আল-জামি` আল-কামিল
6888 - عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحث في خطبته على الصدقة، وينهى عن المثلة.
صحيح: رواه النسائي (4047) عن محمد بن المثنى، قال: حدثنا عبد الصمد، قال: حدثنا هشام (هو الدستوائي)، عن قتادة، عن أنس فذكره.
ورواه أبو داود (4368) من وجه آخر عن هشام بإسناده في قصة عرينة وزاد: ثم نهى عن المثلة. وإسناده صحيح.
وذكرُ أبي داود النهي عن المثلة في قصة عُرينة يدل على أن قتادة كان يذكره موصولا وبلاغًا.
وهذا خلاف للحافظ ابن حجر الذي يرى أن النهي عن المثلة إدراج، وأن هذا القدر من الحديث لم يسنده قتادة عن أنس. الفتح (7/ 409).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খুতবায় সাদকা (দান) করার জন্য উৎসাহিত করতেন এবং অঙ্গহানি (মুতলাহ) করতে নিষেধ করতেন।
6889 - عن الهياج بن عمران، أن عمران أبق له غلام، فجعل الله عليه لئن قدر عليه ليقطعن يده. فأرسلني لأسأل له فأتيت سمرة بن جندب فسألته فقال كان نبي الله صلى الله عليه وسلم يحثنا على الصدقة وينهانا عن المثلة. فأتيت عمران بن حصين فسألته، فقال: كان
رسول الله صلى الله عليه وسلم يحثنا على الصدقة، وينهانا عن المثلة.
حسن: رواه أبو داود (2667) عن محمد بن المثنى، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن الحسن، عن الهياج بن عمران فذكره.
وإسناده حسن، من أجل الهياج بن عمران فإنه وثقه ابن سعد، وذكره ابن حبان في الثقات.
وأما قول الحافظ:"مقبول" فالصواب أنه صدوق. ولذا قال في الفتح (7/ 459):"وإسناد هذا الحديث قوي، وقال: هياج بن عمران البصري وثّقه ابن سعد، وابن حبان، وبقية رجاله رجال الصحيح". وقال: وأخرجه أحمد من طريق سعيد، عن قتادة بهذا الإسناد إلى عمران بن حصين، وفيه قصة".
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিয়াজ ইবনে ইমরান থেকে বর্ণিত— উমরান নামক এক ব্যক্তির একটি গোলাম (দাস) পালিয়ে গিয়েছিল। উমরান আল্লাহর নামে মানত করেছিল যে, যদি সে তাকে ধরতে পারে, তবে অবশ্যই তার হাত কেটে দেবে। অতঃপর তিনি (উমরান) আমাকে এ বিষয়ে ফতোয়া জিজ্ঞেস করার জন্য পাঠালেন। আমি সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সাদাকা করার জন্য উৎসাহ দিতেন এবং বিকৃত শাস্তি (মুছলা) দিতে নিষেধ করতেন। এরপর আমি ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনিও বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সাদাকা করার জন্য উৎসাহ দিতেন এবং বিকৃত শাস্তি (মুছলা) দিতে নিষেধ করতেন।
6890 - عن ابن عباس أن أعمى كانت له أم ولده كانت تشتم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتقع فيه، فينهاها فلا تنتهي، ويزجرها فلا تنزجر، قال: فلما كان ذات ليلة جعلت تقع في النبي صلى الله عليه وسلم، وتشتمه، فأخذ المغولَ فوضعه في بطنها، واتكأ عليه فقتلها، فوقع بين رجليها طفل، فلطخت ما هنالك بالدم، فلما أصبح ذكر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فجمع الناس فقال:"أنشد الله رجلًا فعل ما فعل، لي عليه حق إلا قام" فقام الأعمى يتخطى الناس، وهو يتزلزل حتى قعد بين يدي النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أنا صاحبها، كانت تشتمك، وتقع فيك فأنهاها فلا تنتهي، وأزجرها فلا تنزجر، ولي منها ابنان مثل اللؤلؤتين، وكانت بي رفيقة، فلما كان البارحة جعلت تشتمك وتقع فيك، فأخذت المغول فوضعته في بطنها، واتكأت عليها حتى قتلتها. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألا اشهدوا أن دمها هدر".
حسن: رواه أبو داود (4361) والنسائي (4070) وابن أبي عاصم في الديات (299)، والدارقطني (3/ 112)، والحاكم (4/ 354) كلهم من طريق إسرائيل، عن عثمان الشحام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل عثمان الشحّام العدوي أبو سلمة البصري. يقال اسم أبيه ميمون، أو عبد الله، وهو مختلف فيه. وثّقه أبو داود، وقال أحمد:"ليس به بأس" وقال أبو زرعة:"ما أرى بحديثه بأسا" وقال النسائي:"ليس بالقوي".
