বঞ্চিত) রাখলেন।
6704 - عن * *
৬৭০৪ - থেকে * *
6705 - عن ابن عباس يقول: كان في بني إسرائيل القصاص، ولم تكن فيهم الدية. فقال الله تعالى لهذه الأمة: {كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ فِي الْقَتْلَى الْحُرُّ بِالْحُرِّ وَالْعَبْدُ بِالْعَبْدِ وَالْأُنْثَى بِالْأُنْثَى فَمَنْ عُفِيَ لَهُ مِنْ أَخِيهِ شَيْءٌ} [البقرة: 178] فالعفو أن يقبل الدية في العمد. {فَاتِّبَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ وَأَدَاءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَانٍ} [البقرة: 178] يتبع المعروف ويؤدي بإحسان {ذَلِكَ تَخْفِيفٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ} [البقرة: 178] مما كتب على من كان قبلكم {فَمَنِ اعْتَدَى بَعْدَ ذَلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ} [البقرة: 178] أي قتل بعد قبول الدية.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4498) عن الحميدي، حدثنا سفيان، حدثنا عمرو قال: سمعت مجاهدًا قال: سمعت ابن عباس يقول: فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনী ইসরাঈলের মধ্যে কিসাস (মৃত্যুদণ্ড) ছিল, কিন্তু তাদের মধ্যে দিয়াত (রক্তমূল্য) ছিল না। অতঃপর আল্লাহ তাআলা এই উম্মতের (মুসলমানদের) জন্য বললেন: {তোমাদের উপর নিহতদের ব্যাপারে কিসাসের বিধান দেওয়া হলো: স্বাধীন ব্যক্তির বদলে স্বাধীন, দাসের বদলে দাস এবং নারীর বদলে নারী। অতঃপর তার ভাইয়ের পক্ষ থেকে যদি তাকে (হত্যার অপরাধীকে) কিছু মাফ করে দেওয়া হয়...} [সূরা বাকারা: ১৭৮] তখন (এই আয়াতে) ‘মাফ করে দেওয়া’ মানে হলো ইচ্ছাকৃত (হত্যা)-এর ক্ষেত্রে দিয়াত (রক্তমূল্য) গ্রহণ করা। {তখন যথাযথ নিয়মে তার অনুসরণ করা এবং সুন্দরভাবে তার (দিয়াত) পরিশোধ করা কর্তব্য।} [সূরা বাকারা: ১৭৮] সে যেন যথাযথ নিয়মের অনুসরণ করে এবং সুন্দরভাবে (দিয়াত) পরিশোধ করে। {এটা তোমাদের রবের পক্ষ থেকে লঘু বিধান ও দয়া।} [সূরা বাকারা: ১৭৮] যা তোমাদের পূর্ববর্তীদের উপর যা লেখা হয়েছিল, তার তুলনায় (লঘু বিধান)। {অতঃপর এরপর যে সীমালঙ্ঘন করবে, তার জন্য রয়েছে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি।} [সূরা বাকারা: ১৭৮] অর্থাৎ দিয়াত (রক্তমূল্য) গ্রহণ করার পরেও (যদি সে হত্যাকারীকে) হত্যা করে।
6706 - عن أبي جحيفة قال: سألت عليًّا رضي الله عنه: هل عندكم شيء ما ليس في القرآن. وقال مرة: ما ليس عند الناس؟ فقال: والذي فلق الحبة وبرأ النسمة ما عندنا إلا ما في القرآن إلا فهمًا يعطى رجل في كتابه وما في الصحيفة. قلت: وما في الصحيفة؟ قال: العقل، وفكاك الأسير، وأن لا يقتل مسلم بكافر.
صحيح: رواه البخاري في الديات (6903) عن صدقة بن الفضل، أخبرنا ابن عيينة، حدّثنا مطرّف، قال: سمعت الشعبي قال: سمعت أبا جحيفة فذكره.
قوله:"العقل": أي الدية. وسميت الدية عقلًا تسميةً بالمصدر.
لأن الإبل كانت تعقل بفناء ولي القتيل، ثم كثر الاستعمال حتى أطلق العقل على الدية ولو لم تكن إبلًا. فتح الباري (1
আবু জুহায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনাদের কাছে কি এমন কিছু আছে যা কুরআনে নেই? তিনি একবার বললেন: এমন কিছু যা সাধারণ মানুষের কাছে নেই? তিনি (আলী) বললেন: সেই সত্তার শপথ, যিনি শস্যদানা বিদীর্ণ করেছেন এবং প্রাণ সৃষ্টি করেছেন! আমাদের কাছে কুরআনে যা আছে তা ছাড়া অন্য কিছু নেই, তবে (আমাদের কাছে) সেই বোধগম্যতা আছে যা কোনো ব্যক্তিকে আল্লাহ্র কিতাব (কুরআনের জ্ঞান) থেকে দান করা হয় এবং আছে এই সহীফায় যা আছে। আমি বললাম: সহীফায় কী আছে? তিনি বললেন: দিয়াত (রক্তপণ), বন্দীর মুক্তি এবং কোনো মুসলমানকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না।
6707 - عن أبي هريرة قال: لما فتح الله على رسوله مكة قام في الناس، فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: ...."ومن قتل له قتيل فهو بخير النظرين: إما أن يُفدى وإما أن يُقيد".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2434)، ومسلم في الحج (1355) كلاهما من حديث الوليد
ابن مسلم، حَدَّثَنَا الأوزاعي، حَدَّثَنِي يحيى بن أبي كثير، حَدَّثَنِي أبو سلمة، حَدَّثَنِي أبو هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আল্লাহ তাঁর রাসূলের জন্য মক্কা বিজয় দান করলেন, তখন তিনি লোকদের মাঝে দাঁড়ালেন। অতঃপর তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি বর্ণনা করলেন এবং বললেন: ...‘আর যার কোনো নিহত হয়েছে, সে দুটি বিষয়ের মধ্যে উত্তমটি গ্রহণ করবে: হয় ক্ষতিপূরণ (দিয়ত) গ্রহণ করবে, নতুবা প্রতিশোধ (কিসাস) গ্রহণ করবে।’