والمِغول: بكسر الميم، وسكون الغين. قال الخطابي:"شبه المِشْمَل، نصله دقّيق ماضٍ"، والمشمل السيف القصير، وسمي بذلك لأنه يشتمل عليه الرجل أي يغطيه بثوبه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক অন্ধ ব্যক্তির উম্মে ওয়ালাদ (সন্তানের জননী ক্রীতদাসী) ছিল। সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে গালি দিত এবং তাঁর দোষ বর্ণনা করত। অন্ধ লোকটি তাকে নিষেধ করত কিন্তু সে নিবৃত্ত হতো না, তাকে ধমকাত কিন্তু সে শান্ত হতো না।
তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন, যখন এক রাতে সে আবার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের দোষ বর্ণনা করতে ও তাঁকে গালি দিতে শুরু করল, তখন লোকটি 'মিগল' (এক ধরনের খঞ্জর) নিয়ে তার পেটে স্থাপন করল এবং তার উপর ভর দিয়ে তাকে হত্যা করল। তার দুই পায়ের মাঝখানে একটি শিশু পড়ে গেল এবং সেখানের সব রক্তে মাখামাখি হয়ে গেল।
যখন সকাল হলো, তখন বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে উল্লেখ করা হলো। তিনি লোকজনকে একত্রিত করে বললেন: "আমি আল্লাহর কসম দিয়ে সেই ব্যক্তিকে আহ্বান জানাচ্ছি, যে এই কাজ করেছে, আমার উপর যদি তার কোনো হক (অধিকার/দাবি) থাকে, সে যেন দাঁড়িয়ে যায়।"
তখন সেই অন্ধ লোকটি কাঁপতে কাঁপতে লোকজনকে ডিঙ্গিয়ে এগিয়ে গেল, এমনকি সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সামনে বসে পড়ল এবং বলল: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমিই তার হত্যাকারী। সে আপনাকে গালি দিত এবং আপনার দোষ বর্ণনা করত। আমি তাকে নিষেধ করতাম কিন্তু সে নিবৃত্ত হতো না, ধমকাত কিন্তু শান্ত হতো না। আমার কাছে তার থেকে দুটি মুক্তোর মতো সুন্দর সন্তান আছে এবং সে আমার প্রতি দয়ালুও ছিল। কিন্তু গত রাতে সে যখন আপনাকে গালি দিতে ও দোষ বর্ণনা করতে শুরু করল, তখন আমি 'মিগল' নিয়ে তার পেটে স্থাপন করলাম এবং তার উপর ভর দিয়ে তাকে হত্যা করলাম।"
তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমরা সাক্ষী থাকো, তার রক্ত মূল্যহীন।"
6891 - عن جابر بن عبد الله يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لكعب بن الأشرف، فإنه
آذى الله ورسوله؟" فقال محمد بن مسلمة: أنا يا رسول الله! أتحبُّ أن أقتله؟ قال:"نعم" فذهب فقتله.
متفق عليه: رواه البخاري في الرهن (2510) ومسلم في الجهاد (1801) كلاهما من حديث سفيان، عن عمرو، عن جابر فذكره مختصرا ومطولا.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কা'ব ইবনুল আশরাফের জন্য কে আছে? কারণ সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে কষ্ট দিয়েছে।" তখন মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামা বললেন: "আমি, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি চান যে আমি তাকে হত্যা করি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" এরপর তিনি গিয়ে তাকে হত্যা করলেন।
6892 - عن أبي برزة قال: كنت عند أبي بكر رضي الله عنه، فتغيظ على رجل فاشتد عليه، فقلت: تأذن لي يا خليفة رسول الله صلى الله عليه وسلم أضرب عنقه؟ قال: فأذهبت كلمتي غضبه، فقام فدخل فأرسل إلي فقال: ما الذي قلت آنفًا؟ قلت: ائذن لي أضرب عنقه، قال: أكنت فاعلًا لو أمرتك؟ قلت: نعم، قال: لا والله ما كانت لبشر بعد محمد صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أبو داود (4363) والنسائي (4077) وأحمد (61) وابن أبي عاصم في الديات (302) كلهم من طريق يزيد بن زريع، عن يونس بن عبيد، عن حميد بن هلال، عن عبد الله بن مطرف، عن أبي برزة فذكره.
قال النسائي: هذا الحديث أحسن الحديث وأجودها".
وقال الدارقطني أيضا في العلل (1/ 236 - 237): رواه يونس بن عبيد فجوّد إسناده.
قلت: فيه عبد الله بن مطرف وهو ابن الشخير صدوق إلا أنه توبع.
فقد رواه النسائي (4071) وأحمد (54) والحاكم (4/ 354) كلهم من طرق عن شعبة، عن توبة العنبري قال: سمعت أبا سوار القاضي يقول: عن أبي برزة الأسلمي، قال: أغلظ رجل لأبي بكر الصديق قال: فقال أبو برزة: ألا أضرب عنقه؟ فانتهره وقال: ما هي لأحد بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وللحديث طرق أخرى ذكرها ابن أبي عاصم والدارقطني في العلل وغيرهما.
قال أبو داود: قال أحمد بن حنبل: أي لم يكن لأبي بكر أن يقتل رجلا إلا بإحدى الثلاث التي قالها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كفر بعد إيمان، أو زنا بعد إحصان، أو قتل نفس بغير نفسه وكان للنبي أن يقتل (أي من سبّه).
وذكر هذا القول الخطابي أيضا في معالمه فقال: أخبرني الحسن بن يحيى، عن ابن المنذر قال: قال أحمد بن حنبل فذكر مثله. وهو في الأوسط لابن المنذر (13/ 485).
قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى:"وقد استدل به على جواز قتل ساب النبي صلى الله عليه وسلم جماعة من العلماء، منهم: أبو داود، وإسماعيل بن إسحاق القاضي، وأبو بكر بن عبد العزيز، والقاضي أبو يعلى وغيرهم من العلماء. وذلك لأن أبا برزة لما رأى الرجل قد شتم أبا بكر، وأغلظ له حتى تغيّظ أبو بكر استأذنه في أن يقتله بذلك، وأخبره أنه لو أمره لقتله، فقال أبو بكر: ليس لأحد بعد النبي صلى الله عليه وسلم. وقال"فقد تضمن الحديث خِصيصتين لرسول الله صلى الله عليه وسلم.
إحداهما: أنه يطاع في كل من أمر بقتله (أي بخلاف غيره فإنه لا يطاع في كل من أمر بقتله إلا بحقه) والثانية: أن له أن يقتل من شتمه وأغلظ له.
وهذا المعنى الثاني الذي كان له باق في حقه بعد موته، فكل من شتمه، أو أغلظ في حقه كان قتله جائزا بل بعد موته أوكد وأوكد، لأن حرمته بعد موته أكمل، والتساهل في عرضه بعد موته غير ممكن.
وهذا الحديث يُفيد أن سبّه في الجملة يبيح القتل، ويستدل بعمومه على قتل الكافر والمسلم. انتهى. انظر: الصارم المسلول علي شاتم الرسول صلى الله عليه وسلم (ص 128 - 129).
وكذلك من شتم نبيا من أنبياء الله يقتل ولا يستتاب.
قلت: قال ابن المنذر: أجمع عوام أهل العلم على أن حدّ من سب النبي صلى الله عليه وسلم القتلُ. وممن قاله مالك والليث وأحمد وإسحاق وهو مذهب الشافعي.
وقال: وحكي عن النعمان (أبو حنيفة):"لا يُقتل، يعني الذي هم عليه من الشرك أعظم" الإجماع (ص 144) وانظر أيضا الأوسط له (13/ 483).
لأن أبا حنيفة وأصحابه قالوا: لا ينتقض العهد بالسب، ولا يُقتل الذمي بذلك، لكن يعزر على إظهار ذلك كما يعزر على إظهار المنكرات.
ومن التعزير إذا رأى الإمام أن يَقْتل من سبّ النبي صلى الله عليه وسلم قتله سياسة لا حدًّا. وأما المسلم إن سب النبي صلى الله عليه وسلم فإنه يكفر بذلك، ويقتل بغير الخلاف وبه قال الأئمة الأربعة وغيرهم.
قال الخطابي:"لا أعلم أحدًّا من المسلمين اختلف في وجوب قتله".
وأما ما روي عن علي رضي الله عنه أن يهودية كانت تشتم النبي صلى الله عليه وسلم وتقع فيه، فخنقها رجل حتى ماتت، فأبطل رسول الله صلى الله عليه وسلم دمها فهو منقطع.
رواه أبو داود (4362) عن عثمان بن أبي شيبة وعبد الله بن الجراح، عن جرير، عن مغيرة، عن الشعبي، عن علي فذكره.
اختلف في سماع الشعبي من علي بن أبي طالب فأثبت سماعه البخاري في صحيحه (6812) عن آدم، حدثنا شعبة، حدثنا سلمة بن كهيل، قال: سمعت الشعبي يحدث عن علي رضي الله عنه حين رجم المرأة يوم الجمعة وقال: قد رجمتها بسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وقد سئل الدارقطني في العلل (4/ 97) فقال:"سمع منه حرفا ما سمع غير هذا" هو يشير إلى ما ذكره البخاري. وينفي عنه سماعه مطلقا. وكذلك قال أحمد: إن روايته عن علي ليست بشيء. المراسيل (290).
وكذلك لا يصح ما روي عن عمير بن أمية، أنه كانت له أخت، وكان إذا خرج إلى النبي صلى الله عليه وسلم آذتْه وشتمت النبي صلى الله عليه وسلم، وكانت مشركة، فاشتمل لها يومًا على السيف، ثم أتاها فوضعه عليها فقتلها، فقام بنوها فصاحوا وقالوا: قد علمْنا من قتلها، فتُقْتل أمنا؟ وهؤلاء قوم لهم آباء وأمهات
مشركون، فلما خاف عمير أن يقتلوا غير قاتلها ذهب إلى النبي صلى الله عليه وسلم في فأخبره، فقال:"أقتلت أختك؟" قال: نعم، قال:"ولم؟" قال: لأنها كانت تؤذيني فيك، فأرسل النبي صلى الله عليه وسلم إلى بنيها فسألهم، فسموا غير قاتلها، فأخبرهم بي وأهدر دمها، فقالوا: سمعًا وطاعةً.
رواه ابن أبي عاصم في الديات (310) والطبراني في الكبير (17/ 64) كلاهما من حديث يعقوب بن حميد، نا عبد الله بن يزيد، عن سعيد بن أبي أيوب، أن يزيد بن أبي حبيب حدثه أن أسلم بن يزيد وزيد بن إسحاق حدثاه عن عمير بن أمية فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل يعقوب بن حميد بن كاسب المدني، وقد ينسب إلى جده، جمهور أهل العلم على تضعيفه.
قال العقيلي عن زكريا بن يحيى الحلواني:"رأيت أبا داود السجستاني قد جهل حديث يعقوب بن كاسب، وقال: مات على ظهور كتبه، فسألته عنه فقال: رأينا في مسنده أحاديث أنكرناها فطالبنا بالأصول فدافعنا، ثم أخرجها بعد فوجدنا الأحاديث في الأصول مغيرة بخط طري، كانت مراسيل فأسندها وزاد فيها".
وفي الإسناد أيضا أسلم بن يزيد، وكذلك زيد بن إسحاق وقيل: يزيد بن إسحاق وبعض هؤلاء من المجهولين. ولم يضبطهم الرواة. ولعله يعود ذلك إلى يعقوب بن حميد فإنه كثير الخطأ ويروي الغرائب والعجائب.
আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি একবার আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তিনি এক ব্যক্তির উপর ক্রুদ্ধ হলেন এবং তার প্রতি কঠোর হলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খলীফা! আপনি কি আমাকে অনুমতি দেবেন যে আমি তার গর্দান (মাথা) উড়িয়ে দেই?
আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার এই কথায় তাঁর রাগ দূর হয়ে গেল। তিনি উঠে ভেতরে চলে গেলেন। এরপর তিনি আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: এইমাত্র তুমি কী বলেছিলে?
আমি বললাম, আমাকে অনুমতি দিন, আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই।
তিনি জিজ্ঞেস করলেন: আমি যদি তোমাকে আদেশ করতাম, তবে কি তুমি তা করতে?
আমি বললাম, হ্যাঁ।
তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে আর কারো জন্য এটা (এই ক্ষমতা) নয়।
6893 - عن أنس قال: كان رجل نصرانيًا، فأسلم، وقرأ البقرة وآل عمران. فكان يكتب للنبي صلى الله عليه وسلم فعاد نصرانيا فكان يقول: ما يدري محمد إلا ما كتبت له. فأماته الله فدفنوه. فأصبح وقد لفظته الأرض، فقالوا: هذا فعل محمد وأصحابه لما هرب منهم. نبشوا عن صاحبنا لما هرب منهم فألقوه. فحفروا له، وأعمقوا له في الأرض ما استطاعوا. فأصبح قد لفظته الأرض. فعلموا: أنه ليس من الناس فألقوه.
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3617) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز، عن أنس فذكره.
وأخرجه مسلم في صفات المنافقين (2781) من وجه آخر عن أنس بن مالك وزاد فيه قوله: كان منا رجل من بني النجار قد قرأ البقرة وآل عمران، وكان يكتب لرسول الله صلى الله عليه وسلم: فانطلق هاربا حتى لحق بأهل الكتاب فرفعوه وقالوا: هذا قد كان يكتب لمحمد فأعجبوا به. فما لبث أن قصم الله عنقه فيهم فحفروا له فواروه، وذكر في دفنه ثلاث مرات ثم قال: فتركوه منبوذًا".
قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله: فهذا الملعون الذي افترى على النبي صلى الله عليه وسلم أنه ما كان
يدري إلا ما كتب له، قصمه الله وفضحه بأن أخرجه من القبر بعد أن دفن مرارًا. وهذا أمر خارج عن العادة، يدل كل أحد على أن هذا كان عقوبة لما قاله، وأنه كان كاذبًا، إذ كان عامة الموتى لا يُصيبهم مثل هذا، وأن هذا الجرم أعظم من مجرد الارتداد. إذ عامة المرتدين يموتون، ولا يُصيبهم مثل هذا وأن الله منتقم لرسوله ممن طعن عليه وسبه، ومظهر لدينه، ولكذب الكاذب، إذ لم يمكن الناس أن يقيموا عليه الحد".
ثم قال رحمه الله:"ونظير هذا ما حدثنا أعداد من المسلمين العدول أهل الفقه والخبرة عما جربوه مرات متعددة في حصر الحصون والمدائن التي بالسواحل الشامية لما حصر المسلمون فيها بني الأصفر في زماننا قالوا: كنا نحن نحصر الحصن أو المدينة الشهر أو أكثر من الشهر، وهو ممتنع علينا، حتى نكاد نيأس إذ تعرض أهله لسب رسول الله صلى الله عليه وسلم والوقيعة في عرضه، فعجلنا فتحه وتيسر ولم يكد يتأخر إلا يوما أو يومين أو نحو ذلك ثم يفتح المكان عنوة، ويكون فيهم ملحمة عظيمة قالوا: حتى إن كنا لنتباشر بتعجيل الفتح إذا سمعناهم يقعون فيه مع امتلاء القلوب غيظا بما قالوه فيه.
وهكذا حدثني بعض أصحابنا الثقات أن المسلمين من أهل الغرب حالهم مع النصاري كذلك، ومن سنة الله أن يعذب أعداءه تارة بعذاب من عنده، وتارة بأيدي عباده المؤمنين.
وكذلك لما تمكن النبي صلى الله عليه وسلم من ابن أبي سرح أهدر دمه لما طعن في النبوة وافترى عليه الكذب، مع أنه قد آمن جميع أهل مكة الذين قاتلوه وحاربوه أشد المحارية، ومع أن السنة في المرتد أنه لا يقتل حتى يستاب إما وجوبا أو استحبابا.
وسنذكر - إن شاء الله تعالى - أن جماعة ارتدوا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم ثم دعوا إلى التوبة وعرضت عليهم حتى تابوا فقبلت توبتهم.
وفي ذلك دليل على أن جرم الطاعن على رسول الله صلى الله عليه وسلم في الساب له أعظم من جرم المرتد". الصارم المسلول على شاتم الرسول صلى الله عليه وسلم (ص 148).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি খ্রিস্টান ছিল। সে ইসলাম গ্রহণ করল এবং সূরা বাকারা ও আলে ইমরান পড়ল। সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য ওহি লিখত। এরপর সে পুনরায় খ্রিস্টান হয়ে গেল। সে বলত: আমি যা লিখে দিয়েছি, মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা ছাড়া আর কিছুই জানেন না।
আল্লাহ তাকে মৃত্যু দিলেন এবং তারা তাকে দাফন করল। কিন্তু সকালে দেখা গেল, মাটি তাকে বের করে বাইরে ফেলে দিয়েছে। তখন তারা বলল: এটা মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তার সাহাবীদের কাজ, কারণ সে তাদের থেকে পালিয়ে গিয়েছিল। তারা আমাদের লোকটিকে কবর খুঁড়ে বের করে বাইরে ফেলে দিয়েছে। এরপর তারা আবার তার জন্য কবর খনন করল এবং যতটা সম্ভব গভীরে খনন করল। কিন্তু সকালে দেখা গেল, মাটি তাকে পুনরায় বের করে বাইরে ফেলে দিয়েছে। তখন তারা বুঝল যে, এটি মানুষের কাজ নয়। ফলে তারা তাকে (অনাদরে) ফেলে রাখল।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি মানাকিব অধ্যায়ে (৩৬১৭) আবু মাম্মার থেকে, তিনি আব্দুল ওয়ারিস থেকে, তিনি আব্দুল আযীয থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
ইমাম মুসলিম এটি মুনাফিকদের বৈশিষ্ট্য অধ্যায়ে (২৭৮১) আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে ভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে এই অতিরিক্ত অংশটুকু উল্লেখ করেছেন: আমাদের আনসারদের বনু নাজ্জার গোত্রের একজন ব্যক্তি ছিল, যে সূরা বাকারা ও আলে ইমরান পাঠ করেছিল এবং সে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লিখত। এরপর সে পালিয়ে গিয়ে আহলে কিতাবের সাথে যোগ দিল। তারা তাকে গ্রহণ করল এবং বলল: এ তো মুহাম্মদের জন্য লিখত! তারা তাকে পেয়ে খুব খুশি হলো। কিন্তু বেশি দিন না যেতেই আল্লাহ তাদের মাঝেই তার ঘাড় ভেঙে দিলেন (তাকে মেরে ফেললেন)। তারা তার জন্য কবর খুঁড়ে তাকে দাফন করল। তার দাফনের ঘটনা তিনবার উল্লেখ করার পর তিনি বললেন: অতঃপর তারা তাকে পরিত্যক্ত অবস্থায় ফেলে রাখল।
শাইখুল ইসলাম ইবনে তাইমিয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এই অভিশপ্ত ব্যক্তি, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বিরুদ্ধে অপবাদ দিয়েছিল যে তিনি শুধু তাই জানেন যা সে লিখে দিয়েছে— আল্লাহ তার ঘাড় ভেঙে দিয়েছেন এবং তাকে অপদস্থ করেছেন এই বলে যে, তাকে বারবার দাফন করার পরেও কবর তাকে বাইরে বের করে ফেলে দিয়েছে। এটি এমন একটি অস্বাভাবিক ঘটনা যা সবার কাছে প্রমাণ করে যে, এটি তার মন্তব্যের শাস্তি ছিল এবং সে ছিল একজন মিথ্যাবাদী। কারণ অধিকাংশ মৃত ব্যক্তির ক্ষেত্রে এমন ঘটে না, এবং এটি (রাসূলের প্রতি অপবাদ দেওয়া) শুধু মুরতাদ হওয়ার চেয়েও গুরুতর অপরাধ। কারণ সাধারণত মুরতাদরা মৃত্যুবরণ করে, কিন্তু তাদের ক্ষেত্রে এমন ঘটে না। আল্লাহ তাঁর রাসূলের উপর যারা আক্রমণ করে বা তাঁকে গালি দেয়, তাদের থেকে প্রতিশোধ গ্রহণকারী এবং তিনি তাঁর দ্বীন ও মিথ্যাবাদীর মিথ্যাচারকে প্রকাশকারী, যেহেতু মানুষ তার উপর হদ (শাস্তি) কার্যকর করতে পারেনি।
এরপর তিনি (রাহিমাহুল্লাহ) আরও বলেন: এর অনুরূপ ঘটনা যা আমাদের সময়ের সিরিয়ার উপকূলীয় অঞ্চলের দুর্গ ও শহরগুলো অবরোধ করার সময় বিশ্বস্ত, ফিকহ ও অভিজ্ঞতা সম্পন্ন বহু মুসলিম আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, যখন মুসলিমরা সেখানে ইউরোপীয়দের (বনী আসফার) অবরোধ করেছিলেন। তারা বলেন: আমরা মাসখানেক বা তারও বেশি সময় ধরে কোনো দুর্গ বা শহর অবরোধ করে রাখতাম, যা আমাদের জন্য দুর্ভেদ্য থাকত। আমরা প্রায় হতাশ হয়ে পড়তাম। এমন সময় যখন এর অধিবাসীরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দেওয়া শুরু করত এবং তাঁর সম্মানে আঘাত হানত, তখন দ্রুতই আমরা সেটি জয় করে ফেলতাম। এটি সহজ হয়ে যেত এবং এক বা দুই দিনের বেশি দেরি হতো না, এরপরই জোরপূর্বক সেই স্থান জয় হতো এবং সেখানে এক বিশাল যুদ্ধ সংঘটিত হতো। তারা বলেন: এমনও হয়েছে যে, তাদের গালি দেওয়ার কথা শোনা মাত্রই আমাদের হৃদয় ক্রোধে ভরে গেলেও আমরা দ্রুত বিজয়ের সুসংবাদ দিয়ে আনন্দ প্রকাশ করতাম।
এভাবেই আমার কিছু বিশ্বস্ত বন্ধু আমাকে বর্ণনা করেছেন যে, পশ্চিমের মুসলিমদের অবস্থাও খ্রিস্টানদের সাথে একই রকম। আল্লাহর সুন্নাত হলো, তিনি কখনও তাঁর নিজের পক্ষ থেকে শাস্তি দ্বারা এবং কখনও তাঁর মুমিন বান্দাদের হাত দ্বারা তাঁর শত্রুদের শাস্তি দেন।
অনুরূপভাবে, আব্দুল্লাহ ইবনে আবি সারহ যখন নবুওয়তের উপর আক্রমণ করল এবং তাঁর বিরুদ্ধে মিথ্যা অপবাদ দিল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের পর তাকে মৃত্যুদণ্ড দেন, যদিও মক্কার সকল লোক যারা তাঁর সাথে কঠিনতম যুদ্ধ করেছিল— তারা ঈমান এনেছিল। আর মুরতাদের ক্ষেত্রে সুন্নাত হলো, তাকে তওবার জন্য আহ্বান না করা পর্যন্ত হত্যা করা হয় না— চাই তা আবশ্যক হোক বা মুস্তাহাব।
ইনশাআল্লাহ আমরা উল্লেখ করব যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে বহু লোক মুরতাদ হয়েছিল, কিন্তু তাদের তওবার আহ্বান করা হয়েছিল এবং তারা তওবা করার পর তাদের তওবা গ্রহণ করা হয়েছিল।
এ থেকে প্রমাণিত হয় যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দেওয়া বা তাঁর প্রতি আঘাত হানার অপরাধ একজন সাধারণ মুরতাদের অপরাধের চেয়েও গুরুতর। (আস-সারিমুল মাসলুল আলা শাতিমির রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম, পৃ. ১৪৮)।
6894 - عن * *
৬৮৯৪ - থেকে বর্ণিত * *
6895 - عن أنس بن مالك قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تزال جهنم تقول: هل من مزيد حتى يضع رب العزة فيها قدمه، فتقول: قط قط وعزّتك، ويُزْوى بعضها إلى بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6661) ومسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (37: 2848) كلاهما من طريق شيبان، عن قتادة، حدّثنا أنس بن مالك، فذكره.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহান্নাম সবসময় বলতে থাকবে, 'আরও আছে কি?' যতক্ষণ না আল্লাহ্ রাব্বুল ইজ্জত তার মধ্যে তাঁর কদম রাখবেন। তখন সে বলবে, 'যথেষ্ট, যথেষ্ট, আপনার ইজ্জতের কসম!' এবং তার এক অংশ অপর অংশের সাথে সংকুচিত হয়ে যাবে।"
6896 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:" … ويبقى رجل مقبل بوجهه على النار، فيقول: يا رب قد نشبني ريحها وأحرقني ذكاؤها، فاصرف وجهي عن النار، فلا يزال يدعو الله، فيقول: لعلّك إن أعطيتك أن تسألني غيره؟ فيقول: لا وعزتك لا أسألك غيره .." الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6573) ومسلم في الإيمان (299: 182) كلاهما من طريق ابن شهاب الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي هريرة. فذكر الحديث بطوله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "...এবং একজন লোক অবশিষ্ট থাকবে, যার মুখ আগুনের দিকে ফেরানো থাকবে। সে বলবে: হে আমার রব! এর (আগুনের) ধোঁয়া আমাকে ধরে ফেলেছে এবং এর তীব্র তাপ আমাকে জ্বালিয়ে দিয়েছে। সুতরাং আমার মুখ আগুন থেকে ফিরিয়ে দিন। সে অনবরত আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করতে থাকবে। (আল্লাহ) তখন বলবেন: সম্ভবত, আমি যদি তোমাকে এটা দিই, তাহলে তুমি এরপর অন্য কিছু চাইবে? সে বলবে: আপনার ইজ্জতের কসম! আমি আপনার কাছে আর অন্য কিছু চাইব না।" হাদীস।
6897 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لما خلق الله الجنة والنار، أرسل جبريل عليه السلام إلى الجنة، فقال: انظر إليها، وإلى ما أعددت لأهلها فيها، فنظر
إليها، فرجع، فقال: وعزتك، لا يسمع بها أحد إلا دخلها، فأمر بها، فحفّت بالمكاره، فقال: اذهب إليها، فانظر إليها، وإلى ما أعددت لأهلها فيها، فإذا هي قد حفت بالمكاره، فقال: وعزتك، لقد خشيت أن لا يدخلها أحد، قال: اذهب فانظر إلى النار، وإلى ما أعددت لأهلها فيها، فنظر إليها، فإذا هي يركب بعضها بعضًا، فرجع، فقال: وعزتك، لا يدخلها أحد، فأمر بها، فحفّت بالشهوات، فقال: ارجع فانظر إليها، فنظر إليها، فإذا هي قد حفت بالشهوات، فرجع، وقال: وعزتك، لقد خشيت أن لا ينجو منها أحد إلا دخلها".
حسن: رواه النسائي (3763) والترمذي (2560) وأحمد (8398) كلهم من حديث محمد بن عمرو، حدثنا أبو سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة الليثي حسن الحديث.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ যখন জান্নাত ও জাহান্নাম সৃষ্টি করলেন, তখন তিনি জিবরাইল (আঃ)-কে জান্নাতের দিকে পাঠালেন এবং বললেন, "এটিকে এবং এর অধিবাসীদের জন্য আমি যা প্রস্তুত করে রেখেছি, তা দেখ।" তিনি সেদিকে তাকালেন। তারপর ফিরে এসে বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, যে কেউ এটির কথা শুনবে, সে অবশ্যই তাতে প্রবেশ করবে।" অতঃপর আল্লাহ এর চারপাশ অপছন্দনীয় বিষয়াবলী দ্বারা বেষ্টন করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি বললেন, "সেখানে যাও এবং এটিকে ও এর অধিবাসীদের জন্য আমি যা প্রস্তুত করে রেখেছি, তা দেখ।" জিবরাইল (আঃ) গিয়ে দেখলেন, সেটিকে অপছন্দনীয় বিষয়াবলী দ্বারা বেষ্টন করা হয়েছে। তিনি বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, আমার আশঙ্কা হচ্ছে যে কেউই হয়তো তাতে প্রবেশ করতে পারবে না।" আল্লাহ বললেন, "যাও এবং জাহান্নামকে দেখ, আর এর অধিবাসীদের জন্য আমি যা প্রস্তুত করে রেখেছি, তাও দেখ।" জিবরাইল (আঃ) সেটির দিকে তাকালেন। তিনি দেখলেন, সেটি (আগুন) একটার ওপর আরেকটা চড়ে আছে। তিনি ফিরে এসে বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, কেউই তাতে প্রবেশ করবে না।" অতঃপর আল্লাহ এর চারপাশ প্রবৃত্তি ও কামনাবাসনা দ্বারা বেষ্টন করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি বললেন, "ফিরে যাও এবং এটিকে দেখ।" তিনি সেটির দিকে তাকালেন। তিনি দেখলেন, সেটি প্রবৃত্তি ও কামনাবাসনা দ্বারা বেষ্টন করা হয়েছে। তিনি ফিরে এসে বললেন, "আপনার সম্মানের কসম, আমার আশঙ্কা হচ্ছে যে কেউই তা থেকে রক্ষা পাবে না, বরং সবাই তাতে প্রবেশ করবে।
6898 - عن ابن عمر قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بعْثًا، وأمّر عليهم أسامة بن زيد، فطعن بعض الناس في إمْرته، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إن كنتم تطعنون في إمْرته، فقد كنتم تطعنون في إمرة أبيه من قبل، وأيم الله إن كان لخليقًا للإمارة، وإن كان لمن أحبّ الناس إليّ، وإنّ هذا لمن أحبّ الناس إليّ بعده".
متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6627) ومسلم في الفضائل (63: 2426) كلاهما من طريق إسماعيل بن جعفر، عن عبد الله بن دينار، أنه سمع ابن عمر يقول، فذكره.
ورواه مسلم من طريق سالم بن عمر عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال وهو على المنبر:"إن تطعنوا في إمارته - يريد أسامة بن زيد - فقد طعنتم في إمارة أبيه من قبله، وأيم الله إن كان لخليقًا لها، وأيم الله إن كان لأحبّ الناس إلي، وأيم الله إن هذا لها لخليق - يريد أسامة بن زيد -، وأيم الله إن كان لأحبّهم إليّ من بعده، فأوصيكم به فإنه من صالحيكم".
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সেনাবাহিনী প্রেরণ করলেন এবং উসামা ইবন যায়দকে তাদের সেনাপতি নিযুক্ত করলেন। তখন কিছু লোক তাঁর (উসামার) নেতৃত্বের বিষয়ে আপত্তি উত্থাপন করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে বললেন, "যদি তোমরা তার (উসামার) নেতৃত্বের বিষয়ে আপত্তি তোলো, তবে তোমরা ইতিপূর্বে তার পিতার (যায়দ ইবন হারিসার) নেতৃত্বের বিষয়েও আপত্তি তুলেছিলে। আল্লাহর কসম! নিশ্চয়ই তিনি (উসামার পিতা) নেতৃত্বের যোগ্য ছিলেন এবং নিশ্চয়ই তিনি আমার নিকট মানুষদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়জনদের অন্যতম ছিলেন। আর নিশ্চয়ই এ ব্যক্তি (উসামা) তাঁর (পিতার) পরে আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয়জনদের অন্যতম।"
6899 - عن أبي هريرة، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال سليمان: لأطوفنّ الليلة على تسعين امرأة، كلهنّ تأتي بفارس يجاهد في سبيل الله، فقال له صاحبه: قل: إن شاء الله، فلم يقل إن شاء الله، فطاف عليهنّ جميعًا فلم يحْمل منهن إلا امرأة واحدة، جاءت بشق رجل، وأيم الذي نفس محمد بيده، لو قال: إن شاء الله، لجاهدوا في سبيل الله
فرسانًا أجمعون".
متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6639) ومسلم في الأيمان والنذور (25: 1654) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن هرمز الأعرج عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সুলাইমান (আঃ) বললেন, "আমি আজ রাতে নব্বই জন স্ত্রীর কাছে অবশ্যই যাবো। তাদের প্রত্যেকেই এমন একজন অশ্বারোহী জন্ম দেবে, যে আল্লাহর পথে জিহাদ করবে।" তখন তাঁর সঙ্গী তাঁকে বললেন, "ইনশাআল্লাহ (আল্লাহ যদি চান) বলুন।" কিন্তু তিনি 'ইনশাআল্লাহ' বললেন না। অতঃপর তিনি তাদের সকলের কাছে গেলেন। কিন্তু তাদের মধ্যে একজন নারী ছাড়া আর কেউই গর্ভবতী হলো না। আর সে একটি অসম্পূর্ণ মানুষ জন্ম দিল। যার হাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবন, তাঁর কসম! যদি তিনি 'ইনশাআল্লাহ' বলতেন, তবে তারা সবাই আল্লাহর পথে অশ্বারোহী যোদ্ধা হিসেবে জিহাদ করত।
6900 - عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن أهل الجنة ليتراءون أهل الغرف من فوقهم، كما تتراءون الكوكب الدّريّ الغابر من الأفق من المشرق أو المغرب، لتفاضل ما بينهم" قالوا: يا رسول الله، تلك منازل الأنبياء لا يبلغها غيرهم. قال:"بلى، والذي نفسي بيده رجال آمنوا بالله وصدَّقوا المرسلين".
متفق عليه: رواه البخاري في بدء الخلق (3256) ومسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2831) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن صفوان بن سُليم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “জান্নাতবাসীরা তাদের ওপরের কক্ষসমূহের (উচ্চ মর্যাদার) অধিবাসীদেরকে এমনভাবে দেখতে পাবে, যেমন তোমরা দূর দিগন্তে পূর্ব বা পশ্চিম আকাশে উজ্জ্বল নক্ষত্র দেখতে পাও, তাদের মর্যাদার পার্থক্যের কারণে।” সাহাবীরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ঐগুলো তো নবীগণের স্থান, অন্য কেউ সেখানে পৌঁছতে পারবে না। তিনি বললেন: “হ্যাঁ, অবশ্যই! যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! তারা এমন লোক হবে যারা আল্লাহর প্রতি ঈমান এনেছে এবং রাসূলদেরকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে।”
6901 - عن جابر بن سمرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا هلك كسرى فلا كسرى بعده، وإن هلك قيصر فلا قيصر بعده، والذي نفسي بيده لتُنفقنّ كنوزهما في سبيل الله".
متفق عليه: رواه البخاري في فرض الخمس (3121) ومسلم في الفتن (2919) كلاهما من حديث جرير، عن عبد الملك بن عمير، عن جابر بن سمرة فذكره واللفظ للبخاري.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কিসরা (পারস্য সম্রাট) ধ্বংস হবে, তখন তার পরে আর কোনো কিসরা থাকবে না। আর যখন কাইসার (রোম সম্রাট) ধ্বংস হবে, তখন তার পরে আর কোনো কাইসার থাকবে না। যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! তোমরা অবশ্যই তাদের দুজনের ধন-ভান্ডার আল্লাহর পথে ব্যয় করবে।"
6902 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين قال لها أهل الإفك ما قالوا، فبرأها الله، فقام النبي صلى الله عليه وسلم فاستعذر من عبد الله بن أبي، فقام أسيد بن حضير، فقال لسعد بن عبادة: لعمْر الله لنقتلنَّه.
متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6662) ومسلم في التوبة (56: 1770) من طريق عن الزهري، سمعت عروة بن الزبير، وسعيد بن المسيب، وعلقمة بن وقاص، وعبيد الله بن عبد الله عن حديث عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين قال لها أهل الإفك ما قالوا، فبرأها الله، وكلّ حدثني طائفة من الحديث، فذكره والسياق للبخاري في هذا الموضع، وهو عند مسلم بطوله وتمامه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত; যখন ইফকের (মিথ্যা অপবাদের) লোকেরা তাঁকে যা বলার তা বলল এবং আল্লাহ তাঁকে নির্দোষ প্রমাণিত করলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং আবদুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের বিষয়ে (তার মন্দ থেকে) নিষ্কৃতি চাইলেন। অতঃপর উসাইদ ইবনে হুযায়র দাঁড়ালেন এবং সা'দ ইবনে উবাদাহকে বললেন: আল্লাহর কসম, আমরা অবশ্যই তাকে হত্যা করব।
6903 - عن عبد الله بن عمر قال: كثيرا ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحلف بهذه اليمين:"لا ومقلب القلوب".
صحيح: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6628) عن محمد بن يوسف، عن سفيان، عن
موسى بن عقبة، عن سالم، عن عبد الله بن عمر فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রায়শই এই কসম খেতেন: "না, অন্তরসমূহের পরিবর্তনকারীর (আল্লাহর) কসম।"
6904 - عن أنس بن مالك أبي ذرّ قال: انتهيت إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو جالس في ظل الكعبة، فلما رآني قال:"هم الأخسرون، ورب الكعبة" قال: فجئت حتى جلست، فلم أتقارّ أن قمت، فقلت: يا رسول الله، فداك أبي وأمي من هم؟ قال:"هم الأكثرون أموالًا، إلا من قال هكذا وهكذا وهكذا (من بين يديه ومن خلفه عن يمينه وعن شماله) … الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6638) ومسلم في الزكاة (30: 990) كلاهما من طريق الأعمش، عن المعرور بن سويد، عن أبي ذر، فذكره، والسياق لمسلم.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলাম, তখন তিনি কা'বার ছায়ায় বসে ছিলেন। যখন তিনি আমাকে দেখলেন, তখন বললেন: "কাবার রবের কসম! তারাই সবচেয়ে বেশি ক্ষতিগ্রস্ত।" (আবূ যার) বলেন: অতঃপর আমি এসে বসলাম। কিন্তু (কথাটি শুনে) আমি স্থির থাকতে পারলাম না, ফলে উঠে দাঁড়ালাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোক, তারা কারা? তিনি বললেন: "তারা হলো ঐ সকল লোক, যাদের সম্পদ বেশি। তবে ঐ ব্যক্তি নয়, যে এভাবে, এভাবে এবং এভাবে (তার সামনে, তার পিছনে, তার ডানে এবং তার বামে) দান করে..." [শেষ পর্যন্ত]।
6905 - عن حارثة بن وهب، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"ألا أدلكم على أهل الجنة؟ كل ضعيف متضعّف، لو أقسم على الله لأبرّه، وأهل النار: كل جوّاظ عُتُلّ مستكبِر".
متفق عليه: رواه البخاري في الأيمان والنذور (6657) ومسلم في الجنة (2853) كلاهما من طريق شعبة، حدثني معبد بن خالد، أنه سمع حارثة بن وهب، فذكره.
قوله:"كل ضعيف" أي فقير.
"متضعّف" أي الناس يستضعفونه ويحتقرونه.
"لو أقسم على الله لأبرّه" أي لو حلف يمينًا على شيء أن يقع طمعًا في كرم الله بإبراره لأبرّه وأوقعه لأجله.
"الجوّاظ": هو المختال في مشيته.
হারিসা ইবনে ওয়াহাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি কি তোমাদেরকে জান্নাতীদের সম্পর্কে অবহিত করব না? (তারা হলো) প্রত্যেক দুর্বল, যাকে দুর্বল মনে করা হয় (বা যার প্রতি মানুষ দুর্বল আচরণ করে)। সে যদি আল্লাহর নামে কসম করে তবে আল্লাহ অবশ্যই তা পূর্ণ করেন। আর জাহান্নামের অধিবাসী হলো: প্রত্যেক অহংকারী, রুক্ষ্ম স্বভাবের এবং দাম্ভিক।"
6906 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ربّ أشعث مدفوع بالأبواب، لو أقسم على الله لأبرّه".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة والأدب (2622) عن سويد بن سعيد، حدثني حفص بن ميسرة، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "অনেক এমন এলোমেলো কেশধারী (বা অপরিচ্ছন্ন) লোক আছে, যাদেরকে দরজাসমূহ থেকে তাড়িয়ে দেওয়া হয় (বা ফিরিয়ে দেওয়া হয়), যদি সে আল্লাহর নামে কসম করে কিছু বলে (বা চায়), তবে আল্লাহ তা অবশ্যই পূর্ণ করে দেন।"
6907 - عن البراء بن عازب قال: أمرنا النبي صلى الله عليه وسلم بسبع ونهانا عن سبع: أمرنا باتباع الجنائز، وعيادة المريض، وإجابة الداعي، ونصر المظلوم، وإبرار القسم، وردّ السّلام، وتشميت العاطس .. الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1239) ومسلم في اللباس والزينة (3: 2066) كلاهما من طريق أشعث بن أبي الشعثاء، قال: سمعت معاوية بن سويد بن مقرن، عن البراء، فذكره.
واللفظ للبخاري، وزاد مسلم:"أو المقْسم".
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাতটি বিষয়ের আদেশ দিয়েছেন এবং সাতটি বিষয় থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি আমাদের আদেশ করেছেন জানাযার অনুসরণ করতে, অসুস্থকে দেখতে যেতে, দাওয়াতকারীর আমন্ত্রণ গ্রহণ করতে, মজলুমকে সাহায্য করতে, কসম পূর্ণ করতে, সালামের উত্তর দিতে এবং হাঁচিদাতার জন্য দু'আ করতে (তাসমীত করতে)।
